হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8862)


8862 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن أحمد بن عَتَّابِ العَبْدي [1]، حدثنا يحيى بن جعفر بن أبي طالب، حدثنا علي بن عاصم، عن داود بن أبي هِند، عن أبي حَرْب بن أبي الأسود، حدثني طَلْحة النَّصْري [2]، قال: كان الرجلُ منا إذا قَدِمَ المدينة فكان له بها عَريفٌ نزل على عريفه، وإن لم يكن له بها عريفٌ نزل الصُّفّةَ، فقدمتُ المدينةَ ولم يكن لي بها عريفٌ، فنزلتُ الصُّفّةَ، وكان يجيءُ علينا من رسول الله صلى الله عليه وسلم كلَّ يومٍ مُدٌّ من تمرٍ بين اثنين، ويَكسُونا الخُنُفَ، فصلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بعضَ صلوات النهار، فلما سلَّم ناداه أهلُ الصفة يمينًا وشِمالًا: يا رسولَ الله، أحرَقَ بطونَنا التمرُ، وتخرَّقَت عنا الخُنُفُ، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى منبره فصَعِدَ فَحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم ذكر شدَّةَ ما لقي من قومه، حتى قال: "ولقد أَتى عليَّ وعلى صاحبِي بضعَ عشرةَ ما لي وله طعامٌ إلَّا البَرِيرُ" - قال: فقلت لأبي حربٍ: وأيُّ شيءٍ البريرُ؟ قال: طعامُ سَوءٍ؛ ثمرُ الأَراك - فقَدِمْنا على إخواننا هؤلاءِ من الأنصار وعظيمُ طعامِهم التمرُ، فواسَوْنا فيه، ووالله لو أَجِدُ لكم الخبزَ واللحمَ لأَشبعتُكم منه، ولكن عسى أن تُدرِكوا زمانًا - أو من أدركه منكم - يُغدَى ويُراحُ عليكم بالجِفَان، وتَلبَسون مثلَ أستار الكعبة".قال داود قال لي أبو حَرْب: يا داود، وهل تدري ما كان أستارُ الكعبة يومئذٍ؟ قلت: لا، قال: ثيابٌ بِيضٌ كان يُؤتَى بها من اليمن. قال: داود: فحدَّثتُ بهذا الحديث الحسنَ بن [أبي] [3] الحسن، فقال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنتم اليومَ خيرٌ منكم يومئذٍ، أنتم اليومَ إخوانٌ بنِعْمة الله، وأنتم يومئذٍ أعداءٌ يضربُ بعضُكم رقابَ بعض" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালহা আন-নাসরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কোনো ব্যক্তি যখন মদিনায় আসত এবং সেখানে তার কোনো তত্ত্বাবধায়ক (আরিফ) থাকত, সে তার তত্ত্বাবধায়কের কাছে থাকত। আর যদি তার সেখানে কোনো তত্ত্বাবধায়ক না থাকত, তবে সে সুফ্ফায় (মসজিদে নববীর বারান্দায়) থাকত। আমি মদিনায় আগমন করলাম, তখন আমার কোনো তত্ত্বাবধায়ক ছিল না, তাই আমি সুফ্ফায় উঠলাম।

প্রতিদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পক্ষ থেকে আমাদের জন্য দুইজনের মাঝে এক মুদ্দ পরিমাণ খেজুর আসত এবং তিনি আমাদের মোটা চট বা কাপড়ের পোশাক (খুনুফ) দিতেন।

একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনের কোনো এক সালাত আমাদের নিয়ে আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন সুফ্ফাবাসীরা ডান ও বাম দিক থেকে তাঁকে ডাকলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! খেজুর আমাদের পেট জ্বালিয়ে দিয়েছে (ক্ষুধার তীব্রতায়) এবং আমাদের এই চটের পোশাকগুলো ছিঁড়ে গেছে।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মিম্বরের দিকে দাঁড়ালেন এবং তাতে আরোহণ করলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর কওমের পক্ষ থেকে যে কঠিন দুঃখ-কষ্ট ভোগ করেছিলেন, তা উল্লেখ করে বললেন: "আমার ও আমার সঙ্গীর উপর বেশ কয়েক দিন এমন কেটেছে যখন আমার ও তার জন্য ‘বারীর’ ছাড়া অন্য কোনো খাবার ছিল না।" (রাবী) বলেন, আমি আবূ হারবকে জিজ্ঞেস করলাম, ‘বারীর’ কী? তিনি বললেন, এটা খারাপ খাবার; আরাক গাছের ফল। (অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন) "এরপর আমরা আমাদের এই আনসার ভাইদের কাছে আসলাম, যাদের প্রধান খাবার ছিল খেজুর। তারা আমাদের এতে সান্ত্বনা দিয়েছেন। আল্লাহর শপথ! যদি আমি তোমাদের জন্য রুটি ও মাংসের ব্যবস্থা করতে পারতাম, তবে অবশ্যই তোমাদের তা দ্বারা পরিতৃপ্ত করতাম। কিন্তু সম্ভবত তোমরা এমন যুগ পাবে—অথবা তোমাদের মধ্যে যে তা পাবে—যখন সকাল-সন্ধ্যায় বড় বড় থালায় তোমাদের খাবার পরিবেশন করা হবে এবং তোমরা কা’বার পর্দার মতো পোশাক পরিধান করবে।"

দাঊদ বলেন, আবূ হারব আমাকে বললেন, হে দাঊদ! তুমি কি জানো সেই সময় কা’বার পর্দা কেমন ছিল? আমি বললাম, না। তিনি বললেন, ইয়েমেন থেকে আনা সাদা কাপড়।

দাঊদ বলেন, আমি এই হাদীসটি হাসান ইবন আল-হাসানকে শোনালাম। তিনি বললেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছিলেন: "তোমরা আজ তোমাদের সেই দিনের চেয়ে উত্তম হবে। তোমরা আজ আল্লাহর অনুগ্রহে ভাই ভাই। আর তোমরা সেই দিন ছিলে শত্রু, তোমরা একে অপরের গর্দান মারতে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ز) و (ب): المكي، والمثبت من (ك) و (م)، وهو الصواب الموافق لما في ترجمته من "تاريخ بغداد" 3/ 476 وغيره، فهذا الرجل بغداديّ لا مكيّ.



[2] بالنون والصاد المهملة، هكذا ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 390، نسبة إلى نصر بن معاوية من هوازن، وفي نسخنا الخطية: البصري، بالباء فالصاد، وهو صحيح أيضًا، فقد ذكر ابن حبان في "الثقات" 3/ 204 أنه سكن البصرة، إلّا أنَّ النسبة إلى القبيلة في المتقدمين عادةً أشهر من النسبة إلى البلدان.



8862 [3] - زيادة لا بد منها ليست في نسخنا الخطية، فالحسن بن أبي الحسن هذا: هو الحسن البصري، واسم أبيه أبي الحسن: يسار. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.



8862 [4] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل علي بن عاصم، ففيه ضعف إلّا أنه يعتبر به. وقد سلف الحديث من طريقه وطريق غيره برقم (4336)، فانظر تمام تخريجه والكلام عليه هناك. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.