হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3599)


3599 - أخبرني أبو الحسن محمد بن علي بن بَكْر العَدْل، حدثنا الحسين بن الفَضْل البَجَلي، حدثنا شَبَابةُ بن سوَّار، حدثني إسحاق بن يحيى بن طَلْحة، عن عمِّه موسى بن طَلْحة قال: بَيْنا عائشةُ بنتُ طلحة تقول لأمِّها أمِّ كُلثُوم بنت أبي بكر: أَبي خيرٌ من أبيكِ، فقالت عائشة أمُّ المؤمنين: ألا أَقضي بينكما، إنَّ أبا بكر دَخَلَ على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "يا أبا بكرٍ، أنت عَتيقُ اللهِ من النار"، قالت: فمن يومِئذٍ سُمِّي عَتيقًا، ودَخَلَ طلحةُ على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "أنت يا طلحةُ ممَّن قَضَى نَحْبَه" [1]. صحيح الإسناد ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একবার আয়িশা বিনতে তালহা তাঁর মাতা উম্মে কুলসুম বিনতে আবী বাকরকে বলছিলেন, "আমার পিতা আপনার পিতার চেয়ে উত্তম।" তখন উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি কি তোমাদের দুজনের মধ্যে ফয়সালা করব না? নিশ্চয় আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন, তখন তিনি বললেন, 'হে আবূ বাকর! তুমি আল্লাহর পক্ষ থেকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তিপ্রাপ্ত (আতীক)।' তিনি (আয়িশা) বললেন, তখন থেকে তাঁর নাম আতীক রাখা হয়। আর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন, তখন তিনি বললেন, 'হে তালহা! তুমি তাদের অন্তর্ভুক্ত, যারা তাদের অঙ্গীকার পূর্ণ করেছে।'"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده بهذا السِّياق ضعيف جدًّا من أجل إسحاق بن يحيى بن طلحة فإنه متروك الحديث، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3870) عن شبابة بن سوّار، بهذا الإسناد. وسيأتي عند المصنف برقم (5711) من طريق ابن وهب عن إسحاق بن يحيى عن عمه عيسى بن طلحة بن عبيد الله … فذكر القصة.وسيأتي مختصرًا بقصة تسمية أبي بكر بعتيق برقم (4452) من وجه آخر، وفيه صالح بن موسى الطلحي وهو متروك أيضًا.وأخرجه كذلك مختصرًا الترمذي (3679) من طريق معن بن عيسى، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عمه إسحاق بن طلحة، عن عائشة أم المؤمنين. وقال: حديث غريب.وقد روى إسحاق بن يحيى أيضًا عن عمِّه موسى بن طلحة، عن معاوية بن أبي سفيان رفعه قال: "طلحة ممن قضى نحبه". أخرجه ابن ماجه (126) و (127)، والترمذي (3202).وهذا الحرف قد روي بإسناد حسن عند الترمذي برقم (3203) من طريق طلحة بن يحيى، عن عمَّيه موسى وعيسى ابني طلحة بن عبيد الله، عن أبيهما طلحة رضي الله عنه. وحسَّنه الترمذي.وأما الحرف الذي فيه ذكر تسمية أبي بكر بعتيق، فقد روي بإسناد قوي عند ابن حبان (6864) من حديث عبد الله بن الزبير.قوله: "ممَّن قضى نحبه" يشير إلى قوله تعالى: {مِنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ فَمِنْهُمْ مَنْ قَضَى نَحْبَهُ وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْتَظِرُ} [الأحزاب: 23]، والنَّحْب: العهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3600)


3600 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا العبَّاس بن محمد الدُّوري، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، حدثنا شَرِيك بن أبي نَمِرٍ، عن عطاء بن يَسَار، عن أم سَلَمة أنها قالت: في بيتي نَزَلَت هذه الآية: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ} [الأحزاب: 33]، قالت: فأَرسَل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى علي وفاطمة والحسن والحسين، فقال: "اللهمَّ هؤلاءِ أهلُ بيتي" قالت أم سلمة: يا رسول الله، ما أنا من أهلِ البيت؟ قال: "إنَّكِ إلى خيرٍ، وهؤلاءِ أهلُ بيتي" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার ঘরে এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: "আল্লাহ কেবল চান তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে, হে আহলে বাইত (নবীর পরিবার)।" [সূরা আহযাব: ৩৩] তিনি বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী, ফাতিমা, হাসান এবং হুসাইনের কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! এরাই হলো আমার আহলে বাইত (পরিবার)।" উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত নই?' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তুমি কল্যাণের উপর আছো, তবে এরাই হলো আমার আহলে বাইত।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار فيه لين، وقد خالفه من هو أوثق منه فأرسل الحديث، فهو المحفوظ، غير أنَّ هذا الحديث مرويّ من وجوه عن أم سلمة بعضُها صحيح.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (23/ 627) عن إدريس بن جعفر العطار، وأبو نُعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 253 من طريق محمد بن هارون الرازي، كلاهما عن عثمان بن عمر، بهذا الإسناد.وأخرجه علي بن حُجر السَّعْدي في "أحاديث إسماعيل بن جعفر" (403) عن إسماعيل بن جعفر بن أبي كثير، وابن المغازلي في "مناقب عليّ" (351) من طريق أنس بن عياض الليثي، كلاهما عن شريك بن أبي نمر، عن عطاء بن يسار: أنَّ هذه الآية نزلت في بيت أم سلمة {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} … ثم ذكرا نحو القصة. وعطاء بن يسار قد صحَّ سماعه من أم سلمة لكن روايته هنا ظاهرة في إرساله الحديثَ، وأنه لم يسمعه من أم سلمة.وأخرجه أحمد (44/ 26508) من طريق أبي ليلى الكندي، عن أم سلمة. وإسناده صحيح إن شاء الله.وأخرجه أحمد (44/ 26508) من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء بن أبي رباح، عمَّن سمع أم سلمة. ورجاله ثقات، وهذا المبهم هو - فيما يغلب على ظننا - ابنها عمر بن أبي سلمة ربيب النبي صلى الله عليه وسلم.فقد أخرجه الترمذي (3205) و (3787) من طريق يحيى بن عبيد المكي - كما جاء منسوبًا عند الطبري 22/ 8 والطبراني (8295) والطحاوي في "المشكل" (771) - عن عطاء بن أبي رباح، عن عمر بن أبي سلمة، قال: نزلت هذه الآية على النبي صلى الله عليه وسلم في بيت أم سلمة … فذكر القصة. فأرسله عمر بن أبي سلمة، وهو صحابي صغير ومرسله حجة، والغالب أنه سمعه من أمه. وهذا إسناد جيد إن شاء الله.وأخرجه أحمد (44/ 26508) و (26550) و (26597)، والترمذي (3871) من طرق عن شهر بن حوشب، عن أم سلمة. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. قلنا: وشهرٌ حسن الحديث في المتابعات والشواهد.وسيأتي برقم (4756) من طريق الحسن بن مُكرم عن عثمان بن عمر.وانظر شواهده عند حديث ابن عبَّاس الآتي عند المصنف برقم (4702).قال الإمام القرطبي في "الجامع لأحكام القرآن" 14/ 184: هذه دعوة من النبي صلى الله عليه وسلم لهم بعد نزول الآية أحب أن يدخلهم في الآية التي خوطب بها الأزواج.قال البيهقي في "الاعتقاد" ص 327 بعد أن ذكر حديث أم سلمة: هذا يؤكد ما ذكرنا من دخول آله وأزواجه في أهل بيته وعلينا محبة جميعهم وموالاتهم في الدين.وممّن جعل الآية شاملة لأزواج النبي صلى الله عليه وسلم وعليٍّ وفاطمة والحَسن والحُسين: أبو إسحاق الزجاج في "معاني القرآن وإعرابه" 4/ 226، ووافقه الواحدي في "تفسيره البسيط" 18/ 241، وكذلك قال أبو المظفر السمعاني في "تفسيره" 4/ 281، وأبو حيان في "البحر المحيط" 8/ 479، وابن تيمية في "منهاج السنة" 4/ 23 و 7/ 74، وابن كثير في "تفسيره" 6/ 411، وغيرهم.وقوله: "إنك إلى خير" قال السندي في حاشيته على "المسند": ظاهره عدم دخولها فيهم، وظاهر القرآن الدخول، فيحتمل أنَّ المراد بكونها إلى خيرٍ أنها داخلةٌ البتّة كما هو ظاهر سَوْق القرآن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3601)


3601 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا العبَّاس بن الوليد بن مَزيَد، أخبرني أبي، قال: سمعتُ الأوزاعيَّ يقول: حدثني أبو عمَّار، قال: حدثني واثلةُ بن الأسقَعِ قال: جئتُ أريد عليًّا فلم أجِدْه، فقالت فاطمةُ: انطلَقَ إلى رسول الله يَدعُوه، فاجلِسْ، فجاء مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فدخل ودخلتُ معهما، قال: فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حسنًا وحسينًا فأجلسَ كلَّ واحد منهما على فَخذِه، وأدنى فاطمةَ من حِجْره وزوجَها، ثم لفَّ عليهم ثوبَه وأنا شاهدٌ، فقال: " {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا}، اللهمَّ هؤلاءِ أهلُ بيتي، اللهمَّ أهلي أحقُّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ওয়াসিলা ইবনুল আসকা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ওয়াসিলা) বললেন: আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিলাম, কিন্তু তাঁকে পেলাম না। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডাকার জন্য তাঁর কাছে গিয়েছেন। আপনি বসুন। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আসলেন এবং ঘরে প্রবেশ করলেন। আমিও তাঁদের সাথে প্রবেশ করলাম। তিনি বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং তাঁদের প্রত্যেককে তাঁর এক উরুতে বসালেন, এবং ফাতিমা ও তাঁর স্বামীকে (আলীকে) তাঁর নিকটবর্তী করলেন। এরপর আমার উপস্থিতিতেই তিনি তাঁদের উপর তাঁর কাপড় জড়িয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “নিশ্চয় আল্লাহ চান, তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে, হে আহলে বাইত (নবীর পরিবার)! এবং তোমাদের সম্পূর্ণরূপে পবিত্র করতে।” (আল-আহযাব ৩৩:৩৩) তিনি আরও বললেন: “হে আল্লাহ! এরা আমার আহলে বাইত (পরিবার)। হে আল্লাহ! আমার পরিবারই (এই দয়া ও পবিত্রতার) বেশি হকদার।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عمار: هو شدّاد بن عبد الله مولى معاوية بن أبي سفيان.وأخرجه أحمد (28/ 16988)، وابن حبان (6976) من طرق عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. وقع في بعض الروايات في آخره - كما عند ابن حبان وغيره -: قال واثلة: فقلت من ناحية البيت: وأنا يا رسول الله من أهلِك؟ قال: "وأنت من أهلي"، قال واثلة: إنها لَمِن أرجى ما أَرتجي.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (4757).قال السندي في حاشيته على "المسند": قوله: "وأهل بيتي أحق" أي: بهذه الكرامة، وهي إذهاب الرجس والتطهير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3602)


3602 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهدُ الأصبهاني، حدثنا أَسِيدُ بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان بن سعيد، عن ابن أبي نَجِيح، عن مجاهد، عن أم سَلَمة قالت: قلت: يا رسول الله، يُذكَرُ الرجالُ ولا يُذكَرُ النساءُ! فأنزل الله عز وجل: {إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ} [الأحزاب: 35]، وأنزل: {أَنِّي لَا أُضِيعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِنْكُمْ مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى} [آل عمران: 195] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! পুরুষদের (ফযীলত) উল্লেখ করা হয়, কিন্তু মহিলাদের উল্লেখ করা হয় না!" অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "নিশ্চয় আত্মসমর্পণকারী পুরুষ ও আত্মসমর্পণকারিণী নারী, ঈমানদার পুরুষ ও ঈমানদার নারী..." (সূরা আল-আহযাব: ৩৫) এবং নাযিল করলেন: "আমি তোমাদের মধ্যে কর্মনিষ্ঠ নর-নারীর কারো কর্ম বিফল করি না।" (সূরা আলে ইমরান: ১৯৫)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، وقد سلف الكلام على سماع مجاهد من أم سلمة عند الحديث رقم (3234).وأخرجه أحمد (44/ 26575) و (26603)، والنسائي (11341) من طريق عبد الرحمن بن شيبة، عن أم سلمة - دون ذكر آية آل عمران. وإسناده صحيح.وأخرجه كذلك النسائي (11340) من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أم سلمة. وإسناده حسن إن شاء الله.وانظر ما سلف برقم (3213) و (3234).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3603)


3603 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا سفيان، عن علي بن الأقمَر، عن الأغرِّ، عن أبي سعيدٍ أنه قال.وحدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن أبي حامد المقرئ، حدثنا عيسى بن جعفر الرازي، حدثنا سفيان بن سعيد، عن علي بن الأقمَر، عن الأغرِّ، عن أبي سعيدٍ وأبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أيقَظَ الرجلُ امرأتَه من الليل فصَلَّيا ركعتين، كُتِبا من الذاكرينَ الله كثيرًا والذاكراتِ" [1].لم يُسنِدْه أبو نُعيم ولم يَذكُر النبيَّ صلى الله عليه وسلم في الإسناد، وأسنَدَه عيسى بنُ جعفر وهو ثقةٌ.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ ও আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো ব্যক্তি তার স্ত্রীকে রাতে জাগিয়ে তোলে এবং অতঃপর তারা (স্বামী-স্ত্রী) দু’রাকাআত সালাত আদায় করে, তখন তাদের দু’জনকে আল্লাহকে অধিক স্মরণকারী পুরুষ ও স্মরণকারী নারীদের অন্তর্ভুক্ত করা হয়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، وعيسى بن جعفر الرازي - وإن كان من جملة الثقات - قد وهمَ في الجمع بين حديثي أبي سعيد وأبي هريرة، فالصواب أنَّ حديث أبي سعيد في رواية سفيان الثوري موقوف، هكذا رواه عنه أبو نعيم الفضل بن دكين عند المصنف هنا، وعبدُ الرزاق في "مصنفه" (4738)، ومحمدُ بن كثير العبدي عند أبي داود في "سننه" (1309).وقد رواه عن علي بن الأقمر غيرُ سفيان فرفع الحديث عن أبي سعيد وأبي هريرة كليهما، كالأعمش فيما سلف عند المصنف برقم (1204).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3604)


3604 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا أبو عَوَانة، أخبرني عمر بن أبي سَلَمة، عن أبيه قال: حدثني أسامة بن زيد قال: كنتُ في المسجد فأتاني العبَّاسُ وعليٌّ فقالا لي: يا أسامةُ، استأذِنْ لنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدخلتُ على النبي صلى الله عليه وسلم فاستأذنتُه فقلت له: إنَّ العبَّاس وعليًّا يستأذِنانِ، قال: "هل تدري ما حاجَتُهما؟ " قلت: لا والله ما أَدري، قال: "لكنِّي أَدْري، ائذَنْ لهما" فدخلا عليه، فقالا: يا رسول الله، جئناك نسألُك: أيُّ أهلِك أحبُّ إليك؟ قال: "أَحبُّ أهلي إليَّ فاطمةُ بنتُ محمدٍ" فقالا: يا رسول الله، ليس نسألُك عن فاطمةَ، قال: "فأسامةُ بنُ زيدٍ الذي أَنْعَمَ اللهُ عليه وأَنعمتُ عليه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মসজিদে ছিলাম। তখন আমার কাছে আব্বাস ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং আমাকে বললেন: হে উসামা, আপনি আমাদের জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে প্রবেশের অনুমতি নিন। আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে প্রবেশ করলাম এবং তাঁর কাছে অনুমতি চাইলাম। আমি তাঁকে বললাম: আব্বাস এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করতে অনুমতি চাচ্ছেন। তিনি বললেন: "তুমি কি জানো তাদের কী প্রয়োজন?" আমি বললাম: আল্লাহর শপথ, আমি জানি না। তিনি বললেন: "কিন্তু আমি জানি। তুমি তাদের দু'জনকে অনুমতি দাও।" অতঃপর তারা দু'জন তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনার কাছে এসেছি আপনাকে জিজ্ঞেস করতে যে, আপনার পরিবারের মধ্যে আপনার কাছে সবচেয়ে প্রিয় কে? তিনি বললেন: "আমার পরিবারের মধ্যে আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় হলো ফাতিমা বিনত মুহাম্মাদ।" তারা দু'জন বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে ফাতিমা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করিনি। তিনি বললেন: "তাহলে উসামা ইবনু যায়িদ, যার উপর আল্লাহ অনুগ্রহ করেছেন এবং আমিও অনুগ্রহ করেছি।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لتفرُّد عمر بن أبي سلمة به ففيه ضعيف، والراجح فيه أنه يقتل من حديثه ما توبع عليه، وقد ضعَّف الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه الترمذي (3819) عن أحمد بن الحسن، عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن، وكان شعبة يضعِّف عمر بن أبي سلمة.وسيأتي مختصرًا بآخره برقم (6674).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3605)


3605 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار العَدْل، حدثنا الحسين بن الفَضْل البَجَلي، حدثنا عفَّان بن مُسلِم، حدثنا حمّاد بن زيد، عن ثابت، عن أنس قال: جاء زيدُ بن حارثةَ يَشكُو إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من زينب بنت جَحْش، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "أَمسِكْ عليك أَهلَك"، فنزلت: {وَتُخْفِي فِي نَفْسِكَ مَا اللَّهُ مُبْدِيهِ} [الأحزاب: 37] [1].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ ইবনে হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে অভিযোগ করতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার স্ত্রীকে (জায়নাবকে) তোমার কাছে রেখে দাও।" অতঃপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: "আর তুমি তোমার অন্তরে যা গোপন রেখেছিলে, আল্লাহ তা প্রকাশ করে দিচ্ছেন।" (সূরা আহযাব: ৩৭)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه ابن حبان (7045) من طريق محمد بن عبد الرحيم، عن عفان، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد (19/ 12511)، والبخاري (4787)، والترمذي (3212)، والنسائي (11343) من طرق عن حماد بن زيد، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3606)


3606 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن أبي عثمان، عن أنس بن مالك قال: لما تَزوَّج النبيُّ صلى الله عليه وسلم زينبَ بَعَثَت أمُّ سُلَيم حَيْسًا في تَوْرٍ من حجارة، قال أنس: فقال ليَ النبي صلى الله عليه وسلم: "اذهَبْ فَادْعُ مَن لَقِيتَ من المسلمين"، فذهبتُ فما رأيت أحدًا إلَّا دعوتُه، قال: ووَضَعَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم يدَه في الطعام ودعا فيه وقال ما شاءَ الله، قال: فجعلوا يأكلون ويَخرُجون، وبَقِيَت طائفةٌ في البيت، فجعل النبيُّ صلى الله عليه وسلم يَستَحْيي منهم، وأطالوا الحديثَ؛ فخَرَجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وتَرَكَهم في البيت، فأنزل الله: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَنْ يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ} يعني: غير مُتحيِّنِينَ، حتَّى بلغ {ذَلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ} [الأحزاب: 53] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিয়ে করলেন, তখন উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাথরের একটি পাত্রে 'হায়স' (ঘি, খেজুর ও পনির মিশ্রিত খাবার) পাঠালেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "যাও, পথে যাদেরকে পাবে সেই মুসলিমদের দাওয়াত দাও।" আমি গেলাম এবং যাকে পেলাম তাকেই দাওয়াত করলাম। তিনি বলেন, অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাবারের মধ্যে হাত রাখলেন, তাতে দু'আ করলেন এবং বললেন, "মা-শা-আল্লাহ (আল্লাহ যা চান)!" এরপর তারা (লোকেরা) খেতে লাগল এবং একে একে চলে যেতে লাগল, কিন্তু একটি দল ঘরের মধ্যে থেকে গেল। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রতি লজ্জিত বোধ করতে লাগলেন, আর তারা কথাবার্তা দীর্ঘায়িত করতে থাকল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘর থেকে বের হয়ে গেলেন এবং তাদেরকে ঘরে রেখে আসলেন। তখন আল্লাহ্ নাযিল করলেন: "হে মু’মিনগণ! তোমরা নবীর ঘরে প্রবেশ করো না, যতক্ষণ না তোমাদেরকে খাওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়, খাবারের সময়ের জন্য অপেক্ষা না করে..." (অর্থাৎ: সময় না গুনে)। এমনকি তিনি এ পর্যন্ত পৌঁছালেন: "...তা তোমাদের ও তাদের হৃদয়ের জন্য অধিক পবিত্র।" (সূরা আহযাব: ৫৩)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات، إلَّا أنَّ أبا عثمان - وهو الجعد بن دينار اليشكري - قد تفرَّد بذكر بعث أمِّ سليم حيسًا في وليمة زينب، وكل من رواه عن أنس ذكر أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أطعمهم فيها خبزًا ولحمًا، وقد أشار إلى هذا الإشكال القاضي عياض في "إكمال المعلم" 4/ 602، وانظر "فتح الباري" لابن حجر 15/ 448 - 449.وأخرجه أحمد (20/ 12669)، ومسلم (1428) (95) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهول منه.وأخرجه النسائي (11352) من طريق محمد بن ثور، عن معمر، به.وأخرجه مسلم (1428) (94)، والترمذي (3218)، والنسائي (6584) من طريق جعفر بن سليمان، وعلَّقه البخاري (5163) عن إبراهيم بن طهمان، كلاهما عن أبي عثمان، به.وأخرجه بنحوه أو بمعناه: أحمد (19/ 12023) و (20/ 12716) و (13025) و (21/ 13361) و (13538)، والبخاري (5166) و (5466) و (6238) و (6239) و (6271) و (7421)، ومسلم (1427) (87) و (1428)، والترمذي (3217) و (3219)، والنسائي (5379) و (6581) و (8869) و (11348) و (11352) و (11353) و (11356) و (11357)، وابن حبان (5145) و (5578) و (5579) من طرق عن أنس.الحيس: طعام من أقِط وسمن وتمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3607)


3607 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عوف الطائي، حدثنا عبد القُدُّوس بن الحجَّاج، حدثني صفوان بن عمرو، حدثني سُلَيم بن عامر قال: جاء رجل إلى أبي أُمامة فقال: يا أبا أُمامة، إني رأيتُ في منامي أنَّ الملائكة تصلِّي عليك كلَّما دخلتَ وكلَّما خرجتَ، وكلَّما قمتَ وكلَّما جلستَ، قال أبو أُمامة: اللهمَّ غَفْرًا، دَعُونا عنكم، وأنتم لو شئتُم صلَّت عليكم الملائكةُ، ثم قرأ: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا اللَّهَ ذِكْرًا كَثِيرًا (41) وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَأَصِيلًا (42) هُوَ الَّذِي يُصَلِّي عَلَيْكُمْ وَمَلَائِكَتُهُ لِيُخْرِجَكُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ وَكَانَ بِالْمُؤْمِنِينَ رَحِيمًا} [الأحزاب: 41 - 43] [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল: হে আবু উমামা, আমি স্বপ্নে দেখেছি যে আপনি যখনই প্রবেশ করেন, যখনই বের হন, যখনই দাঁড়ান এবং যখনই বসেন, ফেরেশতাগণ আপনার উপর সালাত (দরুদ/দোয়া) পাঠ করে। আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহ, (আমাকে) ক্ষমা করো। তোমরা এ কথা ছাড়ো। আর তোমরা যদি চাও, তবে ফেরেশতাগণ তোমাদের উপরেও সালাত (দরুদ/দোয়া) পাঠ করবে। এরপর তিনি তেলাওয়াত করলেন: "হে মুমিনগণ! তোমরা আল্লাহকে অধিক পরিমাণে স্মরণ করো। আর সকাল-সন্ধ্যায় তাঁর তাসবীহ (পবিত্রতা) বর্ণনা করো। তিনিই তোমাদের প্রতি সালাত (দয়া) বর্ষণ করেন এবং তাঁর ফেরেশতাগণও; যাতে তিনি তোমাদেরকে অন্ধকার থেকে আলোর দিকে বের করে আনতে পারেন। আর তিনি মুমিনদের প্রতি পরম দয়ালু।" (সূরা আল-আহযাব: ৪১-৪৩)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 25 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 66 - عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وكذلك أخرجه أحمد (28/ 17150) عن عبد الرحمن بن مهدي، وابن حبان (6404) من طريق عبد الله بن وهب، كلاهما عن معاوية بن صالح، بهذا الإسناد. وأخطأ عبد الرحمن بن مهدي فسمى عبدَ الأعلى بن هلال: عبدَ الله بن هلال، ونبَّه على ذلك عبد الله بن أحمد بإثر الرواية التي عند والده في "المسند".وسيأتي من وجه ضعيف عن سعيد بن سويد برقم (4220). وانظر شواهده هناك وفيما هو مفصَّل في التعليق على "مسند أحمد".قوله: "وأبي منجدل في طينته" يريد آدم كما وقع صريحًا في روايات الحديث. ومنجدل: أي: ملقًى على الجَدَالة، وهي الأرض، وذلك قبل نفخ الرُّوح فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3608)


3608 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سهل بِشْر بن سهل اللَّبّاد، حدثنا عبد الله بن صالح المِصْري، حدثني معاوية بن صالح، عن سعيد بن سُوَيد، عن عبد الأعلى بن هلال، عن عِرْباض بن ساريَةَ صاحبِ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنِّي عبدُ الله وخاتَمُ النبيِّين وأَبي مُنجَدِلٌ في طِينتِه، وسأخبِرُكم عن ذلك: دعوةُ أَبي إبراهيمَ، وبِشارةُ عيسى، ورُؤْيا أمِّي التي رأَتْ، وكذلك أُمَّهاتُ النبيِّين يَرَيْن" وإنَّ أمَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأتْ حين وَضَعَته نُورًا أضاءت له قصورُ الشام، ثم تلا: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا (45) وَدَاعِيًا إِلَى اللَّهِ بِإِذْنِهِ وَسِرَاجًا مُنِيرًا} [الأحزاب: 45، 46] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইরবায ইবনে সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আমি আল্লাহর বান্দা এবং শেষ নবী। (আমার নবুওয়াত তখন থেকেই সুনির্ধারিত) যখন আদম (আঃ)-এর মাটি ও কাদা মিশ্রিত হচ্ছিল। আমি তোমাদেরকে এ বিষয়ে অবহিত করব: (আমার আগমন হলো) আমার পিতা ইবরাহীম (আঃ)-এর দু'আ, ঈসা (আঃ)-এর সুসংবাদ, আর আমার মায়ের দেখা সেই স্বপ্ন, যা তিনি দেখেছিলেন। আর এমনিভাবে নবীগণের মায়েরা স্বপ্ন দেখে থাকেন।" নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাতা তাঁকে জন্ম দেওয়ার সময় এমন এক নূর (আলো) দেখেছিলেন, যার দ্বারা শামের প্রাসাদসমূহ আলোকিত হয়েছিল। এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াত তিলাওয়াত করেন: "হে নবী! আমি আপনাকে সাক্ষী, সুসংবাদদাতা, সতর্ককারী, আল্লাহর অনুমতিক্রমে তাঁর দিকে আহ্বানকারী এবং উজ্জ্বল প্রদীপরূপে প্রেরণ করেছি।" (সূরা আহযাব: ৪৫-৪৬)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره دون التلاوة، وهذا إسناد حسن إن شاء الله تعالى كما قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 494، إلّا أنَّ ذكر التلاوة في آخر الحديث انفرد به بشر بن سهل اللباد عن عبد الله بن صالح، وبشر هذا قد روى عنه جمع على ما وقع في الأسانيد، ولم يؤثر فيه جرح ولا تعديل، فهو مجهول الحال لكن يعتبر به في المتابعات والشواهد، إلّا أنه في هذا الحديث انفرد بذكر الآية، فقد رواه يعقوب بن سفيان وأبو إسماعيل الترمذي عند البيهقي في "الشعب" (1322) و"الدلائل" 1/ 80، وبكر بن سهل عند الطبراني في "الكبير" (18/ 629)، ثلاثتهم عن عبد الله بن صالح، فلم يذكروا التلاوة في آخره. وكذلك أخرجه أحمد (28/ 17150) عن عبد الرحمن بن مهدي، وابن حبان (6404) من طريق عبد الله بن وهب، كلاهما عن معاوية بن صالح، بهذا الإسناد. وأخطأ عبد الرحمن بن مهدي فسمى عبدَ الأعلى بن هلال: عبدَ الله بن هلال، ونبَّه على ذلك عبد الله بن أحمد بإثر الرواية التي عند والده في "المسند".وسيأتي من وجه ضعيف عن سعيد بن سويد برقم (4220). وانظر شواهده هناك وفيما هو مفصَّل في التعليق على "مسند أحمد".قوله: "وأبي منجدل في طينته" يريد آدم كما وقع صريحًا في روايات الحديث. ومنجدل: أي: ملقًى على الجَدَالة، وهي الأرض، وذلك قبل نفخ الرُّوح فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3609)


3609 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن أبي حامد المقرئ، حدثنا إسحاق بن سليمان الرازي قال: سمعتُ فِطْر بن خَليفة يحدِّث عن الحسن بن مسلم بن يَنَّاق، عن طاووس، عن ابن عبَّاس: أنه تلا قولَ الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ} [الأحزاب: 49]، قال: فلا يكون طلاقٌ حتى يكونَ نكاحٌ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.قال الحاكم: أنا متعجِّبٌ من الشيخين الإمامين كيف أهمَلا هذا الحديثَ ولم يُخرجاه في "الصحيحين"، فقد صحَّ على شرطهما حديثُ ابن عمر وعائشة وعبد الله بن عبَّاس ومعاذ بن جَبَل وجابر بن عبد الله [2].فأمَّا حديثُ عبد الله بن عمر:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর এই বাণী তিলাওয়াত করলেন: "হে মুমিনগণ! যখন তোমরা মুমিন নারীদের বিবাহ করো, অতঃপর স্পর্শ করার পূর্বেই তাদেরকে তালাক দাও..." (সূরা আহযাব: ৪৯)। তিনি বললেন: বিবাহ (নিকাহ) না হওয়া পর্যন্ত তালাক হয় না।

এটি সহীহ ইসনাদের হাদীস, কিন্তু শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) তা বর্ণনা করেননি। ইমাম হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি দুই ইমাম সম্পর্কে বিস্মিত যে তাঁরা কীভাবে এই হাদীসটি উপেক্ষা করলেন এবং তাঁদের সহীহ গ্রন্থদ্বয়ে এটিকে স্থান দিলেন না, অথচ ইবনে উমর, আয়িশা, আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস, মুআয ইবনে জাবাল ও জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসগুলো তাঁদের শর্ত অনুযায়ী সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। আর আব্দুল্লাহ ইবনে উমরের হাদীসের ক্ষেত্রে...




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وانظر ما سلف برقم (2857).



[2] بل هي أحاديث معلَّة كما سيأتي بيانه، فلا تعجُّب إذًا من فعل الشيخين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3610)


3610 - فحدَّثنا أبو علي وأبو الحسين بن المظفَّر الحافظان وأبو حامد بن شارَكَ [1] الفقيه وأبو أحمد الشُّعَيبي وأبو إسحاق البُزَاري [2] في آخرين، قالوا: حدثنا يحيى بن محمد بن صاعد، حدثنا محمد بن يحيى القُطَعي، حدثنا عاصم بن هلال، حدثنا أيوب، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا طلاق إلَّا بعدَ نِكاحٍ" [3]. وأما حديث عائشة:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হওয়ার পূর্বে কোনো তালাক নেই।" আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস প্রসঙ্গে:




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ص) و (ب): شريك، وهو تحريف، وفي (ز): شرك، والمثبت من مصادر ترجمته كـ "سير أعلام النبلاء" 16/ 273، وهو أبو حامد أحمد بن محمد الهروي الحافظ مفتي هَراة وشيخها. وقد يكون ما في (ز) صحيحًا على تحريك الشين والراء بقَصْر الألف، والله أعلم.



[2] البُزَاري: نسبة إلى قرية بنيسابور يقال لها: أبزار وبُزَار كما في "الأنساب" للسمعاني. وانظر ترجمته في "سير النبلاء" 16/ 152. فقال: ثم رجع عنه القطعي.



3610 [3] - حديث معلول، لا أصل له من حديث ابن عمر بهذا الإسناد كما سيأتي بيانه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 5/ 232، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (2918) عن يحيى بن محمد بن صاعد، بهذا الإسناد والمتن.وأخرجه ابن عدي أيضًا 4/ 73، والطبراني في "الأوسط" (3676) و"الصغير" (501) عن صالح بن أحمد بن أبي مقاتل، عن محمد بن يحيى القطعي، به. وصالح بن أبي مقاتل متروك واتهمه الدارقطني بالكذب، وقال ابن عدي: لا يعرف إلّا بابن صاعد، سرقه صالح من ابن صاعد حتى لا يفوته الحديث.قلنا: وهذا الحديث بهذا الإسناد قد وهمَ فيه ابن صاعد، فقد ذكر ابن عدي في "الكامل" 5/ 232 أنه ذكره من رواية ابن صاعد لأبي عروبة الحرّاني، فأخرج إليه أبو عروبة "فوائد القُطعي" فإذا فيها حديث عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده - وقد رواه ابن صاعد عن القطعي عن محمد بن راشد عن حسين المعلم عن عمرو - أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا طلاق إلّا بعد نكاح"، وبعقبه: حدثنا عاصم بن هلال عن أيوب عن نافع عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم: {يَوْمَ يَقُومُ النَّاسُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ} [المطففين: 6] … إلخ" (وهو في "أحاديث أبي عروبة" برواية أبي أحمد الكرابيسي الحاكم برقم 27)، قال ابن عدي: فعلى ما تبيَّن لنا في كتاب أبي عروبة أنه دخل لابن صاعد حديث في حديث، و {يَوْمَ يَقُومُ النَّاسُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ} مشهور عن أيوب، على أنَّ عاصم بن هلال يحتمل ما هو أنكر من هذا. انتهى، يعني أنَّ حفظه ليس بذاك المتين.وذكر أبو يعلى الخليلي في "الإرشاد" 1/ 459 عن المصنف أبي عبد الله الحاكم أنه سمع الحافظ أبا أحمد الكرابيسي يقول: قال لي أبو عروبة: يا أبا أحمد، لو كان هذا الحديث عند أيوب عن نافع، لا يحتجُّ به الناس منذ مئتي سنة عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده. ونحوه في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 64/ 362. وحديث عمرو بن شعيب سلف عند المصنف برقم (2856).أما الدارقطني فقد نسب الوهمَ فيه إلى القُطعي نفسه كما في "سؤالات حمزة السهمي" (107)، فقال: ثم رجع عنه القطعي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3611)


3611 - فحدَّثَنَاه أبو عمران موسى بن سعيد الحنظلي الحافظ بهَمَذان، حدثنا أبو مسلم إبراهيم بن عبد الله، حدثنا حجَّاج بن مِنهال، حدثنا هشام الدَّستُوائي، عن هشام بن عُرْوة، عن عُرْوة، عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا طلاقَ إلَّا بعد نكاحٍ، ولا عِتقَ إلَّا بعد مِلْكٍ" [1]. وأما حديث ابن عبَّاس:




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিবাহের আগে কোনো তালাক নেই এবং মালিকানা লাভের আগে কোনো দাসমুক্তি নেই।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث مضطرب، رجاله ثقات إلّا أنه قد تفرَّد به هكذا مسندًا من حديث عائشة مرفوعًا. حجاجُ بن المنهال عن هشام الدستوائي.وقد خالفه ابنُ جريج ومعمر عند عبد الرزاق في "مصنفه" (11464) فروياه عن هشام بن عروة، عن أبيه من قوله.وتابعهما حمادُ بن زيد عند سعيد بن منصور في "سننه" (1054)، والليث بن سعد عند ابن أبي داود فيما أخرجه من طريقه الحافظ ابن حجر في "التغليق" 4/ 442.ورواه هشام بن سعد - وهو حسن الحديث في المتابعات والشواهد - واختُلف عليه فيه: فرواه حماد بن خالد الخياط عند ابن أبي شيبة 5/ 16 و 14/ 224، والطحاوي في "مشكل الآثار" 2/ 135، والبيهقي في "سننه" 7/ 321 عن هشام بن سعد، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة موقوفًا من قولها.وخالفه علي بن الحسين بن واقد عند ابن ماجه (2048)، والطبراني في "الأوسط" (7028)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 109، فرواه عن هشام بن سعد، عن الزهري، عن عروة، عن المِسوَر بن مَخرَمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وأدخل ابن عدي بين علي بن الحسين بن واقد وهشامٍ الحسينَ بن واقد والد علي، وعلي هذا ليس بذاك القوي، إلّا أنه تابعه على روايته للحديث عن المسور بشرُ بن السَّري كما ذكر الدارقطني في "العلل" (3816) وذكر أنَّ بشرًا رواه أيضًا عن هشام بن سعد عن الزهري وجعله من حديث عائشة مرفوعًا، ثم قال الدارقطني: والصحيح عن هشام بن سعد ما قاله حماد بن خالد (يعني موقوفًا من قولها)، والله أعلم.وأخرجه الدارقطني أيضًا في "سننه" (3936) من طريق معمر بن بكار السعدي، عن إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة مرفوعًا. ومعمر هذا ليس بالحافظ كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 16/ 87، وهو صاحب أوهام. وأحسن شيء في هذا الباب مرفوعًا حديثُ عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده، وقد سلف عند المصنف برقم (2856).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3612)


3612 - فأخبرَناه أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا يحيى بن أيوب العلَّاف بمصر، حدثنا عمرو بن خالد الحرَّاني، حدثنا أيوب بن سليمان الجَزَري، عن رَبيعة بن أبي عبد الرحمن، عن عطاء بن أبي رَبَاح، عن ابن عبَّاس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا طلاقَ لمن لا يَملِكُ" [1].وأما حديث معاذ بن جَبَل:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি মালিকানা রাখে না, তার কোনো তালাক নেই।" আর মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সম্পর্কে (বলা যায়):




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح موقوفًا على ابن عبَّاس، وهذا إسناد ليِّن من أجل أيوب بن سليمان الجزري فإنه لا يعرف ولم يؤثر فيه جرح ولا تعديل، وقد أخطأ في رفعه والمحفوظ عن عطاء وقفه على ابن عبَّاس، كما أنَّ يحيى بن أيوب العلاف قد وهمَ فأدخل بين أيوب وعطاءٍ ربيعةَ بنَ أبي عبد الرحمن.فقد خالف يحيى محمدُ بنُ عمرو بن خالد عند الخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (232) فرواه عن أبيه عن أيوب بن سليمان قال: دخلتُ على عطاءٍ … وذكر قصة في سؤاله عن الطلاق، وذكر فيها هذا الخبر.وأخرجه كذلك الدولابي في "الكنى والأسماء" (619) من طريق الحسن بن محمد بن أعيَن، ومحمد بن سعيد الحراني في "تاريخ الرقة" (301)، والطبراني في "الكبير" (11467) من طريق أحمد بن عبد الملك بن واقد الحراني، كلاهما عن أيوب بن سليمان أنه دخل على عطاء وسأله …ورواه ابن جريج عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عبَّاس موقوفًا عليه من قوله، أخرجه أبو قرة موسى بن طارق كما في "تغليق التعليق" للحافظ ابن حجر 4/ 449، وعبد الرزاق (11448)، وابن أبي شيبة 5/ 16، وأحمد بن حنبل في "مسائل ابنه له" (1320)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 320، و"معرفة السنن والآثار" (14611). وقال الحافظ ابن حجر: هذا الإسناد أصح ما ورد فيه.وانظر ما سلف برقم (2857).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3613)


3613 - فحدَّثَناه أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا أبو إسماعيل محمد ابن إسماعيل، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا عبد المجيد بن عبد العزيز، حدثنا ابن جُرَيج، عن عمرو بن دينار، عن طاووس، عن معاذ بن جَبَل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا طلاقَ إلَّا بعد نكاحٍ، ولا عِتقَ إلَّا بعد مِلْكٍ" [1]. وأما حديث جابر:




মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হওয়ার আগে কোনো তালাক নেই, এবং মালিকানায় আসার আগে কোনো দাস মুক্তি নেই।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف، ابن جريج مدلّس وقد عنعن في روايته هنا عن عمرو، وعمرو هذا قد وهمَ في تسميته أحدُ الرواة ممن دون ابن جريج، والصواب أنه عمرو بن شعيب، هكذا سمّاه عليُّ بن شعيب السِّمسار - وهو ثقة - عن عبد المجيد بن عبد العزيز عند المحاملي في "أماليه" رواية ابن مهدي الفارسي (158)، والدارقطني في "سننه" (3930).وكذلك سمّاه عن ابن جريج عبدُ الرزاق في "مصنفه" (11455) وعند الطبراني في "الكبير" (20/ 349)، وتابع ابنَ جريج على ذلك عبدُ الرحمن بن الحارث بن عياش عن عمرو بن شعيب عند عبد بن حميد في "مسنده" (121)، وهو المحفوظ، وما وقع عند المصنف وعنه البيهقي في "السنن" 7/ 320 من الأوهام.ثم إنَّ هذا الإسناد منقطع بين طاووس ومعاذ بن جبل، فإنه لم يسمع منه.والمحفوظ في هذا الحديث عن عمرو بن شعيب ما رواه جماعة من الثقات عنه عن أبيه عن جدِّه عبد الله بن عمرو بن العاص، كما سلف عند المصنف برقم (2856).وأما طاووس فقد اختُلف عليه فيه أيضًا، فقد أخرجه عبد الرزاق (11457)، وابن أبي شيبة 5/ 16 و 14/ 224 من طريق سفيان الثوري، عن محمد بن المنكدر، عمَّن سمع طاووسًا يحدِّث عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره. وهذا على إرساله فيه راوٍ مبهم، فالإسناد ضعيف.ورواه بنحوه إسماعيل بن مسلم المكي - وهو أحد الضعفاء - عند البيهقي 8/ 65 عن محمد بن المنكدر، عن طاووس، عن النبي صلى الله عليه وسلم.ووصله عن محمد بن المنكدر عبدُ الله بنُ لهيعة عند الطبراني في "الكبير" (11004)، وعبدُ الله بنُ زياد بن سمعان عند ابن عدي في "الكامل" 4/ 126 ومن طريقه الخطيب في "تاريخ بغداد" 11/ 123، فروياه عنه عن طاووس عن ابن عبَّاس مرفوعًا - زاد ابنُ سمعان فجعله من رواية ابن عباس عن علي مرفوعًا. وابن لهيعة سيئ الحفظ، وابن سمعان متهم بالكذب.ورواه أيضًا عن طاووس عن ابن عبَّاس مرفوعًا: الحسن بن عمارة عن حميد الأعرج عنه عند ابن عدي 2/ 290، وسليمان بن أبي سليمان الزهري عن يحيى بن أبي كثير عنه عند الدارقطني (3938). والإسنادان ضعيفان، الأول فيه الحسن بن عمارة متروك الحديث عند جمهور المحدثين، والثاني فيه سليمان بن أبي سليمان الزهري وهو ضعيف الحديث في بعض ما يرويه مناكير. وأما المحفوظ عن طاووس فهو ما رواه عن ابن عبَّاس موقوفًا عليه من قوله، كما سلف عند المصنف برقم (3609)، والإسناد إليه صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3614)


3614 - فحدَّثَناه يحيى بن منصور القاضي ويحيى بن محمد العَنبَري وأبو النَّضر الفقيه والحسن بن يعقوب العَدْل ومحمد بن جعفر المزكِّي قالوا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا أبو بكر عبد الله بن يزيد الدمشقي، حدثنا صَدَقة بن عبد الله الدمشقي قال: جئتُ محمدَ بن المنكدِر وأنا مُغضَبٌ، فقلت: آللهِ أنت أحلَلتَ للوليد بن يزيد أمَّ سَلَمة؟ قال: أنا! ولكنْ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، حدَّثَني جابرُ بن عبد الله الأنصاري أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا طلاقَ لمن لا يَملِكُ، ولا عِتقَ لمن لا يَملِك" [1].




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (সদাকা ইবনে আবদুল্লাহ বলেন:) আমি রাগান্বিত অবস্থায় মুহাম্মাদ ইবনুল মুনকাদির (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম: আল্লাহর কসম, আপনি কি ওয়ালিদ ইবনে ইয়াযীদের জন্য উম্মে সালামাকে হালাল করে দিয়েছেন? তিনি বললেন: আমি? বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তা হালাল করেছেন)। জাবির ইবনে আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যার মালিকানা বা কর্তৃত্ব নেই, তার তালাক নেই এবং যার মালিকানা বা কর্তৃত্ব নেই, তার মুক্তি (দাস আযাদ) নেই।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل صدقة بن عبد الله، فإنه ضعيف في أحاديثه مناكير، وقد اتهمه ابن حبان في مروياته عن ابن المنكدر عن جابر.وأخرجه البيهقي 7/ 319 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. ومن طريق يحيى بن منصور، عن محمد بن إبراهيم العبدي، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (459)، وابن المقرئ في "معجمه" (1086)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 56/ 39 من طريقين عن عبد الله بن يزيد الدمشقي، به.وسأل ابن أبي حاتم الرازي في "علل الحديث" (1222) أباه عن حديث صدقة هذا فقال: هذا خطأ، والصحيح ما رواه الثوري عن محمد بن المنكدر قال: حدثني من سمع طاووسًا، فلو كان سمع من جابر، لم يحدِّث عن رجل عن طاووس مرسلًا. قلنا: وحديث الثوري سلف تخريجه عند الحديث السابق. الرواة رواه عن ابن أبي ذئب عمَّن حدَّثه عن محمد بن المنكدر وعطاء؛ فوقع فيه على هذا انقطاع أيضًا بين ابن المنكدر وجابر، على أنَّ حديث ابن المنكدر فيه اضطراب أيضًا كما سبق بيانه عند الحديثين السابقين.وأخرجه ابن أبي شيبة 5/ 16، ومن طريقه البيهقي 7/ 319، وأخرجه البزار (1499) عن يوسف بن موسى، كلاهما (ابن أبي شيبة ويوسف) عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه حرب الكرماني في "مسائله" 1/ 387 عن إسحاق بن راهويه، عن وكيع، به - ولم يذكر فيه محمدَ بن المنكدر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3615)


3615 - وحدَّثَناه أبو علي الحافظ، حدثنا عبد الله بن محمود، حدثنا أحمد بن عبد الله بن الحَكَم، حدثنا وَكيع، عن ابن أبي ذِئْب، عن عطاء ومحمد بن المنكدِر، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا طلاقَ قبل نِكاحٍ" [1]. قال الحاكم: مدارُ سند هذا الحديث على إسنادَين واهيَين: جُوَيبر [2] عن الضحَّاك عن النَّزَّال بن سَبْرة عن علي، وعمرو بن شعيب عن أبيه عن جدِّه، فلذلك لم يَقَعِ الاستقصاءُ من الشيخين في طلب هذه الأسانيد الصحيحة، والله أعلم.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "বিবাহের আগে কোনো তালাক নেই।" [১]
আল-হাকিম বলেছেন: এই হাদীসের সনদের ভিত্তি দুটি দুর্বল সনদের ওপর নির্ভরশীল: জুওয়াইবির [২] (বর্ণনা) দাহ্হাক থেকে, তিনি নাযযাল ইবনে সাবরা থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে; এবং আমর ইবনে শুআইব (বর্ণনা) তার পিতা থেকে, তিনি তার দাদা থেকে। এই কারণেই শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এই সহীহ সনদগুলির অনুসন্ধানে পূর্ণ মনোনিবেশ করেননি। আল্লাহই ভালো জানেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه واضطرابه، وقد سلف بيان الانقطاع فيه بين عطاء بن أبي رباح وجابر برقم (2855)، وقد أشار البزار بإثر الحديث (1499 - كشف الأستار) إلى أنَّ بعض الرواة رواه عن ابن أبي ذئب عمَّن حدَّثه عن محمد بن المنكدر وعطاء؛ فوقع فيه على هذا انقطاع أيضًا بين ابن المنكدر وجابر، على أنَّ حديث ابن المنكدر فيه اضطراب أيضًا كما سبق بيانه عند الحديثين السابقين.وأخرجه ابن أبي شيبة 5/ 16، ومن طريقه البيهقي 7/ 319، وأخرجه البزار (1499) عن يوسف بن موسى، كلاهما (ابن أبي شيبة ويوسف) عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه حرب الكرماني في "مسائله" 1/ 387 عن إسحاق بن راهويه، عن وكيع، به - ولم يذكر فيه محمدَ بن المنكدر.



[2] جويبر هذا: هو ابن سعيد الأزدي متروك الحديث، وحديثه هذا عند ابن ماجه برقم (2049)، وانظر تتمة تخريجه هناك، والراجح فيه أنه عن عليٍّ موقوف.وأما حديث عمرو بن شعيب فقد سلف أن خرَّجه المصنف برقم (2856)، وهو حديث مشهور عن عمرو بن شعيب، وهو أحسن شيء مرفوع في الباب، والعجب من المصنف هنا كيف وهّاه وهو قد صحَّح لعمرو بن شعيب عن أبيه عن جده في غير موضع من كتابه هذا، فهذا يدلُّ على أنه قد اضطرب فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3616)


3616 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن السُّدِّي، عن أبي صالح، عن أم هانئ قالت: خَطَبَني النبيُّ صلى الله عليه وسلم فاعتذرتُ إليه فعَذَرَني، وأَنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ} إلى قوله: {اللَّاتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ} [الأحزاب: 50]، قالت: فلم أكن أَحِلُّ له، لم أهاجِرْ معه، كنت من الطُّلَقاءِ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিয়ের প্রস্তাব দিলেন। তখন আমি ওঁর কাছে ওযর পেশ করলাম, আর তিনি আমার ওযর গ্রহণ করলেন (বা, আমাকে ওযর পেশ করার অনুমতি দিলেন)। আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: {হে নবী, নিশ্চয় আমরা আপনার জন্য আপনার স্ত্রীদের হালাল করেছি...} আল্লাহ্‌র এই উক্তি পর্যন্ত: {যারা আপনার সাথে হিজরত করেছে} [সূরা আল-আহযাব: ৫০]। তিনি বললেন: অতএব, আমি তাঁর জন্য হালাল ছিলাম না। কারণ আমি তাঁর সাথে হিজরত করিনি; আমি ছিলাম ‘তুল্লাকা’ (মক্কা বিজয়ের পর ইসলাম গ্রহণকারী মুক্ত মানুষ)-দের অন্তর্ভুক্ত।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف. وهو مكرر (2789).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3617)


3617 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفَضْل البَجَلي، حدثنا عفَّان بن مُسلِم، حدثنا حماد بن سَلَمة، أخبرنا ثابت البُنَاني: أنه تَلَا قول الله عز وجل: {إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا} [الأحزاب: 56]، فقال ثابت: قَدِمَ علينا سليمانُ مولى الحسن بن علي، فحدَّثَنا عن عبد الله بن أبي طَلْحة الأنصاري، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء ذات يومٍ والبِشْرُ يُرَى في وجهه، فقلنا: يا رسول الله، إنا لنَرى البِشرَ في وجهك، فقال: "إنَّه أتاني الملَكُ، فقال: يا محمدُ، إنَّ ربك يقول: أمَا تَرضَى ما أحدٌ من أمَّتِك صلَّى عليك إلَّا صلَّيتُ عليه عشرَ صَلَوَاتٍ، ولا سَلَّم عليك أحدٌ من أمَّتِك إلَّا رَدَدتُ عليه عشرَ مرَّاتٍ؟ فقال: بَلَى" [1].هذا حديث صحيح [2]، ولم يُخرجاه.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন এমন অবস্থায় আসলেন যে তাঁর চেহারায় আনন্দের ঝলক দেখা যাচ্ছিল। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনার চেহারায় আনন্দের ঝলক দেখতে পাচ্ছি। তিনি বললেন: "আমার কাছে একজন ফেরেশতা এসেছিলেন এবং তিনি বললেন, 'হে মুহাম্মাদ! আপনার রব বলছেন: আপনার উম্মতের কেউ আপনার উপর একবার সালাত পাঠালে আমি কি তার উপর দশবার সালাত পাঠাবো না? আর আপনার উম্মতের কেউ আপনার উপর একবার সালাম পাঠালে আমি তাকে দশবার প্রতি-সালাম (জবাব) দেব—আপনি কি এতে সন্তুষ্ট নন?' তিনি বললেন: 'অবশ্যই (আমি সন্তুষ্ট)।'"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده محتمل للتحسين، رجاله ثقات مشهورون غير سليمان مولى الحسن بن علي فإنه لم يرو عنه غير ثابت البناني فيما قاله الذهبي، وقال النسائي: سليمان هذا ليس بالمشهور، وذكره البخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 6 وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 152 فلم يوردا فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 6/ 385 وذكر فيه 2/ 310 أنه ممّن قُتل يوم كربلاء مع الحسين بن علي رضي الله عنهما، وهذا الحديث متابع عليه.وأخرجه أحمد (26/ 16361) عن عفان، والنسائي (1207) عن إسحاق بن منصور الكوسج، عن عفان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (16363)، والنسائي (1219) و (9805)، وابن حبان (915) من طرق عن حماد بن سلمة، به.والخبر في الصلاة من الله تعالى عشر مرات على من صلَّى على النبي صلى الله عليه وسلم واحدةً، صحيح رواه غير واحدٍ من الصحابة، منهم: أبو هريرة عند أحمد (14/ 8854) ومسلم (408) وغيرهما، وأنس عند أحمد (19/ 11998) وغيره، وعبد الله بن عمرو عند أحمد (11/ 6568) ومسلم (384) وغيرهما.



[2] هكذا في (ز)، وفي بقية النسخ: صحيح الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3618)


3618 - أخبرنا أبو النَّضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو صالح محبوب بن موسى، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن الأعمش وسفيان، عن عبد الله بن السائب، عن زاذانَ، عن ابن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ لله ملائكة سيَّاحِينَ في الأرض يُبلِّغوني عن أمَّتي السلامَ" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد عَلَوْنا في حديث الثَّوري، فإنه مشهور عنه، فأما حديث الأعمش عن عبد الله بن السائب، فإنا لم نَكتُبه إلَّا بهذا الإسناد.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহর এমন একদল ফেরেশতা রয়েছে যারা পৃথিবীতে ঘুরে বেড়ায়, তারা আমার উম্মতের পক্ষ থেকে আমার কাছে সালাম পৌঁছিয়ে দেয়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محبوب بن موسى، وقد توبع. أبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث، وسفيان هو الثوري، وزاذان: هو أبو عمر الكندي مولاهم الكوفي.وأخرجه أحمد (6/ 3666) و (7/ 4210) و (4320)، والنسائي (1206) و (9811)، وابن حبان (914) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأما رواية الأعمش سليمان بن مهران، فقد أخرجها الطبراني في "الكبير" (10528)، وأبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 205 من طريقين عن أبي صالح محبوب بن موسى، عن أبي إسحاق الفزاري، عن الأعمش وحده، به. معروضة عليَّ … "، وإسناده صحيح إن شاء الله.