আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8999 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب الأُمَوي إملاءً، حدثنا أبو عمر أحمد ابن عبد الجبار بن عُمير [1] التَّميمي بالكوفة، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن شَقِيق، عن عمرو بن الحارث بن المُصطَلِق، عن ابن أخي زينبَ امرأةِ عبد الله، عن زينبَ قالت: خَطَبَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "يا معشر النساء، تَصدَّقن ولو من حُليِّكُنَّ، فإنكنَّ أكثرُ أهلِ جهنَّمَ يومَ القيامة".قالت: وكان عبد الله رجلًا خفيفَ ذاتِ اليد، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أُلقِيَ عليه المَهابةُ، فقلت له: سَلْ لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيُجزئُ عني من الصدقة النفقةُ على زوجي وأيتامٍ لي في حِجْري؟ قال لنا أبو العباس: وذكر الحديث [2]. 8999 م - فأخبرَناه أبو بكر أحمد بن جعفر بن حَمْدان الزاهد من أصل كتابه، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنبَل، حدثني أَبي، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن شَقيق، عن عمرو بن الحارث بن المُصطلِق، عن ابن أخي زينبَ امرأةِ عبد الله، عن زينبَ قالت: خَطَبَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "يا معشرَ النساء، تصدَّقن ولو من حُليِّكُنَّ، فإنكنَّ أكثر أهل جهنَّم يومَ القيامة".قالت: وكان عبد الله رجلًا خفيفَ ذاتِ اليد فقلت له: سَلْ لي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: أيُجزئُ عني من الصدقة النفقةُ على زوجي وأيتامٍ في حِجْري؟ قالت: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أُلقِيتَ عليه المَهابةُ، فقال لي عبد الله: اذهبي فسَلِيه، قالت: فانطلقتُ فانتهيتُ إلى الباب، فإذا عليه امرأةٌ من الأنصار حاجتُها كحاجَتي، قالت: فخرج إلينا بلالٌ فقلنا له: سَلْ لنا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: أتُجزئُ عنا من الصدقة النفقةُ على أزواجنا وعلى أيتامٍ في حِجْرنا؟ قالت: فدخل عليه بلالٌ، فقال: على الباب زينبُ، قال: "أيُّ الزَّيانبِ؟ " فقال: زينبُ امرأةُ عبد الله، وزينبُ امرأةٌ من الأنصار، يَسألانِك عن النفقة على أزواجهما وأيتامٍ في حُجورِهما: أيُجزئُ ذلك عنهما من الصَّدقة؟ قالت: فخرج إلينا بلالٌ، فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لهما أَجْرانِ: أَجرُ القَرَابة، وأجرُ الصَّدقة" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، وتفرَّد مسلم رحمه الله بإخراجه مختصرًا!
যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে খুৎবা দিলেন এবং বললেন: “হে নারী সমাজ! তোমরা সাদকা করো, যদিও তোমাদের অলঙ্কার থেকে হয়। কারণ কিয়ামতের দিন তোমরাই হবে জাহান্নামের অধিবাসীদের মধ্যে সংখ্যাগরিষ্ঠ।”
তিনি (যায়নাব) বলেন, আমার স্বামী আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন সামান্য সম্পদের অধিকারী (স্বল্প আয়ের মানুষ)। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর প্রতি (প্রচণ্ড) মহব্বত ও ভীতি সঞ্চারিত ছিল (ফলে আমি সরাসরি জিজ্ঞাসা করতে পারিনি)। আমি তাকে (আবদুল্লাহকে) বললাম, আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে আমার পক্ষ থেকে জিজ্ঞেস করুন: আমার স্বামী এবং আমার তত্ত্বাবধানে থাকা ইয়াতিমদের পিছনে খরচ করা কি আমার জন্য সাদকা হিসেবে যথেষ্ট হবে? আবদুল্লাহ আমাকে বললেন, তুমি নিজেই গিয়ে জিজ্ঞেস করো।
তিনি বলেন, আমি গেলাম এবং দরজার কাছে পৌঁছালাম। সেখানে আনসার গোত্রের একজন মহিলাও ছিলেন, যাঁর প্রয়োজন ছিল আমার মতোই। তিনি (যায়নাব) বলেন, এরপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে বেরিয়ে আসলেন। আমরা তাঁকে বললাম, আপনি আমাদের পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জিজ্ঞেস করুন: আমাদের স্বামীদের ও আমাদের তত্ত্বাবধানে থাকা ইয়াতিমদের পিছনে খরচ করা কি আমাদের জন্য সাদকা হিসেবে যথেষ্ট হবে?
তিনি বলেন, বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রবেশ করে বললেন, দরজায় যায়নাব আছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, “কোন যায়নাব?” বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আবদুল্লাহ (ইবনু মাসউদ)-এর স্ত্রী যায়নাব এবং আনসার গোত্রের একজন মহিলা যায়নাব, তারা দু’জনই তাঁদের স্বামীদের এবং তাঁদের তত্ত্বাবধানে থাকা ইয়াতিমদের জন্য ব্যয় করা সাদকা হিসেবে যথেষ্ট হবে কি না, সেই ব্যাপারে জিজ্ঞেস করছেন।
তিনি (যায়নাব) বলেন, অতঃপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে বেরিয়ে এসে বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তাদের উভয়ের জন্য দু’টি পুরস্কার রয়েছে: একটি আত্মীয়তার (সম্পর্ক রক্ষার) পুরস্কার এবং অপরটি সাদকার পুরস্কার।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في (ك): إلى عمر، وفي (م) إلى: عمرو، وسقط هذا الإسناد من (ز) و (ب). والمثبت على الصواب من مصادر ترجمته. وانظر تخريجه في الذي يليه.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار، وهو متابع، ومن فوقه ثقات إلّا أنَّ أبا معاوية - وهو محمد بن خازم الضرير - وهمَ في إسناده فقال: عمرو بن الحارث عن ابن أخي زينب، والصواب أنَّ عمرو بن الحارث هو ابن أخي زينب، وقد نبَّه على ذلك الترمذي بإثر الحديث (636).الأعمش: هو سليمان بن مهران، وشقيق: هو ابن سلمة أبو وائل الأسدي، وعبد الله زوج زينب: هو عبد الله بن مسعود. وانظر تخريجه في الذي يليه.
8999 [3] - إسناده صحيح على وهمٍ فيه كما سبق. وهو في "مسند أحمد" 44/ (27048).وأخرجه ابن ماجه (1734)، والترمذي (635)، والنسائي (9156)، وابن حبان (4248) من طرق عن أبي معاوية، بهذا الإسناد. وبعضهم اختصره.وأخرجه أحمد 25/ (16082)، والترمذي (636)، والنسائي (2375) و (9157) من طريق شعبة، والبخاري (1466)، ومسلم (1000) (46)، والنسائي (9158) من طريق حفص بن غياث، ومسلم (1000) (45) من طريق أبي الأحوص سلام بن سليم، ثلاثتهم عن الأعمش، عن شقيق، عن عمرو بن الحارث، عن زينب بطوله - دون قوله: "فإنكن أكثر أهل جهنم يوم القيامة"، فقد تفرَّد بها أبو معاوية عن الأعمش.
9000 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن فراس الفقيه بمكة حَرَسَها الله، حدثنا بكر بن سهل الدِّمْياطي، حدثنا عبد الله بن يوسف، حدثنا سعيد بن عبد العزيز التَّنُوخي، عن زياد بن أبي سَوْدة قال: كان عبادةُ بن الصامت على سور بيتِ المَقدِس الشَّرقي يَبكي، فقال بعضهم: ما يبكيك يا أبا الوليد؟ فقال: من هاهنا أخبرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنه رأى جهنَّمَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বাইতুল মাকদিসের পূর্ব প্রাচীরের উপর ছিলেন এবং তিনি কাঁদছিলেন। তখন তাদের কেউ কেউ তাঁকে বলল, হে আবুল ওয়ালীদ! কিসে আপনাকে কাঁদাচ্ছে? তিনি বললেন, এই স্থান থেকেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে জানিয়েছিলেন যে তিনি জাহান্নাম দেখেছিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات غير بكر بن سهل الدمياطي فإنه ضعيف، إلَّا أنه لم ينفرد به، فقد روي هذا الخبر من غير وجه عن سعيد بن عبد العزيز عن زياد بن أبي سودة، وزياد هذا روايته عن عبادة مرسلة كما سلف بيانه وتخريجه عند الرواية المتقدمة برقم (3828). بيانه عند الحديث رقم (2174)، فهما من حديث واحد، وسلفت هذه القطعة برقم (2808) من رواية معمر عن يحيى بن أبي كثير.وأخرجه أحمد 24/ (15531) عن اسماعيل ابن عليّة، عن هشام - وهو الدستوائي - بهذا الإسناد.
9001 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن دَرّاج، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: " {مَاءِ كَالْمُهْلِ} [الكهف: 29]: كعَكَر الزَّيت، فإذا قَرَّبَه إلى فيهِ سَقَطَت فَرُوةُ وجهه فيه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "{মায়ি কাল-মুহলি} [আল-কাহফ: ২৯] (গলে যাওয়া ধাতুর মতো পানি) এর অর্থ হলো তেলের তলানির মতো। যখন সে সেটিকে তার মুখের কাছে নেবে, তখন তার চেহারার চামড়া তাতে খসে পড়বে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف دراج في أبي الهيثم. وقد سلف برقم (3892). بيانه عند الحديث رقم (2174)، فهما من حديث واحد، وسلفت هذه القطعة برقم (2808) من رواية معمر عن يحيى بن أبي كثير.وأخرجه أحمد 24/ (15531) عن اسماعيل ابن عليّة، عن هشام - وهو الدستوائي - بهذا الإسناد.
9002 - أخبرنا إبراهيم بن عِصْمة العَدْل، حدثنا السَّرِيّ بن خُزَيمة، حدثنا مُسلِم بن إبراهيم، حدثنا هشام، عن يحيى بن أبي كَثير، عن أبي راشد الحُبْراني، عن عبد الرحمن بن شِبْل قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ الفُسّاق هم أهلُ النار" قالوا: يا رسول الله، وما الفُسّاق؟ قال: "النساءُ" قال رجل: يا رسول الله، ألسْنَ أمَّهاتِنا وأخَواتِنا وأزواجَنا؟ قال: "بلى، ولكنَّهنَّ إذا أُعطِينَ لم يَشكُرن، وإذا ابتُلِينَ لم يَصبِرنَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই ফাসিক্বরা হলো জাহান্নামের অধিবাসী।" সাহাবীগণ বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! ফাসিক্ব কারা? তিনি বললেন: "নারীরা।" এক ব্যক্তি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! তারা কি আমাদের মা, বোন ও স্ত্রী নন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তবে যখন তাদের কিছু দেওয়া হয়, তখন তারা কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না এবং যখন তাদের উপর কোনো পরীক্ষা আসে, তখন তারা ধৈর্য ধারণ করে না।।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلَّا أنه اختلف فيه على يحيى بن أبي كثير كما سلف بيانه عند الحديث رقم (2174)، فهما من حديث واحد، وسلفت هذه القطعة برقم (2808) من رواية معمر عن يحيى بن أبي كثير.وأخرجه أحمد 24/ (15531) عن اسماعيل ابن عليّة، عن هشام - وهو الدستوائي - بهذا الإسناد.
9003 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقّي، حدثنا أبي، حدثنا عُبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن الطُّفيل بن أُبيِّ بن كعب عن أبيه قال: بَيْنا نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة الظُّهر، والناسُ في الصفوف خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرأَينا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يتناولُ شيئًا فجعل يتناولُه، فتأخَّر وتأخَّر الناس، ثم تأخَّر الثانيةَ فتأخَّر الناس، فقلت: يا رسول الله، رأيناك صنعتَ اليومَ شيئًا ما كنت تصنعه في الصلاة! فقال: "إنه عُرِضَت عليَّ الجنةُ بما فيها من الزَّهْرة والنَّضْرة، فتناولتُ قِطْفًا من عِنَبِها، ولو أخذتُه لأَكل منه ما بينَ السماء والأرض لا يَنقُصونَه، فحِيلَ بيني وبينَه، وعُرِضَت عليَّ النارُ، فلما وجدتُ سَفْعتها تأخَّرتُ عنها، وأكثرُ مَن رأيت فيها النساءُ، إنِ ائتُمِنَّ أَفَشَينَ، وإن سأَلن ألحَفْنَ، وإذا سُئلنَ بَخِلنَ، وإذا أُعطينَ لم يَشكُرنَ، ورأيت فيها عمرَو بن لُحَيٍّ يَجُرُّ قُصْبَه في النار، وأشبَهُ ما رأيت به مَعبَدُ بنُ أَكثَمَ الكَعْبي [1] " فقال معبدٌ: يا رسول الله، أتخشى عليَّ من شَبَهه، فإنه والدٌ؟ فقال: "لا، أنت مؤمنٌ وهو كافرٌ، وهو أولُ من حَمَلَ العربَ على عبادِة الأصنام" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা একদা যোহরের সালাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম। লোকেরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিছনে সারিতে দাঁড়িয়েছিল। আমরা দেখলাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু একটা ধরার জন্য হাত বাড়াচ্ছেন, এবং তিনি তা ধরতে শুরু করলেন। এরপর তিনি পিছিয়ে গেলেন এবং লোকেরা (অনুসরণ করে) পিছিয়ে গেল। তারপর তিনি দ্বিতীয়বার পিছিয়ে গেলেন এবং লোকেরা আবার পিছিয়ে গেল। আমি বললাম, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আজ আপনাকে সালাতে এমন কিছু করতে দেখলাম যা আপনি পূর্বে কখনও করেননি!” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমার সামনে জান্নাত পেশ করা হয়েছিল—তাতে যা কিছু মনোরম ও সতেজ জিনিস রয়েছে সবকিছুসহ। আমি সেখান থেকে এক থোকা আঙ্গুর ধরতে চেয়েছিলাম। যদি আমি সেটি নিয়ে নিতাম, তবে আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী সকলে তা খেলেও তা শেষ হতো না। কিন্তু আমার এবং সেটির মাঝে প্রতিবন্ধকতা সৃষ্টি করা হলো। এবং আমার সামনে জাহান্নাম পেশ করা হয়েছিল। যখন আমি তার তাপ অনুভব করলাম, তখন আমি পিছিয়ে গেলাম। আমি দেখলাম, সেখানে যাদের সংখ্যা সর্বাধিক, তারা হলো নারী। কারণ, যদি তাদের কাছে আমানত রাখা হয়, তবে তারা তা প্রকাশ করে দেয় (গোপন রাখে না); যদি তারা কিছু চায়, তবে তারা পীড়াপীড়ি করে; যদি তাদের কাছে কিছু চাওয়া হয়, তবে তারা কৃপণতা করে; আর যদি তাদের কিছু দেওয়া হয়, তবে তারা কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না। আমি জাহান্নামে আমর ইবনু লুহাইকে দেখলাম, সে তার নাড়িভুঁড়ি টেনে নিয়ে চলছে। আমি তার চেহারার সাথে মাবাদ ইবনু আকসাম আল-কা'বীর চেহারার সর্বাধিক সাদৃশ্য দেখলাম।” তখন মাবাদ বললেন, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি আমার উপর ভয় করছেন তার সাদৃশ্যের কারণে, যখন সে ছিল (আমার) পিতা?” তিনি বললেন, “না, তুমি মু'মিন আর সে কাফির। সেই প্রথম ব্যক্তি, যে আরবদেরকে মূর্তি পূজার দিকে নিয়ে এসেছিল।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الكلبي، والصواب ما أثبتنا، فهو خزاعي كعبي، نسبة إلى كعب ابن عمرو من خزاعة. فقد أخرجه أحمد 35/ (21251) عن أحمد بن عبد الملك الحراني، عن عبيد الله بن عمرو الرقي، بهذا الإسناد. وأحمد بن عبد الملك هذا ثقة.ورواه أحمد بن عبد الملك مرة أخرى عند أحمد (21250)، وزكريا بنُ عدي وحسين بن محمد المرُّوذي عنده أيضًا 23/ (14800)، ثلاثتهم عن عبيد الله بن عمرو الرقي، عن عبد الله ابن محمد بن عقيل، عن جابر قال: بينما نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم … وذكره.وقد روى نحوَ هذه القصة عن جابر لكن في صلاة الكسوف ودون قصتَي النساء وعمرو بن لحيّ: عطاءُ بن أبي رباح وأبو الزبير فيما أخرجه أحمد 22/ (14417) و 23/ (15018) ومسلم (904) وغيرهما.وأما مقالته صلى الله عليه وسلم في النساء، فقد صحَّت عن جابر بغير هذه السياقة، أخرجها أحمد (14420) ومسلم (885) من حديث عطاء بن أبي رباح عن جابر: أنه شهد صلاة عيدٍ مع النبي صلى الله عليه وسلم، وأنه صلى الله عليه وسلم مضى إلى النساء ومعه بلال فوعظهنَّ وقال لهن: "تصدَّقن، فإنَّ أكثر كنَّ حطب جهنم" فسئل: لِمَ؟ فقال: "إنكن تُكثرنَ الشَّكَاة، وتكفُرن العشيرَ".وقوله: "تكفرن العشير" أي: تجحدن إحسان الزوج.وأما قصة عمرو بن لُحي، فيشهد لها حديث أبي هريرة التالي، ووقع التشبيه به بأكثم بن أبي الجون، وهو أصحُّ.القُصْب: الأمعاء.
[2] إسناده ضعيف لتفرد عبد الله بن محمد بن عقيل به بهذه السياقة واضطرابه في إسناده، فكان مرة يجعله من حديثه عن الطفيل بن أُبي عن أبيه، ومرة من حديثه عن جابر بن عبد الله، وهذا هو المحفوظ. وأصل القصة صحيح تابع ابنَ عقيل في بعضها عطاء بن أبي رباح وأبو الزبير عن جابر.وفي إسناد المصنف أيضًا العلاء بن هلال والد هلال، وهو ضعيف، لكنه متابع. فقد أخرجه أحمد 35/ (21251) عن أحمد بن عبد الملك الحراني، عن عبيد الله بن عمرو الرقي، بهذا الإسناد. وأحمد بن عبد الملك هذا ثقة.ورواه أحمد بن عبد الملك مرة أخرى عند أحمد (21250)، وزكريا بنُ عدي وحسين بن محمد المرُّوذي عنده أيضًا 23/ (14800)، ثلاثتهم عن عبيد الله بن عمرو الرقي، عن عبد الله ابن محمد بن عقيل، عن جابر قال: بينما نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم … وذكره.وقد روى نحوَ هذه القصة عن جابر لكن في صلاة الكسوف ودون قصتَي النساء وعمرو بن لحيّ: عطاءُ بن أبي رباح وأبو الزبير فيما أخرجه أحمد 22/ (14417) و 23/ (15018) ومسلم (904) وغيرهما.وأما مقالته صلى الله عليه وسلم في النساء، فقد صحَّت عن جابر بغير هذه السياقة، أخرجها أحمد (14420) ومسلم (885) من حديث عطاء بن أبي رباح عن جابر: أنه شهد صلاة عيدٍ مع النبي صلى الله عليه وسلم، وأنه صلى الله عليه وسلم مضى إلى النساء ومعه بلال فوعظهنَّ وقال لهن: "تصدَّقن، فإنَّ أكثر كنَّ حطب جهنم" فسئل: لِمَ؟ فقال: "إنكن تُكثرنَ الشَّكَاة، وتكفُرن العشيرَ".وقوله: "تكفرن العشير" أي: تجحدن إحسان الزوج.وأما قصة عمرو بن لُحي، فيشهد لها حديث أبي هريرة التالي، ووقع التشبيه به بأكثم بن أبي الجون، وهو أصحُّ.القُصْب: الأمعاء.
9004 - أخبرني أبو عبد الرحمن بن أبي الوَزير، حدثنا أبو حاتم الرّازي، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عُرِضَت عليَّ النارُ، فرأيتُ فيها عمرَو بنَ قَمَعَة بنِ خِندِفَ أبو عمرو، وهو يَجُرُّ قُصْبَه في النار، وهو أول من سَيَّبَ السَّوائب، وغَيَّر عهدَ إبراهيم عليه السلام، وأشبه من رأيتُ به أكثمُ بن أبي الجَوْن" قال: فقال أكثمُ: يا رسول الله، يَضرُّني شَبَهُه؟ قال: "لا، إنك مسلمٌ وإنه كافرٌ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার সামনে জাহান্নামকে পেশ করা হয়েছিল। আমি সেখানে আমর ইবনু কামআহ ইবনু খিন্দিফ আবু আমরকে দেখলাম, সে আগুনের মধ্যে তার নাড়িভুঁড়ি টেনে নিয়ে যাচ্ছে। সে-ই প্রথম ব্যক্তি, যে (দেবতাদের উদ্দেশ্যে উৎসর্গীকৃত) সাওয়ায়িব-এর প্রথা চালু করেছিল এবং ইবরাহীম (আঃ)-এর ধর্মকে পরিবর্তন করেছিল। আর আমি তার সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ হিসেবে আকছাম ইবনু আবিল জাওনকে দেখেছি।" আকছাম জিজ্ঞেস করলেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ, তার সাদৃশ্য কি আমার জন্য ক্ষতিকর হবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। কেননা তুমি মুসলিম, আর সে কাফের।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي أبو حاتم الرازي: هو محمد بن إدريس بن المنذر، وأبو سلمة هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه ابن حبان (7490) من طريق الفضل بن موسى عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد. وفيه: عمرو بن لحي بن قمعة. وأما تكنيته بأبي عمرو فلم ترد إلَّا عند المصنف ولم يذكر أحد له كنية.وأخرجه مختصرًا أحمد 14 / (8787)، والبخاري (3521)، ومسلم (2856) (51)، والنسائي (11091)، وابن حبان (6260) من طريق سعيد بن المسيب، والبخاري (3520)، ومسلم (2856) (50) من طريق أبي صالح السمان، كلاهما عن أبي هريرة. ولم يذكرا فيه أكثم بن أبي الجون وشَبَهه بعمرو بن لحي.
9005 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحر بن نَصر الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن دَرّاج، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا كان يوم القيامةِ عُرَّفَ [1] الكافِرُ بعملِهِ فَجَحَدَ وخاصمَ، فيقول له: جيرانك يَشهَدون عليك، فيقول: كَذَّبوا، فيقال: أهلُك وعشيرتُك، فيقول: كَذَبوا، فيقال: احْلِفُوا، فيَحلِفون، ثم يُصمِتُهم اللهُ، ويَشْهَدُ عليهم ألسنتُهم، فيُدخِلُهم النارَ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন কাফিরকে তার আমল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হবে। কিন্তু সে তা অস্বীকার করবে এবং ঝগড়া করবে (বিতর্ক করবে)। তখন তাকে বলা হবে: তোমার প্রতিবেশীরা তোমার বিরুদ্ধে সাক্ষ্য দিচ্ছে। সে বলবে: তারা মিথ্যা বলছে। তখন বলা হবে: তোমার পরিবার-পরিজন ও গোত্রের লোকেরা (সাক্ষী দিচ্ছে)। সে বলবে: তারা মিথ্যা বলছে। তখন বলা হবে: তোমরা কসম করো। অতঃপর তারা কসম করবে। এরপর আল্লাহ তাদেরকে নীরব করে দেবেন এবং তাদের জিহ্বা তাদের বিরুদ্ধে সাক্ষ্য দেবে। অতঃপর তিনি তাদের জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: عرى، ومكانها في (م) بياض، وسقطت من (ك). والتصويب من مصادر التخريج.
[2] إسناده ضعيف لضعف درّاج في أبي الهيثم.وأخرجه الطبري 18/ 105، وابن أبي حاتم 8/ 2558، والثعلبي 8/ 134 - ثلاثتهم في "التفسير"- من طريقين عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أسد بن موسى في "الزهد" (92)، وأبو يعلى (1392) من طريق عبد الله بن لهيعة، عن دراج، به.
9006 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا علي بن عبد العزيز ومحمد ابن غالب بن حرب، قالا: حدثنا أبو النعمان محمد بن الفضل، حدثنا سلّام ابن مِسكين قال: حدَّثَ أبو بُرْدةَ عن عبد الله بن قيس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ أهلَ النار لَيَبكُون حتى لو أُجريت السفنُ في دموعهم لجَرَتْ، وإنهم لَيَبكُون الدم"؛ يعني: مكانَ الدَّمع [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জাহান্নামের অধিবাসীরা এত বেশি কাঁদবে যে, যদি তাদের চোখের পানির ওপর জাহাজ চালানো হয়, তবে তা চলতে থাকবে। আর নিশ্চয়ই তারা রক্তের অশ্রু ঝরাবে—অর্থাৎ চোখের পানির বদলে রক্ত ঝরাবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات، إلَّا أنه منقطع بين سلام بن مسكين وأبي بردة، بينهما فيه قتادة، ثم إنه مختلف في رفعه ووقفه.فقد رواه يزيد بن هارون عند ابن أبي شيبة 13/ 156، وأبي نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 261، عن سلام بن مسكين، عن قتادة، عن أبي بردة - وهو ابن أبي موسى- عن أبيه أبي موسى عبد الله ابن قيس الأشعري موقوفًا من قوله. وقتادة قال ابن معين: لا أعلمه سمع من أبي بردة، حكاه عنه إسحاق بن منصور كما في "جامع التحصيل" للعلائي.ويشهد له حديث أنس مرفوعًا بنحو هذا اللفظ عند ابن ماجه (4324)، وإسناده ضعيف لضعف راويه عن أنس، وهو يزيد بن أبان الرقاشي، ومن أوجُهِ ضعفه في الحديث أنه كان يقلب كلام الحسن البصري فيجعله عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم وهو لا يعلم، قاله ابن حبان في "المجروحين" 3/ 98. موافقة لما في مصادر التخريج.
9007 - أخبرنا الأستاذ أبو الوليد، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا محمد بن أبي بكر، حدثنا أبو قُتَيبة، حدثنا فَرقد بن الحجَّاج أبو نَصْر، حدثنا عُقبة بن أبي الحَسْناء، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لو أُخِذَ سبعُ خَلِفاتٍ بِشُحومِهنَّ فَأُلقِينَ من شَفيرِ جهنَّم، ما انتهين إلى آخرها سبعين عامًا" [1].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি সাতটি গর্ভবতী উষ্ট্রীকে (তাদের চর্বিসহ) ধরে নিয়ে জাহান্নামের কিনারা থেকে নিক্ষেপ করা হয়, তবুও তারা সত্তর বছর পর্যন্ত তার শেষ প্রান্তে পৌঁছাতে পারবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح بطرقه وشواهده، وهذا إسناد فيه لين من جهة عقبة بن أبي الحسناء، فقد تفرَّد بالرواية عنه فرقد، وفرقد ليس بذاك القوي، وقد سلف الكلام على هذا الإسناد عند الحديث السالف برقم (8982) حيث رواه المصنف هناك من وجه آخر عن أبي هريرة.محمد بن أبي بكر: هو المقدَّمي، وأبو قتيبة: هو سَلم بن قتيبة الخراساني. موافقة لما في مصادر التخريج.
9008 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب، حدثنا عبيد الله بن محمد التَّيْمي، حدثنا حماد بن سَلَمة، حدثنا أبو حمزة، عن إبراهيم، عن عَلقَمة، عن عبد الله بن مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "أُتِيتُ بالبُرَاق، فركبتُ خلفَ جبريل عليه السلام، فسارَ بنا، فكان إذا أَتى على جبلٍ [1] إذا ارتفع ارتفَعَت رِجْلاه، وإذا هَبَطَ ارتفعت يداه، قال: فسار بنا في أرض غُمّةٍ [2] مُنتِنةٍ، حتى أفضَيْنا إلى أرض فَيْحاءَ طيِّبة، فقلت: يا جبريلُ، إنا كنا نسيرُ في أرضِ غُمّةٍ مُنتِنة، ثم أفضَيْنا إلى أرض فيحاءَ طيّبة، قال: تلك أرضُ النار، وهذه أرضُ الجنة، قال: فأتيتُ على رجل قائم يصلَّي، فقال: مَن هذا معك يا جبريلُ؟ قال: هذا أخوك محمدٌ، فرحَّبَ بي ودعا لي بالبَرَكة، وقال: سَلْ لأمَّتِك اليُسْرَ، فقلت: مَن هذا يا جبريل؟ فقال: هذا أخوك عيسى ابنُ مريمَ، قال: فسِرْنا فسمعتُ صوتًا وتذمُّرًا، فأَتينا على رجل فقال: مَن هذا يا جبريلُ؟ قال: هذا أخوك محمدٌ [فرحَّب بي ودعا لي بالبَرَكة، وقال: سَلْ لأمّتِك اليُسْرَ، فقلت: مَن هذا يا جبريلُ؟ فقال: هذا أخوك موسى] [3] قال: قلت: على من كان تذمُّرُه وصوته؟ قال: على ربِّه، قلت: على ربِّه؟! قال: نعم، قد يُعرَفُ ذلك من حِدَّتِه، قال: ثم سرنا فرأيت مصابيحَ [4] وضَوْءًا، قال: قلت: ما هذا يا جبريلُ؟ قال: هذه شجرةُ أبيك إبراهيم، أتَدنُو منها؟ قال: قلت: نعم، فدَنَوْنا، فرَحَّب بي ودعا لي بالبَرَكة، ثم مَضَيْنا حتى أتَينا بيتَ المَقدِس، فرَبَطتُ الدابةَ بالحلقة التي يَربطُ بها الأنبياءُ، ثم دخلتُ المسجدَ فَبَشَرَت بي [5] الأنبياء مَن سَمَّى اللهُ عز وجل منهم ومن لم يُسمِّ، فصلَّيتُ بهم إلَّا هؤلاءِ النَّفَرَ الثلاثةَ: إبراهيم وموسى وعيسى عليهم السلام" [6]. هذا حديث تفرَّد به أبو حمزة الأعورُ ميمونٌ، وقد اختلفت أقاويلُ أئمَّتِنا فيه، وقد أتى بزيادات لم يُخرجها الشيخان رضي الله عنهما في ذِكْر المعراج.
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে বুরাক আনা হলো। আমি জিবরীল (আঃ)-এর পিছনে আরোহণ করলাম। তিনি আমাদের নিয়ে চলতে শুরু করলেন। তিনি যখন কোনো পাহাড়ের উপর দিয়ে যেতেন, তখন (বুরাক) উপরে উঠলে তার পা দুটি উপরে উঠে যেত এবং যখন নীচে নামত তখন তার হাত দুটি উপরে উঠে যেত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর তিনি আমাদের নিয়ে এক অন্ধকারাচ্ছন্ন ও দুর্গন্ধময় ভূমির উপর দিয়ে চললেন, যতক্ষণ না আমরা প্রশস্ত ও মনোরম এক ভূমিতে পৌঁছালাম।
আমি বললাম: হে জিবরীল! আমরা তো এক অন্ধকারাচ্ছন্ন ও দুর্গন্ধময় ভূমির উপর দিয়ে পথ চলছিলাম, তারপর আমরা প্রশস্ত ও মনোরম এক ভূমিতে পৌঁছালাম। তিনি (জিবরীল) বললেন: ওটা ছিল জাহান্নামের ভূমি, আর এটা হল জান্নাতের ভূমি।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর আমি এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছালাম যিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তিনি (ঐ ব্যক্তি) বললেন: হে জিবরীল, আপনার সাথে ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মুহাম্মাদ। তখন তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন এবং বললেন: আপনার উম্মতের জন্য সহজতা চান।
আমি বললাম: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই ঈসা ইবনু মারইয়াম।
তিনি বললেন: এরপর আমরা চলতে লাগলাম। আমি একটি আওয়াজ এবং রাগের শব্দ শুনতে পেলাম। আমরা এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছালাম। তিনি বললেন: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মুহাম্মাদ। [তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন এবং বললেন: আপনার উম্মতের জন্য সহজতা চান। আমি বললাম: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মূসা।]
আমি বললাম: তাঁর রাগ ও আওয়াজ কার ওপর ছিল? তিনি (জিবরীল) বললেন: তাঁর রবের ওপর। আমি বললাম: তাঁর রবের ওপর?! তিনি বললেন: হ্যাঁ, তাঁর তীব্র মেজাজ থেকেই এটা বোঝা যায়।
তিনি বললেন: এরপর আমরা চললাম, তখন আমি কিছু বাতি ও আলো দেখলাম। আমি বললাম: হে জিবরীল, এটা কী? তিনি বললেন: এটা আপনার পিতা ইব্রাহীম (আঃ)-এর বৃক্ষ। আপনি কি এর কাছে যাবেন? আমি বললাম: হ্যাঁ। আমরা তার কাছে গেলাম। তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন।
এরপর আমরা এগিয়ে গেলাম, অবশেষে বায়তুল মাকদিসে পৌঁছালাম। আমি সেই আংটার সাথে বুরাক বাঁধলাম, যেখানে নাবীগণ তাদের বাহন বাঁধতেন। এরপর আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল যাদের নাম উল্লেখ করেছেন এবং যাদের নাম উল্লেখ করেননি, সেই সকল নাবীগণ আমার সাথে সাক্ষাৎ করলেন। আমি তাঁদের নিয়ে সালাত আদায় করলাম—তবে এই তিনজন ব্যক্তি ছাড়া: ইব্রাহীম, মূসা ও ঈসা (আলাইহিমুস সালাম)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في نسخنا الخطية: فسار بها إذ أتى رجل، وهذا تحريف، وأقرب شيء إلى الصواب ما أثبتناه موافقة لما في مصادر التخريج.
[2] أرضٌ غُمّة: أي: ضيّقة، والأرض الفيحاء: الواسعة. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.
9008 [3] - ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج، ولا بدَّ منه. ووقع بعد قوله: "قال: قلت" بياض بقدر نصف سطر في (ز) و (ب). في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.
9008 [4] - في النسخ الخطية: مصابيحًا، والجادة ما أثبتنا. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.
9008 [5] - بَشَرَت بي: أي: سُرَّت بي. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.
9008 [6] - إسناده ضعيف جدًا، ومتنه منكر، تفرَّد به أبو حمزة الأعور كما قال المصنف، وهو متفق على ضعفه. إبراهيم هو ابن يزيد النَّخَعي، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (22)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.
9009 - أخبرني عَبْدانُ بن يزيد الدَّقاق بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا أبو طلحة الراسِبي، عن غَيْلان بن جَرير، عن أبي بُرْدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تُحشَرُ هذه الأمة على ثلاثة أصنافٍ: صنفٍ يدخلون الجنةَ بغير حساب، وصنفٍ يُحاسبون حسابًا يسيرًا، وآخرين يَجيئون [1] على ظُهورِهم أمثالُ الجبال الراسيَة، فيسأل الله عنهم -وهو أعلمُ- فيقول: هؤلاءِ عَبيدٌ من عَبيدي لم يُشرِكوا بي شيئًا، وعلى ظهورِهم الخطايا والذنوبُ، حُطُّوها واجعلوها على اليهود والنصارى، وادخُلوا الجنةَ بَرحْمتي" [2].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "وآخرين يجيئون" هذا أقرب شيء يقرأ به هذا الحرف في (ز) و (ب)، ووقع مكانه بياض في (م)، وفي (ك) مكانه: وصنف على ظهورهم .... وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 357 من طريق يزيد بن موهب، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وقرن بعمرو بن الحارث عبدَ الله بن لهيعة.ويشهد له حديث ابن مسعود عند ابن حبان (567) و (5559). وإسناده حسن.وحديث قيس بن سعد عند ابن عدي 2/ 161، والبيهقي في "الشعب" (4887) و (10595). قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" بتحقيقنا 7/ 138: إسناده لا بأس به.وحديث أبي هريرة عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (381)، والبزار (9517)، وابن عدي 4/ 326 و 6/ 72، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 209، والبيهقي في "الشعب" (6581)، بأسانيد ضعيفة.وحديث الحسن البصري مرسلًا عند أبي داود في "المراسيل" (165)، ورجاله ثقات.وعلَّقه البخاري في "صحيحه" بين يدي الحديث (2142) بلا إسناد بلفظ: "الخديعة في النار".
[2] ضعيف بهذا اللفظ كما سلف بيانه وتحقيقه عند المصنف برقم (194). وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 357 من طريق يزيد بن موهب، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وقرن بعمرو بن الحارث عبدَ الله بن لهيعة.ويشهد له حديث ابن مسعود عند ابن حبان (567) و (5559). وإسناده حسن.وحديث قيس بن سعد عند ابن عدي 2/ 161، والبيهقي في "الشعب" (4887) و (10595). قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" بتحقيقنا 7/ 138: إسناده لا بأس به.وحديث أبي هريرة عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (381)، والبزار (9517)، وابن عدي 4/ 326 و 6/ 72، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 209، والبيهقي في "الشعب" (6581)، بأسانيد ضعيفة.وحديث الحسن البصري مرسلًا عند أبي داود في "المراسيل" (165)، ورجاله ثقات.وعلَّقه البخاري في "صحيحه" بين يدي الحديث (2142) بلا إسناد بلفظ: "الخديعة في النار".
9010 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حَبيب، عن سِنان بن سعد، عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "المَكرُ والخديعةُ والخِيانةُ في النار" [1].
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل سنان بن سعد، فإنه صالح للاعتبار. وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 3/ 357 من طريق يزيد بن موهب، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وقرن بعمرو بن الحارث عبدَ الله بن لهيعة.ويشهد له حديث ابن مسعود عند ابن حبان (567) و (5559). وإسناده حسن.وحديث قيس بن سعد عند ابن عدي 2/ 161، والبيهقي في "الشعب" (4887) و (10595). قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" بتحقيقنا 7/ 138: إسناده لا بأس به.وحديث أبي هريرة عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (381)، والبزار (9517)، وابن عدي 4/ 326 و 6/ 72، وأبي نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 209، والبيهقي في "الشعب" (6581)، بأسانيد ضعيفة.وحديث الحسن البصري مرسلًا عند أبي داود في "المراسيل" (165)، ورجاله ثقات.وعلَّقه البخاري في "صحيحه" بين يدي الحديث (2142) بلا إسناد بلفظ: "الخديعة في النار".
9011 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن عَمْرَوَيهِ الصَّفّار ببغداد، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني [1]، حدثنا أبو الجوَّاب، حدثنا يحيى بن سَلَمة بن كُهَيل، عن أبيه، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عمر، أنه كان يقول: أَطَلَعَت الحمراءُ بعدُ؟ فإذا رآها قال: لا مَرحبًا، ثم قال: إنَّ مَلكين من الملائكة، هَارُوتَ وَمَارُوتَ، سَأَلَا اللهَ تعالى أن يَهبِطا إلى الأرض، فأهبطا إلى الأرض، فكانا يَقضِيان بين الناس، فإذا أمسيَا تكلَّما بكلماتٍ وعَرَجا بها إلى السماء، فقُيِّضَ لهما بامرأةٍ من أحسن الناس، وأُلقيت عليهما الشَّهوةُ، فجعلا يؤخِّرانها، وأُلقيت في أنفُسِهما، فلم يزالا يفعلانِ حتى وَعَدَتهما ميعادًا، فأتتهما للميعادِ فقالت: علِّماني الكلمةَ التي تَعرُجانِ بها، فعلَّماها الكلمة، فتكلَّمت بها، فعَرَجَت بها إلى السماء، فمُسِخَت فجُعِلَت كما ترونَ، فلما أَمسَيًا تكلّما بالكلمة التي كانا يَعرُجانِ بها إلى السماء، فلم يَعرُجا، فبُعِث إليهما: إن شئتُما فعذابُ الآخرة، وإن شئتُما فعذاب الدنيا إلى أن تقومَ الساعةُ، على أنْ تلتقيانِ [2] الله تعالى، فإن شاء عذَّبَكما، وإن شاء رَحِمَكما، فنَظَرَ أحدُهما إلى صاحبه، فقال أحدُهما لصاحبه: بل نختارُ عذابَ الدنيا ألفَ ألفِ ضعفٍ؛ فهما يُعذِّبَانِ إلى أن تقومَ الساعة [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وترك حديث يحيى بن سَلَمة عن أبيه من المُحالات التي يردُّها العقلُ! فإنه لا خلاف أنه من أهل الصَّنعة [4]، فلا يُنكَر لأبيه أن يَخُصَّه بأحاديث يتفرَّد بها عنه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الصنعاني، والمعروف بالرواية عن أبي الجوّاب - وهو الأحوم ابن جوّاب - هو أبو بكر محمد بن إسحاق الصاغاني. رفع الفعل هنا بإثبات النون بعد "أنْ" جاء حملًا على أنها مخفّفة من "أنَّ" وضمير الشأن محذوف، أو على لغة بعض العرب الذين لا يُعملون "أن" الناصبة للفعل المضارع فيرفعونه. انظر "شواهد التوضيح" لابن مالك ص 180، و "شرح ابن عقيل على ألفية ابن مالك" 4/ 4 - 5.
[2] هكذا في نسخنا الخطية، ويغلب على ظننا أنه خطأ من الناسخ قديمًا، ويمكن توجيهه بأن رفع الفعل هنا بإثبات النون بعد "أنْ" جاء حملًا على أنها مخفّفة من "أنَّ" وضمير الشأن محذوف، أو على لغة بعض العرب الذين لا يُعملون "أن" الناصبة للفعل المضارع فيرفعونه. انظر "شواهد التوضيح" لابن مالك ص 180، و "شرح ابن عقيل على ألفية ابن مالك" 4/ 4 - 5.
9011 [3] - إسناده ضعيف جدًا، يحيى بن سلمة بن كهيل متروك الحديث، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيص المستدرك".وهذا الطريق لم نقف عليه عند غير المصنف.وقد روي نحو هذا عن ابن عمر مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم عند أحمد 10/ (6178) وابن حبان (6186) بإسناد ضعيف كما هو مبين فيهما.والصحيح أن هذا من رواية ابن عمر عن كعب الأحبار ممّا نقله عن كتب بني إسرائيل، فقد أخرج عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 53 - 54، وابن أبي الدنيا في "العقوبات" (224)، والطبري في "تفسيره" 1/ 456 - 457 من طريق سفيان الثوري، عن موسى بن عقبة، عن سالم بن عبد الله ابن عمر، عن أبيه، عن كعب الأحبار. وهذا إسناد صحيح. وانظر تمام الكلام على هذا الخبر في التعليق على "مسند أحمد" و "صحيح ابن حبان".قال الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 1/ 84: هذا من أخبار بني إسرائيل … ويكون من خرافاتهم التي لا يُعوّل عليها، والله أعلم.
9011 [4] - تحرّف في نسخنا الخطية إلى: الصفة، والتصويب من "إتحاف المهرة" (9748).
9012 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا محمد بن عيسي الطَّرَسُوسي، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، عن سعيد بن عُمير [1] قال: جلستُ إلى ابن عمر وأبي سعيد، فقال أحدهما لصاحبه: إني سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم يَذكُر مَبْلَغَ العَرقِ من ابن آدم فقال: " [إلى] شحمةِ أُذنيه"، وقال الآخر: "يُلجِمُه العرقُ"، وأشار ابن عمر فخَطَّ من [2] شحمة أُذنه بالسَّبّابة [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: جبير، والتصويب مما سلف برقم (8920).
[2] في النسخ الخطية: بين، وأغلب الظن أنها محرَّفة عن: من، كما أثبتنا.
9012 [3] - إسناده حسن من أجل سعيد بن عمير.وقد سلف برقم (8920) من طريق أبي قلابة عن أبي عاصم وزاد فيه بين سعيد بن عمير وعبد الحميد بن جعفر أباه جعفر بن عبد الله، ويغلب على ظننا أنه سقط هنا من الناسخ، والله تعالى أعلم.
9013 - أخبرنا أبو سهل أحمد بن عبد الله بن زياد القَطّان، حدثنا الحسن بن مُكرَم البزَّاز، حدثنا أبو علي عُبيد الله بن عبد المجيد الحَنَفي، حدثنا عِكرِمة بن عمّار، حدثنا إياس بن سَلَمة بن الأكوَع، حدثني أَبي قال: عُدْنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا موعوكًا، فوَضَعتُ يدي عليه فقلت: تاللهِ [ما رأيتُ] [1] كاليوم رجلًا أشدَّ حرًّا منه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أخبِرُكم بأشدَّ حرًّا منه يومَ القيامة، هاذَينِكَ الرجلينِ الراكبَينِ المُقفِّيِّين"؛ لرجلين حينئذٍ من أصحابه [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هذه الزيادة من مصادر التخريج وليست في النسخ الخطية.
[2] إسناده قوي.وأخرجه مسلم (2783) من طريق النضر بن محمد اليمامي، عن عكرمة بن عمار، بهذا الإسناد.المقفيَين: أي: المنصرفين الموليين أقفيتهما.قوله: "من أصحابه" سمّاهما هكذا لإظهارهما الإسلام والصحبة، لا أنهما ممَّن نالته فضيلة الصحبة. قاله النووي في "شرح مسلم".
9014 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله ابن وَهْب، أخبرني عمرو بن الحارث وابن لهيعة [عن يزيد بن أبي حَبيب] [1] عن سِنان بن سعد الكِنْدي، عن أنس بن مالك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله إذا أراد بعبدٍ خيرًا، عجَّلَ له العقوبةَ في الدنيا، وإذا أراد بعبدٍ شرًا، أَمسكَ عليه بذَنْبِه حتى يُوافيَه يومَ القيامة" [2].
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] سقط "يزيد" من النسخ الخطية، واستدركناه، من مصادر التخريج، وسنان لم يرو عنه غير يزيد بن أبي حبيب.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل سنان بن سعد الكندي.وابن لهيعة - وإن كان سيئ الحفظ - متابع.وأخرجه الطحاوي في "مشكل الآثار" (2050) عن يونس بن عبد الأعلى، وابن عدي في "الكامل" 3/ 356 من طريق يزيد بن مَوهَب، كلاهما عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (2396)، وأبو يعلى (4254) و (4255)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (316)، والبغوي في "شرح السنة" (1435) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، به. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.ويشهد له حديث عبد الله بن مغفل السالف برقم (1307)، وإسناده صحيح. وأخرجه بنحوه عبد الرزاق في "مصنفه" (5285)، وابن أبي شيبة 13/ 378، وأبو داود في "الزهد" (288)، وابن أبي الدنيا في "الزهد" (233)، والطبري 27/ 86، والطحاوي في "مشكل الآثار" (706) و (707)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" 1/ 420 - 421، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 281 من طرق عن عطاء بن السائب، به. وفيهم مَن سمع من عطاء قبل اختلاطه.
9015 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا موسى بن سهل ابن كَثير، حدثنا إسماعيل ابن عُليَّة، عن عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي قال: نَزَلْنا من المدائن على فَرسَخ، فلما جاءت الجمعةُ، حضر [أَبي] وحضرتُ معه، فخَطَبَنا حذيفةُ فقال: إنَّ الله عز وجل يقول: {اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَاَنشَقَّ الْقَمَرُ}، ألا وإنَّ الساعةَ قد اقتَرَبَت، ألا وإنَّ القمرَ قد انشقَّ، ألا وإنَّ الدنيا قد آذَنَتْ بفِراقٍ، ألا وإنَّ اليومَ المضمار وغدًا السِّباقُ. [فقلت] لأَبي: أيستبقُ الناسُ غدًا؟ قال: يا بنيَّ، إنك لجاهل، إنما يعني: العملُ اليومَ والجزاءُ غدًا، فلما جاءت الجمعةُ الأخرى، حَضَرْنا فَخَطَبَنا حذيفةُ فقال: إنَّ الله عز وجل يقول: {اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانشَقَّ الْقَمَرُ}، ألا وإنَّ الدنيا قد آذنت بِفراقٍ، ألا وإنَّ اليوم المضمارُ وغدًا السِّباقُ، ألا وإنَّ الغايةَ النارُ، والسابقُ من سَبَق إلى الجنة [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف موسى بن بن سهل، وقد توبع. أبو عبد الرحمن السلمي: هو عبد الله بن حبيب.وأخرجه ابن أبي شيبة 2/ 115، والطبري في "تفسيره" 86/ 27 من طريق ابن علية، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه عبد الرزاق في "مصنفه" (5285)، وابن أبي شيبة 13/ 378، وأبو داود في "الزهد" (288)، وابن أبي الدنيا في "الزهد" (233)، والطبري 27/ 86، والطحاوي في "مشكل الآثار" (706) و (707)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" 1/ 420 - 421، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 281 من طرق عن عطاء بن السائب، به. وفيهم مَن سمع من عطاء قبل اختلاطه.
9016 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن دَرّاج، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد الخُدْري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يأكلُ الترابُ كلّ شيءٍ من الإنسان إِلَّا عَجْبَ ذَنَبِه" قيل: وما هو يا رسول الله؟ قال: "مِثلُ حَبَّةِ خَردَلٍ، منه يُنشَؤُون" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "مثل حبة خردل"، وهذا إسناد ضعيف لضعف دراج أبي السمح في أبي الهيثم العُتْواري.وأخرجه ابن حبان (3140) من طريق حرملة بن يحيى، عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17 / (11230/ 3) من طريق ابن لهيعة، عن دراج، به.ويشهد له حديث أبي هريرة عند البخاري (4814) ومسلم (2955).عَجْب الذنب: هو رأس العُصْعُص أسفل العمود الفقري.
9017 - أخبرني الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق الإمام، أخبرنا موسى بن الحسن ابن عَبّاد، حدثنا عفّان بن مُسلِم، حدثنا همّام بن يحيى، عن مَطَر الورَّاق، عن أبي قِلابة قال: دخل نفرّ من القُرّاء على أبي ذرّ، وعنده امرأةٌ سوداءُ عليها عَباءةٌ قطوانيَّة ليس عليها مَجاسِدُ ولا خَلُوقٌ، فقال أبو ذر: أتدرون ما تقولُ هذه؟ تأمرُني أن آتيَ العراقَ، ولو أتيتُ العراقَ لقالوا: هذا صاحبُ رسول الله، فمالُوا علينا من الدنيا، وإنَّ خَليلي أبا [1] القاسم صلى الله عليه وسلم عَهِدَ إليَّ: أن جسرَ جَهَنَّمَ دَحْضٌ مَزَلّةٌ، وفي أحمالنا اقتِدارٌ [2]، لعلَّنا أن ننجوَ منها [3].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين إن كان أبو قِلابةَ سمع من أبي ذرٍّ الغِفاري رحمه الله [4].
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في (ز) و (ك) و (ب) إلى: أبو، والتصويب من (م) و "تلخيص الذهبي".
[2] في النسخ الخطية: إفساد، وهو تحريف، والتصويب من مصادر التخريج. ومعنى "اقتدار": توسُّط، كما في "حاشية السندي على أحمد".
9017 [3] - خبر صحيح، وهذا إسناد شاذٌّ بذكر مطر عن أبي قلابة، فموسى بن الحسن بن عباد - وإن كان لا بأس به، كما قال الدارقطني - قد خولف فيه.فقد رواه محمد بن سعد في "الطبقات" 4/ 222، وأحمد في "المسند" 35/ (21416)، والحارث ابن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (1087) - وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 161 - ثلاثتهم عن عفان بن مسلم، عن همام، عن قتادة، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء الرَّحَبي: أنه دخل على أبي ذر … فذكره. وهذا إسناد متصل صحيح.أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي، وأبو أسماء الرحبي: هو عمرو بن مرثد.ويشهد للمرفوع منه حديث أبي سعيد الخدري في خبر طويل عند البخاري (7439) ومسلم (183).وكذا حديث عبد الله بن مسعود السالف عند المصنف برقم (3465).المجَاسد: جمع مُجسَد، وهو الثوب المصبوغ بالزعفران أو العصفر.والخَلوق: طيب مركَّب من الزعفران وغيره.دحضٌ مزلّة: موضع لا تثبت فيه الأقدام فتزلّ وتَزلَق.
9017 [4] - لم يسمع منه وبينهما فيه أبو أسماء كما سبق.
9018 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا محمد بن عبد الرحمن الطُّفَاوي، حدثنا أيوب، عن عبد الله ابن أبي مُلَيكة: أنَّ رجلًا سأل ابن عباس عن قوله عز وجل: {وَإِن يَوْمَا عِندَ رَبِّكَ كَأَلْفِ سَنَةٍ مِّمَّا تَعُدُّونَ} [الحج: 47]، فقال: من أنت؟ فذَكَر له أنه رجلٌ من كذا وكذا، فقال ابن عباس: فما يومٌ كان مقدارُه خمسين ألف سنةٍ؟ فقال الرجل: رَحِمَك اللهُ، إنما سألتُك لتخبرنا، فقال ابن عباس: يومانِ ذَكَرَهما اللهُ عز وجل في كتابه، الله أعلمُ بهما، نكره أن نقول في كتاب الله بغير علمٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه. آخر كتاب الأهوال [2]وهو آخر كتاب "الجامع الصحيح المستدرَك" تأليف الحاكم الإمام أبي عبد الله محمد بن عبد الله بن محمد بن حَمدَوَيهِ الحافظ، رحمه الله.
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عبد الرحمن الطفاوي.وأخرجه بنحوه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 108، وفي "أماليه" (163)، ومن طريقه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 9/ 576 - 577 عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة قال: دخلت أنا وابن فيروز مولى عثمان علي ابن عباس … فذكر نحوه. وإسناده صحيح.
[2] تحرَّف في (ز) و (ك) و (ب) إلى الأصول، والتصويب من (م).