আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
6181 - حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مُصعَب بن عبد الله الزُّبيري قال: مَخرَمة بن نوفل بن أُهَيب بن عبد مَنَاف بن زُهْرة بن كِلاب، وأمُّه رُقَيقة بنت [أبي] صَيفيّ بن هاشم بن عبد مَناف، وأمها [هالةُ بنت] كَلَدةً بن عبد مناف [1]، وكان من المؤلَّفة قلوبُهم.
মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাখরামাহ ইবনু নওফল ইবনু উহাইব ইবনু আবদ মানাফ ইবনু যুহরাহ ইবনু কিলাব। আর তাঁর মাতা হলেন রুকায়েকা বিনত [আবু] সাইফি ইবনু হাশিম ইবনু আবদ মানাফ। আর তাঁর (রুকায়েকার) মাতা হলেন [হালা বিনত] কালাদাহ ইবনু আবদ মানাফ। আর তিনি ছিলেন আল-মুআল্লাফাতু কুলুবুহুম (যাদের অন্তর ইসলামের দিকে ঝোঁকানোর জন্য অনুগ্রহ করা হয়েছিল) তাদের অন্তর্ভুক্ত।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] من قوله: "بن زهرة" إلى هنا سقط من (ب). وتحرَّف: بن عبد مناف، فيها إلى: بنت عبد مناف، وما بين المعقوفين سقط من (ز) و (ص) و (م) واستدركنا ذلك كله من "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 90.وعبد مناف جدُّ رقيقة: هو ابن قصي بن كلاب، وأما عبد مناف جدُّ هالة بنت كلدة: فهو ابن عبد الدار بن قصي بن كلاب.وذكر ابن سعد في "الطبقات" 10/ 211 أنه اختلف في اسم أم رقيقة، فقيل: هالة، وقيل: تُماضر. وراءَها حِلٌّ وما دونها حرام، وهي حدود موروثة من عهد قريش، ثم أقرّها رسول الله صلى الله عليه وسلم وحافظ عليها المسلمون على مرِّ السنين.
6182 - فحدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر قال: أسلمَ مَخرمةُ بن نوفل عند فتح مكّة، وكان عالمًا بنَسَب قريش وأحاديثِها، وكانت له معرفةٌ بأنصاب الحَرَم [1]، فوَلَدَ مخرمةُ صفوانَ، وبه كان يُكنَى، وهو الأكبر من ولده.
মুহাম্মদ ইবনে উমর থেকে বর্ণিত, মাখরামা ইবনে নাওফাল মক্কা বিজয়ের সময় ইসলাম গ্রহণ করেন। তিনি কুরাইশদের বংশতালিকা ও তাদের ঘটনাবলী সম্পর্কে জ্ঞানী ছিলেন এবং হারামের (পবিত্র এলাকার) সীমানা চিহ্নিতকারী স্তম্ভগুলি (আনসাব) সম্পর্কেও তাঁর জ্ঞান ছিল। মাখরামা সাফওয়ানের জন্ম দেন। তাঁর মাধ্যমেই তিনি কুনিয়ত গ্রহণ করতেন এবং সে ছিল তাঁর সন্তানদের মধ্যে জ্যেষ্ঠ।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] قال الأستاذ عاتق البلادي الحربي رحمه الله في "معجم المعالم الجغرافية في السيرة النبوية" ص 33: هي أنصاب مبنية من الحجارة المجصّصة على جوانب الطرق الخارجة من مكة، فما وراءَها حِلٌّ وما دونها حرام، وهي حدود موروثة من عهد قريش، ثم أقرّها رسول الله صلى الله عليه وسلم وحافظ عليها المسلمون على مرِّ السنين.
6183 - Null
6183 - فسمعت أبا زكريا يحيى بن محمد العَنبَري يقول: سمعت أبا عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي يقول: سمعت يحيى بن عبد الله بن بُكَير يقول: مَخرَمةُ بن نوفل يُكنَى أبا المِسوَر.
আবূ যাকারিয়্যা ইয়াহইয়া ইবনু মুহাম্মাদ আল-ʿআনবারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম আল-ʿআব্দী-কে বলতে শুনেছি। তিনি বলেন: আমি ইয়াহইয়া ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু বুকাইর-কে বলতে শুনেছি যে, মাখরামাহ ইবনু নাওফাল-এর উপনাম (কুনিয়াত) ছিল আবূ মিসওয়ার।
6184 - حَدَّثَنَا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حَدَّثَنَا محمد بن إسماعيل التِّرمِذي، حَدَّثَنَا مَخلَد بن مالك، حَدَّثَنَا الليث بن سعد وعَطَّاف بن خالد، عن ابن أبي مُلَيكة قال: أخبرني المِسوَر بن مَخرَمة قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لأبي [1]: "يا أبا صفوان" [2].
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পিতাকে লক্ষ্য করে বললেন: “হে আবূ সাফওয়ান।”
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية: "لا يا أبا صفوان"، والمثبت من "الأنساب والكنى" لأبي أحمد الحاكم و"الاستيعاب" لابن عبد البر.
[2] إسناده قوي من أجل مخلد بن مالك: وهو ابن شيبان الحراني، وأما شيخه عطاف بن خالد فإنه صدوق حسن الحديث ليس بذاك المتين، لكنه متابع. قلنا: ويغلب على ظننا أنَّ اللفظ المساق هنا بذكر تكنية مخرمة بأبي صفوان هو لعطاف بن خالد، فقد روى القصة غير واحد عن الليث بن سعد ليس فيه الكنية إنما باسمه مجرّدًا من كنيته، انظر: أحمد (31/ 18927)، والبخاري (2599)، ومسلمًا (1058) (129)، وأبا داود (4028)، والترمذي (2818)، والنسائي (9584)، وابن حبان (4817) و (4818). ورواه حماد بن زيد عن أيوب السختياني عن ابن أبي مليكة عند البخاري (3127) فقال فيه: "يا أبا المِسوَر". إذًا فعطاف بن خالد واهمٌ في ذكر الكنية بأبي صفوان، والله أعلم.وأخرجه كرواية المصنّف أبو أحمد الحاكم فيمن كنيته أبو صفوان من "الأسامي والكنى" ورقة 237 عن أبي العبّاس الثقفي، عن محمد بن إسماعيل الترمذي، بهذا الإسناد.وذكره ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 677 معلقًا من رواية الليث بن سعد، عن ابن أبي مليكة، به.وقد روى هذا الحديث ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 57/ 156 - 157 - ضمن خبر في قَسْم رسول الله صلى الله عليه وسلم أقبية بين أصحابه - من طريق إسحاق بن سيار النصيبي، عن مخلد بن مالك، به.
6185 - وحدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الله بن رُستَهْ، حَدَّثَنَا سليمان بن داود، حَدَّثَنَا محمد بن عمر قال: شهد مَخرمةُ بنُ نوفل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنين، فأعطاه من غنائم حُنين خمسين بعيرًا. ومات مخرمةُ بالمدينة سنة أربع وخمسين، وكان يومَ مات ابنَ مئةٍ وخمسَ عشرةَ سنة [1].
মাখরামা ইবনু নাওফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের দিন উপস্থিত ছিলেন। ফলে তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে হুনাইনের গনীমতের সম্পদ থেকে পঞ্চাশটি উট দান করেন। আর মাখরামা চুয়ান্ন (৫৪) হিজরী সনে মদীনায় ইন্তেকাল করেন। যখন তিনি ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল একশ' পনেরো বছর।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] وذكره عن محمد بن عمر الواقدي أيضًا تلميذه محمد بن سعد في "الطبقات" 6/ 70، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 57/ 156، وزاد فيه عن الواقدي قال: ورأيت عبدَ الله بن جعفر - يعني ابن عبد الرحمن بن المسور بن مخرمة العلّامة المحدِّث - ينكر أن يكون مخرمةُ أخذ من ذلك شيئًا وقال: ما سمعت أحدًا من أهلي يذكر ذلك.
6186 - فحدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حَدَّثَنَا أحمد بن مِهرانَ بن خالد قال: سمعتُ سعيدَ بن عُفَير، يقول: تُوفِّي مَخرمةُ بن نوفل القُرشي وهو ابن خمسَ عشرةَ ومئةٍ، وكان أسلمَ يومَ الفتح، وهو من المؤلَّفة قلوبُهم [1].
সাঈদ ইবনে উফাইর থেকে বর্ণিত, মাখরামা ইবনে নাওফাল আল-কুরাশী ইন্তেকাল করেন যখন তাঁর বয়স ছিল একশত পনেরো বছর (১১৫)। তিনি মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন এবং তিনি ছিলেন ‘মুআল্লাফাতুল কুলুব’ (যাদের হৃদয় আকর্ষণ করা হয়েছিল) এর অন্তর্ভুক্ত।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده حسن، وكان سعيد بن عفير - وهو سعيد بن كثير بن عفير - عالمًا بالأنساب والتواريخ.
6187 - حَدَّثَنَا محمد بن إبراهيم بن الفضل المزكِّي، حَدَّثَنَا الحسين بن محمد بن زياد، حَدَّثَنَا الزُّبير بن بكّار، حدثني عبد الرحمن بن عبد الله الزُّهْري قال: قال معاويةُ بن أبي سفيان وعنده عبد الرحمن بن أزهرَ: من لي بمخرمةَ بن نوفل؟ [ما] [1] يَضعُني من لسانه تنقُّصًا، فقال له عبد الرحمن بن أزهر: أنا أكفِيكَه، فبلغ ذلك مخرمةَ، فقال: جعلني عبدُ الرحمن يتيمًا في حَجْره، يَزْعُم لمعاوية [2] أنه يَكفيهِ إِيَّاي! فقال له ابن البَرْصاء اللَّيثي: إنه عبد الرحمن بن أزهر، فرفع عصًا في يده وضربه فشجَّه وقال: أعدوُّنا [3] في الجاهلية وتَحسُدُنا في الإسلام وتدخلُ بيني وبين ابن الأزهر؟! [4]
মু'আবিয়া ইবন আবী সুফইয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন—যখন তার কাছে আবদুর রহমান ইবন আযহার উপস্থিত ছিলেন: কে আমাকে মাখরামাহ ইবন নাওফালের মোকাবিলা করার জন্য আছে? তার নিন্দা করার জিহ্বা আমাকে ছোট করে দিচ্ছে। তখন তাকে আবদুর রহমান ইবন আযহার বললেন: আমিই আপনার জন্য যথেষ্ট। এই খবর মাখরামাহর কাছে পৌঁছাল। তিনি বললেন: আবদুর রহমান আমাকে তার কোলে রাখা এতিমের মতো বানিয়ে দিয়েছে, সে মু'আবিয়ার কাছে দাবি করছে যে সে আমার মোকাবিলা করার জন্য যথেষ্ট! তখন ইবনু আল-বারসা আল-লাইসী তাকে বললেন: তিনি তো আবদুর রহমান ইবন আযহার। তখন তিনি (মাখরামাহ) তার হাতে থাকা লাঠিটি তুলে তাকে আঘাত করলেন এবং তার মাথা ফাটিয়ে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: জাহেলিয়াতে তুমি ছিলে আমাদের শত্রু, আর ইসলাম গ্রহণের পর তুমি আমাদের প্রতি ঈর্ষা করছো এবং আমার ও ইবনুল আযহারের মাঝে বাধা সৃষ্টি করছো?!
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] زيادة لا بدَّ منها من "تاريخ دمشق" 57/ 161 و "الإصابة" لابن حجر في ترجمة مخرمة، حيث ذكراه عن الزبير بن بكار.
[2] لفظ "لمعاوية" تحرّف في نسخنا الخطية إلى: بقوته. وجاء على الصواب في النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.
6187 [3] - هكذا في (ص) والنسخة المحمودية، وفي (ز) و (ب): أعدوانًا.
6187 [4] - إسناده معضل، فإنَّ عبد الرحمن بن عبد الله الزهري هذا لم يدرك زمن معاوية، وهو شيخ للزبير مجهول الحال، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 7/ 83. وأبو داود (4028)، والترمذي، (2818)، والنسائي (9584)، وابن حبان (4817) و (4818) من طريق الليث بن سعد، عن ابن أبي مليكة، به.وسيأتي مكررًا عند المصنّف برقم (6357).
6188 - حَدَّثَنَا محمد بن إبراهيم بن الفضل، حَدَّثَنَا الحسين بن محمد بن زياد، حَدَّثَنَا الزُّبير بن بكّار قال: لما حَضَرَت مخرمةَ بن نوفل الوفاةُ بَكَتْه ابنتُه، فقالت: وا أَبَتاه، كان هيِّنًا ليِّنًا فأفاق فقال: مَن النادبةُ؟ فقالوا: ابنتُك، فقال: تعالَيْ، فجاءت، فقال: ليس هكذا يُندَبُ مِثلي، قولي: وا أَبتاه، كان شَهمًا شَيظَميًّا، كان أبًا حَصينًا [1].
যুবাইর ইবনে বাক্কার থেকে বর্ণিত, যখন মাখরামাহ ইবনে নওফল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর সময় উপস্থিত হলো, তাঁর কন্যা তাকে নিয়ে কেঁদে উঠলো এবং বলল: "হায় আমার বাবা! তিনি ছিলেন বিনয়ী, কোমল (হৃদয়)।" তখন তিনি জেগে উঠলেন এবং বললেন: "বিলাপকারী কে?" তারা বলল: "আপনার কন্যা।" তিনি বললেন: "এসো।" তখন সে এলো। তিনি বললেন: "আমার মতো লোকের জন্য এভাবে বিলাপ করা উচিত নয়। তুমি বরং বলো: 'হায় আমার বাবা! তিনি ছিলেন বুদ্ধিমান ও সম্মানিত, তিনি ছিলেন এক সুরক্ষিত (বা শক্তিশালী) পিতা।'"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] هكذا في نسخنا الخطية، وتُقرأ في بعضها أبا حِصنًا. وفي النسخة المحمودية: أبًا عصيًّا، وهو الموافق لما في "تاريخ دمشق" 57/ 161 حيث رواه من طريق أحمد بن سليمان الطوسي عن الزبير بن بكار قال: وأخبرني مصعب بن عثمان قال: لما حضرت … إلخ. وهذا إسناد معضل، فإنَّ مصعب بن عثمان - وهو زبيريٌّ - لم يدرك زمن مخرمة.والشَّيظمي: الطويل الجسيم الفتيّ. وأبو داود (4028)، والترمذي، (2818)، والنسائي (9584)، وابن حبان (4817) و (4818) من طريق الليث بن سعد، عن ابن أبي مليكة، به.وسيأتي مكررًا عند المصنّف برقم (6357).
6189 - حَدَّثَنَا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، حَدَّثَنَا علي بن عبد العزيز، حَدَّثَنَا مُسلِم بن إبراهيم، حَدَّثَنَا حاتم بن وَرْدان، حَدَّثَنَا أيوب، عن ابن أبي مُلَيكة، عن المِسَور بن مَخرَمة قال: قَدِمَت على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أَقبيَةٌ فقَسَمَها بين أصحابه، فقال لي أَبي: انطلِقْ بنا إليه، فإنه أتته أقبيَةٌ، فتكلَّم أَبي على الباب، فعرف النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم صوتَه، فخرج ومعه قَباءٌ، فجعل يقول: "خَبَأتُ لك هذا، خَبَأتُ لك هذا" [1].
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু কাবা (লম্বা পোশাক) আসল। অতঃপর তিনি তা তাঁর সাহাবীগণের মধ্যে বণ্টন করে দিলেন। তখন আমার পিতা আমাকে বললেন: চলো আমরা তাঁর (নবীর) নিকট যাই, কেননা তাঁর কাছে কিছু কাবা এসেছে। আমার পিতা দরজার কাছে কথা বললেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কণ্ঠস্বর চিনতে পারলেন। অতঃপর তিনি (নবী) বেরিয়ে এলেন এবং তাঁর সাথে একটি কাবা ছিল। তিনি বলতে লাগলেন: "আমি এটি তোমার জন্য লুকিয়ে রেখেছিলাম, আমি এটি তোমার জন্য লুকিয়ে রেখেছিলাম।"
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده صحيح. مسلم بن إبراهيم: هو الأزدي الفراهيدي، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السَّختياني، وابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة.وأخرجه البخاري (2657)، ومسلم (1058) (130) عن زياد بن يحيى الحسّاني، عن حاتم بن وردان، بهذا الإسناد.ورواه إسماعيل ابن عليّة عن أيوب عند البخاري برقم (6132) فأرسله، لم يذكر فيه المسور بن مخرمة.وأخرجه أحمد (31/ 18927)، والبخاري (2599) و (5800)، ومسلم (1058) (129)، وأبو داود (4028)، والترمذي، (2818)، والنسائي (9584)، وابن حبان (4817) و (4818) من طريق الليث بن سعد، عن ابن أبي مليكة، به.وسيأتي مكررًا عند المصنّف برقم (6357).
6190 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن جعفر بن دَرَستَوَيهِ الفارسي، حَدَّثَنَا يعقوب بن سفيان الفارسي، حَدَّثَنَا سعيد بن عُفَير وسعيد بن أبي مريم وعبد الله بن صالح ويحيى بن بُكَير المِصريُّون بمِصر، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُرْوة بن الزُّبير، عن المِسوَر بن مَخرَمة الزُّهْري، عن أبيه قال: لما أَظهَرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الإسلامَ أسلم أهلُ مكة كلُّهم، وذلك قبل أن تُفرَضَ الصلاة، حتَّى إذا كان يقرأُ السجدةَ ما يستطيع أحدُهم أن يسجد، حتَّى قَدِمَ رؤساءُ قريشٍ الوليدُ بن المغيرة وأبو جَهْل بن هشام وغيرُهما، وكانوا بالطائف في أرَضِيهم، فقالوا: تَدَعُون دينَ آبائكم؟! فكَفَروا [1].قال يعقوب بن سفيان: ولا نعلمُ لمخرمةَ بن نوفلٍ حديثًا مسنَدًا غيرَ هذا. ذكرُ مناقب سعيد بن يَربُوعٍ المخزومي رضي الله عنه -
মাখরামা ইবনে নওফল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (তাঁর পিতা) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইসলামকে প্রকাশ করলেন, তখন মক্কার সব লোক ইসলাম গ্রহণ করলো। আর এটা ছিল সালাত ফরয হওয়ার আগে। এমনকি যখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিজদার আয়াত পড়তেন, তখন তাদের কেউ সিজদা করা থেকে বিরত থাকতে পারতো না। অতঃপর কুরাইশদের নেতারা—ওয়ালীদ ইবনুল মুগীরাহ, আবূ জাহল ইবনে হিশাম এবং অন্যান্যরা, যারা তাদের জমিতে তায়েফে ছিল—ফিরে এলো। তারা বললো: তোমরা কি তোমাদের পূর্বপুরুষদের ধর্ম ত্যাগ করছো?! অতঃপর তারা কাফির হয়ে গেল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده ضعيف لتفرد عبد الله بن لَهِيعة به وسوء حفظه. أبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن الأسدي يتيم عروة.وأخرجه يحيى بن معين في "تاريخه" برواية الدوري (212)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (617)، والطحاوي في "معاني الآثار" 3/ 331 - 33 والطبراني في "الكبير" (20/ 2)، والبيهقي في "معرفة السنن والآثار" (18268 - 18269)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 57/ 154 و 155 من هذه الطرق التي عند المصنّف عن ابن لَهِيعة، بهذا الإسناد.
6191 - Null
6191 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر قال: سعيد بن يَربُوع بن عَنكَثة بن عامر بن مَخزُوم، ويُكنى أبا هُودٍ، أسلم يوم فتح مكة، وشَهِدَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حُنينًا، وأعطاه رسول الله صلى الله عليه وسلم من غنائم حُنينٍ خمسين بعيرًا.
মুহাম্মাদ ইবনে উমর থেকে বর্ণিত: সাঈদ ইবনে ইয়ারবূ' ইবনে আনকাথা ইবনে আমের ইবনে মাখযূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যার উপনাম ছিল আবূ হূদ। তিনি মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণ করেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের গনীমতের সম্পদ থেকে তাঁকে পঞ্চাশটি উট প্রদান করেন।
6192 - قال محمد بن عمر: سمعتُ عبدَ الله بن جعفر يقول: جاء عمرُ بن الخطّاب إلى منزل سعيد بن يَربُوع، فعزّاه بذهاب بصرِه وقال: لا تَدَعِ الجمعةَ ولا الصلاةَ في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ليس لي قائدٌ، قال: نحن نَبعثُ إِليك بقائدٍ، قال: فبَعَثَ إليه بغلامٍ من السَّبْي [1].قال [2]: وتُوفِّي سعيدُ بن يَربُوع بالمدينة سنة أربع وخمسين، وكان يومَ توفِّي ابنَ مئةٍ وعشرين سنة.
আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাঈদ ইবনু ইয়ারবূ'-এর বাড়িতে এলেন। অতঃপর তিনি তার দৃষ্টিশক্তি হারানোর জন্য তাকে সান্ত্বনা দিলেন এবং বললেন: তুমি জুমু'আহ এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে সালাত (আদায় করা) ত্যাগ করো না। সাঈদ বললেন: আমার কোনো পথপ্রদর্শক নেই। তিনি (উমার) বললেন: আমরা তোমার কাছে একজন পথপ্রদর্শক পাঠাচ্ছি। অতঃপর তিনি তার কাছে যুদ্ধবন্দীদের মধ্য থেকে একটি গোলাম পাঠালেন। (বর্ণনাকারী) বলেন: সাঈদ ইবনু ইয়ারবূ' চুয়ান্ন (৫৪) হিজরীতে মদীনায় ইন্তিকাল করেন। মৃত্যুর দিন তার বয়স হয়েছিল একশো বিশ বছর।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] إسناده معضل، فعبد الله بن جعفر - وهو ابن عبد الرحمن بن المسور بن مخرمة - لم يدرك زمن عمر لعلّه ولد قريبًا من سنة مئة للهجرة.ورواه عن محمد بن عمر - وهو الواقدي - ابن سعد في "الطبقات" 6/ 98، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 327. الحراني، بهذا الإسناد - دون قصة أسر العبّاس.وقصة أسره للعبّاس رُويت عن عبد الله بن عبّاس من غير وجه، انظر "مسند أحمد" 5/ (3310).
[2] يعني محمد بن عمر الواقدي. الحراني، بهذا الإسناد - دون قصة أسر العبّاس.وقصة أسره للعبّاس رُويت عن عبد الله بن عبّاس من غير وجه، انظر "مسند أحمد" 5/ (3310).
6193 - حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مُصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: مات سعيدُ بن يربوع بن عَنكَثة بن عامر المخزومي سنة خمس وخمسين وهو ابن مئةٍ وثمانَ عشرةَ سنة، قال مصعب: وكان اسمُه صُرْمًا [1] في الجاهلية، فسمَّاه رسول الله صلى الله عليه وسلم سعيدًا، واسم أُمِّه هِند. ذكرُ مناقب أبي اليَسَر كعب بن عمرو الأنصاري رضي الله عنه -
মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাঈদ ইবনু ইয়ারবু' ইবনু আনকাথা ইবনু আমির আল-মাখযূমী পঁঞ্চান্ন হিজরীতে (৫৫ হিজরি সনে) ইন্তিকাল করেন। তখন তাঁর বয়স ছিল একশ আঠারো বছর। মুসআব বলেন: জাহিলিয়াতের যুগে তাঁর নাম ছিল স়রমা। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নাম পরিবর্তন করে সাঈদ রাখেন। এবং তাঁর মায়ের নাম ছিল হিন্দ। আবু ইয়াসার কা'ব ইবনু আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা/গুণাবলী আলোচনা/প্রসঙ্গ।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] الصُّرم: اسم للقطيعة بين الرجلين. الحراني، بهذا الإسناد - دون قصة أسر العبّاس.وقصة أسره للعبّاس رُويت عن عبد الله بن عبّاس من غير وجه، انظر "مسند أحمد" 5/ (3310).
6194 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حَدَّثَنَا أبو عُلَاثة، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، حَدَّثَنَا أبو الأسود، عن عُرْوة: فيمن بايعَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بالعَقَبة من بني عمرو بن سَوَاد [1]: أبو اليَسَر كعب بن عَمرو بن عبَّاد بن عمرو بن تَمِيم بن سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة، من أهل بدرٍ، شَهِدَ العَقَبَةَ، وهو الذي أَسَرَ العبّاسَ بن عبد المطَّلب [2].
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত... বনু আমর ইবনে সাওয়াদের মধ্যে যারা আকাবায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইয়াত গ্রহণ করেছিলেন তাদের একজন হলেন: আবু আল-ইয়াসার কা’ব ইবনে আমর ইবনে আব্বাদ ইবনে আমর ইবনে তামিম ইবনে সাওয়াদ ইবনে গানাম ইবনে কা’ব ইবনে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি ছিলেন বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের অন্যতম এবং আকাবায় উপস্থিত ছিলেন। আর তিনিই সেই ব্যক্তি যিনি আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবকে বন্দী করেছিলেন।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] في النسخ الخطية في الموضعين: سوادة، بزيادة تاء مربوطة في آخره، وهو خطأ، والتصويب من كتب التراجم والأنساب. الحراني، بهذا الإسناد - دون قصة أسر العبّاس.وقصة أسره للعبّاس رُويت عن عبد الله بن عبّاس من غير وجه، انظر "مسند أحمد" 5/ (3310).
[2] أخرجه الطبراني في "الكبير" 19 / (366) عن أبي علاثة - وهو محمد بن عمرو بن خالد الحراني، بهذا الإسناد - دون قصة أسر العبّاس.وقصة أسره للعبّاس رُويت عن عبد الله بن عبّاس من غير وجه، انظر "مسند أحمد" 5/ (3310).
6195 - Null
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6197 - Null
6195 - سمعتُ أبا العبّاس محمد بن يعقوب يقول: سمعتُ العبّاس بن محمد الدُّورِي يقول: سمعتُ يحيى بن مَعِين يقول: أبو اليَسَر كعبُ بن عمرو تُوفِّي سنة خمس وخمسين بالمدينة، وهو آخرُ أهل بدرٍ وفاةً.
ইয়াহইয়া ইবনে মাঈন থেকে বর্ণিত, আবু আল-ইয়াসার কা'ব ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঁয়ষট্টি (৫৫) হিজরি সনে মদীনায় ইন্তেকাল করেন। বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের মধ্যে তিনিই ছিলেন সর্বশেষ মৃত্যুবরণকারী।
6196 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتَيبة، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الله بن نُمَير قال: مات أبو اليَسَر كعبُ بن عمرو بن عبَّاد بن عمرو بن سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة بن سعد بن غَنْم بن أَسد بن جُشَم بن الخَزرَج سنة خمس وخمسين بالمدينة.
মুহাম্মদ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবুল ইয়াসার কা'ব ইবনে আমর ইবনে আব্বাদ ইবনে আমর ইবনে সাওয়াদ ইবনে গানম ইবনে কা'ব ইবনে সালামা ইবনে সা'দ ইবনে গানম ইবনে আসাদ ইবনে জুশাম ইবনে খাযরাজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঁয়ষট্টি (৫৫) হিজরি সনে মদীনায় মৃত্যুবরণ করেন।
6197 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مُصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: أبو اليَسَر كعب بن عمرو بن عبَّاد بن عمرو بن سَوَاد بن غَنْم بن كعب بن سَلِمة بن غَنْم بن أَسد بن جُشَم بن الخَزرَج. ذكرُ مناقب عبد الله بن حَوَالة الأَزْدي رضي الله عنه -
৬১৯৭ - আমাকে বর্ণনা করেছেন আবু বকর ইবনু বালায়ওয়াইহি, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী, তিনি বলেন: আবুল ইয়াসার কা‘ব ইবনু আমর ইবনু আব্বাদ ইবনু আমর ইবনু সাওয়াদ ইবনু গানম ইবনু কা‘ব ইবনু সালামা ইবনু গানম ইবনু আসাদ ইবনু জুশাম ইবনু আল-খাযরাজ। আব্দুল্লাহ ইবনু হাওয়ালাহ আল-আযদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদাসমূহ উল্লেখ।
6198 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، قال: مات أبو محمد عبد الله بن حَوَالة الأَزْدي صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو من بني المَعِيص [1] بن عامر بن لُؤَي في سنة ثمان وخمسين وهو ابن ثلاث وتسعين سنة [2]. ذكرُ مناقب حُوَيطِب بن عبد العُزَّى العامري رضي الله عنه -
আব্দুল্লাহ ইবনু হাওয়ালা আল-আযদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [মুহাম্মাদ ইবনু উমার] বলেন: আবু মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ ইবনু হাওয়ালা আল-আযদি, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবী এবং যিনি বনী মা'য়ীস ইবনু আমির ইবনু লুয়াই গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, তিনি আটান্ন (৫৮) হিজরি সনে নিরানব্বই (৯৩) বছর বয়সে ইনতিকাল করেন। হুওয়াইতিব ইবনু আব্দুল উযযা আল-আমিরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদাসমূহ আলোচনা।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] رسم هذا اللفظ في نسخنا الخطية: النقص، وهو تحريف والصواب ما أثبتناه. قال ابن دريد في "الاشتقاق" ص 111: واشتقاق معيص من المَعْص، والمعص: وجع يصيب الرجل في عَصَبه من كثرة المشي.
[2] كذا وقع عند المصنّف بزيادة نسبته إلى الأزد في قول محمد بن عمر الواقدي، والصواب إسقاطها فإنه نسبه إلى بطنٍ من قريش، وأما الذي نسبه إلى الأزد فهو الهيثم بن عدي كما في "الطبقات" لابن سعد 9/ 417 و "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 394، قال ابن عبد البر: وهو الأشهر في ابن حوالة أنه أزدي، ويشبه أن يكون حليفًا لبني عامر بن لؤي.
6199 - حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبَيري قال: حُوَيطِب بن عبد العزَّى بن أبي قيس بن عبدِ وَدَّ بن نصر بن مالك بن حِسْل، من مُسلِمة الفتح، مات في آخر إمارة معاوية وهو ابن عشرين ومئة سنة، أمُّه وأمُّ أخيه رُهْم بن عبد العزَّى: زينبُ بنت علقمة بن غَزْوان بن يَربُوع بن مُنقِذ بن عمرو بن مَعِيص [1]، وكان حُويطِبٌ باع من معاوية دارًا بالمدينة بأربعين ألفَ دينار، فاستَشرَف الناسُ لذلك، فقال: وما أربعون ألفَ دينارٍ لرجل له أربعةٌ من العِيال؟ [2]
মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, হুওয়াইতিব ইবনু আব্দুল উযযা ইবনু আবী ক্বায়স ইবনু আবদি ওয়াদ্দ ইবনু নসর ইবনু মালিক ইবনু হিসল। তিনি মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণকারীদের অন্তর্ভুক্ত। তিনি মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের শেষদিকে মৃত্যুবরণ করেন। তখন তাঁর বয়স হয়েছিল একশো বিশ বছর। তাঁর এবং তাঁর ভাই রুহম ইবনু আব্দুল উযযার মা হলেন: যাইনাব বিনতু আলক্বামাহ ইবনু গাযওয়ান ইবনু ইয়ারবূ‘ ইবনু মুনকিয ইবনু আমর ইবনু মা‘ঈস। হুওয়াইতিব মদীনাতে তাঁর একটি বাড়ি মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চল্লিশ হাজার দীনারের বিনিময়ে বিক্রি করেছিলেন। লোকেরা এ দেখে বিস্মিত হলো। তখন তিনি বললেন: যার চারজন পোষ্য (পরিবার/সন্তান) রয়েছে, তার জন্য চল্লিশ হাজার দীনার এমন কী বেশি?
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: محيص. ومعيص هذا: هو ابن عامر بن لؤي. الزنجي، عن ابن أبي نجيح، به. فقرن بمسلم الزنجي داودَ العطار وحمل روايته على روايته، وهو خطأ، ولعله من يعقوب بن أبي عباد - وهو يعقوب بن إسحاق بن أبي عباد - وهو صدوق لا بأس به، إلّا أنه خولف في رواية داود بن عبد الرحمن.فقد رواه ثلاثة غيره لا بأس بهم عن داود العطار، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن ابن أبي نجيح، عن حويطب بن عبد العزى قال: كان في الجاهلية في الكعبة حَلَقٌ أمثال لُجُم البُهْم، يُدخل الخائف فيها يده فلا يريبه أحد، فلما كان ذات يوم ذهب خائف ليُدخل يده فيها فاجتبذه رجل فشَلَّتَ يده، فأدركه الإسلام وإنه لأشلُّ. أخرجه الأزرقي 1/ 167 و 2/ 24، وابن أبي الدنيا (311)، وابن المنذر في "تفسيره" (733). فهذا داود العطار قد رواه عن ابن أبي جريج بواسطة ابن خثيم، وجاء به بلفظ يخالف لفظ مسلم الزنجي.وخالف معمرٌ في لفظه فرواه عنه عبد الرزاق في "مصنفه" (8866) عن ابن خثيم، قال: أخبرني أبو نجيح عن حويطب بن عبد العزى أنَّ أَمَة في الجاهلية عاذت بالبيت، فجاءت سيدتها فجبذتها، فشَلَّت يدها، قال: ولقد جاء الإسلام وإن يدها لشلّاء.وقد روى عبد الرزاق في "مصنفه" (8865) عن معمرٍ، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه قال: كان أهل الجاهلية لا يصيبون في الحرم شيئًا إلّا عُجّل لهم.ونقل ابن حجر في "الفتح" 11/ 297 عن كتاب "مجابي الدعوة" لابن أبي الدنيا في قصة طويلة في معني سرعة الإجابة بالحرم للمظلوم فيمن ظلمه، قال: فقال عمر: كان يُفعَل بهم ذلك في الجاهلية ليتناهَوْا عن الظلم، لأنهم كانوا لا يعرفون البعث، فلما جاء الإسلام أُخِّر القصاص إلى يوم القيامة.
[2] هو في "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 42 وزاد فيه بين يربوع ومنقذٍ الحارثَ.وقصة بيعه دارًا من معاوية ستأتي عند المصنّف قريبًا برقم (6203) من رواية ابن أبي الزناد عن أبيه، وذكر أنها بمكة لا بالمدينة. الزنجي، عن ابن أبي نجيح، به. فقرن بمسلم الزنجي داودَ العطار وحمل روايته على روايته، وهو خطأ، ولعله من يعقوب بن أبي عباد - وهو يعقوب بن إسحاق بن أبي عباد - وهو صدوق لا بأس به، إلّا أنه خولف في رواية داود بن عبد الرحمن.فقد رواه ثلاثة غيره لا بأس بهم عن داود العطار، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن ابن أبي نجيح، عن حويطب بن عبد العزى قال: كان في الجاهلية في الكعبة حَلَقٌ أمثال لُجُم البُهْم، يُدخل الخائف فيها يده فلا يريبه أحد، فلما كان ذات يوم ذهب خائف ليُدخل يده فيها فاجتبذه رجل فشَلَّتَ يده، فأدركه الإسلام وإنه لأشلُّ. أخرجه الأزرقي 1/ 167 و 2/ 24، وابن أبي الدنيا (311)، وابن المنذر في "تفسيره" (733). فهذا داود العطار قد رواه عن ابن أبي جريج بواسطة ابن خثيم، وجاء به بلفظ يخالف لفظ مسلم الزنجي.وخالف معمرٌ في لفظه فرواه عنه عبد الرزاق في "مصنفه" (8866) عن ابن خثيم، قال: أخبرني أبو نجيح عن حويطب بن عبد العزى أنَّ أَمَة في الجاهلية عاذت بالبيت، فجاءت سيدتها فجبذتها، فشَلَّت يدها، قال: ولقد جاء الإسلام وإن يدها لشلّاء.وقد روى عبد الرزاق في "مصنفه" (8865) عن معمرٍ، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه قال: كان أهل الجاهلية لا يصيبون في الحرم شيئًا إلّا عُجّل لهم.ونقل ابن حجر في "الفتح" 11/ 297 عن كتاب "مجابي الدعوة" لابن أبي الدنيا في قصة طويلة في معني سرعة الإجابة بالحرم للمظلوم فيمن ظلمه، قال: فقال عمر: كان يُفعَل بهم ذلك في الجاهلية ليتناهَوْا عن الظلم، لأنهم كانوا لا يعرفون البعث، فلما جاء الإسلام أُخِّر القصاص إلى يوم القيامة.
6200 - حَدَّثَنَا الشيخ الإمام أبو بكر بن إسحاق، حَدَّثَنَا أحمد بن علي الخَزَّاز، حَدَّثَنَا داود بن مِهران الدَّبّاغ، حَدَّثَنَا مُسلم بن خالد الزَّنْجي، عن ابن أبي نَجِيح، عن أبيه، عن حُوَيطب بن عبد العزّى قال: كنا قعودًا يومًا بفِناء الكعبة في الجاهلية، إذ جاءت امرأةٌ تَعُوذُ بالكعبة من زوجها، فجاء زوجها فمدَّ يدَه إليها، فيَبِسَت يدُه، فلقد رأيته في الإسلام وإنه لأَشلُّ [1].
হুয়াইতিব ইবনু আব্দুল উযযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহেলী যুগে (অর্থাৎ ইসলাম আসার পূর্বে) আমরা একদিন কাবার চত্বরে বসেছিলাম। এমন সময় একজন মহিলা তার স্বামীর কাছ থেকে বাঁচতে কাবার আশ্রয়প্রার্থী হয়ে আসল। তখন তার স্বামী এসে তার দিকে হাত বাড়াল, ফলে সাথে সাথেই তার হাত শুকিয়ে গেল (অবশ হয়ে গেল)। আমি তাকে ইসলামের যুগেও দেখেছি, তখনও তার হাত অবশই ছিল।
تحقيق: الشيخ عادل مرشد، الشيخ د. سعيد اللحام (بالاشتراك)
[1] خبر مضطرب، وهذا إسناد ليِّن من أجل مسلم بن خالد الزَّنجي، ففيه ضعف، وباقي رجاله ثقات إلّا أنَّ أبا نجيح المكي لم يصرح بسماعه له من حويطب. ابن أبي نجيح: هو عبد الله بن يسار المكي.وأخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 25، وابن أبي الدنيا في "العقوبات" (306)، والبغوي في "معجم الصحابة" (551) من طرق عن مسلم بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك الطبراني في "الكبير" (3068) - ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1875) - من طريق يعقوب بن أبي عباد المكي، عن داود بن عبد الرحمن العطار ومسلم بن خالد الزنجي، عن ابن أبي نجيح، به. فقرن بمسلم الزنجي داودَ العطار وحمل روايته على روايته، وهو خطأ، ولعله من يعقوب بن أبي عباد - وهو يعقوب بن إسحاق بن أبي عباد - وهو صدوق لا بأس به، إلّا أنه خولف في رواية داود بن عبد الرحمن.فقد رواه ثلاثة غيره لا بأس بهم عن داود العطار، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن ابن أبي نجيح، عن حويطب بن عبد العزى قال: كان في الجاهلية في الكعبة حَلَقٌ أمثال لُجُم البُهْم، يُدخل الخائف فيها يده فلا يريبه أحد، فلما كان ذات يوم ذهب خائف ليُدخل يده فيها فاجتبذه رجل فشَلَّتَ يده، فأدركه الإسلام وإنه لأشلُّ. أخرجه الأزرقي 1/ 167 و 2/ 24، وابن أبي الدنيا (311)، وابن المنذر في "تفسيره" (733). فهذا داود العطار قد رواه عن ابن أبي جريج بواسطة ابن خثيم، وجاء به بلفظ يخالف لفظ مسلم الزنجي.وخالف معمرٌ في لفظه فرواه عنه عبد الرزاق في "مصنفه" (8866) عن ابن خثيم، قال: أخبرني أبو نجيح عن حويطب بن عبد العزى أنَّ أَمَة في الجاهلية عاذت بالبيت، فجاءت سيدتها فجبذتها، فشَلَّت يدها، قال: ولقد جاء الإسلام وإن يدها لشلّاء.وقد روى عبد الرزاق في "مصنفه" (8865) عن معمرٍ، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه قال: كان أهل الجاهلية لا يصيبون في الحرم شيئًا إلّا عُجّل لهم.ونقل ابن حجر في "الفتح" 11/ 297 عن كتاب "مجابي الدعوة" لابن أبي الدنيا في قصة طويلة في معني سرعة الإجابة بالحرم للمظلوم فيمن ظلمه، قال: فقال عمر: كان يُفعَل بهم ذلك في الجاهلية ليتناهَوْا عن الظلم، لأنهم كانوا لا يعرفون البعث، فلما جاء الإسلام أُخِّر القصاص إلى يوم القيامة.