আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4459 - حدثني الأستاذ أبو الوليد، حدثنا عبد الله بن سليمان بن الأشعث، حدثنا عبد الملك بن شعيب بن الليث، حدثني أبي، عن جدِّي، عن عُقيل، عن ابن شِهَاب: أَنَّ رجلًا أهدى يومًا لأبي بكر صَحْفةً من خَزِيرة، وعنده رجلٌ يقال له: الحارث بن كَلَدة، وعنده عِلمٌ، فلما أكلا منها قال ابن كَلَدة فيها سُمُّ سنةٍ، فوالذي نفسي بيده لم يمرَّ الحولُ حتى ماتا في يوم واحدٍ رأسَ السنة [1].
আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন এক ব্যক্তি তাঁকে এক বাটি ‘খাযিরাহ’ (এক প্রকার খাবার) উপহার দিল। তাঁর কাছে আল-হারিস ইবন কালাদাহ নামের একজন লোক উপস্থিত ছিলেন, যার (চিকিৎসা) জ্ঞান ছিল। যখন তাঁরা দু'জন সেই খাবার খেলেন, তখন ইবন কালাদাহ বললেন: এতে এক বছরের বিষ আছে। অতঃপর, যার হাতে আমার প্রাণ, সেই সত্তার কসম! বছরটি পূর্ণ হলো না, বরং তারা দুজনই একই দিনে, বছরের শুরুতে মৃত্যুবরণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه مرسل. عُقيل: هو ابن خالد الأيلي، والليث: هو ابن سعد، وعبد الله: هو ابن عمر بن الخطاب.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 182، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 409، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 230 عن عبد العزيز بن عبد الله الأُويسي، وأبو نُعيم الأصبهاني في "الطب النبوي" (570) من طريق حجاج بن محمد المِصِّيصي، كلاهما عن الليث بن سعد، به.وهذا على إرساله هو أصحُّ ما روي في سبب وفاة أبي بكر الصديق رضي الله عنه.
4460 - فحدثني بكر بن محمد الصَّيْرفي بِمَرُو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مكّي بن إبراهيم، حدثنا السَّرِيّ بن إسماعيل، عن الشَّعْبي، أنه قال: ماذا يُتوقَّعُ من هذه الدنيا الدَّنِيَّة وقد سُمَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وسُمَّ أبو بكر الصِّدِّيق، وقُتل عمرُ حَتْفَ أنفِه، وكذلك قُتل عثمانُ وعليٌّ، وسُمَّ الحسنُ، وقُتل الحُسين حَتْفَ أنفِه [1].
আশ-শা'বি থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: এই নিকৃষ্ট দুনিয়া থেকে আর কী-ই বা আশা করা যায়? অথচ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কেও বিষ প্রয়োগ করা হয়েছিল, এবং আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও বিষ প্রয়োগ করা হয়েছিল, আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ভাগ্য নির্ধারিত পন্থায় শহীদ হয়েছিলেন, তেমনিভাবে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও হত্যা করা হয়েছিল, আর হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিষ প্রয়োগ করা হয়েছিল, এবং হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ভাগ্য নির্ধারিত পন্থায় শহীদ হয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، قال الذهبي في "تلخيصه": السَّرِيُّ متروك.وهو مكرر الخبر المتقدم برقم (4443) غير أنه ذكر هناك داود بن يزيد الأَوْدي بدل السّرِيّ، وهو ضعيف أيضًا.
4461 - حدثني أبو جعفر أحمد بن عُبيد الحافظ بهَمَذان، حدثنا محمد بن إبراهيم، حدثنا عمرو بن زياد، حدثنا غالب بن عبد الله القَرْقَساني، عن أبيه، عن جده حَبيب بن حَبيبِ، قال: شهدت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال لحسان بن ثابت: "قلتَ في أبي بكر شيئًا؟ قُلْ حتى أسمعَ" قال: قلت:وثانيَ اثنينِ في الغارِ المُنِيف وقد … طافَ العدوُّ به إذ صاعَدَ الجَبَلاوكان حِبَّ رسولِ الله قد عَلِمُوا … مِن الخلائقِ لم يَعدِلْ به بَدَلا فتبسَّم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1]
হাবীব ইবনে হাবীব থেকে বর্ণিত, তিনি (হাবীব ইবনে হাবীব) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি হাসসান ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলছিলেন: "তুমি কি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে কিছু বলেছ? বলো, যেন আমি শুনতে পারি।" তিনি (হাসসান) বললেন, আমি বললাম:
'সুউচ্চ গুহায় দু'জনের দ্বিতীয় তিনি,
যখন শত্রু তাকে ঘিরে ফেলেছিল, যখন তিনি পাহাড়ে উঠছিলেন।
আর তিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয়তম—তা তারা জানত,
সৃষ্টিকুলের মাঝে তাঁর সমকক্ষ আর কাউকে পাওয়া যায়নি।'
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف، عمرو بن زياد - وهو الباهلي - يضع الحديث، كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وغالبٌ المذكور مجهول وكذا أبوه.وأخرجه الواحدي في "التفسير الوسيط" 2/ 497 عن عبد الرحمن بن محمد الوراق، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وسيتكرر برقم (4511).وله شاهد من مرسل الزُّهْري عند ابن سعد 3/ 159، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 10/ 56، وابن عدي في "الكامل" 2/ 160، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2428)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 90 و 91. لكنه انفرد به عن الزُّهْري رجلٌ اسمُه أبو العَطُوف جرّاح بن مِنْهال الجزري، وهو متروك الحديث. وقد وصله بعضُ من أنُّهم بسرقة الحديث بذكر أنس بن مالك فيه عند ابن عدي 2/ 160 ومن طريقه ابن عساكر 30/ 91، وقال ابن عدي: هذا الحديث موصولُه ومرسلُه منكر، والبلاء فيه من أبي العَطُوف. "تاريخه" 2/ 314، والآجُرّي في "الشريعة" (1245) و (1246)، وابن بطة العكبري في "الإبانة" 9/ 447، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (73)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 41، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 209 من طريق عبد الرحمن بن مغراء، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "الزهد" لأبيه، (579)، والطبري 2/ 315، وابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2657)، والطبراني في "الكبير" (12562)، والخطيب في "تاريخه" 16/ 77، وابن عساكر 30/ 40 من طريق الهيثم بن عدي، وابن عساكر 30/ 39، وأبو العبّاس الحنفي في "مشيخة ابن البخاري" (857) من طريق عبد الله بن الأجلح، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 13/ 52 و 14/ 310، ومن طريقه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (44)، والدِّينَوري في "المجالسة" (625)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (73)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 373 - 374، وابن عساكر 30/ 40 عن شيخٍ له، كلهم عن مجالد بن سعيد، عن الشَّعْبي، عن ابن عبّاس.وأخرجه ابن بطة في "الإبانة" 9/ 447 من طريق أبي يعلى زكريا المنقري، عن أبي الربيع العتكي، عن جَرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مقسم عن الشَّعْبي، عن ابن عبّاس. والظاهر أنَّ هذا خطأ، لأنَّ الصحيح في رواية أبي الربيع العتكي أنه يرويه عن الهيثم بن عدي عن مجالد عن الشَّعْبي، كما أخرجه الطبراني (12562) عن مُسبِّح بن حاتم العُكْلي، عن أبي الربيع.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 369 من طريق مالك بن مِغْوَل، عن رجلٍ قال: سئل ابن عبّاس … فذكره. ولمالك بن مِغْول رواية عن الشَّعْبي، ولكن ليس مثلُ مالك بن مِغول من يُبهِم ذكر مثل الشَّعْبي، فالظاهر أنه غيرُه، والله أعلم.وروي عن ابن عبّاس: أنَّ أول من أسلم بعد خديجة عليّ بن أبي طالب كما سيأتي عند المصنّف برقم (4702)، وفي إسناده مقال كما سيأتي بيانه هناك.وسيأتي عن عمرو بن عَبَسَة (4467) و (4468) أنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم عمَّن تَبِعه، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "حرٌّ وعبدٌ: أبو بكر وبلال"، وإسناده صحيح.
4462 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن علي بن مَخلَد الجَوهَري ببغداد، حدثنا الحارث بن أبي أسامة حدثنا الخليل بن زكريا، حدثنا مُجالِد بن سعيد قال: سُئل الشَّعْبي: مَن أولُ من أسلَمَ؟ فقال: أما سمعتَ قول حسان:إذا تَذكَّرتَ شَجُوًا من أخي ثقةٍ … فاذكُرْ أخاك أبا بكرٍ بما فَعَلاخيرَ البريّةِ أتقاها وأعدَلَها … بعدَ النبيِّ وأَوفاها بما حَمَلاالثانيَ التالَي المحمودَ مَشهَدُهُ … وأولَ الناسِ منهم صَدَّق الرُّسُلا [1]
মুজালিদ ইবনে সাঈদ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: শা'বীকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: "কে প্রথম ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন?" জবাবে তিনি (শা'বী) বললেন: "তুমি কি হাসসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কবিতা শোনোনি? (যেখানে তিনি বলেন:)
যদি তুমি কোনো বিশ্বস্ত ভাইয়ের পক্ষ থেকে কোনো দুঃখজনক বিষয় স্মরণ করো,
তবে তোমার ভাই আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে স্মরণ করো তার কৃতকর্মের জন্য।
তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে সৃষ্টিকূলের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, তাঁদের মধ্যে সর্বাধিক আল্লাহভীরু, সর্বাধিক ন্যায়পরায়ণ এবং তাঁকে অর্পিত বোঝা তিনি সবচেয়ে পূর্ণাঙ্গরূপে বহনকারী।
তিনি দ্বিতীয় (গারের সাথী), অনুসরণকারী, যার উপস্থিতি প্রশংসিত। আর তিনিই সেই লোকদের মধ্যে প্রথম, যিনি রাসূলদেরকে (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) সত্য বলে বিশ্বাস করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل الخليل بن زكريا فهو متروك، وقد خالفه غيرُ واحدٍ فرووا هذا الخبرَ عن مجالد بن سعيد عن الشَّعْبي عن ابن عبّاس، فجعلوه من رواية الشَّعْبي عن ابن عبّاس، وكذلك رواه مالك بن مِغْوَل عن رجل عن ابن عبّاس. وعلى أيّ حالٍ فكلا الطريقين ضعيف، أما الأول فلضعف مجالد بن سعيد، وأما الثاني فلجهالة شيخ مالك بن مِغْوَل. وقد ضعف هذا الخبر أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنُه في "العلل" (2657)، وضعَّفه أيضًا ابن مَعِين فيما أسنده عنه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 16/ 77.وأخرجه عبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "فضائل الصحابة" لأبيه (103)، والطبري في "تاريخه" 2/ 314، والآجُرّي في "الشريعة" (1245) و (1246)، وابن بطة العكبري في "الإبانة" 9/ 447، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (73)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 41، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 209 من طريق عبد الرحمن بن مغراء، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "الزهد" لأبيه، (579)، والطبري 2/ 315، وابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2657)، والطبراني في "الكبير" (12562)، والخطيب في "تاريخه" 16/ 77، وابن عساكر 30/ 40 من طريق الهيثم بن عدي، وابن عساكر 30/ 39، وأبو العبّاس الحنفي في "مشيخة ابن البخاري" (857) من طريق عبد الله بن الأجلح، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 13/ 52 و 14/ 310، ومن طريقه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (44)، والدِّينَوري في "المجالسة" (625)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (73)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 373 - 374، وابن عساكر 30/ 40 عن شيخٍ له، كلهم عن مجالد بن سعيد، عن الشَّعْبي، عن ابن عبّاس.وأخرجه ابن بطة في "الإبانة" 9/ 447 من طريق أبي يعلى زكريا المنقري، عن أبي الربيع العتكي، عن جَرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مقسم عن الشَّعْبي، عن ابن عبّاس. والظاهر أنَّ هذا خطأ، لأنَّ الصحيح في رواية أبي الربيع العتكي أنه يرويه عن الهيثم بن عدي عن مجالد عن الشَّعْبي، كما أخرجه الطبراني (12562) عن مُسبِّح بن حاتم العُكْلي، عن أبي الربيع.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 369 من طريق مالك بن مِغْوَل، عن رجلٍ قال: سئل ابن عبّاس … فذكره. ولمالك بن مِغْول رواية عن الشَّعْبي، ولكن ليس مثلُ مالك بن مِغول من يُبهِم ذكر مثل الشَّعْبي، فالظاهر أنه غيرُه، والله أعلم.وروي عن ابن عبّاس: أنَّ أول من أسلم بعد خديجة عليّ بن أبي طالب كما سيأتي عند المصنّف برقم (4702)، وفي إسناده مقال كما سيأتي بيانه هناك.وسيأتي عن عمرو بن عَبَسَة (4467) و (4468) أنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم عمَّن تَبِعه، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "حرٌّ وعبدٌ: أبو بكر وبلال"، وإسناده صحيح.
4463 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا بشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثني هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة أنها قالت: سألني أبو بكر: في كم كفَّنتُم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم؟ فقلت: في ثلاثةِ أثوابٍ، قال: ففيها فكفِّنوني [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞাসা করলেন: তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কয়টি কাপড়ে কাফন দিয়েছিলে? আমি বললাম: তিনটি কাপড়ে। তিনি বললেন: তাহলে তোমরা আমাকেও সেগুলোতে কাফন দিও।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير المكِّي، وسفيان: هو ابن عيينة، وعروة: هو ابن الزُّبير بن العوّام.وأخرجه أحمد 41 / (24869) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، والبخاري (1387) من طريق وُهَيب بن خالد، كلاهما عن هشام بن عُرْوة به. لكن بينت عائشة وصف هذه الأثواب فقالت: في ثلاثة أثواب بيض سَحُولية ليس فيها قميص ولا عمامة زاد ابن أبي الزناد في روايته: جُدُد يمانية. وزاد كلاهما في خبر عائشة نحو الزيادة الواردة في رواية عبد الرحيم بن سليمان عن هشام بن عروة الآتية بعد هذه.
4464 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا الحسن بن علي بن شَبِيب المَعْمَري، حدثنا عبد الرحمن بن صالح الأزدي، حدثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة أخبرته: أنَّ أبا بكر حين حَضَرتْه الوفاةُ قال: في كم كفَّنتمُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم؟ فقلت: في ثلاثة أثواب بيضٍ يمانيةٍ جُدُدٍ ليس فيها قميصٌ ولا عِمامة، قال: اغسِلُوا ثوبي هذا - وفيه رَدْعُ زَعْفَرانٍ ومِشْقٍ - فاجعلُوه مع ثوبَين جديدَين، فقلت: إنه خَلَقٌ، فقال: الحيُّ أحقُّ بالجديد من الميت، إنه للمُهْل [1].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে খবর দিলেন যে, যখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর সময় ঘনিয়ে এল, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, তোমরা নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কয়টি কাপড়ে কাফন দিয়েছিলে? আমি বললাম, তিনটি সাদা ইয়েমেনী নতুন কাপড়ে, যার মধ্যে কোনো জামা বা পাগড়ি ছিল না। তিনি বললেন, তোমরা আমার এই কাপড়টি ধুয়ে নাও—আর এতে জাফরান ও মিষ্ক (হলুদ বা লালচে দাগ) লেগে আছে—এবং এটিকে দুটি নতুন কাপড়ের সাথে মিলিয়ে দাও। আমি বললাম, এটা তো পুরাতন। তখন তিনি বললেন, নতুন কাপড়ের অধিকার মৃত ব্যক্তির চেয়ে জীবিত ব্যক্তিরই বেশি। এই কাপড়টিই (আমার জন্য) যথেষ্ট হবে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قويّ من أجل عبد الرحمن بن صالح الأزدي، وقد توبع في الطريق السابقة.والمِشْق، بكسر الميم وسكون الشين، وزان حِمْل هو صبغ أحمر.والمُهْل: الصديد والقيح.والخَلَق، بفتحتين: هو البالي. ذكر عثمان بن الوليد بين هشام وأبيه، كذلك رواه سفيانُ الثوريُّ عند عبد الرزاق (6175) و (6552) و (6576) والبيهقي 4/ 52، ومعمرُ بنُ راشد عند عبد الرزاق (6552) و (6576)، وابن المنذر في "الأوسط" (3093)، ووكيعُ بن الجراح وعبدُ الله بن نُمير عند ابن سعد 3/ 189، وعبدُ العزيز بنُ محمد الدَّرَاوردي عند ابن سعد 3/ 190، وحفصُ بنُ غياث عند ابن أبي شيبة 3/ 364، ومحاضرُ بنُ المُورِّع عند ابن المنذر في "الأوسط" (3092)، وشريكٌ النَّخَعي عند أبي بكر الدِّيْنَوري في "المجالسة" (2179)، كلهم عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه مرسلًا.وكذلك رواه سفيان بن عُيينة عن هشام بن عُرْوة، لكنه قال: عن أبيه عن مولًى لهم. أخرجه من طريقه أبو نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (120).ورواه إسماعيل بن أبان الغَنَوي عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، فوصله بذكر عائشة. أخرجه من طريقه ابن الأعرابي في "معجمه" (674)، والبيهقي 4/ 51. قال البيهقي: إسماعيل الغنوي متروك.وذكر الدارقطني في "علله" (3494) أنَّ الدراوردي رواه كذلك موصولًا بذكر عائشة. وفيه نظر، لأنَّ ابن سعد قد أخرجه كما تقدَّم من طريقه مرسلًا ليس فيه عائشة.وقد تقدَّم موصولًا كذلك من طريق الزُّهْري عن عروة عن عائشة، إلّا أنَّ إسناده إلى الزُّهْري في غاية الضعف. فلا يصح إذًا ذكر عائشة فيه البتة.فالصحيح من ذلك أنَّ هشام بن عُرْوة رواه عن عثمان بن الوليد عن عروة بن الزبير مرسلًا، وربما كان هشامٌ سمعه بعد ذلك من أبيه مباشرة، فلا يبعُد ذلك، خصوصًا أن البخاري وغيره قد أخرجوا روايته عن أبيه عن عائشة في دفن الصِّدِّيق ليلًا، وهي قطعة من هذا الخبر الذي هنا، فلم يذكروا فيه عثمان بن الوليد بل فيه عند بعضهم تصريح هشام بسماعه له من أبيه، فيكون الوجهان محفوظين.والظاهر أنَّ عروة بن الزُّبير سمع قصة الصلاة على أبي بكر في المسجد من المولى المذكور، كما صرَّح بذكره في روايته ابن عُيينة، وطَوَى ذِكْره في رواية الآخرين في معرض الاحتجاج به لا في معرض الرواية كما تدل عليه رواية معمر والثوري.فيتحصّل من ذلك كلّه أنَّ هشامًا سمع قصة دفن أبي بكر الصِّدِّيق ليلًا من أبيه عروة الذي سمعها من خالته عائشة.وسمع هشام قصة الصلاة على أبي بكر في المسجد من عثمان بن الوليد، وعثمان سمعها من أبيه عروة، وعروة بن الزُّبير سمعها من مولاهم المذكور، ثم سمعها هشام من أبيه مباشرة دون واسطة، والله تعالى أعلم. وقد ثبت ذكر الصلاة على أبي بكر في المسجد أيضًا من مرسل المُطلب بن عبد الله بن حَنْطب كما تقدَّم تخريجه برقم (4457).
4465 - قال عبد الرحيم: وحدَّثني هشام بن عُرْوة، قال: أخبرني عُثمان بن الوليد، عن عُرُوة: أن أبا بكر صُلِّيَ عليه في المسجد، ودُفن ليلًا إلى جنبِ رسول الله صلى الله عليه وسلم في حُجرة عائشة [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযার সালাত মসজিদে আদায় করা হয়েছিল এবং তাঁকে রাতে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হুজরার মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশে দাফন করা হয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكنه مرسل، فإنَّ عروة - وهو ابن الزبير - لم يدرك أبا بكر، لكن دفنُ أبي بكر ليلًا مما أخبرته به عائشة أم المؤمنين كما في رواية البخاري (1387) وغيره. وقد تابع عبدَ الرحيم على ذكر عثمان بن الوليد بين هشام وأبيه عليُّ بنُ مُسهِر كما في "جامع بيان العلم" لابن عبد البر (2402)، وكذلك زائدةُ بنُ قدامة كما في "علل الدارقطني (3494).وقد روى جماعةٌ عن هشام بن عروة عن أبيه مرسلًا الصلاة على أبي بكر في المسجد، دون ذكر عثمان بن الوليد بين هشام وأبيه، كذلك رواه سفيانُ الثوريُّ عند عبد الرزاق (6175) و (6552) و (6576) والبيهقي 4/ 52، ومعمرُ بنُ راشد عند عبد الرزاق (6552) و (6576)، وابن المنذر في "الأوسط" (3093)، ووكيعُ بن الجراح وعبدُ الله بن نُمير عند ابن سعد 3/ 189، وعبدُ العزيز بنُ محمد الدَّرَاوردي عند ابن سعد 3/ 190، وحفصُ بنُ غياث عند ابن أبي شيبة 3/ 364، ومحاضرُ بنُ المُورِّع عند ابن المنذر في "الأوسط" (3092)، وشريكٌ النَّخَعي عند أبي بكر الدِّيْنَوري في "المجالسة" (2179)، كلهم عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه مرسلًا.وكذلك رواه سفيان بن عُيينة عن هشام بن عُرْوة، لكنه قال: عن أبيه عن مولًى لهم. أخرجه من طريقه أبو نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (120).ورواه إسماعيل بن أبان الغَنَوي عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، فوصله بذكر عائشة. أخرجه من طريقه ابن الأعرابي في "معجمه" (674)، والبيهقي 4/ 51. قال البيهقي: إسماعيل الغنوي متروك.وذكر الدارقطني في "علله" (3494) أنَّ الدراوردي رواه كذلك موصولًا بذكر عائشة. وفيه نظر، لأنَّ ابن سعد قد أخرجه كما تقدَّم من طريقه مرسلًا ليس فيه عائشة.وقد تقدَّم موصولًا كذلك من طريق الزُّهْري عن عروة عن عائشة، إلّا أنَّ إسناده إلى الزُّهْري في غاية الضعف. فلا يصح إذًا ذكر عائشة فيه البتة.فالصحيح من ذلك أنَّ هشام بن عُرْوة رواه عن عثمان بن الوليد عن عروة بن الزبير مرسلًا، وربما كان هشامٌ سمعه بعد ذلك من أبيه مباشرة، فلا يبعُد ذلك، خصوصًا أن البخاري وغيره قد أخرجوا روايته عن أبيه عن عائشة في دفن الصِّدِّيق ليلًا، وهي قطعة من هذا الخبر الذي هنا، فلم يذكروا فيه عثمان بن الوليد بل فيه عند بعضهم تصريح هشام بسماعه له من أبيه، فيكون الوجهان محفوظين.والظاهر أنَّ عروة بن الزُّبير سمع قصة الصلاة على أبي بكر في المسجد من المولى المذكور، كما صرَّح بذكره في روايته ابن عُيينة، وطَوَى ذِكْره في رواية الآخرين في معرض الاحتجاج به لا في معرض الرواية كما تدل عليه رواية معمر والثوري.فيتحصّل من ذلك كلّه أنَّ هشامًا سمع قصة دفن أبي بكر الصِّدِّيق ليلًا من أبيه عروة الذي سمعها من خالته عائشة.وسمع هشام قصة الصلاة على أبي بكر في المسجد من عثمان بن الوليد، وعثمان سمعها من أبيه عروة، وعروة بن الزُّبير سمعها من مولاهم المذكور، ثم سمعها هشام من أبيه مباشرة دون واسطة، والله تعالى أعلم. وقد ثبت ذكر الصلاة على أبي بكر في المسجد أيضًا من مرسل المُطلب بن عبد الله بن حَنْطب كما تقدَّم تخريجه برقم (4457).
4466 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثقفي المَعْمَري، حدثنا جعفر بن مُسافر، حدثنا عبد الله بن نافع عن نافع بن أبي نُعيم، عن نافع، عن ابن عمر قال: وليَ [1] أبو بكر في خلافته سنتين وسبعةَ أشهرٍ [2].حدثنا الحاكم الفاضل أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খেলাফতকালে দুই বছর এবং সাত মাস শাসন করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من "تلخيص المستدرك " للذهبي ومن المطبوع، وجاء محلها بياض في نسخنا الخطية، وجاء في "إتحاف المهرة" (11429): "أقام"، بدل "ولي".
[2] رجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنه من قول نافع مولى ابن عمر ليس فيه ابن عمر، كذلك رواه عبد الرحمن بن عبد الملك بن شيبة عند البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 350، وإبراهيم بن المنذر الحِزَامي عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 247، كلاهما عن عبد الله بن نافع: وهو الصائغ.
4467 - حدثنا عبد الله بن جعفر بن دَرستوَيهِ الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا أبو تَوْبة الربيع بن نافع الحَلَبي، حدثنا محمد بن مُهاجر، عن العبّاس بن سالم، عن أبي سلّام، عن أبي أُمامة عن عمرو بن عَبَسة قال: أتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في أولِ ما بُعِثَ وهو بمكة، وهو حينئذٍ مُستخْفٍ فقلت: ما أنت؟ قال: "أنا نبيٌّ" قلت: وما النبيُّ؟ قال: "رسولُ الله قلت: آلله أرسلَكَ؟ قال: "نعم" قلت: بما أرسلَكَ؟ قال: "أن تعبدَ الله، وتَكسِرَ الأوثانَ، وتَصِل الأرحامَ" قلت: نِعمَ ما أرسلَكَ به، فمن تَبِعَك على هذا؟ قال: "عبدٌ وحُرٌّ" يعني أبا بكر وبلالًا.وكان عَمرو يقول: لقد رأيتُني وأنا رُبْعُ الإسلام، قال: فأسلمتُ، قلت: أَتْبعُك يا رسول الله، قال: "لا، ولكن الْحَقْ بقومِك، فإذا أُخبِرتَ أني قد خرجتُ فاتْبَعني" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. وقد تابع أبا سلّام على روايته ضَمْرةُ بن حبيب وأبو طلحة الراسِبيّ [2] وشَدّادُ بن عبد الله أبو عمّار.أما حديث ضَمْرة وأبي طلحة:
আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবুওয়াত প্রাপ্তির প্রথম দিকে আমি মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম। তখন তিনি গোপনে (দাওয়াত) দিচ্ছিলেন। আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কে? তিনি বললেন: "আমি নবী।" আমি বললাম: নবী কী? তিনি বললেন: "আল্লাহর রাসূল।" আমি বললাম: আল্লাহ কি আপনাকে পাঠিয়েছেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: তিনি কী দিয়ে আপনাকে পাঠিয়েছেন? তিনি বললেন: "যেন তুমি আল্লাহর ইবাদত করো, মূর্তিগুলো ভেঙে দাও এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখো।" আমি বললাম: কতই না উত্তম যে জিনিসগুলো দিয়ে তিনি আপনাকে পাঠিয়েছেন! আপনার এই আদর্শে এখন পর্যন্ত কে কে আপনার অনুসরণ করেছে? তিনি বললেন: "একজন দাস এবং একজন স্বাধীন মানুষ"—অর্থাৎ আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আমি নিজেকে ইসলামের (অনুসারীদের) চতুর্থজন হিসেবে দেখেছিলাম। তিনি বলেন: অতঃপর আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি কি আপনার সাথে থাকব? তিনি বললেন: "না, বরং তুমি তোমার গোত্রের কাছে ফিরে যাও। যখন তুমি জানতে পারবে যে আমি (মক্কা থেকে) বেরিয়ে গেছি, তখন তুমি আমার অনুসরণ করো। "
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وهو قطعة من الحديث المتقدم برقم (593) بالإسناد نفسه. وانظر تالييه.
[2] كذا جاء في بعض النسخ، وفي بعضها الرسبي، مع أنَّ أبا طلحة المذكور - وهو نُعيم بن زياد الشامي - يُنسب أنماريًا لا راسِبيًا، وفي الرواة رجل اسمه شداد بن سعيد أبو طلحة الراسبي، وهو بصري مشهور، فالظاهر أن ما وقع هنا سبق قلم بسبب اشتراكهما في الكنية، ولعله لأجل ذلك ضبَّب فوقها في (ز). وأخرجه أحمد 28/ (17019) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، ومسلم (832) من طريق النضر بن محمد الجرشي، كلاهما عن عكرمة بن عمار، بهذا الإسناد.
4468 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب حدثنا بحر بن نصر بن سابِق الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب قال وأخبرني معاوية بن صالح، حدثنا أبو يحيى وضَمْرة بن حبيب وأبو طلحة، عن أبي أمامة الباهلي، قال: أخبرني عمرو بن عَبَسة قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو نازِلٌ بعُكاظٍ، قلت: يا رسولَ الله، من اتَّبعك على هذا الأمر؟ قال: "اتَّبعني عليه رجلانِ، حُرٌّ وعبدٌ: أبو بكر وبلال"، قال: فأسلمتُ عند ذلك [1].وأما حديثُ أبي عمّار:
আমর ইবনু আবাসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম, যখন তিনি উকাযের প্রান্তরে অবস্থান করছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এই বিষয়ে (ইসলামের দাওয়াত) আপনার অনুসরণ কে কে করেছে? তিনি বললেন, "দু’জন লোক এ বিষয়ে আমার অনুসরণ করেছে—একজন স্বাধীন ও একজন দাস: আবূ বকর ও বিলাল।" তিনি বলেন, অতঃপর আমি সে সময় ইসলাম গ্রহণ করলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو يحيى هو سُليم بن عامر الكَلاعي، وأبو طلحة: هو نُعيم بن زياد.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 315 عن بحر بن نصر الخَولاني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 4/ 201 و 9/ 406 عن معن بن عيسى، عن معاوية بن صالح، به.وسيأتي برقم (5329) من طريق عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن أبي يحيى سُليم بن عامر، وحده. وأخرجه أحمد 28/ (17019) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، ومسلم (832) من طريق النضر بن محمد الجرشي، كلاهما عن عكرمة بن عمار، بهذا الإسناد.
4469 - فحدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أيوب، أخبرنا أبو الوليد الطَّيالِسي، حدثنا عِكْرمة بن عمار، حدثنا شَدَّاد بن عبد الله أبو عمّار - وكان قد أدرك نفرًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: قال أبو أُمامة: يا عمرَو بنَ عَبَسَة، بأيِّ شيءٍ تدّعي أنك رُبُع الإسلامِ؟ فذكر الحديثَ بطُوله [1].
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমর ইবনে আবাসাকে বললেন: "হে আমর ইবনে আবাসা! কোন যুক্তিতে তুমি দাবি করো যে তুমি ইসলামের এক-চতুর্থাংশ?" এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه أحمد 28/ (17019) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، ومسلم (832) من طريق النضر بن محمد الجرشي، كلاهما عن عكرمة بن عمار، بهذا الإسناد.
4470 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا العبّاس بن الفضل الأَسْفاطي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، عن سليمان بن بلال، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، عن عمر، قال: كان أبو بكر سيِّدَنا وخيرَنا، وأحبَّنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].صحيح على شرطهما، ولم يُخرجاه!
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু বকর ছিলেন আমাদের সর্দার ও শ্রেষ্ঠ ব্যক্তি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমাদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل إسماعيل بن أبي أُويس - وهو إسماعيل بن عبد الله بن عبد الله الأصبحي - وقد تابعه أخوه أبو بكر عند ابن سعد 2/ 235، وهو ثقة.وأخرجه البخاري (3667)، والترمذي (3656) من طريق إسماعيل بن أبي أويس بهذا الإسناد. ورواية البخاري ضمن الحديث الطويل في بيعة أبي بكر الصِّدِّيق بالسَّقيفة. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. في الصحابة لكن الأصح أنه تابعي، إلَّا أنه مع إرساله يعدُّ من أقوى المراسيل لجلالة إبراهيم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 152، وفي الاعتقاد ص 350 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "مغازي موسى بن عقبة" برواية إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة عنه كما في "منتخبه" لابن قاضي شُهْبة (19).الكُبْر: القُعدُد في النسب.
4471 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد البَيهقي، حدثنا إبراهيم بن المُنذر الحِزَامي، حدثنا محمد بن فُلَيح، عن موسى بن عُقبة، عن سعد بن إبراهيم، قال: حدثني إبراهيم بن عبد الرحمن بن عَوْف: أنَّ عبد الرحمن بن عوف كان مع عُمر بن الخطاب، وأنَّ محمد بن مَسْلَمة كسر سيفَ الزُّبير، ثم قام أبو بكر فخطبَ الناسَ واعتذرَ إليهم، وقال: والله ما كنتُ حَريصًا على الإمارة يومًا ولا ليلةً قطُّ، ولا كنتُ فيها راغِبًا، ولا سألتُها الله عز وجل في سِرٍّ ولا عَلانية، ولكني أشفقتُ مِن الفتنة، وما لي في الإمارة من راحةٍ، ولكن قُلَدتُ أمرًا عظيمًا ما لي به من طاقةٍ ولا يَدانِ إلَّا بتقوية الله عز وجل، ولَودِدْتُ أنَّ أقوى الناسِ عليها مَكاني اليومَ، فقَبِل المهاجِرون منه ما قال وما اعتذَر به قال عليٌّ والزبيرُ: ما غَضِبنا إِلَّا أنّا قد أُخِّرنا عن المُشاورة، وإنا نَرى أبا بكرٍ أحقَّ الناس بها بعدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إنه لَصاحِبُ الغارِ، وثاني اثنين، وإنا لَنعلَمُ بشرفه وكُبْرِه، ولقد أمَره رسول الله صلى الله عليه وسلم بالصلاةِ بالناسِ وهو حيٌّ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলেন, এবং মুহাম্মাদ ইবন মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর তরবারি ভেঙে দিয়েছিলেন। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে জনগণের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং তাদের কাছে ওজর পেশ করলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি একদিনও বা এক রাতও এই নেতৃত্বের প্রতি কখনো আগ্রহী ছিলাম না এবং আমি এতে ইচ্ছুকও ছিলাম না। আমি আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর কাছে গোপনে বা প্রকাশ্যে কখনো এটি চাইনি। কিন্তু আমি ফিতনার (বিশৃঙ্খলা) ভয় করেছিলাম। আর এই নেতৃত্বের মধ্যে আমার কোনো আরাম নেই। বরং আমাকে এক বিশাল কাজের দায়িত্ব দেওয়া হয়েছে, যা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর সাহায্য ছাড়া বহন করার ক্ষমতা বা শক্তি আমার নেই। আমি বরং পছন্দ করতাম যে আজ আমার স্থানে সবথেকে শক্তিশালী ব্যক্তি দায়িত্বে থাকত। অতঃপর মুহাজিরগণ তার বক্তব্য এবং তার ওজর পেশ করা (ক্ষমাপ্রার্থনা) গ্রহণ করে নিলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা কেবল এজন্যই অসন্তুষ্ট হয়েছিলাম যে, আমাদের পরামর্শের বাইরে রাখা হয়েছিল। তবে আমরা আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পরে এই দায়িত্বের সবচেয়ে যোগ্য ব্যক্তি বলে মনে করি। নিশ্চয়ই তিনি গুহার সঙ্গী (সাহিবুল গার), এবং দুইজনের মধ্যে দ্বিতীয়। আমরা অবশ্যই তার মর্যাদা ও শ্রেষ্ঠত্ব সম্পর্কে অবগত আছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবিত অবস্থায় তাকে মানুষের ইমামতি করার নির্দেশ দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه مرسل إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف تابعي كبير، وذكره بعضهم في الصحابة لكن الأصح أنه تابعي، إلَّا أنه مع إرساله يعدُّ من أقوى المراسيل لجلالة إبراهيم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 152، وفي الاعتقاد ص 350 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "مغازي موسى بن عقبة" برواية إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة عنه كما في "منتخبه" لابن قاضي شُهْبة (19).الكُبْر: القُعدُد في النسب.
4472 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو البَخْتَري عبد الله بن محمد بن شاكر، حدثنا حسين بن علي الجعفي، عن زائدة، عن عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله، قال: لما قُبِضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقالت الأنصارُ: مِنّا أميرٌ ومنكم أميرٌ، قال: فأتاهم عمرُ فقال: يا معشر الأنصار، ألستم تعلمون أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أمَر أبا بكر يؤمُّ الناسّ، فأيُّكم تطيبُ نفسُه أن يتقدَّم أبا بكر؟ فقالت الأنصار: نعوذُ بالله أن نتقّدمَ أبا بكر [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হলো, তখন আনসারগণ বললেন: আমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে এবং তোমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে। তিনি বলেন, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে এলেন এবং বললেন: হে আনসার সম্প্রদায়, তোমরা কি জানো না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকরকে লোকদের ইমামতি করার নির্দেশ দিয়েছিলেন? তোমাদের মধ্যে কার অন্তর খুশি হবে যে সে আবূ বাকরের আগে দাঁড়াবে? তখন আনসারগণ বললেন: আমরা আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই যে আমরা আবূ বাকরের আগে অগ্রসর হই।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عاصم - وهو ابن أبي النَّجُود، ويقال له أيضًا: ابن بَهْدلة - لكن تابعه إسماعيل بن أبي خالد عند أبي بكر الآجُرّي في "الشريعة" (1198)، وابنِ عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 272، وغيرهما زائدة: هو ابن قُدامة، وزِرٌّ: هو ابن حُبيش.وأخرجه أحمد 1/ (133) و 6 / (3765) عن حُسين بن علي الجُعفي، والنسائي (855) عن إسحاق بن إبراهيم - وهو المعروف بابن راهويه - وهناد بن السَّرِيّ، عن حُسين بن علي الجُعفي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 1 / (133) و 6 / (3842) عن معاوية بن عمرو، عن زائدة بن قُدامة، به.
4473 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا العبّاس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا محمد بن أبي عُبيدة، عن أبيه، عن الأعمش، عن أبي سُفيان، عن أنس قال: لقد ضَربُوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم حتى غُشيَ عليه، فقام أبو بكر فجعل يُنادي ويقول: ويلكُم، أتقتُلُون رجلًا أن يقولَ: ربِّيَ الله؟! قالوا: من هذا؟ قالوا: هذا ابن أبي قُحافة المجنونُ [1]هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এত প্রহার করেছিল যে তিনি অচেতন হয়ে পড়েন। তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং উচ্চস্বরে বলতে লাগলেন: তোমাদের জন্য দুর্ভোগ! তোমরা কি এমন একজন মানুষকে হত্যা করতে চাও, যে বলে, ‘আমার রব আল্লাহ’? লোকেরা জিজ্ঞাসা করল, এ লোকটি কে? তারা (অন্যদের) বলল, ইনি ইবনে আবু কুহাফা, একজন পাগল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قويّ من أجل أبي سفيان - وهو طلحة بن نافع - والعباس بن الفضل، فهما صدوقان لا بأس بهما، وقد توبع العباس، فيبقى الشأن في أبي سفيان، وقد صحَّح إسناده الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 11/ 320، وقال: هذا من مراسيل الصحابة. يعني أن أنسًا لم يحضُر القصة، ومراسيل الصحابة حُجّة. أبو عُبيدة: هو عبد الملك بن معن بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود.وأخرجه أبو يعلى (3691)، ومن طريقه ابن عدي في "الكامل" 4/ 113، والضياء المقدسي في "المختارة" 6 / (2234) عن محمد بن عبد الله بن نمير بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (3879)، وعبد الله بن أحمد بن حنبل في "زياداته على فضائل الصحابة" لأبيه (218)، والبزار (7506) و (7507)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 233، وابن عبد البر في "الدرر في اختصار المغازي والسير" ص 43 من طُرق عن محمد بن أبي عُبيدة، به.وأخرجه ابن بَطَّة العُكبري في "الإبانة" 9/ 610 من طريق مُحاضِر بن المُورِّع، عن الأعمش، به.
4474 - حدثنا عبد الله بن جعفر الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا سعيد بن عُفير، حدثنا الليث بن سعد، عن عُقيل، عن ابن شِهَاب، عن عبد الرحمن بن مالك المُدلِجِيّ - وهو ابن أخي سُرَاقة بن جُعْشُم - أن أباه أخبره أنه سمع سُراقةَ أنَّ ابن جُعْثُم يقول: جاءتنا رسُلُ كُفَّارِ قُريشٍ يَجعلُون في رسول الله صلى الله عليه وسلم دِيَةً، ولمن قتلهما في كلِّ واحدٍ منهما ديةً، أو أسَرَهما [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!
সুরাকা ইবনু জু'শুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের কাছে কুরাইশ কাফিরদের পক্ষ থেকে দূত এসেছিল, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য রক্তমূল্য (দিয়াহ) নির্ধারণ করে দিয়েছিল। আর যে ব্যক্তি তাঁকে অথবা তাঁর সঙ্গীকে হত্যা করবে অথবা তাদের উভয়কে বন্দী করবে, তাদের প্রত্যেকের জন্য রক্তমূল্য (দিয়াহ) প্রদান করার ঘোষণা করেছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح سعيد بن عُفير هو سعيد بن كثير بن عُفير، وعُقيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه مطولًا بقصة سراقة بتمامها البخاريُّ (3906) عن يحيى بن بُكير، عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقد تقدَّم مطولًا بذكر قصة سراقة تامةً برقم (4315) من طريق معمر بن راشد عن الزُّهْري.
4475 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السّمّاك ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا أبو أحمد الزُّبيري، حدثنا سُفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى، عن سفيان، عن القاسم بن كَثير، عن قيس الخارفي، قال: سمعتُ عليًّا يقول: سَبَقَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وصَلَّى أبو بَكْرٍ، وثَلَّثَ عُمر، ثم خَبَطَتْنا فتنةٌ، ويَعفُو اللهُ عمَّن يشاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রথম হয়েছেন, আবূ বকর দ্বিতীয় হয়েছেন, এবং উমার তৃতীয় হয়েছেন। অতঃপর ফিতনা (বিশৃঙ্খলা) আমাদের আচ্ছন্ন করেছে, আর আল্লাহ যাকে ইচ্ছা ক্ষমা করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل قيس الخارفي - وهو ابن سعد - وقد توبع. أبو أحمد الزُّبيري: هو محمد بن عبد الله بن الزُّبير، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، وسفيان: هو ابن سعيد الثَّوري.وأخرجه أحمد 2/ (1020) و (1107) و (1259) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (895) من طريق أبي إسحاق السَّبيعي، عن عبد خير، عن عليّ. وتابع أبا إسحاق عليه خالد بن علقمة عند الطبراني في "الأوسط" (1639)، وإسناده إليهما حسن.وأخرجه أحمد (1256) من طريق شريك بن عبد الله النخعي، عن الأسود بن قيس، عن عمرو بن سفيان الثقفي، عن عليٍّ. وإسناده حسن.قوله: "وصلَّى أبو بكر" أي: جاء بعد النبي صلى الله عليه وسلم، وهو مأخوذ من المصلِّي من الخيل، وهو الذي يجيء بعد السابق، لأنَّ رأسَه يلي صَلَا المتقدم، والصلاة وسط الظهر أو ما انحدر من الوَرِكَين.
4476 - أخبرنا محمد بن المُؤمَّل بن الحسن بن عيسى، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا يوسف بن عَدي ونعيم بن حماد، قالا: حدثنا عبد الله بن المبارك، أخبرني عُمر بن سعيد بن أبي حُسين القرشي، عن ابن أبي مُلَيكة، قال: سمعت ابن عبّاس يقولُ: لما وُضِع عمرُ بن الخطاب على سَريره، فتَكنَّفه الناسُ يَدْعُون له وأنا فيهم، فجاء عليُّ بن أبي طالب فقال: إن كنتُ لأظنُّ أن يجعلَكَ الله تعالى مع صاحبَيك، وذاك أني كنتُ أُكثرُ أن أسمعَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: ذهبتُ أنا وأبو بكر وعمر، ودخلتُ أنا وأبو بكر وعمر، وخرجتُ أنا وأبو بكر وعمر، وإني كنتُ أظنُّ أن يَجعلَكَ الله معهما [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর খাটের ওপর রাখা হলো, তখন লোকেরা তাঁকে ঘিরে ধরে তাঁর জন্য দু'আ করছিল, আর আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম। তখন আলী ইবনু আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বললেন: আমি তো মনে করতাম যে আল্লাহ তাআলা আপনাকে আপনার উভয় সঙ্গীর (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) সাথে রাখবেন। আর এর কারণ হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রায়শই বলতে শুনতাম: আমি, আবূ বকর ও উমার গেলাম; আমি, আবূ বকর ও উমার প্রবেশ করলাম; এবং আমি, আবূ বকর ও উমার বের হলাম। তাই আমি মনে করতাম যে আল্লাহ আপনাকে তাঁদের দুজনের সাথে রাখবেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح من جهة يوسف بن عدي. ابنُ أبي مُليكة: هو عبد الله بن عُبيد الله.وأخرجه أحمد 2 / (898)، والبخاري (3685)، ومسلم (2389)، وابن ماجه (98)، والنسائي (8061) من طرق عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (3677)، ومسلم (2389) من طريق عيسى بن يونس السَّبيعي، عن عمر بن سعيد، به. وأخرجه الترمذي (3692) عن سلمة بن شبيب وابن حبان (6899) من طريق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.
4477 - حدثنا أحمد بن إسحاق العَدْل الصَّيدلاني، حدثنا الحُسين بن الفَضْل، حدثنا علي بن بَحْر بن بَرِّي، حدثنا سعيد بن مَسلَمة القرشي، عن إسماعيل بن أُمية، عن نافع، عن ابن عمر، قال: دخلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم المسجدَ وإحدى يدَيه على أبي بكر والأُخرى على عمر، فقال: "هكذا نُبعَثُ يومَ القيامة [1].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন, তাঁর এক হাত ছিল আবূ বাকরের উপর এবং অন্য হাত ছিল উমরের উপর। অতঃপর তিনি বললেন: "এভাবেই ক্বিয়ামতের দিন আমরা উত্থিত হব।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بمرّة من أجل سعيد بن مَسلَمة، فإنه ضعيف منكر الحديث، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه"، وقال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (2653): هذا حديث منكر.وأخرجه ابن ماجه (99) عن علي بن ميمون الرّقي، والترمذي (3669) عن عمر بن إسماعيل بن مجالد كلاهما عن سعيد بن مَسلَمة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث غريب.وسيتكرر برقم (7939) عن أبي عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد عن الحسن بن علي بن بحر عن أبيه.وانظر ما بعده. وأخرجه الترمذي (3692) عن سلمة بن شبيب وابن حبان (6899) من طريق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.
4478 - أخبرنا عَبْدان بن يزيد الدَّقِيقي بهَمَذان، حدثنا عُمير بن مِرْداس، حدثنا عبد الله بن نافع الصائغ، حدثنا عاصم بن عُمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أول من تَنشَقُّ عنه الأرضُ أنا، ثم أبو بكر ثم عمرُ ثم آتي البقيعَ فتَنشقُّ عنهم، فأُبعَثُ بينهم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, “যার জন্য সর্বপ্রথম ভূমি বিদীর্ণ হবে, সে হচ্ছি আমি, তারপর আবূ বকর, তারপর উমার। অতঃপর আমি বাকী‘তে যাব এবং তাদের জন্য (সেখানকার বাসিন্দাদের জন্য) ভূমি বিদীর্ণ হবে। তারপর আমি তাদের মধ্য থেকে পুনরুত্থিত হব।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما تقدم بيانه برقم (3774) من طريق سريج بن النُّعمان عن عبد الله بن نافع، ومع ذلك حسّنه الترمذي، وصحَّحه ابن حبان! وأخرجه الترمذي (3692) عن سلمة بن شبيب وابن حبان (6899) من طريق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني، كلاهما عن عبد الله بن نافع بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.