হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5201)


(من جاء منكم الجمعة؛ فليغتسل. فلما كان الشتاء قلنا: يا رسول الله! أمرتنا بالغسل للجمعة، وقد جاء الشتاء ونحن نجد البرد؟ فقال: من اغتسل فبها ونعمت، ومن لم يغتسل؛ فلا حرج) .
موضوع بهذا التمام

أخرجه ابن عدي في `الكامل` (ق 324/ 1) عن الفضل بن المختار عن أبان عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره، في ترجمة الفضل هذا، وقال:
`عامة حديثه مما لا يتابع عليه؛ إما إسناداً وإما متناً`.
قلت: وقال فيه أبو حاتم:
`أحاديثه منكرة، يحدث بالأباطيل`.
قلت: وهو راوي حديث المجرة الموضوع، وقد مضى برقم (284) .
لكن أبان - وهو ابن أبي عياش - ليس خيراً منه، بل لعله شر منه؛ فقد اتفقوا على تركه. وقال شعبة:
`لأن يزني الرجل خير من أن يروي عن أبان`. وقال فيه أحمد:
`كذاب`.
قلت: فهو أو الراوي عنه آفة هذا الحديث، وقد لفقه من حديثين صحيحين، محرفاً لأحدهما:
الأول: قوله صلى الله عليه وسلم: `من جاء منكم الجمعة؛ فليغتسل`؛ فإنه متفق عليه من حديث عمر وابنه عبد الله وغيرهما بألفاظ متقاربة، وهو مخرج في `صحيح أبي داود` (367) .
والحديث الآخر لفظه: `من توضأ يوم الجمعة فبها ونعمت، ومن اغتسل فالغسل أفضل`. هكذا روي عن جمع من الصحابة منهم أنس نفسه، بأسانيد ثلاثة: عن يزيد الرقاشي، وثابت البناني، والحسن البصري؛ ثلاثتهم عن أنس به.

أخرجه عنهم الطحاوي وغيره، وطرقه يقوي بعضها بعضاً، وهي مخرجة في `صحيح أبي داود` أيضاً برقم (380) .
فجاء هذا الكذاب (أبان) ؛ فرواه باللفظ المذكور أعلاه:
`من اغتسل فبها ونعمت، ومن لم يغتسل فلا حرج`.
فجعل لفظه صريح الدلالة في عدم وجوب غسل الجمعة! وليس هذا فحسب، بل إنه ربط بينه وبين الحديث الأول: `من جاء منكم الجمعة؛ فليغتسل` - وهو ظاهر على وجوب الغسل - ؛ فربط بينهما بجملة الشتاء والسؤال، بحيث يدل الجواب على أن الحديث الأول منسوخ قطعاً.
ولذلك؛ استدل به للحنفية الحافظ الزيلعي في `نصب الراية` (1/ 88) على أن أحاديث الوجوب منسوخة! فإنه ساقه من طريق ابن عدي كما سقناه، ثم عقب عليه بقوله:
`إلا أن هذا سند ضعيف يسد بغيره`!
كذا فيه: `يسد` بالسين المهملة؛ أي: يصلح، ولعله: `يشد` بالمعجمة، وسواء كان هذا أو ذاك؛ فإن القلب يشهد بأن في العبارة تحريفاً من بعض الناسخين
أو غيرهم، ولعل الأصل:
`ضعيف بمرة` أو نحوه؛ فإني أكبر الحافظ الزيلعي أن يقتصر على تضعيف هذا الإسناد الهالك بهذا المتن الباطل، وليس هذا فقط، بل ويقول فيه:
`يسد (أو يشد) بغيره`!!
إني أستبعد جداً أن يقول هذا، وهو يعلم أن الشديد الضعف لا يقوى بغيره، لا سيما إذا كان متنه باطلاً كهذا.
وأما الشيخ مهدي الحنفي الذي سبق ذكره في الحديث المتقدم؛ فقد نقل عبارة الزيلعي هذه واستدلاله به على النسخ، وسلم بذلك كله متعقباً عليه بقوله:
`وسيأتي تحقيق الحديث المذكور (يعني: من توضأ يوم الجمعة … ) ؛ فإن بعض طرقه صحيح أو حسن، والمجموع ينهض حجة للنسخ؛ فافهم`!!
فانطلى عليه حال إسناد هذا الحديث الهالك والمتن الباطل، فلم ينبه على شيء من ذلك؛ وبخاصة الفرق بين متنه ومتن تلك الأحاديث التي يتقوى بها متنها دون متنه، وهي لا تدل على النسخ المزعوم مطلقاً، وتجد بيان ذلك في `المحلى` (2/ 14) ، و `الفتح` (2/ 300) .
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(তোমাদের মধ্যে যে জুমুআর জন্য আসে, সে যেন গোসল করে। যখন শীতকাল এলো, আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাদেরকে জুমুআর জন্য গোসল করার নির্দেশ দিয়েছেন, অথচ শীতকাল এসে গেছে এবং আমরা ঠাণ্ডা অনুভব করি? তখন তিনি বললেন: যে গোসল করলো, সে তো উত্তম কাজ করলো এবং ভালো করলো, আর যে গোসল করলো না, তার কোনো দোষ নেই।)
এই পূর্ণতার সাথে মাওদ্বূ (জাল)।

ইবনু আদী এটি তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (খন্ড ১/৩২৪) ফাদল ইবনুল মুখতার হতে, তিনি আবান হতে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। এই ফাদলের জীবনীতে তিনি (ইবনু আদী) বলেছেন:
‘তার অধিকাংশ হাদীসই এমন, যার উপর (অন্যরা) অনুসরণ করে না; হয় ইসনাদের দিক থেকে, না হয় মাতনের দিক থেকে।’
আমি (আলবানী) বলি: তার সম্পর্কে আবূ হাতিম বলেছেন:
‘তার হাদীসগুলো মুনকার (অস্বীকৃত), সে বাতিল (মিথ্যা) বিষয় বর্ণনা করে।’
আমি বলি: সে হলো মাওদ্বূ (জাল) হাদীস ‘আল-মাজাররাহ’র বর্ণনাকারী, যা পূর্বে ২৮৪ নং-এ গত হয়েছে।
কিন্তু আবান—আর সে হলো ইবনু আবী আইয়াশ—সে তার (ফাদলের) চেয়ে ভালো নয়, বরং সম্ভবত সে তার চেয়েও খারাপ; কারণ তারা (মুহাদ্দিসগণ) তাকে বর্জন করার ব্যাপারে একমত হয়েছেন। শু‘বাহ বলেছেন:
‘কোনো ব্যক্তির যেনা করাও আবান হতে হাদীস বর্ণনা করার চেয়ে উত্তম।’ তার সম্পর্কে আহমাদ বলেছেন:
‘সে মিথ্যাবাদী (কাযযাব)।’
আমি বলি: সে অথবা তার থেকে বর্ণনাকারীই এই হাদীসের ত্রুটি (আফা)। সে এই হাদীসটিকে দুটি সহীহ হাদীস থেকে একত্রিত করে তৈরি করেছে, যার মধ্যে একটিকে বিকৃত করেছে:
প্রথমটি: তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাণী: ‘তোমাদের মধ্যে যে জুমুআর জন্য আসে, সে যেন গোসল করে’; এটি উমার ও তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্যদের হাদীস হতে কাছাকাছি শব্দে মুত্তাফাকুন আলাইহি (সহীহ বুখারী ও মুসলিমে বর্ণিত), আর এটি ‘সহীহ আবী দাঊদ’ গ্রন্থে (৩৬৭) সংকলিত হয়েছে।
আর অপর হাদীসটির শব্দ হলো: ‘যে ব্যক্তি জুমুআর দিন ওযু করলো, সে তো উত্তম কাজ করলো এবং ভালো করলো, আর যে গোসল করলো, তবে গোসল করাই উত্তম।’ এভাবে সাহাবীগণের একটি দল হতে বর্ণিত হয়েছে, তাদের মধ্যে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজেও আছেন, তিনটি ইসনাদের মাধ্যমে: ইয়াযীদ আর-রাকাশী হতে, সাবিত আল-বুনানী হতে, এবং হাসান আল-বাসরী হতে; এই তিনজনই আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এটি বর্ণনা করেছেন।
আত-তাহাবী ও অন্যান্যরা তাদের হতে এটি সংকলন করেছেন, আর এর সনদগুলো একে অপরের দ্বারা শক্তিশালী হয়, এবং এটি ‘সহীহ আবী দাঊদ’ গ্রন্থেও ৩৮০ নং-এ সংকলিত হয়েছে।
অতঃপর এই মিথ্যাবাদী (আবান) এসে এটিকে উপরোক্ত শব্দে বর্ণনা করেছে:
‘যে গোসল করলো, সে তো উত্তম কাজ করলো এবং ভালো করলো, আর যে গোসল করলো না, তার কোনো দোষ নেই।’
ফলে সে এর শব্দকে জুমুআর গোসল ওয়াজিব না হওয়ার ব্যাপারে স্পষ্ট প্রমাণ বহনকারী বানিয়েছে! শুধু তাই নয়, বরং সে এটিকে প্রথম হাদীসটির সাথে যুক্ত করেছে: ‘তোমাদের মধ্যে যে জুমুআর জন্য আসে, সে যেন গোসল করে’—যা গোসল ওয়াজিব হওয়ার ব্যাপারে স্পষ্ট—; সে শীতকাল ও প্রশ্ন করার বাক্য দ্বারা উভয়ের মধ্যে এমনভাবে সংযোগ ঘটিয়েছে, যাতে উত্তরটি স্পষ্টভাবে প্রমাণ করে যে প্রথম হাদীসটি নিশ্চিতভাবে মানসূখ (রহিত)।
এই কারণে; হানাফীদের পক্ষে হাফিয আয-যাইলাঈ ‘নাসবুর রায়াহ’ গ্রন্থে (১/৮৮) এই হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন যে, ওয়াজিব হওয়ার হাদীসগুলো মানসূখ! তিনি এটিকে ইবনু আদী’র সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যেমনটি আমরা বর্ণনা করেছি, অতঃপর তিনি এর উপর মন্তব্য করে বলেছেন:
‘তবে এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), যা অন্য দ্বারা শক্তিশালী হয় (يَسُدُّ بِغَيْرِهِ)!’
এতে এভাবে রয়েছে: ‘يَسُدُّ’ (ইয়াসুদ্দু) সিন (س) অক্ষর দ্বারা; অর্থাৎ, এটি উপযুক্ত। সম্ভবত এটি যাল (ذ) অক্ষর দ্বারা ‘يَشُدُّ’ (ইয়াশুদ্দু)। এটি হোক বা ওটিই হোক; অন্তর সাক্ষ্য দেয় যে, এই বাক্যটিতে কিছু লিপিকার বা অন্য কারো দ্বারা বিকৃতি ঘটেছে। সম্ভবত মূল শব্দটি ছিল: ‘একদম যঈফ’ (ضعيف بمرة) অথবা এর কাছাকাছি কিছু; কারণ আমি হাফিয যাইলাঈকে এর চেয়ে অনেক বড় মনে করি যে, তিনি এই বাতিল মাতন (মূলপাঠ) সহ এই ধ্বংসাত্মক ইসনাদকে কেবল দুর্বল বলে ক্ষান্ত হবেন, শুধু তাই নয়, বরং তিনি এর সম্পর্কে বলবেন: ‘এটি অন্য দ্বারা শক্তিশালী হয় (يَسُدُّ বা يَشُدُّ بِغَيْرِهِ)’!!
আমি অত্যন্ত অসম্ভব মনে করি যে তিনি এমন কথা বলবেন, অথচ তিনি জানেন যে, মারাত্মক দুর্বল (শাদীদ আয-যঈফ) হাদীস অন্য দ্বারা শক্তিশালী হয় না, বিশেষত যখন এর মাতন (মূলপাঠ) এর মতো বাতিল হয়।
আর শাইখ মাহদী আল-হানাফী, যার কথা পূর্ববর্তী হাদীসে উল্লেখ করা হয়েছে; তিনি যাইলাঈর এই বাক্যটি এবং এর দ্বারা মানসূখ হওয়ার পক্ষে তাঁর প্রমাণ পেশ করাকে উদ্ধৃত করেছেন, এবং তিনি এর সবটাই মেনে নিয়েছেন, অতঃপর এর উপর মন্তব্য করে বলেছেন:
‘আর উল্লেখিত হাদীসের তাহকীক (বিশ্লেষণ) শীঘ্রই আসবে (অর্থাৎ: যে ব্যক্তি জুমুআর দিন ওযু করলো...); কারণ এর কিছু সনদ সহীহ বা হাসান, আর সমষ্টিগতভাবে তা মানসূখ হওয়ার পক্ষে প্রমাণ হিসেবে যথেষ্ট; সুতরাং বুঝে নাও’!!
ফলে এই ধ্বংসাত্মক ইসনাদ এবং বাতিল মাতনবিশিষ্ট হাদীসের অবস্থা তার কাছে গোপন রয়ে গেছে, তাই তিনি এর কোনো কিছুর উপরই সতর্ক করেননি; বিশেষত এর মাতন এবং সেই হাদীসগুলোর মাতনের মধ্যে পার্থক্য, যার দ্বারা এর মাতন নয় বরং তাদের মাতন শক্তিশালী হয়, আর সেগুলো কথিত মানসূখ হওয়ার উপর মোটেও প্রমাণ বহন করে না। তুমি এর ব্যাখ্যা ‘আল-মুহাল্লা’ (২/১৪) এবং ‘আল-ফাতহ’ (২/৩০০) গ্রন্থে পাবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5202)


(لا عليكما، صوما مكانه يوماً آخر) .
ضعيف
روي من حديث عائشة، وله عنها طريقان: أحدهما عن عروة، والآخر عن عمرة.
1 - أما طريق عروة؛ فله عنه طريقان:
الأولى: عن زميل مولى عروة عن عروة بن الزبير عنها قالت:
أهدي لي ولحفصة طعام، وكنا صائمتين، فأفطرنا، ثم دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلنا له: يا رسول الله! إنا أهديت لنا هدية، فاشتهيناها فأفطرنا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.

أخرجه أبو داود (2457) ، والنسائي في `السنن الكبرى` (ق 63/ 2) ، وابن أبي حاتم في `العلل` (1/ 227) ، وابن عدي في `الكامل` (151/ 2) ، والبيهقي (4/ 281) ؛ وقال - تبعاً لابن عدي، وهذا تبعاً للبخاري في `التاريخ` (2/ 1/ 450) - :
`لا يعرف لزميل سماع من عروة، ولا تقوم به الحجة`. ثم قال ابن عدي:
`وحديث عروة عن عائشة معروف بزميل، وإسناده لا بأس به`!
وهذا منه غريب؛ إذ كيف يكون إسناده لا بأس به، وفيه زميل، وقد قال فيه البخاري: `لا تقوم به الحجة`، ولم يرو عنه غير يزيد بن الهاد؟! ففيه إشارة إلى أنه مجهول، وقد صرح بذلك جمع، أقدمهم الإمام أحمد فقال:
`لا أدري من هو؟! `.
وتبعه الخطابي؛ فقال في `معالم السنن` (3/ 335) :
`إسناده ضعيف، وزميل مجهول، ولو ثبت الحديث؛ أشبه أن يكون إنما أمرهما بذلك استحباباً`.
وتبعه على هذا الحافظ المنذري في `مختصر السنن`. ولذلك؛ قال الحافظ في `التقريب`:
`مجهول`. ونحوه في `الميزان`، وقال:
`ومن مناكيره … `؛ ثم ساق له هذا الحديث.
ثم قال البيهقي:
`وروي من أوجه أخرى عن عائشة، لا يصح شيء منها، وقد بينت ضعفها في (الخلافيات) `.
قلت: وسأبينها في حدود ما اطلعت عليه، وما توفيقي إلا بالله.
والطريق الأخرى: عن الزهري عن عروة. وله عن الزهري طرق:
الأولى: عن جعفر بن برقان قال: حدثنا الزهري عن عروة عن عائشة به.

أخرجه الترمذي (1/ 142) ، والنسائي (ق 63/ 2) ، والبيهقي (4/ 280) ، وأحمد (6/ 263) ، وأبو يعلى (3/ 1140) كلهم عن كثير بن هشام قال: حدثنا جعفر بن برقان … وأعلوه بالإرسال؛ فقال الترمذي عقبه:
`وروى صالح بن أبي الأخضر، ومحمد بن أبي حفصة هذا الحديث عن الزهري عن عروة عن عائشة مثل هذا. ورواه مالك بن أنس، ومعمر، وعبيد الله بن عمر، وزياد بن سعد وغير واحد من الحفاظ عن الزهري عن عائشة مرسلاً، ولم يذكروا فيه: عن عروة، وهو أصح؛ لأنه روي عن ابن جريج قال: سألت الزهري قلت له: أحدثك عروة عن عائشة؟ قال: لم أسمع من عروة في هذا شيئاً، ولكني سمعت في خلافة سليمان بن عبد الملك من نا عن بعض من سأل عائشة عن هذا الحديث`. وقال البيهقي:
`هكذا رواه جعفر بن برقان، وصالح بن أبي الأخضر، وسفيان بن حسين؛ عن الزهري؛ وقد وهموا فيه عن الزهري`.
وكذا قال ابن أبي حاتم في `العلل` (1/ 227) عن أبيه، والنسائي؛ كما يأتي في الطريق الثالثة.
وعلة هذه الطريق الأولى - بالإضافة إلى مخالفة الثقات الحفاظ - جعفر هذا؛ فإنه وإن كان أخرج له مسلم؛ فهو ضعيف في روايته عن الزهري خاصة، صرح بذلك جمع من أئمة الجرح، كأحمد وابن معين وابن عدي وغيرهم، ويأتي كلام النسائي بذلك قريباً.
الثانية: عن سفيان بن حسين عن الزهري به.

أخرجه النسائي (63/ 2 - 64/ 1) ؛ وأعله بابن حسين؛ كما يأتي.
الثالثة: عن صالح بن أبي الأخضر عنه به.

أخرجه ابن صاعد في `مجلسان` (ق 52/ 1) - من طريق روح بن عبادة عنه - ، ورواه النسائي (64/ 1) ، والبيهقي - من طريق سفيان بن عيينة - قالا: سمعنا من صالح بن أبي الأخضر … فذكره، قال سفيان: فسألوا الزهري - وأنا شاهد - فقالوا: هو عن عروة؟ فقال: لا.
وقول سفيان؛ هذا أخرجه الطحاوي أيضاً في `شرح المعاني` (1/ 354) .
ورواه ابن أبي حاتم عن أبيه: حدثنا ابن أبي مريم عن ابن عيينة بلفظ:
فقال: لم أسمعه من عروة، إنما حدثني رجل على باب … فذكره نحو رواية ابن جريج المتقدمة عند الترمذي.
وقد وصلها هو، وعبد الرزاق (4/ 276) ، والطحاوي؛ عنه.
ولعله هو السائل الذي أشار إليه سفيان في قوله المذكور. وقد قال النسائي عقبه:
`الصواب ما روى ابن عيينة عن الزهري؛ وصالح بن أبي الأخضر ضعيف في الزهري وغير الزهري، وسفيان بن حسين وجعفر بن برقان ليسا بالقويين في الزهري، ولا بأس بهما في غير الزهري`. وقال البيهقي:
`فهذان ابن جريج وسفيان بن عيينة شهدا على الزهري - وهما شاهدا عدل - بأنه لم يسمعه من عروة، فكيف يصح وصل من وصله؟!
قال أبو عسيى الترمذي: سألت محمد بن إسماعيل البخاري عن هذا الحديث؟ فقال: لا يصح حديث الزهري عن عروة عن عائشة. وكذلد قال محمد ابن يحيى الذهلي، واحتج بحكاية ابن جريج وسفيان بن عيينة، وبإرسال من أرسل الحديث من الأئمة`.
الرابعة والخامسة والسادسة: عن إسماعيل بن إبراهيم عن ابن شهاب به.

أخرجه النسائي من طريق يحيى بن أيوب عنه. قال يحيى بن أيوب: وسمعت صالح بن كيسان بمثله. قال النسائي:
`وجدته عندي في موضع آخر: حدثني صالح بن كيسان ويحيى بن سعيد. وهذا أيضاً خطأ مثله`.
قلت: وهو من يحيى بن أيوب - وهو أبو العباس المصري - ، فإنه وإن كان احتج به الشيخان؛ فقد تكلم فيه بعض الأئمة؛ لسوء حفظه ومخالفته. بل قال فيه الإمام أحمد:
`يخطىء خطأ كثيراً`.
ويحيى بن سعيد؛ قد ذكره البيهقي (4/ 279) في زمرة الثقات الحفاظ الذين رووا الحديث عن الزهري منقطعاً، فدل ذلك على خطأ يحيى بن أيوب عليه حين رواه عنه عن الزهري عن عروة عن عائشة متصلاً. ورواية ابن سعيد المنقطعة قد وصلها البيهقي عنه كما سيأتي.
السابعة: عن عبد الله بن عمر العمري عن ابن شهاب به.

أخرجه الطحاوي (1/ 354) .
والعمري هذا - وهو المكبر - ضعيف إذا تفرد؛ فكيف إذا خالف الثقات؟!
وقد قرنه ابن أبي حاتم (1/ 227) مع سفيان بن حسين وجعفر بن برقان المخالفين المتقدمين آنفاً. ومن الثقات الذين خالفهم: أخوه عبيد الله بن عمر العمري الثقة الثبت؛ فقد ذكره البيهقي في زمرة الثقات الحفاظ الذين أرسلوا الحديث؛ كما تقدم قريباً، وكذلك ذكره فيهم الترمذي في كلامه السابق في الطريق الأولى. وقد وصله عنه النسائي.
وما تعقب به ابن التركماني البيهقي في ذكره عبيد الله في تلك الزمرة بقوله:
`قلت: أخرجه أبو عمر من حديث أبي خالد الأحمر عن عبيد الله ويحيى ابن سعيد وحجاج بن أرطأة؛ كلهم عن الزهري عن عروة أن عائشة وحفصة أصبحتا صائمتين … الحديث`!! فالجواب من وجهين:
الأول: أن أبا خالد الأحمر - واسمه سليمان بن حيان - ، وإن كان ممن أخرج له الشيخان؛ ففي حفظه أيضاً كلام. ولذلك؛ قال فيه الحافظ:
`صدوق يخطىء`. فلا عبرة بحديثه إذا خالف الثقات.
والآخر: أن ظاهر إسناده الإرسال أيضاً؛ لأن قوله: `عن عروة: أن عائشة وحفصة … ` صورته المرسل؛ كما هو ظاهر، فيكون أبو خالد قد شذ مرتين:
الأولى: من جهة مخالفة الثقات الحفاظ الذين رووه عن الزهري مرسلاً.
والأخرى: الذين خالفوا هؤلاء ممن سبق ذكرهم؛ فرووه عنه عن عروة عن عائشة متصلاً!!
2 - وأما طريق عمرة؛ تفرد به جرير بن حازم عن يحيى بن سعيد عنها عن عائشة به.

أخرجه النسائي، والطحاوي (1/ 355) ، وابن حبان (951 - موارد) . وقال النسائي:
`هذا خطأ`.
قلت: يعني: من جرير؛ فإن حاله كحال أبي خالد الأحمر وغيره، وقد بين ذلك البيهقي؛ فقال:
`وجرير بن حازم وإن كان من الثقات؛ فهو واهم فيه، وقد خطأه في ذلك أحمد بن حنبل، وعلي بن المديني. والمحفوظ: عن يحيى بن سعيد عن الزهري عن عائشة مرسلاً`.
ثم روى بإسناده عن الأثرم قال: `قلت لأبي عبد الله - يعني: أحمد بن حنبل - تحفظه عن يحيى عن عمرة عن عائشة … فأنكره، وقال: من رواه؟ قلت: جرير بن حازم. فقال: جرير كان يحدث بالتوهم`.
وعن أحمد بن منصور الرمادي قال: `قلت لعلي بن المديني: يا أبا الحسن! تحفظ عن يحيى بن سعيد عن عمرة عن عائشة … ؟ فقال لي: من روى هذا؟ قال: قلت: ابن وهب عن جرير بن حازم عن يحيى بن سعيد. قال: فضحك؛ فقال: مثلك يقول مثل هذا؟! حدثنا حماد بن زيد عن يحيى بن سعيد عن الزهري أن عائشة … `.
وجملة القول: أن الحديث ضعيف لا يصح، وأن الصواب فيه عن الزهري مرسلاً، وأن من قال عنه: عن عروة، أو قال: عن يحيى بن سعيد عن عمرة عن عائشة؛ فقد وهم عليهما - بلا شك - وهماً فاحشاً؛ لمخالفة الحفاظ الثقات أولاً، وقد تقدم تسمية بعضهم - ومنهم مالك في `الموطأ` (1/ 306/ 50) - ، ولمصادمة ذلك لتصريحه بأنه لم يسمعه من عروة، وإنما من رجل لم يسمه، فما لعروة - بله عمرة - بهذا الحديث صلة.
وإنما أفضت في الكشف عن علة الحديث وطرقه؛ لأني رأيت صنيع ابن التركماني في `الجوهر النقي` قد حشر ما وقع عليه من الطرق موهماً أن الحديث بها ثابت، ولا غرابة في ذلك؛ لما هو معروف به من التعصب للمذهب، وإنما الغرابة أن ابن القيم - بعدما ساق بعض الطرق المذكورة دون أي مناقشة لمفرادتها، وبيان ما في رواته من الضعف أو الشذوذ والمخالفة لروايات الثقات الأثبات - قال في `تهذيب السنن` (3/ 336) :
`فالذي يغلب على الظن: أن اللفظة محفوظة في الحديث، وتعليلها - لما ذكر - قد تبين ضعفه`!
وظني أن ابن القيم رحمه الله لو تتبع الطرق ورواتها - وما قاله الزهري نفسه من
النفي لسماعه للحديث من عروة - ؛ لما ذهب إلى هذا الذي حكينا عنه، ولوجد أن الأئمة الذين أعلوا الحديث بالإرسال كانوا على الحق والصواب، وأن قولهم فيه هو فصل الخطاب.
ثم إن الحديث لو صح؛ فهو محمول على الاستحباب؛ كما تقدم عن الخطابي (1) .
ومما يشهد له: قوله صلى الله عليه وسلم لأحد أصحابه - وقد دعي إلى الطعام وهو صائم - :
`أفطر، وصم مكانه يوماً إن شئت`؛ وهو حديث ثابت؛ كما حققته في `آداب الزفاف` (ص 159) ، ثم في `إرواء الغليل` (1952) .
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(তোমাদের উপর কোনো দোষ নেই, তোমরা এর পরিবর্তে অন্য একদিন রোযা রাখো)।
যঈফ (দুর্বল)

এটি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে বর্ণিত হয়েছে। তাঁর থেকে এর দুটি সূত্র রয়েছে: একটি উরওয়াহ থেকে, এবং অন্যটি আমরাহ থেকে।

১ - উরওয়াহ-এর সূত্র: তাঁর থেকে এর দুটি পথ রয়েছে:

প্রথমটি: উরওয়াহ-এর আযাদকৃত গোলাম যুমাইল থেকে, তিনি উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: আমার ও হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য খাবার হাদিয়া হিসেবে পাঠানো হলো, আর আমরা দু’জন রোযা ছিলাম। তখন আমরা ইফতার করে ফেললাম। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রবেশ করলেন। আমরা তাঁকে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের জন্য একটি হাদিয়া পাঠানো হয়েছিল, আমরা তা খেতে চাইলাম এবং ইফতার করে ফেললাম? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

এটি আবূ দাঊদ (২৪৫৭), নাসায়ী তাঁর ‘আস-সুনানুল কুবরা’তে (খন্ড ২/পৃ. ৬৩), ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (১/২২৭), ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (২/১৫১), এবং বায়হাকী (৪/২৮১) বর্ণনা করেছেন। তিনি (বায়হাকী) – ইবনু আদীকে অনুসরণ করে, আর ইবনু আদী বুখারীকে ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (২/১/৪৫০) অনুসরণ করে – বলেছেন: ‘যুমাইল-এর উরওয়াহ থেকে শ্রবণের বিষয়টি জানা যায় না, এবং এর দ্বারা প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয় না।’ অতঃপর ইবনু আদী বলেন: ‘উরওয়াহ-এর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি যুমাইল দ্বারা পরিচিত, এবং এর সনদ দুর্বল নয় (লা বা’স বিহ)’!

এটি তাঁর (ইবনু আদী’র) পক্ষ থেকে একটি অদ্ভুত বিষয়; কারণ, এর সনদে যুমাইল থাকা সত্ত্বেও কীভাবে এর সনদ দুর্বল নয় হতে পারে? অথচ বুখারী তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘এর দ্বারা প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয় না’, এবং ইয়াযীদ ইবনুল হাদ ছাড়া অন্য কেউ তার থেকে বর্ণনা করেনি?! এতে ইঙ্গিত রয়েছে যে সে মাজহূল (অজ্ঞাত)। আর একদল ইমাম স্পষ্টভাবে তা বলেছেন, তাদের মধ্যে প্রাচীনতম হলেন ইমাম আহমাদ, যিনি বলেছেন: ‘আমি জানি না সে কে?!’

খাত্তাবী তাঁকে অনুসরণ করেছেন; তিনি ‘মাআলিমুস সুনান’ গ্রন্থে (৩/৩৩৫) বলেছেন: ‘এর সনদ যঈফ (দুর্বল), এবং যুমাইল মাজহূল (অজ্ঞাত)। যদি হাদীসটি প্রমাণিতও হতো, তবে সম্ভবত তিনি (নবী সাঃ) তাদেরকে তা মুস্তাহাব হিসেবেই আদেশ করেছিলেন।’ হাফিয মুনযিরী ‘মুখতাসারুস সুনান’ গ্রন্থে এই বিষয়ে তাঁকে অনুসরণ করেছেন। এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘মাজহূল’। অনুরূপ কথা ‘আল-মীযান’ গ্রন্থেও রয়েছে, যেখানে তিনি বলেছেন: ‘তার মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসগুলোর মধ্যে এটি একটি...’; অতঃপর তিনি তার জন্য এই হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।

অতঃপর বায়হাকী বলেন: ‘আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্যান্য সূত্রেও এটি বর্ণিত হয়েছে, কিন্তু সেগুলোর কোনোটিই সহীহ নয়। আমি ‘আল-খিলাফিয়্যাত’ গ্রন্থে সেগুলোর দুর্বলতা স্পষ্ট করেছি।’

আমি (আলবানী) বলি: আমি যতটুকু জানতে পেরেছি, ততটুকুর মধ্যে সেগুলোর দুর্বলতা স্পষ্ট করব। আমার সফলতা কেবল আল্লাহর পক্ষ থেকেই।

এবং অন্য সূত্রটি হলো: যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে। যুহরী থেকে এর কয়েকটি পথ রয়েছে:

প্রথমটি: জা’ফার ইবনু বুরকান থেকে, তিনি বলেন: আমাদের কাছে যুহরী হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।

এটি তিরমিযী (১/১৪২), নাসায়ী (খন্ড ২/পৃ. ৬৩), বায়হাকী (৪/২৮০), আহমাদ (৬/২৬৩), এবং আবূ ইয়া’লা (৩/১১৪০) বর্ণনা করেছেন। তারা সকলেই কাসীর ইবনু হিশাম থেকে, তিনি বলেন: আমাদের কাছে জা’ফার ইবনু বুরকান হাদীস বর্ণনা করেছেন...। আর তারা এটিকে ইরসাল (মুরসাল) হওয়ার কারণে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। অতঃপর তিরমিযী এর পরপরই বলেন: ‘সালেহ ইবনু আবিল আখদার এবং মুহাম্মাদ ইবনু আবী হাফসাহ এই হাদীসটি যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন। আর মালিক ইবনু আনাস, মা’মার, উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার, যিয়াদ ইবনু সা’দ এবং অন্যান্য হাফিযগণ যুহরী থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন, এবং তারা এতে ‘উরওয়াহ থেকে’ কথাটি উল্লেখ করেননি। আর এটিই অধিক সহীহ; কারণ ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: আমি যুহরীকে জিজ্ঞাসা করলাম, আমি তাঁকে বললাম: উরওয়াহ কি আপনাকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন? তিনি বললেন: এই বিষয়ে আমি উরওয়াহ থেকে কিছুই শুনিনি। বরং আমি সুলাইমান ইবনু আব্দুল মালিকের খিলাফতের সময় এমন একজনের কাছ থেকে শুনেছি, যিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন।’

আর বায়হাকী বলেছেন: ‘এভাবেই জা’ফার ইবনু বুরকান, সালেহ ইবনু আবিল আখদার এবং সুফইয়ান ইবনু হুসাইন – যুহরী থেকে এটি বর্ণনা করেছেন; আর তারা যুহরী থেকে বর্ণনায় ভুল করেছেন (ওয়াহম)।’ অনুরূপ কথা ইবনু আবী হাতিম তাঁর পিতা থেকে ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (১/২২৭) এবং নাসায়ীও বলেছেন; যেমনটি তৃতীয় সূত্রে আসছে।

এই প্রথম সূত্রের ত্রুটি হলো – নির্ভরযোগ্য হাফিযদের বিরোধিতার পাশাপাশি – এই জা’ফার; যদিও মুসলিম তাঁর থেকে হাদীস গ্রহণ করেছেন, তবুও যুহরী থেকে তাঁর বর্ণনার ক্ষেত্রে তিনি বিশেষভাবে দুর্বল। জারহ-এর ইমামদের একটি দল, যেমন আহমাদ, ইবনু মাঈন, ইবনু আদী এবং অন্যান্যরা স্পষ্টভাবে তা বলেছেন। নাসায়ী’র বক্তব্য এই বিষয়ে শীঘ্রই আসছে।

দ্বিতীয়টি: সুফইয়ান ইবনু হুসাইন থেকে, তিনি যুহরী থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। এটি নাসায়ী (খন্ড ২/পৃ. ৬৩-৬৪) বর্ণনা করেছেন; এবং তিনি ইবনু হুসাইনের কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন; যেমনটি আসছে।

তৃতীয়টি: সালেহ ইবনু আবিল আখদার থেকে, তিনি যুহরী থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। এটি ইবনু সা’ইদ ‘মাজলিসান’ গ্রন্থে (খন্ড ১/পৃ. ৫২) – রূহ ইবনু উবাদাহ-এর সূত্রে তাঁর থেকে – বর্ণনা করেছেন। আর নাসায়ী (খন্ড ১/পৃ. ৬৪) এবং বায়হাকী – সুফইয়ান ইবনু উয়াইনাহ-এর সূত্রে – বর্ণনা করেছেন। তারা দু’জন (নাসায়ী ও বায়হাকী) বলেন: আমরা সালেহ ইবনু আবিল আখদার থেকে শুনেছি... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। সুফইয়ান বলেন: অতঃপর তারা যুহরীকে জিজ্ঞাসা করলেন – আর আমি উপস্থিত ছিলাম – তারা বললেন: এটি কি উরওয়াহ থেকে? তিনি বললেন: না।

সুফইয়ানের এই বক্তব্যটি তাহাবীও ‘শারহুল মা’আনী’ গ্রন্থে (১/৩৫৪) বর্ণনা করেছেন। আর ইবনু আবী হাতিম তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে ইবনু আবী মারইয়াম হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবনু উয়াইনাহ থেকে এই শব্দে: তিনি বললেন: আমি এটি উরওয়াহ থেকে শুনিনি, বরং এক ব্যক্তি আমাকে দরজার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন... অতঃপর তিনি তিরমিযীর নিকট ইবনু জুরাইজের পূর্বোক্ত বর্ণনার অনুরূপ উল্লেখ করেন।

তিনি (ইবনু আবী হাতিম), আব্দুর রাযযাক (৪/২৭৬) এবং তাহাবী তাঁর থেকে এটি মুত্তাসিল (সংযুক্ত) করেছেন। সম্ভবত তিনিই সেই প্রশ্নকারী, যার দিকে সুফইয়ান তাঁর উল্লিখিত বক্তব্যে ইঙ্গিত করেছেন। আর নাসায়ী এর পরপরই বলেছেন: ‘সহীহ হলো যা ইবনু উয়াইনাহ যুহরী থেকে বর্ণনা করেছেন; আর সালেহ ইবনু আবিল আখদার যুহরী এবং অন্য সকলের ক্ষেত্রে দুর্বল। সুফইয়ান ইবনু হুসাইন এবং জা’ফার ইবনু বুরকান যুহরীর ক্ষেত্রে শক্তিশালী নন, তবে যুহরী ছাড়া অন্য ক্ষেত্রে তারা দুর্বল নন।’

আর বায়হাকী বলেছেন: ‘এই দু’জন – ইবনু জুরাইজ এবং সুফইয়ান ইবনু উয়াইনাহ – যুহরীর উপর সাক্ষ্য দিয়েছেন – আর তারা দু’জনই নির্ভরযোগ্য সাক্ষী – যে তিনি এটি উরওয়াহ থেকে শোনেননি। তাহলে যারা এটিকে মুত্তাসিল করেছেন, তাদের সংযোগ কীভাবে সহীহ হতে পারে?!’ আবূ ঈসা আত-তিরমিযী বলেন: আমি মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আল-বুখারীকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সহীহ নয়। অনুরূপ কথা মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াহইয়া আয-যুহলীও বলেছেন, এবং তিনি ইবনু জুরাইজ ও সুফইয়ান ইবনু উয়াইনাহ-এর বর্ণনা এবং যে সকল ইমাম হাদীসটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন, তাদের ইরসাল দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন।

চতুর্থ, পঞ্চম ও ষষ্ঠ: ইসমাঈল ইবনু ইবরাহীম থেকে, তিনি ইবনু শিহাব (যুহরী) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। নাসায়ী এটি ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব-এর সূত্রে তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন। ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব বলেন: আমি সালেহ ইবনু কায়সানকেও অনুরূপ বলতে শুনেছি। নাসায়ী বলেন: ‘আমি আমার কাছে অন্য স্থানে পেয়েছি: আমার কাছে সালেহ ইবনু কায়সান এবং ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ হাদীস বর্ণনা করেছেন। আর এটিও অনুরূপ ভুল।’

আমি (আলবানী) বলি: আর এটি ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব – যিনি আবূল আব্বাস আল-মিসরী – এর পক্ষ থেকে এসেছে। যদিও শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) তাঁর থেকে দলীল গ্রহণ করেছেন, তবুও কিছু ইমাম তাঁর দুর্বল স্মৃতি ও বিরোধিতার কারণে তাঁর সম্পর্কে সমালোচনা করেছেন। বরং ইমাম আহমাদ তাঁর সম্পর্কে বলেছেন: ‘তিনি প্রচুর ভুল করেন।’ আর ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদকে; বায়হাকী (৪/২৭৯) সেই নির্ভরযোগ্য হাফিযদের দলে উল্লেখ করেছেন, যারা যুহরী থেকে হাদীসটি মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এটি প্রমাণ করে যে ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব তাঁর উপর ভুল করেছেন, যখন তিনি তাঁর থেকে যুহরী, তিনি উরওয়াহ, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুত্তাসিল (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর ইবনু সাঈদের মুনকাতি’ বর্ণনাটি বায়হাকী তাঁর থেকে সংযুক্ত করেছেন, যেমনটি শীঘ্রই আসছে।

সপ্তম: আব্দুল্লাহ ইবনু উমার আল-উমারী থেকে, তিনি ইবনু শিহাব (যুহরী) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। এটি তাহাবী (১/৩৫৪) বর্ণনা করেছেন। আর এই উমারী – যিনি আল-মুকাব্বার (বড় উপাধিধারী) – তিনি এককভাবে বর্ণনা করলে দুর্বল হন; তাহলে যখন তিনি নির্ভরযোগ্যদের বিরোধিতা করেন, তখন কেমন হবে?!

ইবনু আবী হাতিম (১/২২৭) তাঁকে সুফইয়ান ইবনু হুসাইন এবং জা’ফার ইবনু বুরকান-এর সাথে যুক্ত করেছেন, যারা পূর্বে উল্লিখিত বিরোধী বর্ণনাকারী। আর তিনি যাদের বিরোধিতা করেছেন, তাদের মধ্যে নির্ভরযোগ্য হলেন: তাঁর ভাই উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার আল-উমারী, যিনি নির্ভরযোগ্য ও সুপ্রতিষ্ঠিত। বায়হাকী তাঁকে সেই নির্ভরযোগ্য হাফিযদের দলে উল্লেখ করেছেন, যারা হাদীসটি মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন; যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। অনুরূপভাবে তিরমিযীও প্রথম সূত্রের পূর্বোক্ত আলোচনায় তাঁকে তাদের মধ্যে উল্লেখ করেছেন। আর নাসায়ী তাঁর থেকে এটি মুত্তাসিল করেছেন।

আর ইবনু আত-তুরকুমানী বায়হাকীর উপর উবাইদুল্লাহকে সেই দলে উল্লেখ করার কারণে যে আপত্তি করেছেন, এই বলে: ‘আমি বলি: আবূ উমার এটি আবূ খালিদ আল-আহমার-এর হাদীস থেকে, তিনি উবাইদুল্লাহ, ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ এবং হাজ্জাজ ইবনু আরত্বাআহ থেকে বর্ণনা করেছেন; তারা সকলেই যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, যে আয়েশা ও হাফসাহ সকালে রোযা অবস্থায় ছিলেন... হাদীসটি’!! এর উত্তর দুই দিক থেকে:

প্রথমত: আবূ খালিদ আল-আহমার – যার নাম সুলাইমান ইবনু হাইয়ান – যদিও শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) তাঁর থেকে হাদীস গ্রহণ করেছেন; তবুও তাঁর স্মৃতিশক্তির বিষয়েও সমালোচনা রয়েছে। এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর সম্পর্কে বলেছেন: ‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন।’ সুতরাং, যখন তিনি নির্ভরযোগ্যদের বিরোধিতা করেন, তখন তাঁর হাদীস গ্রহণযোগ্য নয়।

এবং দ্বিতীয়ত: তাঁর সনদের বাহ্যিক রূপটিও ইরসাল (মুরসাল); কারণ তাঁর বক্তব্য: ‘উরওয়াহ থেকে: যে আয়েশা ও হাফসাহ...’ এটি মুরসালের রূপ, যেমনটি স্পষ্ট। সুতরাং আবূ খালিদ দু’বার শায (বিচ্ছিন্ন) হয়েছেন: প্রথমত: সেই নির্ভরযোগ্য হাফিযদের বিরোধিতা করার দিক থেকে, যারা যুহরী থেকে এটি মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এবং দ্বিতীয়ত: যারা এদের বিরোধিতা করেছেন, যাদের কথা পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে; তারা যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুত্তাসিল হিসেবে বর্ণনা করেছেন!!

২ - আর আমরাহ-এর সূত্র: জারীর ইবনু হাযিম এককভাবে ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আমরাহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।

এটি নাসায়ী, তাহাবী (১/৩৫৫) এবং ইবনু হিব্বান (৯৫১ – মাওয়ারিদ) বর্ণনা করেছেন। আর নাসায়ী বলেছেন: ‘এটি ভুল।’

আমি (আলবানী) বলি: অর্থাৎ: জারীর-এর পক্ষ থেকে (ভুল); কারণ তার অবস্থা আবূ খালিদ আল-আহমার এবং অন্যদের মতোই। বায়হাকী তা স্পষ্ট করেছেন; তিনি বলেছেন: ‘জারীর ইবনু হাযিম যদিও নির্ভরযোগ্যদের অন্তর্ভুক্ত, তবুও তিনি এতে ভুল করেছেন (ওয়াহিম)। আহমাদ ইবনু হাম্বল এবং আলী ইবনুল মাদীনী এই বিষয়ে তাঁকে ভুল বলেছেন। আর সংরক্ষিত (মাহফূয) হলো: ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুরসাল হিসেবে।’

অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ আল-আছরাম থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘আমি আবূ আব্দুল্লাহকে – অর্থাৎ: আহমাদ ইবনু হাম্বলকে – বললাম: আপনি কি ইয়াহইয়া থেকে, তিনি আমরাহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি মুখস্থ রেখেছেন...? তিনি তা অস্বীকার করলেন এবং বললেন: কে এটি বর্ণনা করেছে? আমি বললাম: জারীর ইবনু হাযিম। তিনি বললেন: জারীর ওয়াহম (ভুল ধারণা) দ্বারা হাদীস বর্ণনা করতেন।’

আর আহমাদ ইবনু মানসূর আর-রামাদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ‘আমি আলী ইবনুল মাদীনীকে বললাম: হে আবুল হাসান! আপনি কি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আমরাহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি মুখস্থ রেখেছেন...? তিনি আমাকে বললেন: কে এটি বর্ণনা করেছে? তিনি (রামাদী) বলেন: আমি বললাম: ইবনু ওয়াহব, তিনি জারীর ইবনু হাযিম থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে। তিনি হেসে ফেললেন; অতঃপর বললেন: আপনার মতো লোক এমন কথা বলে?! আমাদের কাছে হাম্মাদ ইবনু যায়দ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি যুহরী থেকে, যে আয়েশা...।’

সারকথা হলো: হাদীসটি যঈফ (দুর্বল) এবং সহীহ নয়। আর এই বিষয়ে সঠিক হলো যুহরী থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা। আর যে ব্যক্তি যুহরী থেকে ‘উরওয়াহ থেকে’ বলেছেন, অথবা ‘ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আমরাহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে’ বলেছেন; তারা নিঃসন্দেহে তাদের উভয়ের উপর মারাত্মক ভুল (ওয়াহম ফাহিশ) করেছেন; প্রথমত, নির্ভরযোগ্য হাফিযদের বিরোধিতার কারণে, এবং দ্বিতীয়ত, যুহরীর এই স্পষ্ট ঘোষণার সাথে সাংঘর্ষিক হওয়ার কারণে যে তিনি এটি উরওয়াহ থেকে শোনেননি, বরং এমন একজন ব্যক্তির কাছ থেকে শুনেছেন যার নাম তিনি উল্লেখ করেননি। সুতরাং উরওয়াহ-এর সাথে – আমরাহ তো দূরের কথা – এই হাদীসের কোনো সম্পর্ক নেই।

আমি হাদীসের ত্রুটি (ইল্লাহ) এবং এর সূত্রগুলো উন্মোচন করতে বিস্তারিত আলোচনা করেছি; কারণ আমি দেখেছি যে ইবনু আত-তুরকুমানী ‘আল-জাওহারুন নাকী’ গ্রন্থে তার কাছে পাওয়া সূত্রগুলো একত্রিত করেছেন, এই ধারণা দিতে যে হাদীসটি সেগুলোর মাধ্যমে প্রমাণিত। এতে আশ্চর্যের কিছু নেই; কারণ মাযহাবের প্রতি তার গোঁড়ামির জন্য তিনি পরিচিত। তবে আশ্চর্যের বিষয় হলো যে ইবনুল কাইয়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ) – উল্লিখিত কিছু সূত্র উল্লেখ করার পর, সেগুলোর একক বর্ণনা নিয়ে কোনো আলোচনা না করে এবং বর্ণনাকারীদের দুর্বলতা, শায (বিচ্ছিন্নতা) বা নির্ভরযোগ্য সুপ্রতিষ্ঠিত বর্ণনাকারীদের বিরোধিতার বিষয়ে কোনো ব্যাখ্যা না দিয়ে – ‘তাহযীবুস সুনান’ গ্রন্থে (৩/৩৩৬) বলেছেন: ‘যা প্রবল ধারণা দেয় তা হলো: হাদীসের শব্দগুলো সংরক্ষিত (মাহফূয), এবং এর ত্রুটিযুক্ত হওয়ার কারণ – যা উল্লেখ করা হয়েছে – তা দুর্বল প্রমাণিত হয়েছে!’

আমার ধারণা, ইবনুল কাইয়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ) যদি সূত্রগুলো এবং এর বর্ণনাকারীদের অনুসরণ করতেন – এবং যুহরী নিজে হাদীসটি উরওয়াহ থেকে না শোনার যে অস্বীকার করেছেন – তা দেখতেন; তাহলে তিনি আমাদের বর্ণিত এই মতের দিকে যেতেন না। এবং তিনি দেখতে পেতেন যে যে সকল ইমাম হাদীসটিকে ইরসাল (মুরসাল) হওয়ার কারণে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন, তারা সত্য ও সঠিক পথে ছিলেন, এবং এই বিষয়ে তাদের কথাই চূড়ান্ত সিদ্ধান্ত (ফাসলুল খিতাব)।

অতঃপর, হাদীসটি যদি সহীহও হতো; তবে তা মুস্তাহাব (পছন্দনীয়) হিসেবে গণ্য হতো; যেমনটি খাত্তাবী (১) থেকে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। এর পক্ষে সাক্ষ্য দেয়: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর এক সাহাবীকে – যখন তাঁকে খাবারের জন্য দাওয়াত দেওয়া হয়েছিল এবং তিনি রোযা ছিলেন – বলেছিলেন: ‘ইফতার করে নাও, আর তুমি চাইলে এর পরিবর্তে অন্য একদিন রোযা রাখো’; আর এটি একটি প্রমাণিত হাদীস; যেমনটি আমি ‘আদাবুয যিফাফ’ (পৃ. ১৫৯) গ্রন্থে, অতঃপর ‘ইরওয়াউল গালীল’ গ্রন্থে (১৯৫২) তাহকীক করেছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5203)


(إنا أهل بيت؛ اختار الله لنا الآخرة على الدنيا، وإن أهل بيتي سيلقون بعدي بلاء وتشريداً وتطريداً، حتى يأتي قوم من قبل المشرق؛ معهم رايات سود، فيسألون الخير، فلا يعطونه، فيقاتلون فينصرون، فيعطون ماسألوا؛ فلا يقبلونه، حتى يدفعوها إلى رجل من أهل بيتي؛ فيملؤها قسطاً؛ كما ملؤوها جوراً، فمن أدرك ذلك منكم؛ فليأتهم ولو حبواً على الثلج) .
منكر

أخرجه ابن ماجه (2/ 518) ، وابن أبي عاصم في `السنة` برقم (1499) ، والعقيلي في `الضعفاء` (4/ 1494) عن يزيد بن أبي زياد عن إبراهيم عن علقمة عن عبد الله قال:
بينما نحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ إذ أقبل فتية من بني هاشم، فلما رآهم النبي صلى الله عليه وسلم؛ اغرورقت عيناه، وتغير لونه، قال: فقلت: ما نزال نرى في وجهك شيئاً
(1) كرر الشيخ رحمه الله الحديث برقم (5480) لكن من طريق آخر. (الناشر)
نكرهه؟! فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، ورجاله ثقات؛ غير يزيد بن أبي زياد - وهو الهاشمي مولاهم الشيعي - . قال الذهبي:
`أحد علماء الكوفة المشاهير؛ على سوء حفظه`. وقال الحافظ:
`ضعيف، كبر فتغير، وصار يتلقن`. وقال البوصيري في `زوائده` (ق 249/ 1) :
`مختلف فيه، ورواه أبو بكر بن أبي شيبة (يعني: شيخ ابن ماجه فيه) ، وأبو يعلى بزيادة ونقص، لكن لم يتفرد به يزيد بن أبي زياد عن إبراهيم؛ فقد رواه الحاكم في `المستدرك` من طريق عمرو بن قيس عن الحكم عن إبراهيم به`!
قلت: ما أحسن البوصيري صنعاً بهذا الاستدراك؛ فإنه الحديث عند الحاكم (4/ 464) من طريق محمد بن عثمان بن سعيد القرشي: حدثنا يزيد بن محمد الثقفي: حدثنا حنان (الأصل: حبان) بن سدير عن عمرو بن قيس الملائي به.
سكت عنه الحاكم! وتعقبه الذهبي بقوله:
`قلت: هذا موضوع`.
أقول: لعل آفته من حنان هذا؛ فقد أورده ابن أبي حاتم (1/ 2/ 299) ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً، والحافظ في `اللسان` (2/ 367) ، وساق له من مناكيره حديثاً من روايته عن أهل البيت، وقال:
`قال الدارقطني في `المؤتلف والمختلف` وفي `العلل`: إنه من شيوخ الشيعة`.
قلت: وهو في `رجال الكشي`؛ انظر `الفهرس` (ص 108) .
وقد تصحف اسمه في `المستدرك` إلى (حبان) ؛ كما سبقت الإشارة إليه.
وفي `الميزان`: `حبان بن مديد`؛ وقال:
`قال الأزدري: ليس بالقوي عندهم`.
ثم ساق له هذا الحديث. ووقع في `اللسان`.
`حبان بن مدير`؛ وعزا الحديث الحاكم؛ وذكر تعقب الذهبي له بما سبق، وأقره؛ ولكنه قال:
`وأنا أخشى أن يكون هذا هو حنان - بفتح المهملة ونونين مخففاً - ، وأبوه (سدير) بفتح السين المهملة بوزن (قدير) ، تصحف اسمه واسم أبيه`.
قلت: والراوي عنه يزيد بن محمد الثقفي؛ لم أعرفه!
وكذا الراوي عنه: محمد بن عثمان بن سعيد القرشي! ومن طبقته: محمد ابن عثمان بن سعيد بن عبد السلام بن أبي السوار المصري، حدث عن أبي صالح كاتب الليث؛ قال أبو سعيد بن يونس: لم يكن بثقة؛ كما في `اللسان` (5/ 279) ، فلعله هو.
ثم إن الحديث قد أنكره جماعة من الأئمة المتقدمين على يزيد بن أبي زياد؛ فقال وكيع:
`يزيد بن أبي زياد عن إبراهيم عن علقمة عن عبد الله - حديث الرايات - ليس بشيء`. وقال أبو أسامة:
`لو حلف لي خمسين يميناً قسامة ما صدقته`؛ يعني: في هذا الحديث. وذكر الذهبي عن الإمام أحمد أنه قال فيه مثل قول وكيع المتقدم.
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(নিশ্চয় আমরা এমন আহলে বাইত; আল্লাহ আমাদের জন্য দুনিয়ার উপর আখিরাতকে বেছে নিয়েছেন। আর আমার আহলে বাইতের লোকেরা আমার পরে বিপদাপদ, বিতাড়ন ও নির্বাসনের সম্মুখীন হবে। অবশেষে পূর্ব দিক থেকে একদল লোক আসবে; তাদের সাথে থাকবে কালো পতাকা। তারা কল্যাণ চাইবে, কিন্তু তাদের তা দেওয়া হবে না। তখন তারা যুদ্ধ করবে এবং বিজয়ী হবে। অতঃপর তাদের যা চাওয়া হয়েছিল, তা দেওয়া হবে; কিন্তু তারা তা গ্রহণ করবে না। অবশেষে তারা তা আমার আহলে বাইতের এক ব্যক্তির হাতে তুলে দেবে; ফলে সে তা ন্যায় দ্বারা পূর্ণ করে দেবে; যেমন তা অন্যায় দ্বারা পূর্ণ করা হয়েছিল। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সেই সময় পাবে; সে যেন তাদের কাছে আসে, যদিও বরফের উপর হামাগুড়ি দিয়ে আসতে হয়।)
মুনকার

এটি ইবনু মাজাহ (২/৫১৮), ইবনু আবী আসিম তার ‘আস-সুন্নাহ’ গ্রন্থে (নং ১৪৯৯), এবং আল-উকাইলী তার ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে (৪/১৪৯৪) ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ হতে, তিনি ইবরাহীম হতে, তিনি আলক্বামাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন:
আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট ছিলাম, এমন সময় বানী হাশিমের কিছু যুবক আসলেন। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের দেখলেন; তখন তাঁর চোখ অশ্রুসিক্ত হলো এবং তাঁর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেল। বর্ণনাকারী বলেন: আমি বললাম: আমরা আপনার চেহারায় এমন কিছু দেখতে পাচ্ছি
(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীসটিকে অন্য সূত্রে ৫৪৮০ নং-এ পুনরাবৃত্তি করেছেন। (প্রকাশক)
যা আমরা অপছন্দ করি?! তখন তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য; ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ ব্যতীত—তিনি হলেন তাদের মাওলা শিয়া হাশেমী। ইমাম যাহাবী বলেন: ‘তিনি কুফার প্রসিদ্ধ আলেমদের একজন; তবে তার মুখস্থশক্তির দুর্বলতা ছিল।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেন: ‘তিনি যঈফ (দুর্বল), বৃদ্ধ হওয়ার পর তার পরিবর্তন ঘটেছিল এবং তিনি তালক্বীন (অন্যের শেখানো কথা) গ্রহণ করতেন।’ আল-বুসয়রী তার ‘যাওয়ায়েদ’ গ্রন্থে (ক্বাফ ২৪৯/১) বলেন: ‘তার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। আর আবূ বাকর ইবনু আবী শাইবাহ (অর্থাৎ: এতে ইবনু মাজাহর শাইখ), এবং আবূ ইয়া’লা এটিকে কম-বেশি সহকারে বর্ণনা করেছেন। তবে ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ ইবরাহীম হতে এটি এককভাবে বর্ণনা করেননি; কেননা আল-হাকিম এটিকে ‘আল-মুসতাদরাক’ গ্রন্থে আমর ইবনু ক্বায়স হতে, তিনি আল-হাকাম হতে, তিনি ইবরাহীম হতে বর্ণনা করেছেন!’

আমি বলি: আল-বুসয়রী এই সংশোধনী এনে কতই না উত্তম কাজ করেছেন! কেননা হাদীসটি আল-হাকিমের নিকট (৪/৪৬৪) মুহাম্মাদ ইবনু উসমান ইবনু সাঈদ আল-ক্বুরাশী-এর সূত্রে রয়েছে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট ইয়াযীদ ইবনু মুহাম্মাদ আস-সাক্বাফী হাদীস বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদের নিকট হান্নান (মূল পাণ্ডুলিপিতে: হাব্বান) ইবনু সুদাইর আমর ইবনু ক্বায়স আল-মুল্লায়ী হতে এটি বর্ণনা করেছেন। আল-হাকিম এ ব্যাপারে নীরব থেকেছেন! আর ইমাম যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেন: ‘আমি বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল)।’ আমি (আলবানী) বলি: সম্ভবত এর ত্রুটি এই হান্নানের পক্ষ থেকে এসেছে; কেননা ইবনু আবী হাতিম তাকে (১/২/২৯৯) উল্লেখ করেছেন কিন্তু তার ব্যাপারে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে (২/৩৬৭) তাকে উল্লেখ করেছেন এবং আহলে বাইত হতে তার বর্ণনাকৃত মুনকার হাদীসগুলোর মধ্যে একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘দারাকুতনী ‘আল-মু’তালিফ ওয়াল-মুখতালিফ’ এবং ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে বলেছেন: সে শিয়াদের শাইখদের একজন।’

আমি বলি: সে ‘রিজালুল কাশশী’-তেও রয়েছে; সূচিপত্র (পৃষ্ঠা ১০৮) দেখুন। আর ‘আল-মুসতাদরাক’-এ তার নাম বিকৃত হয়ে (হাব্বান) হয়েছে; যেমনটি পূর্বে ইঙ্গিত করা হয়েছে। আর ‘আল-মীযান’-এ রয়েছে: ‘হাব্বান ইবনু মাদীদ’; এবং তিনি বলেছেন: ‘আল-আযদী বলেছেন: তাদের নিকট সে শক্তিশালী নয়।’ অতঃপর তিনি তার জন্য এই হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। আর ‘আল-লিসান’-এ এসেছে: ‘হাব্বান ইবনু মুদাইর’; এবং হাদীসটিকে আল-হাকিমের দিকে সম্পর্কিত করেছেন; এবং পূর্বে উল্লেখিত ইমাম যাহাবীর সমালোচনা উল্লেখ করেছেন এবং তা সমর্থন করেছেন; কিন্তু তিনি বলেছেন: ‘আমি আশঙ্কা করি যে, এ ব্যক্তিই হান্নান—হা (ح) অক্ষরটি ফাতহা (যবর) সহকারে এবং দুটি নূন (ন) অক্ষর হালকা করে—এবং তার পিতা (সুদাইর) সীন (س) অক্ষরটি ফাতহা সহকারে (ক্বাদীর)-এর ওজনে, তার নাম ও তার পিতার নাম বিকৃত হয়েছে।’

আমি বলি: আর তার থেকে বর্ণনাকারী ইয়াযীদ ইবনু মুহাম্মাদ আস-সাক্বাফী; আমি তাকে চিনি না! অনুরূপভাবে তার থেকে বর্ণনাকারী: মুহাম্মাদ ইবনু উসমান ইবনু সাঈদ আল-ক্বুরাশী! আর তার সমসাময়িকদের মধ্যে রয়েছেন: মুহাম্মাদ ইবনু উসমান ইবনু সাঈদ ইবনু আব্দুস সালাম ইবনু আবীস সাওয়ার আল-মিসরী, যিনি আবূ সালিহ কাতিবুল লাইস হতে হাদীস বর্ণনা করেছেন; আবূ সাঈদ ইবনু ইউনুস বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য ছিল না; যেমনটি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে (৫/২৭৯) রয়েছে। সম্ভবত সে-ই এই ব্যক্তি।

অতঃপর, এই হাদীসটিকে পূর্ববর্তী ইমামদের একটি দল ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদের কারণে মুনকার (অস্বীকার) ঘোষণা করেছেন; ওয়াকী’ বলেছেন: ‘ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ ইবরাহীম হতে, তিনি আলক্বামাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ হতে—এই পতাকার হাদীসটি—কোনো কিছুই নয়।’ আর আবূ উসামাহ বলেছেন: ‘যদি সে আমার কাছে পঞ্চাশটি ক্বাসামাহ (শপথ) খেত, তবুও আমি তাকে বিশ্বাস করতাম না’; অর্থাৎ: এই হাদীসের ব্যাপারে। আর ইমাম যাহাবী ইমাম আহমাদ হতে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি এতে ওয়াকী’র পূর্বোক্ত কথার মতোই বলেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5204)


(كيف بكم - أيها الناس! - إذا طغى نساؤكم، وفسق فتيانكم؟ قالوا: يا رسول الله! إن هذا لكائن؟! قال: نعم، وأشد منه، كيف أنتم إذا تركتم الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر؟! قالوا: يا رسول الله! إن هذا لكائن؟ قال: وأشد منه، كيف بكم إذا رأيتم المنكر معروفاً، والمعروف منكراً؟!) .
ضعيف

أخرجه أبو يعلى في `مسنده` (ق 301/ 1) : حدثنا محمد بن الفرج: حدثنا محمد بن الزبرقان: حدثنا موسى بن عبيدة قال: أخبرني عمر بن هارون وموسى بن أبي عيسى عن أبي هريرة مرفوعاً به.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ موسى بن عبيدة - وهو الربذي - ضعيف عند الجمهور، وبعضهم ضعفه جداً.
والحديث؛ أورده الهيثمي في `مجمع الزوائد` (7/ 280 - 281) ؛ وقال:
`رواه أبو يعلى، والطبراني في `الأوسط`؛ إلا أنه قال: `فسق شبابكم`، وفي إسناد أبي يعلى: موسى بن عبيدة، وهو متروك، وفي إسناد الطبراني: جرير ابن المسلم؛ ولم أعرفه، والراوي عنه شيخ الطبراني همام بن يحيى؛ لم أعرفه`!
قلت: جرير هذا روى له الطبراني حديثاً آخر في `المعجم الصغير` (ص 206) ، ونسبه فيه صنعانياً.
وروي من حديث أبي أمامة مرفوعاً بلفظ:
`كيف أنتم إذا طغى نساؤكم … ` الحديث نحوه، وزاد في آخره:
قالوا: وكائن ذلك يا رسول الله؟! قال: `نعم، وأشد منه سيكون، يقول الله تعالى: بي حلفت! لأتيحن لهم فتنة يصير الحليم فيهم حيراناً`.

أخرجه ابن أبي حاتم في `العلل` (2/ 417 - 418) ، والحافظ عبد الغني المقدسي في `كتاب الأمر بالمعروف` (91 - 92) عن حماد بن عبد الرحمن الكلبي: حدثنا خالد بن الزبرقان القرشي عن سليم بن حبيب المحاربي عن أبي أمامة … وقال ابن أبي حاتم:
`قال أبي: هذا حديث منكر، وحماد ضعيف الحديث`.
قلت: وشيخه خالد بن الزبرقان؛ قال ابن أبي حاتم (1/ 2/ 332) :
`سمعت أبي يقول: هو منكر الحديث. وغيري يحكي عن أبي أنه قال: صالح الحديث`.
ثم أخرجه المقدسي من حديث ابن مسعود مختصراً. ورجاله ثقات؛ غير أبي نصر الفضل بن محمد بن سعيد؛ يرويه عن أبي الشيخ عن أبي يعلى بإسناده الحسن عنه.
غير أني لم أجده في `مسند أبي يعلى`، ولا في `المجمع`؛ فلينظر إن كان فيه؛ فإن كان ابن سعيد هذا معروفاً؛ فهو حسن ينقل إلى `الصحيحة`؛ فإني لم أعرف ابن سعيد هذا!
ثم وقفت على إسناد الطبراني، فوجدت فيه علتين أخريين، إحداهما واهية جداً، كما عرفت منه أحد الراويين اللذين لم يعرفهما الهيثمي، فقال الطبراني في
`المعجم الأوسط` (2/ 298/ 12/ 9479) : حدثنا همام بن يحيى: حدثنا حريز بن المسلم الصنعاني: حدثنا عبد المجيد بن عبد العزيز (الأصل: عبد المجيد) ابن أبي رواد (الأصل: داود) عن ياسين الزيات عن الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة به. وقال:
`لم يروه عن الأعمش إلا ياسين، ولا عن ياسين إلا عبد المجيد، تفرد به حريز بن المسلم`.
قلت: هو بالحاء المهملة وآخره؛ زاي كما في `الإكمال` (2/ 85 - 86) ؛ وكناه بـ (أبي المسلم) ؛ وقال:
`صنعاني، يروي عن عبد المجيد بن أبي رواد وغيره. روى عنه إبراهيم بن محمد بن المعمر`.
قلت: وذكره ابن حبان في `الثقات` (8/ 213) ، وقال:
`روى عن سفيان بن عيينة. وعنه أهل اليمن`.
ووقع عند الهيثمي: (جرير) بالجيم! فلا أدري إذا كان وقع له كذلك في `المعجم`؛ فلم يعرفه، أو أنه تحرف على ناسخ `المجمع`؟! والله أعلم.
وشيخه عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي رواد؛ قال الحافظ:
`صدوق يخطىء، وكان مرجئاً، أفرط ابن حبان فقال: متروك`.
وأقول: الآفة من شيخه ياسين الزيات؛ فإنه مجمع على ضعفه، بل هو متروك؛ كما قال النسائي وغيره. وقال البخاري (4/ 2/ 429) :
`يتكلمون فيه، منكر الحديث`.
فلا أدري لماذا سكت عنه الهيثمي، وأعل الحديث بما تقدم ممن لم يعرفه؟!
ثم رأيت ابن المبارك قد أخرج الحديث في `الزهد` (484/ 1376) ؛ قال: أخبرنا سفيان بن عيينة عن موسى بن أبي عيسى المديني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
فهذا يعل رواية موسى بن عبيدة المتقدمة عند أبي يعلى، ويؤكد ضعف ابن عبيدة حين أسنده عن موسى بن أبي عيسى عن أبي هريرة؛ فإن سفيان بن عيينة ثقة، وقد رواه عنه مرسلاً.
وموسى بن أبي عيسى المديني - وهو الحناط أبو هارون الغفاري - ، وهو ثقة؛ لكنهم لم يذكروا له رواية عن أحد من الصحابة، ولذلك؛ ذكره الحافظ في الطبقة السادسة؛ أي: أتباع التابعين، وفيهم ذكره اب حبان في `ثقاته` (7/ 454) .
وعليه؛ فهو منقطع بينه وبين أبي هريرة، بل معضل.
وعمر بن هارون: هو الزرقي الأنصاري المديني؛ ذكره ابن حبان في `الثقات`، وقال (5/ 153) :
`يروي عن أبي هريرة. روى عنه يحيى بن حمزة`.
كذا وقع فيه: (يحيى) ! وفي `تاريخ البخاري` و `الجرح والتعديل`:
(عمر) . والله أعلم؛ وذكرا في ترجمته أنه روى عن أبيه، وزاد البخاري:
`وروى موسى بن عبيدة: حدثنا عمر بن هارون عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم. فلا أدري هو هذا أم لا؟ `.
وأورده الذهبي في `الميزان`؛ وقال:
`.. عن أبيه عن أبي هريرة رضي الله عنه، لا يعرف، والخبر منكر`.
وعقب عليه في `اللسان` بقول ابن حبان المذكور آنفاً.
قلت: وعمر هذا وقرينه؛ لم يعرفهما المعلق على `مسند أبي يعلى` (11/ 304 - 305) ؛ فقال:
`إسناده ضعيف؛ لضعف موسى بن عبيدة الربذي، وقد تركه كثير من أهل العلم، وشيخه وشيخ شيخه لم أعرفهما`!
والصواب: `وشيخاه لم أعرفهما`؛ كما يظهر بأدنى تأمل.
ثم رأيت في `تاريخ البخاري` (4/ 2/ 441) ، و `الجرح والتعديل` (4/ 2/ 323) قد ذكرا من طريق عبد العزيز الأويسي عن سعيد بن عبد الرحمن عن عبيد الله بن نافع عن ابن عباس الحميري عن أبيه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: … فذكر الحديث بطرفه الأول فقط.
قلت: وهذا إسناد مجهول؛ الحميري هذا وأبوه لا يعرفان إلا في هذا الحديث.
وقد أورده الحافظ في ترجمة الأب من `الإصابة` من طريق ابن أبي حاتم فقط، ولم يزد!!
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(হে লোক সকল!) তোমাদের কী অবস্থা হবে—যখন তোমাদের নারীরা সীমালঙ্ঘন করবে এবং তোমাদের যুবকেরা ফাসিক (পাপী) হয়ে যাবে? তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এমন কি হবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এবং এর চেয়েও কঠিন হবে। তোমাদের কী অবস্থা হবে—যখন তোমরা সৎকাজের আদেশ এবং অসৎকাজের নিষেধ করা ছেড়ে দেবে? তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এমন কি হবে? তিনি বললেন: এবং এর চেয়েও কঠিন হবে। তোমাদের কী অবস্থা হবে—যখন তোমরা অসৎকে সৎ এবং সৎকে অসৎ হিসেবে দেখবে?!)।
যঈফ (দুর্বল)

এটি আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (খন্ড ১/৩০১) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আল-ফারাজ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আয-যুবরকান: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মূসা ইবনু উবাইদাহ, তিনি বলেন: আমাকে খবর দিয়েছেন উমার ইবনু হারূন এবং মূসা ইবনু আবী ঈসা, আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); মূসা ইবনু উবাইদাহ—যিনি আর-রাবযী—তিনি জমহূর (অধিকাংশ মুহাদ্দিস)-এর নিকট দুর্বল, আর কেউ কেউ তাকে অত্যন্ত দুর্বল বলেছেন।

আর হাদীসটি আল-হাইসামী তাঁর ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’ গ্রন্থে (৭/২৮০-২৮১) উল্লেখ করেছেন; এবং তিনি বলেছেন:
‘এটি আবূ ইয়া'লা এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন; তবে তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন: ‘তোমাদের যুবকেরা ফাসিক হয়ে যাবে’, আর আবূ ইয়া'লার সনদে রয়েছে: মূসা ইবনু উবাইদাহ, আর তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত)। আর ত্বাবারানীর সনদে রয়েছে: জারীর ইবনু আল-মুসলিম; আমি তাকে চিনি না, আর তার থেকে বর্ণনাকারী ত্বাবারানীর শায়খ হাম্মাম ইবনু ইয়াহইয়া; আমি তাকেও চিনি না!’

আমি বলি: এই জারীর থেকে ত্বাবারানী ‘আল-মু'জামুস সাগীর’ গ্রন্থে (পৃষ্ঠা ২০৬) আরেকটি হাদীস বর্ণনা করেছেন, এবং তাতে তাকে সান'আনী হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আর আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে মারফূ' হিসেবে এই শব্দে বর্ণিত হয়েছে:
‘তোমাদের কী অবস্থা হবে—যখন তোমাদের নারীরা সীমালঙ্ঘন করবে...’ হাদীসটি এর কাছাকাছি, এবং এর শেষে অতিরিক্ত রয়েছে:
তারা বললেন: এমন কি হবে হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)? তিনি বললেন: ‘হ্যাঁ, এবং এর চেয়েও কঠিন হবে। আল্লাহ তা'আলা বলেন: আমার কসম! আমি তাদের উপর এমন ফিতনা চাপিয়ে দেবো, যার কারণে তাদের মধ্যেকার ধৈর্যশীল ব্যক্তিও হতভম্ব হয়ে যাবে।’

এটি ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/৪১৭-৪১৮) এবং হাফিয আব্দুল গানী আল-মাকদিসী ‘কিতাবুল আমর বিল মা'রূফ’ গ্রন্থে (৯১-৯২) হাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান আল-কালবী থেকে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন খালিদ ইবনু আয-যুবরকান আল-কুরাশী, সুলাইম ইবনু হাবীব আল-মুহারিবী থেকে, তিনি আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে...। আর ইবনু আবী হাতিম বলেছেন:
‘আমার পিতা (আবূ হাতিম) বলেছেন: এই হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত), আর হাম্মাদ দুর্বল রাবী।’

আমি বলি: আর তার শায়খ খালিদ ইবনু আয-যুবরকান; ইবনু আবী হাতিম (১/২/৩৩২) বলেছেন:
‘আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি: তিনি মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস অস্বীকৃত)। আর অন্যেরা আমার পিতা থেকে বর্ণনা করে যে, তিনি বলেছেন: তিনি সালিহুল হাদীস (গ্রহণযোগ্য রাবী)।’

অতঃপর আল-মাকদিসী এটি ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে সংক্ষিপ্তাকারে বর্ণনা করেছেন। এর রাবীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য); আবূ নাসর আল-ফাদল ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সাঈদ ব্যতীত; তিনি এটি আবূশ শায়খ থেকে, তিনি আবূ ইয়া'লা থেকে তাঁর হাসান সনদসহ বর্ণনা করেছেন।
তবে আমি এটি ‘মুসনাদ আবী ইয়া'লা’ বা ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে পাইনি; সুতরাং দেখা উচিত যদি তাতে থাকে; যদি এই ইবনু সাঈদ পরিচিত হন; তবে এটি হাসান হবে এবং ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে স্থানান্তরিত হবে; কারণ আমি এই ইবনু সাঈদকে চিনি না!

অতঃপর আমি ত্বাবারানীর সনদের উপর দৃষ্টিপাত করলাম, এবং তাতে আরও দুটি ত্রুটি পেলাম, যার একটি অত্যন্ত দুর্বল, যেমনটি আমি হাইসামী কর্তৃক অপরিচিত ঘোষিত রাবীদ্বয়ের একজনকে চিনতে পারলাম। ত্বাবারানী ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (২/২৯৮/১২/৯৪৭৯) বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হাম্মাম ইবনু ইয়াহইয়া: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হারিয ইবনু আল-মুসলিম আস-সান'আনী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল মাজীদ ইবনু আব্দুল আযীয (মূল পাণ্ডুলিপিতে: আব্দুল মাজীদ) ইবনু আবী রাওয়াদ (মূল পাণ্ডুলিপিতে: দাঊদ) ইয়াসীন আয-যাইয়াত থেকে, তিনি আল-আ'মাশ থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন:
‘আল-আ'মাশ থেকে ইয়াসীন ব্যতীত কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর ইয়াসীন থেকে আব্দুল মাজীদ ব্যতীত কেউ বর্ণনা করেননি, হারিয ইবনু আল-মুসলিম এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি বলি: এটি (হারিয) হলো হা (ح) অক্ষর দ্বারা এবং শেষে যা (ز) অক্ষর দ্বারা, যেমনটি ‘আল-ইকমাল’ গ্রন্থে (২/৮৫-৮৬) রয়েছে; এবং তিনি তার কুনিয়াত (উপনাম) দিয়েছেন (আবুল মুসলিম); আর বলেছেন:
‘সান'আনী, তিনি আব্দুল মাজীদ ইবনু আবী রাওয়াদ এবং অন্যান্যদের থেকে বর্ণনা করেন। তার থেকে ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আল-মু'আম্মার বর্ণনা করেছেন।’
আমি বলি: আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে (৮/২১৩) উল্লেখ করেছেন, এবং বলেছেন:
‘তিনি সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। আর তার থেকে ইয়ামানের লোকেরা বর্ণনা করেছেন।’
আর হাইসামী'র নিকট (জারীর) জীম (ج) অক্ষর দ্বারা এসেছে! আমি জানি না, ‘আল-মু'জাম’ গ্রন্থে তার নিকট কি এভাবেই এসেছিল, ফলে তিনি তাকে চিনতে পারেননি, নাকি ‘আল-মাজমা’-এর লিপিকারের ভুল হয়েছে?! আল্লাহই ভালো জানেন।

আর তার শায়খ আব্দুল মাজীদ ইবনু আব্দুল আযীয ইবনু আবী রাওয়াদ; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন, আর তিনি মুরজিয়া ছিলেন। ইবনু হিব্বান বাড়াবাড়ি করে তাকে মাতরূক (পরিত্যক্ত) বলেছেন।’
আর আমি বলি: ত্রুটিটি তার শায়খ ইয়াসীন আয-যাইয়াত থেকে এসেছে; কারণ তার দুর্বলতার উপর ইজমা (ঐকমত্য) রয়েছে, বরং তিনি মাতরূক; যেমনটি নাসাঈ এবং অন্যান্যরা বলেছেন। আর বুখারী (৪/২/৪২৯) বলেছেন:
‘লোকেরা তার সম্পর্কে কথা বলে, তিনি মুনকারুল হাদীস।’
সুতরাং আমি জানি না কেন হাইসামী তার (ইয়াসীনের) ব্যাপারে নীরব থাকলেন, আর পূর্বোক্ত অপরিচিত রাবীদের দ্বারা হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত করলেন?!

অতঃপর আমি দেখলাম যে ইবনু আল-মুবারক হাদীসটি ‘আয-যুহদ’ গ্রন্থে (৪৮৪/১৩৭৬) বর্ণনা করেছেন; তিনি বলেন: আমাদের খবর দিয়েছেন সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ, মূসা ইবনু আবী ঈসা আল-মাদীনী থেকে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
সুতরাং এটি আবূ ইয়া'লার নিকট মূসা ইবনু উবাইদাহ কর্তৃক বর্ণিত পূর্বোক্ত বর্ণনাটিকে ত্রুটিযুক্ত করে, এবং ইবনু উবাইদাহ-এর দুর্বলতাকে নিশ্চিত করে, যখন তিনি এটিকে মূসা ইবনু আবী ঈসা থেকে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুসনাদ (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন; কারণ সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), আর তিনি এটি তার থেকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আর মূসা ইবনু আবী ঈসা আল-মাদীনী—যিনি আল-হান্নাত আবূ হারূন আল-গিফারী—তিনি সিকাহ; কিন্তু তারা তার জন্য কোনো সাহাবী থেকে বর্ণনা উল্লেখ করেননি। এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) তাকে ষষ্ঠ স্তরে উল্লেখ করেছেন; অর্থাৎ: তাবেঈনদের অনুসারী (আতবাউত তাবেঈন)-দের মধ্যে, এবং তাদের মধ্যেই ইবনু হিব্বান তাকে তার ‘সিকাত’ গ্রন্থে (৭/৪৫৪) উল্লেখ করেছেন।
অতএব; এটি তার এবং আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে মুনকাতি' (বিচ্ছিন্ন), বরং মু'দাল (অত্যন্ত বিচ্ছিন্ন)।

আর উমার ইবনু হারূন: তিনি হলেন আয-যুরাকী আল-আনসারী আল-মাদীনী; ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, এবং বলেছেন (৫/১৫৩):
‘তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। তার থেকে ইয়াহইয়া ইবনু হামযাহ বর্ণনা করেছেন।’
এতে এভাবেই (ইয়াহইয়া) এসেছে! আর ‘তারীখুল বুখারী’ এবং ‘আল-জারহু ওয়াত তা'দীল’ গ্রন্থে (উমার) এসেছে। আল্লাহই ভালো জানেন; এবং তারা তার জীবনীতে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন, আর বুখারী অতিরিক্ত বলেছেন:
‘আর মূসা ইবনু উবাইদাহ বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন উমার ইবনু হারূন, আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে। আমি জানি না, তিনি কি এই ব্যক্তি, নাকি অন্য কেউ?’
আর আয-যাহাবী তাকে ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন; এবং বলেছেন:
‘... তার পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি অপরিচিত, আর খবরটি মুনকার।’
আর ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে পূর্বোক্ত ইবনু হিব্বানের উক্তি দ্বারা এর উপর মন্তব্য করা হয়েছে।

আমি বলি: আর এই উমার এবং তার সঙ্গী; ‘মুসনাদ আবী ইয়া'লা’-এর টীকাকার (১১/৩০৪-৩০৫) তাদের দু'জনকে চিনতে পারেননি; ফলে তিনি বলেছেন:
‘এর সনদ দুর্বল; মূসা ইবনু উবাইদাহ আর-রাবযী-এর দুর্বলতার কারণে, আর তাকে অনেক আহলুল ইলম (আলেমগণ) পরিত্যাগ করেছেন, আর তার শায়খ এবং শায়খের শায়খকে আমি চিনি না!’
আর সঠিক হলো: ‘আর তার দুই শায়খকে আমি চিনি না’; যেমনটি সামান্য চিন্তা করলেই স্পষ্ট হয়।

অতঃপর আমি ‘তারীখুল বুখারী’ (৪/২/৪৪১) এবং ‘আল-জারহু ওয়াত তা'দীল’ (৪/২/৩২৩) গ্রন্থে দেখলাম যে, তারা আব্দুল আযীয আল-উওয়াইসী-এর সূত্রে, তিনি সাঈদ ইবনু আব্দুর রহমান থেকে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু নাফি' থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস আল-হিমইয়ারী থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি হাদীসটির কেবল প্রথম অংশটুকু উল্লেখ করলেন।
আমি বলি: এই সনদটি মাজহূল (অজ্ঞাত); এই হিমইয়ারী এবং তার পিতাকে এই হাদীস ব্যতীত অন্য কোথাও চেনা যায় না। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে পিতার জীবনীতে কেবল ইবনু আবী হাতিমের সূত্রেই এটি উল্লেখ করেছেন, এবং অতিরিক্ত কিছু বলেননি!!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5205)


(كان من دعائه الذي كان يقول: يا كائناً قبل أن يكون شيء، والمكون لكل شيء، والكائن بعدما لا يكون شيء! أسألك بلحظة من لحظاتك الحافظات، الغافرات الواجبات المنجيات) .
موضوع

أخرجه البيهقي في `الأسماء والصفات` (ص 11) من طريق
محمد بن سنان القزاز: حدثنا محمد بن الحارث مولى بني هاشم: حدثنا محمد بن عبد الرحمن بن البيلماني عن أبيه عن ابن عمر رضي الله عنهما مرفوعاً.
قلت: وهذا موضوع؛ آفته محمد بن عبد الرحمن بن البيلماني؛ متهم بالوضع؛ قال ابن حبان في `الضعفاء` (2/ 264) :
`حدث عن أبيه بنسخة شبيهاً بمئتي حديث كلها موضوعة، لا يجوز الاحتجاج به، ولا ذكره في الكتب إلا على جهة التعجب`.
ثم ساق له بضعة عشر حديثاً، قد مضى اثنان منها برقم (54،2411) .
ومحمد بن الحارث ضعيف؛ كما تقدم بيانه تحت الحديث الأول من الحديثين المشار إليهما.
ومثله القزاز؛ فإنه ضعيف؛ كما في `التقريب`.
وقد أشار البيهقي إلى تضعيف الحديث بقوله عقبه:
`إن صح`!
وهذا تقصير منه ظاهر، فكان الأولى أن ينزه كتابه منه ولا يورده فيه!
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(তাঁর দু'আগুলোর মধ্যে এটিও ছিল যা তিনি বলতেন: হে সেই সত্তা যিনি কোনো কিছু সৃষ্টি হওয়ার পূর্বেও বিদ্যমান ছিলেন, এবং যিনি সবকিছুর সৃষ্টিকর্তা, এবং যিনি কোনো কিছু না থাকার পরেও বিদ্যমান থাকবেন! আমি আপনার কাছে আপনার সেই সংরক্ষণকারী, ক্ষমাশীল, অপরিহার্য (বা অবশ্যম্ভাবী) এবং মুক্তিদানকারী মুহূর্তগুলোর একটি মুহূর্তের মাধ্যমে প্রার্থনা করি।)
মাওদ্বূ (Mawdu/জাল)

এটি বাইহাকী তাঁর ‘আল-আসমাউ ওয়াস-সিফাত’ (পৃ. ১১) গ্রন্থে এই সূত্রে বর্ণনা করেছেন:
মুহাম্মাদ ইবনু সিনান আল-কায্যায: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আল-হারিস মাওলা বানী হাশিম: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান ইবনু আল-বাইলামানী তাঁর পিতা থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল); এর ত্রুটি হলো মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান ইবনু আল-বাইলামানী; সে জালিয়াতির (হাদীস বানানোর) অভিযোগে অভিযুক্ত। ইবনু হিব্বান ‘আদ-দু’আফা’ (২/২৬৪) গ্রন্থে বলেছেন:
‘সে তার পিতা থেকে প্রায় দুইশত হাদীসের একটি পান্ডুলিপি বর্ণনা করেছে, যার সবগুলোই মাওদ্বূ (জাল)। তার দ্বারা প্রমাণ পেশ করা জায়েয নয়, এবং বিস্ময় প্রকাশ ছাড়া কিতাবসমূহে তার উল্লেখ করাও উচিত নয়।’
অতঃপর তিনি (ইবনু হিব্বান) তার জন্য দশটিরও বেশি হাদীস উল্লেখ করেছেন, যার মধ্যে দুটি (৫৪, ২৪১১) নম্বরে পূর্বে চলে গেছে।

আর মুহাম্মাদ ইবনু আল-হারিস যঈফ (দুর্বল); যেমনটি পূর্বে উল্লেখিত দুটি হাদীসের প্রথমটির অধীনে তার বর্ণনা চলে গেছে।
আর আল-কায্যাযও অনুরূপ; কারণ সেও যঈফ (দুর্বল); যেমনটি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে।

আর বাইহাকীও এর পরে তাঁর এই উক্তি দ্বারা হাদীসটিকে দুর্বল বলে ইঙ্গিত করেছেন:
‘যদি এটি সহীহ হয়!’
আর এটি তাঁর পক্ষ থেকে স্পষ্ট ত্রুটি; বরং উচিত ছিল যে তিনি তাঁর কিতাবকে এটি থেকে পবিত্র রাখতেন এবং এতে এটি উল্লেখ না করতেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5206)


(هذه صفة ربي عز وجل وتقدس علواً كبيراً) .
منكر

أخرجه البيهقي في `الأسماء` (ص 279) من طريق مخلد بن أبي عاصم: أخبرنا محمد بن موسى - يعني الحرشي - : أخبرنا عبد الله بن عيسى: أخبرنا داود - يعني: ابن أبي هند - عن عكرمة عن ابن عباس:
أن اليهود جاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم - منهم كعب بن الأشرف، وحيي بن
أخطب - ، فقالوا: يا محمد! صف لنا ربك الذي بعثك، فأنزل الله عز وجل: (قل هو الله أحد. الله الصمد. لم يلد) : فيخرج منه، (ولم يولد) : فيخرج من شيء، (ولم يكن له كفواً أحد) : ولا شبه، فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ عبد الله بن عيسى متفق على تضعيفه، وهو الخزاز أبو خلف؛ قال العقيلي في `الضعفاء` (ص 216) :
`لا يتابع على أكثر حديثه`. وقال ابن عدي (ق 225/ 1 - 2) :
`يروي عن يونس بن عبيد وداود بن أبي هند ما لا يوافقه عليه الثقات، وأحاديثه إفرادات كلها، وليس هو ممن يحتج بحديثه`.
ثم ساق له أحاديث هذا أحدها: أخبرنا محمد بن أحمد بن الحسين: حدثنا محمد ابن موسى الحرشي به مختصراً؛ دون حديث الترجمة وتفسير السورة.
والحرشي؛ قال الحافظ في `التقريب`:
`لين`.
ومخلد بن أبي عاصم؛ لم أعرفه، ولعل فيه تحريفاً.
وقد خالفه في متنه محمد بن أحمد بن الحسين - شيخ ابن عدي - فاختصره؛ كما رأيت؛ وهو الصواب.
فقد رواه يزيد عن عكرمة مرسلاً به نحوه.

أخرجه ابن جرير في `التفسير` (30/ 221) بسند صحيح عنه.
وهو يزيد بن أبي سعيد النحوي المروزي، وهو ثقة.
وكذلك أخرجه ابن جرير، والحاكم (2/ 540) ، والبيهقي (ص 32،279) عن أبي بن كعب قال:
إن المشركين قالوا: يا محمد! انسب لنا ربك! فأنزل الله السورة.
صححه الحاكم والذهبي! وفيه أبو جعفر الرازي، وهو ضعيف.
لكن لحديثه شواهد تقويه؛ فراجعها في `الدرالمنثور`.
ولقد كان الباعث على تحرير هذا: أنني رأيت الشيخ عبد الله الحبشي في رسالته `الصراط المستقيم` (ص 29) قد قال:
`أخرجه البيهقي بالإسناد الصحيح عن ابن عباس … ` فذكر الحديث!
فتصحيحه لهذا الإسناد لأكبر دليل على جهل هذا الرجل بهذا العلم، وقد بلغنا أه صار له أتباع كثر في لبنان؛ مما ذكرني بالقول المشهور: (إن البغاث بأرضنا يستنسر) !
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(এই হলো আমার রবের গুণাবলী, যিনি মহা সম্মানিত ও পবিত্র, যিনি অনেক মহান উচ্চতায় রয়েছেন)।
মুনকার

এটি বাইহাকী তাঁর ‘আল-আসমা’ গ্রন্থে (পৃ. ২৭৯) মাখলাদ ইবনু আবী আসিম-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু মূসা – অর্থাৎ আল-হারাশী – খবর দিয়েছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে ‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘ঈসা খবর দিয়েছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে দাঊদ – অর্থাৎ ইবনু আবী হিন্দ – খবর দিয়েছেন, তিনি ‘ইকরিমাহ হতে, তিনি ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন:
যে, ইয়াহূদীরা নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসেছিল – তাদের মধ্যে কা‘ব ইবনুল আশরাফ এবং হুয়াই ইবনু আখতাবও ছিল – তারা বলল: হে মুহাম্মাদ! আপনার রব, যিনি আপনাকে পাঠিয়েছেন, তাঁর গুণাবলী আমাদের নিকট বর্ণনা করুন। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: (বলুন, তিনি আল্লাহ, এক ও অদ্বিতীয়। আল্লাহ কারো মুখাপেক্ষী নন। তিনি কাউকে জন্ম দেননি) : অর্থাৎ তাঁর থেকে কেউ বের হয়নি, (এবং তিনি জন্ম নেননি) : অর্থাৎ কোনো কিছু থেকে তিনি বের হননি, (এবং তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই) : অর্থাৎ তাঁর কোনো সাদৃশ্য নেই। অতঃপর তিনি বললেন: ... তারপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); ‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘ঈসা-কে দুর্বল বলার ব্যাপারে সকলে একমত। তিনি হলেন আল-খায্যায আবূ খালাফ। আল-‘উকাইলী ‘আয-যু‘আফা’ গ্রন্থে (পৃ. ২১৬) বলেছেন:
‘তার অধিকাংশ হাদীসের অনুসরণ করা হয় না।’ আর ইবনু ‘আদী (খ. ২২৫/১-২) বলেছেন:
‘তিনি ইউনুস ইবনু ‘উবাইদ এবং দাঊদ ইবনু আবী হিন্দ হতে এমন সব হাদীস বর্ণনা করেন, যেগুলোর ব্যাপারে নির্ভরযোগ্য রাবীগণ তার সাথে একমত হন না। তার সমস্ত হাদীসই একক বর্ণনা (ইফরাদাত), আর তিনি এমন ব্যক্তি নন যার হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায়।’
অতঃপর তিনি তার জন্য কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন, এটি তার মধ্যে একটি: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনুল হুসাইন খবর দিয়েছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু মূসা আল-হারাশী এটি সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন; অনুচ্ছেদের হাদীস এবং সূরার তাফসীর ব্যতীত।
আর আল-হারাশী; হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তিনি নরম (দুর্বল)।’
আর মাখলাদ ইবনু আবী ‘আসিম; আমি তাকে চিনতে পারিনি, সম্ভবত এতে বিকৃতি ঘটেছে।
আর মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনুল হুসাইন – যিনি ইবনু ‘আদী-এর শায়খ – তিনি এর মতন (মূল পাঠ)-এর ক্ষেত্রে তার বিরোধিতা করেছেন এবং এটিকে সংক্ষিপ্ত করেছেন; যেমনটি আপনি দেখেছেন; আর এটিই সঠিক।
কেননা ইয়াযীদ এটি ‘ইকরিমাহ হতে মুরসালরূপে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

এটি ইবনু জারীর তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (৩০/২২১) তার (ইয়াযীদ) হতে সহীহ সনদে বর্ণনা করেছেন।
আর তিনি হলেন ইয়াযীদ ইবনু আবী সা‘ঈদ আন-নাহবী আল-মারওয়াযী, আর তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।
অনুরূপভাবে এটি ইবনু জারীর, হাকিম (২/৫৪০) এবং বাইহাকীও (পৃ. ৩২, ২৭৯) উবাই ইবনু কা‘ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: নিশ্চয়ই মুশরিকরা বলল: হে মুহাম্মাদ! আপনার রবের বংশ পরিচয় আমাদের নিকট বর্ণনা করুন! তখন আল্লাহ তা‘আলা এই সূরাটি নাযিল করলেন।
হাকিম ও যাহাবী এটিকে সহীহ বলেছেন! তবে এতে আবূ জা‘ফার আর-রাযী রয়েছেন, আর তিনি যঈফ (দুর্বল)।
কিন্তু তার হাদীসের এমন কিছু শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে যা এটিকে শক্তিশালী করে; আপনি তা ‘আদ-দুররুল মানসূর’ গ্রন্থে দেখে নিতে পারেন।
আর এই (হাদীসটির) তাহকীক করার কারণ হলো: আমি শাইখ ‘আব্দুল্লাহ আল-হাবাশী-কে তার রিসালাহ ‘আস-সিরাতুল মুস্তাকীম’ (পৃ. ২৯)-এ বলতে দেখেছি যে:
‘বাইহাকী ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে সহীহ সনদে এটি বর্ণনা করেছেন...’ অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন!
এই সনদটিকে তার সহীহ বলা এই জ্ঞানের (হাদীস শাস্ত্রের) ব্যাপারে লোকটির অজ্ঞতার সবচেয়ে বড় প্রমাণ। আর আমাদের নিকট খবর পৌঁছেছে যে, লেবাননে তার অনেক অনুসারী তৈরি হয়েছে; যা আমাকে এই প্রসিদ্ধ উক্তিটি স্মরণ করিয়ে দেয়: (নিশ্চয়ই আমাদের ভূমিতে ছোট পাখিও ঈগল হয়ে যায়)!
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5207)


(من قرأ ألف آية في سبيل الله؛ كتبه الله مع النبين والصديقين والشهداء والصالحين) .
منكر

أخرجه أبو يعلى (1489) ، والحاكم (2/ 87) ، وعنه البيهقي في `السنن` (9/ 172) عن زبان بن فائد عن سهل بن معاذ الجهني عن أبيه مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات؛ غير زبان؛ قال أحمد:
`أحاديثه مناكير`. وضعفه ابن حبان جداً؛ كما بينته في `ضعيف أبي داود` (230) . فقول الحاكم:
`صحيح الإسناد`! مردود؛ وإن وافقه الذهبي!
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(যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে এক হাজার আয়াত তিলাওয়াত করবে; আল্লাহ তাকে নবীগণ, সিদ্দীকগণ, শহীদগণ এবং সালেহীনদের (নেককারদের) সাথে লিপিবদ্ধ করবেন।)
মুনকার

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা (১৪৮৯), এবং হাকিম (২/৮৭), এবং তার (হাকিমের) সূত্রে বাইহাকী তাঁর ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে (৯/১৭২) যাব্বান ইবনু ফায়েদ হতে, তিনি সাহল ইবনু মু'আয আল-জুহানী হতে, তিনি তার পিতা হতে মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) সূত্রে।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (সিকাহ); তবে যাব্বান ব্যতীত। ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) তার সম্পর্কে বলেন: ‘তার হাদীসগুলো মুনকার (অস্বীকৃত)।’ ইবনু হিব্বান তাকে অত্যন্ত দুর্বল বলেছেন; যেমনটি আমি ‘যঈফ আবী দাঊদ’ (২৩০)-এ স্পষ্ট করেছি। সুতরাং হাকিমের এই উক্তি: ‘সহীহুল ইসনাদ’ (সনদ সহীহ)! প্রত্যাখ্যাত; যদিও যাহাবী তার সাথে একমত পোষণ করেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5208)


(الليل خلق من خلق الله عز وجل عظيم، لعله أعانك عليه (يعني: الصيد) شيء؟ انبذها عنك) .
منكر

أخرجه أبو داود في `المراسيل` (383) ، ومن طريقه البيهقي في `السنن الكبرى` (9/ 241) من طريق جرير عن موسى بن أبي عائشة عن أبي رزين قال:
جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم بصيد، فقال: إني رميته من الليل فأعياني، ووجدت سهمي فيه من الغد، وقد عرفت سهمي؟ فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد مرسل؛ أبو رزين هذا: هو مسعود بن مالك الأسدي الكوفي التابعي، وهو ثقة.
وكذلك سائر رواته؛ إلا أن جريراً - وهو ابن عبد الحميد الضبي الكوفي - ، وهو ثقة، لكنه قد تكلم فيه بعضهم من قبل حفظه؛ وفي `التقريب`:
`ثقة صحيح الكتاب، قيل: كان في آخر عمره يهم من حفظه`.
قلت: وقد خالفه في إسناده من هو أحفظ منه: فقال سفيان - وهو الثوري - : عن موسى بن أبي عائشة عن عبد الله بن أبي رزين عن أبي رزين مرفوعاً به، نحوه مختصراً، ليس فيه ذكر الليل والنهار.

أخرجه البيهقي، وقال:
`وأبو رزين هذا؛ اسمه مسعود مولى شقيق بن سلمة، وليس بأبي رزين مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم. والحديث مرسل. قاله البخاري`.
قلت: وعبد الله بن أبي رزين هذا لا يعرف إلا في هذا لإسناد. وقد قال الذهبي في `الميزان`:
`ذكره ابن حبان في `الثقات`، لا يدرى من هو؟ `.
قلت: فهو علة هذا الإسناد الصحيح مرسلاً.
وقد وهم المناوي وهماً فاحشاً؛ فإنه على الرغم من أن السيوطي صرح بقوله: `.. عن أبي رزين مرسلاً` علق عليه بأن أبا رزين هو العقيلي!!
قلت: ولو كان هو العقيلي؛ لم يكن الحديث مرسلاً؛ لأنه صحابي معروف، واسمه لقيط بن صبرة.
ثم إن في الحديث عندي نكارة؛ فقد صح عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال لأبي ثعلبة الخشني:
`إذا رميت الصيد فأدركته بعد ثلاث ليال، وسهمك فيه؛ فكله؛ ما لم ينتن`.
رواه مسلم وغيره، وهو مخرج في `سلسلة الأحاديث الصحيحة` (1350) . وفي رواية من حديث عدي بن حاتم:
`إذا عرفت سهمك فيه لم تر فيه أثر غيره، وتعلم أنه قتله؛ فكله`.
قلت: فلم يأمر صلى الله عليه وسلم بنبذ الصيد لمجرد احتمال أن يكون قتل بطريق غير شرعي، كما في حديث الترجمة، بينما الأمر على خلاف ذلك في الحديث الصحيح؛ فقد أحال فيه على ظاهر الأمر من نتانة أو مشاركة سبع، والله سبحانه وتعالى أعلم.
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(রাত আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার এক মহান সৃষ্টি। সম্ভবত অন্য কোনো কিছু তোমাকে এতে (অর্থাৎ শিকারে) সাহায্য করেছে? এটিকে তোমার থেকে দূরে ফেলে দাও।)
মুনকার

এটি আবূ দাঊদ তাঁর ‘আল-মারাসীল’ (৩৮৩) গ্রন্থে এবং তাঁর (আবূ দাঊদের) সূত্রে বাইহাকী তাঁর ‘আস-সুনানুল কুবরা’ (৯/২৪১) গ্রন্থে জারীর হতে, তিনি মূসা ইবনু আবী আয়িশাহ হতে, তিনি আবূ রাযীন হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি (আবূ রাযীন) বলেন:
এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট একটি শিকার নিয়ে আসলো এবং বললো: আমি রাতে এটিকে তীর মেরেছিলাম, কিন্তু এটি আমার হাতছাড়া হয়ে যায়। পরের দিন আমি এতে আমার তীরটি দেখতে পাই, আর আমি আমার তীরটি চিনতে পেরেছি? তখন তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা (উপরের মাতন) উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি মুরসাল (Mursal)। এই আবূ রাযীন হলেন: মাসঊদ ইবনু মালিক আল-আসাদী আল-কূফী, যিনি একজন তাবিঈ (Tabi'i), আর তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।

অনুরূপভাবে এর অন্যান্য বর্ণনাকারীগণও (সিকাহ)। তবে জারীর—আর তিনি হলেন ইবনু আব্দুল হামীদ আয-যাব্বী আল-কূফী—তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), কিন্তু কেউ কেউ তাঁর স্মৃতিশক্তির কারণে তাঁর সম্পর্কে কথা বলেছেন। ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে আছে: ‘তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তাঁর কিতাব সহীহ (সঠিক)। বলা হয়েছে: জীবনের শেষ দিকে তিনি মুখস্থের ক্ষেত্রে ভুল করতেন।’

আমি বলি: তাঁর (জারীরের) চেয়ে অধিক হাফিয (স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন) ব্যক্তি সনদের ক্ষেত্রে তাঁর বিরোধিতা করেছেন। সুফিয়ান—আর তিনি হলেন আস-সাওরী—তিনি বলেছেন: মূসা ইবনু আবী আয়িশাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আবী রাযীন হতে, তিনি আবূ রাযীন হতে মারফূ‘ হিসেবে এর অনুরূপ সংক্ষিপ্তাকারে বর্ণনা করেছেন, যাতে রাত ও দিনের উল্লেখ নেই।

এটি বাইহাকীও বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এই আবূ রাযীন; তাঁর নাম মাসঊদ, শাক্বীক্ব ইবনু সালামাহর মাওলা (মুক্তদাস)। তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর মাওলা আবূ রাযীন নন। হাদীসটি মুরসাল। এটি ইমাম বুখারী বলেছেন।’

আমি বলি: এই আব্দুল্লাহ ইবনু আবী রাযীনকে এই সনদ ছাড়া অন্য কোথাও জানা যায় না। ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আস-সিক্বাত’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তিনি কে, তা জানা যায় না?’ আমি বলি: সুতরাং, মুরসাল হিসেবে সহীহ হওয়া সত্ত্বেও এই সনদটির ত্রুটি (ইল্লাহ) হলো এই ব্যক্তি।

আর আল-মুনাভী মারাত্মক ভুল করেছেন। কারণ, সুয়ূতী স্পষ্টভাবে ‘...আবূ রাযীন হতে মুরসাল হিসেবে’ বলা সত্ত্বেও তিনি (আল-মুনাভী) মন্তব্য করেছেন যে, আবূ রাযীন হলেন আল-উক্বাইলী!! আমি বলি: যদি তিনি আল-উক্বাইলী হতেন, তবে হাদীসটি মুরসাল হতো না; কারণ তিনি একজন সুপরিচিত সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং তাঁর নাম লুক্বাইত ইবনু সাবরাহ।

এরপর আমার মতে হাদীসটিতে মুনকার (অস্বীকৃত) দিক রয়েছে। কারণ, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে আবূ সা‘লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উদ্দেশ্য করে সহীহভাবে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: ‘যখন তুমি শিকারকে তীর মারো এবং তিন রাত পর তা পাও, আর তোমার তীরটি তাতে থাকে; তবে তা খাও, যতক্ষণ না তাতে দুর্গন্ধ হয়।’ এটি মুসলিম ও অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন এবং এটি ‘সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ’ (১৩৫০)-তে সংকলিত হয়েছে।

আর আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের এক বর্ণনায় আছে: ‘যখন তুমি তাতে তোমার তীরটি চিনতে পারো, তাতে অন্য কিছুর কোনো চিহ্ন না দেখো, এবং তুমি জানো যে এটিই তাকে হত্যা করেছে; তবে তা খাও।’

আমি বলি: সুতরাং, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম শুধুমাত্র এই সম্ভাবনার কারণে শিকারকে ফেলে দিতে আদেশ করেননি যে, এটি অবৈধ উপায়ে নিহত হয়েছে, যেমনটি আলোচ্য হাদীসে রয়েছে। বরং সহীহ হাদীসে বিষয়টি এর বিপরীত; সেখানে তিনি বাহ্যিক কারণ, যেমন দুর্গন্ধ হওয়া বা কোনো হিংস্র প্রাণীর অংশগ্রহণ, এর উপর নির্ভর করেছেন। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা‘আলা সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5209)


(............................................) (1) .
(1) كان هنا الحديث: (ما أطيبك وما أطيب ريحك، ما أعظمك وأعظم حرمتك. . .) . رواه ابن ماجه.
وقد كتب الشيخ رحمه الله عليه بخطه: ` نقل إلى ` الصحيحة ` (3420) لشاهد له قوي `. (الناشر) .
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(............................................) (১) ।
(১) এখানে হাদীসটি ছিল: (তুমি কতই না পবিত্র এবং তোমার সুগন্ধি কতই না পবিত্র! তুমি কতই না মহান এবং তোমার পবিত্রতা কতই না মহান!...) । এটি ইবনু মাজাহ বর্ণনা করেছেন।
আর শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) নিজ হাতে লিখেছেন: "শক্তিশালী শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) থাকার কারণে এটিকে 'আস-সহীহাহ' (৩৪২০) তে স্থানান্তরিত করা হয়েছে।" (প্রকাশক) ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5210)


(ليدخلن بشفاعة عثمان سبعون ألفاً - كلهم قد استوجبوا النار - الجنة بغير حساب) .
منكر

أخرجه ابن عساكر في ترجمة عثمان رضي الله عنه من `التاريخ` (10/ 105/ 2) من طريقين عن عبد الرحمن بن نافع: أخبرنا محمد بن يزيد القرشي: أخبرنا محمد بن عمرو عن عطاء عن ابن عباس مرفوعاً.
ثم من طريق الحسين بن عبيد الله العجلي: أخبرنا مروان بن معاوية الفزاري عن سليمان عن عكرمة عن ابن عباس به نحوه.
وهذا إسناد ضعيف من الوجهين؛ ففي الأول: عبد الرحمن بن نافع؛ ولم أعرفه.
ومثله محمد بن يزيد القرشي، و [لا] أستبعد أن يكون هو يزيد بن محمد القرشي، انقلب على الراوي؛ فقد ذكره في الرواة عن محمد بن عمرو - وهو ابن حلحلة الديلي المدني - الراوي عن عطاء؛ وهو يزيد بن محمد بن قيس القرشي المطلبي، وهو ثقة؛ فإن كان هو؛ فقد انقلب اسمه على عبد الرحمن بن نافع هذا، وهو مما يدل على عدم حفظه وضبطه.
وأما الوجه الآخر؛ فآفته الحسين بن عبيد الله العجلي؛ قال الدارقطني:
`كان يضع الحديث`.
والحديث؛ أورده السيوطي من رواية ابن عساكر هذه؛ فتعقبه المناوي بقوله:
`قضية تصرف المصنف أن ابن عساكر خرجه وسكت عليه، والأمر بخلافه، بل قال: روي بإسناد غريب عن ابن عباس رفعه، وهو منكر. اهـ. وأقره عليه الذهبي في اختصاره لـ (تاريخه) `!
قلت: ولم أر قول ابن عساكر في الموضع الذي أشرت إليه آنفاً؛ فلعله ذكر ذلك في موضع آخر.
وإن مما يؤكد نكارته: أن الحديث صح عن غير ما واحد من الصحابة مرفوعاً بنحوه دون ذكر عثمان، وهو مخرج في `المشكاة` (5601) من حديث عبد الله ابن أبي الجدعاء.
وقد أخرجه الحاكم (3/ 408) - وصححه هو والذهبي - ، وزاد:
قال الحسن: إنه أويس القرني.
ويخالفه ما أخرجه ابن عساكر أيضاً بسند صحيح عن أبي أمامة مرفوعاً بلفظ:
`ليدخلن الجنة - بشفاعة رجل من أمتي - مثل أحد الحيين: ربيعة ومضر`؛ وزاد:
فكان المشيخة يرون ذلك الرجل عثمان بن عفان.
وجملة القول: أن الحديث - باللفظ المذكور أعلاه - منكر لا يصح. والله تعالى أعلم.
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(উসমানের শাফা‘আতে সত্তর হাজার লোক—যারা সকলেই জাহান্নামের উপযুক্ত ছিল—হিসাব ছাড়াই জান্নাতে প্রবেশ করবে।)
মুনকার

ইবনু আসাকির তাঁর ‘আত-তারীখ’ (১০/১০৫/২) গ্রন্থে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জীবনীতে এটি দু’টি সূত্রে বর্ণনা করেছেন। প্রথম সূত্রটি হলো: আব্দুর রহমান ইবনু নাফি‘ হতে, তিনি বলেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ আল-কুরাশী খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু আমর খবর দিয়েছেন, তিনি আতা হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

অতঃপর হুসাইন ইবনু উবাইদুল্লাহ আল-‘ইজলী-এর সূত্রে, তিনি বলেন: আমাদেরকে মারওয়ান ইবনু মু‘আবিয়াহ আল-ফাযারী খবর দিয়েছেন, তিনি সুলাইমান হতে, তিনি ইকরিমা হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

এই সনদটি উভয় দিক থেকেই যঈফ (দুর্বল)। প্রথম সূত্রে রয়েছে: আব্দুর রহমান ইবনু নাফি‘; আমি তাকে চিনি না। অনুরূপভাবে মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ আল-কুরাশীও (অজ্ঞাত)। আমি এটা অসম্ভব মনে করি না যে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-কুরাশী হবেন, যা বর্ণনাকারীর কাছে উল্টে গেছে। কারণ মুহাম্মাদ ইবনু আমর (যিনি ইবনু হালহালাহ আদ-দাইলী আল-মাদানী, যিনি আতা হতে বর্ণনা করেন)-এর বর্ণনাকারীদের মধ্যে তাঁর নাম উল্লেখ করা হয়েছে। আর তিনি হলেন ইয়াযীদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু কাইস আল-কুরাশী আল-মুত্তালিবী, এবং তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। যদি তিনি-ই হন, তবে আব্দুর রহমান ইবনু নাফি‘-এর কাছে তাঁর নাম উল্টে গেছে, যা তাঁর দুর্বল স্মৃতিশক্তি ও দুর্বলতা প্রমাণ করে।

আর দ্বিতীয় সূত্রটির ত্রুটি হলো: আল-হুসাইন ইবনু উবাইদুল্লাহ আল-‘ইজলী। দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘তিনি হাদীস জাল করতেন।’

আর এই হাদীসটি সুয়ূতী ইবনু আসাকিরের এই বর্ণনা হতে উল্লেখ করেছেন। অতঃপর আল-মুনাভী তাঁর সমালোচনা করে বলেন: ‘গ্রন্থকারের (সুয়ূতীর) আচরণ এমন যে, ইবনু আসাকির এটি বর্ণনা করেছেন এবং নীরব থেকেছেন। কিন্তু বিষয়টি এর বিপরীত। বরং তিনি (ইবনু আসাকির) বলেছেন: এটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে গারীব (অদ্ভুত) সনদে বর্ণিত হয়েছে, আর এটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। সমাপ্ত। আর যাহাবী তাঁর ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থের সংক্ষিপ্তকরণে এটি সমর্থন করেছেন!’

আমি (আলবানী) বলি: আমি পূর্বে উল্লেখিত স্থানে ইবনু আসাকিরের এই মন্তব্য দেখিনি; সম্ভবত তিনি অন্য কোনো স্থানে তা উল্লেখ করেছেন।

আর এর মুনকার হওয়ার বিষয়টি যা নিশ্চিত করে, তা হলো: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উল্লেখ ছাড়াই অনুরূপ হাদীস একাধিক সাহাবী হতে মারফূ‘ হিসেবে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। এটি ‘আল-মিশকাত’ (৫৬০১) গ্রন্থে আব্দুল্লাহ ইবনু আবী আল-জাদ‘আ-এর হাদীস হতে সংকলিত।

আর এটি হাকিম (৩/৪০৮) বর্ণনা করেছেন—এবং তিনি ও যাহাবী এটিকে সহীহ বলেছেন—এবং অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি হলেন উওয়াইস আল-কারনী। এর বিপরীত বর্ণনাও ইবনু আসাকির সহীহ সনদে আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন, যার শব্দ হলো: ‘আমার উম্মাতের এক ব্যক্তির শাফা‘আতে রাবী‘আহ ও মুদার গোত্রের দুই শাখার যেকোনো এক শাখার সমপরিমাণ লোক জান্নাতে প্রবেশ করবে।’ এবং অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: মাশায়েখগণ সেই ব্যক্তিকে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে করতেন।

সারকথা হলো: উপরে উল্লেখিত শব্দে হাদীসটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য), সহীহ নয়। আর আল্লাহ তা‘আলাই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5211)


(ليدركن الدجال قوماً مثلكم أو خيراً منكم (ثلاث مرات) ، ولن يخزي الله أمة أنا أولها، وعيسى ابن مريم آخرها) (1) .
منكر

أخرجه الحاكم (3/ 41) عن عيسى بن يونس عن صفوان بن عمرو عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير عن أبيه رضي الله عنه قال:
لما اشتد جزع أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم على من قتل يوم (مؤتة) ؛ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. وقال:
`صحيح على شرط الشيخين`!! ورده الذهبي بقوله:
`قلت: ذا مرسل: وهو خبر منكر`.
قلت: وليس رجاله على شرط الشيخين؛ إلا عيسى بن يونس.
وأما سائرهم؛ فإنما احتج بهم مسلم وحده. وقال المناوي:
`ورواه ابن أبي شيبة من حديث عبد الرحمن بن جبير بن نفير - أحد التابعين - ؛ قال ابن حجر: وإسناده حسن`.
(1) كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن: ` تقدم برقم (5099) `. (الناشر)
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(দাজ্জাল অবশ্যই তোমাদের মতো অথবা তোমাদের চেয়ে উত্তম এমন একদল লোকের সাক্ষাৎ পাবে (তিনবার)। আর আল্লাহ এমন কোনো উম্মতকে কখনো লাঞ্ছিত করবেন না, যার প্রথম আমি এবং যার শেষ হলেন ঈসা ইবনে মারইয়াম।) (১)

মুনকার

এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (৩/৪১) ঈসা ইবনে ইউনুস থেকে, তিনি সাফওয়ান ইবনে আমর থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনে জুবাইর ইবনে নুফাইর থেকে, তিনি তার পিতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন:
যখন মুতার (Mu'tah) যুদ্ধের দিন নিহতদের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের অস্থিরতা তীব্র হলো; তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন। আর তিনি (হাকিম) বললেন:
‘শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ’!! কিন্তু যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তার এই কথা প্রত্যাখ্যান করে বললেন:
‘আমি (যাহাবী) বলি: এটি মুরসাল (Mursal)। আর এটি একটি মুনকার (Munkar) বর্ণনা।’
আমি (আলবানী) বলি: ঈসা ইবনে ইউনুস ব্যতীত এর বর্ণনাকারীগণ শাইখাইন-এর শর্তানুযায়ী নন।
আর বাকি যারা আছেন; তাদের দ্বারা কেবল মুসলিম একাই প্রমাণ পেশ করেছেন। আর মানাভী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘আর ইবনু আবী শাইবাহ এটি বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনে জুবাইর ইবনে নুফাইর—যিনি একজন তাবেঈ—তার হাদীস থেকে; ইবনু হাজার বলেছেন: এর সনদ হাসান (Hasan)।’

(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনটির উপরে লিখেছেন: ‘এটি পূর্বে (৫০৯৯) নম্বরে গত হয়েছে।’ (প্রকাশক)









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5212)


(ما ترون مما تكرهون؛ فذلك ما تجزون، يؤخر الخير لأهله في الآخرة) .
ضعيف

أخرجه الحاكم (2/ 532 - 533) عن محمد بن مسلمة الواسطي: حدثنا يزيد بن هارون: أنبأ سفيان بن حسين عن أبي قلابة عن أبي أسماء الرحبي قال:
بينما أبو بكر الصديق رضي الله عنه يتغدى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ إذ نزلت هذه الآية: (فمن يعمل مثقال ذرة خيراً يره. ومن يعمل مثقال ذرة شراً يره) ؛ فأمسك أبو بكر، وقال: يا رسول الله! أكل ما عملنا من سوء رأيناه؟! فقال: … فذكره. وقال:
`صحيح الإسناد`! ورده الذهبي بقوله:
`قلت: مرسل`.
قلت: ومع الإرسال علة أخرى؛ وهي محمد بن مسلمة الواسطي؛ فإنه واه؛ قال الذهبي:
`أتى بخبر باطل اتهم به، وقال أبو القاسم اللالكائي: ضعيف … وساق له ابن عدي أحاديث تستنكر، وقال أبو محمد الخلال: هو ضعيف جداً`.
لكن الظاهر أنه لم يتفرد به؛ فقد عزاه السيوطي في `الدر المنثور` (6/ 380) لإسحاق بن راهويه، وعبد بن حميد، والحاكم، وابن مردويه عن أسماء. وكذا وقع فيه: `أسماء`؛ فصار الحديث بذلك موصولاً.
لكن الظاهر أنه سقط من الناسخ أداة الكنية: `أبي`، وساعد على ذلك أنه لم يكن في أصله وصفه بالرحبي، وإلا؛ لصار التحريف هكذا: `أسماء الرحبي`!
فإذا كان الأمر كما ذكرنا، وكان من مخرجي الحديث إسحاق بن راهويه وعبد ابن حميد - وهما من طبقة الواسطي - ؛ كان ذلك دليلاً واضحاً على أنهما قد تابعاه عليه، أو على الأقل: على أنه لم يتفرد به، فالعلة حينئذ إنما هي الإرسال. والله أعلم.
وإن مما يؤيد ما ذكرته من التحريف والسقط: أن السيوطي ذكره في `الجامع الصغير` من رواية الحاكم عن أبي أسماء الرحبي مرسلاً. وكذا في `الجامع الكبير` له.
وقد روي الحديث من طرق أخرى عن أبي بكر الصديق بنحوه، دون الشطر الثاني منه؛ فانظر `التعليق الرغيب` (4/ 152/ 54) .
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(তোমরা যা অপছন্দ করো, তা-ই তোমাদের প্রতিদান হিসেবে দেওয়া হয়। আর কল্যাণকে তার হকদারদের জন্য আখিরাতের জন্য বিলম্বিত করা হয়।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (২/৫৩২-৫৩৩) মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ আল-ওয়াসিতী থেকে, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াযীদ ইবনু হারূন, তিনি বলেন: আমাদের অবহিত করেছেন সুফিয়ান ইবনু হুসাইন, তিনি আবূ কিলাবাহ থেকে, তিনি আবূ আসমা আর-রাহবী থেকে, তিনি বলেন:
আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দুপুরের খাবার খাচ্ছিলেন, এমন সময় এই আয়াতটি নাযিল হলো: (সুতরাং কেউ অণু পরিমাণ ভালো কাজ করলে তা সে দেখতে পাবে। আর কেউ অণু পরিমাণ মন্দ কাজ করলে তা সে দেখতে পাবে।) [সূরা যিলযাল: ৭-৮]; তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খাওয়া বন্ধ করে দিলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা যত মন্দ কাজ করেছি, তার সব কি আমরা দেখতে পাবো?! তখন তিনি (রাসূল সাঃ) বললেন: ... অতঃপর তিনি (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন। আর তিনি (হাকিম) বললেন:
‘সনদ সহীহ’! কিন্তু যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তা প্রত্যাখ্যান করে তাঁর এই উক্তি দ্বারা:
‘আমি বলি: এটি মুরসাল।’
আমি বলি: ইরসাল (মুরসাল হওয়া) ছাড়াও এতে আরেকটি ত্রুটি রয়েছে; আর তা হলো মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ আল-ওয়াসিতী। কেননা সে দুর্বল (ওয়াহী)। যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘সে একটি বাতিল খবর নিয়ে এসেছে, যার কারণে সে অভিযুক্ত। আর আবুল কাসিম আল-লালাকাঈ বলেছেন: দুর্বল... আর ইবনু আদী তার এমন কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন যা মুনকার (অস্বীকার্য)। আর আবূ মুহাম্মাদ আল-খাল্লাল বলেছেন: সে খুবই দুর্বল।’
তবে বাহ্যত মনে হয় যে, সে (মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ) এককভাবে এটি বর্ণনা করেনি। কেননা সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি ‘আদ-দুররুল মানসূর’ (৬/৩৮০)-এ ইসহাক ইবনু রাহওয়াইহ, আব্দ ইবনু হুমাইদ, হাকিম এবং ইবনু মারদাওয়াইহ থেকে আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর এভাবেই তাতে ‘আসমা’ শব্দটি এসেছে; ফলে হাদীসটি এর দ্বারা মাওসূল (সংযুক্ত) হয়ে যায়।
কিন্তু বাহ্যত মনে হয় যে, লিপিকারের (নাসিখ) থেকে কুনিয়াহ (উপনাম)-এর শব্দ ‘আবূ’ বাদ পড়েছে। আর এর কারণ হলো, মূল কিতাবে তার সাথে ‘আর-রাহবী’ বিশেষণটি যুক্ত ছিল না। অন্যথায়, বিকৃতিটি এমন হতো: ‘আসমা আর-রাহবী’!
সুতরাং যদি বিষয়টি এমন হয় যেমনটি আমরা উল্লেখ করেছি, এবং হাদীসটির বর্ণনাকারীদের মধ্যে ইসহাক ইবনু রাহওয়াইহ ও আব্দ ইবনু হুমাইদ থাকেন – আর তারা উভয়েই আল-ওয়াসিতীর সমসাময়িক স্তরের – তবে এটি স্পষ্ট প্রমাণ যে, তারা উভয়েই তাকে এর উপর অনুসরণ করেছেন, অথবা অন্ততপক্ষে: সে এককভাবে এটি বর্ণনা করেনি। সেক্ষেত্রে ত্রুটিটি কেবল ইরসাল (মুরসাল হওয়া)। আর আল্লাহই ভালো জানেন।
আর আমি বিকৃতি ও বাদ পড়ার যে কথা উল্লেখ করেছি, তার সমর্থনে একটি বিষয় হলো: সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি ‘আল-জামি‘উস সাগীর’-এ হাকিমের সূত্রে আবূ আসমা আর-রাহবী থেকে মুরসাল হিসেবে উল্লেখ করেছেন। অনুরূপভাবে তাঁর ‘আল-জামি‘উল কাবীর’-এও।
আর হাদীসটি আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর অনুরূপভাবে অন্যান্য সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে, তবে এর দ্বিতীয় অংশটি ছাড়া। সুতরাং ‘আত-তা’লীকুর রাগীব’ (৪/১৫২/৫৪) দেখুন।
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5213)


(قسم الله العقل على ثلاثة أجزاء، فمن كن فيه فهو العاقل، ومن لم تكن فيه فلا عقل له: حسن المعرفة بالله عز وجل، وحسن الطاعة لله عز وجل، وحسن الصبر لله عز وجل .
موضوع

أخرجه أبو نعيم في `الحلية` (1/ 21) ، ومن طريقه ابن الجوزي في `الموضوعات` (1/ 172) من طريق سليمان بن عيسى عن ابن جريج عن عطاء عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً. وقال ابن الجوزي:
`ليس من كلام رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال أبو حاتم الرازي: سليمان بن عيسى كذاب، وقال ابن عدي: يضع الحديث`.
وتابعه من هو مثله؛ عبد العزيز بن أبي رجاء: حدثنا ابن جريج به.

أخرجه أبو نعيم أيضاً (3/ 323) ، وقال:
`غريب من حديث عطاء، لا أعلم عنه راوياً إلا ابن جريج`.
وتعقبه السيوطي في `اللآلي` بقوله (1/ 127) :
`وعبد العزيز؛ قال الدارقطني: متروك، له تصنيف في العقل؛ موضوع كله`.
وله متابعات أخرى لا وزن لها، فانظر `اللآلي` و `تنزيه الشريعة` (10/ 175) .
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আল্লাহ তাআলা আকলকে (বুদ্ধিকে) তিনটি অংশে ভাগ করেছেন। যার মধ্যে এই তিনটি অংশ বিদ্যমান, সে-ই বুদ্ধিমান (আকিল)। আর যার মধ্যে এই তিনটি অংশ নেই, তার কোনো আকল নেই: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা সম্পর্কে উত্তম জ্ঞান, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার প্রতি উত্তম আনুগত্য এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার জন্য উত্তম ধৈর্য।

মাওদ্বূ (জাল)

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ নুআইম তাঁর ‘আল-হিলইয়াহ’ গ্রন্থে (১/২১), এবং তাঁর (আবূ নুআইমের) সূত্রে ইবনুল জাওযী তাঁর ‘আল-মাওদ্বূ‘আত’ গ্রন্থে (১/১৭২)।

(এটি বর্ণিত হয়েছে) সুলাইমান ইবনু ঈসা-এর সূত্রে, তিনি ইবনু জুরাইজ থেকে, তিনি আতা থেকে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে।

আর ইবনুল জাওযী বলেছেন:
‘এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কথা নয়।’ আবূ হাতিম আর-রাযী বলেছেন: ‘সুলাইমান ইবনু ঈসা একজন মিথ্যুক (কাযযাব)।’ আর ইবনু আদী বলেছেন: ‘সে হাদীস জাল করত।’

এবং তার (সুলাইমানের) মতো আরেকজন বর্ণনাকারী তার অনুসরণ করেছে; সে হলো আব্দুল আযীয ইবনু আবী রাজা: সে ইবনু জুরাইজ থেকে এটি বর্ণনা করেছে।

আবূ নুআইম এটিও বর্ণনা করেছেন (৩/৩২৩), এবং তিনি বলেছেন:
‘এটি আতা থেকে বর্ণিত গারীব (বিরল) হাদীস। আমি ইবনু জুরাইজ ছাড়া তার থেকে অন্য কোনো বর্ণনাকারীর কথা জানি না।’

আর আস-সুয়ূতী তাঁর ‘আল-লাআলী’ গ্রন্থে (১/১২৭) এই বলে এর সমালোচনা করেছেন:
‘আর আব্দুল আযীয সম্পর্কে; দারাকুতনী বলেছেন: সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)। আকল (বুদ্ধি) সম্পর্কে তার একটি সংকলন আছে; যা পুরোটাই মাওদ্বূ (জাল)।’

আর এর অন্যান্য মুতাবাআত (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে, যার কোনো গুরুত্ব নেই। সুতরাং ‘আল-লাআলী’ এবং ‘তানযীহ আশ-শারীআহ’ (১০/১৭৫) দেখুন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5214)


(ما يحل لمؤمن أن يشتد إلى أخيه بنظرة تؤذيه) .
ضعيف

أخرجه عبد الله بن المبارك في `الزهد` (689) : أخبرنا موسى ابن عبيدة عن حمزة بن عبدة - قال ابن صاعد: كذا في كتابي، ولا أدري من حمزة؟ - قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، وفيه علتان:
الأولى: الإرسال والجهالة؛ فإن حمزة لم أعرفه، وقد أشار يحية بن صاعد إلى جهالته، ولم أجده في شيء من كتب الرجال التي عندي.
وقد وقع في `الجامع الصغير` و `الكبير` من رواية ابن المبارك: `حمزة بن عبيد` مصغراً، ولم أجده أيضاً! وأما قول المناوي:
هو ابن عبد الله بن عمر، قال الذهبي: ثقة إمام`!! فلا وجه له؛ فإن حفيد ابن عمر اسمه حمزة بن عبد الله، وهذا اسمه: حمزة بن عبدة - أو ابن عبيد - ؛ فأين هذا من هذا؟!
ثم هو - مع جهالته - تابعي، فحديثه مرسل، وقد صرح بإرساله السيوطي.
والأخرى: ضعف موسى بن عبيدة - وهو الربذي - ؛ قال الحافظ:
`ضعيف`.
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(কোনো মুমিনের জন্য এটা বৈধ নয় যে, সে তার ভাইয়ের দিকে এমন তীব্র দৃষ্টিতে তাকাবে যা তাকে কষ্ট দেয়।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি আব্দুল্লাহ ইবনুল মুবারক তাঁর ‘আয-যুহদ’ গ্রন্থে (৬৮৯) বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন মূসা ইবনু উবাইদাহ, তিনি হামযাহ ইবনু আবদাহ থেকে – (ইবনু সা'ইদ বলেছেন: আমার কিতাবে এমনই আছে, আর আমি জানি না হামযাহ কে?) – তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), এবং এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাত) রয়েছে:

প্রথমটি: ইরসাল (মুরসাল হওয়া) এবং জাহালাহ (অজ্ঞাত থাকা); কারণ আমি হামযাহকে চিনতে পারিনি। ইয়াহইয়া ইবনু সা'ইদ তার অজ্ঞাত হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন, আর আমার কাছে থাকা রিজাল শাস্ত্রের কোনো কিতাবেই আমি তাকে পাইনি।

আর ইবনুল মুবারকের বর্ণনায় ‘আল-জামি‘উস সাগীর’ ও ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে এসেছে: ‘হামযাহ ইবনু উবাইদ’ (ছোট করে), তাকেও আমি পাইনি!

আর মানাওয়ীর এই উক্তি: ‘তিনি হলেন ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার, ইমাম যাহাবী বলেছেন: তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), ইমাম’!! এর কোনো ভিত্তি নেই; কারণ ইবনু উমারের নাতির নাম হলো হামযাহ ইবনু আব্দুল্লাহ, আর এর নাম হলো: হামযাহ ইবনু আবদাহ – অথবা ইবনু উবাইদ – ; তাহলে এর সাথে ওর সম্পর্ক কোথায়?!

এরপর, সে – তার অজ্ঞাত হওয়া সত্ত্বেও – একজন তাবেঈ, তাই তার হাদীসটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদযুক্ত), আর সুয়ূতী স্পষ্টভাবে এটিকে মুরসাল বলে উল্লেখ করেছেন।

দ্বিতীয়টি: মূসা ইবনু উবাইদাহ – যিনি আর-রাবযী – তার দুর্বলতা; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘যঈফ’ (দুর্বল)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5215)


(مشيك إلى المسجد، ورجوعك إلى بيتك في الأجر سواء) .
منكر

أخرجه نعيم بن حماد في `زوائد الزهد` (رقم 10) عن ابن المبارك: أنبأنا أبو بكر بن أبي مريم عن يحيى بن يحيى الغساني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إساد مرسل؛ بل معضل؛ فإنه الغساني هذا لم يذكروا له رواية عن الصحابة، وهو ثقة.
وأبو بكر بن أبي مريم ضعيف مختلط.
ونعيم بن حماد نفسه ضعيف أيضاً.
والحديث؛ عزاه في `الجامع الصغير` لسعيد بن منصور في `سننه`.
وأما في `الكبير`؛ فعزاه لابن زنجويه. والله أعلم.
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(মসজিদের দিকে তোমার হেঁটে যাওয়া এবং তোমার ঘরে ফিরে আসা—উভয়ই সওয়াবের দিক থেকে সমান।)

মুনকার

এটি বর্ণনা করেছেন নুআইম ইবনু হাম্মাদ তাঁর ‘যাওয়াইদ আয-যুহদ’ গ্রন্থে (নং ১০) ইবনু মুবারক থেকে: তিনি বলেন, আমাদেরকে সংবাদ দিয়েছেন আবূ বাকর ইবনু আবী মারইয়াম, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া আল-গাসসানী থেকে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি মুরসাল; বরং মু'দাল (দুর্বলতার চরম পর্যায়)। কারণ এই আল-গাসসানী সম্পর্কে সাহাবীগণ থেকে কোনো বর্ণনা উল্লেখ করা হয়নি, যদিও তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।

আর আবূ বাকর ইবনু আবী মারইয়াম হলেন যঈফ (দুর্বল) ও মুখতালাত (স্মৃতিবিভ্রাটগ্রস্ত)।

আর নুআইম ইবনু হাম্মাদ নিজেও যঈফ (দুর্বল)।

আর এই হাদীসটি; ‘আল-জামি‘উস সাগীর’ গ্রন্থে সাঈদ ইবনু মানসূর তাঁর ‘সুনান’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন বলে উল্লেখ করা হয়েছে।

আর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে; এটি ইবনু যানজাওয়াইহ-এর দিকে সম্পর্কিত করা হয়েছে। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5216)


(من احتجب عن الناس؛ لم يحجب عن النار) .
ضعيف

أخرجه ابن منده في `الصحابة` - كما في `أسد الغابة` (2/ 161) - من طريق إدريس بن يونس بن راشد عن عبد الكريم بن مالك الجزري عن عبدة بن رباح عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مظلم؛ رباح لا يعرف إلا في هذا الحديث.
وابنه عبدة بن رباح؛ قال ابن أبي حاتم (3/ 1/ 89) :
`عبدة بن رباح الغساني روى عن يزيد بن أبي مالك، وعبادة بن نسي. روى عنه الوليد بن مسلم`.
وإدريس بن يونس؛ لم أجد من ذكره.
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(যে ব্যক্তি মানুষের কাছ থেকে নিজেকে আড়াল করে রাখে; তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে আড়াল করা হবে না)।
যঈফ

এটি ইবনু মানদাহ তাঁর `আস-সাহাবাহ` গ্রন্থে সংকলন করেছেন - যেমনটি `আসাদুল গাবাহ` (২/১৬১)-তে রয়েছে - ইদরীস ইবনু ইউনুস ইবনু রাশিদ এর সূত্রে, তিনি আব্দুল কারীম ইবনু মালিক আল-জাযারী থেকে, তিনি আবদাহ ইবনু রাবাহ থেকে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি (পিতা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল) এবং অন্ধকারাচ্ছন্ন (অজ্ঞাত)। রাবাহকে এই হাদীস ছাড়া অন্য কোথাও জানা যায় না।

আর তার পুত্র আবদাহ ইবনু রাবাহ; ইবনু আবী হাতিম (৩/১/৮৯) বলেছেন:
‘আবদাহ ইবনু রাবাহ আল-গাসসানী ইয়াযীদ ইবনু আবী মালিক এবং উবাদাহ ইবনু নুসাই থেকে বর্ণনা করেছেন। তার থেকে আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম বর্ণনা করেছেন।’

আর ইদরীস ইবনু ইউনুস; আমি এমন কাউকে পাইনি যিনি তার উল্লেখ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5217)


(من بلغه حديث فكذب به؛ فقد كذب ثلاثة: الله، ورسوله، والذي حدث به) .
ضعيف

أخرجه الطبراني في `الأوسط` (1/ 29/ 1 - مجمع البحرين) : حدثنا محمد بن أحمد بن الوليد: حدثنا سعيد بن عمرو السكوني: حدثنا بقية بن الوليد عن محفوظ بن مسور عن محمد بن المنكدر عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. وقال:
`لم يروه عن ابن المنكدر إلا محفوظ، تفرد به بقية`.
قلت: وبقية بن الوليد مشهور بالتدليس والرواية عن الضعفاء والمجهولين؛ قال ابن حبان في `المجروحين` (1/ 191) :
`دخلت حمص، وأكثر همي شأن بقية، فتتبعت حديثه، وكتبت النسخ على الوجه، وتتبعت ما لم أجد بعلو من رواية القدماء عنه، فرأيته ثقة مأموناً، ولكنه كان مدلساً، سمع من عبيد الله بن عمر وشعبة ومالك أحاديث يسيرة مستقيمة، ثم سمع عن أقوام كذابين ضعفاء متروكين عن عبيد الله بن عمر وشعبة ومالك، مثل: المجاشع بن عمرو، والسري بن عبد الحميد وعمر بن موسى التميمي وأشباههم، وأقوام لا يعرفون إلا بالكنى، فروى عن أولئك الثقات الذين رآهم بالتدليس ما سمع من هؤلاء الضعفاء؛ فكان يقول: قال عبيد الله بن عمر عن نافع، و: قال مالك عن نافع كذا، فحملوا: بقية عن عبيد الله وبقية عن مالك، وأسقط الواهي بينهما، فالتزق الموضوع ببقية، وتخلص الواضع من الوسط`.
ثم ساق له أحاديث عدة من روايته عن ابن جريج عن عطاء عن ابن عباس؛ وقال:
`كلها موضوعة`. وقال أحمد وابن معين وغيره:
`إذا حدث عن الثقات - مثل صفوان بن عمرو وغيره - ؛ فاقبلوه، وأما إذا حدث عن أولئك المجهولين؛ فلا`. وقال يعقوب:
`ثقة حسن الحديث إذا حدث عن المعروفين، ويحدث عن قوم متروكي الحديث، وعن الضعفاء، ويحيد عن أسمائهم إلى كناهم، وعن كناهم إلى أسمائهم`!
قلت: وشيخه في هذا الحديث - محفوظ بن مسور - ؛ لم أجد له ترجمة، والظاهر أنه من شيوخ بقية المجهولين.
وأما قول الهيثمي في `مجمع الزوائد` (1/ 149) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه محفوظ بن ميسور، ذكره ابن أبي حاتم، ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً`!
أقول: فلا أدري وجهه! فإنه لم يذكر فيه في `من يسمى بمحفوظ` إلا رجلين، ليس هذا أحدهما، ولا ذكره أيضاً في `الأفراد`.
ثم إن الذي في `مجمع الزوائد`: `ابن ميسور` مخالف لما نقلته عن `مجمع البحرين`: `ابن مسور`، وكلاهما للهيثمي. والله أعلم.
ومن هذا البيان؛ تعلم ما في جزم الشيخ عبد الله الغماري نسبة الحديث إلى النبي صلى الله عليه وسلم من التلبيس على الناس، والمخالفة لقوله صلى الله عليه وسلم: `من حدث عني
بحديث وهو يرى أنه كذب فهو أحد الكذابين`. رواه مسلم وغيره؛ فقد قال في رسالته `مصباح الزجاجة` (ص 42) :
`فقد ورد عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: … ` فذكره، ونقل ما سبق نقله عن `مجمع الزوائد`؛ وأقره على ذلك، ولم يزد عليه ولا حرفاً واحداً!!
ثم رأيت الحديث في `التمهيد` لابن عبد البر (1/ 152) من طريق أخرى عن بقية بن الوليد به.
وكذلك رواه ابن عساكر في `التاريخ` (7/ 142) .
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(যার নিকট কোনো হাদীস পৌঁছল এবং সে তা মিথ্যা প্রতিপন্ন করল; সে তিনজনকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করল: আল্লাহকে, তাঁর রাসূলকে এবং যে ব্যক্তি তা বর্ণনা করেছে তাকে)।
যঈফ

এটি ত্বাবারানী তাঁর `আল-আওসাত্ব`-এ (১/২৯/১ - মাজমাউল বাহরাইন) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনুল ওয়ালীদ: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন সাঈদ ইবনু আমর আস-সাকুনী: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ, মাহফূয ইবনু মাসওয়ার হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনুল মুনকাদির হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। আর তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন:
‘ইবনুল মুনকাদির হতে মাহফূয ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর বাক্বিয়্যাহ এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আলবানী) বলি: আর বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ তাদলীস (দোষ গোপন) এবং দুর্বল ও অজ্ঞাতনামা বর্ণনাকারীদের নিকট হতে বর্ণনা করার জন্য সুপরিচিত। ইবনু হিব্বান `আল-মাজরূহীন`-এ (১/১৯১) বলেছেন:
‘আমি হিমসে প্রবেশ করলাম, আর আমার অধিকাংশ মনোযোগ ছিল বাক্বিয়্যাহর বিষয়ে। অতঃপর আমি তার হাদীসগুলো অনুসরণ করলাম এবং হুবহু অনুলিপি লিখলাম। আর আমি তার থেকে প্রাচীনদের বর্ণনার মধ্যে যা উচ্চ সনদযুক্ত পাইনি, তা অনুসরণ করলাম। আমি তাকে বিশ্বস্ত ও আমানতদার হিসেবে পেলাম, কিন্তু সে ছিল মুদাল্লিস (তাদলীসকারী)। সে উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার, শু‘বাহ এবং মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) হতে সামান্য কিছু সঠিক হাদীস শুনেছে। অতঃপর সে উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার, শু‘বাহ এবং মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) হতে মিথ্যাবাদী, দুর্বল ও পরিত্যাজ্য কিছু লোকের মাধ্যমে শুনেছে, যেমন: আল-মুজাশী‘ ইবনু আমর, আস-সারী ইবনু আব্দুল হামীদ এবং উমার ইবনু মূসা আত-তামীমী ও তাদের মতো অন্যান্যরা, এবং এমন কিছু লোক যাদেরকে শুধুমাত্র কুনিয়াত (উপনাম) দ্বারাই চেনা যায়। অতঃপর সে ঐ সকল বিশ্বস্ত রাবীদের নিকট হতে তাদলীসের মাধ্যমে বর্ণনা করত, যা সে এই দুর্বলদের নিকট হতে শুনেছিল। ফলে সে বলত: উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার নাফি‘ হতে বলেছেন, এবং মালিক নাফি‘ হতে এমন বলেছেন। ফলে লোকেরা ধরে নিত: বাক্বিয়্যাহ উবাইদুল্লাহ হতে এবং বাক্বিয়্যাহ মালিক হতে শুনেছেন, আর মাঝখানের দুর্বল রাবীকে বাদ দেওয়া হতো। ফলে মাওদ্বূ (বানোয়াট) হাদীস বাক্বিয়্যাহর সাথে জুড়ে যেত, আর জালকারী মাঝখান থেকে মুক্ত হয়ে যেত।’
অতঃপর তিনি (ইবনু হিব্বান) ইবনু জুরাইজ হতে, তিনি আত্বা হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার (বাক্বিয়্যাহর) বর্ণনাকৃত বেশ কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন; এবং বলেছেন:
‘এগুলো সবই মাওদ্বূ (বানোয়াট)।’
আর আহমাদ, ইবনু মাঈন এবং অন্যান্যরা বলেছেন:
‘যদি সে বিশ্বস্ত রাবীদের নিকট হতে বর্ণনা করে – যেমন সাফওয়ান ইবনু আমর এবং অন্যান্যরা – তবে তা গ্রহণ করো। আর যদি সে ঐ সকল অজ্ঞাতনামা রাবীদের নিকট হতে বর্ণনা করে; তবে নয়।’
আর ইয়া‘কূব বলেছেন:
‘সে বিশ্বস্ত, তার হাদীস উত্তম, যদি সে পরিচিতদের নিকট হতে বর্ণনা করে। আর সে এমন কিছু লোকের নিকট হতে বর্ণনা করে যারা হাদীসের ক্ষেত্রে পরিত্যাজ্য এবং দুর্বল। আর সে তাদের নাম হতে কুনিয়াতের (উপনামের) দিকে এবং কুনিয়াত হতে নামের দিকে সরে যায়!’
আমি বলি: আর এই হাদীসে তার শায়খ – মাহফূয ইবনু মাসওয়ার – তার জীবনী আমি খুঁজে পাইনি। স্পষ্টতই সে বাক্বিয়্যাহর অজ্ঞাতনামা শায়খদের অন্তর্ভুক্ত।
আর `মাজমাউয যাওয়ায়েদ`-এ (১/১৪৯) হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য হলো:
‘এটি ত্বাবারানী `আল-আওসাত্ব`-এ বর্ণনা করেছেন, আর এতে মাহফূয ইবনু মাইসূর রয়েছে। ইবনু আবী হাতিম তার উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তার সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা‘দীল (প্রশংসা) উল্লেখ করেননি!’
আমি বলি: এর কারণ আমি জানি না! কারণ তিনি (ইবনু আবী হাতিম) ‘যারা মাহফূয নামে পরিচিত’ তাদের মধ্যে মাত্র দু’জন লোকের কথা উল্লেখ করেছেন, যাদের মধ্যে এই ব্যক্তি একজন নয়। আর তিনি তাকে ‘আল-আফরাদ’-এও উল্লেখ করেননি। উপরন্তু, `মাজমাউয যাওয়ায়েদ`-এ যা রয়েছে: ‘ইবনু মাইসূর’, তা `মাজমাউল বাহরাইন` হতে আমি যা উদ্ধৃত করেছি: ‘ইবনু মাসওয়ার’-এর বিপরীত। আর উভয়টিই হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
আর এই ব্যাখ্যা হতে আপনি জানতে পারলেন যে, শাইখ আব্দুল্লাহ আল-গুমারী কর্তৃক হাদীসটিকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে নিশ্চিতভাবে সম্পর্কিত করার মধ্যে মানুষের উপর কী ধরনের ধোঁকা রয়েছে, এবং তা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের এই বাণীর বিরোধী: ‘যে ব্যক্তি আমার পক্ষ হতে এমন কোনো হাদীস বর্ণনা করে, যা সে মিথ্যা বলে মনে করে, তবে সে মিথ্যাবাদীদের মধ্যে একজন।’ এটি মুসলিম এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। তিনি (আল-গুমারী) তার রিসালাহ `মিসবাহুয যুজাজাহ`-এ (পৃষ্ঠা ৪২) বলেছেন:
‘নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণিত হয়েছে যে তিনি বলেছেন: ...’ অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন, এবং `মাজমাউয যাওয়ায়েদ` হতে পূর্বে যা উদ্ধৃত করা হয়েছে, তা নকল করেছেন; এবং তিনি এর উপর সম্মতি দিয়েছেন, একটি অক্ষরও বাড়াননি!!
অতঃপর আমি হাদীসটি ইবনু আব্দুল বার্র-এর `আত-তামহীদ`-এ (১/১৫২) বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ হতে অন্য একটি সূত্রে দেখেছি। অনুরূপভাবে ইবনু আসাকিরও এটি `আত-তারীখ`-এ (৭/১৪২) বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5218)


(إن لكل شيء شرفاً، وإن أشرف المجالس ما استقل به القبلة، ومن نظر في كتاب أخيه عن غيره أمره؛ فكأنما ينظر في النار) (1) .
ضعيف جداً

أخرجه الطبراني في `الكبير` (3/ 98/ 1) ، والحاكم (4/ 270) من طريق هشام بن زياد أبي المقدام عن محمد بن كعب القرظي عن ابن عباس مرفوعاً به.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً؛ من أجل أبي المقدام هذا.
وسكت عنه الحاكم! فتعقبه الذهبي بقوله:
`قلت: هشام متروك`. وكذا قال الحافظ في `التقريب`.
لكن الشطر الأول منه تابعه عليه مصادف بن زياد المديني، رواه عنه محمد ابن معاوية - وأثنى عليه خيراً - قال سمعت محمد بن كعب به.
(1) كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن: ` تقدم برقم (2786) `. (الناشر)
ولكن قال الذهبي عقب ما سبق:
`ومحمد بن معاوية كذبه الدارقطني؛ فبطل الحديث`.
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(নিশ্চয় প্রত্যেক বস্তুরই একটি মর্যাদা রয়েছে। আর মজলিসসমূহের মধ্যে সবচেয়ে মর্যাদাপূর্ণ হলো যা কিবলামুখী হয়। আর যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের অনুমতি ব্যতীত তার কিতাবের দিকে তাকায়, সে যেন আগুনের দিকেই তাকালো।) (১)
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে (৩/৯৮/১) এবং হাকিম (৪/২৭০) হিশাম ইবনু যিয়াদ আবিল মিকদাম সূত্রে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু কা'ব আল-কুরাযী হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি আবিল মিকদাম নামক রাবীর কারণে যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)।

আর হাকিম এ সম্পর্কে নীরবতা অবলম্বন করেছেন! অতঃপর যাহাবী তাঁর সমালোচনা করে বলেন:

‘আমি (যাহাবী) বলি: হিশাম মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’ হাফিয ইবনু হাজারও ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে অনুরূপ বলেছেন।

কিন্তু এর প্রথম অংশটির ক্ষেত্রে মুসাদাফ ইবনু যিয়াদ আল-মাদীনী তার অনুসরণ করেছেন। মুহাম্মাদ ইবনু মু'আবিয়াহ তার থেকে বর্ণনা করেছেন – এবং তার প্রশংসা করেছেন – তিনি বলেন: আমি মুহাম্মাদ ইবনু কা'ব হতে এটি শুনেছি।

(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনের উপরে লিখেছেন: ‘এটি পূর্বে (২৭৮৬) নম্বরে উল্লেখ করা হয়েছে।’ (প্রকাশক)

কিন্তু যাহাবী পূর্বোক্ত আলোচনার পর বলেছেন:

‘মুহাম্মাদ ইবনু মু'আবিয়াহকে দারাকুতনী মিথ্যাবাদী বলেছেন; ফলে হাদীসটি বাতিল (অকার্যকর)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5219)


(ما من ميت يموت، فيقرأ عنده سورة (يس) ؛ إلا هون الله عز وجل عليه) .
موضوع

أخرجه الديلمي في `مسند الفردوس` (4/ 17) - عن أبي نعيم معلقاً، وهذا في `أخبار أصبهان` (1/ 188) - ، والروياني في `مسنده` (1/ 13/ 1 - المنتقى منه) عن عبد الحميد بن أبي رواد عن مروان بن سالم عن صفوان ابن عمرو عن شريح عن أبي الدرداء وأبي ذر رفعه.
قلت: وهذا موضوع؛ آفته مروان هذا؛ قال الشيخان وأبو حاتم:
`منكر الحديث`. وقال أبو عروبة الحراني:
`يضع الحديث`. وقال الساجي:
`كذاب يضع الحديث`.
قلت: وقد خولف في إسناده ومتنه؛ فقال الإمام أحمد (5/ 105) : حدثنا أبو المغيرة: حدثنا صفوان: حدثني المشيخة:
أنهم حضروا غضيف بن الحارث الثمالي حين اشتد سوقه، فقال: هل منكم أحد يقرأ (يس) ؟ قال: فقرأها صالح بن شريح السكوني، فلما بلغ أربعين منها قبض. قال: فكان المشيخة يقولون: إذا قرئت عند الميت خفف عنه بها. قال صفوان: وقرأها عيسى بن المعتمر عند ابن معبد.
قلت: صفوان - وهو ابن عمرو السكسكي الحمصي - جل روايته عن التابعين، فقوله: `حدثني المشيخة` يعني: مشيخة من التابعين، فعليه؛ فالحديث مقطوع موقوف عليهم، رفعه ووصله ذلك الكذاب مروان، فهذا هو علة هذا الإسناد. وأما قول الهيثمي (2/ 322) :
`رواه أحمد، وفيه من لم يسم`!
فمن الواضح أنه لم يصنع شيئاً؛ لأنه يعني بذلك: `المشيخة`، وهم جماعة من التابعين، فلو أنهم أسندوه؛ لكان إسناداً حسناً عندي، والله أعلم.
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(এমন কোনো মৃত ব্যক্তি নেই যে মারা যায়, আর তার নিকট সূরা (ইয়াসীন) পাঠ করা হয়; কিন্তু আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তার জন্য তা সহজ করে দেন।)
মাওদ্বূ (বানোয়াট)

এটি দায়লামী তাঁর ‘মুসনাদুল ফিরদাউস’ (৪/১৭)-এ আবূ নুআইম থেকে মুআল্লাক্বভাবে বর্ণনা করেছেন। আর এটি ‘আখবারু আসবাহান’ (১/১৮৮)-এ রয়েছে। আর রুয়াইয়ানী তাঁর ‘মুসনাদ’ (১/১৩/১ - আল-মুনতাকা মিনহু)-এ আব্দুল হামীদ ইবনু আবী রাওয়াদ থেকে, তিনি মারওয়ান ইবনু সালিম থেকে, তিনি সাফওয়ান ইবনু আমর থেকে, তিনি শুরাইহ থেকে, তিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (বানোয়াট); এর ত্রুটি হলো এই মারওয়ান। শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এবং আবূ হাতিম বলেছেন:
‘সে মুনকারুল হাদীস (অগ্রহণযোগ্য হাদীস বর্ণনাকারী)’।
আর আবূ উরূবাহ আল-হাররানী বলেছেন:
‘সে হাদীস জাল করে।’
আর আস-সাজী বলেছেন:
‘সে মিথ্যুক, হাদীস জাল করে।’

আমি (আলবানী) বলি: তার ইসনাদ ও মাতনে ভিন্নতা রয়েছে। ইমাম আহমাদ (৫/১০৫) বলেছেন: আমাদেরকে আবূল মুগীরাহ হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে সাফওয়ান হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাকে মাশায়িখগণ (মুরব্বীগণ) হাদীস বর্ণনা করেছেন: যে তারা গুদ্বাইফ ইবনু আল-হারিস আস-সুমালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট উপস্থিত ছিলেন যখন তার মৃত্যুযন্ত্রণা তীব্র হলো। তিনি বললেন: তোমাদের মধ্যে কি এমন কেউ আছে যে (ইয়াসীন) পাঠ করবে? বর্ণনাকারী বলেন: তখন সালিহ ইবনু শুরাইহ আস-সাকুনী তা পাঠ করলেন। যখন তিনি এর চল্লিশে পৌঁছলেন, তখন তার রূহ কবজ করা হলো। বর্ণনাকারী বলেন: তখন মাশায়িখগণ বলতেন: যখন মৃত ব্যক্তির নিকট তা পাঠ করা হয়, তখন এর দ্বারা তার কষ্ট লাঘব করা হয়। সাফওয়ান বলেন: আর ঈসা ইবনুল মু‘তামির ইবনু মা‘বাদ-এর নিকট তা পাঠ করেছিলেন।

আমি (আলবানী) বলি: সাফওয়ান – আর তিনি হলেন ইবনু আমর আস-সাকসাকী আল-হিমসী – তার অধিকাংশ বর্ণনা তাবেঈন থেকে। সুতরাং তার কথা: ‘আমাকে মাশায়িখগণ হাদীস বর্ণনা করেছেন’ এর অর্থ হলো: তাবেঈনদের মধ্য থেকে মাশায়িখগণ। অতএব; হাদীসটি মাকতূ‘ (বিচ্ছিন্ন) এবং তাদের উপর মাওকূফ (সাহাবী বা তাবেঈর উক্তি হিসেবে সীমাবদ্ধ)। সেই মিথ্যুক মারওয়ান এটিকে মারফূ‘ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত) হিসেবে উন্নীত করেছে এবং যুক্ত করেছে। সুতরাং এটিই এই ইসনাদের ত্রুটি।

আর হাইসামী (২/৩২২)-এর উক্তি:
‘এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন, আর এতে এমন বর্ণনাকারী আছে যার নাম উল্লেখ করা হয়নি!’
– এটা স্পষ্ট যে তিনি কোনো কাজ করেননি; কারণ তিনি এর দ্বারা ‘আল-মাশায়িখাহ’ (মুরব্বীগণ)-কে বুঝিয়েছেন, আর তারা হলেন তাবেঈনদের একটি দল। যদি তারা এটিকে ইসনাদযুক্ত করতেন, তবে আমার নিকট তা হাসান ইসনাদ হতো। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (5220)


(لو يعلم المار بين يدي المصلي؛ لأحب أن ينكسر فخذه، ولا يمر بين يديه) .
منكر

أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف` (1/ 282) : حدثنا أبو أسامة عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر قال: سمعت عبد الحميد بن عبد الرحمن - عامل عمر بن عبد العزيز - ؛ ومر رجل بين يديه وهو يصلي، فجبذه حتى كاد يخرق ثيابه؛ فلما انصرف قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين؛ إلا أنه مرسل أو معضل؛ فإن عبد الحميد بن عبد الرحمن - وهو ابن زيد الخطاب القرشي العدوي - ، وإن كان له رواية عن ابن عباس، فالغالب عليه روايته عن التابعين، فعلة الحديث الإرسال أو الإعضال.
ولفظه منكر؛ فإن المحفوظ عن النبي صلى الله عليه وسلم إنما هو بلفظ:
`لو يعلم المار بين يدي المصلي ماذا عليه؛ لكان أن يقف أربعين خيراً له من أن
يمر بين يديه`.
وهو مخرج في `صحيح أبي داود` (698) .
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(যদি সালাত আদায়কারীর সামনে দিয়ে অতিক্রমকারী জানত; তবে সে পছন্দ করত যে তার উরু ভেঙে যাক, তবুও সে তার সামনে দিয়ে অতিক্রম করবে না)।
মুনকার

এটি ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ (১/২৮২)-এ সংকলন করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ উসামাহ, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ ইবনু জাবির (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি বলেন: আমি আব্দুল হামীদ ইবনু আব্দুর রহমান – যিনি উমার ইবনু আব্দুল আযীযের গভর্নর ছিলেন – তাঁকে বলতে শুনেছি; এক ব্যক্তি তাঁর সামনে দিয়ে অতিক্রম করছিল যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন, তখন তিনি তাকে এমনভাবে টেনে ধরলেন যে প্রায় তার কাপড় ছিঁড়ে যাচ্ছিল; যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটির সকল বর্ণনাকারীই সিকা (নির্ভরযোগ্য) এবং শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবী; তবে এটি মুরসাল (Mursal) অথবা মু'দাল (Mu'dal); কারণ আব্দুল হামীদ ইবনু আব্দুর রহমান – আর তিনি হলেন ইবনু যায়িদ আল-খাত্তাব আল-কুরাশী আল-আদাবী – যদিও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাঁর বর্ণনা রয়েছে, তবে তাঁর অধিকাংশ বর্ণনা তাবেঈনদের থেকে। সুতরাং হাদীসটির ত্রুটি হলো ইরসাল (Mursal হওয়া) অথবা ই'দাল (Mu'dal হওয়া)।

আর এর শব্দাবলী মুনকার (Munkar); কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে যা মাহফূয (সংরক্ষিত) তা হলো এই শব্দে:
`সালাত আদায়কারীর সামনে দিয়ে অতিক্রমকারী যদি জানত যে এর কী (শাস্তি) রয়েছে; তবে তার সামনে দিয়ে অতিক্রম করার চেয়ে চল্লিশ (দিন/মাস/বছর) দাঁড়িয়ে থাকা তার জন্য উত্তম হত।`
আর এটি ‘সহীহ আবী দাঊদ’ (৬৯৮)-এ সংকলিত হয়েছে।