সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
141 - عن أنس بن مالك:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أتى أم حرام، فأتيناه بتمر وسمن فقال:
` ردوا هذا في وعائه وهذا في سقائه فإني صائم `.
(عن أنس بن مالك) :
قال: ثم قام فصلى بنا ركعتين تطوعا، فأقام أم حرام وأم سليم خلفنا،
وأقامني عن يمينه، - فيما يحسب ثابت - قال: فصلى بنا تطوعا على بساط، فلما
قضى صلاته، قالت أم سليم: إن لي خويصة: خويدمك أنس، ادع الله له، فما ترك
يومئذ خيرا من خير الدنيا والآخرة إلا دعا لي به ثم قال: اللهم أكثر ماله
وولده وبارك له فيه، قال أنس: فأخبرتني ابنتي أني قد رزقت من صلبي بضعا
وتسعين، وما أصبح في الأنصار رجل أكثر مني مالا، ثم قال أنس: يا ثابت، ما
أملك صفراء ولا بيضاء إلا خاتمي! `.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط مسلم، وقد أخرجه أبو داود (608) حدثنا موسى
ابن إسماعيل حدثنا حماد به، دون قوله ` فلما قضى صلاته.... ` ثم أخرجه أحمد
(3 /
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উম্মে হারামের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে গেলেন। আমরা তাঁকে খেজুর ও মাখন/ঘি দিলাম। তখন তিনি বললেন: "এটি এর পাত্রে রাখো এবং এটি এর মশকে (চামড়ার থলে) রাখো, কারণ আমি রোজা রেখেছি।"
(আনাস ইবনে মালিক বলেন): এরপর তিনি (নবীজী) দাঁড়ালেন এবং আমাদের নিয়ে নফল দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন। তিনি উম্মে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আমাদের পেছনে দাঁড় করালেন, আর আমাকে তাঁর ডান পাশে দাঁড় করালেন—যেমনটি সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ধারণা করেন— তিনি (আনাস) বলেন: নবীজী একটি চাটাইয়ের উপর দাঁড়িয়ে আমাদের নিয়ে নফল সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার একটি বিশেষ আবেদন আছে: আপনার এই ছোট সেবক আনাস, আপনি তার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন। অতঃপর তিনি সেদিন আমার জন্য দুনিয়া ও আখিরাতের কোনো কল্যাণই বাদ রাখলেন না যার জন্য তিনি দু‘আ করেননি। এরপর তিনি (নবীজী) দু‘আ করলেন: "হে আল্লাহ! তুমি তার সম্পদ ও সন্তান-সন্ততিকে বৃদ্ধি করে দাও এবং তাতে তাকে বরকত দাও।"
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার কন্যা আমাকে জানিয়েছেন যে, আমি আমার ঔরসে নব্বইয়ের উপরে সংখ্যায় সন্তান লাভ করেছি। আর আনসারদের মধ্যে এমন কোনো পুরুষ নেই যার আমার চেয়ে বেশি সম্পদ আছে। এরপর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (তাঁর ছাত্র সাবেতকে) বললেন: হে সাবেত! আমার আংটি ছাড়া আমার কাছে সোনা বা রূপার (স্বর্ণমুদ্রা বা রৌপ্যমুদ্রা) কিছুই নেই!
142 - ` على المؤمنين في صدقة الثمار - أو مال العقار - عشر ما سقت العين وما سقت
السماء، وعلى ما يسقى بالغرب نصف العشر `.
أخرجه ابن أبي شيبة (4 / 22) والدارقطني (215) والبيهقي (4 / 130) من
طريق ابن جريج: أخبرني نافع عن ابن عمر قال:
` كتب النبي صلى الله عليه وسلم إلى أهل اليمن إلى الحارث بن عبد كلال ومن معه
من معافر وهمدان ... ` فذكره.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرجه البخاري وأصحاب السنن
الأربعة وغيرهم من طريق سالم عن ابن عمر مرفوعا نحوه.
وورد من حديث جماعة آخرين من الصحابة كجابر وأبي هريرة ومعاذ بن جبل،
وعبد الله بن عمرو، وعمرو بن حزم، وقد أخرجت أحاديثهم في ` إرواء الغليل `
(790) .
(الغرب) بسكون الراء الدلو العظيمة التي تتخذ من جلد ثور.
فقه الحديث:
وإنما أوردت هذه الرواية بصورة خاصة لقوله في صدرها:
` على المؤمنين ` ففيه فائدة هامة لا توجد في سائر الروايت.
قال البيهقي:
` وفيه كالدلالة على أنها لا تؤخذ من أهل الذمة `.
قلت: وكيف تؤخذ منهم وهم على شركهم وضلالهم، فالزكاة لا تزكيهم وإنما
تزكي المؤمن المزكي من درن الشرك كما قال تعالى:
(خذ من أموالهم صدقة تطهرهم وتزكيهم بها، وصل عليهم إن صلاتك سكن لهم) .
فهذه الآية تدل دلالة ظاهرة على
أن الزكاة إنما تؤخذ من المؤمنين، لكن الحديث
أصرح منها دلالة على ذلك ...
وإن من يدرس السيرة النبوية، وتاريخ الخلفاء الراشدين وغيرهم من خلفاء
المسلمين وملوكهم يعلم يقينا أنهم لم يكونوا يأخذون الزكاة من غير المسلمين من
المواطنين، وإنما كانوا يأخذون منهم الجزية كما ينص عليها الكتاب والسنة.
فمن المؤسف أن ينحرف بعض المتفقهة عن سبيل المؤمنين باسم الإصلاح تارة.
والعدالة الاجتماعية تارة، فينكروا ما ثبت في الكتاب والسنة وجرى عليه عمل
المسلمين بطرق من التأويل أشبه ما تكون بتأويلات الباطنيين من جهة، ومن جهة
أخرى يثبتون، ما لم يكونوا يعرفون، بل ما جاء النص بنفيه. والأمثلة على ذلك
كثيرة، وحسبنا الآن هذه المسألة التي دل عليها هذا الحديث وكذا الآية
الكريمة، فقد قرأنا وسمعنا أن بعض الشيوخ اليوم يقولون: بجواز أن تأخذ
الدولة الزكاة من أغنياء جميع المواطنين على اختلاف أديانهم مؤمنهم وكافرهم،
ثم توزع على فقرائهم دون أي تفريق، ولقد سمعت منذ أسابيع معنى هذا من أحد
كبار مشايخ الأزهر في ندوة تلفزيونية كان يتكلم فيها عن الضمان الاجتماعي في
الإسلام، ومما ذكره أن الاتحاد القومي في القاهرة سيقوم بجمع الزكاة من جميع
أغنياء المواطنين. وتوزيعها على فقرائهم! فقام أحد الحاضرين أمامه في الندوة
وسأله عن المستند في جواز ذلك فقال: لما عقدنا جلسات الحلقات الاجتماعية
اتخذنا في بعض جلساتها قرارا بجواز ذلك اعتمادا على مذهب من المذاهب الإسلامية
وهو المذهب الشيعي. وأنا أظن أنه يعني المذهب الزيدي.
وهنا موضع العبرة، لقد أعرض هذا الشيخ ومن رافقه في تلك الجلسة عن دلالة
الكتاب والسنة واتفاق السلف على أن الزكاة خاصة بالمؤمنين، واعتمد في
خلافهم على المذهب الزيدي! وهل يدري القارىء الكريم ما هو السبب في ذلك؟
ليس هو إلا موافقة بعض الحكام على سياستهم الاجتماعية والاقتصادية، وليتها
كانت على
منهج إسلامي إذن لهان الأمر بعض الشيء في هذا الخطأ الجزئي ولكنه
منهج غير إسلامي، بل هو قائم على تقليد بعض الأوربيين الذين لا دين لهم!
والإعراض عن الاستفادة من شريعة الله تعالى التي أنزلها على قلب محمد صلى الله
عليه وسلم لتكون نورا وهداية للناس في كل زمان ومكان، فإلى الله المشتكى من
علماء السوء والرسوم الذين يؤيدون الحكام الجائرين بفتاويهم المنحرفة عن جادة
الإسلام، وسبيل المسلمين، والله عز وجل يقول: (ومن يشاقق الرسول من بعد
ما تبين له الهدى ويتبع غير سبيل المؤمنين نوله ما تولى ونصله جهنم وساءت
مصيرا) .
هذا، وفي الحديث قاعدة فقهية معروفة وهي أن زكاة الزرع تختلف باختلاف المؤنة
والكلفة عليه، فإن كان يسقى بماء السماء والعيون والأنهار فزكاته العشر،
وإن كان يسقى بالدلاء والنواضح (الاترتوازية) ونحوها فزكاته نصف العشر.
ولا تجب هذه الزكاة في كل ما تنتجه الأرض ولو كان قليلا، بل ذلك مقيد بنصاب
معروف في السنة، وفي ذلك أحاديث معروفة.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আহলে ইয়েমেনের কাছে, অর্থাৎ হারিছ ইবনে আব্দুল কালাল এবং তাঁর সাথে থাকা মা’আফির ও হামদান গোত্রের কাছে এই মর্মে চিঠি লিখেছিলেন (যে):
"মুমিনদের উপর ফল-ফসল অথবা স্থাবর সম্পত্তির (আয়-এর) সাদাকা (যাকাত) হলো— যা ঝর্ণা বা নদী দ্বারা অথবা আকাশ (বৃষ্টি) দ্বারা সিঞ্চিত হয়, তার দশ ভাগের এক ভাগ (এক-দশমাংশ)। আর যা বড় ডোল বা বালতি (’গরব’) দ্বারা সেচ করা হয়, তার উপর বিশ ভাগের এক ভাগ (অর্ধেক দশমাংশ)।"
143 - ` أشد الناس بلاء الأنبياء، ثم الأمثل فالأمثل، يبتلى الرجل على حسب (وفي
رواية: قدر) دينه، فإن كان دينه صلبا اشتد بلاؤه وإن كان في دينه رقة ابتلي
على حسب دينه، فما يبرح البلاء بالعبد حتى يتركه يمشي على الأرض ما عليه خطيئة
`.
رواه الترمذي (2 / 64) وابن ماجه (4023) والدارمي (2 /320) والطحاوي
(3 / 61) وابن حبان (699) والحاكم (1 / 40، 41) وأحمد (1 /
172،
174، 180، 185) والضياء في ` المختارة ` (1 / 349) من طريق عاصم بن بهدلة
حدثني مصعب بن سعد عن أبيه قال:
` قلت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: أي الناس أشد بلاء؟ قال: فقال:
الأنبياء ثم ... ؟ ` الحديث.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
قلت: وهذا سند جيد رجاله كلهم رجال الشيخين، غير أن عاصما إنما أخرجا
له مقرونا بغيره، ولم يتفرد به، فقد أخرجه ابن حبان (698) والمحاملي
(3 / 92 / 2) والحاكم أيضا من طريق العلاء بن المسيب عن أبيه عن سعد به،
بالرواية الثانية.
والعلاء بن المسيب وأبوه ثقتان من رجال البخاري. فالحديث صحيح. والحمد لله
وله شاهد بلفظ:
` أشد الناس بلاء الأنبياء، ثم الصالحون، إن كان أحدهم ليبتلى بالفقر، حتى
ما يجد أحدهم إلا العباءة التي يحويها، وإن كان أحدهم ليفرح بالبلاء كما يفرح
أحدكم بالرخاء `.
সা’দ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"মানবজাতির মধ্যে সবচেয়ে কঠিন পরীক্ষা (বিপদাপদ) আসে নবী-রাসূলদের উপর, এরপর তাদের উপর যারা (ঈমান ও আমলে) তাদের কাছাকাছি, এরপর তাদের উপর যারা (ঈমান ও আমলে) তাদের কাছাকাছি। মানুষকে তার দ্বীনের (ঈমানের) শক্তি অনুযায়ী পরীক্ষা করা হয়। যদি তার দ্বীন মজবুত ও দৃঢ় হয়, তবে তার পরীক্ষাও কঠিন হয়। আর যদি তার দ্বীনে দুর্বলতা থাকে, তবে তাকে তার দ্বীন অনুযায়ী পরীক্ষা করা হয়। বান্দার উপর বিপদাপদ লেগেই থাকে, যতক্ষণ না তা তাকে এমন অবস্থায় ছেড়ে দেয় যে সে জমিনের উপর চলাফেরা করে কিন্তু তার উপর কোনো পাপ থাকে না।"
144 - ` أشد الناس بلاء الأنبياء، ثم الصالحون، إن كان أحدهم ليبتلى بالفقر، حتى
ما يجد أحدهم إلا العباءة التي يحويها، وإن كان أحدهم ليفرح بالبلاء كما يفرح
أحدكم بالرخاء `.
أخرجه ابن ماجه (4024) وابن سعد (2 / 208) والحاكم (4 / 307) من طريق
هشام بن سعد عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار عن أبي سعيد الخدري قال:
` دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك، فوضعت يدي عليه، فوجدت حره
بين يدي فوق اللحاف، فقلت: يا رسول الله! ما أشدها عليك! قال: إنا كذلك،
يضعف لنا البلاء، ويضعف لنا الأجر. قلت: يا رسول الله! أي الناس أشد
بلاء؟ قال: الأنبياء،
قلت: يا رسول الله! ثم من قال: ثم الصالحون،
إن كان ... `. الحديث.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
وله شاهد آخر مختصر وهو:
` إن من أشد الناس بلاء الأنبياء، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم
الذين يلونهم `.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। আমি তাঁর গায়ে হাত রাখলাম এবং কাঁথার (বা চাদরের) উপর দিয়েই তাঁর দেহের উত্তাপ অনুভব করলাম। আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার উপর কত কঠিন (কষ্ট)!"
তিনি বললেন, "আমরা তেমনই। আমাদের জন্য বিপদকে দ্বিগুণ করা হয় এবং আমাদের জন্য পুরস্কারও দ্বিগুণ করা হয়।"
আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! কাদের উপর সবচেয়ে কঠিন বিপদ আসে?"
তিনি বললেন, "নবীগণের উপর।"
আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারপর কারা?"
তিনি বললেন, "তারপর নেককার ব্যক্তিগণ। নিশ্চয়ই তাদের মধ্যে কেউ কেউ দারিদ্র্য দ্বারা এত বেশি পরীক্ষিত হতেন যে, তাদের কাছে নিজেদের শরীর ঢাকার জন্য একটি মাত্র আবায়া (বা চাদর) ছাড়া আর কিছুই থাকতো না। আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ বিপদে এত আনন্দিত হতেন, যেমন তোমাদের কেউ কেউ প্রাচুর্যে আনন্দিত হয়।"
145 - ` إن من أشد الناس بلاء الأنبياء، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم
الذين يلونهم `.
رواه أحمد (6 / 369) والمحاملي في ` الأمالي ` (3 / 44 / 2) عن أبي عبيدة
بن حذيفة عن عمته فاطمة أنها قالت:
` أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم، نعوده في نسائه، فإذا سقاء معلق نحوه
يقطر ماؤه عليه من شدة ما يجد من حر الحمى، قلنا: يا رسول الله لو دعوت الله
فشفاك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
وإسناده حسن رجاله كلهم ثقات غير أبي عبيدة هذا فلم يوثقه غير ابن حبان
(1 / 275) ، لكن روى عنه جماعة من الثقات.
وفي هذه الأحاديث دلالة صريحة على أن المؤمن كلما كان أقوى إيمانا، ازداد
ابتلاء وامتحانا، والعكس بالعكس، ففيها رد على ضعفاء العقول والأحلام
الذين يظنون أن المؤمن إذا أصيب ببلاء كالحبس أو الطرد أو الإقالة من الوظيفة
ونحوها أن ذلك دليل على أن المؤمن غير مرضي عند الله تعالى! وهو ظن باطل،
فهذا رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو أفضل البشر، كان أشد الناس حتى
الأنبياء بلاء، فالبلاء غالبا دليل خير، وليس نذير شر، كما يدل على ذلك
أيضا الحديث الآتي:
` إن عظم الجزاء مع عظم البلاء، وإن الله إذا أحب قوما ابتلاهم، فمن رضي فله
الرضا، ومن سخط فله السخط `.
ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের স্ত্রীদের সাথে তাঁকে দেখতে গিয়েছিলাম। তখন দেখলাম তাঁর পাশে একটি মশক ঝুলানো আছে, যার পানি তীব্র জ্বরের কারণে ফোঁটা ফোঁটা করে তাঁর উপর পড়ছে। আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আল্লাহর কাছে দোয়া করুন, যাতে তিনি আপনাকে আরোগ্য দান করেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:
"নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে কঠিন বিপদের সম্মুখীন হন নবীগণ, অতঃপর যারা তাঁদের নিকটবর্তী, অতঃপর যারা তাঁদের নিকটবর্তী, অতঃপর যারা তাঁদের নিকটবর্তী (মর্যাদাশীল)।"
(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরও বলেছেন):
"নিশ্চয়ই মহাপুরস্কার মহা বিপদের সাথেই আসে। আর আল্লাহ যখন কোনো জাতিকে ভালোবাসেন, তখন তাদেরকে পরীক্ষা করেন (বিপদ দেন)। অতঃপর যে ব্যক্তি সন্তুষ্ট থাকে, তার জন্য রয়েছে আল্লাহর সন্তুষ্টি; আর যে অসন্তুষ্ট হয়, তার জন্য রয়েছে আল্লাহর অসন্তুষ্টি।"
146 - ` إن عظم الجزاء مع عظم البلاء، وإن الله إذا أحب قوما ابتلاهم، فمن رضي فله
الرضا، ومن سخط فله السخط `.
أخرجه الترمذي (2 / 64) وابن ماجه (4031) وأبو بكر البزاز بن نجيح في
` الثاني من حديثه ` (227 / 2) عن سعد بن سنان عن أنس عن النبي صلى الله
عليه وسلم.
وقال الترمذي: ` حديث حسن غريب `.
قلت: وسنده حسن، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير ابن سنان هذا وهو صدوق
له أفراد كما في ` التقريب `.
وهذا الحديث يدل على أمر زائد على ما سبق وهو أن البلاء إنما يكون خيرا،
وأن صاحبه يكون محبوبا عند الله تعالى، إذا صبر على بلاء الله تعالى، ورضي
بقضاء الله عز وجل. ويشهد لذلك الحديث الآتي:
` عجبت لأمر المؤمن، إن أمره كله خير، إن أصابه ما يحب حمد الله وكان له خير
وإن أصابه ما يكره فصبر كان له خير، وليس كل أحد أمره كله خير إلا المؤمن `.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
নিশ্চয় বড় প্রতিদান বড় বিপদের (কষ্টের) সাথেই সম্পর্কযুক্ত। আর আল্লাহ যখন কোনো সম্প্রদায়কে ভালোবাসেন, তখন তাদেরকে পরীক্ষা করেন (বিপদাপদ দেন)। সুতরাং যে ব্যক্তি (আল্লাহর ফায়সালাতে) সন্তুষ্ট থাকে, তার জন্য রয়েছে (আল্লাহর পক্ষ থেকে) সন্তুষ্টি। আর যে অসন্তুষ্ট হয়, তার জন্য রয়েছে অসন্তুষ্টি।
তিনি আরও বলেন: মুমিনের ব্যাপারটি দেখে আমি বিস্মিত হই। নিশ্চয় তার সমস্ত কাজই কল্যাণকর। যদি সে পছন্দের কিছু পায়, তবে সে আল্লাহর প্রশংসা করে, আর এটি তার জন্য কল্যাণকর হয়। আর যদি অপছন্দের কিছু পায়, আর সে তাতে ধৈর্য ধারণ করে, তবে সেটাও তার জন্য কল্যাণকর হয়। মুমিন ছাড়া অন্য কারও জন্য তার সমস্ত কাজ এমন কল্যাণকর হয় না।
147 - ` عجبت لأمر المؤمن، إن أمره كله خير، إن أصابه ما يحب حمد الله وكان له خير
، وإن أصابه ما يكره فصبر كان له خير، وليس كل أحد أمره كله خير إلا المؤمن
`.
أخرجه الدارمي (2 / 318) وأحمد (6 / 16) عن حماد بن سلمة حدثنا ثابت عن
عبد الرحمن بن أبي ليلى عن صهيب قال:
` بينا رسول الله صلى الله عليه وسلم قاعد مع أصحابه إذ ضحك، فقال: ألا
تسألوني مم أضحك؟ قالوا: يا رسول الله! ومم تضحك؟ قال: ` فذكره.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط مسلم، وقد أخرج في ` صحيحه ` (8 /
227) من
طريق سليمان بن المغيرة حدثنا ثابت به المرفوع فقط نحوه. وهو رواية لأحمد
(4 / 332، 333، 6 / 15) .
وله شاهد من حديث سعد بن أبي وقاص مرفوعا نحوه. أخرجه الطيالسي (211)
بإسناد صحيح. وله شاهد آخر مختصر بلفظ:
` عجبا للمؤمن لا يقضي الله له شيئا إلا كان خيرا له `.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন:
আমি মু’মিনের (ঈমানদারের) সকল অবস্থা দেখে বিস্মিত হই। নিশ্চয় তার সকল কাজই কল্যাণকর। যদি তার কাছে এমন কিছু আসে যা সে পছন্দ করে, তখন সে আল্লাহ্র প্রশংসা করে, আর এটি তার জন্য কল্যাণকর হয়। আর যদি তার কাছে এমন কিছু আসে যা সে অপছন্দ করে, তখন সে ধৈর্য ধারণ করে, আর এটিও তার জন্য কল্যাণকর হয়। মু’মিন ব্যতীত অন্য কারো জন্য তার সকল কাজই এমন কল্যাণকর হয় না।
148 - ` عجبا للمؤمن لا يقضي الله له شيئا إلا كان خيرا له `.
رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (5 / 24) وأبو الفضل التميمي في ` نسخة
أبي مسهر ... ` (61 / 1) وأبو يعلى (200 / 2) عن أنس بن مالك قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ... فذكره.
قلت: سنده صحيح رجاله كلهم ثقات غير ثعلبة هذا وقد ذكره ابن حبان
في
` الثقات ` (1 / 8) وكناه أبا بحر مولى أنس بن مالك وقال ابن أبي حاتم
(1 / 1 / 464) عن أبيه ` صالح الحديث `.
وله طريق أخرى عند أبي يعلى (205 / 2) والضياء في ` المختارة ` (1 / 518) .
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
মুমিনের বিষয়টি কতই না আশ্চর্যজনক! আল্লাহ তার জন্য যা কিছুই ফয়সালা করেন না কেন, তা তার জন্য কল্যাণকরই হয়।
149 - ` ليس المؤمن الذي يشبع وجاره جائع إلى جنبه `.
رواه البخاري في ` الأدب المفرد ` (112) والطبراني في ` الكبير ` (3 / 175
/ 1) والحاكم (4 / 167) وكذا ابن أبي شيبة في ` كتاب الإيمان ` (189 / 2
) والخطيب في ` تاريخ بغداد ` (10 / 392) وابن عساكر (9 / 136 / 2)
والضياء في ` المختارة ` (62 / 292 / 1) عن عبد الملك بن أبي بشير عن عبد
الله بن مساور قال: سمعت ابن عباس ذكر ابن الزبير فبخله، ثم قال سمعت
رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
قلت: ورجاله ثقات غير ابن المساور فهو مجهول كما قال الذهبي في ` الميزان `
ولم يرو عنه غير عبد الملك هذا كما قال ابن المديني، وأما ابن حبان فذكره في
` الثقات ` (1 / 110) ، وكأنه هو عمدة المنذري في ` الترغيب ` (3 / 237)
ثم الهيثمي في ` المجمع ` (8 / 167) في قولهما:
` رواه الطبراني وأبو يعلى ورجاله ثقات `.
وقال الحاكم ` صحيح الإسناد ` ووافقه الذهبي.
كذا قالا! نعم هو صحيح بما له من الشواهد، فقد روي من حديث أنس وابن عباس
وعائشة.
أما حديث أنس، فيرويه محمد بن سعيد الأثرم: حدثنا همام حدثنا ثابت عنه مرفوعا
بلفظ:
` ما آمن بي من بات شبعان وجاره جائع بجنبه وهو يعلم به `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (1 / 66 / 1) ، وقال الذهبي في كتابه
` حقوق الجار ` (ق 17 / 1) :
` الأثرم ضعفه أبو زرعة، وهذا حديث منكر `.
قلت: وضعفه أبو حاتم أيضا، لكن قال الهيثمي:
` رواه الطبراني والبزار، وإسناد البزار حسن `.
وكذا في ` الترغيب ` (3 / 236) إلا أنه قال: ` وإسناده حسن ` فهذا يحتمل
أن الضمير يعود إلى الحديث، ويحتمل أنه يعود إلى البزار، ولعله
مراد
المنذري بدليل عبارة الهيثمي فإنها صريحة في ذلك.
قلت: فهذا يشعر أنه لم يتفرد به الأثرم هذا. والله أعلم.
وأما حديث ابن عباس، فيرويه حكيم بن جبير عنه مرفوعا به.
أخرجه ابن عدي (ق 89 / 1) .
وحكيم بن جبير ضعيف كما في ` التقريب `.
وأما حديث عائشة، فعزاه المنذري (3 / 237) للحاكم نحو حديث ابن ` عباس `
ولم أره في مستدرك الحاكم الآن بعد مراجعته في مظانه.
قلت: وفي الحديث دليل واضح على أنه يحرم على الجار الغني أن يدع جيرانه
جائعين، فيجب عليه أن يقدم إليهم ما يدفعون به الجوع، وكذلك ما يكتسون به إن
كانوا عراة، ونحو ذلك من الضروريات.
ففي الحديث إشارة إلى أن في المال حقا سوى الزكاة، فلا يظنن الأغنياء أنهم قد
برئت ذمتهم بإخراجهم زكاة أموالهم سنويا، بل عليهم حقوق أخرى لظروف وحالات
طارئة، من الواجب عليهم القيام بها، وإلا دخلوا في وعيد قوله تعالى:
(والذين يكنزون الذهب والفضة ولا ينفقونها في سبيل الله فبشرهم بعذاب أليم
يوم يحمى عليها في نار جهنم، فتكوى بها جباههم وجنوبهم وظهورهم، هذا ما
كنزتم لأنفسكم فذوقوا ما كنتم تكنزون) .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
সেই ব্যক্তি মুমিন নয়, যে পেট ভরে আহার করে অথচ তার প্রতিবেশী তার পাশেই অভুক্ত থাকে।
[এই হাদীসটির আলোকে] এতে সুস্পষ্ট প্রমাণ রয়েছে যে, ধনী প্রতিবেশীর জন্য এটা হারাম যে সে তার প্রতিবেশীকে অভুক্ত রাখবে। বরং তার জন্য আবশ্যক হলো, সে এমন কিছু প্রদান করবে যা দিয়ে তারা ক্ষুধা নিবারণ করতে পারে। অনুরূপভাবে, যদি তারা বস্ত্রহীন থাকে তবে তাদেরকে পোশাক সরবরাহ করবে এবং অন্যান্য জরুরি প্রয়োজনও পূরণ করবে।
এই হাদীসে ইঙ্গিত রয়েছে যে, সম্পদের উপর যাকাত ছাড়াও হক বা অধিকার রয়েছে। ধনীদের এই ধারণা করা উচিত নয় যে, তারা প্রতি বছর তাদের সম্পদের যাকাত আদায়ের মাধ্যমেই দায়মুক্ত হয়ে গেছেন। বরং জরুরি পরিস্থিতি ও অপ্রত্যাশিত ঘটনার ক্ষেত্রে তাদের ওপর অন্যান্য হকও রয়েছে, যা পালন করা তাদের জন্য আবশ্যক।
অন্যথায় তারা আল্লাহ তাআলার এই বাণীর শাস্তির হুঁশিয়ারির অন্তর্ভুক্ত হবে:
"যারা সোনা ও রূপা সঞ্চয় করে এবং তা আল্লাহর পথে খরচ করে না, তাদেরকে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তির সুসংবাদ দাও। যেদিন জাহান্নামের আগুনে তা উত্তপ্ত করা হবে এবং তা দিয়ে তাদের কপাল, পার্শ্বদেশ ও পিঠে দাগ দেওয়া হবে, (বলা হবে:) এটিই সেই সম্পদ যা তোমরা নিজেদের জন্য জমা করে রেখেছিলে। সুতরাং তোমরা যা জমা করতে, তার স্বাদ গ্রহণ করো।" (সূরা আত-তাওবা: ৩৪-৩৫)
150 - ` إن الله أذن لي أن أحدث عن ديك قد مرقت رجلاه الأرض، وعنقه منثن تحت العرش
وهو يقول: سبحانك ما أعظمك ربنا، فيرد عليه: ما يعلم ذلك من حلف بي كاذبا `.
رواه الطبراني في ` الأوسط ` (1 / 156 / 1) : حدثنا محمد بن العباس بن الأخرم
حدثنا الفضل بن سهل الأعرج حدثنا إسحاق بن منصور حدثنا إسرائيل عن معاوية بن
إسحاق عن سعيد بن أبي سعيد عن أبي هريرة مرفوعا. وقال:
` لم يروه عن معاوية إلا إسرائيل تفرد به إسحاق `.
قلت: وهو ثقة من رجال الشيخين وكذا سائر الرواة ثقات أيضا من رجال البخاري
غير ابن الأخرم وهو من الفقهاء الحفاظ المتقنين كما في ` لسان الميزان `
فالحديث صحيح الإسناد. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (4 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমাকে এমন একটি মোরগ সম্পর্কে বর্ণনা করার অনুমতি দিয়েছেন, যার পাগুলো যমীন ভেদ করে নিচে চলে গেছে, আর তার গলা আরশের নিচে অবনত অবস্থায় রয়েছে। আর সে বলে, ’সুবহানাকা মা আ’যমাকা রাব্বানা’ (আপনি কতই না মহান, হে আমাদের রব!)। তখন আল্লাহ তাকে জবাব দেন, ’যে ব্যক্তি আমার নামে মিথ্যা কসম করে, সে আমার এই মহত্ব সম্পর্কে অবগত নয়।’
151 - ` أذن لي أن أحدث عن ملك من ملائكة الله تعالى من حملة العرش، ما بين شحمة
أذنه إلى عاتقه مسيرة سبعمائة سنة `.
رواه أبو داود (4727) والطبراني في ` الأوسط ` كما في ` المنتقى منه `
للذهبي (6 / 2) وفي ` حديثه عن النسائي ` (317 / 2) وابن شاهين في
` الفوائد ` (113 /
2) وابن عساكر في المجلس (139) من ` الأمالي `
(50 / 1) وفي ` التاريخ ` (12 / 232 / 1) عن إبراهيم ابن طهمان عن موسى
ابن عقبة عن محمد بن المنكدر عن جابر مرفوعا.
وهو في ` مشيخة ابن طهمان ` (238 / 2) .
وقال الطبراني:
` لم يروه عن موسى بن عقبة إلا إبراهيم بن طهمان `.
قلت: وهو ثقة كما في ` التقريب ` ولهذا قال الذهبي في ` العلو ` (ص 58 طبعة
الأنصار) :
` إسناده صحيح `. ثم ساق له شاهدا من حديث محمد بن إسحاق عن الفضل بن عيسى عن
يزيد الرقاشي عن أنس مرفوعا. وقال:
` إسناده واه `.
وقال الهيثمي في الطريق الأولى (1 / 80) :
` رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح `.
وقد تابعه صدقة بن عبد الله القرشي بلفظ:
` إن لله ملائكة وهم الأكروبيون، من شحمة أذن أحدهم إلى ترقوته مسيرة سبعمائة
عام للطائر السريع في انحطاطه `.
وقد سقت إسناده وتكلمت عليه في ` الأحاديث الضعيفة ` (927) .
وله شاهد من حديث جابر وابن عباس مرفوعا به نحوه.
أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (3 / 158) ، وفيه من لم أعرفه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে আল্লাহ তাআলার ফেরেশতাদের মধ্যে এমন একজন ফেরেশতা সম্পর্কে বর্ণনা করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে যিনি আরশ বহনকারীদের অন্তর্ভুক্ত; তাঁর কানের লতি থেকে কাঁধ পর্যন্ত দূরত্ব হলো সাতশো বছরের পথ।"
152 - ` لا يرث الصبي حتى يستهل صارخا، واستهلاله أن يصيح أو يعطس أو يبكي `.
رواه ابن ماجه (2751) والطبراني في ` الأوسط ` (1 / 153 / 2) عن العباس
بن الوليد الخلال الدمشقي حدثنا مروان بن محمد الطاطري حدثنا سليمان بن بلال
عن يحيى بن سعيد عن سعيد بن المسيب عن جابر بن عبد الله والمسور بن مخرمة
مرفوعا.
وقال الطبراني:
` لم يروه عن يحيى إلا سليمان تفرد به مروان `.
قلت: وهو ثقة وكذلك سائر الرواة فالحديث صحيح.
وأما قول الهيثمي (4 / 225) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` و ` الكبير ` وفيه العباس بن الوليد الخلال
وثقه أبو مسهر ومروان بن محمد وقال أبو داود، لا أحدث عنه، وبقية رجاله
رجال الصحيح `.
ففيه نظر من وجهين:
الأول: أن مروان ليس من رجال الصحيح.
الثاني: أن قول أبي داود فيه لم يذكره عنه الحافظ في ` التهذيب ` وإنما نقل
عنه من رواية الآجري أنه قال: ` كتبت عنه وكان عالما بالرجال والأخبار `
ولذلك قال فيه في ` تقريب التهذيب ` ` صدوق `، فلا أدري أذلك وهم من الهيثمي
أم قصور من الحافظ حيث لم يذكره.
ثم إن إيراد الهيثمي لهذا الحديث في كتابه هو على خلاف شرطه، لإخراج ابن ماجه
إياه، فلعله لم يستحضر ذلك عندما أورده.
وللحديث شاهد بلفظ: ` إذا استهل المولود ورث `.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং মিসওয়ার ইবনু মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
‘কোনো শিশু (উত্তরাধিকারী) হবে না, যতক্ষণ না সে চিৎকার করে আত্মপ্রকাশ করে। আর তার আত্মপ্রকাশ হলো: সে আওয়াজ করবে, অথবা হাঁচি দেবে, অথবা কাঁদবে।’
153 - ` إذا استهل المولود ورث `.
رواه أبو داود (2920) عن محمد بن إسحاق عن يزيد بن عبد الله بن قسيط عن
أبي هريرة مرفوعا.
وعن أبي داود رواه البيهقي (6 / 257) وذكر أن ابن خزيمة أخرجه من هذا
الوجه.
قلت: ورجاله ثقات، إلا أن ابن إسحاق مدلس، وقد عنعنه.
ولكن له شاهد من حديث جابر مرفوعا.
رواه ابن ماجه (2750) عن الربيع بن بدر حدثنا أبو الزبير عنه.
قلت: والربيع بن بدر متروك، لكن تابعه المغيرة بن مسلم وسفيان عن
أبي الزبير به.
أخرجه الحاكم (4 / 348، 349) وقال:
` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي.
قلت: بل على شرط مسلم فقط، على أن أبا الزبير مدلس وقد عنعن.
وله شاهد من حديث ابن عباس مرفوعا.
أخرجه ابن عدي (ق 193 / 1) من طريق شريك عن أبي إسحاق عن عطاء عنه.
قلت: وهذا سند لا بأس به في الشواهد، فإن شريكا هو ابن عبد الله القاضي ثقة
إلا أنه سيء الحفظ، ومثله أبو إسحاق وهو السبيعي فإنه كان اختلط.
(فائدة) في حديث جابر والمسور المتقدم تفسير استهلال الصبي بقوله:
` أن يصيح أو يعطس أو يبكي `. وهو حديث صحيح كما تقدم، فلا يغتر بقول
الصنعاني
في ` سبل السلام ` (3 / 133) :
` والاستهلال روي في تفسيره حديث مرفوع ضعيف: ` الاستهلال العطاس `. أخرجه
البزار `.
فإن الذي أخرجه البزار. إنما هو من حديث ابن عمر باللفظ الذي ذكره الصنعاني،
وفيه محمد بن عبد الرحمن بن البيلمان وهو ضعيف.
كما في ` المجمع `، فهذا غير حديث جابر والمسور فتنبه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কোনো নবজাতক (জীবিত থাকার শব্দ করে বা) কেঁদে ওঠে, তখন সে উত্তরাধিকারী হয়।
154 - ` لا يرد القضاء إلا الدعاء، ولا يزيد في العمر إلا البر `.
أخرجه الترمذي (2 / 20) والطحاوي في ` المشكل ` (4 / 169) وابن حيويه في
` حديثه ` (3 / 4 / 2) وعبد الغني المقدسي في ` الدعاء ` (
দোআ ব্যতীত আল্লাহর কোনো ফায়সালা (তাকদীর) প্রতিহত হয় না এবং নেক আমল ব্যতীত আয়ুষ্কাল বৃদ্ধি পায় না।
155 - ` أسلم الناس وآمن عمرو بن العاص `.
رواه الروياني في ` مسنده ` (9 / 50 /
অন্যান্য লোকেরা ইসলাম গ্রহণ করেছিল, আর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঈমান এনেছিলেন।
156 - ` ابنا العاص مؤمنان: هشام وعمرو `.
أخرجه عفان بن مسلم في ` حديثه ` (ق 238 / 2) حدثنا حماد بن سلمة حدثنا محمد
بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة رفعه.
وأخرجه أحمد (2 / 354) وابن سعد (4 / 191) من طريق عفان به،
وكذلك
أخرجه الحاكم (3 / 452) . ثم أخرجه أحمد (2 / 304، 327، 353) وابن سعد
وأبو علي الصواف في ` حديثه (3 / 2 / 2) وابن عساكر (13 / 52 / 1) من طرق
أخرى عن حماد به.
قلت: وهذا سند حسن، وسكت عليه الحاكم والذهبي، ومن عادتهما أن يصححا هذا
الإسناد على شرط مسلم.
وله شاهد، خرجه ابن عساكر من طريق ابن سعد حدثنا عمر بن حكام بن أبي الوضاح
حدثنا شعبة عن عمرو بن دينار عن أبي بكر بن محمد ابن عمرو بن حزم عن عمر مرفوعا.
قلت: ورجاله ثقات غير ابن حكام هذا فلم أعرفه. ثم استدركت فقلت: هو عمرو
بالواو سقط من قلمي أو من ناسخ ابن عساكر، وعمرو ابن حكام معروف بالرواية
عن شعبة وهو ضعيف، إلا أنه مع ضعفه يكتب حديثه كما قال ابن عدي، فهو صالح
للاستشهاد به.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন:
"আল-আসের দুই পুত্র - হিশাম এবং আমর - উভয়ই মুমিন (ঈমানদার)।"
157 - ` والذي نفسي بيده لا يسمع بي رجل من هذه الأمة، ولا يهودي ولا نصراني ثم
لم يؤمن بي إلا كان من أهل النار `.
رواه ابن منده في ` التوحيد ` (44 / 1) من طريق عبد الرزاق عن معمر عن همام
بن منبه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة فذكره مرفوعا.
ثم رواه من طريق أبي يونس عن أبي هريرة به.
قلت: وهذان إسنادان صحيحان، الأول على شرط الشيخين، والآخر على شرط مسلم.
وقد أخرجه في صحيحه (1 / 93) نحوه.
والحديث صريح في أن من سمع بالنبي صلى الله عليه وسلم وما أرسل به، بلغه ذلك
على الوجه الذي أنزله الله عليه، ثم لم يؤمن به صلى الله عليه وسلم أن مصيره
إلى النار، لا فرق في ذلك بين يهودي أو نصراني أو مجوسي أو لا ديني.
واعتقادي أن كثيرا من الكفار لو أتيح لهم الاطلاع على الأصول والعقائد
والعبادات التي جاء بها الإسلام، لسارعوا إلى الدخول فيه أفواجا، كما وقع
ذلك في أول الأمر، فليت أن بعض الدول الإسلامية ترسل إلى بلاد الغرب من يدعو
إلى الإسلام، ممن هو على علم به على حقيقته وعلى معرفة بما ألصق به من
الخرافات والبدع والافتراءات، ليحسن عرضه على المدعوين إليه، وذلك يستدعي
أن يكون على علم بالكتاب والسنة الصحيحة، ومعرفة ببعض اللغات الأجنبية
الرائجة، وهذا شيء عزيز يكاد يكون مفقودا، فالقضية تتطلب استعدادات هامة،
فلعلهم يفعلون.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "শপথ তাঁর, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! এই উম্মতের কোনো ব্যক্তি, অথবা কোনো ইহুদি কিংবা খ্রিস্টান আমার সম্পর্কে শুনবে, অতঃপর আমার প্রতি ঈমান আনবে না, সে অবশ্যই জাহান্নামবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হবে।"
158 - ` لولا أن لا تدافنوا لدعوت الله عز وجل أن يسمعكم (من) عذاب القبر
(ما أسمعني) `.
قال الإمام أحمد (3 / 201) : حدثنا يزيد أنبأنا حميد عن أنس ` أن النبي
صلى الله عليه وسلم مر بنخل لبني النجار، فسمع صوتا فقال: ما هذا؟ قالوا:
قبر رجل دفن في الجاهلية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ` فذكره.
قلت: وهذا سند ثلاثي صحيح على شرط الشيخين وقد أخرجه أحمد أيضا (3 / 103)
عن ابن أبي عدي، و (3 / 114) عن يحيى ابن سعيد، وابن حبان (786) عن
إسماعيل، ثلاثتهم عن حميد به.
وهاذان إسنادان صحيحان ثلاثيان أيضا، وزاد ابن أبي عدي بعد قولهم: ` في
الجاهلية `: ` فأعجبه ذلك ` وهي عند النسائي (1 / 290) من طريق عبد الله
- وهو ابن المبارك - عن حميد بلفظ: ` فسر بذلك `.
وصرح يحيى بن سعيد بتحديث حميد به عن أنس.
وقد تابعه ثابت، عند أحمد أيضا (3 / 153، 175، 284) من طريق حماد قال:
أنبأنا ثابت وحميد عن أنس به وزاد:
` وهو على بغلة شهباء، فإذا هو بقبر يعذب (وفي رواية: فسمع أصوات قوم
يعذبون في قبورهم) فحاصت البغلة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: لولا
.... ` الحديث.
وإسناده صحيح على شرط مسلم.
وتابعه قاسم بن مرثد الرحال فقال أحمد (3 / 111) : حدثنا سفيان قال: سمع
قاسم الرحال أنسا يقول:
` دخل النبي صلى الله عليه وسلم خربا لبني النجار، وكان يقضي فيها حاجة،
فخرج إلينا مذعورا أو فزعا وقال: لولا ... ` الحديث وفيه الزيادتان.
وهذا سند ثلاثي أيضا صحيح، فسفيان هو ابن عيينة من رجال الستة، وقاسم وثقه
ابن معين وغيره.
وتابعه أيضا قتادة عن أنس المرفوع منه فقط دون القصة أخرجه مسلم (8 / 161)
وأحمد (3 / 176 و 273) .
وله شاهد من حديث جابر قال:
` دخل النبي صلى الله عليه وسلم يوما نخلا لبني النجار، فسمع أصوات رجال من
بني النجار ماتوا في الجاهلية يعذبون في قبورهم، فخرج رسول الله صلى الله عليه
وسلم فزعا، فأمر أصحابه أن تعوذوا من عذاب القبر `.
أخرجه أحمد (3 /
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
একবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বনু নাজ্জারের খেজুর বাগান দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি একটি শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "এটা কিসের শব্দ?" সাহাবীগণ বললেন, "এটি জাহিলিয়াতের যুগে দাফন করা এক ব্যক্তির কবর।"
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "যদি এমন না হতো যে তোমরা (ভয়ে) তোমাদের মৃতদের দাফন করা ছেড়ে দেবে, তবে আমি অবশ্যই মহান আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে দু’আ করতাম যেন তিনি তোমাদেরকে কবরের সেই আযাব শোনান—যা আমি শুনছি।"
159 - ` إن هذه الأمة تبتلى في قبورها، فلولا أن لا تدافنوا لدعوت الله أن يسمعكم من
عذاب القبر الذي أسمع منه. قال زيد: ثم أقبل علينا بوجهه فقال: تعوذوا بالله
من عذاب النار، قالوا: نعوذ بالله من عذاب النار، فقال: تعوذوا بالله من
عذاب القبر، قالوا: نعوذا بالله من عذاب القبر، قال: تعوذوا بالله من الفتن
ما ظهر منها وما بطن، قالوا: نعوذ بالله من الفتن ما ظهر منها وما بطن،
قال: تعوذوا بالله من فتنة الدجال، قالوا: نعوذ بالله من فتنة الدجال `.
أخرجه مسلم (8 /
যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (ﷺ) বলেছেন: নিশ্চয় এই উম্মতকে তাদের কবরসমূহে পরীক্ষা করা হবে। যদি এমন আশঙ্কা না থাকত যে তোমরা (পরস্পরকে) দাফন করা ছেড়ে দেবে, তাহলে আমি আল্লাহর কাছে দু’আ করতাম যেন তিনি তোমাদেরকে কবরের শাস্তি শোনান, যা আমি শুনতে পাই।
যায়দ বলেন: এরপর তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরালেন এবং বললেন: তোমরা আল্লাহর কাছে জাহান্নামের শাস্তি থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। তারা বললেন: আমরা আল্লাহর কাছে জাহান্নামের শাস্তি থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করছি। তিনি বললেন: তোমরা আল্লাহর কাছে কবরের শাস্তি থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। তারা বললেন: আমরা আল্লাহর কাছে কবরের শাস্তি থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করছি। তিনি বললেন: তোমরা আল্লাহর কাছে প্রকাশ্য ও গোপন সকল ফিতনা (বিপর্যয়) থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। তারা বললেন: আমরা প্রকাশ্য ও গোপন সকল ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করছি। তিনি বললেন: তোমরা আল্লাহর কাছে দাজ্জালের ফিতনা থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। তারা বললেন: আমরা দাজ্জালের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করছি।
160 - 161) من طريق ابن علية قال: وأخبرنا سعيد الجريري
عن أبي نضرة عن أبي سعيد الخدري عن زيد بن ثابت قال أبو سعيد: ولم أشهده من
النبي صلى الله عليه وسلم ولكن حدثنيه زيد بن ثابت قال:
` بينما النبي صلى الله عليه وسلم في حائط لبني النجار على بغلة له، ونحن معه
إذ حادت به، فكادت تلقيه، وإذا أقبر ستة أو خمسة أو أربعة - شك الجريري -
فقال: من يعرف أصحاب هذه الأقبر؟ فقال رجل: أنا قال: فمتى مات هؤلاء؟
قال: ماتوا في الإشراك فقال ... ` فذكره.
وأخرجه أحمد (5 / 190) : حدثنا يزيد بن هارون أنبأنا أبو مسعود الجريري به
إلا أنه قال: ` تعوذوا من فتنة المحيا والممات `، بدل ` تعوذوا من الفتن ما
ظهر منها وما بطن `.
وأخرجه ابن حبان (785) بنحو رواية مسلم، لكن لم يذكر فيه زيد بن ثابت.
غريب الحديث
(تدافنوا) أصله تتدافنوا فحذف إحدى التاءين. أي: لولا خشية أن يفضي سماعكم
إلى ترك أن يدفن بعضكم بعضا.
(شهباء) : بيضاء.
(حاصت) أي حامت كما في رواية لأحمد أي اضطربت.
(خربا) بكسر الخاء وفتح الراء جمع خربة، كنقمة ونقم.
(تبتلى) أي تمتحن. والمراد امتحان الملكين للميت بقولهما: ` من ربك؟ `:
` من نبيك `.
من فوائد الحديث
وفي هذه الأحاديث فوائد كثيرة أذكر بعضها أو أهمها:
যায়দ ইবনু সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
একদা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বনী নাজ্জারের একটি বাগানে তাঁর খচ্চরের উপর ছিলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে ছিলাম। হঠাৎ (খচ্চরটি) তাঁকে নিয়ে বেঁকে গেল, আর তাঁকে ফেলে দেওয়ার উপক্রম হলো। আর সেখানে ছিল ছয়টি, অথবা পাঁচটি, অথবা চারটি কবর—(বর্ণনাকারী) জারীরীর এ বিষয়ে সন্দেহ ছিল। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন, এই কবরগুলোর অধিকারীদের কে চেনে? এক ব্যক্তি বলল, আমি। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, এরা কখন মারা গিয়েছিল? লোকটি উত্তর দিল, তারা শিরকের (আল্লাহর সাথে অংশীদার স্থাপনের) অবস্থায় মারা গিয়েছে। অতঃপর তিনি বললেন... (এবং অবশিষ্ট বর্ণনা করলেন)।