হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8897)


8897 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا محمد بن سعد العَوْفي، حدثنا يعقوب بن عيسى، حدثنا عبد الرحمن بن المغيرة [عن عبد الرحمن بن عيَّاش] [1] عن دَلْهَم بن الأسود، عن عبد الله بن الأسود بن عامر اليَحصُبي [2]، عن عمِّه لَقِيط بن عامر: أنه خرج وافدًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم ومعه نَهيكُ بن عاصم بن عن مالك بن المُنتفق، قال: فقَدِمْنا المدينةَ لانسلاخ رَجَب، فصلَّينا معه صلاةَ الغَدَاة، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم في الناس خطيبًا، فقال: "أيها الناسُ، إني قد خَبَاتُ لكم صوتي منذُ أربعةِ أيام لأُسمعكم، فهل من امرئٍ بَعَثَه قومُه، قالوا: اعلَمْ لنا ما يقولُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم لعله أن يُلهيه حديثُ نفسه أو حديثُ صاحبِه، أو يُلهِيَه الضَّلَالُ؟ أَلَا إِني مسؤولٌ، هل بلَّغتُ؟ ألَا فاسمَعوا تَعيشوا، ألَا فاسمَعوا تَعيشوا، ألَا اجلِسوا فجلس الناس، وقمتُ أنا وصاحبي.حتى إذا فرَّغ لنا فؤادَه وبصرَه قلت: يا رسول الله إني أسألك عن حاجَتي، فلا تَعجَلَنَّ عليَّ، قال: "سَلْ عمَّا شئتَ" قلت: يا رسول الله، هل عندك من علمِ الغيب؟ فضَحِكَ لَعَمْرُ الله وهزَّ رأسَه وعَلِمَ أني أبتغي بسَقَطِه [3]، فقال: "ضَنَّ ربُّك بمفاتيحِ خمسٍ من الغيب، لا يعلمُهنَّ إِلَّا الله " وأشار بيده فقلت: وما هنَّ يا رسول الله؟ قال: "عِلمُ المَنِيَّةِ، قد عَلِمَ متى مَنيَّةُ أحدِكم ولا تعلمونه، وعِلمُ يوم الغَيْث، يُشرف عليكم آزِلينَ [4] مُشفقين، فظلَّ يَضحَك وقد عَلِمَ أَنَّ غِيَرَكم [5] قريب" قال لَقِيط: فقلت: يا رسول الله، لن نَعدَمَ من ربٍّ يضحك خيرًا "وعِلمُ ما في غدٍ، قد عَلِمَ ما أنت طاعمٌ في غدٍ ولا تَعلمُه، وعِلمُ يومِ الساعة"، قال: وأَحسَبُه ذكرَ ما في الأرحام.قال: فقلنا: يا رسول الله، علِّمْنا ممّا يَعلمُ الناسُ، وما نَعلمُ، فإنا من قَبيلٍ لا يُصدقون تصديقنا أحدٌ من مَدْحِجَ التي تَدْنُو إلينا، وخَثعَمَ التي تُوالِينا [6]، وعَشيرتِنا [-4] التي نحن منها، قال: "تَلبَثون ما لَبِثْتُم، ثم يُتوفَّى نبيُّكم، ثم تَلبَثون ما لَبِثتم، ثم تُبعَثُ الصَّيحةُ، فَلَعَمْرُ الهِكَ ما تَدَعُ على ظهر الأرض شيئًا إلَّا مات، والملائكةُ الذين مع ربِّك، فخَلَتِ الأرضُ، فأرسل ربُّك السماءَ بهَضْبٍ [-4] من تحت العرش، فلَعَمرُ إِلهِكَ ما تَدَعُ على ظهرها من مَصرَعِ قتيلٍ، ولا مَدفَنِ مِيتٍ، إِلَّا شَقَّت القبرَ عنه، حتى يَخلُقَه من قِبَلِ رأسه، فيستوي جالسًا، يقول ربُّكَ: مَهْيَمُ [-4]؟ فيقول: يا ربِّ، أمسِ، لعَهدِه بالحياة يَحسَبُه حديثًا بأهله".فقلت: يا رسول الله، كيف يَجمعُنا بعدما تُمزِّقنا الرِّياحُ والبِلَى والسِّباع؟! قال: "أُنبَّتُك بمِثْل ذلك في آلاءِ الله [-4]؛ الأرضُ أشرَفتَ عليها مَدَرةً باليةً فقلت: لا تَحْيا أبدًا، فأرسَلَ ربُّك عليها السماءَ، فلم تَلبَثْ عليها أيامًا حتى أشرَفَت عليها فإذا هي شَرَبَةٌ [-4] واحدةٌ، ولَعَمرُ إلهِكَ لهو أقدرُ على أن يجمعكم من [-4] الماء على أن يجمعَ نباتَ الأرض، فتخرجون من الأصْواءِ [-4] من مَصارعِكم فتنظرون إليه ساعةً ويَنظُر إليكم "قال: قلت: يا رسول الله، كيف وهو شخصٌ واحد ونحن مِلءُ الأرض، نَنظُر إليه ويَنظُر إلينا؟! قال: "أنبِّئُك بمثل ذلك في إِلِّ الله؛ الشمسُ والقمرُ آيةٌ منه قريبةٌ صغيرة، ترونَهما في ساعة واحدة ويَرَيانِكم، ولا تَضَامُّون في رؤيِتهما، ولَعَمرُ إلهَكَ لهو على أن يراكم وترونَه أقدرُ منهما على أن يريانِكم وترونَهما.قلت: يا رسول الله، فما يفعل بنا ربُّنا إذا لَقِيناه؟ قال: "تُعرضون عليه باديةً له صَفَحاتُكم ولا تَخفَى عليه منكم خافيةٌ، فيأخذُ ربُّك بيده غَرْفةً من الماء فيَنضَحُ بها قِبَلَكم [-4]، فَلَعَمرُ إلهِكَ ما تُخطئ وجهَ واحدٍ منكم قَطْرةٌ، فأما المؤمنُ فتَدَعُ وجهَه مِثلَ الرَّيْطة البيضاء، وأما الكافرُ فتَخطِمُه بمثل الحُمَم الأَسود [-4]، ثم ينصرفُ نبيُّكم فيمرُّ على أثَرِه الصالحون - أو قال: ينصرف على أثره الصالحون. قال: فيسَلُكون جسرًا من النار، يَطأُ أحدُكم الجَمْرةَ فيقول: حَسِّ، فيقول ربُّك: أوانُه [-4] ".قال: "فيَطَّلعون على حوض الرسول على أظمأِ ناهلةٍ واللهِ رأيتها قطُّ، فَلَعَمرُ إلهِكَ ما يَبسُط - أو قال: ما يُسقط - واحدٌ منكم يدَه إِلَّا وَقَعَ عليها قَدَحْ يطهِّرُه من الطَّوْفِ [-4] والبولِ والأذى، وتَخلُصُ الشمس والقمرُ - أو قال: تُحبَس الشمسُ والقمر فلا ترون منهما واحدًا" فقلت: يا رسول الله، فبِمَ نُبصِرُ يومئذٍ؟ قال: "مِثلَ بَصَرِ ساعتِك هذه، وذلك في يومٍ أسفَرَتْه الأرضُ وتراخَتْه الجبالُ".قلت: يا رسول الله، فيمَ نُجازَى من سيئاتنا وحسناتنا؟ قال: "الحسنةُ بعشر أمثالِها، والسيئةُ بمثلِها أو تُغفَر".قلت: يا رسول الله، فما الجنةُ وما النار؟ قال: "لَعَمْرُ إِلهِكَ، إِنَّ الجنة لها [ثمانية] أبواب ما منهنَّ بابان إلَّا وبينهما مسيرةُ الراكب سبعين عامًا"، وإنَّ للنار سبعة أبواب، ما منهنَّ بابان إلَّا وبينهما مسيرة الراكب سبعين عامًا" قلت: يا رسول الله على ما يُطَّلع من الجنة؟ قال: "أنهارٍ من عسل مُصفًّى، وأنهارٍ من لبن لم يتغيَّرْ طعمُه، وأنهارٍ من كأسٍ ما لها صُداعٌ ولا نَدامةٌ، ومن ماءٍ غيرِ آسِنٍ، وبفاكهةٍ - لَعَمرُ إلهِكَ. ما تعلمون وخير من مثله معه أزواجٌ مُطَهَّرة" قلت: يا رسول الله، أوَلَنا فيها أزواجٌ مُصلِحات؟ قال: "الصالحاتُ للصالحين، تَلَدُّونَهنَّ مثلَ لَذَّاتِكم في الدنيا ويَلذَذْنكم، غير أنه لا تَوالُدَ": قلت: يا رسول الله، هذا أقصى [-4] ما نحن بالغون ومُنتَهُون، إليه؟ قلت: يا رسول الله على ما أبايعُك؟ قال: فبَسَط يدَه وقال: "على إقام الصلاة، وإيتاء الزكاة، وإياكَ والشِّركَ، لا تُشرِكْ بالله شيئًا" أو "لا تُشْرِكْ مع الله إلهًا غيرَه" فقلت: وإنَّ لنا ما بينَ المشرقِ والمغرب؟ فَقَبَضَ وبَسَطَ أصابعه، فظنّ أني مشترطٌ شيئًا لا يُعطينيه، فقلت: نَحُلُّ منها حيثُ شئنا، ولا يَجْني على امرئٍ إلَّا نفسُه، قال: "ذلك لك، حُلَّ منها حيثُ شئتَ، ولا تَجْني عليك إلَّا نفسك"، فبايعناه ثم انصرَفْنا، فقال: "ها، إنَّ ذَيْنِ [-4] -ثلاثًا- لمن نفر هم أصدقُ الناسِ حديثًا، لأنهم من أَتقى الناسِ الله في الأوّل والآخِر"، فقال كعبُ بن فلانٍ أحد بني بكرِ بن كِلابَ: مَن هم يا رسول الله؟ قال: بنو المُنتفِق".فأقبلتُ عليه فقلت: يا رسول الله، هل لأحدٍ [-4] ممَّن مضى منَّا في جاهلية من خير؟ فقال رجلٌ من عُرْض قُريش: إِنَّ أباك المُنتفِقَ في النار، فكأنه وقع حَرٌّ بين جلدِ وجهي ولحمي، مما قال لأَبي على رؤوس الناس، فهَمَمتُ أن أقول: وأبوك يا رسولَ الله؟ ثم نظرتُ فإذا الأُخرى أَجملُ، فقلت: وأهلُك [-4] يا رسول الله؟ فقال: "وأهلي لَعَمرُ اللهِ، ما أَتيتَ عليه من قبرِ قرشيٍّ أو عامريٍّ مشرِكٍ فقل: أرسَلَني إليك محمدٌ، فأَبشِرْ بما يسُوؤُك، تُجَرُّ على وجهِك وبطنِك في النار" فقلت: فيمَ أفعلُ ذلك لهم يا رسولَ الله وكانوا على عملِ يَحسبَون أنْ لا إيَّاهُ، وكانوا يَحْسَبُونهم مُصلِحين؟! قال: "ذلك بأنَّ الله بعثَ في آخرِ كلِّ سبعِ أُممٍ نبيًّا، فمَن أطاع نبيَّه كان من المهتدِين، ومن عصى نبيَّه كان من الضالِّين" [-4]. هذا حديث جامعٌ في الباب، صحيح الإسناد، كلُّهم مدنيُّون، ولم يُخرجاه.




লক্বীত ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রতিনিধি হিসেবে বের হলেন, তার সাথে ছিলেন নাহীক ইবন আসিম ইবন মালিক ইবনুল মুন্তাফিক। তিনি (লক্বীত) বলেন: আমরা রজব মাসের শেষ দিকে মদীনায় আগমন করলাম এবং তাঁর সাথে ফজরের সালাত আদায় করলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনগণের মাঝে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! আমি গত চার দিন যাবৎ আমার কণ্ঠস্বর তোমাদের জন্য রক্ষা করে রেখেছিলাম, যাতে তোমরা শুনতে পাও। এমন কি কেউ আছে, যাকে তার কওম এই বলে পাঠিয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলছেন তা আমাদের জন্য জেনে নাও? এরপর হয়তো তার নিজের কথা, বা তার সঙ্গীর কথা তাকে ভুলিয়ে দেবে, কিংবা ভ্রষ্টতা তাকে ভুলিয়ে দেবে? সাবধান! আমার নিকট জিজ্ঞাসা করা হবে, আমি কি পৌঁছাতে পেরেছি? শুনে নাও, তবেই তোমরা বাঁচবে! শুনে নাও, তবেই তোমরা বাঁচবে! শোনো, তোমরা বসে যাও।" তখন লোকেরা বসে গেল, আর আমি ও আমার সঙ্গী দাঁড়িয়ে রইলাম।

যখন তিনি আমাদের প্রতি মন ও দৃষ্টি নিবদ্ধ করলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি আপনাকে আমার প্রয়োজন সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে চাই, আপনি আমার উপর তাড়াতাড়ি করবেন না। তিনি বললেন: "যা খুশি জিজ্ঞাসা করো।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনার কাছে কি গায়েবী জ্ঞান আছে? আল্লাহর কসম! তিনি হাসলেন এবং মাথা নাড়লেন। তিনি বুঝলেন যে, আমি অপ্রত্যাশিত কথা জিজ্ঞেস করেছি। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমার প্রতিপালক পাঁচটি গায়েবের চাবি গোপন রেখেছেন, যা একমাত্র আল্লাহ ব্যতীত আর কেউ জানেন না।" এই বলে তিনি হাত দিয়ে ইশারা করলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! সেগুলো কী?

তিনি বললেন: "মৃত্যুর জ্ঞান (যা তিনি জানেন তোমাদের কার মৃত্যু কখন হবে, অথচ তোমরা তা জানো না), এবং বৃষ্টির দিনের জ্ঞান (যখন তোমরা হতাশ ও আশঙ্কাপূর্ণ অবস্থায় থাকো, কিন্তু তিনি হাসতে থাকেন, কেননা তিনি জানেন তোমাদের পরিবর্তন (বৃষ্টি) আসন্ন)।" লক্বীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! যে রব হাসেন, তাঁর নিকট থেকে আমরা কল্যাণের কমতি দেখব না। (আর তৃতীয়টি হলো) "আগামীকালের জ্ঞান (তিনি জানেন আগামীকাল তুমি কী খাবে, অথচ তুমি তা জানো না), এবং কিয়ামতের জ্ঞান।" বর্ণনাকারী বলেন: আমার মনে হয়, তিনি গর্ভাশয়ের বিষয়ও উল্লেখ করেছিলেন।

আমরা বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! যে জ্ঞান মানুষ জানে এবং যা আমরা জানি না, তা আমাদেরকে শিক্ষা দিন। কারণ, আমরা এমন গোত্রের লোক, যাদের নিকটবর্তী মাযহিজ ও আমাদের মিত্র খাস'আম গোত্রের কেউ আমাদের এই সাক্ষ্যকে বিশ্বাস করে না, এমনকি আমাদের নিজেদের গোত্রের লোকেরাও না।

তিনি বললেন: "তোমরা যত দিন থাকো, ততদিন থাকবে। এরপর তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃত্যু হবে। এরপর তোমরা যত দিন থাকো, ততদিন থাকবে। অতঃপর সেই বিকট শব্দ (শিঙায় ফুৎকার) আসবে। আপনার রবের কসম! তা পৃথিবীর উপরিভাগে কোনো কিছুকে জীবিত রাখবে না, সব মরে যাবে—এমনকি আপনার রবের সাথে যে ফিরিশতারা আছেন তারাও। পৃথিবী শূন্য হয়ে যাবে। অতঃপর আপনার রব আরশের নিচ থেকে প্রবল বৃষ্টিসহ আকাশকে প্রেরণ করবেন। আপনার রবের কসম! ভূপৃষ্ঠের উপর নিহতদের শয়নস্থল বা মৃতদের কবরস্থান কোনোটিই বাকি রাখবে না, বরং সব কবর ফেটে যাবে। এমনকি তার মাথার দিক থেকে তাকে সৃষ্টি করে (শরীর সম্পূর্ণ করে) তিনি সোজা হয়ে বসে যাবেন। আপনার রব বলবেন: কী ব্যাপার? তখন সে বলবে: হে রব! গতকাল (এখনোই উঠলাম)! পার্থিব জীবনের সাথে তার এই সদ্য সম্পর্ক থাকার কারণে সে মনে করবে এটি তার পরিবারের একটি নতুন আলোচনা।"

আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! বাতাস, ক্ষয় এবং হিংস্র প্রাণীরা ছিন্নভিন্ন করার পর তিনি কীভাবে আমাদের একত্র করবেন? তিনি বললেন: "আল্লাহর কুদরতের উদাহরণ দিয়ে আমি তোমাকে এর খবর দিচ্ছি: তুমি যখন জীর্ণ, পুরাতন মাটির দিকে তাকাও, তখন বলো: এটা আর কখনোই জীবন লাভ করবে না। অতঃপর তোমার রব তার উপর আকাশ (বৃষ্টি) প্রেরণ করেন। তারপর কিছুদিন অতিবাহিত হতে না হতেই যখন তুমি তার দিকে তাকাও, তখন দেখবে তা সতেজ শস্যে পরিণত হয়েছে। আর তোমার রবের কসম! মাটির উদ্ভিদকে একত্র করার চেয়ে তোমাদের একত্র করার ক্ষমতা সেই পানির প্রতি তাঁর বেশি। অতঃপর তোমরা তোমাদের শয়নস্থল থেকে (কবরের) গর্তসমূহ থেকে বের হবে। তোমরা ক্ষণিকের জন্য তাঁর (আল্লাহর) দিকে তাকাবে, আর তিনিও তোমাদের দিকে তাকাবেন।"

তিনি বলেন: আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! তিনি তো একজন মাত্র সত্তা, আর আমরা পৃথিবীতে পরিব্যাপ্ত। আমরা সবাই তাঁর দিকে তাকাব আর তিনিও আমাদের দিকে তাকাবেন—এটা কীভাবে সম্ভব? তিনি বললেন: "আল্লাহর শক্তির উদাহরণ দিয়ে আমি তোমাকে এর খবর দিচ্ছি: চাঁদ ও সূর্য আল্লাহর একটি নিকটবর্তী ও ছোট নিদর্শন। তোমরা একই সময়ে তাদের দু'জনকে দেখো এবং তারাও তোমাদের দেখতে পায়। তাদের দেখতে তোমাদের কোনো ভিড় হয় না। আর তোমার রবের কসম! তারা তোমাদের দেখুক আর তোমরা তাদের দেখো—এর চেয়ে বরং তিনি তোমাদের দেখেন এবং তোমরা তাঁকে দেখো—এর ক্ষমতা তাঁর অধিক।

আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! যখন আমরা তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করব, তখন আমাদের প্রতি আমাদের রব কী করবেন? তিনি বললেন: "তোমাদের পৃষ্ঠদেশসমূহ তাঁর সামনে উন্মুক্ত করা হবে। তোমাদের কোনো গোপন বিষয়ই তাঁর কাছে গোপন থাকবে না। অতঃপর তোমার রব এক অঞ্জলি পানি নিয়ে তোমাদের দিকে ছিটিয়ে দেবেন। তোমার রবের কসম! তোমাদের একজনেরও মুখমণ্ডল সেই ফোঁটা থেকে বাদ পড়বে না। মু'মিনের মুখমণ্ডলকে তা সাদা চাদরের মতো উজ্জ্বল করে দেবে, আর কাফিরের মুখমণ্ডলকে তা কালিমার মতো কালো করে দেবে। এরপর তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে যাবেন এবং তাঁর পশ্চাতে সৎকর্মশীলগণ পথ ধরে চলবেন। অথবা তিনি বলেছেন: সৎকর্মশীলগণ তাঁর পশ্চাতে ফিরে যাবেন। তিনি বলেন: তারা আগুনের উপর নির্মিত একটি সেতুর উপর দিয়ে অতিক্রম করবেন। তোমাদের কেউ একজন জ্বলন্ত অঙ্গারের উপর পা রাখবে, তখন সে বলবে: আহ্! (কষ্ট হচ্ছে)। তখন তোমার রব বলবেন: এটাই তার সময়।"

তিনি বললেন: "তারা রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাউযের নিকট উপস্থিত হবে—আল্লাহর কসম! এত তৃষ্ণার্ত লোক আমি আর কখনো দেখিনি। তোমার রবের কসম! তোমাদের মধ্যে কেউ হাত বাড়ালেই—অথবা তিনি বলেছেন: হাত নিচে করলেই—তাতে একটি পানপাত্র চলে আসবে, যা তাকে ময়লা, পেশাব ও কষ্ট থেকে পবিত্র করবে। আর সূর্য ও চাঁদ অস্তমিত হবে—অথবা তিনি বলেছেন: সূর্য ও চাঁদকে আটকে রাখা হবে, ফলে তোমরা সে দুটির কোনোটিকেই দেখতে পাবে না।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! সেদিন আমরা কী দিয়ে দেখব? তিনি বললেন: "এই মুহূর্তে তোমার দৃষ্টিশক্তির মতোই, আর তা এমন দিনে হবে যখন জমিন উজ্জ্বল হবে এবং পাহাড়সমূহ বিছিয়ে দেওয়া হবে।"

আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাদের পাপ ও পুণ্যের প্রতিদান কী হবে? তিনি বললেন: "একটি পুণ্যের দশ গুণ এবং পাপের শুধু সমান অথবা তা ক্ষমা করে দেওয়া হবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! জান্নাত ও জাহান্নাম কী? তিনি বললেন: "তোমার রবের কসম! জান্নাতের আটটি দরজা রয়েছে। এর দুটি দরজার মাঝখানে সত্তর বছরের পথ দূরত্ব। আর জাহান্নামের সাতটি দরজা রয়েছে। এর দুটি দরজার মাঝখানে সত্তর বছরের পথ দূরত্ব।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! জান্নাত কিসের উপর নির্মিত? তিনি বললেন: "বিশুদ্ধ মধুর নহরসমূহ, যার স্বাদ পরিবর্তিত হয়নি এমন দুধের নহরসমূহ, এমন শরাবের নহরসমূহ যা পান করলে মাথাব্যথা হয় না ও অনুশোচনা আসে না, এবং অপরিবর্তনীয় পানির নহরসমূহ, আর এমন ফলমূল—তোমার রবের কসম! যা তোমরা জানো না এবং এর চেয়েও উত্তম ফল; আর তার সাথে থাকবে পবিত্র স্ত্রীগণ।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! সেখানে কি আমাদের জন্য সৎ স্ত্রীগণ থাকবেন? তিনি বললেন: "সৎ নারীরা সৎ পুরুষদের জন্য। তোমরা দুনিয়ার আনন্দের মতোই তাদের দ্বারা আনন্দ উপভোগ করবে এবং তারাও তোমাদের দ্বারা আনন্দ পাবে, তবে সেখানে কোনো সন্তান জন্ম হবে না।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! এটাই কি আমাদের শেষ প্রাপ্তি ও গন্তব্যস্থল?

আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি কিসের উপর আপনার হাতে বায়আত করব? তখন তিনি তার হাত বাড়ালেন এবং বললেন: "সালাত কায়েম করা, যাকাত প্রদান করা, আর শিরক থেকে সতর্ক থাকা। আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শিরক করবে না" অথবা তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে অন্য কোনো ইলাহকে শরীক করবে না।" আমি বললাম: আর প্রাচ্য ও পাশ্চাত্যের মধ্যবর্তী সব ভূমি কি আমাদের হবে? তখন তিনি তার আঙ্গুলগুলো গুটিয়ে নিলেন এবং আবার প্রসারিত করলেন। আমি ভাবলাম, হয়তো আমি এমন কিছু শর্ত করছি যা তিনি আমাকে দেবেন না। আমি বললাম: আমরা কি যেখানে খুশি বসবাস করতে পারব, আর কোনো ব্যক্তির অপরাধের বোঝা কি তার নিজের উপর ছাড়া পড়বে না? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তা তোমাদের জন্য। যেখানে খুশি বসবাস করো, আর তোমার উপর তোমার নিজের অপরাধ ছাড়া আর কিছু বর্তাবে না।" অতঃপর আমরা তাঁর হাতে বায়আত করে ফিরে গেলাম। তখন তিনি বললেন: "শোনো! এই দলটি—তিনবার বললেন—যারা সবচেয়ে সত্যবাদী, কারণ তারা প্রথম ও শেষ পর্যন্ত মানুষের মধ্যে আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করে।" তখন কা’ব ইবনু ফুলান, যিনি বানু বকর ইবনু কিলাবের একজন ছিলেন, বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! তারা কারা? তিনি বললেন: বানুল মুন্তাফিক।

এরপর আমি তাঁর দিকে এগিয়ে গিয়ে বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাদের মধ্যে যারা জাহিলিয়্যাতে মারা গেছে, তাদের কি কোনো কল্যাণ হবে? তখন কুরাইশের জনৈক ব্যক্তি পাশ থেকে বলে উঠল: তোমার পিতা মুন্তাফিক তো জাহান্নামে। জনগণের সামনে আমার পিতা সম্পর্কে এই কথা বলায় আমার চেহারা ও চামড়ার মাঝে যেন আগুন লেগে গেল। আমি বলতে উদ্যত হলাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আর আপনার পিতা? কিন্তু আমি চিন্তা করে দেখলাম, অন্য প্রশ্নটি করা উত্তম। তাই আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আর আপনার পরিবার?

তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমার পরিবারও (জাহান্নামে)। তুমি যখনই কোনো কুরাইশী বা আমিরী মুশরিকের কবরের পাশ দিয়ে যাবে, তখনই বলবে: মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তোমার কাছে পাঠিয়েছেন। তাই তুমি এমন সুসংবাদ নাও, যা তোমাকে কষ্ট দেবে—তোমাকে তোমার মুখ ও পেটের উপর ভর করে জাহান্নামে টেনে নিয়ে যাওয়া হবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! কেন তাদের সাথে এমন করা হবে, অথচ তারা এমন আমলের উপর ছিল যা তারা ছাড়া আর কেউ ছিল না বলে ভাবত এবং তারা নিজেদেরকে সৎকর্মশীল মনে করত?! তিনি বললেন: "তা এজন্য যে, আল্লাহ প্রতি সাতটি উম্মতের শেষ ভাগে একজন করে নবী প্রেরণ করেছেন। যে তার নবীর অনুসরণ করেছে, সে হেদায়েতপ্রাপ্তদের অন্তর্ভুক্ত হয়েছে। আর যে তার নবীর অবাধ্য হয়েছে, সে পথভ্রষ্টদের অন্তর্ভুক্ত হয়েছে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من المطبوع ومن مصادر التخريج. أي: عرف أني جئته متكشّفًا عن أمره طالبًا لرديء كلامه، لأعرف به حقيقة أمره.



[2] هكذا في النسخ الخطية، وهو خطأ والصواب: عبد الله بن حاجب بن عامر العُقيلي، وهو جدُّ دلهم بن الأسود، ويحصب قبيلة من حِميَر في اليمن، أما العُقيلي فمنسوب إلى عُقيل بن كعب من بني عامر بن صعصعة بطن من مُضَر، ومنها بنو المنتفِق. أي: عرف أني جئته متكشّفًا عن أمره طالبًا لرديء كلامه، لأعرف به حقيقة أمره.



8897 [3] - في "المسند": لسقطه باللام، قال السندي في "حاشيته": بفتحتين، وهو الرديء من الكلام، أي: عرف أني جئته متكشّفًا عن أمره طالبًا لرديء كلامه، لأعرف به حقيقة أمره.



8897 [4] - أي: صائرين إلى الضِّيق والشِّدة.



8897 [5] - الغِيَر: تغيُّر الحال.



8897 [6] - قوله: "وخثعم التي توالينا" سقط من (ز) و (ب).



8897 [-4] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى وعشيرتها، والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وهو الصواب، فإنَّ عشيرة لَقيط التي هو منها من بني عامر بن صعصعة من مُضَر كما سبق، وأما خثعم فإنهم من كَهلان بن سبأ، وهؤلاء من قحطان، ولا تداخل بينهم في النسب.



8897 [-4] - الهَضْب: المطر.



8897 [-4] - أي: ما أمرُك وما شأنُك؟



8897 [-4] - هكذا في النسخ الخطية ومصادر التخريج والمعنى على هذا في جملة ما أنعم الله به عليكم من المخلوقات، ورواه أهل اللغة كابن قتيبة في "غريب الحديث" 1/ 532 وأبي عبيد الهروي في "الغريبين" 1/ 94 بلفظ: "في إِلِّ الله" وقالوا: معناه: في قدرة الله وإلهيَّته.



8897 [-4] - الشَّرَبَة: حوض يكون في أصل النخلة وحولها يُملأ ماءً لتشربه.



8897 [-4] - في النسخ الخطية: على، والمثبت من "التلخيص".



8897 [-4] - تحرَّف في النسخ إلى الأصوات، والتصويب من مصادر التخريج وكتب الغريب، والأصواء: القبور، قال ابن قتيبة: وأصل الأصواء: الأعلام تُنصَب في الأرض للهُدى، شبّه القبور بها. وفي "تلخيص الذهبي": الأجداث. وهي القبور أيضًا.



8897 [-4] - من قوله: ولا تخفى عليه إلى هنا سقط من (ز) و (ب).



8897 [-4] - في النسخ الخطية فتخطه بمثل حمر الأسود، والمثبت من المطبوع ومصادر التخريج، وهو أَوجه. قال ابن قتيبة في "غريبه" 1/ 535: أي: تصيب حَطمه (وهو الأنف) والحُمَم: الفحم، واحدته: حُمَمَة. والرَّيطة: المُلاءَة.



8897 [-4] - هكذا في النسخ ومصادر التخريج أي هذا أوان وَطْء الجمر والتوجع منه، فإنّ "حَسَّ" كلمة للتأوُّه والتوجع. ورواه أهل اللغة بلفظ "وإنَّه"، وفيه قولان: أحدُهما: أن تجعل "إِنَّهْ" بمعنى: نَعَم، والآخر أن تجعل الكلام مختصرًا، كأنه قال: وإنه كذلك، أو إنه على ما تقول، فالهاء اسم إنَّ وخبرها محذوف.



8897 [-4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى الطرف، بالراء. والطَّوف: هو الغائط.



8897 [-4] - تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: قضاء.



8897 [-4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: إنَّ الذين، والتصويب من "التلخيص". وأخرجه ابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 460 - 476 عن محمد بن منصور، وابن النحاس في "رؤية الله" (11) من طريق عبد الله بن أبي مَسَرَّة، كلاهما عن يعقوب بن محمد بن عيسى، عن عبد الرحمن بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن عياش عن دَلْهم بن الأسود بن عبد الله بن حاجب، عن أبيه، عن عمِّه لقيط بن عامر.وأخرجه أبو داود (3266)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند" 26/ (16206) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، عن عبد الرحمن بن المغيرة بالإسناد السابق. غير أنَّ أبا داود لم يسق لفظه، ووقع في إسناده وهمٌ وإسقاط كما نبَّه عليه المزِّي في "تحفة الأشراف" 8/ 334. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه في "المسند".



8897 [-4] - في النسخ الخطية أحد، والمثبت من مصادر التخريج، وهو أَوجه. وأخرجه ابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 460 - 476 عن محمد بن منصور، وابن النحاس في "رؤية الله" (11) من طريق عبد الله بن أبي مَسَرَّة، كلاهما عن يعقوب بن محمد بن عيسى، عن عبد الرحمن بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن عياش عن دَلْهم بن الأسود بن عبد الله بن حاجب، عن أبيه، عن عمِّه لقيط بن عامر.وأخرجه أبو داود (3266)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند" 26/ (16206) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، عن عبد الرحمن بن المغيرة بالإسناد السابق. غير أنَّ أبا داود لم يسق لفظه، ووقع في إسناده وهمٌ وإسقاط كما نبَّه عليه المزِّي في "تحفة الأشراف" 8/ 334. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه في "المسند".



8897 [-4] - في النسخ الخطية أو أهلك، والمثبت من "التلخيص". وأخرجه ابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 460 - 476 عن محمد بن منصور، وابن النحاس في "رؤية الله" (11) من طريق عبد الله بن أبي مَسَرَّة، كلاهما عن يعقوب بن محمد بن عيسى، عن عبد الرحمن بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن عياش عن دَلْهم بن الأسود بن عبد الله بن حاجب، عن أبيه، عن عمِّه لقيط بن عامر.وأخرجه أبو داود (3266)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند" 26/ (16206) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، عن عبد الرحمن بن المغيرة بالإسناد السابق. غير أنَّ أبا داود لم يسق لفظه، ووقع في إسناده وهمٌ وإسقاط كما نبَّه عليه المزِّي في "تحفة الأشراف" 8/ 334. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه في "المسند".



8897 [-4] - إسناده ضعيف جدًّا مسلسلٌ بالمجاهيل؛ عبد الرحمن بن عياش ومَن فوقه، وأما يعقوب بن عيسى - وهو يعقوب بن محمد بن عيسى الزهري - فضعيف يعتبر به، وقد أعلَّ الذهبي الحديث في "تلخيصه" به، إلّا أنه متابع، والعلَّة ممَّن فوقه. وأخرجه ابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 460 - 476 عن محمد بن منصور، وابن النحاس في "رؤية الله" (11) من طريق عبد الله بن أبي مَسَرَّة، كلاهما عن يعقوب بن محمد بن عيسى، عن عبد الرحمن بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن عياش عن دَلْهم بن الأسود بن عبد الله بن حاجب، عن أبيه، عن عمِّه لقيط بن عامر.وأخرجه أبو داود (3266)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند" 26/ (16206) من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري، عن عبد الرحمن بن المغيرة بالإسناد السابق. غير أنَّ أبا داود لم يسق لفظه، ووقع في إسناده وهمٌ وإسقاط كما نبَّه عليه المزِّي في "تحفة الأشراف" 8/ 334. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه في "المسند".