الحديث


المستدرك على الصحيحين للحاكم
Al-Mustadrak alas-Sahihayn lil Hakim
আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





المستدرك على الصحيحين للحاكم (8988)
আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8988)


8988 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد قال: قُرِئَ على يحيى ابن جعفر بن الزِّبرقان، وأنا أسمعُ حدثنا علي بن عاصم، حدثنا بَهزُ بن حَكيم، عن أبيه، عن جدِّه قال: أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقلت: يا نبيَّ الله، ما أتيتُك حتى حلفتُ [أكثرَ] من [عَدَد] [1] هؤلاء - يعني الكفَّين جميعًا - لا آتيك ولا آتي دينَك، وقد كنتُ امرَأً لا أَعقِلُ شيئًا إِلَّا ما علَّمني اللهُ ورسولُه، فإني أسألك بوَجْه الله: بِمَ بَعَثَكَ رَبُّنا؟ قال: "بالإسلام" قال: قلت: يا نبيَّ الله، وما آيةُ الإسلام؟ قال: "أن تقول: أسلمتُ وجهيَ لله وتخلَّيتُ، وتقيمَ الصلاةَ، وتؤتيَ الزكاةَ، كلُّ مسلمٍ عن مسلمٍ محرَّمٌ، أَخَوانِ نَصيرانِ، لا يَقبَلُ الله من مسلم أشركَ بعدما أسلمَ عملًا حتى يفارقَ المشركين إلى المسلمين.ما لي آخُذُ بحُجَزِكم عن النار، ألَا إِنَّ رَبِّي داعيَّ، ألَا وإنه سائلي: هل بلَّغتَ [2] عبادي؟ وإني قائل: ربِّ قد بلَّغْتُهم، فليُبلِّغ شاهدُكم غائبَكم، ثم إنكم تُدعَوْنَ مُقدَّمةً أفواهُكم بالفِدام، ثم أولُ ما يُبين عن أحدكم لَفَخِذُه وكفُّه" قال: قلت: يا رسول الله، هذا دينُنا؟ قال: "هذا دِينكُم [3]، وأَيْنَما تُحسِنْ يَكفِكَ" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




অনুবাদঃ মুআবিয়া ইবন হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললাম: হে আল্লাহর নবী! আমি আপনার কাছে আসিনি যতক্ষণ না আমি এইগুলির [আমার উভয় হাতের আঙ্গুলগুলির] সংখ্যার চেয়েও বেশিবার শপথ করেছি যে আমি আপনার কাছেও আসব না এবং আপনার দ্বীনের কাছেও আসব না। আমি ছিলাম এমন একজন ব্যক্তি যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূল আমাকে যা শিখিয়েছেন তা ছাড়া কিছুই বুঝতাম না (বা জ্ঞান রাখতাম না)। আমি আল্লাহর ওয়াস্তে আপনাকে জিজ্ঞেস করছি: আমাদের প্রতিপালক আপনাকে কী দিয়ে প্রেরণ করেছেন? তিনি বললেন: "ইসলাম দ্বারা।" বর্ণনাকারী বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! ইসলামের নিদর্শন কী? তিনি বললেন: "তা হলো—তুমি বলবে: আমি আল্লাহর কাছে আমার মুখমণ্ডলকে (সত্তা/অস্তিত্বকে) সঁপে দিলাম এবং আমি মুক্ত হলাম, আর তুমি সালাত কায়েম করবে, যাকাত আদায় করবে। প্রত্যেক মুসলমানের জন্য অন্য মুসলমান হারাম (অর্থাৎ তার জীবন, রক্ত, সম্পদ)। তারা উভয়েই সাহায্যকারী ভাই। আল্লাহ এমন কোনো মুসলমানের কোনো আমল কবুল করবেন না যে ইসলাম গ্রহণের পর শিরক করেছে, যতক্ষণ না সে মুশরিকদের থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে মুসলমানদের সাথে যোগ দেয়। (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:) কেন আমি তোমাদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে বিরত রাখব না! সাবধান! নিশ্চয় আমার রব আমাকে ডেকেছেন। সাবধান! নিশ্চয় তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করবেন: তুমি কি আমার বান্দাদের কাছে পৌঁছিয়েছ? আর আমি বলব: হে রব! আমি তাদের কাছে পৌঁছে দিয়েছি। অতএব তোমাদের মধ্যে যারা উপস্থিত আছে, তারা যেন অনুপস্থিতদের কাছে পৌঁছে দেয়। অতঃপর তোমাদেরকে ডাকা হবে এমন অবস্থায় যে, তোমাদের মুখে মুখবন্ধ লাগানো থাকবে। এরপর তোমাদের কারও সম্পর্কে সর্বপ্রথম যে অঙ্গ সাক্ষ্য দেবে, তা হলো তার উরু এবং তার হাত।" বর্ণনাকারী বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এটিই কি আমাদের দ্বীন? তিনি বললেন: "এটিই তোমাদের দ্বীন। আর তোমরা যেখানেই সৎকাজ করবে, তাই তোমাদের জন্য যথেষ্ট হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين من "تلخيص الذهبي" وليس في النسخ الخطية.



[2] في (ز) و (ك) و"التلخيص": بلَّغته؛ بهاءِ، تعود على الإسلام، والمثبت من (م) و (ب).



8988 [3] - قوله: "قال: هذا دينكم" سقط من (ز) و (ب).



8988 [4] - إسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه، وعلي بن عاصم الواسطي يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد تابعه عليه غير واحد.فقد أخرجه أحمد 33 / (20037) و (20043)، وابن ماجه (2536)، والنسائي (2227) و (2360) و (11405) من طرق عن بهز بن حكيم بهذا الإسناد. وبعضهم اختصره.وأخرج الشطر الأول منه أحمد (20011)، والنسائي (2228)، وابن حبان (160) من طريق أبي قزعة الباهلي، عن حكيم بن معاوية، عن أبيه.وقصة الفدام سلفت عند المصنف برقم (3686) من طريق سعيد الجريري، و (3687) من طريق أبي قزعة، كلاهما عن حكيم بن معاوية.قوله: "بحُجَزكم" جمع حُجْزة، وهي مَعقِد الإزار من وسط الإنسان.وقوله في الإجابة على الإسلام: "أن تقول: أسلمت وجهي الله وتخلَّيتُ" هكذا وقع عند أكثر الرواة عن بهز وخالفهم معمر بن راشد فرواه في "جامعه" (20115) عن بهز بلفظ: "تشهد أن لا إلَّا الله وأنَّ محمدًا رسول الله"، وهكذا وقع في رواية الثقة أبي قزعة الباهلي عن حكيم بن معاوية، وهذا هو الموافق لما صحَّ من الأحاديث والآثار في المطالبة بإسلام المشركين، وأما قوله: "أن تقول: أسلمت … إلخ" فهو مقتضى النطق بالشهادتين، ولعلّ رواة حديث حكيم بن معاوية قد أخلُّوا بالرواية فاختصروها، والله تعالى أعلم.