الحديث


المستدرك على الصحيحين للحاكم
Al-Mustadrak alas-Sahihayn lil Hakim
আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





المستدرك على الصحيحين للحاكم (9008)
আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (9008)


9008 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا الحسن بن علي بن شَبيب، حدثنا عبيد الله بن محمد التَّيْمي، حدثنا حماد بن سَلَمة، حدثنا أبو حمزة، عن إبراهيم، عن عَلقَمة، عن عبد الله بن مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "أُتِيتُ بالبُرَاق، فركبتُ خلفَ جبريل عليه السلام، فسارَ بنا، فكان إذا أَتى على جبلٍ [1] إذا ارتفع ارتفَعَت رِجْلاه، وإذا هَبَطَ ارتفعت يداه، قال: فسار بنا في أرض غُمّةٍ [2] مُنتِنةٍ، حتى أفضَيْنا إلى أرض فَيْحاءَ طيِّبة، فقلت: يا جبريلُ، إنا كنا نسيرُ في أرضِ غُمّةٍ مُنتِنة، ثم أفضَيْنا إلى أرض فيحاءَ طيّبة، قال: تلك أرضُ النار، وهذه أرضُ الجنة، قال: فأتيتُ على رجل قائم يصلَّي، فقال: مَن هذا معك يا جبريلُ؟ قال: هذا أخوك محمدٌ، فرحَّبَ بي ودعا لي بالبَرَكة، وقال: سَلْ لأمَّتِك اليُسْرَ، فقلت: مَن هذا يا جبريل؟ فقال: هذا أخوك عيسى ابنُ مريمَ، قال: فسِرْنا فسمعتُ صوتًا وتذمُّرًا، فأَتينا على رجل فقال: مَن هذا يا جبريلُ؟ قال: هذا أخوك محمدٌ [فرحَّب بي ودعا لي بالبَرَكة، وقال: سَلْ لأمّتِك اليُسْرَ، فقلت: مَن هذا يا جبريلُ؟ فقال: هذا أخوك موسى] [3] قال: قلت: على من كان تذمُّرُه وصوته؟ قال: على ربِّه، قلت: على ربِّه؟! قال: نعم، قد يُعرَفُ ذلك من حِدَّتِه، قال: ثم سرنا فرأيت مصابيحَ [4] وضَوْءًا، قال: قلت: ما هذا يا جبريلُ؟ قال: هذه شجرةُ أبيك إبراهيم، أتَدنُو منها؟ قال: قلت: نعم، فدَنَوْنا، فرَحَّب بي ودعا لي بالبَرَكة، ثم مَضَيْنا حتى أتَينا بيتَ المَقدِس، فرَبَطتُ الدابةَ بالحلقة التي يَربطُ بها الأنبياءُ، ثم دخلتُ المسجدَ فَبَشَرَت بي [5] الأنبياء مَن سَمَّى اللهُ عز وجل منهم ومن لم يُسمِّ، فصلَّيتُ بهم إلَّا هؤلاءِ النَّفَرَ الثلاثةَ: إبراهيم وموسى وعيسى عليهم السلام" [6]. هذا حديث تفرَّد به أبو حمزة الأعورُ ميمونٌ، وقد اختلفت أقاويلُ أئمَّتِنا فيه، وقد أتى بزيادات لم يُخرجها الشيخان رضي الله عنهما في ذِكْر المعراج.




অনুবাদঃ আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে বুরাক আনা হলো। আমি জিবরীল (আঃ)-এর পিছনে আরোহণ করলাম। তিনি আমাদের নিয়ে চলতে শুরু করলেন। তিনি যখন কোনো পাহাড়ের উপর দিয়ে যেতেন, তখন (বুরাক) উপরে উঠলে তার পা দুটি উপরে উঠে যেত এবং যখন নীচে নামত তখন তার হাত দুটি উপরে উঠে যেত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর তিনি আমাদের নিয়ে এক অন্ধকারাচ্ছন্ন ও দুর্গন্ধময় ভূমির উপর দিয়ে চললেন, যতক্ষণ না আমরা প্রশস্ত ও মনোরম এক ভূমিতে পৌঁছালাম।

আমি বললাম: হে জিবরীল! আমরা তো এক অন্ধকারাচ্ছন্ন ও দুর্গন্ধময় ভূমির উপর দিয়ে পথ চলছিলাম, তারপর আমরা প্রশস্ত ও মনোরম এক ভূমিতে পৌঁছালাম। তিনি (জিবরীল) বললেন: ওটা ছিল জাহান্নামের ভূমি, আর এটা হল জান্নাতের ভূমি।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর আমি এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছালাম যিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তিনি (ঐ ব্যক্তি) বললেন: হে জিবরীল, আপনার সাথে ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মুহাম্মাদ। তখন তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন এবং বললেন: আপনার উম্মতের জন্য সহজতা চান।

আমি বললাম: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই ঈসা ইবনু মারইয়াম।

তিনি বললেন: এরপর আমরা চলতে লাগলাম। আমি একটি আওয়াজ এবং রাগের শব্দ শুনতে পেলাম। আমরা এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছালাম। তিনি বললেন: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মুহাম্মাদ। [তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন এবং বললেন: আপনার উম্মতের জন্য সহজতা চান। আমি বললাম: হে জিবরীল, ইনি কে? তিনি বললেন: ইনি আপনার ভাই মূসা।]

আমি বললাম: তাঁর রাগ ও আওয়াজ কার ওপর ছিল? তিনি (জিবরীল) বললেন: তাঁর রবের ওপর। আমি বললাম: তাঁর রবের ওপর?! তিনি বললেন: হ্যাঁ, তাঁর তীব্র মেজাজ থেকেই এটা বোঝা যায়।

তিনি বললেন: এরপর আমরা চললাম, তখন আমি কিছু বাতি ও আলো দেখলাম। আমি বললাম: হে জিবরীল, এটা কী? তিনি বললেন: এটা আপনার পিতা ইব্রাহীম (আঃ)-এর বৃক্ষ। আপনি কি এর কাছে যাবেন? আমি বললাম: হ্যাঁ। আমরা তার কাছে গেলাম। তিনি আমাকে সাদরে গ্রহণ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন।

এরপর আমরা এগিয়ে গেলাম, অবশেষে বায়তুল মাকদিসে পৌঁছালাম। আমি সেই আংটার সাথে বুরাক বাঁধলাম, যেখানে নাবীগণ তাদের বাহন বাঁধতেন। এরপর আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল যাদের নাম উল্লেখ করেছেন এবং যাদের নাম উল্লেখ করেননি, সেই সকল নাবীগণ আমার সাথে সাক্ষাৎ করলেন। আমি তাঁদের নিয়ে সালাত আদায় করলাম—তবে এই তিনজন ব্যক্তি ছাড়া: ইব্রাহীম, মূসা ও ঈসা (আলাইহিমুস সালাম)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في نسخنا الخطية: فسار بها إذ أتى رجل، وهذا تحريف، وأقرب شيء إلى الصواب ما أثبتناه موافقة لما في مصادر التخريج.



[2] أرضٌ غُمّة: أي: ضيّقة، والأرض الفيحاء: الواسعة. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.



9008 [3] - ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج، ولا بدَّ منه. ووقع بعد قوله: "قال: قلت" بياض بقدر نصف سطر في (ز) و (ب). في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.



9008 [4] - في النسخ الخطية: مصابيحًا، والجادة ما أثبتنا. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.



9008 [5] - بَشَرَت بي: أي: سُرَّت بي. في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.



9008 [6] - إسناده ضعيف جدًا، ومتنه منكر، تفرَّد به أبو حمزة الأعور كما قال المصنف، وهو متفق على ضعفه. إبراهيم هو ابن يزيد النَّخَعي، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (22)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1039)، والبزار (1568)، وأبو يعلى (5036)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5008) و (5012)، والعقيلي في "الضعفاء" (1707)، والطبراني في "الكبير" (9976)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 234 من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وانظر حديث المعراج بطوله من وجه صحيح، وبسياق صحيح من حديث أنس وغيره في "مسند أحمد" 19/ (21505) والتعليق عليه.وأما صلاته بالأنبياء، فرويت في حديث أبي هريرة عند مسلم في "صحيحه" (173)، وحديث أنس عند النسائي في "المجتبى" (450)، وليس فيهما استثناء أحدٍ من الأنبياء.