আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
3259 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا عبد الملك ابن محمد الرَّقَاشي، حدثنا وَهْب بن جَرير وسعيد بن عامر قالا: حدثنا شعبة، عن سِماك بن حَرْب، قال: سمعت عِيَاضً [1] الأشعريَّ يقول: لمَّا نزلت {فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ} [المائدة: 54]، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هم قَومُك يا أبا موسى"، وأومأَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده إلى أبي موسى الأشعريِّ [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {অচিরেই আল্লাহ এমন এক সম্প্রদায়কে আনবেন যাদেরকে তিনি ভালোবাসেন এবং যারা তাঁকে ভালোবাসে} [সূরা আল-মায়িদাহ: ৫৪], তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবূ মূসা! তারা হলো তোমার কওম (সম্প্রদায়)।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দ্বারা আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ইশারা করলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا جاء في أصولنا الخطية بغير ألف مع أنه منصوب، على لغة من يكتب المنصوب بلا ألف، وانظر التعليق عند الحديث (1429).
[2] إسناده إلى عياض حسن، وعياض قد اختُلف في صحبته، فإن لم يكن صحابيًا فهو تابعي مخضرم، وحديثه هذا مرسل، وقد رواه بعضهم عن سماك فجعله من رواية عياض الأشعري عن أبي موسى.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 32/ 33 من طريق الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 4/ 100، وابن أبي شيبة في "مسنده" (664)، و"مصنفه" 12/ 123، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2515)، والطبري في "تفسيره" 6/ 284، والطبراني في "الكبير" 17/ (1016)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5438)، و"أخبار أصبهان" 1/ 59، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 363، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 32/ 33 - 34 و 47/ 252 من طرق عن شعبة، به.وأخرجه الطبري 6/ 284، وابن أبي حاتم 4/ 1160، وابن عساكر 32/ 34 و 47/ 253 من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث وأبي الوليد الطيالسي، عن شعبة، عن سماك، عن عياض، عن أبي موسى الأشعري. فوصله بذكر أبي موسى.وكذلك أخرجه موصولًا تمام الرازي في "فوائده" (1108)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 351، وابن عساكر 32/ 34 من طريق عبد الله بن إدريس الأودي، عن أبيه، عن سماك به.ويشهد له حديث جابر مرفوعًا عند ابن أبي حاتم 4/ 160، والطبراني في "الأوسط" (1392)، وإسناده حسن.
3260 - حدثنا عبد الصمد بن علي البزَّاز ببغداد، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا الحارث بن عُبيد، حدثنا سعيد الجُرَيري، عن عبد الله بن شَقيق، عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُحرَسُ حتى نزلت هذه الآية: {وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ} [المائدة: 67]، فأخرج النبي صلى الله عليه وسلم رأسَه من القُبَّة، فقال لهم: "أيها الناسُ، انصَرِفوا، فقد عَصَمَني اللهُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পাহারা দেওয়া হতো যতক্ষণ না এই আয়াত নাযিল হলো: {আর আল্লাহ আপনাকে মানুষের (ক্ষতি) থেকে রক্ষা করবেন} [সূরা আল-মায়েদা: ৬৭]। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁবুর ভেতর থেকে তাঁর মাথা বের করলেন এবং তাদের বললেন: "হে লোক সকল, তোমরা চলে যাও, আল্লাহ অবশ্যই আমাকে রক্ষা করেছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات غير الحارث بن عبيد الإيادي فإنه ضعيف يُعتبر به، وقد خالفه إسماعيل ابن عُليَّة عند الطبري 6/ 307 - 308، ووُهيب بن خالد عند ابن مردويه -كما في "تفسير ابن كثير"- فروياه عن سعيد بن إياس الجريري عن عبد الله بن شقيق مرسلًا لم يذكر فيه عائشة، وهو الصواب، فإنَّ ابن عُليَّة ووهيب ثقتان ثبتان.وأخرجه الترمذي (3046) من طريقين عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد. وقال: حديث غريب، ثم أشار إلى الرواية المرسلة. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 9/ 156: إسناده حسن، واختُلف في وصله وإرساله.
3261 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا إسرائيل، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ} [المائدة: 83]، قال: مع أُمَّة محمد صلى الله عليه وسلم وأُمَّتُه شَهِدُوا له بالبلاغ، وشَهِدوا اللرُّسل أنهم قد بَلَّغوا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী, "আর আপনি আমাদেরকে সাক্ষ্যদানকারীদের অন্তর্ভুক্ত করে নিন" (সূরা আল-মায়িদাহ: ৮৩) প্রসঙ্গে তিনি বলেন: (এর অর্থ) মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের সাথে। আর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মত তাঁর (তাবলীগ বা বার্তা) পৌঁছানোর ব্যাপারে সাক্ষ্য দেবে এবং অন্যান্য রাসূলগণের ব্যাপারেও সাক্ষ্য দেবে যে তাঁরাও (আল্লাহর বার্তা) পৌঁছিয়ে দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل سماك بن حرب.وأخرجه ابن المنذر في "تفسيره" (521) من طريق إسحاق بن راهويه، عن المؤمَّل ويحيى بن آدم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 7/ 6، وكذا ابن أبي حاتم 2/ 660 و 4/ 1185، والطبراني في "الكبير" (11732)، والضياء المقدسي في "المختارة" 12/ (106) و (107) من طرق عن إسرائيل، به.وأخرجه الطبري أيضًا 7/ 6 من طريق معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عبَّاس.
3262 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جَرير، عن منصور، عن أبي الضُّحى، عن مسروق قال: أُتِيَ عبدُ الله بضَرْع، فقال للقوم: ادنُوا، فأخذوا يَطعَمُونه، وكان رجل منهم في ناحيةٍ، فقال عبد الله: ادنُ، فقال: إني لا أريده، فقال: لِمَ؟ قال: لأني حرَّمتُ الضَّرعَ، فقال عبد الله: هذا من خُطُوات الشيطان، فقال عبد الله: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ} [المائدة: 87]، ادنُ فكُلْ وكفِّرْ عن يمينِك؛ فإنَّ هذا من خُطُوات الشيطان [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট (রান্না করা) একটি স্তন (গরু বা ভেড়ার ওলান) আনা হলো। তিনি উপস্থিত লোকদের বললেন: তোমরা কাছে এসো (এবং খাও)। অতঃপর তারা তা খেতে শুরু করল। তাদের মধ্যে একজন লোক একপাশে বসে ছিল। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি কাছে এসো। লোকটি বলল: আমি তা খেতে চাই না। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: কেন? সে বলল: কারণ আমি স্তন (ওলান) খাওয়াকে নিজের উপর হারাম করে নিয়েছি। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি শয়তানের পদক্ষেপের অংশ। অতঃপর আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিলাওয়াত করলেন: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ} [المائدة: 87]। অর্থাৎ: "হে মুমিনগণ! আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে তোমরা হারাম করো না এবং সীমা লঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমা লঙ্ঘনকারীদের ভালোবাসেন না।" (সূরা আল-মায়েদা: ৮৭)। তিনি (ঐ ব্যক্তিকে) বললেন: তুমি কাছে এসো, খাও এবং তোমার কসমের কাফফারা দাও। কারণ এটি শয়তানের পদক্ষেপের অংশ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي 7/ 354 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (772)، ومن طريقه الطبراني (8908) عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 198 - 199، و"مصنفه" (16042)، والطبراني (8907) من طريق سفيان الثوري، عن منصور بن المعتمر، به.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" (12443 - عوامة) من طريق الأعمش، عن أبي الضحى مسلم بن صُبيح، به -ولم يذكر فيه الآية، وبيَّن في روايته أنَّ الضَّرع ضرع ناقة. وأخرجه أبو داود (3605) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن الشعبي: أنَّ رجلًا من المسلمين حضرته الوفاة … وذكر القصة.وهذا القضاء من أبي موسى الأشعري على مقتضى الآية السادسة بعد المئة من سورة المائدة.
3263 - حدثنا عبد الله بن جعفر بن دَرَسْتَوَيهِ النَّسَوَي من أصل كتابه لفظًا، حدثنا يعقوب بن سفيان الفَسَوي، حدثنا يحيى بن يعلى بن الحارث، حدثنا أَبي يعلى بنُ الحارث، عن غَيْلان بن جامع المُحارِبي، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر الشَّعْبي، عن أبي موسى الأشعري: أنه شَهِدَ عنده رجلان نصرانيَّان على وصيَّةِ رجل مسلم مات عندهم، قال: فارتاب أهلُ الوصيَّة، فأَتَوْا بهما أبا موسى الأشعريَّ، فاستحلَفَهما بعد صلاة العصر بالله ما اشتَرَيا به ثمنًا ولا كَتَما شهادةَ الله إنا إذًا لمن الآثمِين.قال عامر: ثم قال أبو موسى: والله إنَّ هذه لَقِصَّةٌ .......... [1]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তাঁর সামনে দুজন খ্রিস্টান লোক এক মুসলিম ব্যক্তির ওসিয়ত (উইল) সম্পর্কে সাক্ষ্য দিয়েছিল, যে মুসলিম ব্যক্তি তাদের কাছে মারা গিয়েছিল। বর্ণনাকারী বলেন: ওসিয়তের উত্তরাধিকারীরা সন্দেহ পোষণ করল। ফলে তারা সেই দুজন লোককে আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে নিয়ে এলো। তিনি আসরের সালাতের পর তাদের দু'জনকে আল্লাহর নামে শপথ করালেন যে, তারা এর (সাক্ষ্যের) বিনিময়ে কোনো মূল্য গ্রহণ করেনি এবং তারা আল্লাহর সাক্ষ্য গোপন করেনি। [তারা বলল:] যদি আমরা তা করি, তবে আমরা অবশ্যই গুনাহগারদের অন্তর্ভুক্ত হব। আমের (শা'বী) বলেন: এরপর আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, এই ঘটনাটি তো.........।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هنا بياض في النسخ الخطية، ونقدِّر أن يكون مكانه من الكلام: لم تكن بعد الذي كان في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، كما في رواية أبي داود، والله تعالى أعلم.والخبر إسناده صحيح إن شاء الله. وأخرجه أبو داود (3605) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن الشعبي: أنَّ رجلًا من المسلمين حضرته الوفاة … وذكر القصة.وهذا القضاء من أبي موسى الأشعري على مقتضى الآية السادسة بعد المئة من سورة المائدة.
3264 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا هارون بن سليمان الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن مَهْدي، حدثنا سفيان، عن سَلَمة بن كُهيل، عن عِمران بن الحكم، عن ابن عبَّاس قال: قالت قريشٌ للنبي صلى الله عليه وسلم: ادعُ اللهَ ربَّك أن يجعلَ لنا الصَّفا ذهبًا، ونُؤمِنَ بك، قال: "أوَتفعلون؟ " قالوا: نعم، قال: فدَعَا الله، فأتاه جبريل فقال: "إنَّ ربك يَقرأُ عليك السلامَ ويقول: إن شئتَ أصبح لهم الصفا ذهبًا، فمن كَفَرَ منهم عذَّبتُه عذابًا لا أعذِّبُه أحدًا من العالمين، وإن شئت فتحتُ لهم أبوابَ التوبة والرحمة" قال: "يا ربِّ، بابُ التوبةِ والرَّحمة" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. 6 - تفسير سورة الأنعامبسم الله الرحمن الرحيم
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আপনার রব আল্লাহ্র কাছে দু’আ করুন, তিনি যেন আমাদের জন্য সাফা পর্বতকে সোনায় পরিণত করে দেন, তাহলে আমরা আপনার প্রতি ঈমান আনব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা কি সত্যিই তা করবে?” তারা বলল: হ্যাঁ। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি আল্লাহ্র কাছে দু’আ করলেন। তখন তাঁর কাছে জিবরাঈল (আঃ) এলেন এবং বললেন: “আপনার রব আপনাকে সালাম বলছেন এবং বলছেন: আপনি যদি চান, তবে তাদের জন্য সাফা সোনায় পরিণত হবে। কিন্তু এরপর তাদের মধ্যে যে কুফরি করবে, আমি তাকে এমন শাস্তি দেব, যা বিশ্বজগতের আর কাউকেও দেব না। আর আপনি যদি চান, তবে আমি তাদের জন্য তাওবা ও রহমতের দরজা খুলে দেব।” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে রব, (আমি চাই) তাওবা ও রহমতের দরজা।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وهو مكرر (175). الذهبي في "تلخيصه" بقوله: لا والله لم يدرك جعفرٌ السديَّ وأظن هذا موضوعًا، وعقَّب ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 230 على كلام الذهبي هذا فقال: لعله يريد إدراك السماع منه لا إدراك زمانه، فإنه وُلد سنة تسع ومئة، ويقال: سنة تسع عشرة، ومات السدي سنة تسع وعشرين ومئة، فعلى التقديرين كان يمكنه السماعُ منه، ولا سيما وهما في بلدة واحدة (يعني البصرة) لكن إنما طلب جعفرٌ العلمَ بعد الأربعين ومئة، والذي ظهر لي أنَّ اسم إسماعيل انقلب على بعض رواته، فقد أخرج الحديثَ المذكور عبدُ بن حميد في "تفسيره" -وهو أحد الحفاظ المتقنين- عن جعفر بن عون المذكور فقال: عن موسى بن عبيدة عن محمد بن المنكدر، فذكره مرسلًا ليس فيه جابر، وهذا أَولى.قلنا: وهذا الطريق المرسل رواه أيضًا البيهقي في "شعب الإيمان" (2209) من طريق أبي عثمان البصري -وهو الإمام القدوة عمرو بن عبد الله بن درهم- عن محمد بن عبد الوهاب، عن جعفر بن عون، عن موسى بن عُبيدة، به. فرجع الحديث في رواية محمد بن عبد الوهاب إلى موسى بن عبيدة أيضًا، وموسى هذا: هو الرَّبَذي، والجمهور على تضعيفه.وله شاهد من حديث أنس بن مالك موقوفًا عند الطبراني في "الأوسط" (6447)، والبيهقي في "الشعب" (2210). وفي إسناده أبو بكر أحمد بن محمد السالمي ولا يُعرف حالُه، وعمر بن طلحة الليثي وهو ليس بذاك القوي.وآخر من حديث أسماء بنت يزيد موقوفًا، أخرجه الخِلَعي في "فوائده" ومن طريقه ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 228 - 229، وهو من رواية ليث بن أبي سليم عن شهر بن حوشب عن أسماء، وليث وشهر ضعيفان، وهو عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2298)، لكن جعله من رواية الليث عن شهر مرسلًا، فهذه علَّة أخرى للحديث.وثالث عن ابن عبَّاس موقوفًا أيضًا عند ابن الضريس في "فضائل القرآن" (196) و (201) بإسنادين ضعيفين، الثاني منهما فيه شهر بن حوشب، وهو صاحب مناكير.قلنا: ومع كل ذلك فقد ذهب الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" إلى تحسين هذه الأخبار ببعضها، ونظن ذلك تساهلًا منه رحمه الله، والله تعالى أعلم.
3265 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ وأبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل قالا: حدثنا محمد بن عبد الوهاب العَبْدي، أخبرنا جعفر بن عَوْن، أخبرنا إسماعيل بن عبد الرحمن، حدثنا محمد بن المنكِدر، عن جابر قال: لما نزلت سورةُ الأنعام، سَبَّحَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ثم قال: "لقد شَيَّعَ هذه السورةَ من الملائكة ما سَدُّوا [1] الأُفُقَ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فإنَّ إسماعيل هذا: هو السُّدِّي، ولم يخرِّجه البخاري.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সূরা আল-আন'আম অবতীর্ণ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর পবিত্রতা জ্ঞাপন করলেন (তাসবীহ পাঠ করলেন), অতঃপর বললেন: "নিশ্চয় এই সূরাটির সাথে এত বেশি সংখ্যক ফেরেশতা এসেছিল যে তারা দিগন্তকে ছেয়ে ফেলেছিল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في النسخ الخطية -وكذا في أصول "شعب الإيمان" للبيهقي (2208) حيث رواه عن المصنف- على إثبات الواو التي هي علامة الفاعل المذكَّر المجموع، وهي لغة لبعض العرب وهم القائلون: أكلوني البراغيث. والجادَّة: سدَّ. الذهبي في "تلخيصه" بقوله: لا والله لم يدرك جعفرٌ السديَّ وأظن هذا موضوعًا، وعقَّب ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 230 على كلام الذهبي هذا فقال: لعله يريد إدراك السماع منه لا إدراك زمانه، فإنه وُلد سنة تسع ومئة، ويقال: سنة تسع عشرة، ومات السدي سنة تسع وعشرين ومئة، فعلى التقديرين كان يمكنه السماعُ منه، ولا سيما وهما في بلدة واحدة (يعني البصرة) لكن إنما طلب جعفرٌ العلمَ بعد الأربعين ومئة، والذي ظهر لي أنَّ اسم إسماعيل انقلب على بعض رواته، فقد أخرج الحديثَ المذكور عبدُ بن حميد في "تفسيره" -وهو أحد الحفاظ المتقنين- عن جعفر بن عون المذكور فقال: عن موسى بن عبيدة عن محمد بن المنكدر، فذكره مرسلًا ليس فيه جابر، وهذا أَولى.قلنا: وهذا الطريق المرسل رواه أيضًا البيهقي في "شعب الإيمان" (2209) من طريق أبي عثمان البصري -وهو الإمام القدوة عمرو بن عبد الله بن درهم- عن محمد بن عبد الوهاب، عن جعفر بن عون، عن موسى بن عُبيدة، به. فرجع الحديث في رواية محمد بن عبد الوهاب إلى موسى بن عبيدة أيضًا، وموسى هذا: هو الرَّبَذي، والجمهور على تضعيفه.وله شاهد من حديث أنس بن مالك موقوفًا عند الطبراني في "الأوسط" (6447)، والبيهقي في "الشعب" (2210). وفي إسناده أبو بكر أحمد بن محمد السالمي ولا يُعرف حالُه، وعمر بن طلحة الليثي وهو ليس بذاك القوي.وآخر من حديث أسماء بنت يزيد موقوفًا، أخرجه الخِلَعي في "فوائده" ومن طريقه ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 228 - 229، وهو من رواية ليث بن أبي سليم عن شهر بن حوشب عن أسماء، وليث وشهر ضعيفان، وهو عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2298)، لكن جعله من رواية الليث عن شهر مرسلًا، فهذه علَّة أخرى للحديث.وثالث عن ابن عبَّاس موقوفًا أيضًا عند ابن الضريس في "فضائل القرآن" (196) و (201) بإسنادين ضعيفين، الثاني منهما فيه شهر بن حوشب، وهو صاحب مناكير.قلنا: ومع كل ذلك فقد ذهب الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" إلى تحسين هذه الأخبار ببعضها، ونظن ذلك تساهلًا منه رحمه الله، والله تعالى أعلم.
[2] ضعيف بمرَّة، إسماعيل بن عبد الرحمن هذا ذهب المصنف إلى أنه السُّدِّي، فتعقّبه الذهبي في "تلخيصه" بقوله: لا والله لم يدرك جعفرٌ السديَّ وأظن هذا موضوعًا، وعقَّب ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 230 على كلام الذهبي هذا فقال: لعله يريد إدراك السماع منه لا إدراك زمانه، فإنه وُلد سنة تسع ومئة، ويقال: سنة تسع عشرة، ومات السدي سنة تسع وعشرين ومئة، فعلى التقديرين كان يمكنه السماعُ منه، ولا سيما وهما في بلدة واحدة (يعني البصرة) لكن إنما طلب جعفرٌ العلمَ بعد الأربعين ومئة، والذي ظهر لي أنَّ اسم إسماعيل انقلب على بعض رواته، فقد أخرج الحديثَ المذكور عبدُ بن حميد في "تفسيره" -وهو أحد الحفاظ المتقنين- عن جعفر بن عون المذكور فقال: عن موسى بن عبيدة عن محمد بن المنكدر، فذكره مرسلًا ليس فيه جابر، وهذا أَولى.قلنا: وهذا الطريق المرسل رواه أيضًا البيهقي في "شعب الإيمان" (2209) من طريق أبي عثمان البصري -وهو الإمام القدوة عمرو بن عبد الله بن درهم- عن محمد بن عبد الوهاب، عن جعفر بن عون، عن موسى بن عُبيدة، به. فرجع الحديث في رواية محمد بن عبد الوهاب إلى موسى بن عبيدة أيضًا، وموسى هذا: هو الرَّبَذي، والجمهور على تضعيفه.وله شاهد من حديث أنس بن مالك موقوفًا عند الطبراني في "الأوسط" (6447)، والبيهقي في "الشعب" (2210). وفي إسناده أبو بكر أحمد بن محمد السالمي ولا يُعرف حالُه، وعمر بن طلحة الليثي وهو ليس بذاك القوي.وآخر من حديث أسماء بنت يزيد موقوفًا، أخرجه الخِلَعي في "فوائده" ومن طريقه ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 228 - 229، وهو من رواية ليث بن أبي سليم عن شهر بن حوشب عن أسماء، وليث وشهر ضعيفان، وهو عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2298)، لكن جعله من رواية الليث عن شهر مرسلًا، فهذه علَّة أخرى للحديث.وثالث عن ابن عبَّاس موقوفًا أيضًا عند ابن الضريس في "فضائل القرآن" (196) و (201) بإسنادين ضعيفين، الثاني منهما فيه شهر بن حوشب، وهو صاحب مناكير.قلنا: ومع كل ذلك فقد ذهب الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" إلى تحسين هذه الأخبار ببعضها، ونظن ذلك تساهلًا منه رحمه الله، والله تعالى أعلم.
3266 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش، عن أبي حَصِين، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: {ثُمَّ قَضَى أَجَلًا وَأَجَلٌ مُسَمًّى عِنْدَهُ} [الأنعام:2]، قال: هما أَجَلان: أجلٌ في الدنيا، وأجلٌ في الآخرة مسمًّى عنده لا يعلمُه إلَّا الله، وقوله: {وَلَوْ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ كِتَابًا فِي قِرْطَاسٍ فَلَمَسُوهُ بِأَيْدِيهِمْ} [الأنعام: 7]، قال: مسُّوه ونَظَروا إليه ولم يؤمنوا به [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী: "{তারপর তিনি একটি নির্দিষ্ট সময়কাল নির্ধারণ করেছেন এবং অপর একটি নির্দিষ্ট সময়কাল রয়েছে তাঁর কাছেই} (সূরা আন'আম: ২)" সম্পর্কে তিনি বলেন: এই দুটি হলো দুটি সময়কাল (মেয়াদ): একটি হলো দুনিয়ার মেয়াদ এবং অপরটি হলো আখিরাতের মেয়াদ, যা তাঁর (আল্লাহর) কাছে সুনির্দিষ্ট করা আছে। আল্লাহ ব্যতীত অন্য কেউ তা জানে না। আর তাঁর বাণী: "{আর যদি আমি তোমার ওপর কাগজে লিখিত কিতাবও নাযিল করতাম আর তারা তা নিজ হাতে স্পর্শও করত} (সূরা আন'আম: ৭)" সম্পর্কে তিনি বলেন: তারা তা স্পর্শ করত এবং দেখত, কিন্তু তবুও তাতে ঈমান আনত না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن. أبو حصين: هو عثمان بن عاصم الأسدي. وهذا الخبر انفرد به الحاكم. وتابعهما حماد بن شعيب عند سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (874). وحماد هذا ضعيف.
3267 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن مَندَهُ الأصبهاني، حدثنا بكر ابن بكَّار، حدثنا حمزة بن حَبيب، عن حَبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس في قول الله عز وجل: {وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْأَوْنَ عَنْهُ} [الأنعام: 26]، قال: نزلت في أبي طالب، كان يَنْهى المشركين أن يُؤْذُوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، ويتباعدُ عمَّا جاءَ به [1].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: "তারা তা থেকে অন্যদেরকে নিষেধ করে এবং নিজেরাও তা থেকে দূরে সরে যায়।" [সূরা আল-আন'আম: ২৬]। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: এটি আবূ তালিব সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। সে মুশরিকদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট দেওয়া থেকে নিষেধ করত এবং (একই সাথে) তিনি যা নিয়ে এসেছিলেন তা থেকে নিজেও দূরে সরে থাকত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف محمد بن منده الأصبهاني، وبكر بن بكار ليس بذاك القوي.وأخرجه البيهقي في "الدلائل" 2/ 340 - 341، والواحدي في "أسباب النزول" (426)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 323 من طريق أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده. وتابعهما حماد بن شعيب عند سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (874). وحماد هذا ضعيف.
3268 - أخبرَناه أبو العبَّاس المحبُوبي، حدثنا أحمد بن سيَّار، حدثنا محمد بن كَثير، حدثنا سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عمَّن سمع ابنَ عبَّاس يقول في قول الله عز وجل: {وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْأَوْنَ عَنْهُ}، قال: نزلت في أبي طالب، كان ينهى المشركين أن يُؤْذُوه ويَنْأَى عنه [1]. حديث حمزة عن حبيب صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: {وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْأَوْنَ عَنْهُ} (অর্থাৎ: আর তারা লোকদেরকে তা থেকে বাধা দেয় এবং নিজেরাও তা থেকে দূরে থাকে) তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: এটি আবূ তালিব সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। সে মুশরিকদেরকে তাঁকে (নবীকে) কষ্ট দিতে নিষেধ করত, কিন্তু সে নিজে তা (ইসলাম) থেকে দূরে থাকত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لإبهام الواسطة بين حبيب وابن عبَّاس. سفيان: هو الثوري.وأخرجه البيهقي في "الدلائل" 2/ 340 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.ومن طريق سفيان أخرجه أيضًا أبو حذيفة النهدي في "تفسير سفيان" (264)، وعبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 206، والطبري في "تفسيره" 7/ 173، وكذا ابن أبي حاتم 4/ 1276 - 1277.وتابع سفيانَ على هذه الرواية بإبهام الواسطة: قيسُ بن الربيع عند الطبري 7/ 173، وابن عساكر 66/ 323، وذُكر قيس عند الطبري بكنيته وهي أبو محمد الأسدي. ووقعت روايته عند الطبراني في "الكبير" (12682) بإسقاط الواسطة المبهمة. وقيس بن الربيع فيه ضعف. وتابعهما حماد بن شعيب عند سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (874). وحماد هذا ضعيف.
3269 - حدثني أبو بكر محمد بن عبد الله الحَفِيدُ، حدثنا الحسين بن الفضل، حدثنا محمد بن سابق، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن ناجيَةَ بن كعب الأَسَدي، عن علي قال: قال أبو جهل للنبي صلى الله عليه وسلم: قد نعلمُ يا محمدُ أنك تَصِلُ الرَّحِمَ، وتَصدُقُ الحديثَ، ولا نُكَذِّبُك ولكن نكذِّبُ بالذي جئتَ به، فأنزل الله عز وجل: {قَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذِي يَقُولُونَ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَكِنَّ الظَّالِمِينَ بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ} [الأنعام: 33] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু জাহল নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলল: “হে মুহাম্মাদ, আমরা অবশ্যই জানি যে আপনি আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখেন এবং সত্য কথা বলেন। আমরা আপনাকে মিথ্যাবাদী বলি না, কিন্তু আপনি যা নিয়ে এসেছেন, আমরা তা প্রত্যাখ্যান করি।” অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা নাযিল করলেন: “আমরা অবশ্যই জানি, তাদের কথা আপনাকে কষ্ট দেয়। বস্তুত তারা আপনাকে মিথ্যাবাদী মনে করে না, বরং জালিমরা আল্লাহর আয়াতসমূহকে (নিদর্শনাবলিকে) অস্বীকার করে।” [সূরা আন'আম: ৩৩]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ضعيف، فقد روي موصولًا ومرسلًا، والمرسل أصح كما قال الترمذي في "جامعه" والبخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (656) والدارقطني في "العلل" 4/ (474)، وناجية بن كعب فيه بعض جهالة. أبو إسحاق: هو السَّبيعي عمرو بن عبد الله.وأخرجه الترمذي في "جامعه" (3064) من طريق معاوية بن هشام، عن سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، به موصولًا. ومعاوية صدوق له أوهام.وخالفه عبد الرحمن بن مهدي عند الترمذي أيضًا (3064)، ويحيى بن آدم عند الطبري في "تفسيره" 7/ 182، وهما ثقتان حافظان، فروياه عن سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن ناجية ابن كعب: أنَّ أبا جهل … فذكره مرسلًا، وهو المحفوظ. وهو في "تفسير عبد الرزاق" 1/ 206، ومن طريقه أخرجه الطبري في "تفسيره" 7/ 188 - 189.وأخرجه الطبري أيضًا من طريق محمد بن ثور، عن معمر، به.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1286 من طريق كثير بن هشام، عن جعفر بن برقان، به.وقصة الأخذ للشاة الجمّاء (وهي التي بلا قرون) من القَرْناء، قد رويت مرفوعة من حديث العلاء بن عبد الرحمن عن أبيه عن أبي هريرة، وهو مخرَّج عند أحمد 12/ (7204)، ومسلم (2582)، وغيرهما.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو موقوفًا، سيأتي عند المصنف برقم (8931).
3270 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن جعفر الجَزَري، عن يزيد ابن الأَصمِّ، عن أبي هريرة في قوله عز وجل: {أُمَمٌ أَمْثَالُكُمْ} [الأنعام: 38]، قال: يُحشَر الخلقُ كلُّهم يومَ القيامة: البهائمُ والدوابُّ والطيرُ وكلُّ شيء، فيَبلُغُ من عَدْل الله أن يأخذَ للجَمَّاءِ من القَرْناء، ثم يقول: كُوني ترابًا، لذلك يقول الكافر: {يَالَيْتَنِي كُنْتُ تُرَابًا} [النبأ: 40] [1]. جعفر الجَزَري هذا: هو ابن بُرْقان، قد احتَجَّ به، مسلم، وهو صحيح على شرطه، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: {তোমাদের মতো জাতিসমূহ (প্রাণীসমূহ)} [সূরা আন'আম: ৩৮]— তিনি বললেন: কিয়ামতের দিন সকল সৃষ্টিকে— চতুষ্পদ জন্তু, গৃহপালিত পশু, পাখি এবং সবকিছুকেই একত্রিত করা হবে। আল্লাহ তাআলার ইনসাফের পূর্ণতা এই পর্যন্ত পৌঁছবে যে, তিনি শিংবিহীন পশুর পক্ষ থেকে শিংওয়ালা পশুর (প্রতিশোধ) নিবেন। এরপর তিনি বলবেন: মাটি হয়ে যাও। এই কারণেই কাফির বলবে: {হায়! আমি যদি মাটি হয়ে যেতাম!} [সূরা নাবা: ৪০]। [১]। এই জাফর আল-জাযারী হলেন ইবনু বুরকান। ইমাম মুসলিম তাঁর থেকে বর্ণনা গ্রহণ করেছেন। হাদীসটি তাঁর শর্তানুসারে সহীহ, তবে শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وهو في "تفسير عبد الرزاق" 1/ 206، ومن طريقه أخرجه الطبري في "تفسيره" 7/ 188 - 189.وأخرجه الطبري أيضًا من طريق محمد بن ثور، عن معمر، به.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1286 من طريق كثير بن هشام، عن جعفر بن برقان، به.وقصة الأخذ للشاة الجمّاء (وهي التي بلا قرون) من القَرْناء، قد رويت مرفوعة من حديث العلاء بن عبد الرحمن عن أبيه عن أبي هريرة، وهو مخرَّج عند أحمد 12/ (7204)، ومسلم (2582)، وغيرهما.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو موقوفًا، سيأتي عند المصنف برقم (8931).
3271 - أخبرنا أبو بكر الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا أبو حذيفة، حدثنا سفيان، عن زياد بن عِلَاقة، عن زياد بن حَرمَلة قال: سمعت عليَّ بن أبي طالب يقرأ هذه الآية: {الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولَ} [الأنعام: 82]، قال: هذه في إبراهيمَ وأصحابه ليس في هذه الأُمة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.إنما اتَّفقا [2] على حديث الأعمش عن إبراهيم عن عَلقَمة عن عبد الله [3]: أنهم قالوا: يا رسول الله، وأيُّنا لم يَظلِمْ نفسَه، الحديثَ بطوله بغير هذا التأويل.
আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াতটি পাঠ করেন: {الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ} [সূরা আন’আম: ৮২] (অর্থাৎ: যারা ঈমান এনেছে এবং তাদের ঈমানকে জুলুমের সাথে মিশ্রিত করেনি), অতঃপর তিনি বলেন: এটি ইবরাহীম (আঃ) এবং তাঁর সাথীদের সম্পর্কে, এই উম্মতের জন্য নয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لجهالة زياد بن حرملة فلم نقف له على ذكرٍ في شيء من كتب التراجم. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه الطبري 7/ 259، وابن أبي حاتم 4/ 1333 من طريق قيس بن الربيع، عن زياد بن علاقة، بهذا الإسناد.
[2] البخاري برقم (6937)، ومسلم برقم (124).
3271 [3] - قوله: "عن عبد الله" سقط من (ز) و (ص) و (ع)، هو ثابت في (ب).
3272 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حدثنا جدِّي، حدثنا عمرو بن عَوْن، حدثنا هُشيم، أخبرنا أبو بِشْر، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا} [هود: 6]، قال: المستقَرُّ: ما كان في الرَّحِم، مما هو حيٌّ ومما قد مات، والمستَودَع: ما في الصُّلْب [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا} [হুদ: ৬] (অর্থাৎ তিনি তার স্থায়ী আবাসস্থল এবং আমানত রাখার স্থান সম্পর্কে অবগত) এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: ‘আল-মুসতাক্বার্রু’ (স্থায়ী আবাসস্থল) হলো যা রেহেমের (গর্ভের) মধ্যে আছে—তা জীবিত হোক বা মৃত হোক; আর ‘আল-মুসতাওদা’ (আমানত রাখার স্থান) হলো যা পৃষ্ঠদেশে (ঔরসে/মেরুদণ্ডে) রয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو بشر: هو جعفر بن أبي وحشيَّة.وأخرجه سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (892) عن هشيم، بهذا الإسناد.وسيأتي نحوه في آخر الحديث رقم (3920) من طريق تميم الضبّي عن سعيد بن جبير. توبع. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الأشجعي.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 8/ 62 و 63، وأبو عبيد في "الأموال" (969)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1400 من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري أيضًا 8/ 63، وابن زنجويه في "الأموال" (1429) من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، به. لكن بيَّن شعبة في رواية محمد بن جعفر عنه عند الطبري أنه إنما سمعه من سفيان الثوري عن أبي إسحاق.
3273 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا إبراهيم بن الحَكَم بن أبَان، حدثني أبي، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس أنه سُئِلَ: هل رأى محمدٌ ربَّه؟ قال: نعم، رأى كأنَّ قَدَميهِ على خَضِرةٍ دونَه سِترٌ من لؤلؤ، فقلت: يا أبا عبَّاس، أليس يقول الله: {لَا تُدْرِكُهُ الْأَبْصَارُ وَهُوَ يُدْرِكُ الْأَبْصَارَ} [الأنعام: 103]؟ قال: يا لا أمَّ لك، ذاك نُورُه، وهو نورُه، إذا تجلَّى بنُورِه لا يُدرِكُه شيءٌ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তাঁকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর রবকে দেখেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তিনি দেখেছেন। যেন তাঁর (আল্লাহর) উভয় কদম সবুজ কিছুর উপর স্থাপিত, যার নিচে মুক্তার একটি পর্দা রয়েছে। আমি (প্রশ্নকারী) বললাম, হে আবূ আব্বাস! আল্লাহ কি বলেননি: “দৃষ্টিসমূহ তাঁকে আয়ত্ত করতে পারে না, তবে তিনি দৃষ্টিসমূহকে আয়ত্ত করেন?” [সূরাহ আল-আন'আম: ১০৩] তিনি বললেন: হে মায়ের বিয়োগকারী! সেটি (যার কথা কুরআনে বলা হয়েছে) হলো তাঁর নূর (জ্যোতি)। আর যখন তিনি তাঁর নূর দ্বারা নিজেকে প্রকাশ করেন (তাজাল্লী দেন), তখন কোনো কিছুই তাঁকে আয়ত্ত করতে পারে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًا، إبراهيم بن الحكم متَّفق على ضعفه، وقال الذهبي في "تلخيصه": متروك.وأخرجه بنحوه الترمذي (3279) من طريق سلم بن جعفر، عن الحكم بن أبان، بهذا الإسناد. دون ذكر القدمين والستر. وهذا الإسناد حسن.وأخرج النسائي (11473) من طريق يزيد بن أبي حكيم، عن الحكم بن أبان، عن عكرمة، عن ابن عبَّاس قال: إنَّ محمدًا صلى الله عليه وسلم رأى ربَّه عز وجل. وسلف هذا من طريق آخر عن عكرمة برقم (218)، وانظر الكلام على مسألة الرؤية في التعليق على الحديث رقم (217). توبع. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الأشجعي.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 8/ 62 و 63، وأبو عبيد في "الأموال" (969)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1400 من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري أيضًا 8/ 63، وابن زنجويه في "الأموال" (1429) من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، به. لكن بيَّن شعبة في رواية محمد بن جعفر عنه عند الطبري أنه إنما سمعه من سفيان الثوري عن أبي إسحاق.
3274 - أخبرنا أبو بكر الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوَص، عن ابن مسعود: {وَمِنَ الْأَنْعَامِ حَمُولَةً وَفَرْشًا} [الأنعام:142]، قال: الحَمُولة: ما حَمَل من الإبل، والفَرْش: الصِّغار [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {আর গৃহপালিত চতুষ্পদ জন্তুর মধ্যে কিছু আছে বোঝার জন্য এবং কিছু আছে বিছানার জন্য} [সূরা আল-আনআম: ১৪২] সম্পর্কে তিনি বলেন: ‘আল-হামূলা’ (الحَمُولة) হলো উট, যা বোঝা বহন করে। আর ‘আল-ফার্শ’ (الفَرْش) হলো ছোটগুলো (বাচ্চা)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي حذيفة -وهو موسى بن مسعود النهدي- وقد توبع. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الأشجعي.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 8/ 62 و 63، وأبو عبيد في "الأموال" (969)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1400 من طرق عن سفيان، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري أيضًا 8/ 63، وابن زنجويه في "الأموال" (1429) من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، به. لكن بيَّن شعبة في رواية محمد بن جعفر عنه عند الطبري أنه إنما سمعه من سفيان الثوري عن أبي إسحاق.
3275 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثنا عمرو بن دينار قال: قلت لجابر بن زيد [1]: إنهم يَزعُمون أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لحوم الحُمُر الأهلية زمنَ خيبر، قال: قد كان يقول ذلك الحَكَمُ بن عمرو عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن أَبَي ذلك البحرُ -يعني ابنَ عبَّاس- وقرأ {قُلْ لَا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا} الآيةَ [الأنعام: 145].وقد كان أهلُ الجاهلية يتركون أشياءَ تقذُّرًا، فأنزل الله عز وجل في كتابه وبيَّن حلالَه وحرامَه، فما أَحلَّ فهو حلال، وما حرَّم فهو حرام، وما سَكَتَ عنه فهو عَفْوٌ؛ ثم تلا هذه الآية: {قُلْ لَا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَى طَاعِمٍ يَطْعَمُهُ إِلَّا أَنْ يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًا مَسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنْزِيرٍ} [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السياقة.
জাবির ইবনে যায়িদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, (আমর ইবনে দীনার তাঁকে বলেছেন) আমি জাবির ইবনে যায়িদকে বললাম: লোকেরা দাবি করে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের সময় গৃহপালিত গাধার মাংস নিষেধ করেছিলেন। তিনি বললেন: হাকাম ইবনে আমর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এমনটি বর্ণনা করতেন, কিন্তু আল-বাহর (জ্ঞানের সমুদ্র)—অর্থাৎ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তা প্রত্যাখ্যান করেছেন। আর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করেন: “বলো, আমার প্রতি যা ওহী করা হয়েছে, তার মধ্যে আমি এমন কিছু পাচ্ছি না যা ভক্ষণকারীর জন্য হারাম।” (সূরা আনআম: ১৪৫)। জাহেলিয়াতের যুগের লোকেরা ঘৃণাবশত কিছু জিনিস বর্জন করত। অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে তা অবতীর্ণ করেন এবং তাঁর হালাল ও হারাম স্পষ্ট করে দেন। সুতরাং, তিনি যা হালাল করেছেন, তা হালাল; আর তিনি যা হারাম করেছেন, তা হারাম। আর যে বিষয়ে তিনি নীরবতা অবলম্বন করেছেন, তা ক্ষমা (বা অনুমোদিত)। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করেন: “বলো, আমার প্রতি যা ওহী করা হয়েছে, তার মধ্যে আমি ভক্ষণকারীর জন্য এমন কিছু পাচ্ছি না যা হারাম, যদি না তা হয় মৃত জীব, প্রবাহিত রক্ত, অথবা শূকরের মাংস।” (আল-আনআম: ১৪৫)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: لجابر بن عبد الله، وهو تحريف، وجاء على الصواب كما أثبتناه في "السنن الكبرى" للبيهقي 9/ 330 حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه، وهو كذلك في "مسند الحميدي" (859)، وكذا عند البخاري (5529) من روايته عن علي بن المديني عن سفيان: وهو ابن عيينة، وجابر بن زيد: هذا هو أبو الشعثاء البصري، أحد كبار تلامذة ابن عباس. وسيأتي عند المصنف برقم (6415) من طريق حماد بن زيد عن عمرو بن دينار.والشطر الثاني منه -وهو قوله: قد كان أهل الجاهلية … إلخ- سيأتي عند المصنف برقم (7291) من طريق محمد بن شريك عن عمرو بن دينار، وفيه بيانُ أنه من قول ابن عباس رواه عنه أبو الشعثاء.قلنا: الذي كان يأباه ابنُ عبَّاس رضي الله عنهما فيما يُروى من النهي عن لحوم الحمر الأهلية هو أنها محرَّمة لذاتها، فقد كان يتردَّد في سبب النهي كما روى البخاري في "صحيحه" (4227) من طريق الشعبي عنه قال: لا أدري أَنَهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم -أي: عن لحم الحُمر الأهليَّة يوم خيبر- من أجل أنه كان حَمُولةَ الناس فكره أن تذهب حمولتُهم، أو حرَّمه؟! وإلّا فالنهي عن لحومها قد جاء مرويًا عن عشرة من الصحابة غير الحكم أو أكثر، وكلها أحاديث صحيحة أخرجها الشيخان وغيرهما، وقد أزال هذا التردُّدَ الذي وقع لابن عبَّاس حديثُ أنس بن مالك عند البخاري (4198) و (5528) حيث جاء فيه مرفوعًا: "فإنها رِجْس"، وكذا الأمر بغسل الإناء من أثرها في حديث سلمة بن الأكوع عند البخاري أيضًا (4196)، وهذا حكم المتنجِّس، فيستفاد من هذين الحديثين تحريم أكلها، وهما دالَّان على تحريمها لعينها لا لمعنًى آخر، كما قال غير واحد من أهل العلم فيما نقله الحافظ ابن حجر في "الفتح" 17/ 116، وانظر بقية كلامه هناك في الردِّ على الاستدلال بآية الأنعام.
[2] إسناده صحيح.وأخرج الشطر الأول منه أحمد 29/ (17861)، والبخاري (5529) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك أبو داود (3808) من طريق ابن جريج، عن عمرو بن دينار، به. وسيأتي عند المصنف برقم (6415) من طريق حماد بن زيد عن عمرو بن دينار.والشطر الثاني منه -وهو قوله: قد كان أهل الجاهلية … إلخ- سيأتي عند المصنف برقم (7291) من طريق محمد بن شريك عن عمرو بن دينار، وفيه بيانُ أنه من قول ابن عباس رواه عنه أبو الشعثاء.قلنا: الذي كان يأباه ابنُ عبَّاس رضي الله عنهما فيما يُروى من النهي عن لحوم الحمر الأهلية هو أنها محرَّمة لذاتها، فقد كان يتردَّد في سبب النهي كما روى البخاري في "صحيحه" (4227) من طريق الشعبي عنه قال: لا أدري أَنَهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم -أي: عن لحم الحُمر الأهليَّة يوم خيبر- من أجل أنه كان حَمُولةَ الناس فكره أن تذهب حمولتُهم، أو حرَّمه؟! وإلّا فالنهي عن لحومها قد جاء مرويًا عن عشرة من الصحابة غير الحكم أو أكثر، وكلها أحاديث صحيحة أخرجها الشيخان وغيرهما، وقد أزال هذا التردُّدَ الذي وقع لابن عبَّاس حديثُ أنس بن مالك عند البخاري (4198) و (5528) حيث جاء فيه مرفوعًا: "فإنها رِجْس"، وكذا الأمر بغسل الإناء من أثرها في حديث سلمة بن الأكوع عند البخاري أيضًا (4196)، وهذا حكم المتنجِّس، فيستفاد من هذين الحديثين تحريم أكلها، وهما دالَّان على تحريمها لعينها لا لمعنًى آخر، كما قال غير واحد من أهل العلم فيما نقله الحافظ ابن حجر في "الفتح" 17/ 116، وانظر بقية كلامه هناك في الردِّ على الاستدلال بآية الأنعام.
3276 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن عبَّاس: أنه سمع رجلًا يقول: الشرُّ ليس بقَدَر، فقال ابن عبَّاس: بينَنا وبينَ أهل القَدَر: {سَيَقُولُ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكْنَا وَلَا آبَاؤُنَا} حتى بلغ {فَلَوْ شَاءَ لَهَدَاكُمْ أَجْمَعِينَ} [الأنعام: 148 - 149]، قال ابن عبَّاس: والعَجْرُ والكَيْسُ من القَدَر [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন যে, মন্দ (অকল্যাণ) তাকদীরের অন্তর্ভুক্ত নয়। তখন ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমাদের এবং কাদারিয়্যাদের (তাকদীর অস্বীকারকারীদের) মাঝে এই আয়াতটি (নির্ণায়ক): "{যারা শিরক করেছে, তারা বলবে: যদি আল্লাহ চাইতেন, তবে আমরাও শিরক করতাম না এবং আমাদের পিতৃপুরুষেরাও নয়...}" — এভাবে পড়তে থাকলেন — যতক্ষণ না তিনি এই আয়াতে পৌঁছলেন: "{...যদি তিনি চাইতেন, তবে তোমাদের সকলকেই সঠিক পথ দেখাতেন।}" (সূরা আল-আন'আম: ১৪৮-১৪৯)। ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুর্বলতা (অক্ষমতা) এবং বুদ্ধিমত্তা (সাফল্য) উভয়ই তাকদীরের অন্তর্ভুক্ত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه.وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (380) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (970) من طريق ابن شيرويه، عن إسحاق بن راهويه، وهو في "جامع معمر" مقطَّعًا برقم (20073) و (20080).ومن طريق عبد الرزاق أخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1412، وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 3/ 278 و 4/ 166. ولم يذكر ابن أبي حاتم فيه قول ابن عبَّاس: العجز والكيس من القدر.وأخرجه كذلك دون قول ابن عبَّاس في آخره: الفريابي في "القدر" (336) من طريق ابن المبارك، عن معمر، به. وأخرج قولَ ابن عبَّاس هذا برقم (305) من طريق ابن جريج عن عبد الله ابن طاووس.وقوله: "العجز والكيس من القدر" روي مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم من حديث ابن عمر عند مسلم (2655) وغيره بلفظ: "كل شيء بقدر حتى العجز والكيس".والكَيْس: ضد العَجْز، وهو النشاط والحِذْق بالأمور.
3277 - حدثنا بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مالك بن إسماعيل النَّهْدي، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن خَليفة قال: سمعت ابن عبَّاس يقول: إِنَّ في الأنعام آياتٍ مُحكَماتٍ هُنَّ أُمُّ الكتاب، ثم قرأ: {قُلْ تَعَالَوْا أَتْلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمْ عَلَيْكُمْ} إلى آخر الآية [الأنعام: 151] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিঃসন্দেহে সূরা আন'আমের মধ্যে সুস্পষ্ট আয়াতসমূহ রয়েছে, যা হলো উম্মুল কিতাব (কুরআনের মূল ভিত্তি)। এরপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: "{বলো, এসো, আমি তোমাদেরকে পড়ে শোনাই তোমাদের প্রতিপালক তোমাদের জন্য কী হারাম করেছেন...}" আয়াতের শেষ পর্যন্ত। (সূরা আন'আম: ১৫১)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده فيه لِين، كما سبق بيانه عند المصنف برقم (3175).
3278 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا جَرِير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: لما أَنزل الله: {وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ} [الأنعام:152]، و {إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًا} [النساء: 10]، انطَلَقَ من كان عنده يتيمٌ فعَزَلَ طعامَه من طعامِه، وشرابَه من شرابِه، فجعل يَفضُلُ الشيءُ من طعامه فيُحبَسُ له حتى يأكلَه أو يَفسُدَ، فاشتَدَّ ذلك عليهم، فذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله عز وجل: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلَاحٌ لَهُمْ خَيْرٌ وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ} [البقرة: 220]، فخَلَطُوا طعامَهم بطعامِهم، وشرابَهم بشرابِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহ তাআলা অবতীর্ণ করলেন: "আর তোমরা ইয়াতীমের সম্পদের নিকটবর্তী হয়ো না, উত্তম পন্থা ব্যতীত।" [সূরা আন'আম: ১৫২] এবং "নিশ্চয় যারা অন্যায়ভাবে ইয়াতীমদের সম্পদ ভক্ষণ করে, তারা তাদের পেটে আগুনই ভর্তি করে এবং অচিরেই তারা প্রজ্বলিত আগুনে প্রবেশ করবে।" [সূরা নিসা: ১০], তখন যার কাছে কোনো ইয়াতীম ছিল, সে তার খাদ্য ইয়াতীমের খাদ্য থেকে আলাদা করে দিল এবং তার পানীয় তার পানীয় থেকে আলাদা করে দিল। ফলে ইয়াতীমের খাদ্য থেকে কিছু অবশিষ্ট থাকলে তা তার জন্য রেখে দেওয়া হতো, যতক্ষণ না সে তা খেত বা তা নষ্ট হয়ে যেত। এতে তাদের জন্য তা কঠিন হয়ে গেল। তখন তারা বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা অবতীর্ণ করলেন: "আর তারা তোমাকে ইয়াতীমদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে। বলে দাও, তাদের জন্য সুব্যবস্থা করাই উত্তম। আর যদি তোমরা তাদের সাথে মিশে যাও, তবে তারা তো তোমাদের ভাই।" [সূরা বাকারা: ২২০] অতঃপর তারা তাদের খাদ্য ও পানীয় ইয়াতীমদের খাদ্য ও পানীয়ের সাথে মিশিয়ে দিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث حسن. وهو مكرر (3223). إلى الآية، ومنهم من قال: وقرأ آية النساء، ومنهم من قال: وقرأ الآية.وأخرجه بنحوه أحمد (22670)، ومسلم (1709) (43)، وابن ماجه (2603)، وابن حبان (4405) من طريق أبي قلابة، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن عبادة قال: أخذ علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم كما أَخذ على النساء … وذكره.وشكَّ خالد الحذّاء في روايته عن أبي قلابة عند أحمد (22668) فجعله من حديثه عن أبي أسماء الرحبي عن عبادة. والمحفوظ: أبو قلابة عن أبي الأشعث الصنعاني.وانظر حديث علي بن أبي طالب السالف برقم (13).