হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3927)


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হাদীসটি পাওয়া যায় নি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3928)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3929)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3930)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3931)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3932)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3933)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3934)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3935)


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সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3936)


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হাদীসটি পাওয়া যায় নি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3937)


‌‌3937- (اللهمّ! إنِّي أعوذُ بك من البخلِ، وأعوذُ بك من الجُبنِ، وأعوذُ بك أن أردّ إلى أرذلِ العُمُر، وأعوذُ بك من فتنة الدنيا، وأعوذ بك من عذاب القبر) .
أخرجه البخاري (6365 و 6370) ، والنسائي (2/314 و316) ، وأحمد (1/183و186) ، وأبو بكر البزار في `مسند سعد`، وأبو يعلى في `مسنده ` (2/71/716) ، والشاشي في `مسنده ` (1/143/79) ، والبيهقي في `عذاب القبر` (113/183) من طرق عن شعبة: حدثنا عبد الملك بن عمير عن مصعب قال: كان سعد يأمر بخمسٍ، ويذكرهن عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يأمر بهن … فذكرهن. وزاد البخاري- بعد قوله: `فتنة الدنيا`-:
يعني: فتنة الدجال.
وقد ذكر الحافظ في `الفتح ` (11/179) أنه من تفسير بعض الرواة.
وتابعه جماعة عن عبد الملك بن عمير به.
منهم: عييدة بن حميد في `مصنف ابن أبي شيبة` (3/376 و10/188/9179) ، ومن طريقه: أبو يعلى (2/110/ 771) .
ومن هذا الوجه أخرجه البخاري (6390) بلفظ:
كان النبي صلى الله عليه وسلم يعلمنا هؤلاء الكلمات كما تعلم الكتابة.
وكذا رواه ابن حبان في `صحيحه ` (2/175/1000) .
ومنهم: أبو عوانة عند البخاري (2822) قال: حدثنا عبد الملك بن عمير: سمعت عمرو بن ميمون الأودي قال: كان سعد يعلم بنيه هؤلاء الكلمات كما يعلم المعلم الغلمان الكتابة، ويقول: إن رسول الله كان يتعوذ منهن دبر الصلاة … فذكرهن. فحدثت به مصعباً فصدقه.
وأخرجه النسائي (2/314) ، والبيهقي (114/184) .

وتابعه إسرائيل عن عبد الملك بن عمير عن مصعب بن سعد وعمرو بن ميمون الأودي قال: كان سعد … إلخ.
أخرجه النسائي (2/316) .
وتابعهما شيبان عن عبد الملك بن عميرعنهما به.
أخرجه ابن خزيمة في `صحيحه ` (1/367/746) ، وابن حبان (2022) . وتابعهم عبيد الله بن عمرو الكوفي عن عبد الملك بن عمير به.
أخرجه النسائي (8/ 266) ، والترمذي (3567) ، وقال:
`هذا حديث حسن صحيح من هذا الوجه `.
ووقع في إسناد النسائي زيادة (إسرائيل) بين (عبد الله) و (عبد الملك) ؛ وهي خطأ.
(تنبيه) : اختلف لفظ شعبة في `مسند الشاشي ` في بعض فقراته؛ ومن ذلك أنه وقع مكان: `فتنة الدنيا`: `فتنة المسيح الدجال `! وهو خطأ من شيخ الشاشي أبي قلابة عبد الملك بن محمد.
كما أن لفظة: `الدنيا` في الحديث تحرفت عند بعض الحفاظ إلى: `النساء`، وقد بينت ذلك في `الضعيفة` (7050) بما لا تراه في غيره؛ والحمد لله. *




সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"(হে আল্লাহ!) নিশ্চয়ই আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই কৃপণতা থেকে, আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই ভীরুতা (কাপুরুষতা) থেকে, আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই অতি বার্ধক্যের অকর্মণ্য অবস্থায় উপনীত হওয়া থেকে, আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই দুনিয়ার ফিতনা থেকে এবং আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই কবরের আযাব থেকে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3938)


3938 - (أقربُ العملِ إلى الله عز وجل: الجهاد في سبيل الله، ولا يقاربه شيء؛ [إلا من كان مثل هذا، وأشار النبيُّ - صلى الله عليه وسلم - إلى قائم لا يفترُ من قيامٍ وصيامٍ] ) .
أخرجه البخاري في `التاريخ الكبير` (2/2/152) من طريق سالم بن غيلان
أنه عرض على يزيد بن أبي حبيب هذا الحديث بـ (عرفة) عن السائب بن مالك أنه سمع فضالة يقول:
أقبل رجل فقال: يا رسول الله! صلى الله عليك، ما أقرب العمل إلى الجهاد؟ قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله كلهم ثقات، وفي سالم بن غيلان كلام لا يضر؛ ولذلك قال الذهبي في `الكاشف `:
` صدوق `.
وأخرج له ابن حبان في `صحيحه ` بعد أن وثقه في `الثقات `. *




ফাদ্বালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মহান আল্লাহ তাআলার কাছে সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো আল্লাহর রাস্তায় জিহাদ করা। আর এর সমকক্ষ কিছুই হতে পারে না, তবে সে ব্যক্তি ছাড়া, যে এই ব্যক্তির মতো— আর নবীজি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একজন দাঁড়ানো ব্যক্তির দিকে ইশারা করলেন, যে ব্যক্তি (নফল) সালাতে দাঁড়ানো এবং রোযা রাখা থেকে কখনও বিরত হয় না (বা শিথিলতা দেখায় না)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3939)


3939 - (أعطيتُ ما لم يُعْطَ أحدٌ من الأنبياء. فقلنا: يا رسول الله! ماهو؟ قال:
نُصِرْتُ بالرُّعبِ، وأُعطيتُ مفاتيحَ الأرض، وسُمّيتُ أحمدَ، وجُعلَ الترابُ لي طهوراً، وجُعلت أمّتي خير الأمم) .
أخرجه أحمد (1/98) ، والبيهقي في `السنن ` (1/213 ~ 214) من طريق زهير عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن محمد بن علي أنه سمع علي بن أبي طالب يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن؛ للخلاف المعروف في ابن عقيل.
ومحمد بن علي: هو ابن الحنفية، ثقة من رجال الشيخين مشهور.
وزهير: هو ابن محمد التميمي أبو المنذر الخراساني، ولا بأس به في غير
رواية الشاميين عنه، وهذه منها؛ لأنه عند أحمد من رواية عبد الرحمن عنه - وهو ابن مهدي - ، وعند البيهقي من رواية يحيى بن أبي بكير، والأول بصري، والآخر يمامي.
ومن طريق هذا: أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (11/434/11693) ، والبيهقي في `الدلائل ` أيضاً (5/472) ، وعزاه المعلق عليه لـ `مسند أحمد` (1/301) ! والرقم خطأ.
وقد توبع زهير؛ فقال أحمد (1/158) : ثنا أبو سعيد: ثنا سعيد بن سلمة ابن أبي الحسام: ثنا عبد الله بن محمد بن عقيل عن محمد بن علي الأكبر به.
(تنبيه) : من الملاحظ أنه لا اختلاف بين رواية زهير ورواية سعيد بن سلمة، وقد ذكر ابن أبي حاتم في `العلل ` (2/399/2705) فرقاً نقلاً عن أبي زرعة؛ وما أظن ذلك صحيحاً، فلعله وقع له خطأ في الرواية. وقد كنت أشرت في `الإرواء` (1/317) إلى هذا الفرق أو الاضطراب معزواً لابن أبي حاتم قبل أن يتيسر لي هذا التحقيق؛ فاقتضى التنبيه.
ثم إن الحديث صحيح؛ فقد جاء أكثر فقراته في أحاديث كثيرة صحيحة، فخرجته في `الإرواء` (1/315 ~ 317) .
وفقرة: `وسميت أحمد` يشهد لها أحاديث `أنا محمد، وأحمد ... ` الحديث؛ وبعضها مخرج في `الروض النضير` (401 و 1017) . وأكبر من ذلك شهادة القرآن الكريم على لسان عيسى عليه الصلاة والسلام: (ومبشراً برسول الله يأتي من بعدي اسمه أحمد) .
وكذلك فقرة: `خير الأمم ` يشهد لها قوله تبارك وتعالى: (كنتم خير أمة أخرجت للناس ... ) الآية.
أما فقرة: `وأعطيت مفاتيح الأرض `؛ فيشهد لها قوله - صلى الله عليه وسلم - :
`بعثت بجوامع الكلم، ونصرت بالرعب، وبينا أنا نائم؛ أتيت بمفاتيح خزائن الأرض، فوضعت بين يدي `.
رواه الشيخان، وابن حبان وغيرهم عن أبي هريرة، وهو مخرج في `التعليقات الحسان ` (8/94/6329) . *




আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"আমাকে এমন কিছু দান করা হয়েছে যা অন্য কোনো নবীকে দান করা হয়নি।" আমরা বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী?" তিনি বললেন:

"আমাকে শত্রুর হৃদয়ে ভয়-ভীতি সঞ্চারের মাধ্যমে সাহায্য করা হয়েছে, আমাকে পৃথিবীর চাবিসমূহ দেওয়া হয়েছে, আমার নাম রাখা হয়েছে আহমাদ, মাটি/ধূলিকণাকে আমার জন্য পবিত্রতার মাধ্যম (পবিত্রকারী) বানানো হয়েছে এবং আমার উম্মতকে সর্বশ্রেষ্ঠ উম্মত করা হয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3940)


3940 - (إنّي رأيتُ في منامي؛ كأنّ بني الحكمِ بن أبي العاصِ يَنْزُونَ على منْبري كما تنزُو القردةُ) .
ورد من حديث أبي هريرة، وثوبان، ومرسل سعيد بن المسيب.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "নিশ্চয় আমি আমার স্বপ্নে দেখলাম, যেন হাকাম ইবনে আবুল আসের বংশধরেরা আমার মিম্বরের উপর লাফালাফি করছে, যেমন বানরেরা লাফালাফি করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3941)


3941 - (إذا مررتُم على أرضٍ قد أهلكت بها أمَّةٌ من الأمم؛ فأغِذُّوا السَّيْر) .
أخرجه أبو الشيخ في `الطبقات ` (ق 52/ 1) ، وعنه أبو نعيم في `أخبار أصبهان ` (2/139) : حدثنا سلم بن عصام قال: وجدت في كتاب أبي قال: حدثني جهور بن سفيان الجرموزي قال: حدثني أبي سفيان بن الحارث قال: حدثني أبو غالب عن أبي أمامة قال: سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول: ... فذكره. قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ سفيان بن الحارث مجهول، أورده ابن أبي حاتم (2/1/221) ، وقال:
`روى عن محمد بن كعب، روى عنه عاصم بن كليب `.
ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً، والظاهر أنه هذا، وعليه؛ كان ينبغي أن يذكر في الرواة عنه ابنه جهوراً، فقد ترجمه بأنه صدوق؛ فلعله لم يقف على هذه الرواية.
ثم رأيته ذكر في ترجمة (الابن) أنه روى عن أبيه.
وقد ذكر ابن حبان الأب في `الثقات ` برواية ابنه جهور عنه.
وعصام: هو سلم بن عبد الله بن أبي مريم أبو سلم بن عصام، قال أبو الشيخ: `من أهل المدينة، توفي سنة إحدى وثلاثين ومئتين، لم يخرج حديثه وتوفي وهو شاب `! ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
والحديث عزاه فى `الجامع الكبير` (1/82/2) للطبراني في `الكبير`؛ وهو فيه (8/333/ 8068 و8069) من طريقين آخرين عن جهور بن سفيان به.
وقال الهيثمي في `المجمع ` (10/ 290) :
`رواه الطبراني، ورجاله ثقات، وفي بعضهم خلاف`.
قلت: والظاهر أنه يشير إلى أبي غالب! والعلة - عندي - جهالة سفيان بن الحارث، كما تقدم.
لكن الحديث له شواهد تقويه، منها حديث ابن عمر في النهي عن الدخول على القوم المعذبين، متفق عليه، وهو مخرج في `فقه السيرة` (ص408) ، و ((الصحيحة ` (19) . زاد البخاري في رواية (4419) :
وأسرع السير حتى أجاز الوادي.
ولفظ مسلم (8/221) ، وابن جرير في `التفسير` (14/34) :
ثم زجر (أي: ناقته) ، فأسرع حتى خلفها.
ومنها حديث علي وجابر رضي الله عنهما في إسراعه - صلى الله عليه وسلم - في وادي محسر، ولفظ علي:
ثم أفاض حتى انتهى إلى (وادي محسر) ، فقرع ناقته، فَخبَّت حتى جاز الوادي، فوقف ... الحديث. وهو مخرج في `جلباب المرأة المسلمة ` (ص 62) .
وحديث جابر راوه مسلم وغيره، وهو مخرج في `صحيح أبي داود` (1699) . *




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন তোমরা এমন কোনো ভূমির পাশ দিয়ে অতিক্রম করো, যেখানে পূর্ববর্তী জাতিসমূহের মধ্যে কোনো জাতিকে ধ্বংস করা হয়েছে, তখন দ্রুতগতিতে পথ চলো (স্থানটি অতিক্রম করো)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3942)


3942 - (إذا ظننتُم فلا تُحَقِّقوا.
وإذا حسدتُم فلا تبغُوا.
وإذا تطيَّرتُم فامضوا؛ وعلى الله توكلوا.
وإذا وُزنتُم فأرجحُوا) .
أورده هكذا السيوطي في `الجامع الصغير` و`الكبير` من رواية ابن ماجه عن
جابر! وليس عند ابن ماجه منه إلا الجملة الأخيرة فقط.
وأورده الحافظ في ` تسديد القوس ` بالطرف الأول، مشيراً إلى تمامه بقوله:
`الحديث. ابن ماجه من رواية محارب عن جابر`.
وهذا يوهم أنه عند ابن ماجه بتمامه، وليس كذلك كما تقدم.
وأورده الحافظ ابن عبد البر في `التمهيد` (6/125) بتمامه دون الشطر الأخير منه، لكنه لم يقف على إسناده، فقال:
`وروي عن النبي - صلى الله عليه وسلم - بإسناد لا أحفظه في وقتي هذا أنه قال ... ` فذكره.
وقد راجعت له `مسند الفردوس ` بواسطة `الغرائب الملتقطة ` فلم أره فيه؛ والنسخة فيها تشويش وخرم. والله أعلم.
ومع ذلك؛ فإني أميل إلى ثبوت الحديث لشواهده:
فالجملة الأولى والثانية قد رويتا من حديث أبي هريرة في لفظ:
`في المؤمن ثلاث خصال ... `.
رواه جمع منهم أبو الشيخ والبيهقي وغيرهما، وهو مخرج في الكتاب الآخر: `الضعيفة` (4019) .
كما رويتا من حديث حارثة بن النعمان عند الطبراني بلفظ:
`ثلاث لازمات أمتي ... ` الحديث وفيه الجملة الثالثة أيضاً نحوه.
وهو مخرج في `غاية المرام ` (185/302) ، مع شاهدين مرسلين له، أحدهما من رواية عبد الرزاق، وقد أشار إليه الحافظ في `الفتح ` (10/213) بقوله:
`وهذا مرسل أو معضل، وله شاهد من حديث أبي هريرة، أخرجه البيهقي في `الشعب `.... `؛ يشير إلى حديثه المذكور آنفاً. ثم قال:
`وأخرج ابن عدي بسند لين عن أبي هريرة رفعه: `إذا تطيرتم فامضوا، وعلى الله فتوكلوا ` ... `.
ومما يشهد لهذه الجملة الثالثة - سوى ما تقدم - : حديث ابن مسعود أن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال:
`الطيرة شرك، وما منا إلا.. ولكن الله يذهبه بالتوكل `.
رواه أصحاب `السنن ` وغيرهم، وصححه جمع، وهو مخرج فيما تقدم برقم (429) ، وفي `غاية المرام ` (186/303) .
وأما الجملة الأخيرة: `واذا وزنتم فأرجحوا `؛ فقد تقدم أنه رواه ابن ماجه، وهو في `سننه ` (2222) ، وإسناده صحيح على شرط البخاري؛ كما قال البوصيري. وله عنده وغيره من أصحاب `السنن ` شاهد من حديث سويد بن قيس مرفوعاً نحوه؛ وصححه الترمذي والحاكم والذهبي؛ وهو كما قالوا.
وقول المعلق على `أخلاق النبي - صلى الله عليه وسلم - ` (ص 105/ دار الكتاب العربي) : `والحديث لا يصح `!
فهذا جهل ظاهر، ويبدو من تعليقاته أن الرجل لا يحسن شيئاً من هذا العلم! وان مما يؤكد ذلك قوله - تعليقاً على حديث `.. فرفع النبي - صلى الله عليه وسلم - عن بطنه عن حجرين ` (ص 223) - :
`لقوله - صلى الله عليه وسلم - : `نحن قوم لا نأكل حتى نجوع، وإذا أكلنا لا نشبع ` ... `!
قلت: ومع كون هذا التعليق لا صلة له بالمعلق عليه - لأن وضع الحجرين لم يكن اختياراً؛ بخلاف ماعلقه هذا الجاهل كما لا يخفى - ؛ فإن هذا القول الذي نسبه إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - لا أصل له! *




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যখন তোমরা (কারো সম্পর্কে) মন্দ ধারণা পোষণ করবে, তখন তার সত্যতা যাচাইয়ে লিপ্ত হবে না।
আর যখন তোমরা হিংসা করবে, তখন (কারো ক্ষতি করে) সীমা লঙ্ঘন করো না।
আর যখন তোমরা কুলক্ষণ দেখবে (বা কোনো কিছু অশুভ মনে করবে), তখন আল্লাহর উপর ভরসা রেখে এগিয়ে যাও।
আর যখন তোমরা (কিছু) পরিমাপ করবে (ওজন করবে), তখন একটু বেশি করে দাও।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3943)


3943 - (كان يقولُ في دعائِه:
اللهم! إنّي أعوذ بك من جارِ السُّوء في دارِِ المُقامةِ؛ فإنَّ جارَ البادية يتحوّل) .
أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (117) ، وابن حبان (2056) ، والطبراني في `الدعاء ` (3/1425/1340) ، والبيهقي في `الدعوات الكبير` (2/62/296) من طريق الحاكم، وهذا في `المستدرك ` (1/532) من طريق سليمان بن حيان أبي خالد الأحمر عن ابن عجلان عن سعيد بن أبي سعيد عن أبي هريرة:
أن النبي - صلى الله عليه وسلم - كان ... الحديث.
ووقع في رواية البخاري في ` الأدب `: ` الدنيا` مكان: ` البادية `! وقال الحاكم: `صحيح على شرط مسلم `! ووافقه الذهبي!
وفيه نظر؛ لأن مسلماً إنما أخرج لابن عجلان متابعة، وقال الحافظ:
`اختلطت عليه أحاديث أبي هريرة `.
فالحديث حسن فقط أو قريب منه؛ لكنه صحيح بما يأتي له من الشواهد.
وقد خالف أبا خالد في متن الحديث: يحيى بن سعيد؛ فقال: حدثنا محمد ابن عجلان به؛ إلا أنه قال:
`تعوذوا بالله من جار السوء في دار المقام ... ` الحديث مثله.
أخرجه النسائي (2/319) ، وهذا أصح؛ لأن ابن عجلان قد تابعه عليه عبد الرحمن بن إسحاق القرشي، وصححه الحاكم على شرط مسلم، ووافقه الذهبي، وقد سبق تخريجه برقم (1443) ، وذكرت له هناك شاهداً من حديث عقبة بن عامر، فلا داعي للإعادة.
والمقصود: أن هذا الشاهد والمتابعة المذكور تؤكد شذوذ رواية سليمان بن حيان بلفظ: `الدنيا`، بل هو باطل؛ كما يدل عليه سياق الأحاديث كلها، فضلاً عن ألفاظها.
وبهذه المناسبة؛ لا بد لي من بيان ما يأتي - دفاعاً عن الحديث النبوي، ورداً على من يتبع هواه فيضعف ما صح منه، ويصحح ما ضعف بل ما هو باطل - ، أعني به هنا: الشيخ أحمد الغماري المغربي؛ فإنه تجاهل الشذوذ المشار إليه، بل إنه قلب الأمر فادعى صحته وضعف ما خالفه، وأنه من تصرف الرواة! فقد ذكر في كتابه `المداوي ` (1/258) الحديث المعروف بوضعه وبطلانه: ` ادفنوا موتاكم وسط قوم صالحين؛ فإن الميت يتأذى بجار السوء، كما يتأذى الحي بجار السوء`! فحلا له تصحيحه ولو بقلب الحقائق العلمية! فقد ساق طرقه، وتكلم على بعضها نقلاً عن ابن الجوزي وابن حبان، وأنه باطل موضوع؛ لأن فيه (سليمان بن عيسى السِّجزي) الكذاب، ولكنه سكت عن بعضها مما تعقب به السيوطي ابن الجوزي، وتساهله في ذلك معروف؛ ومنها حديث عليّ الطويل، وفيه:
قيل: يا رسول الله! وهل ينفع الجار الصالح في الآخرة؛ قال: `هل ينفع في الدنيا؛ `، قالوا: نعم. قال: `كذلك ينفع في الآخرة`!
قلت: وهذا أيضاً فيه الكذاب المذكور، والغماري يعلم ذلك من كتابي
`الأحاديث الموضوعة ` (613) ، وهو كثير الاستفادة منه؛ ولكن على الصمت! كما يتبين ذلك لمن يقابل تخريجاتي فيه بما يخرجه هو في `المداوي `، فكتم علة هذا الحديث؛ تكثراً وتضليلاً للقراء، وإيهاماً لهم بأنه شاهد معتبر!
ولو فرضنا أنه لم يقف على هذه العلة؛ لم يجزله جعله شاهداً مع جهله حال أحد من رواته؛ كما لا يخفى على أهل العلم.
وإن من دعاويه الباطلة، وتضليله لتلامذته السٌّذَّجِ؛ قوله عقب تلك الأحاديث الباطلة:
`قلت: غفل الحافظ السيوطي رحمه الله عن شاهد صحيح وجدته لهذا الحديث في `الأدب المفرد` للبخاري ... `! فساقه بإسناده، مع رواية الحاكم المخالفة لمتنه؛ وشاهدها المؤيد لها، ورد ذلك كله بشطبة قلم فقال:
`وهو عندي من تصرف الرواة، والصحيح ما رواه البخاري (!) ؛ فإن (دار المقامة) في لسان الشرع هي الآخرة لا الدنيا. وأيضاً لا خصوصية للبادية على الحاضرة في هذا، فالحديث كما عند البخاري (!) يشير إلى سؤال مجاورة الصالحين في الدفن، فيكون شاهداً صحيحاً لحديث الكتاب. والله أعلم `!!
فأقول - وبالله أستعين - :
ما أظن - بعد كل ما تقدم - أن عامة القراء - فضلاً عن خاصتهم - بحاجة إلى مزيد من البيان لبطلان هذا الكلام الذي ختم به الرجل تصحيحه للحديث الباطل بالحديث الشاذ، ومع ذلك فإني أرى أن من الخير رده ببيان ما فيه من الزور والمغالطة، والتقول على الشارع الحكيم، فأقول:
أولاً: قوله: ` فإن (دار المقام) في لسان الشارع هي الآخرة لا الدنيا`!
قلت: وهذا كذب وزور، وتقوُّل على الشارع الحكيم بتحميل كلامه ما لا يتحمل؛ فإنه يشير بذلك إلى قوله تعالى في أهل الجنة:
(جنات عدن يدخلونها يحلون فيها من أساور من ذهب ولؤلؤاً ولباسهم فيها حرير. وقالوا الحمد لله الذي أذهب عنا الحَزَنَ إن ربنا لغفور شكور. الذي أحلنا دار المُقَامة من فضله لا يمسُّنا فيها نصب ولا يمسنا فيها لُغُوب) .
فأنت ترى أن (دار المقامة) في الآية أريد بها الجنة؛ لأن من دخلها أقام فيها
ولم يخرج منها ألبتة، بخلاف (النار) فليست كذلك ` فإنه يخرج منها الموحدون كما هو معلوم، فوسع ذاك المأفون معنى هذه الكلمة، فقال: هي الآخرة، فدخل فيها النار أيضاً، وهذا باطل بداهة! فعل ذلك ليدخل فيها الحياة البرزخية؛ تمهيداً للاستشهاد بالحديث - مع شذوذه - على صحة الحديث الباطل! وقد أشار إلى هذا المعنى الذي ذكرته الراغب الأصبهاني في كتابه الفذ `المفردات في غريب القرآن ` فقال (418/2) :
`و (المقامة) : الإقامة، قال تعالى: (الذي أحلنا دار المقامة من فضله) نحو (دار الخلد) ، و (جنات عدن) `. وقال قتادة في تفسير الآية:
`أقاموا فلا يتحولون ولا يُحَوَّلون ` (¬1) .
فالكلمة معناها لغوي محض في القرآن والحديث، ليس لها معنى خاص في الشرع كما زعم المأفون، فهي تقابل معنى التحول الذي صرح به الحديث في قوله:
`جار البادية يتحول `. ولهذا قال ابن الأثير في `غريب الحديث `:
¬_________
(¬1) ` الدر المنثور` (5/ 254) . *
`هو الذي يكون في البادية ومسكنه المضارب والخيام، وهو غير مقيم في موضعه، بخلاف جار المقام في المدن `.
ثانياً: قوله: `وأيضاً لا خصوصية للبادية على الحاضرة في هذا`!
قلت: هذه سفسطة ومكابرة ذات قرون؛ من ناحيتين:
الأولى: ضربه للأحاديث الصحيحة - بالحديث الشاذ - المصرحة بالفرق الذي نفاه.
والأخرى: جحده للمعروف عن أهل البادية أنهم لا يستقرون ولا يقيمون في مكان واحد، بل يتنقلون من مكان إلى آخر للماء والمرعى لمواشيهم، حتى إن بعض العلماء لم يوجبوا عليهم الجمعة؛ لأنهم غير مقيمين.
ومما سبق؛ يتبين لكل ذي بصيرة سقوط ما نفاه من الحقائق العلمية في ختام كلامه، وهو قوله: `فالحديث كما عند البخاري يشير إلى سؤال مجاورة الصالحين في الدفن ... `!!
وخلاصة ذلك؛ أن حديث البخاري في `الأدب المفرد` شاذ لا يستحق التحسين فضلاً عن التصحيح؛ وأن الصحيح إنما هو باللفظ المخالف له: `البادية`.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দো‘আয় বলতেন: হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট স্থায়ী নিবাসের (বসতিস্থলের) খারাপ প্রতিবেশী থেকে আশ্রয় চাই; কেননা, মরুভূমির (অস্থায়ী) প্রতিবেশী স্থান পরিবর্তন করে চলে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3944)


3944 - (إنِّي لكم فرَطٌ على الحوض، فإيّاي! لا يأتينّ أحدكم فيُذَبَّ عنِّي كما يُذبُّ البعير الضال، فأقول: فيم هذا؟ فيقال: إنك لا تدري ما أحدثوا بعدك؟! فأقول: سُحْقاً) .
أخرجه مسلم (7/67) ، والنسائي في `التفسير - الكبرى` (13/16/




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

নিশ্চয় আমি তোমাদের জন্য হাউযের (কওসারের) ধারে অগ্রগামী (প্রতীক্ষাকারী)। অতএব সাবধান! তোমাদের কেউ যেন আমার কাছে এমন অবস্থায় না আসে যে, তাকে আমার কাছ থেকে তাড়িয়ে দেওয়া হবে, যেমনভাবে পথভ্রষ্ট উটকে তাড়িয়ে দেওয়া হয়। তখন আমি বলব, ‘এ কী কারণে?’ তখন বলা হবে, ‘আপনি জানেন না, আপনার পরে এরা কী কী (নতুন বিষয় বা বিদআত) উদ্ভাবন করেছে!’ তখন আমি বলব, ‘দূর হও!’ (অর্থাৎ: আল্লাহর রহমত থেকে দূরে থাকো।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3945)


3945 - (إنِّي لم أُبعَث لعّاناً، وإنما بعثتُ رحمةً) .
أخرجه مسلم (8/24) ، والبخاري في `الأدب المفرد` (321) ، وأبو بكر أحمد ابن جرير السَّلَمَاسِيُّ في `حديث أبي علي اللحياني ` (ق هـ - 6) من طريق مروان الفزاري عن يزيد بن كيسان عن أبي حازم عن أبي هريرة قال:
قيل: يا رسول الله! ادع على المشركين. قال: ... فذكره.
وتابعه هُيَّاج بن بسطام قال: حدثنا يزيد بن كيسان به؛ بتقديم الجملة الأخرى على الأولى.
أخرجه العقيلي في `الضعفاء` (4/366) في ترجمة (هياج) هذا، وقال:
`ولا يتابع عليه، ولا على شيء من حديثه. والحديث من غير هذا الطريق معروف بإسناد صالح `.
قلت: كأنه يشير إلى ما قبله. والله أعلم.
وللشطر الثاني من الحديث طريق أخرى عن أبي هريرة بلفظ:
`يا أيها الناس! إنما أنا رحمة مهداة`.
وقد سبق تخريجه في المجلد الأول برقم (490) .
وللجملة الأولى شاهد من حديث كريز بن أسامة مرفوعاً.
رواه الطبراني بسند ضعيف؛ وقد كنت ذكرته تحت الحديث (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"নিশ্চয়ই আমি অভিশাপকারী (বা লা’নতকারী) হিসেবে প্রেরিত হইনি। বরং আমি রহমত (অনুগ্রহ) স্বরূপ প্রেরিত হয়েছি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3946)


3946 - (اتقُوا الله، واعدِلُوا بينَ أولادِكم؛ كما تُحبُّون أنْ يَبَرُّوكم) .
ذكره السيوطي في `الجامعين `: `الكبير`، و`الصغير` من رواية الطبراني في `المعجم الكبير` من حديث النعمان بن بشير، وسكت عنه كغالب عادته، ولم يورده الهيثمي في `مجمعه `؛ لأن أصله في `الصحيحين ` وغيرهما ` كما يأتي، لكن ليس فيهما جملة (الحب) ، فكان ذلك من الأسباب التي حملتني على إيراده في `ضعيف الجامع ` يوم جعلت `الفتح الكبير في ضم الزيادة إلى الجامع الصغير` للشيخ النبهاني على قسمين: صحيح وضعيف، والآن وقد تفضل الله تبارك وتعالى علي بشيء من النشاط والقوة على البحث والكتابة في مرضي الذي اقعدني - وأنا في صدد تهذيب `الفتح الكبير` - ؛ كان لا بد من تكوين رأي علمي حول هذا الحديث وأمثاله مما كنت بيضت له؛ للسبب المذكور ونحوه مما هو مشروح في مقدمة (القسمين) المشار إليهما، فقد جددت البحث عن الحديث؛ فلم أجده في `معجم الطبراني `؛ لأن المجلد الذي فيه من أول اسمه حرف النون لم يطبع بعد، لكن وفقني الله تعالى، فوجدته في مصدر؛ نادراً ما يرجع الباحثون إليه، ووجدت ما يشهد له ويقويه، فأقول:
أخرجه مسلم الواسطي المعروف بـ (بحشل) في `تاريخ واسط ` (224 ~ 225) من طريق علي بن عاصم عن داود بن أبي هند وحصين بن عبد الرحمن وإسماعيل ابن أبي خالد ومطرف وأبي إسحاق الشيباني عن عامر قال؛ سمعت النعمان بن بشير وهو يخطب على المنبر فقال:
تصدق أبي علي بصدقة، فقالت عمرة بنت رواحة: لا أرضى حتى تُشهِِدَ عليها رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ، فأتى بشير رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فقال: إني تصدقت على ابني
بصدقة، فقالت عمرة بنت رواحة: لا أرضى حتى تشهد عليها رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟ فقال:
`ألك بنون غيره؟ `. قال: نعم. قال:
`فكلهم أعطيت مثلما أعطيت؟ `. قال: لا. قال:
`هذا جور؛ فلا تشهدني عليه، اتقوا الله ... ` الحديث.
قلت: ورجاله ثقات رجال مسلم؛ غير علي بن عاصم، وهو صدوق يخطئ ويصر، كما قال الحافظ.
ولكنه قد توبع، فأخرجه مسلم (5/66 ~ 67) ، وأبو داود (3542) ، وابن حبان (5084/الإحسان) ، والطحاوي في `شرح المعاني ` (2/243 ~ 244 و 244) ، والبيهقي (6/177 ~ 178و178) ، وأحمد (4/270) من طرق عن داود بن أبي هند عن الشعبي وإسماعيل بن سالم ومجالد - عند أحمد - ثلاثتهم عن الشعبي به نحوه، وفي حديث داود:
ثم قال: `أيسرك أن يكونوا إليك في البر سواء؟ `، قال: بلى، قال: ` فلا إذن `. وذكر مجالد في حديثه:
`إن لهم عليك من الحق أن تعدل بينهم، كما أن لك عليهم من الحق أن يَبَرُّوك `.
وأخرجه الطيالسي في `مسنده` (1/107/789) ، ومن طريقه: البيهقي (6/177) : ثنا شعبة عن مجالد به. وقال البيهقي:
`تفرد مجالد بهذه اللفظة`.
يعني لفظة: `الحق `، لكن معناها صحيح، يشهد له مجموع روايات الحديث
كما هو ظاهر.
وللطرف الأول من الحديث: (التقوى والعدل) طرق أخرى في `الصحيحين ` وغيرهما، وقد خرجت بعضها في `الإرواء` (6/ 41 ~ 42) . وانما كان المقصود هنا العناية بتخريج الشطر الثاني منه، والتوصل إلى معرفة مرتبته، فقد تبين أنه صحيح، والحمد لله الذي بنعمته تتم الصالحات. *




নু’মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং তোমাদের সন্তানদের মধ্যে ন্যায়সঙ্গত আচরণ করো; যেমন তোমরা ভালোবাসো যে তারা তোমাদের প্রতি সদাচারী (সদ্ব্যবহারকারী) হোক।"