হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3187)


3187 - (إني عُوتبتُ الليلة في الخيلِ) .
أخرجه مالك في `الموطأ` (2/23) عن يحيى بن سعيد: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم -
رؤي وهو يمسح وجه فرسه بردائه، فسئل عن ذلك؟ فقال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد مرسل، بل معضل؛ فإن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري البخاري القاضي - لم يسمع من صحابي غير أنس؛ كما قال ابن المديني. ولهذا
قال ابن عبد البر في `التمهيد` (24/100) :
`هكذا الحديث في `الموطأ` عند جماعة رواته؛ فيما علمت، وقد روي عن
مالك مسنداً عن يحيى بن سعيد عن أنس؛ ولا يصح `.
ثم ساقه من طريق النَّضرِ بنِ سلمَة: حدثنا عبد الله بن عمرو الفِهري: حدثنا
مالك: سمعته يقول: سمعت يحيى بن سعيد يحدث عن أنس مرفوعاً به.
قلت: سكت عنه ابن عبد البر لظهور ضعفه؛ الفهري هذا لم أعرفه.
والنضر بن سلمة: هو المروزي، كان مقيماً بمدينة الرسول - صلى الله عليه وسلم - ، وقيل: بمكة.
قال أبو حاتم:
`كان يفتعل الحديث `.
واتهمه غير واحد بالكذب، فهو آفة هذا المسند.
وذكره الحافظ في `المطالب العالية ` (2/158/1929) من رواية مُسدَّدِ عن
يحيى بن سعيد الأنصاري عن رجل قال: ... فذكره، وقال الشيخ الأعظمي
تعليقاً عليه:
`قال البوصيري: رواته ثقات `!
قلت: كيف هذا والرجل لم يُسمَّ؟! ولعله توهم أنه صحابي؛ وليس كذلك؛
فقد رواه سعيد بن منصور في `سننه ` (3438) عن ابن عيينة، والدمياطىُّ في
`فضل الخيل ` (ص 37) من طريق عبََّاد - وهو ابن العوََّام - كلاهما عن يحيى بن سعيد عن مسلم بن يسار: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... الحديث.
قلت: فالرجل الذي لم يُسَمَّ عند مسدد: هو مسلم بن يسار هذا، والظاهر أنَّه البصري الأموي المكي الفقيه، وهو تابعي ثقة، فهو مرسل.
وروي مرسلاً من وجه آخر؛ فقال الطيالسي في `مسنده ` (1059) : حدثنا
جرير بن حازم قال: حدثنا الزُّبيرُ بن الخِرّيتِ الأزدي: حدثني نُعيمُ ابن أبي هند الأشجعي قال:
رؤي النبي - صلى الله عليه وسلم - يمسح خدَّ فرس، فقيل له في ذلك؟ فقال رسول الله صلى الله
عليه واله وسلم:
`إن جبريل عاتبني في الفرس `.
ومن طريق الطيالسي: أخرجه ابن عبد البر (24/ 101) ، وأبو داود في `المراسيل ` (228/ 291) من طريق موسى بن إسماعيل: حدثنا جرير به.
قلت: وهذا إسناد صحيح مرسل، ولكنه من مراسيل الكوفيين، فإن نُعَيماً
هذا كوفي، فلعله يعطي قوة للذي قبله؛ لاختلاف بلديهما وشيوخهما، ولا سيما
أنه قد جاء مسنداً؛ فقال أبو بشر يونس بن حبيب - وهو راوي `مسند الطيالسي `
- قال عقب الحديث: أنبأ أحمد بن الفرات عن مسلم بن إبراهيم عن سعيد بن
زيد عن الزبير بن خريت عن نعيم بن أبي هند عن عروة - يعني: عروة البارقي - ، وفي`مسنده`ساقه، ولذلك؛ وهم الحافظ ابن حجر حين عزاه للطيالسي في `المطالب `! وقد قال في ترجمة سعيد بن زيد من `التقريب `:
`صدوق له أوهام `.
قلت: فيخشى أن يكون إسناده لهذا الحديث من أوهامه، وبخاصة أن محمد
ابن أبي نُعَيم قال: ثنا سعيد بن زيد عن الزبير بن الخريت عن نعيم بن أبي هند عن عروة بن أبي الجعد قال:
رأيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فتل ناصية فرسه بين إصبعيه وقال:
`الخيل بنواصيها الخير إلى يوم القيامة`.
فلم يذكر حديث الترجمة.
هكذا أخرجه بحشل في `تاريخ واسط ` (ص 48) بالسند الصحيح عنه؛
لكن محمد بن أبي نعيم فيه كلام، فلا يعارض بروايته رواية مسلم بن إبراهيم
- وهو الفراهيدي الثقة - المتقدمة، وفيها حديث الترجمة.
نعم؛ قد صح حديث محمد بن أبي نعيم من طريق أخرى عن جرير بن
عبد الله قال:
رأيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يلوي ناصية فرس بإصبعه ويقول:
`الخيل معقود بنواصيها الخير إلى يوم القيامة: الأجر والغنيمة`.
أخرجه مسلم (6/




মুসলিম ইবনে ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত,

(একবার) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তাঁর চাদর দিয়ে তাঁর ঘোড়ার মুখ মুছতে দেখা গেল। যখন তাঁকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আজ রাতে ঘোড়া সম্পর্কে আমাকে সতর্ক (বা তিরস্কার) করা হয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3188)


3188 - (إنَّكم تَلقَونَ بَعدي فِتنةً واختلافاً - أو قال: اختلافاً وفتنةً - ، فقال له قائلٌ من الناس: فمن لنا يا رسولَ اللهِ؟! قال: عليكم بالأمينِ وأصحابهِ، وهو يشيرُ إلى عثمان بذلك) .
أخرجه الحاكم (3/99 و 4/




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: ‘নিশ্চয়ই আমার পরে তোমরা ফেতনা ও মতপার্থক্য—অথবা তিনি বলেছেন: মতপার্থক্য ও ফেতনার—মুখোমুখি হবে।’ তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে একজন প্রশ্ন করল: ‘হে আল্লাহর রাসূল! তখন আমাদের জন্য করণীয় কী হবে?’ তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমরা আমীন (বিশ্বস্ত) ব্যক্তি ও তাঁর সাথীদেরকে আঁকড়ে ধরবে।’ এই কথা বলার সময় তিনি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ইশারা করছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3189)


3189 - ( [إنكم] أصبحتُم في زمانٍ كثيرٍ فقهاؤُه، قليلٍ خطباؤُه،
قليلٍ سُؤّاله، كثيرٍ معطوهُ، العملُ فيه خيرٌ من العِلمِ.
وسيأتي زمانٌ قليلٌ فقهاؤُه، كثيرٌ خطباؤُه، كثيرٌ سُؤّاله، قليلٌ
مُعطوهُ، العلمُ فيه خيرٌمن العمل) .
أخرجه الطبراني في`المعجم الكبير`وفي `مسند الشاميين ` (2/ 221/1225) : حدثنا عبد الله بن محمد بن سعيد بن أبي مريم: ثنا عمرو بن أبي سَلمَة التِّنِّيسِي: ثنا صدقة بن عبد الله: حدثني زيد بن واقد عن حَرام بن حكيم عن عمه عبد الله ابن سعد عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف ` كما قال العراقي في `تخريج الإحياء` (1/7) ،
وله علتان:
الأولى: صدقة بن عبد الله، وهو السَّمين، وهو ضعيف؛ كما قال الذهبي في `الكاشف`، والحافظ في`التقريب`، وبه أعله الهيثمي في`مجمع الزوائد` (1/127) .
والأخرى: عبد الله بن أبي مريم هذا، أورده ابن عدي في `الكامل `، وقال
(4/ 5




আবদুল্লাহ ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

তোমরা এমন এক যুগে উপনীত হয়েছ, যখন ফকিহদের (ইসলামী আইনজ্ঞ) সংখ্যা বেশি, কিন্তু খতিবদের (বক্তা বা উপদেশদাতা) সংখ্যা কম। যখন প্রশ্নকর্তা বা সাহায্যপ্রার্থীর সংখ্যা কম, কিন্তু দানকারী বা প্রদানকারীর সংখ্যা বেশি। এই যুগে (অতিরিক্ত) জ্ঞান অর্জনের চেয়ে আমল করাই উত্তম।

আর অচিরেই এমন এক যুগ আসবে, যখন ফকিহদের সংখ্যা হবে নগণ্য, কিন্তু খতিব হবে অনেক; সাহায্যপ্রার্থী বা প্রশ্নকর্তা হবে অনেক, কিন্তু দানকারী হবে কম। সেই যুগে আমল করার চেয়ে জ্ঞান (ইলম) অর্জন করাই উত্তম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3190)


3190 - (إنَّ بأرضِ الحبشةِ مَلِكاً لا يُظلمُ أحدٌ عنده، فالحقُوا
ببلادِه حتّى يجعل اللهُ لكم فرجاً ومخرجاً مّما أنتُم فيهِ) .
أخرجه البيهقي في `السنن ` (9/9) وفي `الدلائل ` (2/ 301) من طريق ابن إسحاق: حدثني الزهري عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام عن أم سلمة رضي الله عنها زوج النبي - صلى الله عليه وسلم - أنها قالت:
لما ضاقت علينا مكة، وأوذي أصحاب رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ، وفُتنوا، ورأوا ما يصيبهم من البلاء والفتنة في دينهم، وأن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - لا يستطيع دفع ذلك عنهم، وكان رسول الله في مَنَعة من قومه وعمه، لا يصل إليه شيء مما يكره؛ مما ينال أصحابه، فقال لهم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره، فخرجنا إليها أرسالاً حتى اجتمعنا ونزلنا بخير دار إلى خير جار، أمنَّا على ديننا، ولم نخشى منه ظلماً ... وذكر الحديث بطوله.
كذا في `السنن `، وقد ساقه بطوله في أربع صفحات.
والحديث في `سيرة ابن هشام ` (1/343) عن ابن إسحاق قال: ... فذكره
نحوه، هكذا معضلاً لم يسق إسناده، ولفظه:
`لو خرجتم إلى أرض الحبشة؛ فإن بها ملكاً لا يُظلم عنده أحد، وهي أرض
صدق، حتى يجعل الله ... ` الحديث.
ولكنه ساق إسناده المتقدم عند البيهقي إلى أم سلمة، دون حديث الترجمة،
قالت:
`لما نزلنا أرض الحبشة؛ جاورنا بها خير جارٍ: النجاشي، أمنَّا على ديننا،
وعبدنا الله تعالى لا نؤذى ... ` الحديث بطوله.
وهكذا رواه أحمد في `المسند` (1/ 201 و5/ 290) من طريق ابن إسحاق به، وقال الهيثمي - عقب عزوه لأحمد (6/27) - :
`ورجاله رجال `الصحيح ` غير [ابن] إسحاق، وقد صرح بالسماع `.
قلت: فهو إسناد جيد، وقد سكت عنه الحافظ في `الفتح ` (7/188) .
ومن هذا التخريج يتبين أن عزو الحديث أو جملة: `لا يظلم عنده أحد` من
الأخ الفاضل سلمان العودة في رسالته المفيدة `من أخلاق الداعية` (ص 45) للإمام أحمد لا يخلو من تساهل! والله ولي التوفيق.
وفي الحديث دلالة ظاهرة على جواز هجرة المسلم من بلد الكفر إذا اشتد الضغط عليه من أهله إلى بلد آخر يجد فيه الحرية الدينية، وليس كذلك ما يفعله بعض الشباب المسلم من السفر من بلده المسلم إلى بعض البلاد الكافرة، لمجرد أنه يجد فيه شيئاً من التضييق أو التعذيب من بعض الحكام الظالمين، فهذا لا يجوز للأحاديث الكثيرة في النهي عن ذلك، كقوله - صلى الله عليه وسلم - : `المسلم والمشرك لا تتراءى نارهما`ونحوه، ولكثرة الفسق والخلاعة المنتشرة في كل مكان من تلك البلاد، بحيث يندر أن لا يتأثر المسلم بذلك، فكيف بأولاده الذين يُرَبّون فيها، ويرضعون لبانتها كما هو مشاهد؟! ولذلك فنحن ننصحهم - ومن أسلم من أهلها - أن يهاجروا إلى بلد من البلاد الإسلامية، يتمكنون فيه من القيام بشعائر دينهم، ويكثِّرون
سواد إخوانهم المؤمنين، والله عز وجل يقول: (إن الذين توفاهم الملائكة ظالمي أنفسهم قالوا فيم كنتم قالوا كنا مستضغفين في الأرض قالوا ألم تكن أرض الله واسعة فتهاجروا فيها ... ) الآية [النساء: 97] . *




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

যখন মক্কা নগরী আমাদের জন্য সংকীর্ণ হয়ে উঠলো, এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীগণকে কষ্ট দেওয়া হলো, তাদের ফিতনায় ফেলা হলো, এবং তাঁরা দ্বীনের ব্যাপারে তাঁদের উপর আপতিত বিপদ ও ফিতনা দেখতে পেলেন, আর (জানলেন) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামও তাঁদের থেকে সে বিপদ দূর করতে সক্ষম নন—কারণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর গোত্র ও চাচার রক্ষণাবেক্ষণের কারণে সুরক্ষিত ছিলেন, যার কারণে সাহাবীগণকে যে কষ্ট দেওয়া হচ্ছিল তা তাঁর কাছে পৌঁছাতো না—তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁদেরকে বললেন:

"নিশ্চয়ই আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমিতে এমন একজন বাদশাহ আছেন, যার কাছে কেউ অত্যাচারিত হয় না। তোমরা তার দেশে চলে যাও, যতক্ষণ না আল্লাহ তোমাদের বর্তমান অবস্থা থেকে মুক্তি ও নিষ্কৃতির পথ বের করে দেন।"

অতঃপর আমরা দলে দলে আবিসিনিয়ার (হাবশার) দিকে রওয়ানা হলাম, যতক্ষণ না আমরা সবাই সেখানে একত্রিত হলাম। আমরা উত্তম প্রতিবেশীর অধীনে এক উত্তম নিবাসে বসবাস শুরু করলাম। আমরা আমাদের দ্বীনের ব্যাপারে নিরাপদ হলাম এবং তার পক্ষ থেকে কোনো জুলুমের ভয় করলাম না। (এরপর তিনি দীর্ঘ হাদীসটি বর্ণনা করেন।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3191)


3191 - (تعوَّذُوا باللهِ من رأس السبعينِ، وإمارةِ الصبيانِ) .
أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (5/49/19082) ، وأحمد (2/326
و355و 448) ، والبزار (4/126/3358) ، وابن عدي في `الكامل` (6/ 81) من طرق عن كامل أبي العلاء قال: سمعت أبا صالح - مؤذناً كان يؤذن لهم - قال: سمعت أبا هريرة يقول: سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول: ... فذكره، وقال البزار: `لا نعلم رواه عن أبي هريرة إلا أبو صالح هذا ولا نعلم رواه عنه إلا أبو كامل `.
قلت: قال ابن عدي - بعد أن ساق له جملة أحاديث هذا أحدها - :
`أرجو أنه لا بأس به `.
قلت: وهو مختلف فيه، وفي `التقريب `:
`صدوق يخطئ `.
فهو حسن الحديث إن شاء الله تعالى، وإلى ذلك يشير الذهبي بقوله فيه في
` الكاشف `:
`وثقه ابن معين، وقال (س) : ليس بالقوي `.
وأبو صالح؛ لم يرو عنه إلا كامل، ووثقه ابن حبان، والذهبي في `الميزان `،
وحسّن له الترمذي.
وقال الهيثمي في `المجمع ` (7/ 220) : `رواه أحمد والبزار، ورجال أحمد رجال `الصحيح `؛غير كامل بن العلاء، وهو ثقة`!
قلت: لي على هذا تعليقان:
الأول: أن إسناد البزّار هو إسناد أحمد.
الثاني: أنّ أبا صالح ليس من رجال `الصحيح `.
وقد توبع أبو صالح، فقال سعيد بن سَمعان قال: سمعت أبا هريرة يتعوّذ من إمارة الصبيان والسفهاء.
فقال سعيد بن سمعان: فأخبرني ابن حسنة الجُهني أنه قال لأبي هريرة: ما
آية ذلك؟ قال: `أن تُقطع الأرحام، ويُطاع المُغوِي، ويعصَى المُرشِدُ`.
رواه البخاري في `الأدب المفرد` (66) : حدثنا آدم بن أبي إياس قال: حدثنا
ابن أبي ذئب قال: حدثنا سعيد ... به.
قلت: سعيد بن سمعان ثقة؛ فحديثه عن أبي هريرة صحيح، وهو موقوف في حكم المرفوع؛ لأنه لا يقال بمجرد الرأي كما هو ظاهر، ويشهد له الطريق الأولى. وكذا ما رواه مالك بن ظالم قال: سمعت أبا هريرة يقول لمروان بن الحكم:
سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول:
`إن فساد أمتي على يدي أُغَيلِمةٍ من سفهاء قريش `.
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (4/ 1/309) ، وابن حبان في `صحيحه `
(8/251/6678) ، و`الثقات` (5/388) ، والحا كم (4/ 470و527) ، والطيالسي (08 25) ، وأحمد (2/299 و 328 و485) ، وقال الحاكم:
`صحيح الإسناد`. ووافقه الذهبي!
قلت: ومالك بن ظالم من رجال `الميزان `، وقال:
`قال الأزدي: لا يتابع عليه `.
وكذا في `اللسان `، وذكرا له هذا الحديث، وفاتهما توثيق ابن حبان إياه،
لكن لم يذكروا له راوياً غير سماك بن حرب؛ فهو مجهول.
لكن أخرجه ابن حبان (6677) من طريق الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة مرفوعاً بلفظ:
`هلاك أمتي على يدي غلمان سفهاء من قريش `.
وزاد: فقال مروان: والغلمان هؤلاء.
وإسناده صحيح.
وله طريق أخرى يرويه سعيد بن عمرو بن سعيد قال: كنت جالساً مع أبي
هريرة في مسجد النبي - صلى الله عليه وسلم - بالمدينة، ومعنا مروان، قال أبو هريرة: سمعت الصادق المصدوق يقول:
`هلكة أمتي على يدي غلمة من قريش `.
فقال مروان: لعنة الله عليهم غلمة، فقال أبو هريرة: لو شئت أن أقول: بني
فلان، بني فلان؛ لفعلت، [قال عمرو بن يحيى:] فكنت أخرج مع جدي إلى
بني مروان حين ملكوا بالشام، فإذا رآهم غلماناً أحداثاً قال لنا: عسى هؤلاء أن يكونوا منهم! قلنا: أنت أعلم.
أخرجه البخاري (6/612/ 3605 و 13/9) - والسياق له - ، وأحمد (2/ 324)
- مختصراً - .
وله عنده طريق أخرى (2/52و536) عن أبي هريرة. *
من فضل عبد الله بن مسعود رضي الله عنه




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"তোমরা সত্তর সালের সূচনা এবং অল্প বয়স্কদের (বালকদের) নেতৃত্ব (বা শাসন) থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় প্রার্থনা করো।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3192)


3192 - (ممَّ تضحكون؟ قالوا: يا نبيَّ اللهِ! من دِقَّةِ ساقيهِ!! فقال:
والذي نفسي بيدهِ؛ لهُما أثقلُ في الميزانِ من أُحُدٍ) .
ورد من حديث ابن مسعود، وعلي بن أبي طالب.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত...
(নবীজি সাঃ জিজ্ঞেস করলেন,) "তোমরা কী নিয়ে হাসছো?"
তাঁরা বললেন, "হে আল্লাহর নবী! আমরা তাঁর পায়ের গোছার অতিরিক্ত চিকনতা দেখে হাসছি!"
তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! কিয়ামতের পাল্লায় এই দুটি (পা) উহুদ পাহাড়ের চেয়েও অনেক বেশি ভারী হবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3193)


3193 - (يَدخُلُ مِن هذا البابِ رجلٌ مِن خيرِ ذي يَمَنٍ، على وجههِ
مَسحَةُ ملكٍ. فدخلَ جريرٌ) .
أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (250) : حدثنا علي بن عبد الله قال:
حدثنا سفيان عن إسماعيل عن قيس قال: سمعت جريراً يقول:
ما رآني رسول الله - صلى الله عليه وسلم - منذ أسلمت إلا تبسم في وجهي، وقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: علي هو ابن المديني. وقد توبع من الحميدي، فقال في `مسنده ` (350/800) : ثنا سفيان به.
وأخرجه النسائي في `السنن الكبرى` (5/82) من طريق قتيبة عن سفيان به. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، فيُتعجّب من الحاكم كيف
لم يستدركه؟! أعني حديث الترجمة وإلا فقول جرير: `ما رآني ... ` إلخ قد أخرجاه: البخاري (0 1/ 504/6089) ، ومسلم (7/




জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইসলাম গ্রহণের পর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যখনই দেখেছেন, তখনই আমার প্রতি মুচকি হেসেছেন। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এই দরজা দিয়ে ইয়েমেনের সর্বোত্তম লোকদের মধ্য থেকে একজন ব্যক্তি প্রবেশ করবে, যার চেহারায় রাজকীয় আভিজাত্যের ছাপ রয়েছে।” (বর্ণনাকারী বলেন,) অতঃপর জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3194)


3194 - (والذي نفسي بيدِه! لوتعلمونَ ما أعلمُ؛ لضحكتُم قليلاً،
ولبكيتُم كثيراً.
ثم انصرف - صلى الله عليه وسلم - ؛ وأبكى القوم، وأوحى اللهُ عز وجل إليه:
يا محمدُ! لم تُقنِّط عبادي؟!
فرجع النبيُّ - صلى الله عليه وسلم - ، فقال:
أبشرُوا، وسدِّدُوا، وقاربُوا) .
أخرجه البخاري في`الأدب المفرد` (254) ، والبيهقي في `شعب الإيمان ` (2/22/1058) من طريق الربيع بن مسلم القرشي: حدثنا محمد بن زياد عن
أبي هريرة قال:
خرج النبي - صلى الله عليه وسلم - على رهط من أصحابه يضحكون ويتحدثون، فقال: ...
فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم.
وكذلك أخرجه ابن حبان في `صحيحه ` (1/162/113و 285/359) ، وقال:
` (سدِّدوا) يريد به: كونوا مسدِّدين. والتسديد: لزوم طريقة النبي - صلى الله عليه وسلم - واتباع
سننه.
وقوله: (وقاربوا) يريد به: لا تحملوا على أنفسكم من التشديد ما لا تطيقون. (وأبشروا) ؛ فإن لكم الجنة إذا لزمتم طريقتي في التسديد، وقاربتم في
الأعمال `.
وقال البيهقي عقب الحديث:
`ففي هذا دلالة على أنه لا ينبغي أن يكون خوفه بحيث يؤيِّسه ويقنِّطه من رحمة الله، كما لا ينبغي أن يكون رجاؤه بحيث يأمن مكر الله، أو يجرئه على معصية الله عز وجل `.
والحديث رواه حماد بن سلمة عن محمد بن زياد قال: سمعت أبا هريرة يقول: سمعت أبا القاسم يقول: ... فذكر الجملة الأولى منه، والأخيرة منه:
` أبشروا.. `.
أخرجه أحمد (2/467) .
ثم أخرجه هو (2/257و 313 و 418 و 432 و 453 و 502) ، والبخاري (6485و 6637) ، ومن طريقه البيهقي في `السنن ` (10/26) ، وابن حبان (7/519/5763) والترمذي (4 231) ، وابن حبان أيضاً (8/249/ 6671)
من طرق أخرى عن أبي هريرة بالشطر الأول فقط، وقال الترمذي:
`حديث حسن صحيح `.
وزاد ابن حبان في الموضع الثاني من طريق خالد بن عبد الله الزِّيادي عن أبي عثمان عنه:
`يظهر النفاق، وتُرفع الأمانة، وتُقبض الرحمة، ويُتهم الأمين، ويؤتمن غير الأمين، أناخِ بكم الشُّرف الجُون `، قالوا: وما الشُّرف الجُون يا رسول الله؟! قال: `فتن كقطع الليل المظلم `.
وهكذا أخرجه الحاكم (4/579) ، وقال:
`صحيح الإسناد`. ووافقه الذهبي!
كذا قالا! وخالد بن عبد الله الزيادي - وقيل: الزبادي - لم يذكروا عنه راوياً
غير اثنين أحدهما: جعفر بن ربيعة، والآخر: عمرو بن الحارث، وهو راويه هنا، وذكره ابن حبان في `الثقات ` (6/259) ، فمثله يحتمِلُ حديثه التحسين، أما
الصحة فلا.
ومثله - أو خير منه - شيخه أبو عثمان وهو الأصبحي، كما وقع مصرَّحاً به
في إسناد الحاكم، وكذلك في ترجمته من `التهذيب `، وسماه عبيد بن عمير، وذكر أنه روى عنه جمع غير الزيادي، ولم يحك فيه جرحاً ولا توثيقاً.
وفي `ثقات ابن حبان ` (5/568 و 576) من طبقته اثنان بكنيته هذه `أبي
عثمان `رويا عن أبي هريرة، روى عن أحدهما معاوية بن صالح، وعن الآخر ثابت البناني؛ فمن المحتمل أن يكون هو هذا. والله أعلم.
ومهما يكن حال هذا وحال الذي قبله؛ فإني أرى أن حديثه هذا لا ينزل عن
مرتبة الحسن؛ لما له من الشواهد المبثوثة في مختلف الأحاديث. والله أعلم. وللشطر الأول من حديث الترجمة شواهد كثيرة، أصحها حديث أنس بن مالك مرفوعاً به.
أخرجه البخاري (6486) ، ومسلم (7/92) ، وا بن حبان (5762) ، ووكيع
في`الزهد` (1/242/17) ، وابن أبي شيبة في`المصنف` (13/246/ 16240) ، وأحمد (3/180و 93 1و 210و251 و 268) من طرق كثيرة عنه.
وقد استوعب شواهدَه وطرقه الأخُ الفاضل عبد الرحمن بن عبد الجبار الفريوائي في تعليقه على `الزهد` (1/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
“(তিনি বললেন:) শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! তোমরা যদি জানতে যা আমি জানি, তবে তোমরা কম হাসতে এবং বেশি কাঁদতে।”
অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং এতে লোকেরা কাঁদতে শুরু করল। তখন আল্লাহ তাআলা তাঁর কাছে ওহী পাঠালেন: “হে মুহাম্মাদ! আপনি আমার বান্দাদেরকে নিরাশ করছেন কেন?”
অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে আসলেন এবং বললেন: “তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো, সঠিক পথে দৃঢ় থাকো এবং মধ্যপন্থা অবলম্বন করো।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3195)


3195 - (كأنِّي أنظرُ إلى بَياضِ كشحِ رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو ساجدٌ) .
أخرجه أحمد (3/15) من طريقين عن ابن لهيعة عن عبيد الله بن المغيرة: سمعت أبا الهيثم يقول: سمعت أبا سعيد الخدري يقول: ... فذكره.
قلت؛ وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن ابن لهيعة فيه ضعف من قبل حفظه،
وبه أعلَّه الهيثمي؛ فقال (2/125) :
`رواه أحمد، وفيه ابن لهيعة، وفيه كلام `.
وأقول: هذا من صحيح حديثه يقيناً؛ لكثرة شواهده عن جمع من الصحابة، منهم البراء بن عازب، وعبد الله بن مالك ابن بُحينَة، وأبو هريرة، وعبد الله بن أقرم، وميمونة؛ وغيرهم بمعناه، وقد أسندها عن المذكورين: النسائيُّ في`السنن الكبرى` (1/233 و 234) ، وبعضها في `صحيح مسلم ` (2/




আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যেন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে সিজদারত অবস্থায় তাঁর পার্শ্বদেশের শুভ্রতা দেখতে পাচ্ছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3196)


3196 - (يأخذُ اللهُ - عزَ وجل - سماواتِه وأرَضيِه بيديهِ، فيقولُ:
أنا اللهُ - ويقبضُ أصابعَه ويبسطُها - أنا الملِكُ، [وتمايلَ رسولُ الله - صلى الله عليه وسلم -
عن يمينه وعن شماله] حتى نظرتُ إلى المنبرِ يتحركُ من أسفلِ شيءٍ منه، حتّى إني لأقولُ: أساقطٌ هو برسولِ الله - صلى الله عليه وسلم - ؟) .
أخرجه مسلم (8/




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন: আল্লাহ তাআলা তাঁর আসমানসমূহ ও জমিনসমূহকে তাঁর দুই হাত দ্বারা গ্রহণ করবেন। অতঃপর তিনি বলবেন: আমিই আল্লাহ! - (নবীজি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর আঙ্গুলগুলো মুষ্টিবদ্ধ করলেন এবং আবার প্রসারিত করলেন) - আমিই বাদশাহ।

আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ডানে ও বামে হেলে পড়লেন, এমনকি আমি মিম্বরের নিচের অংশ পর্যন্ত নড়তে দেখলাম, এমনকি আমি (মনে মনে) বলতে লাগলাম: এই বুঝি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিয়ে পড়ে যাবে?









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3197)


3197 - (لا ينبغي لِذِي الوجهينِ أن يكون أمِيناً) .
أخرجه البخاري في`الأدب المفرد` (313) : حدثنا خالد بن مَخلَدٍ قال:
حدثنا سليمان بن بلال عن عبيد الله بن سلمان عن أبيه عن أبي هريرة - رضي
الله عنه - عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير عبيد الله بن
سلمان - وهو الأغر - ؛ فإنه من رجال البخاري.
وخالد بن مخلد له مناكير؛ كما قال أحمد وغيره، وقد خولف في إسناده ممن
هو أوثق منه، فقال الخرائطي في`مساوئ الأخلاق ` (138/292) : حدثنا أحمد
ابن منصور الرمادي: ثنا أبو سلمة الخزاعي: ثنا سليمان بن بلال عن محمد بن
عجلان عن عبيد الله بن سلمان الأغر به.
قلت: وأبو سلمة الخزاعي اسمه منصور بن سلمة، وهو ثقة ثبت حافظ، وقد
زاد في الإسناد محمد بن عجلان، وهو حسن الحديث، والرمادي ثقة أيضاً،
فالإسناد جيد.
وقد تابع الرماديّ: الإمامُ أحمد فقال في `مسنده ` (2/365) : ثنا الخزاعي
به؛ إلا أنه قال: `ما ينبغي ... `.
وتابعه أيضاً أبو أمية الطَّرسُوسِيُّ: ثنا منصور بن سلمة به.
أخرجه البيهقي في `السنن ` (10/264) و`الشعب ` (4/229/ 4880) .
وتوبع الخزاعي، فقال أحمد أيضاً (2/289) : ثنا عُبيدَةُ بن أبي قُرَّة: ثنا
سليمان به.
و (عبيدة) هكذا وقع في `المسند` في هذا الحديث، وفي حديث آخر قبله
بأحاديث! وفي طبعة أحمد شاكر (15/8 و 9) : `عُبيد`، وهو الصواب الموافق
لترجمته في كتب الرجال: `تاريخ البخاري `، `الجرح والتعديل `، `ثقات ابن
حبان` (8/ 431) ، `تاريخ بغداد` (11/95) ، و`تعجيل المنفعة` للحافظ ابن
حجر، ومن الغريب أنه لم يذكر في ترجمته ما يدل على حاله سوى قول البخاري في `التاريخ ` (3/2/2) في حديث للعباس:
`لا يتابع في حديثه `.
وقول يعقوب بن شيبة:
`ثقة صدوق `.
وذكره ابن حبان في `الثقات`، وقال:
`ربما خالف `.
هذا ما ذكره في `التعجيل `! وفاته قول ابن أبي حاتم عن أبيه:
` صد وق `.
وما رواه الخطيب عن ابن معين:
`ما كان به بأس `.
قلت: فالرجل ثقة، فمتابعته قوية.
والحديث عزاه الحافظ في `الفتح ` (10/475) للبخاري، وأشار إلى تقويته
بسكوته عليه.
وقد روي من طريق أخرى عن أبي هريرة، يرويه كثير بن زيد عن الوليد بن
رباح عن أبي هريرة مرفوعاً بلفظ الترجمة.
أخرجه ابن عدي (6/68) في ترجمة كثير هذا - وهو الأسلمي - ، وقال:
`لم أر بحديثه بأساً، وأرجو أنه لا بأس به `.
وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق يخطئ `.
وروى ابن أبي شيبة (8/558) بسند صحيح عن عكرمة قال:
`لَقَمِنٌ ذو الوجهين أن لا يكون عند الله أميناً`.
(تنبيه) : لقد وهم الشيخ الجيلاني في شرحه على `الأدب المفرد` حين قال
في حديث الترجمة:
`أخرجه الترمذي في`البر` وأحمد بطريقين (ص 365ج 2) `!
وذلك؛ لأن الترمذي لم يخرجه مطلقاً، وأحمد إنما رواه من طريقين عن
سليمان بن بلال كما تقدم، وليس عن أبي هريرة كما هو المتبادر من كلامه.
ثم إن الحديث - مع كونه ليس في شيء من الكتب الستة - ؛فلم يورده
الهيثمي في `مجمع الزوائد` مع كونه على شرطه؛ لأنه قد رواه أحمد! *




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তির দুটো মুখ রয়েছে (অর্থাৎ দ্বিমুখী), তার বিশ্বস্ত (আমানতদার) হওয়া উচিত নয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3198)


3198 - (كان يقولُ: إنّ الخيرَ خيرُ الآخرِة، أو قال:
اللهم لا خير إلا خيرُ الآخرة فاغفر للأنصارِ والمهاجرة) .
أخرجه أحمد (3/169) : ثنا حجاج قال: حدثني شعبة قال: سمعت
قتادة: حدثنا أنس بن مالك: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره. قال شعبة:
فكان قتادة يقول هذا في قصصه.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وقد أخرجه البخاري (3795 و 3796) ، ومسلم (5/188) ، والترمذي
(3857) - وصححه - ، والنسائي في`السنن الكبرى` (5/84/8313و8314) ، وأحمد (3/169و170و72 1و 278) ، وأبو يعلى (5/358و476) من طرق أخرى عن شعبة به، دون قوله: `فكان قتادة ... `، إلا أن بعضهم ذكر معاوية بن قرة أبا إياس، وحميداً مكان قتادة.
وتابعهم أبو التَّيَّاح الضُّبَعي عن أنس به.
أخرجه ابن ماجه (742) ، وابن حبان (9/ 190/7215) ، وأحمد (3/118
و244) من طرق عن حماد به، وهو رواية لمسلم (5/189) .
وأخرجه الشيخان وغيرهما من طرق أخرى عن أبي التَّيَّاح به نحوه؛ وهو
مخرج في `صحيح أبي داود` (478) .
وله شاهد من حديث أم سلمة قالت:
ما نسيت قوله يوم الخندق وهو يعاطيهم اللبن، وقد اغبرَّ شعر صدره، وهو يقول: `اللهم إن الخير خير الآخرة فاغفر للأنصار والمهاجرة`.
قال: فرأى عماراً، فقال:
`ويحَ ابنِ سُمَيَّةَ! تقتله الفئة الباغية`.
أخرجه أحمد (6/289) ، وأبو يعلى (3/ 209/1645) ، وأبو نعيم في `الحلية` (3/43) من طريق ابن عون عن الحسن عن أمه عنها.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، وقد أخرج في `صحيحه ` (8/186) قضية عمار فقط، وهو رواية لأحمد؛ خلافاً لما يوهمه صنيع المعلق على `مسند أبي يعلى`؛ حيث عزاه لمسلم والطيالسي، وليس عندهما حديث الترجمة!
وجملة: `إن الخير خير الآخرة`؛ أخرجها البخاري في `الأدب المفرد` (رقم
346) من طريق أبي غالب عن أم الدرداء قالت:
زارنا سلمان من المدائن إلى الشام ماشياً؛ وعليه كساء وانْدَرْوَرد (قال: يعني سراويل مشمرة) . قال ابن شوذب: رؤي سلمان وعليه كساء مطموم الرأس، ساقط الأذنين، يعني أنه كان أرفش، فقيل له: شَوَّهت نفسك! قال: إن الخير خير الآخرة. قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات، وفي أبي غالب - وهو صاحب أبي أمامة - كلام يسير، لا ينزل حديثه من مرتبة الحسن.
وأما قول ابن شوذب: رؤي ... إلخ؛ فهو معضل؛ لأنه لم يدرك سلمان،
مات سنة ست أو سبع ومئة.
وقد جاء الحديث عن أنس والبراء بأتم من رواية قتادة، وسيأتي تخريجه برقم (3243) . *




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: “নিশ্চয়ই (প্রকৃত) কল্যাণ হলো আখিরাতের কল্যাণ।”
অথবা তিনি বলতেন: “হে আল্লাহ! আখিরাতের কল্যাণ ছাড়া আর কোনো কল্যাণ নেই। সুতরাং আপনি আনসার ও মুহাজিরগণকে ক্ষমা করে দিন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3199)


3199 - (كان إذا قام من الليل يتهجد، صلى ركعتين خفيفتين) .
أخرجه أبو عوانة في `صحيحه ` (2/




যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ) আদায়ের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি হালকা ও সংক্ষিপ্তভাবে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3200)


3200 - (لو أن الله يؤاخذُني وعيسى بذنوبنا (وفي رواية: بما جنت هاتان - يعني: الإبهام والتي تليها - ) ، لُعذَّبَنا ولا (وفي الأخرى: ولم) يظلِمنا شَيئاً) .
أخرجه ابن حبان في `صحيحه ` (2/656 و 658) - بالروايتين - ، وأبو نعيم
في`الحلية` (8/132) - بالرواية الأخرى - من طرق عن حسين بن علي الجُعْفِيِّ عن فُضَيلٍ بن عياض عن هشام بن حسان عن ابن سيرين عن أبي هريرة قال:
قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال أبو نعيم:
`غريب من حديث الفضيل وهشام، تفرد به عنه الحسين بن علي الجعفي `.
قلت: وهو ثقة من رجال الشيخين، وكذلك من فوقه، فالسند صحيح على شرطهما، فيتعجب من الحاكم كيف لم يورده في `مستدركه `؟!
وللحديث طريق أخرى، يرويه محمد بن يوسف الفريابي: ثنا سفيان الثوري عن الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة به نحوه.
أخرجه الطبراني في` الأوسط ` (2294) ، والبزار (4/162/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আল্লাহ তা’আলা আমাকে এবং ঈসাকে (আঃ) আমাদের গুনাহের জন্য পাকড়াও করতেন— (অন্য এক বর্ণনায়: এই দুটি [অর্থাৎ, বৃদ্ধাঙ্গুলি ও তার পার্শ্ববর্তী আঙুল] যা অর্জন করেছে)— তাহলে অবশ্যই তিনি আমাদের আযাব দিতেন। আর এতে তিনি আমাদের প্রতি সামান্য পরিমাণও জুলুম করতেন না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3201)


3201 - (إن أخوف ما أخاف عليكم رجل قرأ القرآن، حتّى إذا رُئيتْ بهجتُه عليه، وكان رِدْءاً للإسلام؛ انسلخ منه ونبذه وراء ظهره، وسعى على جاره بالسيف، ورماه بالشرك. قلت: يا نبيَّ الله! أيُّهما أولى بالشرك، الرامي أو المرمي؟ قال: بل الرامي) .
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (4/ 301/07 29) ، وأبو يعلى في `مسنده الكبير`
- كما في `تفسير ابن كثير` (2/265) و`المطالب العالية` (4/273/4423) - ، ومن طريق أبي يعلى: ابن حبان في `صحيحه ` (1/148/ 81) ، والبزار في
`
مسنده ` (1/99/175) من طرق عن محمد بن بكر عن الصلت] بن بهرام [: حدثنا الحسن: حدثنا جندب البجلي - في هذا المسجد - أن حذيفة حدثه قال:
قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال ابن كثير:
`هذا إسناد جيد، والصلت بن بهرام كان من ثقات الكوفيين، ولم يُرْمَ بشيء
إلا الإرجاء، وقد وثقه أحمد وابن معين وغيرهما`.
وأقول: لا شك أن الصلت بن بهرام ثقة، ولكن هل هو راوي هذا الحديث
عن الحسن - وهو البصري - ؟! هذا فيه نظر، وإن كان جزم به ابن كثير، وسلفه في ذلك ابن حبان، فقد قال في ترجمة الصلت بن بهرام من `ثقاته ` (6/471) : `كوفي عزيز الحديث، يروي عن جماعة من التابعين، روى عنه أهل الكوفة،
وهو الذي يروي عن الحسن، روى عنه محمد بن بكر المقرئ الكوفي - ليس بالبَرَساني - ، ومن قال: إنه الصلت بن مهران؛ فقد وهم، إنما هو الصلت بن بهرام `. كذا قال! وتعقبه الحافظ بقوله في `التهذيب `:
`هذا الذي رده جزم به البخاري عن شيخه علي بن المديني، وهو أخبر بشيخه، وقال البخاري في `التاريخ `: قال لي علي: ثنا محمد بن بكر البرساني عن الصلت بن مهران: حدثني الحسن البصري ... فذكر حديثاً `.
قلت: وهو هذا، وفيما ذكره كل من الحافظ وابن حبان ما يلفت النظر:
أولاً: لا يوجد في نسخة `التاريخ ` المطبوعة: ` البرساني، ابن مهران، البصري `؛فالظاهر أن ذلك من الحافظ ذكره من عنده على سبيل البيان لا الرواية.
ثانياً: جزم ابن حبان بأن محمد بن بكر الراوي عن الصلت ليس هو البرساني، لا أدري ما مستنده في ذلك؟! بل هو مخالف لصنيع الحفاظ الذين ذكروا في
ترجمة البرساني أنه روى عنه علي بن المديني ومحمد بن مرزوق الباهلي، وهما ممن رويا هذا الحديث عنه، الأول عند البخاري كما تقدم، والآخر عند أبي يعلى وابن حبان وكذا البزار، بل إن هذا وقع في إسناده أنه (البرساني) !
ثالثاً: لا نعرف في الرواة (محمد بن بكر المقرئ الكوفي) حتى يَرِدَ جزم ابن حبان بأنه هو، ولو احتمالاً، وكان على ابن حبان أن يورده في `ثقاته ` كما فعل بـ (البرساني) ، فقد أورده في موضعين منه؛ في (أتباع التابعين) (7/442) ، وفي (أتباع أتباعهم) (9/38) ؛ فهو إذن من المجهولين.
رابعاً: سلمنا - جدلاً - أنه غير البرساني، فلا يستقيم جزمه بأن الصلت هو
ابن بهرام، لأنه لم يقع التصريح به إلا في رواية المقرئ هذا، وهو غير معروف.
خامساً: إذا كان الأمر كذلك؛ فمن يكون الصلت هذا؟ أما البخاري فصنيعه المتقدم صريح بأنه ابن مهران؛ لأنه ساق الحديث في ترجمته، ونحوه قول ابن أبي
حاتم فيه (4/439/927 1) :
`روى عن الحسن وشهر بن حوشب، وعنه محمد بن بكر البرساني وسهل
ابن حماد`.
وعليه ` فالصلت هنا اثنان: ابن بهرام، وقد وثقه جماعة كما تقدم، وابن مهران، وهو غير مشهور؛ لأنه لم يرو عنه غير البرساني وشهر، ولذلك قال الذهبي في ` الميزان `:
`مستور، قال ابن القطان: مجهول الحال `.
وظاهر كلام البزار يميل إلى أن الصلت هذا هو الأول؛ فقد قال عقب الحديث:
`
لا نعلمه يروى إلا عن حذيفة، وإسناده حسن، والصلت مشهور، ومن بعده لا يسأل عن أمثالهم `.
قلت: وسواء كان هذا أو ذاك، فالحديث حسن إن شاء الله تعالى؛ لأن له شواهد في الجملة، منها حديث عمر مرفوعاً:
`إن أخوف ما أخاف على أمتي كل منافق عليم اللسان `
رواه أحمد وغيره بسند صحيح عن عمر، وهو مخرج فيما تقدم (3/11/1013) . ورواه البيهقي في `شعب الإيمان ` (2/284/777 1) بلفظ:
`.. منافق يتكلم بالحكمة، ويعمل بالجور`.
وحديث ابن عمر مرفوعاً بلفظ:
`إذا قال الرجل للرجل: `يا كافر! فقد باء به أحدهما إن كان كما قال، وإلا؛ رجعت على الآخر`.
أخرجه أحمد (2/44) ، ومسلم وغيرهما، وقد مضى تخريجه برقم (2891)
في المجلد السادس - . *




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আমি তোমাদের জন্য সবচেয়ে বেশি যে জিনিসটির ভয় করি, তা হলো এমন এক ব্যক্তি যে কুরআন পাঠ করেছে, এমনকি তার ওপর কুরআনের দীপ্তি ফুটে উঠেছে এবং সে ইসলামের সহায়ক হয়েছিল। কিন্তু সে তা থেকে বের হয়ে গেল (দ্বীন ত্যাগ করল), আর তাকে (কুরআন/দ্বীনকে) নিজের পিঠের পেছনে ফেলে দিল, এবং সে তার প্রতিবেশীর ওপর তরবারি নিয়ে ধাবিত হলো, আর তাকে শিরকের অপবাদ দিল। (বর্ণনাকারী বললেন,) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: হে আল্লাহর নবী! তাদের উভয়ের মধ্যে কে শিরকের অধিক উপযুক্ত – যে অপবাদ দিয়েছে, নাকি যাকে অপবাদ দেওয়া হয়েছে? তিনি বললেন: বরং যে অপবাদ দিয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3202)


3202 - (من صام الدهر؛ ضيِّقت عليه جهنم هكذا - وعقد
تسعين - ) .
أخرجه الطيالسي في `مسنده ` (514) ، وعنه البزار في `مسنده ` (1041) ، وكذا البيهقي (4/300) : حدثنا الضحاك بن يسار عن أبي تميمة عن أبي موسى عن النبي - صلى الله عليه وسلم - به.
ثم أخرجه البيهقي، وابن أبي شيبة (3/78) ، وأحمد (4/414) ،
وابن حبان (5/238/3576) من طرق أخرى عن الضحاك بن يسار به.
قلت: وهذا إسناد جيد، أبو تميمة - واسمه طريف بن مجالد الهجيمي - ثقة
من رجال البخاري.
والضحاك بن يسار، قال ابن أبي حاتم (4/462/ 2040) :
`سألت أبي عنه؟ فقال: لا بأس به `.
وذكر عن ابن معين أنه قال:
`يضعفه البصريون `.
وضعفه آخرون ذكرهم الحافظ في `التعجيل `، وهو جرح غير مفسر، وقد ذكره ابن حبان في `الثقات ` (6/683) ، وروى عنه جمع من الحفاظ مثل وكيع وأبي نعيم ومسلم بن إبراهيم، وغيرهم، فمثله يحتج به، وتطمئن النفس لحديثه،
ولا سيما وقد توبع، فقال الطيالسي (513) : حدثنا شعبة عن قتادة عن أبي تميمة به موقوفاً. وقال:
`لم يرفعه شعبة، ورفعه سعيد`.
يعني: ابن أبي عروبة.
ومن طريق الطيالسي أخرجه البيهقي أيضاً.
وقد توبع، فقال ابن أبي شيبة (3/78) : حدثنا وكيع عن شعبة به.
وكذا رواه أحمد (4/414) : ثنا وكيع ...
وتابعه الثوري في `مصنف عبد الرزاق ` (4/296/7866) ؛ فقال: عن الثوري
عن أبي تميمة الهجيمي عن أبي موسى به.
كذا وقع فيه! لم يذكر قتادة بين أبي تميمة والثوري، وهذا لم يدرك أبا
تميمة (¬1) ، فلا أدري أسقط ذكر قتادة من الناسخ أو الطابع، أم الرواية هكذا؟! والأول أرجح، والله أعلم.
ولم يتنبه لهذا الانقطاع: المعلق على `المصنف `، وكذا المعلق على `الإحسان `
(8/




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সারা বছর রোজা রাখে, তার জন্য জাহান্নামকে এভাবে সংকুচিত করে দেওয়া হয়।” – এবং তিনি (নবী সাঃ) নব্বই (সংখ্যা বোঝাতে) যেভাবে অঙ্গভঙ্গি করা হয়, সেভাবে ইশারা করলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3203)


3203 - (ستكون هجرة بعد هجرة، فخيار أهل الأرض ألزمهم مهاجر إبراهيم، ويبقى في الأرض شرار أهلها، تلفظهم أرضوهم، تقذرهم نفس الله، وتحشرهم النار مع القردة والخنازير) .
أخرجه أبو داود (1/




আব্দুল্লাহ ইবন হাওয়ালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

হিজরতের পর হিজরত হবে। তখন পৃথিবীর শ্রেষ্ঠ মানুষ হবে তারা, যারা ইবরাহীম (আঃ)-এর হিজরতের স্থানে দৃঢ় থাকবে। আর পৃথিবীতে অবশিষ্ট থাকবে তার নিকৃষ্ট লোকেরা; তাদের ভূমি তাদের নিক্ষেপ করবে। আল্লাহর সত্তা তাদেরকে ঘৃণা করবেন এবং জাহান্নাম তাদের বানর ও শূকরদের সাথে একত্রিত করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3204)


3204 - (إذا أراد أحدكم أن يسأل؛ فليبدأ بالمدحة والثناء على
الله بما هو أهله، ثم ليصل على النبي - صلى الله عليه وسلم - ، ثم ليسأل بعد؛ فإنه أجدر أن ينجح) .
موقوف في حكم المرفوع: أخرجه عبد الرزاق في`المصنف ` (1/ 441/19642) ،
ومن طريقه: الطبراني في `المعجم الكبير` (9/170/ 8780) عن معمر عن أبي إسحاق عن أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود عن ابن مسعود قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لانقطاعه بين أبي عبيدة وأبيه، قال الهيثمي في `المجمع ` (10/155) :
`رواه الطبراني، ورجاله رجال `الصحيح `؛ إلا أن أبا عبيدة لم يسمع من أبيه `. قلت: فقوله (10/160) :
`وهو حديث جيد`!
غير جيد للانقطاع الذي فيه، وأيضاً فأبو إسحاق - وهو السبيعي - مدلس مختلط؛ إلا إن كان يريد أنه جيد لشواهده، فهو كما قال، ولكنه لم يوضح.
فيقويه أن له طريقاً أخرى عند الترمذي (2/184/593) من طريق أبي بكر
ابن عياش عن عاصم عن زر بن حبيش عن عبد الله قال:
كنت أصلي؛ والنبي - صلى الله عليه وسلم - وأبو بكر وعمر معه، فلما جلست بدأت بالثناء
على الله، ثم الصلاة على النبي - صلى الله عليه وسلم - ، ثم دعوت لنفسي، فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
`سل تعطه، سل تعطه `.
وقال الترمذي:
`حديث حسن صحيح `.
قلت: إسناده حسن، وقد أخرجه أحمد (1/445) من طريق أخرى عن
زائدة: ثنا عاصم بن أبي النجود بالجملة الأخيرة منه في قصة أخرى. وكذلك رواه شعبة عن أبي إسحاق عن أبي عبيدة عن عبد الله.
أخرجه أحمد (1/386 و 437) ؛ وانظر `تخريج المختارة` (455) و` المشكاة` (931) .
وله شاهد آخر بنحوه، تقدم برقم (2035) . *
من أدبه - صلى الله عليه وسلم - مع نسائه




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

যখন তোমাদের কেউ (আল্লাহর কাছে) কিছু প্রার্থনা (দো’আ) করতে ইচ্ছা করে, তখন সে যেন আল্লাহ তাআলার উপযুক্ত গুণাবলী দ্বারা তাঁর প্রশংসা ও স্তুতি দ্বারা শুরু করে। এরপর সে যেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর দরূদ পাঠ করে। অতঃপর সে যেন যা চাওয়ার তা চায়। কারণ, এতেই তার সফল হওয়ার সম্ভাবনা অধিক।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3205)


3205 - (كذلك سَوْقُكَ بالقوارير، يعني النساء. قاله - صلى الله عليه وسلم - في حجة الوداع) .
أخرجه أحمد (6/




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আর তেমনিভাবে, কাঁচের পাত্রদের (অর্থাৎ নারীদেরকে) নিয়ে তোমার দ্রুত চালনা/হাঁকানো [ঠিক নয়]। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় এটি বলেছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3206)


3206 - (لا تكرهوا البنات؛ فإنَّهنَّ المؤنسات الغاليات) .
أخرجه أحمد (4/ 151) ومن طريقه: ابن الجوزي في `العلل `، وتمّام
(11/197/2) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (17/310/856) عن ابن لهيعة عن أبي عُشَّانةَ عن عقبة بن عامر مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لسوء حفظ ابن لهيعة، وبه أعله ابن الجوزي.
وقد جاء من طريق أخرى مرسلاً وموصولاً:
أما المرسل؛ فأخرجه علي بن حرب الطائي في حديثه (ق 81/ 1) : نا أبو
معاوية عن هشام بن عروة عن أبيه مرفوعاً به؛ إلا أنه قال:
` المحقَّرات ` بدل: ` الغاليات `.
وأما الموصول؛ فأخرجه ابن عدي (6/278) ، ومن طريقه: ابن الجوزي عن محمد بن معاوية قال: ثنا أبو معاوية الضرير عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعاً.
ومحمد بن معاوية - وهو النيسا بوري - : متروك متهم.
وبعد كتابة هذا بنحو عشرين سنة؛ تبين لي أن رواية قتيبة بن سعيد عن ابن لهيعة ملحقة - من حيث الصحة - برواية العبادلة عنه كما بينه الحافظ الذهبي في `السير`، ونقلته عنه في غير ما موضع من تخريجاتي وتعليقاتي (¬1) ، ولما كان هذا
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(¬1) انظر مثلا `الصحيحة` (1/595) ، و (6/825) ، و`الضعيفة` (1/421) .
ولما كان هذا الحديث من رواية قتيبة عن ابن لهيعة؛ فقد قررت نقله من `الضعيفة` إلى هنا، وبخاصة أنه يشهد له مرسل عروة بن الزبير.




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:) তোমরা কন্যা সন্তানদের অপছন্দ করো না; কারণ তারা হলো স্নেহশীলা অন্তরঙ্গ সঙ্গী এবং অত্যন্ত মূল্যবান (সম্পদ)।