হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2899)


2899 - أخبرنا ميمون بن إسحاق الهاشمي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا عمرو بن عاصم الكِلابي، حدثنا همَّام، عن عباس الجُريري، حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيُّما مُكاتَبٍ كُوتِبَ على ألف أُوقيّة فأدّاها إلّا عشرَ أَواقٍ، فهو عبدٌ، وأيُّما مُكاتَبٍ كُوتِب على مئة دينارٍ فأدّاها إلّا عشرةَ دنانير، فهو عبدٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি কোনো মুকাতাবকে (মুক্তির চুক্তিবদ্ধ দাস) এক হাজার উকিয়ার (রৌপ্যমুদ্রা) বিনিময়ে চুক্তি করা হয় এবং সে দশ উকিয়া ছাড়া বাকি সব পরিশোধ করে দেয়, তবে সে দাসই থাকবে। আর যদি কোনো মুকাতাবকে একশো দিনারের বিনিময়ে চুক্তি করা হয় এবং সে দশ দিনার ছাড়া বাকি সব পরিশোধ করে দেয়, তবে সে দাসই থাকবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وعباس الجُريري: هو ابن فرُّوخ، وليس هو عباسًا الجزري، كما أصلحه الإمام أحمد في "المسند" بعد أن كان في أصل نسخته: عباس الجريري، اعتمادًا على ما قاله شيخه عبد الصمد - وهو ابن عبد الوارث - الذي يرويه عن همام - وهو ابن يحيى العَوْذي - فقد رواه عن عبد الصمد غير الإمام أحمد، فقالوا فيه: عباس الجريري، وهو الذي قاله غير واحد ممَّن رواه عن همام غير عبد الصمد، كعمرو بن عاصم الكلابي هنا، وعبد الله بن يزيد المقرئ فيما نقله الدارقطني في "السنن" بإثر الحديث (4213)، وكذلك نسبه أبو الوليد الطيالسي في روايته عن همام، غير أنه انفرد بتسميته العلاء بدل عباس، فالأصح أنه عباس الجُريري كما قال الذهبي في "الكاشف". وقد تابعه على معنى حديثه سليمانُ بن سُليم الحمصي، يرويه عن عمرو بن شعيب. وأخرجه النسائي في العِتق كما في "تحفة الأشراف" (8725) عن عبد القدوس بن محمد، عن عمرو بن عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6726)، وأخرجه أبو داود (3927) عن محمد بن المثنى، كلاهما (أحمد وابن المثنى) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن همام، به. غير أنَّ عبد الله بن أحمد قال بعد أن روى هذا الحديث عن أبيه، وقال في إسناده: عباس الجزري، قال: كذا قال عبد الصمد: عباس الجزري، كان في النسخة: عباس الجريري، فأصلحه أبي كما قال عبد الصمد: الجزري. قلنا: وأما ابن المثنى فسماه في روايته عباسًا الجريري، وتابعه أحمد بن سعيد بن صخر الدارمي عند الدارقطني (4213)، فالصحيح ما كان في أصل نسخة الإمام أحمد. وقال عبد الصمد في روايته: "على مئة أوقية"، بدل: "على ألف أوقية".وأخرجه النسائي (5008) من طريق أبي الوليد الطيالسي، عن همام، عن العلاء الجُريري، عن عمرو بن شعيب؛ فسماه العلاء الجريري، فوافق غيره في النسبة، وانفرد بالاسم، والقول قول من سماه عباسًا، كما صحَّحه الذهبي. وقال أبو الوليد في روايته: "على مئة وُقيّة"، كعبد الصمد.وأخرج أبو داود (3926) من طريق إسماعيل بن عياش، عن سليمان بن سُليم الحمصي، عن عمرو بن شعيب، به. بلفظ: "المكاتَب عبدٌ ما بقي عليه من مكاتبته درهمٌ". وإسناده حسن أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2900)


2900 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلْمان بن الحسن الفقيه إملاءً ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكرَم البَزّاز، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا علي بن المُبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: قضَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في المكاتَب أن يُقتَلَ بدِيَةِ الحُرّ على قَدْر ما أَدَّى منه [1]. قال يحيى: قال عِكْرمة عن ابن عباس: يُقام عليه حدُّ المَملُوك [2].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুকাতাব (মুক্তি চুক্তিবদ্ধ দাস) সম্পর্কে এই ফায়সালা দিয়েছেন যে, তাকে (হত্যার বদলে) মুক্ত ব্যক্তির দিয়তের (রক্তমূল্য) অনুপাতে হত্যা করা হবে (বা দিয়ত দিতে হবে), যতটুকু সে (মুক্তির মূল্য) পরিশোধ করেছে তার হিসাব অনুযায়ী। ইয়াহইয়া বলেন, ইকরামা ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেন: তার উপর দাসের শাস্তি (হাদ) কার্যকর করা হবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلِف في وصله وإرساله، وفي رفعه ووقفه، كما بسطناه في "سنن أبي داود" بتحقيقنا (4581)، وقد نبَّه على ذلك أبو داود باختصار بإثر الحديث (4582).وأخرجه النسائي (6983) من طريق وكيع، عن علي بن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 3/ (1944) و (1984) و 4/ (2356)، وأبو داود (4581)، والنسائي (5000) من طريق هشام بن أبي عبد الله الدَّستُوائي، وأحمد 5/ (3423)، وأبو داود (4581)، والنسائي (6985) من طريق حجاج بن أبي عثمان الصوّاف، والنسائي (5001) و (6984) من طريق معاوية بن سلّام، ثلاثتهم عن يحيى بن أبي كثير، به. ولفظ هشام وحجاج بنحو لفظ أبان بن عبد العزيز بن يزيد الآتي عند المصنف بعده.وسيأتي برقم (2902) بلفظ وسياق فيه مغايرة من طريق أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس، ويخالف فتوى ابن عباس التي أسندها المصنف بإثر الرواية هنا، كما نبَّه عليه البيهقي 10/ 326.وإذا ضُبط قوله في الحديث هنا: "أن يَقتُل" على البناء للفاعل، يعني أن يكون المكاتب هو الذي باشر القتل، لا أنه قتله غيره، فيوافق حينئذٍ روايةَ أيوب عن عكرمة، وتكون رواية أيوب فيها زيادة معنًى ليس في هذه الرواية، وهو ذكر الميراث، لكن رواية هشام وأبان وحجاج عن يحيي تدل على أنَّ الضبط هنا بالبناء للمفعول، وعلى أية حالٍ فليس في كلتا الروايتين تعارض، بل إذا انضمتا لبعضهما أفادت كلُّ واحدة معنًى زائدًا على الأخرى، وقد جمعهما الترمذي (1259) في روايته عن أيوب عن عكرمة، لكن تبقى مخالفة المرفوع لفتوى ابن عباس التي هنا، ويبقى الخلاف في الوصل والإرسال والرفع والوقف، والله أعلم.



[2] هذا موصول بالإسناد الذي قبله، ولكنه موقوف على ابن عباس، ويخالف ظاهره رواية أيوب عن عكرمة عن ابن عباس المرفوعة الآتية برقم (2902).وأخرجه البيهقي 10/ 326 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن الجارود (982) عن محمد بن يحيى الذهلي، عن عثمان بن عمر، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 6/ 148 و 9/ 518، وابن أبي عاصم في "الديات" ص 99، والطحاوي في "أحكام القرآن" (2043)، وفي "شرح معاني الآثار" 2/ 461 من طريق وكيع بن الجراح، عن علي بن المبارك، به.وقال البيهقي 10/ 326: هذا عن ابن عباس من قوله يخالف الحديث المرفوع في القياس، ويخالف ما رواه حماد بن سلمة في النص. قلنا: يعني ما رواه حماد عن أيوب عن عكرمة في الرواية الآتية برقم (2902).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2901)


2901 - أخبرنا أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي وعلي بن عبد العزيز، قالا: حدثنا مُسلِم بن إبراهيم، حدثنا أبان بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كَثير، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُودَى المكاتَبُ بقَدْر ما عَتَقَ منه بحِسابِ الحُرِّ، وما رَقَّ فبِحسابِ العَبدِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মুক্তির চুক্তিপ্রাপ্ত (মুকাতাব) ক্রীতদাসকে তার যে পরিমাণ অংশ স্বাধীন হয়েছে, তার জন্য একজন স্বাধীন ব্যক্তির হিসাবে দিয়াত (রক্তমূল্য) দেওয়া হবে। আর তার যে পরিমাণ অংশ ক্রীতদাস হিসেবে রয়েছে, তার জন্য একজন ক্রীতদাসের হিসাবে দিয়াত দেওয়া হবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات كسابقه.وأخرجه أحمد 4/ (2660) عن عفان بن مسلم، عن أبان بن يزيد، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 5/ (3489)، والترمذي (1259) من طريق يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2902)


2902 - أخبرنا إبراهيم بن عِصْمة، حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة.وأخبرني عبد الله بن محمد الصَّيدلاني، حدثنا محمد بن أيوب؛ قالا: حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أيوب، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أصاب المُكاتَبُ حَدًّا، أو وَرِثَ ميراثًا، فإنه يَرِثُ بقَدْر ما عَتَقَ، ويُقامُ عليه بقَدْر ما عَتَقَ منه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো মুকাতাব (মুক্তি চুক্তিবদ্ধ দাস) কোনো হদ্ (শরীয়তি নির্ধারিত শাস্তিযোগ্য অপরাধ) করে অথবা কোনো উত্তরাধিকার লাভ করে, তখন সে ততটুকু অংশের উত্তরাধিকার লাভ করবে যতটুকু সে স্বাধীন হয়েছে, এবং তার উপর ততটুকু অংশের শাস্তি কার্যকর করা হবে যতটুকু সে স্বাধীন হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلف في وصله وإرساله ورفعه ووقفه، كما بيناه مبسوطًا في "سنن أبي داود" بتحقيقنا (4582)، وأشار إلى ذلك أبو داود بإثره.وأخرجه أبو داود (4582) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 5/ (3489)، والترمذي (1259)، والنسائي (5002) و (6357) و (6986) و (7226) من طريق يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، به. زاد الترمذي: وقال النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر نحو رواية أبان بن يزيد عن يحيى بن أبي كثير عن عكرمة التي تقدمت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2903)


2903 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، قال: حدثني نَبْهان مُكَاتَبُ أم سَلَمة، قال: إني لأقودُ بها بالبَيداء - أو بالأبْواء - قالت: مَن هذا؟ فقلت: أنا نَبْهان، فقالت: إني قد تركتُ بقيّة مُكاتَبتِك لابن أخي محمد بن عبد الله بن أبي أُميّة، أُعِينُه به في نكاحه، قال: فقلت: لا والله، لا أؤدّيه أبدًا، قالت: إن كان إنما بك أن تَدخُل عليَّ أو تَراني، فوالله لا تَراني أبدًا، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إذا كان عند المُكاتَب ما يُؤدِّي، فاحتجِبي منه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবহান—যিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুকাতাব (চুক্তিভিত্তিক দাস) ছিলেন—বললেন, আমি বাইদা অথবা আবওয়ার নামক স্থানে তাঁকে (তাঁর সওয়ারীকে) চালিত করছিলাম। তখন তিনি জিজ্ঞেস করলেন, এ কে? আমি বললাম, আমি নাবহান। তখন তিনি বললেন, আমি তোমার মুকাতাবা (মুক্তির চুক্তি) এর অবশিষ্ট অংশ আমার ভাতিজা মুহাম্মদ ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আবী উমাইয়্যার জন্য ছেড়ে দিলাম, যাতে তার বিবাহের ক্ষেত্রে তাকে সাহায্য করা যায়। নাবহান বললেন, আমি তখন বললাম, আল্লাহর কসম! আমি কখনোই তা (তাকে) পরিশোধ করব না। তিনি বললেন, যদি তোমার উদ্দেশ্য আমার কাছে আসা বা আমাকে দেখা হয়ে থাকে, তবে আল্লাহর কসম, তুমি আমাকে আর কখনোই দেখবে না। নিশ্চয় আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: “যখন মুকাতাবের (চুক্তিভিত্তিক দাস) কাছে তার মুক্তির মূল্য পরিশোধ করার মতো সামর্থ্য হয়, তখন তার থেকে পর্দা করো।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل نبهان مكاتب أم سلمة، فقد روى عنه الزُّهْري ومحمد بن عبد الرحمن مولى أبا طلحة وذكره ابن حبان في "الثقات"، ووثقه الذهبي في "الكاشف"، وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 15/ 668 - 669 وهو يتحدث عن حديث نبهان الآخر عن أم سلمة في حديث: "أفعمياوان أنتما": إسناده قوي، وأكثر ما عُلِّل به انفرادُ الزُّهْري بالرواية عن نبهان، وليست بعلة قادحة، فإنَّ من يعرفُه الزُّهْري، ويصفُه بأنه مُكاتَب أم سلمة، ولم يجرحه أحدٌ، لا تُرَدُّ روايته.وأخرجه أحمد 44/ (26629) عن عبد الرزاق، به. دون ذكر القصة.وأخرجه أحمد (26656) عن محمد بن جعفر، والنسائي (5012) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى السامي، كلاهما عن معمر، به. دون ذكر القصة أيضًا.وأخرجه أحمد (26473)، وأبو داود (3928)، وابن ماجه (2520)، والترمذي (1261)، والنسائي (9184) من طريق سفيان بن عيينة، والنسائي (5013) من طريق محمد بن أبي عتيق وموسى بن عقبة، و (5014) من طريق محمد بن إسحاق، و (5015) و (5016) و (9183) من طريق صالح بن كيسان، وابن حبان (4322) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، كلهم عن الزُّهْري، به. لم يذكر أحد منهم القصة سوى يونس بن يزيد، فذكرها بأتم وأوضح ممّا هنا. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.قلنا: ولا يعارض هذا حديث عبد الله بن عمرو بن العاص المتقدم برقم (2899) الذي فيه أنَّ المكاتب عبد ما بقي عليه شيء من مال مكاتبته، ولا مع عمل أم المؤمنين عائشة الذي أخرجه البيهقي 10/ 324، لما استأذن عليها سليمان بن يسار، فقالت له: من هذا؟ فقال: سليمان، قالت: كم بقي عليك من مكاتبتك؟ قال: عشر أواقٍ، قالت: ادخُل، فإنك عبد ما بقي عليك درهم. وذلك أنَّ معنى حديث أم سلمة هنا ما إذا كان عنده ما يقضي مكاتبته ويمنعه وهو واجب عليه لأجل أن يتسع له النظر ولا يمنع من الدخول على مُكاتِبتِه، كما تفيده رواية يونس بن يزيد الأيلي عن الزُّهْري عن نبهان: أنَّ أم سلمة كاتبته، فبقي من كتابته ألفا درهم، قال نبهان: فكنت أمسكها لكي لا تحتجب عني أم سلمة، فذكر نحو القصة. وكما تفيده رواية محمد بن إسحاق عن الزُّهْري، أنَّ أم سلمة قالت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد إلينا إذا كان عند مكاتب إحداكن وفاءً بما بقي من مكاتَبته فاحتجبن منه. وحمل الترمذيُّ الحديثَ على معنى التورُّع، والأقرب حملُه على ما ذكرنا لمساعدة الروايات المذكورة له.وحمله الإمام الشافعي فيما نقله عنه البيهقي في "المعرفة" (20719) على محمل آخر، فقال: هذا في شأن أمهات المؤمنين بالنظر إلى ما عظَّمهن الله به، وخصّهن به، وأنَّ احتجاب المرأة ممَّن له أن يراها واسعٌ لها، وقد أمر النبي صلى الله عليه وسلم سَوْدةَ أن تحتجب من رجل قضى أنه أخوها، وذلك يشبه أن يكون للاحتياط وأنَّ احتجاب المرأة ممَّن له أن يراها مباحٌ.قلنا: ويجوز أن يكون لما أحالت أمُّ سلمة نبهانَ على ابن أخيها ليدفع له ما بقي من كتابته صارت في حكم من استوفى كامل مال المكاتبة، وصار مكاتَبُها في حقها حرًّا تترتب عليه أحكام الأحرار من الاحتجاب وغيره، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2904)


2904 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو بكر الحَنَفي، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن عبد الله بن وهب، عن تَميم الداري، أنه قال: يا رسول الله، الرجلُ من المشركين يُسلِم على يَدَي الرجلِ المُسلمِ، قال: "هو أَولى به في حياتِه ومَماتِه" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه، وعبد الله بن وهب بن زَمْعة [2] مشهور.وشاهدُه عن تَميم الداري حديث قَبيصة بن ذُؤيب:




তামিম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), মুশরিকদের মধ্যে কোনো ব্যক্তি যদি একজন মুসলিম ব্যক্তির হাতে ইসলাম গ্রহণ করে, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (মুসলিম ব্যক্তি) তার (নও-মুসলিম) জীবন ও মরণে তার জন্য অধিক উপযুক্ত (বা তত্ত্বাবধায়ক)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن اختُلف فيه على يونس بن أبي إسحاق، وهو السَّبيعي - فرواه أبو بكر الحنفي - واسمه عبد الكبير بن عبد المجيد - كما هنا، عن يونس، عن أبيه، عن عبد الله بن وهب - وغيره يقول: ابن موهب - عن تَميم الداري، وخالف أبا بكر الحنفي عبيدُ بنُ عُقيل البصري، فرواه عن يونس بن أبي إسحاق، عن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد الله بن موهب، وهذا أولى بالصواب كما قال النسائي بإثر (6379)، وذكر الدارقطني في "الغرائب والأفراد" كما في "أطرافه" للمقدسي (1525) أنَّ هذا غريب من حديث أبي إسحاق السَّبيعي. فالمحفوظ أنَّ الحديث لعبد العزيز بن عمر كما قال المزي في "التهذيب" 16/ 288.ثم إنه اختُلف في هذا الحديث أيضًا عن ابن موهب فرواه سائر أصحاب عبد العزيز بن عمر عنه عن تَميم كما وقع هنا، وجماعة منهم يذكرون تصريح ابن موهب بسماعه من تَميم الداري، منهم وكيع وأبو نعيم الفضل بن دكين.وخالفهم يحيى بن حمزة الحضرمي كما في الطريق التالية عند المصنف، فذكر بين ابن موهب وبين تَميم رجلًا هو قبيصة بن ذؤيب. واختلف أهل العلم في تصحيح الحديث: فصحَّحه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (1642) نظرًا لتصحيح سماع ابن موهب من تَميم كما في رواية أبي نعيم، حيث صرّح بسماعه منه.وصحَّحه آخرون بذكر قبيصة بن ذؤيب لكون الواسطة قد عُلمت، وأنه ثقة وأدرك تَميمًا، ومنهم أبو زرعة الدمشقي ويعقوب بن سفيان وابن التركماني وابن القيم.وضعَّف هذا الحديثَ آخرون بانقطاعه بين ابن موهب وبين تَميم وأنه لا يصح ذكر قبيصة فيه لتفرده بذلك، منهم الشافعي والترمذي وابن المنذر والبيهقي وعبد الحق الإشبيلي، وضعفه البخاري لمعارضته حديث "الولاء لمن أعتق" (المخرّج في "الصحيحين" من حديث عائشة).واختلف فيه قول أحمد، فمرة يقول فيه: لا أعلم إلّا أنَّ ابن موهب لقي تَميمًا، كما في "العلل" برواية ابنه عبد الله (2901). وسأله ابنه صالح أيضًا عن هذا الحديث وأن فيه مخالفة لحديث "الولاء لمن أعتق"، فقال له أحمد: لهذا وجه ولهذا وجه. قلنا: ونحو هذا قول الشافعي في "الأم" 5/ 163 - 164.وضعَّف أحمد الحديث في أحيان أخرى لمعارضته لحديث "الولاء لمن أعتق"، وقد بَسَطَ ذلك في روايات عنه أبو بكر الخلّال في "أحكام أهل الملل والردة" (954 - 965).وأعلَّه الشافعي أيضًا وابن القطان بجهالة ابن موهب.وأخرجه النسائي (6378) عن محمد بن المثنى، عن أبي بكر الحنفي، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (6379) من طريق عبيد بن عقيل، عن يونس بن أبي إسحاق، عن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز عن عبد الله بن موهب، به. وقال بإثره: هذا حديث أولى بالصواب من الذي قبله.وكذلك أخرجه أحمد 28/ (16944) عن إسحاق بن يوسف الأزرق، وأحمد (16948)، وابن ماجه (2752)، والترمذي (2112) من طريق وكيع بن الجراح، والترمذي (2112) من طريق أبي أسامة وابن نمير، والنسائي (6380) من طريق عبد الله بن داود الخُريبي، خمستهم عن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد الله بن موهب، عن تَميم. وصرَّح وكيع في روايته بسماع ابن موهب من تَميم، وتابعه أبو نُعيم الفضل بن دكين عند الدارمي (3076) وغيره، وكان أبو نعيم يقول: أنا سمعت عبد العزيز بن عمر يذكر عن عبد الله بن موهب، قال: سمعت تَميمًا الداري، نقله عنه أبو زرعة الدمشقي في "تاريخه" 1/ 569.وقد بيَّن الشافعيُّ في "الأم" 5/ 164 وجه هذا الحديث، فقال: أقول: إنَّ قول رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنما الولاء لمن أعتق"، ونهيه عن بيع الولاء وعن هبته، وقوله: "الولاء لُحمة كلُحمة النسب لا يُباع ولا يُوهب" فيمن أعتق، لأنَّ العتق نسب والنسب لا يُحوّل، والذي يُسلم على يدي الرجل ليس هو المنهي أن يُحوّل ولاؤه.



[2] كذا جزم المصنف بأنَّ هذا عبد الله بن وهب بن زمعة! وهو قول لم يتقدمْه أحدٌ إليه، ولم يتابعه عليه أحدٌ، وإنما هو عبد الله بن موهب الفِلَسطيني، وقد اغتر المصنف بما ورد في إسناديه للحديث هنا، وفي نسبته في ثاني الإسنادين قرشيًا، فجزم بذلك، وهو خطأ لما سيأتي بيانه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2905)


2905 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو مُسهِر عبد الأعلى بن مُسهِر الغسّاني، حدثني يحيى بن حمزة الحَضْرمي، حدثنا عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، حدثنا عبد الله بن وهب القُرشي، عن قَبيصة بن ذُؤيب، عن تَميم الداري، قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الرجلِ يُسلِمُ على يَدَي الرجل، فقال: "هو أَولى الناس بمَحْياهُ ومَماتِه" [1].




তামীম দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সেই ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, যে অন্য ব্যক্তির হাতে ইসলাম গ্রহণ করে। তিনি বললেন: "সে (দীক্ষাদানকারী) তার (নতুন মুসলমানের) জীবন ও মরণের ক্ষেত্রে সব মানুষের চেয়ে বেশি হকদার।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن بينا عند الطريق التي قبله أنه اختُلف فيه عن عبد العزيز بن عمر في ذكر قبيصة وإسقاطه، وأنَّ يحيى بن حمزة وحده هو من انفرد بذكره. وقوله في هذا الإسناد: عبد الله بن وهب القرشي، وهمٌ ظاهرٌ من محمد بن إسحاق الصغاني أو ممن دونه، لأنَّ أبا زرعة الدمشقي في "تاريخه" 1/ 569، وعمرو بن منصور النسائي عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 232، قد رويا هذا الحديث عن أبي مسهر فقالا فيه: عبد الله بن موهب، لم ينسباه، وقالا: ابن موهب، فاتفق قولهما مع قول سائر أصحاب عبد العزيز بن عمر، وكذلك رواه هشام بن عمار ويزيد بن خالد بن موهب عن يحيى بن حمزة، ثم إنَّ أحدًا ممن ترجم لابن موهب لم ينسبه قرشيًا لا نسبًا ولا ولاءً، بل نسبوه همْدانيًا، وبعضهم قال: رجل من خولان، كما في رواية أبي القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (234).وأخرجه أبو داود (2918) عن هشام بن عمار ويزيد بن خالد بن موهب الرملي، عن يحيى بن حمزة الحضرمي، عن عبد العزيز بن عمر، عن عبد الله بن مَوهَب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2906)


2906 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا يحيى بن محمد ابن يحيى الشهيد، حدثنا مُسدَّد، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن محمد بن جُبير، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن عَوْف، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "شَهِدتُ غلامًا مع عُمومتي حِلفَ المُطيَّبين، فما يَسُرُّني أنَّ لي حُمْرَ النَّعَمِ وإني أَنكُثُه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি আমার চাচাদের সাথে হিলফুল মুতায়্যাবীন (সুগন্ধিযুক্তদের) চুক্তিতে কিশোর বয়সে উপস্থিত ছিলাম। আমার কাছে লাল উট (সর্বোত্তম সম্পদ) থাকা সত্ত্বেও যদি আমি সেই চুক্তি ভঙ্গ করি, তবে তাতে আমি মোটেও সন্তুষ্ট হব না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن إسحاق: وهو المدني.وأخرجه أحمد 3/ (1676)، وأخرجه ابن حبان (4373) من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، كلاهما (أحمد وابن أبي شيبة) عن إسماعيل ابن عُليَّة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 3/ (1655) عن بشر بن المفضّل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، به.والمطيَّبون: جمع مُطيَّب، بصيغة المفعول، وهم خمس قبائل: بنو عبد مَناف، وبنو أسد بن عبد العُزَّى، وبنو تَيْم، وبنو زُهرة، وبنو الحارث بن فِهْر، وذلك لما أرادت بنو عبد مَناف وهم بنو هاشم أخذ ما في أيدي بني عبد الدار من الحجابة والرِّفادة واللواء والسّقاية، وأبت بنو عبد الدار تسليمها إياهم، اجتمع المذكورون في دار ابن جُدعان في الجاهلية، وعقد كل قوم على أمرهم حِلفًا مؤكَّدًا على التناصر وأن لا يتخاذلوا، ثم أخرج لهم بنو عبد مَناف جَفْنةً، ثم خلطوا فيها أطيابًا وغمسوا أيديهم فيها وتعاقدوا، ثم مسحوا الكعبة بأيديهم توكيدًا، فسُمُّوا المُطيَّبين.وحُمْر النَّعَم: هي الإبل، وحُمْرها أفضلها وأنفَسُها. وأخرجه أحمد 27/ (16761)، ومسلم (2530)، وأبو داود (2925) من طريق عبد الله بن نُمير وأبي أسامة حماد بن أسامة، وأبو داود (2925) من طريق محمد بن بشر، وابن حبان (4371) من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، أربعتهم عن زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن جبير بن مُطعم.قال النووي: المراد بقوله: "لا حِلف في الإسلام": حلف التوارُث والحلف على ما منع الشرعُ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2907)


2907 - أخبرنا علي بن عبد الرحمن السَّبِيعي بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزة، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم، عن نافع بن جُبير بن مُطعِم، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا حِلفَ في الإسلام، وأيُّما حِلْفٍ كان في الجاهلية لم يَزِدْه الإسلامُ إلّا شِدّةً" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




জুবাইর ইবনে মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইসলামে কোনো (জাহিলী) অঙ্গীকার (Hilf) নেই। আর জাহিলিয়্যাতের যুগে যে কোনো অঙ্গীকার (Hilf) ছিল, ইসলাম তাকে কেবল দৃঢ়তাই দিয়েছে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ويرويه سعد بن إبراهيم - وهو ابن عبد الرحمن بن عوف - عن أبيه أيضًا عن جبير بن مُطعِم.وأخرجه النسائي (6385)، وابن حبان (4372) من طريق إسحاق بن يوسف الأزرق، عن زكريا بن أبي زائدة، به. وأخرجه أحمد 27/ (16761)، ومسلم (2530)، وأبو داود (2925) من طريق عبد الله بن نُمير وأبي أسامة حماد بن أسامة، وأبو داود (2925) من طريق محمد بن بشر، وابن حبان (4371) من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، أربعتهم عن زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن جبير بن مُطعم.قال النووي: المراد بقوله: "لا حِلف في الإسلام": حلف التوارُث والحلف على ما منع الشرعُ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2908)


2908 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار الزاهد، حدثنا أحمد بن مَهْدِي بن رُسْتُم الأصبهاني، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا قُرَّة بن خالد، عن أبي رجاء العُطَارِدي، عن أبي موسى الأشعَري؛ قال [1]: تعلَّمنا القرآنَ في هذا المسجد - يعني مسجدَ البصرة - وكنا نجلسُ حَلَقًا حَلَقًا، وكأنما أنظرُ إليه بين ثوبين أبيضين، وعنه أخذتُ هذه السورةَ: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}، قال: وكانت أولَ سورة أُنزِلَت على محمدٍ صلى الله عليه وسلم [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح علي شرط مسلم:




আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা এই মসজিদে—অর্থাৎ বসরা মসজিদে—কুরআন শিখেছিলাম। আর আমরা দলবদ্ধভাবে (বা বৃত্তাকারে) বসতাম। আমার মনে হয়, আমি যেন তাকে দেখছি, যিনি দুটি সাদা কাপড়ের মধ্যে ছিলেন, আর তার কাছ থেকেই আমি এই সূরাটি (পড়া) শিক্ষা করেছি: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ} (পড়ুন আপনার রবের নামে যিনি সৃষ্টি করেছেন)। তিনি বললেন: আর এটিই ছিল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর অবতীর্ণ প্রথম সূরা।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] القائل هو أبو رجاء العطاردي، وهو الآخذُ عن أبي موسى.



[2] إسناده صحيح. أبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو، وأبو رجاء العطاردي: هو عمران بن مِلحان.وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 542 و 14/ 88، وابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (24)، والطبري في "تفسيره" 30/ 252، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 256 من طرق عن قرة بن خالد، بهذا الإسناد.قوله: "وكانت أول سورة أنزلت" ليس المراد منه أنها نزلت كاملة، وإنما نزل من أولها أولًا خمس آيات، ثم نزل باقيها بعد ذلك، فإنَّ قوله: {كَلَّا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَيَطْغَى} نزلت في أبي جهل عندما رأى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يصلي كما جاء في حديث أبي هريرة عند مسلم (2797). وانظر "فتح الباري" 15/ 16.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2909)


2909 - أخبرناه أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، عن محمد بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن عائشة قالت: أولُ سورةٍ نزلت {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ} [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: প্রথম যে সূরাটি নাযিল হয়েছিল, তা হলো: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد ذكر سفيان - وهو ابن عُيينة - في الرواية التالية أنَّ ابن إسحاق حفظه لهم، فهذا تثبيت له في روايته.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 30/ 252، والبيهقي في "السنن" 9/ 6، وفي "دلائل النبوة" 2/ 155 من طريق عبد الرحمن بن بشر بن الحكم، والفاكهي في "أخبار مكة" (2301) عن محمد بن منصور، كلاهما عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وصحَّح البيهقي في "الدلائل" إسناده.وانظر ما بعده و (3997) و (3998)، وسيأتي معناه ضمن حديث بدء الوحي الطويل برقم (4903) من حديث الزهري عن عروة عن عائشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2910)


2910 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيان، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن عائشة - قال سفيان: حَفِظَه لنا ابنُ إسحاق -: أنَّ أول شيءٍ نَزَلَ من القرآن {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ} [1].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরআন মাজীদের সর্বপ্রথম যা নাযিল হয়েছিল তা হলো: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات إلّا أنَّ سفيان بن عيينة لم يسمعه من الزهري كما قال المصنف فيما سيأتي برقم (3997)، فقد كان سفيان يُدخِل بينهما فيه ابنَ إسحاق.وأخرجه الطبري 30/ 252، والرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (614) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2911)


2911 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحُسَين بن الفضل، حدثنا هَوْذة بن خَليفة، حدثنا عَوف بن أبي جَميلة، حدثنا يزيدُ الفارسي قال: قال لنا ابن عبَّاس: قلت لعثمانَ بن عفَّان: ما حَمَلَكم على أن عَمَدتُم إلى الأنفال وهي من المَثَاني، وإلى براءةَ، وهي من المِئِين، فقَرَنتُم بينهما ولم تكتبوا بينهما سَطْرَ: بسم الله الرحمن الرحيم، ووَضَعتُموها في السَّبْع الطُّوَل، ما حَمَلَكم على ذلك؟ فقال عثمان: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأتي عليه الزمانُ تَنزِلُ عليه السُّوَرُ ذواتُ عددٍ، فكان إذا نَزَل عليه الشيءُ يدعو بعضَ مَن كان يكتبُه فيقول: "ضَعُوا هذه في السورة التي يُذكَرُ فيها كذا وكذا"، وتَنزِلُ عليه الآيةُ فيقول: "ضَعُوا هذه في السورة التي يُذكَر فيها كذا وكذا"، فكانت الأنفال من أوائل ما أُنزِلَ بالمدينة، وبراءةُ من آخر القرآن، فكانت قِصَّتُها شبيهةً بقصَّتِها، فقُبِضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ولم يُبيِّن لنا أنها منها، فظَنَنَّا أنها منها، فمن ثمَّ قَرَنتُ بينهما ولم أكتب بينهما سَطْرَ: بسم الله الرَّحمن الرَّحيم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আপনারা কেন সূরা আল-আনফালকে, যা 'মাসানি' (দ্বি-শতাধিক আয়াতবিশিষ্ট)-র অন্তর্ভুক্ত, এবং সূরা বারাআহ (তাওবাহ)-কে, যা 'মিঈন' (শতাধিক আয়াতবিশিষ্ট)-র অন্তর্ভুক্ত, এক সাথে যুক্ত করলেন? আপনারা কেন এদের দুটির মাঝে ‘বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম’ লিখলেন না এবং সেটিকে 'আস-সাবউত তিওয়াল' (দীর্ঘ সাতটি সূরার) অন্তর্ভুক্ত করলেন? এর কারণ কী?

উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর এমন সময় আসত যখন একসাথে অনেকগুলো সূরা নাযিল হত। যখন তাঁর উপর কোনো কিছু নাযিল হত, তখন তিনি কতিপয় লিপিকারকে ডেকে বলতেন, “এটি সেই সূরার মধ্যে রেখে দাও, যেখানে অমুক অমুক বিষয় আলোচিত হয়েছে।” আবার যখন কোনো আয়াত নাযিল হত, তিনি বলতেন, “এটি সেই সূরার মধ্যে রেখে দাও, যেখানে অমুক অমুক বিষয় আলোচিত হয়েছে।” সূরা আনফাল হলো মদিনায় নাযিল হওয়া প্রথম দিকের সূরাসমূহের অন্যতম, আর সূরা বারাআহ হলো কুরআনের শেষ দিকে নাযিল হওয়া সূরাসমূহের অন্তর্ভুক্ত। কিন্তু তাদের বিষয়বস্তু প্রায় একই রকম ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হয়ে গেল, কিন্তু তিনি আমাদের কাছে স্পষ্ট করেননি যে, সূরা বারাআহ সূরা আনফালের অংশ কি না। তাই আমরা ধারণা করলাম যে, এটি তারই অন্তর্ভুক্ত। এজন্য আমি সূরা দু'টিকে একত্রিত করে দিলাম এবং এদের মাঝে ‘বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম’ লিখিনি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل يزيد الفارسي، فقد روى عنه غير واحد، وكان يكتب المصاحف كما وقع في خبر عند أحمد (3410)، وقال أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 9/ 294: لا بأس به. وحسّن الترمذي حديثه هذا، وصححه ابن حبان.ويزيد الفارسي هذا فالراجح أنه غير يزيد بن هرمز الثقة المعروف، قال البخاري في "التاريخ الكبير" 8/ 367 وفي "الضعفاء" ص 122: قال لي علي - يعني ابن المديني -: قال عبد الرحمن - يعني ابن مهدي -: يزيد الفارسي هو ابن هرمز، قال: فذكرته ليحيى - يعني ابن سعيد القطان - فلم يعرفه، قال: وكان يكون مع الأمراء.وقال ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 293: اختلفوا في يزيد بن هرمز أنه يزيد الفارسي أم لا؟ فقال عبد الرحمن بن مهدي وأحمد: يزيد الفارسي هو يزيد بن هرمز، وأنكر يحيى بن سعيد القطان أن يكونا واحدًا، وسمعت أبي يقول: يزيد بن هرمز هذا ليس بيزيد الفارسي، هو سواه، فأما يزيد بن هرمز، فهو والد عبد الله بن يزيد بن هرمز، وكان ابن هرمز من أبناء الفرس الذين كانوا بالمدينة وجالسوا أبا هريرة، وليس هو بيزيد الفارسي البصري الذي يروي عن ابن عباس.وقال المزي في "تهذيب الكمال": الصحيح أنَّ يزيد الفارسي غير يزيد بن هرمز.وأخرجه أحمد 1/ (399) و (499)، وأبو داود (786) و (787)، والترمذي (3086)، والنسائي (7953)، وابن حبان (43) من طرق عن عوف بن أبي جميلة، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن لا نعرفه إلَّا من حديث عوف عن يزيد الفارسي عن ابن عباس، ويزيد الفارسي قد روى عن ابن عباس غيرَ حديث، ويقال: هو يزيد بن هرمز.وسيأتي برقم (3311) من طريق روح بن عبادة عن عوف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2912)


2912 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي ببغداد وأبو منصور محمد بن أحمد الفارسي، قالا: حدثنا أبو بكر محمد بن شاذانَ الجَوهَري، حدثنا مُعلَّى بن منصور، حدثنا هُشَيم حدثنا داود بن أبي هند، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يومَ بَدْر: "مَن قَتَلَ قتيلًا، فله كذا وكذا"، أما المَشْيخةُ فثَبَتُوا تحت الرايات، وأما الشُّبّانُ فتسارَعوا إلى القتل والغنائم، فقالت المَشْيخةُ للشُّبّان: أَشْرِكُونا معكم، فإنَّا كنا رِدْأً لكم، ولو كان فيكم شيءٌ لَجَأتُم إلينا، فأَبَوْا، فاختصَموا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فنزلت: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ}، فقُسِمَت الغنائمُ بينهم بالسَّوِيَّة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন বলেছিলেন: "যে ব্যক্তি কোনো নিহতকে হত্যা করবে, তার জন্য থাকবে এই এই জিনিস।" কিন্তু বয়স্ক সাহাবীগণ (মাশায়েখ) ঝান্ডাগুলোর নিচে স্থির ছিলেন। আর যুবকেরা দ্রুত হত্যা (শত্রু নিধন) ও গনিমত সংগ্রহের দিকে এগিয়ে গেল। তখন বয়স্করা যুবকদের বললেন: তোমরা আমাদেরকে তোমাদের সাথে শরীক করে নাও। কেননা আমরা তোমাদের শক্তি যোগাচ্ছিলাম, আর যদি তোমাদের কোনো বিপদ আসতো, তবে তোমরা আমাদের কাছেই আশ্রয় নিতে। কিন্তু তারা (যুবকেরা) রাজি হলো না। ফলে তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বিচারপ্রার্থী হলো। তিনি বললেন: তখন নাযিল হলো: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ} (লোকে তোমাকে আনফাল সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে)। অতঃপর গনিমত তাদের মাঝে সমভাবে বণ্টন করে দেওয়া হলো।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (2738) عن زياد بن أيوب، عن هشيم، بهذا الإسناد.وقد سلف برقم (2627)، وسيأتي برقم (3299). وأخرجه النسائي (11625) عن محمد بن قُدامة، عن جرير، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (2917) و (3823) و (4002) و (4003).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2913)


2913 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المثنَّى، حدثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، حدثنا داود بن أبي هند، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس قال: أَنزل اللهُ القرآنَ إلى السماء الدنيا في ليلة القَدْر، وكان الله إذا أراد أن يُوحَى منه شيءٌ، أَوحاه، أو يَحدُثَ منه في الأرض شيءٌ، أحدَثَه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলা কুরআনকে কদরের রাতে দুনিয়ার আকাশে নাযিল করেছেন। আর আল্লাহ যখন চাইতেন যে এর মধ্য থেকে কোনো কিছু ওহী করা হবে, তিনি তা ওহী করতেন, অথবা যমীনে এর থেকে কোনো ঘটনা ঘটবে, তিনি তা ঘটাতেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (7936) من طريق يزيد بن زريع، عن داود بن أبي هند، بهذا الإسناد.وانظر ما سيأتي برقم (2912) و (2915) و (2917) و (3430) و (3823) و (4002) و (4003) و (4262). وأخرجه النسائي (11625) عن محمد بن قُدامة، عن جرير، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (2917) و (3823) و (4002) و (4003).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2914)


2914 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا موسى بن إسحاق القاضي، حدثنا أبو بكر وعثمان ابنا أبي شَيْبة، حدثنا جَرِير، عن منصور، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبَّاس في قوله: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ}، قال: أُنزِلَ القرآنُ جُمْلةً واحدةً في ليلة القَدْر إلى سماءِ الدنيا، وكان بمَوقِع النجوم، وكان الله يُنزِل على رسوله صلى الله عليه وسلم بعضَه في إثْرِ بعضٍ، قال: وقالوا: {لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْآنُ جُمْلَةً وَاحِدَةً كَذَلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِ فُؤَادَكَ وَرَتَّلْنَاهُ تَرْتِيلًا} [الفرقان: 32] [1]. صحيح على شرطهما، ولم يُخرجاه.




ইব্‌ন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর এই বাণী প্রসঙ্গে: {নিশ্চয়ই আমি এটি (কুরআন) নাযিল করেছি কদরের রাতে}। তিনি বলেন, কুরআনকে লাইলাতুল কদরে একবারে দুনিয়ার আকাশে নাযিল করা হয়েছিল এবং তা নক্ষত্রের অবস্থানে ছিল (অর্থাৎ সেখানে সংরক্ষিত ছিল)। আর আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে কিছু অংশ পরপর কিছু অংশ নাযিল করতেন। তিনি বলেন, (কাফিররা) বলতো: {তার নিকট সমগ্র কুরআন একেবারে নাযিল হলো না কেন? এভাবে (আমি নাযিল করেছি) তোমার অন্তরকে মজবুত করার জন্য এবং আমি এটাকে ধীরে ধীরে সুস্পষ্টভাবে আবৃত্তি করেছি।} (সূরা ফুরকান: ৩২)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد، ومنصور: هو ابن المعتمر. وأخرجه النسائي (11625) عن محمد بن قُدامة، عن جرير، بهذا الإسناد. وانظر ما سيأتي برقم (2917) و (3823) و (4002) و (4003).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2915)


2915 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا داود بن أبي هِنْد، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس قال: أَنزل اللهُ القرآنَ جملةً واحدةً إلى السماءِ [1] الدنيا ليلةَ القَدْر، ثم أُنزِلَ بعدَ ذلك بعشرين سنة: {وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا} [الفرقان: 33]؛ {وَقُرْآنًا فَرَقْنَاهُ لِتَقْرَأَهُ عَلَى النَّاسِ عَلَى مُكْثٍ وَنَزَّلْنَاهُ تَنْزِيلًا} [الإسراء: 106] [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ তাআলা কুরআনকে কদরের রাতে একবারে দুনিয়ার আসমানে নাযিল করেছেন। এরপর তা বিশ বছর ধরে [ধীরে ধীরে] নাযিল করা হয়। (আল্লাহ তাআলা বলেছেন): "আর তারা তোমার কাছে এমন কোনো প্রশ্ন বা সমস্যা উপস্থিত করে না, যার সঠিক সমাধান ও সর্বোত্তম ব্যাখ্যা আমি তোমার কাছে পৌঁছাইনি।" [সূরা আল-ফুরকান: ৩৩]; (এবং আরও বলেছেন): "আর আমি কুরআনকে ভাগ ভাগ করে নাযিল করেছি, যাতে তুমি মানুষের কাছে থেমে থেমে পাঠ করতে পার এবং আমি একে যথার্থভাবে নাযিল করেছি।" [সূরা আল-ইসরা: ১০৬]




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: من السماء، والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي ومن "دلائل النبوة" للبيهقي 7/ 131 حيث أخرجه عن المصنف بإسناده ومتنه، وهو الصواب.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (11308) عن أحمد بن سليمان، عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2916)


2916 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثني سليمان بن المغيرة البَكْري، عن ثابت البُنَاني، عن عبد الله بن رَبَاح الأنصاري، عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أُوحِيَ إليه لم يَستطِعْ أحدٌ منا يَرفَعُ طَرْفَه إليه حتى ينقضيَ الوحيُ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি যখন অহী নাযিল হতো, তখন আমাদের কেউ তার দিকে চোখ তুলে তাকাতে সক্ষম হতো না, যতক্ষণ পর্যন্ত অহী শেষ না হতো।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "الدلائل" 7/ 54 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهذا الحديث قطعة من الحديث الطويل في فتح مكة الذي أخرجه أحمد 16/ (10948)، ومسلم (1780)، والنسائي (11234)، وابن حبان (4760) من طرق - وهو عند النسائي من طريق زيد بن الحباب - عن سليمان بن المغيرة، به. فاستدراك الحاكم له ذهول منه رحمه الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2917)


2917 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو طاهر الزُّبيري [1] محمد بن عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن حسَّان بن حُريث، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبَّاس قال: فُصِلَ القرآنُ من الذِّكْر فوُضِعَ في بيت العِزَّة في السماء الدنيا، فجعل جبريل عليه السلام يُنزِّله على النبي صلى الله عليه وسلم يُرتِّلُه ترتيلًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআনকে ‘যিকর’ (মূল গ্রন্থ) থেকে আলাদা করা হলো এবং তাকে দুনিয়ার আকাশের ‘বাইতুল ইযযা’য় (সম্মানের ঘর) রাখা হলো। অতঃপর জিবরীল (আঃ) তা ধীরে ধীরে (তারতীল সহকারে) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নাযিল করতে থাকলেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] زاد بعده في (ب): حدثنا، فصار من رواية أبي طاهر الزبيري عن محمد بن عبد الله الأصبهاني، وهو خطأ، فإنَّ أبا طاهر الزبيري هذا هو محمد بن عبد الله بن الزبير الأصبهاني كما وقع على الصواب أيضًا عند البيهقي في "الأسماء والصفات" (496) حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه.



[2] خبر موقوف وهو صحيح، وأبو طاهر الزبيري لم نقف على ترجمته حتى تتبيَّن حاله، لكنه لم ينفرد به، فقد روي هذا عن سفيان - وهو الثوري - من غير وجه، منها رواية أبي حذيفة النهدي عنه وذلك فيما سيأتي عند المصنف برقم (4262)، وكذا روي من غير وجه عن الأعمش.وقوله في هذا الإسناد: "حسان بن حريث" كذا وقع هنا، ولعلَّه وهمٌ من بعض رواته ممَّن دون سفيان، فقد جاء في سائر المصادر: حسان بن أبي الأشرس، وهو الذي جزم به الحافظ المزي في ترجمته من "التهذيب" وفي "تحفة الأشراف" (5492). ومهما يكن من أمرٍ، فالحسّانان كلاهما ثقة.وأخرجه النسائي (7937)، والطبراني في "الكبير" (12381) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، عن سفيان، بهذا الإسناد عند النسائي: حسان غير منسوب، وعند الطبراني: حسان بن أبي الأشرس.وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 533، والطبري في "تفسيره" 2/ 144، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 8/ 2690، والطبراني (12382) من طرق عن الأعمش، به. وانظر ما سلف برقم (2913) و (2914) ومكرراتهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2918)


2918 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا المعتمِر بن سليمان، عن محمد بن عمرو بن عَلقَمة، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مِراءٌ في القرآنِ كفرٌ" [1].تابَعَه عمرُ بن أَبي سَلَمة عن أبيه:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল-কুরআন নিয়ে বিতর্ক করা কুফরী।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة، وقد توبع.وأخرجه أحمد 13/ (7848) و 15/ (9479) و 16/ (10143) و (10539) و (10834)، وأبو داود (4603)، وابن حبان (1464) من طرق عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7989)، والنسائي (8039)، وابن حبان (74) من طريق أبي حازم - وهو سلمة بن دينار - عن أبي سلمة، به. وهذا إسناد صحيح.