আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8916 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفَضْل الشَّعراني، حدثنا جدِّي، حدثنا إبراهيم بن حمزة الزُّبيري، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، عن علي بن حسين، عن جابر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "تُمَدُّ الأرضُ يوم القيامة مدًّا لعَظَمِة الرحمن، ثم لا يكونُ لبشرٍ من بني آدم إلَّا مواضعَ قدميهِ، ثم أُدعَى أولَ الناس، فأَخِرُّ ساجدًا، ثم يُؤذَنُ لي فأَقومُ فأقول: يا ربِّ، أخبَرني هذا - لجبريلَ، وهو عن يمين الرحمن، واللهِ ما رآه جبريلُ قبلَها قطُّ أنك أَرسلْتَه إليَّ، قال: وجبريلُ ساكتٌ لا يتكلَّمُ، حتى يقول الله: صَدَقَ، ثم يُؤذَنُ لي في الشَّفاعة، فأقول: يا ربِّ، عبادك عَبَدُوك [1] في أطرافِ الأرض؛ فذلك المَقامُ المحمودُ" [2]. هذا إسنادٌ صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد أرسَلَه يونس بن يزيد ومعمرُ بن راشد عن الزُّهري.أما حديثُ يونسَ:
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দয়াময় (আল্লাহ)-এর মহত্বের কারণে কিয়ামতের দিন পৃথিবীকে টেনে প্রশস্ত করা হবে। এরপর বনী আদমের কোনো মানুষের জন্য তার দুই পায়ের স্থান ব্যতীত আর কোনো জায়গা থাকবে না। এরপর সর্বপ্রথম আমাকে ডাকা হবে। আমি সিজদায় লুটিয়ে পড়ব। অতঃপর আমাকে অনুমতি দেওয়া হবে। আমি উঠে দাঁড়াব এবং বলব: হে আমার রব! এই ব্যক্তি (অর্থাৎ জিবরীল, যিনি আল্লাহর ডান দিকে থাকবেন, আল্লাহর শপথ! এর পূর্বে জিবরীল তাকে কখনো দেখেননি) আমাকে জানিয়েছেন যে আপনি তাকে আমার নিকট প্রেরণ করেছেন। তিনি বলেন, জিবরীল নীরব থাকবেন, কোনো কথা বলবেন না, যতক্ষণ না আল্লাহ বলবেন: সে সত্য বলেছে। এরপর আমাকে সুপারিশের অনুমতি দেওয়া হবে। তখন আমি বলব: হে আমার রব! আপনার বান্দারা পৃথিবীর প্রান্তে প্রান্তে আপনার ইবাদত করেছে; আর এটাই হলো প্রশংসিত স্থান (মাকামে মাহমুদ)।" এই সনদটি শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি বর্ণনা করেননি। ইউনুস ইবনু ইয়াযীদ এবং মা'মার ইবনু রাশিদ যুহরী থেকে এটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর ইউনুসের হাদীসটি হলো: (বাকী অংশ অনুপস্থিত) (8916)
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: عبادك عبدك، والمثبت من مصادر التخريج. قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 9/ 421: وعندي أنَّ معنى قوله: "عبادك عبدوك في الأرض" أي: وقوف في أطراف الأرض، أي: الناسُ مجتمعون في صعيد واحد، مؤمنهم وكافرهم. بالحديث كما قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" 2/ 95.وخولف إبراهيم في إسناده، فقد رواه محمدُ بنُ جعفر الوَرْكاني عند الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (1131 - بغية الباحث)، ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 145، ومحمدُ بنُ خالد بن عَثمة عند البيهقي في "شعب الإيمان" (298)، ومحمدُ بنُ عثمان بن خالد عند أبي زكريا بن منده في "أماليه" (13)، ثلاثتهم عن إبراهيم بن سعد الزهري - زاد ابن عثمة: عن صالح بن كيسان - عن ابن شهاب الزهري، عن علي بن الحسين - وهو زين العابدين - قال: أخبرني رجل من أهل العلم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال … فذكره. وفي إسناد البيهقي إلى ابن عثمة ضعف، وإسنادا الآخَرين جيدان إلى إبراهيم بن سعد.وانظر الحديثين التاليين.
[2] إسناده ضعيف لاضطرابه، فقد اختلف فيه على ابن شهاب الزهري في وصله وإرساله وفي رفعه ووقفه، ولم نقف عليه مسندًا من حديث جابر عند غير المصنف، وقد انفرد إبراهيم بن حمزة الزبيري بذكر جابر فيه، وإبراهيم هذا صدوق ليس به بأس إلَّا أنه لم تكن له تلك المعرفة بالحديث كما قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" 2/ 95.وخولف إبراهيم في إسناده، فقد رواه محمدُ بنُ جعفر الوَرْكاني عند الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (1131 - بغية الباحث)، ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 3/ 145، ومحمدُ بنُ خالد بن عَثمة عند البيهقي في "شعب الإيمان" (298)، ومحمدُ بنُ عثمان بن خالد عند أبي زكريا بن منده في "أماليه" (13)، ثلاثتهم عن إبراهيم بن سعد الزهري - زاد ابن عثمة: عن صالح بن كيسان - عن ابن شهاب الزهري، عن علي بن الحسين - وهو زين العابدين - قال: أخبرني رجل من أهل العلم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال … فذكره. وفي إسناد البيهقي إلى ابن عثمة ضعف، وإسنادا الآخَرين جيدان إلى إبراهيم بن سعد.وانظر الحديثين التاليين.