সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
1 - ` لا يذهب الليل والنهار حتى تعبد اللات والعزى , فقالت عائشة:
يا رسول الله إن كنت لأظن حين أنزل الله * (هو الذي أرسل رسوله بالهدى ودين
الحق ليظهره على الدين كله ولو كره المشركون) * أن ذلك تاما , قال: إنه سيكون
من ذلك ما شاء الله `. الحديث.
` لا يذهب الليل والنهار حتى تعبد اللات والعزى , فقالت عائشة:
يا رسول الله إن كنت لأظن حين أنزل الله * (هو الذي أرسل رسوله بالهدى ودين
الحق ليظهره على الدين كله ولو كره المشركون) * أن ذلك تاما , قال: إنه سيكون
من ذلك ما شاء الله `. الحديث.
رواه مسلم وغيره , وقد خرجته في ` تحذير الساجد من اتخاذ القبور مساجد ` (ص 122) .
وقد وردت أحاديث أخرى توضح مبلغ ظهور الإسلام ومدى انتشاره , بحيث لا يدع
مجالا للشك في أن المستقبل للإسلام بإذن الله وتوفيقه.
وها أنا أسوق ما تيسر من هذه الأحاديث عسى أن تكون سببا لشحذ همم
العاملين
للإسلام , وحجة على اليائسين المتواكلين
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, রাত ও দিন শেষ হবে না, যতক্ষণ না লাত ও উযযা’র পূজা করা হবে। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো মনে করেছিলাম, যখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন— *‘তিনিই সেই সত্তা, যিনি তাঁর রাসূলকে হিদায়াত ও সত্য দ্বীনসহ প্রেরণ করেছেন, যাতে তিনি সকল দ্বীনের উপর একে বিজয়ী করেন, যদিও মুশরিকরা অপছন্দ করে’*— যে এই ওয়াদা পূর্ণতা লাভ করেছে।
তিনি (রাসূল ﷺ) বললেন: আল্লাহ যা চান, তা এর থেকে অবশ্যই হবে।
2 - ` إن الله زوى (أي جمع وضم) لي الأرض، فرأيت مشارقها ومغاربها وإن أمتي
سيبلغ ملكها ما زوي لي منها `. الحديث.
رواه مسلم (8 / 171) وأبو داود (4252) والترمذي (2 / 27) وصححه.
وابن ماجه (رقم 2952) وأحمد (5 / 278 و 284) من حديث ثوبان
وأحمد أيضا (4 / 123) من حديث شداد بن أوس إن كان محفوظا.
وأوضح منه وأعم الحديث التالي:
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা আমার জন্য পৃথিবীকে সংকুচিত (বা একত্রিত) করে দিয়েছিলেন, ফলে আমি এর পূর্ব প্রান্ত ও পশ্চিম প্রান্ত দেখতে পেয়েছি। আর নিশ্চয় আমার উম্মতের রাজত্ব ততদূর পর্যন্ত পৌঁছবে, যতটুকু আমার জন্য সংকুচিত করা হয়েছিল।"
3 - ` ليبلغن هذا الأمر ما بلغ الليل والنهار ولا يترك الله بيت مدر ولا وبر إلا
أدخله الله هذا الدين بعز عزيز أو بذل ذليل عزا يعز الله به الإسلام
وذلا يذل به الكفر `.
رواه جماعة ذكرتهم في ` تحذير الساجد ` (ص 121) . ورواه ابن حبان في
` صحيحه ` (1631 و 1632) .
وأبو عروبة في ` المنتقى من الطبقات ` (2 / 10 / 1) .
ومما لا شك فيه أن تحقيق هذا الانتشار يستلزم أن يعود المسلمون أقوياء
في معنوياتهم ومادياتهم وسلاحهم حتى يستطيعوا أن يتغلبوا على قوى الكفر
والطغيان، وهذا ما يبشرنا به الحديث:
তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
নিশ্চয়ই এই দ্বীন (ইসলাম) সেখানে পৌঁছবেই, যেখানে রাত ও দিন পৌঁছে। আল্লাহ তাআলা কোনো মাটির ঘর বা পশমের তাঁবু (শহুরে বা গ্রামীণ বসতি) বাকি রাখবেন না, যেখানে তিনি এই দ্বীনকে প্রবেশ করাবেন না— কোনো সম্মানিত ব্যক্তির সম্মানের সাথে অথবা কোনো লাঞ্ছিত ব্যক্তির লাঞ্ছনার মাধ্যমে। এমন সম্মান, যার দ্বারা আল্লাহ ইসলামকে সম্মানিত করবেন এবং এমন লাঞ্ছনা, যার দ্বারা তিনি কুফরকে লাঞ্ছিত করবেন।
4 - عن أبى قبيل قال: كنا عند عبد الله بن عمرو بن العاصي وسئل أي المدينتين تفتح
أولا القسطنطينية أو رومية؟ فدعا عبد الله بصندوق له حلق، قال: فأخرج منه
كتابا قال: فقال عبد الله: بينما نحن حول رسول الله صلى الله عليه وسلم نكتب
، إذ سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أي المدينتين تفتح أولا أقسطنطينية أو
رومية؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` مدينة هرقل تفتح أولا. يعني قسطنطينية `..
رواه أحمد (2 / 176) والدارمي (1 / 126) وابن أبي شيبة في ` المصنف `
(47 / 153 / 2) وأبو عمرو الداني في ` السنن الواردة في الفتن ` (116 / 2)
والحاكم (3 / 422 و 4 / 508) وعبد الغني المقدسي في ` كتاب العلم `
(2 / 30 / 1) ، وقال: ` حديث حسن الإسناد `.
وصححه الحاكم ووافقه الذهبي وهو كما قالا.
و (رومية) هي روما كما في ` معجم البلدان ` وهي عاصمة إيطاليا اليوم.
وقد تحقق الفتح الأول على يد محمد الفاتح العثماني كما هو معروف، وذلك بعد
أكثر من ثمانمائة سنة من إخبار النبي صلى الله عليه وسلم بالفتح، وسيتحقق
الفتح الثاني بإذن الله تعالى ولابد، ولتعلمن نبأه بعد حين.
ولا شك أيضا أن تحقيق الفتح الثاني يستدعي أن تعود الخلافة الراشدة إلى الأمة
المسلمة، وهذا مما يبشرنا به صلى الله عليه وسلم بقوله في الحديث:
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
আবু ক্বাবীল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমরা আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো, এই দুটি শহরের মধ্যে কোনটি প্রথমে জয় করা হবে— কনস্টান্টিনোপল (কুস্তুনতুনিয়া) নাকি রোম (রোমীয়াহ)?
তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আংটাযুক্ত একটি সিন্দুক আনতে বললেন। তিনি তা থেকে একটি কিতাব বের করলেন। অতঃপর আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: একবার আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আশেপাশে বসে লিখছিলাম, এমন সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে জিজ্ঞেস করা হলো: এই দুটি শহরের মধ্যে কোনটি প্রথমে জয় করা হবে— কনস্টান্টিনোপল (কুস্তুনতুনিয়া) নাকি রোম (রোমীয়াহ)?
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:
"প্রথমেই হিরাক্লিয়াসের শহর জয় করা হবে। অর্থাৎ কনস্টান্টিনোপল (কুস্তুনতুনিয়া)।"
5 - ` تكون النبوة فيكم ما شاء الله أن تكون، ثم يرفعها الله إذا شاء أن يرفعها
ثم تكون خلافة على منهاج النبوة، فتكون ما شاء الله أن تكون، ثم يرفعها إذا
شاء أن يرفعها، ثم تكون ملكا عاضا فيكون ما شاء الله أن تكون، ثم يرفعها إذا
شاء الله أن يرفعها، ثم تكون ملكا جبريا فتكون ما شاء الله أن تكون، ثم
يرفعها إذا شاء أن يرفعها، ثم تكون خلافة على منهاج النبوة. ثم سكت `.
رواه أحمد (4 / 273) حدثنا سليمان بن داود الطيالسي حدثنا داود بن إبراهيم
الواسطي حدثنا حبيب بن سالم عن النعمان بن بشير قال:
كنا قعودا في المسجد، وكان بشير رجلا يكف حديثه، فجاء أبو ثعلبة الخشني
فقال:
يا بشير بن سعد أتحفظ حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأمراء؟
فقال حذيفة: أنا أحفظ خطبته، فجلس أبو ثعلبة، فقال حذيفة: فذكره
مرفوعا.
قال حبيب: فلما قام عمر بن عبد العزيز وكان يزيد بن النعمان بن بشير في
صحابته فكتبت إليه بهذا الحديث أذكره إياه، فقلت له: إني أرجو أن يكون
أمير المؤمنين - يعني عمر - بعد الملك العاض والجبرية، فأدخل كتابي على
عمر بن عبد العزيز فسر به وأعجبه.
ومن طريق أحمد رواه الحافظ العراقي في ` محجة القرب إلى محبة العرب `
(17 / 2) وقال: ` هذا حديث صحيح، وإبراهيم بن داود الواسطي وثقه أبو
داود الطيالسي
وابن حبان، وباقي رجاله محتج بهم في الصحيح `.
يعني ` صحيح مسلم `، لكن حبيبا هذا قال البخاري: فيه نظر.
وقال ابن عدي: ليس في متون أحاديثه حديث منكر، بل قد اضطرب في أسانيد ما
يروي عنه، إلا أن أبا حاتم وأبا داود وابن حبان وثقوه، فحديثه حسن على
أقل الأحوال إن شاء الله تعالى، وقد قال فيه الحافظ: ` لا بأس به `.
والحديث في ` مسند الطيالسي ` (رقم 438) : حدثنا داود الواسطي - وكان
ثقة - قال: سمعت حبيب بن سالم به، لكن وقع في متنه سقط فيستدرك من ` مسند
أحمد `.
وقال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 189) :
` رواه أحمد والبزار أتم منه والطبراني ببعضه في (الأوسط) ، ورجاله
ثقات `.
ومن البعيد عندي حمل الحديث على عمر بن عبد العزيز، لأن خلافته كانت
قريبة العهد بالخلافة الراشدة ولم تكن بعد ملكين: ملك عاض وملك جبرية،
والله أعلم.
هذا وإن من المبشرات بعودة القوة إلى المسلمين واستثمارهم الأرض استثمارا
يساعدهم على تحقيق الغرض، وتنبىء عن أن لهم مستقبلا باهرا حتى من الناحية
الاقتصادية والزراعية قوله صلى الله عليه وسلم:
নোমান ইবনে বাশির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
তোমাদের মাঝে নবুওয়াত থাকবে যতদিন আল্লাহ্ চান। অতঃপর যখন আল্লাহ্ এটিকে উঠিয়ে নিতে চাইবেন, তখন তিনি তা উঠিয়ে নেবেন।
এরপর নবুওয়াতের পদ্ধতির উপর ভিত্তি করে খেলাফত (শাসন) প্রতিষ্ঠিত হবে। সেটিও থাকবে ততদিন, যতদিন আল্লাহ্ চান। এরপর আল্লাহ্ যখন এটিকে উঠিয়ে নিতে চাইবেন, তখন তিনি তা উঠিয়ে নেবেন।
এরপর (আসবে) দন্ত-নিপীড়ক রাজত্ব (স্বৈরতন্ত্র)। সেটিও থাকবে ততদিন, যতদিন আল্লাহ্ চান। এরপর আল্লাহ্ যখন এটিকে উঠিয়ে নিতে চাইবেন, তখন তিনি তা উঠিয়ে নেবেন।
এরপর (আসবে) জবরদস্তিমূলক রাজত্ব (স্বেচ্ছাচারী শাসন)। সেটিও থাকবে ততদিন, যতদিন আল্লাহ্ চান। এরপর আল্লাহ্ যখন এটিকে উঠিয়ে নিতে চাইবেন, তখন তিনি তা উঠিয়ে নেবেন।
এরপর আবার নবুওয়াতের পদ্ধতির উপর ভিত্তি করে খেলাফত প্রতিষ্ঠিত হবে। অতঃপর তিনি চুপ হয়ে গেলেন।
6 - ` لا تقوم الساعة حتى تعود أرض العرب مروجا وأنهارا `.
رواه مسلم (3 / 84) وأحمد (2 / 703 و 417) والحاكم (4 / 477) من
حديث أبي هريرة.
وقد بدأت تباشير هذا الحديث تتحقق في بعض الجهات من جزيرة العرب بما أفاض
الله عليها من خيرات وبركات وآلات ناضحات تستنبط الماء الغزير من بطن أرض
الصحراء وهناك فكرة بجر نهر الفرات إلى الجزيرة كنا قرأناها في بعض الجرائد
المحلية فلعلها تخرج إلى حيز الوجود، وإن غدا لناظره قريب.
هذا ومما يجب أن يعلم بهذه المناسبة أن قوله صلى الله عليه وسلم:
` لا يأتي عليكم زمان إلا والذي بعده شر منه حتى تلقوا ربكم `.
رواه البخاري في ` الفتن ` من حديث أنس مرفوعا.
فهذا الحديث ينبغي أن يفهم على ضوء الأحاديث المتقدمة وغيرها مثل أحاديث
المهدي ونزول عيسى عليه السلام فإنها تدل على أن هذا الحديث ليس على عمومه
بل هو من العام المخصوص، فلا يجوز إفهام الناس أنه على عمومه فيقعوا في
اليأس الذي لا يصح أن يتصف به المؤمن (إنه لا ييأس من روح الله إلا القوم
الكافرون) أسأل الله أن يجعلنا مؤمنين به حقا.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না আরবের ভূমি আবার তৃণভূমি ও নদী-নালায় পরিণত হবে।"
এই হাদিসের পূর্বাভাসগুলো আরব উপদ্বীপের কিছু অঞ্চলে ইতোমধ্যে বাস্তবে রূপ নিতে শুরু করেছে। কেননা আল্লাহ সেখানে কল্যাণ ও বরকত বর্ষণ করেছেন এবং শক্তিশালী সেচ যন্ত্রের (আলাত নাদিহাত) মাধ্যমে মরুভূমির মাটির গভীর থেকে প্রচুর পরিমাণে পানি উত্তোলন করা হচ্ছে। আরও একটি ধারণা হলো— আমরা যা কিছু স্থানীয় সংবাদপত্রে পড়েছি— ইউফ্রেটিস নদীকে (নহরুল ফুরাত) উপদ্বীপে টেনে আনার একটি পরিকল্পনা রয়েছে। সম্ভবত এটি বাস্তবায়িত হবে। আর আগামীকাল তো অপেক্ষাকারীর জন্য নিকটবর্তী।
এই উপলক্ষে আরও একটি বিষয় জানা দরকার, তা হলো আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বাণী: "তোমাদের উপর এমন কোনো সময় আসবে না, যার পরবর্তী সময়টি তার চেয়ে খারাপ হবে না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের রবের সাথে মিলিত হবে।"
এই হাদিসটিকে পূর্ববর্তী ও অন্যান্য হাদিসের আলোকে বোঝা উচিত, যেমন মাহদী (আ.) সম্পর্কিত হাদিসসমূহ এবং ঈসা (আলাইহিস সালাম)-এর অবতরণ সম্পর্কিত হাদিসসমূহ। কারণ, ঐ হাদিসগুলো প্রমাণ করে যে এই হাদিসটি সাধারণভাবে প্রযোজ্য নয়, বরং এটি হচ্ছে ‘আম খাসুস’ (সাধারণ কিন্তু বিশেষভাবে সীমিত)। সুতরাং, জনসাধারণকে এটি সাধারণ অর্থে প্রযোজ্য বলে বোঝানো উচিত নয়, অন্যথায় তারা হতাশায় নিমজ্জিত হবে, যা কোনো মুমিনের জন্য শোভনীয় নয়। (নিশ্চয়ই কাফির সম্প্রদায় ছাড়া আল্লাহর রহমত থেকে কেউ নিরাশ হয় না।) আমি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করি, তিনি যেন আমাদেরকে সত্যিকারের মুমিন হওয়ার তাওফিক দান করেন।
7 - عن أنس قال النبي صلى الله عليه وسلم:
` ما من مسلم يغرس غرسا أو يزرع زرعا فيأكل منه طير أو إنسان أو بهيمة إلا كان
له به صدقة `.
رواه البخاري (2 / 67 طبع أوربا) ومسلم (5 / 28) وأحمد (3 / 147) .
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যে কোনো মুসলমান কোনো চারা রোপণ করে অথবা কোনো ফসল ফলায়, আর তা থেকে কোনো পাখি, মানুষ বা চতুষ্পদ প্রাণী ভক্ষণ করে, তবে এর বিনিময়ে তার জন্য অবশ্যই সদকা (দান) রয়েছে।
8 - عن جابر مرفوعا:
` ما من مسلم يغرس غرسا إلا كان ما أكل منه له صدقة وما سرق منه له صدقة وما
أكل السبع منه فهو له صدقة وما أكلت الطير فهو له صدقة ولا يرزؤه (أي ينقصه
ويأخذ منه) أحد إلا كان له صدقة (إلى يوم القيامة) `.
(عن جابر) :
رواه مسلم عنه. ثم رواه هو وأحمد (3 / 391) من طرق أخرى عنه بشيء من
الاختصار، وله شاهد من حديث أم مبشر عند مسلم وأحمد (6 / 362 و 240) ،
وله شواهد أخرى ذكرها المنذري في ` الترغيب ` (3 / 224 و 245) .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"এমন কোনো মুসলমান নেই যে কোনো বৃক্ষ রোপণ করে বা ফসল ফলায়, কিন্তু তা থেকে যা কিছু খাওয়া হয়, তা তার জন্য সদকা (দান) হিসেবে গণ্য হয়। আর যা চুরি হয়ে যায়, তা তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়। আর হিংস্র পশু যা খায়, তা-ও তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়। আর পাখি যা খায়, তা-ও তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়। আর কোনো ব্যক্তি যদি তা থেকে কোনো কিছু কমিয়ে দেয় বা নষ্ট করে (যার ফলে কৃষকের ক্ষতি হয়), তবে কিয়ামত পর্যন্ত তা তার জন্য সদকা হিসেবে পরিগণিত হয়।"
9 - عن أنس رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
` إن قامت الساعة وفي يد أحدكم فسيلة، فإن استطاع أن لا تقوم حتى يغرسها
فليغرسها `.
(عن أنس)
رواه الإمام أحمد (3 / 183، 184، 191) وكذا الطيالسي (رقم 2068)
والبخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 479) وابن الأعرابي في ` معجمه `
(ق 21 / 1) عن هشام بن زيد عنه.
وهذا سند صحيح على شرط مسلم، وتابعه يحيى بن سعيد عن أنس. أخرجه ابن عدي
في ` الكامل ` (316 / 1) .
وأورده الهيثمي في ` المجمع ` (63 / 4) مختصرا وقال:
` رواه البزار ورجاله أثبات ثقات `.
وفاته أنه في ` مسند أحمد ` بأتم منه كما ذكرناه.
(الفسيلة) هي النخلة الصغيرة وهي (الودية) .
ولا أدل على الحض على الاستثمار من هذه الأحاديث الكريمة، لاسيما الحديث
الأخير منها فإن فيه ترغيبا عظيما على اغتنام آخر فرصة من الحياة في سبيل زرع
ما ينتفع به الناس بعد موته فيجري له أجره وتكتب له صدقته إلى يوم القيامة.
وقد ترجم الإمام البخاري لهذا الحديث بقوله ` باب اصطناع المال ` ثم روى عن
الحارث بن لقيط قال: كان الرجل منا تنتج فرسه فينحرها فيقول: أنا أعيش حتى
أركب هذه؟
فجاءنا كتاب عمر: أن أصلحوا ما رزقكم الله، فإن في الأمر تنفسا.
وسنده صحيح.
وروى أيضا بسند صحيح عن داود قال: قال لي عبد الله بن سلام: إن سمعت بالدجال
قد خرج وأنت على ودية تغرسها، فلا تعجل أن تصلحه، فإن للناس بعد ذلك عيشا.
وداود هذا هو ابن أبي داود الأنصاري قال الحافظ فيه: ` مقبول `.
وروى ابن جرير عن عمارة بن خزيمة بن ثابت قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول
لأبي: ما يمنعك أن تغرس أرضك؟ فقال له أبي: أنا شيخ كبير أموت غدا، فقال له
عمر: أعزم عليك لتغرسنها؟ فلقد رأيت عمر بن الخطاب يغرسها بيده مع أبي.
كذا في ` الجامع الكبير ` للسيوطي (3 / 337 / 2) .
ولذلك اعتبر بعض الصحابة الرجل يعمل في إصلاح أرضه عاملا من عمال الله عز وجل
فروى البخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 448) عن نافع بن عاصم أنه سمع
عبد الله بن عمرو قال لابن أخ له خرج من (الوهط) : أيعمل عمالك؟ قال: لا
أدري، قال: أما لو كنت ثقفيا لعلمت ما يعمل عمالك، ثم التفت إلينا فقال:
إن الرجل إذا عمل مع عماله في داره (وقال الراوي مرة: في ماله) كان عاملا
من عمال الله عز وجل. وسنده حسن إن شاء الله تعالى.
و (الوهط) في اللغة هو البستان وهي أرض عظيمة كانت لعمرو بن العاص بالطائف
على ثلاثة أميال من (وج) يبدو أنه خلفها لأولاده،
وقد روى ابن عساكر في
` تاريخه ` (13 / 264 / 2) بسند صحيح عن عمرو بن دينار قال: دخل عمرو بن
العاص في حائط له بالطائف يقال له: (الوهط) (فيه) ألف ألف خشبة، اشترى كل
خشبة بدرهم! يعني يقيم بها الأعناب.
هذه بعض ما أثمرته تلك الأحاديث في جملتها من السلف الصالح رضي الله عنهم.
وقد ترجم البخاري في ` صحيحه ` للحديثين الأولين بقوله:
` باب فضل الزرع إذا أكل منه `.
قال ابن المنير:
` أشار البخاري إلى إباحة الزرع، وأن من نهى عنه كما ورد عن عمر فمحله ما إذا
شغل الحرث عن الحرب ونحوه من الأمور المطلوبة، وعلى ذلك يحمل حديث أبي أمامة
المذكور في الباب الذي بعده `.
قلت: سيأتي الكلام على الحديث المشار إليه في المقال الآتي إن شاء الله تعالى.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
‘যদি কিয়ামত শুরু হয়ে যায় এবং তোমাদের কারো হাতে একটি চারা থাকে, আর সে যদি কিয়ামত শুরু হওয়ার আগে তা রোপণ করতে সক্ষম হয়, তবে সে যেন তা রোপণ করে নেয়।’
10 - عن أبي أمامة الباهلي قال - ورأى سكة وشيئا من آلة الحرث فقال: سمعت رسول
الله صلى الله عليه وسلم يقول:
` لا يدخل هذا بيت قوم إلا أدخله الله الذل `.
التكالب على الدنيا يورث الذل:
ذكرت في المقال السابق بعض الأحاديث الواردة في الحض على استثمار الأرض، مما
لا يدع مجالا للشك في أن الإسلام شرع ذلك للمسلمين ورغبهم فيه أيما ترغيب.
واليوم نورد بعض الأحاديث التي قد يتبادر لبعض الأذهان الضعيفة أو القلوب
المريضة أنها معارضة للأحاديث المتقدمة، وهي في الحقيقة غير منافية له،
إذا ما أحسن فهمها، وخلت النفس من اتباع هواها!
الأول: عن أبي أمامة الباهلي قال - ورأى سكة وشيئا من آلة الحرث فقال:
سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
` لا يدخل هذا بيت قوم إلا أدخله الله الذل `.
أخرجه البخاري في ` صحيحه ` (5 / 4 بشرح ` الفتح `) ، ورواه الطبراني في
` الكبير ` من طريق أخرى عن أبي أمامة مرفوعا بلفظ:
` ما من أهل بيت يغدو عليهم فدان إلا ذلوا `.
ذكره في ` المجمع ` (4 / 120) .
وقد وفق العلماء بين هذا الحديث والأحاديث المتقدمة في المقال المشار إليه
بوجهين اثنين:
أ - أن المراد بالذل ما يلزمهم من حقوق الأرض التي تطالبهم بها الولاة من خراج
أو عشر، فمن أدخل نفسه في ذلك فقد عرضها للذل.
قال المناوي في ` الفيض `: ` وليس هذا ذما للزراعة فإنها محمودة مثاب عليها
لكثرة أكل العوافي منها، إذ لا تلازم بين ذل الدنيا وحرمان ثواب البعض `.
ولهذا قال ابن التين: ` هذا من أخباره صلى الله عليه وسلم بالمغيبات، لأن
المشاهد الآن أن أكثر الظلم إنما هو على أهل الحرث `.
ب - أنه محمول على من شغله الحرث والزرع عن القيام بالواجبات كالحرب ونحوه،
وإلى هذا ذهب البخاري حيث ترجم للحديث بقوله:
` باب ما يحذر من عواقب الاشتغال بآلة الزرع، أو مجاوزة الحد الذي أمر به `.
فإن من المعلوم أن الغلو في السعي وراء الكسب يلهي صاحبه عن الواجب ويحمله على
التكالب على الدنيا والإخلاد إلى الأرض والإعراض عن الجهاد، كما هو مشاهد من
الكثيرين من الأغنياء.
ويؤيد هذا الوجه قوله صلى الله عليه وسلم:
` إذا تبايعتم بالعينة، وأخذتم أذناب البقر ورضيتم بالزرع وتركتم الجهاد
سلط الله عليكم ذلا لا ينزعه حتى ترجعوا إلى دينكم `.
আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি (আবু উমামা) লাঙলের ফলা এবং কৃষিকাজের কিছু সরঞ্জাম দেখে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি,
**"এই বস্তুটি [লাঙলের ফলা] কোনো কওমের ঘরে প্রবেশ করলে আল্লাহ তাদের মধ্যে লাঞ্ছনা প্রবেশ করিয়ে দেন।"**
[গ্রন্থকারের মন্তব্য ও ব্যাখ্যা]:
দুনিয়ার প্রতি অত্যাধিক আসক্তি লাঞ্ছনা বয়ে আনে।
পূর্বে আমরা ভূমি বিনিয়োগে উৎসাহিত করে কিছু হাদীস উল্লেখ করেছি। আজকের আলোচনায় এমন কিছু হাদীস পেশ করা হচ্ছে যা দুর্বলমনা বা রুগ্ন হৃদয়ের অধিকারীদের কাছে পূর্বোক্ত হাদীসগুলোর বিরোধী মনে হতে পারে। তবে প্রকৃত অর্থে এগুলো একে অপরের পরিপন্থী নয়, যদি সঠিকভাবে উপলব্ধি করা হয় এবং আত্মা খেয়াল-খুশির অনুসরণ থেকে মুক্ত থাকে।
প্রথম হাদীসটি হলো: আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লাঙলের ফলা এবং কৃষিকাজের সরঞ্জাম দেখে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
**"এই বস্তুটি কোনো কওমের ঘরে প্রবেশ করলে আল্লাহ তাদের মধ্যে লাঞ্ছনা প্রবেশ করিয়ে দেন।"**
(হাদীসটি ইমাম বুখারী তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে সংকলন করেছেন।)
ইমাম তাবরানী ভিন্ন সূত্রে আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
**"এমন কোনো পরিবার নেই যাদের কাছে ফাদান (এক জোড়া বলদ বা লাঙল) সকালে যায়, অথচ তারা লাঞ্ছিত হয় না।"**
আলিমগণ এই হাদীস এবং পূর্বে বর্ণিত হাদীসগুলোর মধ্যে দুটি দিক থেকে সামঞ্জস্য বিধান করেছেন:
ক) ‘লাঞ্ছনা’ দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, ভূমির সাথে সংশ্লিষ্ট সেই সকল অধিকার যা শাসকবর্গ তাদের কাছে খারাজ (ভূমি রাজস্ব) বা উশর (উৎপন্নের যাকাত) হিসেবে দাবি করে। যে ব্যক্তি নিজেকে এতে জড়ায়, সে নিজেকে লাঞ্ছনার সম্মুখীন করে।
আল-মুনাভী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-ফায়দ’ গ্রন্থে বলেছেন: "এটি কৃষিকাজের নিন্দা নয়, কারণ কৃষিকাজ প্রশংসনীয় এবং এতে প্রতিদান রয়েছে, কেননা তা থেকে বহু মানুষ উপকার লাভ করে। দুনিয়ার লাঞ্ছনা এবং প্রতিদানের অভাব—এ দুটির মধ্যে কোনো আবশ্যিক সম্পর্ক নেই।"
ইবনুত তীন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের গায়েবী সংবাদ প্রদান। কারণ বর্তমানে দেখা যায় যে, অধিকাংশ জুলুম কৃষকদের উপরেই হয়ে থাকে।"
খ) এর দ্বারা এমন ব্যক্তিকে বোঝানো হয়েছে, যে কৃষিকাজ ও চাষাবাদে এত বেশি লিপ্ত হয় যে, সে জিহাদ বা অন্যান্য ওয়াজিব কাজ থেকে বিরত থাকে। ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) এই ব্যাখ্যাই গ্রহণ করেছেন। তিনি হাদীসের শিরোনাম দিয়েছেন:
**"কৃষির সরঞ্জাম নিয়ে অতিমাত্রায় ব্যস্ত হওয়া বা নির্দেশিত সীমালঙ্ঘন করার পরিণাম সম্পর্কে সতর্কীকরণ।"**
কারণ এটা জানা কথা যে, উপার্জনের পিছনে অতিরিক্ত দৌঁড়ানো মানুষকে ওয়াজিব কাজ থেকে গাফেল করে দেয় এবং তাকে দুনিয়ার প্রতি অতি লোভী করে তোলে, মাটির প্রতি আসক্ত করে তোলে এবং জিহাদ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতে বাধ্য করে, যেমনটি বহু ধনী ব্যক্তির ক্ষেত্রে দেখা যায়।
এই ব্যাখ্যার সমর্থন পাওয়া যায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অন্য একটি বাণীতে:
**"যখন তোমরা ‘ঈনাহ’ পদ্ধতিতে বেচাকেনা করবে, গরুর লেজ আঁকড়ে ধরবে (অর্থাৎ কৃষিকর্মে সন্তুষ্ট হবে) এবং জিহাদ ছেড়ে দেবে, তখন আল্লাহ তোমাদের উপর এমন লাঞ্ছনা চাপিয়ে দেবেন যা তিনি দূর করবেন না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের দ্বীনের দিকে ফিরে আসবে।"**
11 - ` إذا تبايعتم بالعينة وأخذتم أذناب البقر ورضيتم بالزرع وتركتم الجهاد
سلط الله عليكم ذلا لا ينزعه حتى ترجعوا إلى دينكم `.
وهو حديث صحيح لمجموع طرقه، وقد وقفت على ثلاث منها كلها عن ابن عمر
رضي الله عنه مرفوعا:
الأولى: عن إسحاق أبي عبد الرحمن أن عطاء الخراساني حدثه أن نافعا حدثه عن
ابن عمر قال: فذكره.
أخرجه أبو داود (رقم 3462) والدولابي في ` الكنى ` (2 / 65) وابن عدي في
` الكامل ` (256 / 2) والبيهقي في ` السنن الكبرى ` (5 / 316) .
وتابعه فضالة بن حصين عن أيوب عن نافع به.
رواه ابن شاهين في جزء من ` الأفراد ` (1 / 1) وقال
` تفرد به فضالة `
وقال البيهقي: ` روي ذلك من وجهين عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عمر `.
يشير بذلك إلى تقوية الحديث، وقد وقفت على أحد الوجهين المشار إليهما وهو
الطريق:
الثانية: عن أبي بكر بن عياش عن الأعمش عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عمر.
أخرجه أحمد (رقم 4825) وفي ` الزهد ` (20 / 84 /
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমরা ‘ঈনা’ (সুদভিত্তিক) পদ্ধতিতে ব্যবসা করবে, গরুর লেজ ধরে থাকবে (পশুপালন নিয়ে মগ্ন হবে), কৃষিকাজে সন্তুষ্ট হয়ে যাবে এবং জিহাদ (আল্লাহর পথে সংগ্রাম) ছেড়ে দেবে; তখন আল্লাহ তোমাদের উপর এমন লাঞ্ছনা চাপিয়ে দেবেন যা ততক্ষণ পর্যন্ত দূর করবেন না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের দ্বীনের দিকে ফিরে আসবে।
12 - قوله صلى الله عليه وسلم:
` لا تتخذوا الضيعة فترغبوا في الدنيا `.
رواه الترمذي (4 / 264) وأبو الشيخ في ` الطبقات ` (298) وأبو يعلى في
` مسنده ` (251 / 1) والحاكم (4 / 222) وأحمد (رقم 2589، 4047)
والخطيب (1 / 18) عن شمر بن عطية عن مغيرة بن سعد بن الأخرم عن أبيه عن
ابن مسعود مرفوعا.
وحسنه الترمذي، وقال الحاكم
` صحيح الإسناد `، ووافقه الذهبي.
ثم رواه أحمد (رقم 4181، 4174) من طريق أبي التياح عن ابن الأخرم رجل من طيء
عن ابن مسعود مرفوعا بلفظ: ` نهى عن التبقر في الأهل والمال `.
وتابعه أبو حمزة قال:
سمعت رجلا من طيىء يحدث عن أبيه عن عبد الله مرفوعا به.
رواه البغوي في ` حديث علي بن الجعد ` (ج 6 / 20 / 2) فزاد في السند عن أبيه
وهو الصواب لرواية شمر كذلك.
وله شاهد من رواية ليث عن نافع عن ابن عمر مرفوعا باللفظ الأول.
أخرجه المحاملي في ` الأمالي ` (69 / 2) ، وسنده حسن في الشواهد.
وأورده الحافظ باللفظ الأول مجزوما به في شرح حديث أنس المتقدم في المقال
السابق ثم قال:
` قال القرطبي: يجمع بينه وبين حديث الباب بحمله على الاستكثار والاشتغال
به عن أمر الدين، وحمل حديث الباب على اتخاذها للكفاف أو لنفع المسلمين بها
وتحصيل توابعها `.
قلت: ومما يؤيد هذا الجمع اللفظ الثاني من حديث ابن مسعود، فإن (التبقر)
التكثر والتوسع. والله أعلم.
واعلم أن هذا التكثر المفضي إلى الانصراف عن القيام بالواجبات التي منها
الجهاد في سبيل الله هو المراد بالتهلكة المذكورة في قوله تعالى (ولا تلقوا
بأيديكم إلى التهلكة) وفي ذلك نزلت الآية خلافا لما يظن كثير من الناس! فقد
قال أسلم أبو عمران:
` غزونا من المدينة، نريد القسطنطينية، (وعلى أهل مصر عقبة بن عامر) وعلى
الجماعة عبد الرحمن بن خالد بن الوليد، والروم ملصقو ظهورهم بحائط المدينة،
فحمل رجل (منا) على العدو، فقال الناس: مه مه! لا إله إلا الله! يلقي
بيديه إلى التهلكة! فقال أبو أيوب الأنصاري: (إنما تأولون هذه الآية هكذا
أن حمل رجل يقاتل يلتمس الشهادة، أو يبلي من نفسه!) إنما نزلت هذه الآية
فينا معشر الأنصار، لما نصر الله نبيه وأظهر الإسلام قلنا (بيننا خفيا من
رسول الله صلى الله عليه وسلم) : هلم نقيم في أموالنا ونصلحها، فأنزل الله
تعالى (وأنفقوا في سبيل الله ولا تلقوا بأيديكم إلى التهلكة) فالإلقاء
بالأيدي إلى التهلكة: أن نقيم في أموالنا ونصلحها وندع الجهاد.
قال أبو عمران:
` فلم يزل أبو أيوب يجاهد في سبيل الله حتى دفن بالقسطنطينية `.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
**"তোমরা (বিশাল) ভূমি বা সম্পত্তি অর্জন করো না, তাহলে তোমরা দুনিয়ার প্রতি আসক্ত হয়ে পড়বে।"**
[ইমাম তিরমিযী হাদীসটিকে ‘হাসান’ বলেছেন।]
অন্য এক বর্ণনায় তিনি **"পরিবার ও সম্পদে মাত্রাতিরিক্ত প্রসারণ নিষিদ্ধ করেছেন।"** (অর্থাৎ, দুনিয়ার প্রতি অতিরিক্ত ঝোঁক।)
আল-কুরতুবি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এই হাদীসের অর্থ হলো, সম্পদ অর্জন যদি মানুষকে দ্বীনের কাজ থেকে দূরে সরিয়ে দেয় এবং তার প্রতি অতিরিক্ত মনোযোগ সৃষ্টি করে। তবে জীবিকার জন্য বা মুসলমানদের উপকারের জন্য তা গ্রহণ করা নিষিদ্ধ নয়।
আর এই অতিরিক্ত প্রাচুর্য, যা মানুষকে আল্লাহর পথে জিহাদসহ অন্যান্য ওয়াজিব কর্তব্য থেকে বিমুখ করে, তা-ই হলো মহান আল্লাহর এই বাণীর মাধ্যমে নির্দেশিত ‘ধ্বংস’ (তাহলুকা): **"তোমরা নিজেদের হাতে নিজেদেরকে ধ্বংসের মুখে ঠেলে দিও না।"** (সূরা বাকারা: ১৯৫)
আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াতের ব্যাখ্যা প্রসঙ্গে বলেন: যখন আল্লাহ তাঁর নবীকে সাহায্য করলেন এবং ইসলামকে বিজয়ী করলেন, তখন আমরা আনসারগণ নিজেদের মধ্যে বললাম: ’এসো, আমরা এখন আমাদের সম্পদে স্থিত হই এবং তা সংস্কার করি।’ তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: **"আর তোমরা আল্লাহর পথে ব্যয় করো এবং নিজেদের হাতে নিজেদেরকে ধ্বংসের মুখে ঠেলে দিও না।"** সুতরাং, (জিহাদ ছেড়ে দিয়ে) নিজেদের সম্পদে স্থিত থাকা এবং সেগুলোর সংস্কারে মগ্ন হওয়া—এটাই হলো ধ্বংসের মুখে নিজেদের ঠেলে দেওয়া।
(আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই ব্যাখ্যার ওপর অটল ছিলেন এবং কনস্ট্যান্টিনোপলে সমাহিত হওয়া পর্যন্ত আল্লাহর পথে জিহাদ চালিয়ে গেছেন।)
13 - ` غزونا من المدينة نريد القسطنطينية (وعلى أهل مصر عقبة بن عامر) وعلى
الجماعة عبد الرحمن بن خالد بن الوليد والروم ملصقوا ظهورهم بحائط المدينة
فحمل رجل (منا) على العدو، فقال الناس: مه مه! لا إله إلا الله! يلقي
بيديه إلى التهلكة! فقال أبو أيوب الأنصاري: (إنما تأولون هذه الآية هكذا
أن حمل رجل يقاتل يلتمس الشهادة أو يبلي من نفسه!) إنما نزلت هذه الآية فينا
معشر الأنصار لما نصر الله نبيه وأظهر الإسلام قلنا (بيننا خفيا من رسول الله
صلى الله عليه وسلم) : هلم نقيم في أموالنا ونصلحها، فأنزل الله تعالى (وأنفقوا في سبيل الله ولا تلقوا بأيديكم إلى التهلكة) فالإلقاء بالأيدي إلى
التهلكة: أن نقيم في أموالنا ونصلحها وندع الجهاد.
قال أبو عمران: فلم يزل أبو أيوب يجاهد في سبيل الله حتى دفن بالقسطنطينية `.
رواه أبو داود (1 / 393) وابن أبي حاتم في ` تفسيره ` (1 / 10 / 2)
والحاكم (2 / 275) وقال: ` صحيح على شرط الشيخين ` ووافقه الذهبي،
وقد وهما، فإن الشيخين لم يخرجا لأسلم هذا، فالحديث صحيح فقط.
আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আমরা মদীনা থেকে কনস্টান্টিনোপল (কুসতুনতিনিয়াহ্) অভিমুখে যুদ্ধে বের হলাম। (তখন) মিসরের অধিবাসীদের সেনাপতি ছিলেন উকবা ইবনু আমির এবং (পুরো) দলের সেনাপতি ছিলেন আবদুর রহমান ইবনু খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ। রোমীয়রা শহরের দেয়ালের সাথে নিজেদের পিঠ ঠেকিয়ে রেখেছিল। তখন আমাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি শত্রুর ওপর হামলা করল।
লোকেরা তখন বলতে লাগল: ‘থামো! থামো! লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ! সে তো নিজের হাতকে ধ্বংসের দিকে ঠেলে দিচ্ছে!’
তখন আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (তোমরা তো এই আয়াতের এমন ব্যাখ্যা করছ যে,) কোনো ব্যক্তি শাহাদাত লাভের উদ্দেশ্যে কিংবা নিজের জীবনকে বিপন্ন করে লড়াই করলেই সে (নিজেকে) ধ্বংসের দিকে ঠেলে দিল? (তোমরা এমন ব্যাখ্যা করছ!)
এই আয়াতটি তো আমাদের আনসারদের দল সম্পর্কে অবতীর্ণ হয়েছিল। যখন আল্লাহ তাআলা তাঁর নবীকে সাহায্য করলেন এবং ইসলামকে বিজয়ী করলেন, তখন আমরা (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে গোপন রেখে) নিজেদের মধ্যে আলোচনা করলাম: ‘চলো, আমরা আমাদের ধন-সম্পদের কাছে ফিরে যাই এবং সেগুলোর দেখাশোনা ও সংস্কার করি।’
তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: **"আর তোমরা আল্লাহর পথে ব্যয় করো এবং নিজেদের হাতকে ধ্বংসের দিকে ঠেলে দিও না।"** (সূরা বাকারা: ১৯৫)
সুতরাং (আয়াতে উল্লিখিত) নিজেদের হাতকে ধ্বংসের দিকে ঠেলে দেওয়া হলো—আমাদের ধন-সম্পদের কাছে ফিরে যাওয়া, সেগুলোর সংস্কারে ব্যস্ত হওয়া এবং জিহাদ ত্যাগ করা।
আবু ইমরান (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর রাস্তায় জিহাদ করা থেকে বিরত হননি, যতক্ষণ না তাকে কনস্টান্টিনোপলে দাফন করা হয়।
14 - عن قزعة قال:
أرسلني ابن عمر في حاجة، فقال: تعال حتى أودعك كما ودعني رسول الله
صلى الله عليه وسلم وأرسلني في حاجة له فقال:
` أستودع الله دينك وأمانتك وخواتيم عملك `.
من أدبه صلى الله عليه وسلم عند التوديع:
فيه ثلاثة أحاديث: الأول عن ابن عمر، وله عنه طرق:
أ - عن قزعة قال:
أرسلني ابن عمر في حاجة، فقال: تعال حتى أودعك كما ودعني رسول الله
صلى الله عليه وسلم وأرسلني في حاجة له فقال:
` أستودع الله دينك وأمانتك وخواتيم عملك `.
رواه أبو داود (رقم 2600) والحاكم (2 / 97) وأحمد (2 / 25 و 38 و 136)
وابن عساكر (14 / 290 / 2 و 15 / 469 / 1) عن عبد العزيز بن عمر ابن عبد
العزيز عنه.
ورجاله ثقات، لكن اختلف فيه على عبد العزيز، فرواه بعضهم هكذا، وأدخل
بعضهم بينه وبين قزعة رجلا سماه بعضهم ` إسماعيل بن جرير ` وسماه آخرون
` يحيى بن إسماعيل بن جرير `، وقد ساق الحافظ ابن عساكر الروايات المختلفة
في ذلك.
وقال الحافظ في ` التقريب ` إن الصواب قول من قال: ` يحيى بن إسماعيل `.
قلت: وهو ضعيف، لكن يتقوى الحديث بالطرق الأخرى، وفي رواية لابن عساكر:
` كما ودعني رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخذ بيدي يصافحني، ثم قال: `
فذكره.
ب - عن سالم أن ابن عمر كان يقول للرجل إذا أراد سفرا: ادن مني أودعك كما
كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يودعنا فيقول: فذكره.
أخرجه الترمذي (2 / 255 طبع بولاق) وأحمد (2 / 7)
وعبد الغني المقدسي
في ` الجزء الثالث والستون (41 / 1) ` عن سعيد بن خثيم عن حنظلة عنه.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه من حديث سالم `.
قلت: وهو على شرط مسلم غير أن سعيدا قد خولف في سنده، فرواه الحاكم
(1 / 442 و 2 / 97) عن إسحاق بن سليمان والوليد بن مسلم عن حنظلة بن
أبي سفيان عن القاسم بن محمد قال:
كنت عند ابن عمر فجاءه رجل فقال: أردت سفرا، فقال: انتظر حتى أودعك:
فذكره، وقال:
` صحيح على شرط الشيخين ` ووافقه الذهبي وهو كما قالا.
ولعل الترمذي إنما استغربه من حديث سالم من أجل مخالفة هذين الثقتين: إسحاق
ابن سليمان والوليد بن مسلم لابن خثيم حيث جعله من رواية حنظلة عن سالم،
وجعلاه من رواية حنظلة عن القاسم بن محمد عنه. ولعله أصح.
وأخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (270 / 2) من طريق الوليد بن مسلم وحده.
ج - عن مجاهد قال:
` خرجت إلى العراق أنا ورجل معي، فشيعنا عبد الله بن عمر، فلما أراد أن
يفارقنا قال: إنه ليس معي ما أعطيكما (كذا الأصل، ولعله: أعظكما) ،
ولكن سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: إذا استودع الله شيئا حفظه،
وإني أستودع الله دينكما وأمانتكما، وخواتيم عملكما `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (2376) بسند صحيح.
هـ - عن نافع عنه قال:
كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ودع رجلا أخذ بيده فلا يدعها حتى يكون
الرجل هو يدع يد النبي صلى الله عليه وسلم ويقول: فذكره.
رواه الترمذي (2 / 255 طبع بولاق) وقال: ` حديث غريب من هذا الوجه `.
قلت: يعني أنه ضعيف لخصوص هذه الطريق، وذلك لأنها من رواية إبراهيم
ابن عبد الرحمن بن زيد بن أمية عن نافع وهو أعني إبراهيم هذا مجهول.
لكنه لم ينفرد به، فقد رواه ابن ماجه (2 / 943 رقم 2826) عن ابن أبي ليلى
عنه. وابن أبي ليلى سيء الحفظ واسمه محمد بن عبد الرحمن، ولم يذكر قصة
الأخذ باليد.
আবদুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ক্বাযআ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে একটি কাজে পাঠালেন। তিনি বললেন, "এসো, আমি তোমাকে বিদায় জানাই, যেভাবে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে বিদায় জানিয়েছিলেন যখন তিনি আমাকে তাঁর একটি কাজে পাঠিয়েছিলেন।"
অতঃপর তিনি বললেন:
"আমি তোমার দ্বীনকে (ধর্মকে), তোমার আমানতকে (দায়িত্বকে) এবং তোমার কাজের শেষ পরিণতিকে আল্লাহর কাছে সোপর্দ করছি।" (আস্তাওদিউল্লাহা দীনাকা ওয়া আমানাতাকা ওয়া খাওয়াতীমা আমালিকা)।
15 - عن عبد الله الخطمي قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يستودع
الجيش، قال:
` أستودع الله دينك وأمانتك وخواتيم عملك `.
(عن عبد الله الخطمي) قال:
كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يستودع الجيش، قال: فذكره.
رواه أبو داود وابن السني في ` عمل اليوم والليلة ` (رقم 498) بإسناد صحيح على شرط مسلم. غير أبي جعفر الخطمي - واسمه عمير بن يزيد - وهو ثقة اتفاقا
আব্দুল্লাহ আল-খাতমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো সেনাবাহিনীকে (আল্লাহর হাওলায়) ন্যস্ত করতে চাইতেন (বা বিদায় জানাতে চাইতেন), তখন তিনি বলতেন:
"আমি আল্লাহ্র কাছে তোমার দ্বীন, তোমার আমানত এবং তোমার কর্মের শেষ ফল ন্যস্ত করলাম।"
16 - عن أبى هريرة: أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا ودع أحدا قال:
` أستودع الله دينك وأمانتك وخواتيم عملك `.
أخرجه أحمد (2 / 358) عن ابن لهيعة عن الحسن بن ثوبان عن موسى ابن وردان عنه
قلت: ورجاله موثقون، غير أن ابن لهيعة سيء الحفظ وقد خالفه في متنه الليث
ابن سعد وسعيد بن أبي أيوب عن الحسن بن ثوبان به بلفظ:
` أستودعك الله الذي لا تضيع ودائعه `.
وهذا عن أبي هريرة أصح وسنده جيد، رواه أحمد (1 / 403) .
ثم رأيت ابن لهيعة قد رواه بهذا اللفظ أيضا عند ابن السني رقم (501) .
وابن ماجه (2 / 943 رقم 2825) فتأكدنا من خطئه في اللفظ الأول.
من فوائد الحديث:
يستفاد من هذا الحديث الصحيح جملة فوائد:
الأولى: مشروعية التوديع بالقول الوارد فيه ` أستودع الله دينك وأمانتك
وخواتيم عملك ` أو يقول: ` أستودعكم الله الذي لا تضيع ودائعه `.
الثانية: الأخذ باليد الواحدة في المصافحة، وقد جاء ذكرها في أحاديث كثيرة،
وعلى ما دل عليه هذا الحديث يدل اشتقاق هذه اللفظة في اللغة.
ففي ` لسان العرب `: ` والمصافحة: الأخذ باليد، والتصافح مثله، والرجل
يصافح الرجل: إذا وضع صفح كفه في صفح كفه، وصفحا كفيهما: وجهاهما، ومنه
حديث المصافحة عند اللقاء، وهي مفاعلة من إلصاق صفح الكف بالكف وإقبال الوجه
على الوجه `.
قلت: وفي بعض الأحاديث المشار إليها ما يفيد هذا المعنى أيضا، كحديث حذيفة
مرفوعا: ` إن المؤمن إذا لقي المؤمن فسلم عليه وأخذ بيده فصافحه تناثرت
خطاياهما كما يتناثر ورق الشجر `.
قال المنذري (3 / 270) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` ورواته لا أعلم فيهم مجروحا `.
قلت: وله شواهد يرقى بها إلى الصحة، منها: عن أنس عند الضياء المقدسي
في ` المختارة ` (ق 240 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কাউকে বিদায় দিতেন, তখন তিনি বলতেন:
`আস্তাওদি‘উল্লাহা দীনাকা ওয়া আমানাতাকা ওয়া খাওয়াতীমা আমালিক` (আমি তোমার দীন, তোমার আমানত এবং তোমার শেষ আমলকে আল্লাহর কাছে সোপর্দ করলাম)।
(এই বিষয়ে অন্য বিশুদ্ধ সূত্রে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের এই বাণীটিও এসেছে):
`আস্তাওদি‘উকাল্লাহা আল্লাযী লা তাদী‘উ ওয়াদা-ই‘উহ` (আমি তোমাকে সেই আল্লাহর কাছে সোপর্দ করলাম, যাঁর কাছে রাখা আমানত নষ্ট হয় না)।
17 - ` إن نبي الله أيوب صلى الله عليه وسلم لبث به بلاؤه ثمان عشرة سنة فرفضه
القريب والبعيد إلا رجلين من إخوانه كانا يغدوان إليه ويروحان، فقال أحدهما
لصاحبه ذات يوم: تعلم والله لقد أذنب أيوب ذنبا ما أذنبه أحد من العالمين فقال
له صاحبه: وما ذاك؟ قال: منذ ثمان عشرة سنة لم يرحمه الله فيكشف ما به فلما
راحا إلى أيوب لم يصبر الرجل حتى ذكر ذلك له، فقال أيوب: لا أدري ما تقولان
غير أن الله
تعالى يعلم أني كنت أمر بالرجلين يتنازعان، فيذكران الله فأرجع
إلى بيتي فأكفر عنهما كراهية أن يذكر الله إلا في حق، قال: وكان يخرج إلى
حاجته فإذا قضى حاجته أمسكته امرأته بيده حتى يبلغ، فلما كان ذات يوم أبطأ
عليها وأوحي إلى أيوب أن * (اركض برجلك هذا مغتسل بارد وشراب) * فاستبطأته
فتلقته تنظر وقد أقبل عليها قد أذهب الله ما به من البلاء وهو أحسن ما كان
فلما رأته قالت: أي بارك الله فيك هل رأيت نبي الله هذا المبتلى، والله على
ذلك ما رأيت أشبه منك إذ كان صحيحا، فقال: فإني أنا هو، وكان له أندران
(أي بيدران) : أندر للقمح وأندر للشعير، فبعث الله سحابتين، فلما كانت
إحداهما على أندر القمح أفرغت فيه الذهب حتى فاض وأفرغت الأخرى في أندر الشعير
الورق حتى فاض `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (176 /
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
নিশ্চয় আল্লাহর নবী আইয়ুব (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর আঠারো বছর ধরে পরীক্ষা (বিপদ) বিদ্যমান ছিল। ফলে নিকটাত্মীয় ও দূরবর্তী সকলেই তাঁকে ত্যাগ করেছিল, তবে তাঁর ভাইদের মধ্যে দু’জন লোক ছাড়া। তারা নিয়মিত সকালে ও সন্ধ্যায় তাঁর কাছে যাতায়াত করত।
একদিন তাদের একজন তার সাথীকে বলল: আল্লাহর কসম, তুমি কি জানো? আইয়ুব এমন এক পাপ করেছেন, যা বিশ্বের কেউই করেনি। তখন তার সাথী তাকে জিজ্ঞেস করল: সেটা কী? সে বলল: আঠারো বছর ধরে আল্লাহ তার প্রতি রহম (দয়া) করেননি এবং তাঁর কষ্ট দূর করেননি।
এরপর যখন তারা আইয়ুব (আঃ)-এর কাছে গেলেন, তখন লোকটি ধৈর্য ধারণ করতে পারল না এবং সেই কথা তাঁকে বলে দিল। আইয়ুব (আঃ) বললেন: তোমরা কী বলছ, তা আমি জানি না। তবে আল্লাহ তাআলা জানেন যে, আমি এমন দু’জন লোকের পাশ দিয়ে অতিক্রম করতাম যারা ঝগড়া করছিল এবং তারা আল্লাহর নাম নিচ্ছিল। তখন আমি আল্লাহর নাম শুধু যথার্থ ক্ষেত্রেই উচ্চারিত হোক—এই অপছন্দ থেকে আমার বাড়িতে ফিরে গিয়ে তাদের পক্ষ থেকে কাফফারা আদায় করতাম।
বর্ণনাকারী বলেন: তিনি (আইয়ুব আঃ) তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজনে বের হতেন। যখন তাঁর প্রয়োজন মিটে যেত, তখন তাঁর স্ত্রী তাঁর হাত ধরে রাখতেন, যতক্ষণ না তিনি (নিরাপদে) পৌঁছে যেতেন।
একদিন তিনি (প্রয়োজন সেরে) তাঁর স্ত্রীর কাছে ফিরতে দেরি করলেন। এই সময় আইয়ুব (আঃ)-এর কাছে ওহী এলো: “তুমি তোমার পা দ্বারা আঘাত করো। এটি শীতল স্নান ও পানীয়।”
স্ত্রী তাঁকে ফিরতে দেরি হতে দেখে তাঁকে খুঁজতে গেলেন। তিনি দেখলেন যে, আইয়ুব (আঃ) তাঁর দিকে আসছেন এবং আল্লাহ তাঁর সকল রোগ ও কষ্ট দূর করে দিয়েছেন। তিনি আগের চেয়েও সুন্দর হয়ে গিয়েছিলেন।
তাঁর স্ত্রী তাঁকে দেখে বললেন: হে আল্লাহ তোমাকে বরকত দিন! আপনি কি আল্লাহর এই মুসিবতগ্রস্ত নবীকে দেখেছেন? আল্লাহর কসম, সুস্থ অবস্থায় তিনি আপনার চেয়ে বেশি অন্য কারো মতো ছিলেন না। তিনি বললেন: আমিই সেই ব্যক্তি।
তাঁর দুটি শস্যের গোলা ছিল (শস্য রাখার স্থান): একটি গমের জন্য এবং অপরটি যবের জন্য। এরপর আল্লাহ দুটি মেঘ পাঠালেন। যখন একটি মেঘ গমের গোলায় এলো, তখন তা স্বর্ণ বর্ষণ করতে লাগল, ফলে গোলা পূর্ণ হয়ে উপচে পড়ল। আর অপর মেঘটি যবের গোলায় রৌপ্য (রূপা) বর্ষণ করল, ফলে তাও পূর্ণ হয়ে উপচে পড়ল।
18 - ` حيثما مررت بقبر كافر فبشره بالنار `.
رواه الطبراني (1 / 19 / 1) حدثنا علي بن عبد العزيز أنبأنا محمد بن أبي نعيم
الواسطي أنبأنا إبراهيم بن سعد عن الزهري عن عامر بن سعد عن أبيه قال:
جاء أعرابي إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن أبي كان يصل الرحم وكان
وكان فأين هو؟ قال: في النار، فكأن الأعرابي وجد من ذلك فقال: يا رسول
الله فأين أبوك؟ قال: فذكره.
قال: فأسلم الأعرابي بعد ذلك، فقال: لقد كلفني رسول الله صلى الله عليه وسلم
تعبا: ما مررت بقبر كافر إلا بشرته بالنار.
قلت: وهذا سند صحيح رجاله كلهم ثقات معروفون، وطرح ابن معين لمحمد
ابن أبي نعيم لا يتلفت إليه بعد توثيق أحمد وأبي حاتم إياه، لاسيما وقد
توبع في إسناده، أخرجه الضياء في ` المختارة ` (1 / 333) من طريقين عن زيد
بن أخزم حدثنا يزيد بن هارون أنبأنا إبراهيم بن سعد به وقال:
` سئل الدارقطني عنه فقال: يرويه محمد بن أبي نعيم والوليد بن عطاء بن الأغر
عن إبراهيم بن سعد عن الزهري عن عامر بن سعد، وغيره يرويه عن إبراهيم بن سعد
عن الزهري مرسلا، وهو الصواب.
قلت: وهذه الرواية التي رويناها تقوي المتصل `.
قلت: وزيد بن أخزم ثقة حافظ وكذلك شيخه يزيد بن هارون، فهي متابعة قوية
لابن أبي نعيم الواسطي تشهد لصدقه وضبطه، لكن قد خولف زيد بن أخزم في إسناده
فقال ابن ماجه (رقم 1573) : حدثنا محمد بن إسماعيل بن البختري الواسطي:
حدثنا يزيد بن هارون عن إبراهيم بن سعد عن الزهري عن سالم عن أبيه قال: جاء
أعرابي. الحديث بتمامه.
وهذا ظاهره الصحة، ولذلك قال في ` الزوائد ` (ق 97 / 2) : ` إسناده صحيح
رجاله ثقات، محمد بن إسماعيل وثقه ابن حبان والدارقطني والذهبي، وباقي
رجال الإسناد على شرط الشيخين `.
قلت: لكن قال الذهبي فيه: ` لكنه غلط غلطة ضخمة `. ثم ساق له حديثا صحيحا
زاد فيه ` الرمي عن النساء ` وهي زيادة منكرة وقد رواه غيره من الثقات فلم
يذكر فيه هذه الزيادة. وأقره الحافظ ابن حجر على ذلك.
قلت: فالظاهر أنه أخطأ في إسناد هذا الحديث أيضا فقال فيه.. عن سالم عن أبيه
والصواب عن عامر بن سعد عن أبيه كما في رواية ابن أخزم وغيره، وقد قال
الهيثمي في ` المجمع ` (1 /
সা’দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক বেদুঈন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললেন, "আমার পিতা আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা করতেন এবং (অন্যান্য) ভালো কাজ করতেন। তিনি এখন কোথায় আছেন?"
তিনি (নবী সাঃ) বললেন, "তিনি জাহান্নামে।"
তাতে বেদুঈনটি যেন মনঃক্ষুণ্ণ হলো। সে বললো, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আপনার পিতা কোথায়?"
বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি (নবী সাঃ) সেই প্রসঙ্গটি উল্লেখ করলেন (অর্থাৎ তাঁর পিতার অবস্থানও জানালেন)।
বর্ণনাকারী বলেন, এরপর বেদুঈনটি ইসলাম গ্রহণ করলো। সে বললো, "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে কঠিন দায়িত্ব দিয়েছেন: আমি যখনই কোনো কাফিরের কবরের পাশ দিয়ে যাই, তখনই তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দিই। (নবী সাঃ বলেছেন:) ’তোমরা যখনই কোনো কাফিরের কবরের পাশ দিয়ে যাবে, তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দাও।’"
19 - ` لا تدخلوا على هؤلاء القوم المعذبين إلا أن تكونوا باكين، فإن لم تكونوا
باكين فلا تدخلوا عليهم أن يصيبكم ما أصابهم `.
(وتقنع بردائه وهو على الرحل) .
(عن ابن عمر) :
ورواه أحمد (2 / 9، 58، 66، 72، 74، 91، 96، 113، 137) والزيادة
له.
وقد ترجم لهذا الحديث صديق خان في ` نزل الأبرار ` (ص 293) بـ ` باب البكاء
والخوف عند المرور بقبور الظالمين وبمصارعهم وإظهار الافتقار إلى الله تعالى
والتحذير من الغفلة عن ذلك `.
أسأل الله تعالى أن يفقهنا في ديننا وأن يلهمنا العمل به إنه سميع مجيب.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
"তোমরা এই শাস্তিপ্রাপ্ত জাতির (ধ্বংসাবশেষে) প্রবেশ করো না, যদি না তোমরা ক্রন্দনরত থাকো। যদি তোমরা ক্রন্দনরত না থাকো, তবে তাদের উপর প্রবেশ করো না, পাছে তাদের উপর যা আপতিত হয়েছিল, তা তোমাদের উপরও আপতিত হয়।"
(এবং তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) সওয়ারীর উপর থাকা অবস্থায় তাঁর চাদর দ্বারা মুখমণ্ডল ঢেকে নিলেন।)
20 - ` أفلا تتقي الله في هذه البهيمة التي ملكك الله إياها؟! فإنه شكا إلي أنك
تجيعه وتدئبه `.
رواه أبو داود (1 / 400) والحاكم (2 /
আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"তুমি কি এই পশুর ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করবে না, যাকে আল্লাহ তোমার মালিকানাধীন করে দিয়েছেন?! কেননা, সে আমার কাছে অভিযোগ করেছে যে তুমি তাকে অভুক্ত রাখো এবং অতিরিক্ত পরিশ্রম করাও।"