হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (2461)


حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِذَا دُعِيَ أَحَدُكُمْ إِلَى طَعَامٍ وَهُوَ صَائِمٌ فَلْيَقُلْ إِنِّي صَائِمٌ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কোন (সওম পালনকারী) ব্যক্তিকে খাবার দাওয়াত দেয়া হলে সে যেন বলে, নিশ্চয়ই আমি রোযাদার।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1150)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّد: هو ابن مسرهد الأسَدي، وسفيان: هو ابن عُيينة، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، والأعرج: هو عبد الرحمن بن هُرمز. وأخرجه مسلم (١١٥٠)، وابن ماجه (١٧٥٠)، والترمذي (٧٩١)، والنسائي في "الكبرى" (٣٢٥٦) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٠٤). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (2462)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَعْتَكِفُ الْعَشْرَ الأَوَاخِرَ مِنْ رَمَضَانَ حَتَّى قَبَضَهُ اللَّهُ ثُمَّ اعْتَكَفَ أَزْوَاجُهُ مِنْ بَعْدِهِ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাযান মাসের শেষ দশ দিন ই‘তিকাফ করতেন যতদিন না আল্লাহ তাঁকে মৃত্যুদান করেন। এরপর তাঁর স্ত্রীগণও (ই‘তিকাফ করেন)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2026) صحیح مسلم (1172)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعد، وعُقَيل: ابن خالد الأموي الأيلي، والزهري: هو محمد بن مسلم ابن شهاب، وعروة: هو ابن الزبير بن العوّام. وأخرجه البخاري (٢٠٢٦)، ومسلم (١١٧٢)، والنسائي في "الكبري" (٣٣٢٤) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٧٢) من طريق هشام بن عروة، والترمذي (٨٠٠)، والنسائي (٣٣٢١) و (٣٣٢٢) من طريقين، عن الزهري، كلاهما عن عروة، به. دون قوله: ثم اعتكف أزواجه من بعده. وأخرجه مسلم (١١٧٢) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة، به. دون ذكر اعتكاف أزواجه أيضاً. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٦١٣)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٦٥).









সুনান আবী দাউদ (2463)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا ثَابِتٌ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ أُبَىِّ بْنِ كَعْبٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَعْتَكِفُ الْعَشْرَ الأَوَاخِرَ مِنْ رَمَضَانَ فَلَمْ يَعْتَكِفْ عَامًا فَلَمَّا كَانَ الْعَامُ الْمُقْبِلُ اعْتَكَفَ عِشْرِينَ لَيْلَةً ‏.‏




উবাই ইবনু কা‘ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাযান মাসের শেষ দশকে ই‘তিকাফ করতেন। এক বছর তিনি ই‘তিকাফ করতে না পারায় পরবর্তী বছর বিশ দিন ই‘তিকাফ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2102، 2103) ، أخرجہ ابن ماجہ (1770 وسندہ صحیح) وصححہ ابن خزیمۃ (2225 وسندہ صحیح)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة البصري، وثابت: هو ابن أسلم البُناني، وأبو رافع: هو نُفَيع الصائغ المدني. وأخرجه ابن ماجه (١٧٧٠)، والنسائي في "الكبرى" (٣٣٣٠) و (٣٣٧٥) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٢٧٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٦٣). قال الخطابي: فيه من الفقه أن النوافل المعتادة تقضى كما تقضى الفرائض، ومن هذا قضاء رسول الله ﷺ بعد العصر الركعتين اللتين فاتتاه لِقدوم الوفد عليه، واشتغاله بهم. وفيه مستدل لمن أجاز الاعتكاف بغير صوم ينشئه له، وذلك أن صومه في شهر رمضان إنما كان للشهر، لأن الوقت مستحق له. وقد اختلف الناس في هذا فقال الحسن البصري: إن اعتكف من غير صيام أجزأه، وإليه ذهب الشافعي. وروي عن علي وابن مسعود أنهما قالا: إن شاء صام، وإن شاء أفطر. وقال الأوزاعي ومالك: لا اعتكاف إلا بصوم، وهو مذهب أصحاب الرأي، وروي ذلك عن ابن عمر وابن عباس وعائشة، وهو قول سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير والأوزاعي.









সুনান আবী দাউদ (2464)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، وَيَعْلَى بْنُ عُبَيْدٍ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَرَادَ أَنْ يَعْتَكِفَ صَلَّى الْفَجْرَ ثُمَّ دَخَلَ مُعْتَكَفَهُ ‏.‏ قَالَتْ وَإِنَّهُ أَرَادَ مَرَّةً أَنْ يَعْتَكِفَ فِي الْعَشْرِ الأَوَاخِرِ مِنْ رَمَضَانَ ‏.‏ قَالَتْ فَأَمَرَ بِبِنَائِهِ فَضُرِبَ فَلَمَّا رَأَيْتُ ذَلِكَ أَمَرْتُ بِبِنَائِي فَضُرِبَ ‏.‏ قَالَتْ وَأَمَرَ غَيْرِي مِنْ أَزْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِبِنَائِهِ فَضُرِبَ فَلَمَّا صَلَّى الْفَجْرَ نَظَرَ إِلَى الأَبْنِيَةِ فَقَالَ ‏ "‏ مَا هَذِهِ آلْبِرَّ تُرِدْنَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَتْ فَأَمَرَ بِبِنَائِهِ فَقُوِّضَ وَأَمَرَ أَزْوَاجُهُ بِأَبْنِيَتِهِنَّ فَقُوِّضَتْ ثُمَّ أَخَّرَ الاِعْتِكَافَ إِلَى الْعَشْرِ الأُوَلِ يَعْنِي مِنْ شَوَّالٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ ابْنُ إِسْحَاقَ وَالأَوْزَاعِيُّ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ نَحْوَهُ وَرَوَاهُ مَالِكٌ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ قَالَ اعْتَكَفَ عِشْرِينَ مِنْ شَوَّالٍ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফের ইচ্ছা করলে ফজরের সলাত আদায়ের পর তাঁর ই‘তিকাফের স্থানে প্রবেশ করতেন। তিনি বলেন, একবার তিনি রমাযানের শেষ দশকে ই‘তিকাফের ইচ্ছা করলেন। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি একটি তাঁবু খাটানোর নির্দেশ দিলে তা খাটানো হয়। এরপর তা দেখে আমিও আমার জন্য একটি তাঁবু খাটানোর নির্দেশ দিলে তা খাটানো হয়। তিনি বলেন, আমি ছাড়া নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অন্যান্য স্ত্রীরাও অনুরূপ তাঁবু খাটানোর নির্দেশ দিলে তাদের জন্যও তা খাটানো হয়। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাজর সলাতের পর তাবুঁগুলোর দিকে তাকিয়ে জিজ্ঞেস করলেনঃ এগুলো কি? এটা এমন কি ভালো কাজ যা তোমরা করতে চাইছো? ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি নির্দেশ দিলে তাঁর তাঁবু ভেঙ্গে ফেলা হলো। স্ত্রীগণও নির্দেশ দিলে তাঁদের তাঁবুগুলোও ভেঙ্গে ফেলা হলো। অতঃপর তিনি শাওয়াল মাসের প্রথম দশক পর্যন্ত ই‘তিকাফ পিছিয়ে দেন।



ইমামা আবু দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস ইবনু ইসহাক্ব ও আল-আওযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) ইয়াহিয়া ইবনু সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। কিন্তু ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ সূত্রে বর্ণনা করে বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শাওয়াল মাসে বিশ দিন ই‘তিকাফ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2033) صحیح مسلم (1173) ، مشکوۃ المصابیح (2104)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري، وعَمرَة: هي بنت عبد الرحمن الأنصارية. وأخرجه مسلم (١١٧٣)، ومختصراً الترمذي (٨٠١) من طريق أبي معاوية، وابن ماجه (١٧٧١)، والنسائي في "الكبرى" (٧٩٠) من طريق يعلى بن عُبيد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٠٣٣) و (٢٠٣٤) و (٢٠٤١)، ومسلم (١١٧٣)، والنسائي (٣٣٣٣) من طرق عن يحيى بن سعيد، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٤٤)، و "صحيح ابن حبان" (٣٦٦٦). قال الخطابي: فيه من الفقه أن المعتكف يبتدئ اعتكافه أول النهار، ويدخل في معتكَفه بعد أن يصلي الفجر، وإليه ذهب الأوزاعي، وبه قال أبو ثور. وقال مالك والشافعي وأحمد: يدخل في الاعتكاف قبل غروب الشمس إذا أراد اعتكاف شهر بعينه، وهو مذهب أصحاب الرأي.









সুনান আবী দাউদ (2465)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ يُونُسَ، أَنَّ نَافِعًا، أَخْبَرَهُ عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَعْتَكِفُ الْعَشْرَ الأَوَاخِرَ مِنْ رَمَضَانَ ‏.‏ قَالَ نَافِعٌ وَقَدْ أَرَانِي عَبْدُ اللَّهِ الْمَكَانَ الَّذِي يَعْتَكِفُ فِيهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنَ الْمَسْجِدِ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাযান মাসের শেষ দশকে ই‘তিকাফ করতেন। নাফি‘ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদের যে স্থানে ই‘তিকাফ করতেন ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঐ স্থানটি আমাকে দেখিয়েছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح م خ دون قول نافع وقد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2025) صحیح مسلم (1171)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن وَهب: هو عبد الله القرشي، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، ونافع: هو مولى ابن عمر. وأخرجه البخاري (٢٠٢٥)، ومسلم (١١٧١)، وابن ماجه (١٧٧٣) من طريق ابن وَهب، بهذا الإسناد. ورواية البخاري ليس فيها قولُ نافع. وأخرجه مسلم كذلك دون قول نافع (١١٧١) من طريق موسى بن عقبة، عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٦١٧٢).









সুনান আবী দাউদ (2466)


حَدَّثَنَا هَنَّادٌ، عَنْ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ أَبِي حَصِينٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَعْتَكِفُ كُلَّ رَمَضَانَ عَشَرَةَ أَيَّامٍ فَلَمَّا كَانَ الْعَامُ الَّذِي قُبِضَ فِيهِ اعْتَكَفَ عِشْرِينَ يَوْمًا ‏.‏




আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি রমাযানে দশ দিন ই‘তিকাফ করতেন। কিন্তু যে বছর তিনি মৃত্যুবরণ করেন সে বছর বিশ দিন ই‘তিকাফ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2044)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هناد: هو ابن السري، وأبو بكر: هو ابن عياش، وأبو حَصين: هو عثمان بن عاصم الأسَدي، وأبو صالح: هو ذكوان السمّان. وأخرجه البخاري (٢٠٤٤) و (٤٩٩٨)، وابن ماجه (١٧٦٩)، والنسائي في "الكبرى" (٣٣٢٩) و (٧٩٣٨) من طريق أبي بكر، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٤٣٥). وإنما اعتكف في ذلك العام عشرين، لأنه كان في العام الذي قبله مسافراً، ويدل لذلك ما سلف عند المصنف من حديث أبي بن كعب: أن النبي ﷺ كان يعتكف العشر الأواخر من رمضان، فلم يعتكف عاماً، فلما كان في العام المقبل اعتكف عشرين ليلة، وإسناده صحيح، وأخرجه النسائي ولفظه: أن النبي ﷺ كان يعتكف العشر الأواخر من رمضان، فسافر عاماً، فلم يعتكف، فلما كان العام المقبل اعتكف عشرين.









সুনান আবী দাউদ (2467)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَمْرَةَ بِنْتِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا اعْتَكَفَ يُدْنِي إِلَىَّ رَأْسَهُ فَأُرَجِّلُهُ وَكَانَ لاَ يَدْخُلُ الْبَيْتَ إِلاَّ لِحَاجَةِ الإِنْسَانِ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফরত অবস্থায় স্বীয় মাথা আমার নিকটবর্তী করতেন। আর আমি তাঁর মাথা আঁচড়িয়ে দিতাম এবং তিনি মানবীয় প্রয়োজন ছাড়া ঘরে প্রবেশ করতেন না।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (297)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري. وهو عند مالك في "الموطأ" ٣١٢/ ١، ومن طريقه أخرجه مسلم (٢٩٧)، والنسائي في "الكبرى" (٣٣٦٠). وهو في "مسند أحمد" (٢٤٧٣١). وانظر تمام كلامنا عليه فيه. وانظر تالييه. قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" ٤/ ٢٧٣ التعليق على قوله: إلا لحاجة الإنسان: وفسرها الزهري بالبول والغائط، وقد اتفقوا على استثنائهما، واختلفوا في غيرهما من الحاجات، كالأكل والشرب ، ولو خرج لهما فتوضأ خارج المسجد لم يبطل، ويلتحق بهما القيء والفصد لمن احتاج إليه … وروينا عن علي والنخعي والحسن البصري: إن شهد المعتكف جنازة أو عاد مريضاً أو خرج للجمعة، بطل اعتكافه، وبه قال الكوفيون وابن المنذر في الجمعة، وقال الثوري والشافعي وإسحاق: إن شرط شيئاً من ذلك في ابتداء اعتكافه لم يبطل اعتكافه بفعله، وهو رواية عن أحمد. وانظر "المغني" ٤/ ٤٦٥ - ٤٧١.









সুনান আবী দাউদ (2468)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَلِكَ رَوَاهُ يُونُسُ عَنِ الزُّهْرِيِّ وَلَمْ يُتَابِعْ أَحَدٌ مَالِكًا عَلَى عُرْوَةَ عَنْ عَمْرَةَ وَرَوَاهُ مَعْمَرٌ وَزِيَادُ بْنُ سَعْدٍ وَغَيْرُهُمَا عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে এই সনদে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। ইমাম আবু দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইউনুস (রাহিমাহুল্লাহ) যুহরী হতে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তবে ‘উরওয়াহ ও ‘আমরাহর বর্ণনার উপর কেউই ইমাম মালিকের অনুসরণ করেননি এবং মা‘মার, যিয়াদ ইবনু সা‘দ প্রমুখ যুহরীর মাধ্যমে ‘উরওয়াহ হতে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। [২৪৬৮]



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2029)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعد. وأخرجه البخاري (٢٠٢٩)، ومسلم (٢٩٧)، وابن ماجه (١٧٧٦)، والترمذي (٨١٦)، والنسائي في "الكبرى" (٣٣٦١) من طرق عن الليث، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٨١٥) من طريق مالك، عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٢١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٧٢). وانظر ما قبله وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (2469)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، وَمُسَدَّدٌ، قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَكُونُ مُعْتَكِفًا فِي الْمَسْجِدِ فَيُنَاوِلُنِي رَأْسَهُ مِنْ خَلَلِ الْحُجْرَةِ فَأَغْسِلُ رَأْسَهُ ‏.‏ وَقَالَ مُسَدَّدٌ فَأُرَجِّلُهُ وَأَنَا حَائِضٌ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদে ই‘তিকাফরত অবস্থায় তাঁর ঘরের ফাঁক দিয়ে তাঁর মাথা আমার দিকে এগিয়ে দিতেন। আমি হায়িয অবস্থায় তাঁর মাথা ধুয়ে দিতাম এবং চিরুনী করে দিতাম।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (295، 2030، 5925) صحیح مسلم (297)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مُسَرْهَد الأسَدي. وأخرجه البخاري (٢٩٥) و (٢٩٦) و (٢٠٢٨) وبإثر (٥٩٢٥)، ومسلم (٢٩٧)، وابن ماجه (٦٣٣) و (١٧٧٨) والنسائي في "الكبرى" (٢٦٦) و (٣٣٧١) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢٠٤٦)، ومسلم (٢٩٧)، والنسائي (٣٣٦٩) و (٣٣٧٠) من طرق عن عروة، به. وأخرجه البخاري (٣٠١) و (٢٠٣١). ومسلم (٢٩٧)، والنسائي (٣٣٦٤ - ٣٣٦٦) من طريق الأسود، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٣٨) و (٢٤٦٨٣) و (٢٥٦٨٢)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٥٩). وانظر سابقيه. قال الخطابي: فيه أن المعتكف ممنوع من الخروج من المسجد إلا لغائط أو بول. وفيه أن ترجيل الشعر يجوز للمعتكف، وفي معناه حلق الرأس وتقليم الأظافر، وتنظيف البدن من الشعث والدرن. وفيه أن بدن الحائض طاهر غير نجس. وفيه أن من حلف لا يدخل بيتاً، فأدخل رأسه فيه، وسائر بدنه خارج لم يحنث.









সুনান আবী দাউদ (2470)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ شَبُّويَةَ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنِي عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنٍ، عَنْ صَفِيَّةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مُعْتَكِفًا فَأَتَيْتُهُ أَزُورُهُ لَيْلاً فَحَدَّثْتُهُ ثُمَّ قُمْتُ فَانْقَلَبْتُ فَقَامَ مَعِي لِيَقْلِبَنِي - وَكَانَ مَسْكَنُهَا فِي دَارِ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ - فَمَرَّ رَجُلاَنِ مِنَ الأَنْصَارِ فَلَمَّا رَأَيَا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَسْرَعَا فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ عَلَى رِسْلِكُمَا إِنَّهَا صَفِيَّةُ بِنْتُ حُيَىٍّ ‏"‏ ‏.‏ قَالاَ سُبْحَانَ اللَّهِ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ إِنَّ الشَّيْطَانَ يَجْرِي مِنَ الإِنْسَانِ مَجْرَى الدَّمِ فَخَشِيتُ أَنْ يَقْذِفَ فِي قُلُوبِكُمَا شَيْئًا ‏"‏ ‏.‏ أَوْ قَالَ ‏"‏ شَرًّا ‏"‏ ‏.‏




সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফরত ছিলেন। এক রাতে আমি তাঁর সাথে দেখা করতে যাই। তাঁর সাথে কিছুক্ষণ কথাবার্তার পর আমি ঘরে প্রত্যাবর্তনের উদ্দেশ্যে দাঁড়ালে তিনিও আমাকে এগিয়ে দিতে উঠলেন। তার (সাফিয়্যাহর) বাসস্থান ছিলো উসামাহ ইবনু যায়িদের ঘরের সাথে। দু’জন আনসারী ব্যক্তি ঐ পথ অতিক্রমকালে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে দেখতে পেয়ে দ্রুত চলে যেতে লাগলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমরা স্বাভাবিক গতিতে হাঁটো। এ মহিলাটি হচ্ছেন হুয়াইর কন্যা সাফিয়্যাহ। তারা উভয়ে বললেন, সুবহানাল্লাহ, হে আল্লাহ রাসূল। তিনি বললেনঃ শয়তান রক্তপ্রবাহের ন্যায় মানুষের শিরায়-উপশিরায় প্রবেশ করে। আমার আশঙ্কা হলো, সে তোমাদের মনে কুধারণা বা খারাপ কিছুর উদ্রেক করতে পারে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3281) صحیح مسلم (2175)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الرزاق: هو ابن همام الصنعاني، ومعمر: هو ابن راشد، والزهري: هو محمد بن مسلم ابن شهاب، وعلي بن الحسين: هو ابن علي بن أبي طالب زين العابدين. وهو عند عبد الرزاق في "مصنفه" (٨٠٦٥)، ومن طريقه أخرجه البخاري (٣٢٨١)، ومسلم (٢١٧٥)، والنسائي في "الكبرى" (٣٣٤٣). وأخرجه البخاري (٢٠٣٨) و (٢٠٣٩) و (٣١٠١) و (٦٢١٩) و (٧١٧١)، وابن ماجه (١٧٧٩)، والنسائي (٣٣٤٢) من طرق عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٨٦٣)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٧١). وسيتكرر برقم (٤٩٩٤). وانظر ما بعده. وفي الحديث من الفوائد جواز اشتغاله المعتكف بالأمور المباحة من تشييع زائره، والقيام معه، والحديث مع غيره، وإباحة خلوة المعتكف بالزوجة، وزيارة المرأة للمعتكف، وبيان شفقته ﷺ على أمته، وإرشادهم إلى ما يدفع عنهم الإثم، وفيه التحرز من التعرض لسوء الظن، والاحتفاظ من كيد الشيطان والاعتذار. قال ابن دقيق العيد: وهذا متأكد في حق العلماء، ومن يقتدى به فلا يجوز لهم أن يفعلوا فعلاً يوجب سوء الظن بهم، وإن كان لهم فيه مخلص، لأن ذلك سبب إلى إبطال الانتفاع بعلمهم، ومن ثم قال بعض العلماء: ينبغي للحاكم أن يبين للمحكوم عليه وجه الحكم إذا كان خافياً نفياً للتهمة.









সুনান আবী দাউদ (2471)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا أَبُو الْيَمَانِ، أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِإِسْنَادِهِ بِهَذَا قَالَتْ حَتَّى إِذَا كَانَ عِنْدَ بَابِ الْمَسْجِدِ الَّذِي عِنْدَ بَابِ أُمِّ سَلَمَةَ مَرَّ بِهِمَا رَجُلاَنِ ‏.‏ وَسَاقَ مَعْنَاهُ ‏.‏




আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, এই সানাদে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি যখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর দরজার নিকটস্থ মাসজিদের দরজা পর্যন্ত পৌছলেন তখন তাঁদের পাশ দিয়ে দু’জন লোক অতিক্রম করলো। অতঃপর বর্ণনাকারী উপরোক্ত হাদীসটির অর্থে বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2035)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو اليمان: هو الحكم بن نافع البَهراني، وشعيب: هو ابن أبي حمزة الأموي مولاهم. وأخرجه البخاري (٢٠٣٥) و (٦٢١٩)، ومسلم (٢١٧٥) من طريق أبي اليمان، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤٤٩٦) و (٤٤٩٧). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (2472)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، وَمُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ السَّلاَمِ بْنُ حَرْبٍ، أَخْبَرَنَا اللَّيْثُ بْنُ أَبِي سُلَيْمٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْقَاسِمِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - قَالَ النُّفَيْلِيُّ - قَالَتْ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَمُرُّ بِالْمَرِيضِ وَهُوَ مُعْتَكِفٌ فَيَمُرُّ كَمَا هُوَ وَلاَ يُعَرِّجُ يَسْأَلُ عَنْهُ ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ عِيسَى قَالَتْ إِنْ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَعُودُ الْمَرِيضَ وَهُوَ مُعْتَكِفٌ ‏.




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফরত অবস্থায় রোগীর কাছে যেতেন এবং তাকে দেখেই চলে যেতেন, সেখানে (অবস্থান করে) তাকে কিছু জিজ্ঞেস করতেন না। ইবনু ঈসার (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনায় রয়েছেঃ ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ই‘তিকাফ অবস্থায় রোগী দেখতে যেতেন। [২৪৭২]



দুর্বলঃ মিশকাত (২১০৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، لیث بن أبي سلیم ضعیف ، (انوار الصحیفہ ص 91)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح من فعل عائشة، وهذا إسناد ضعيف لضعف الليث بن أبي سُلَيم. وأخرجه البيهقي ٤/ ٣٢١ من طريق المصنف، بهذا الإسناد. وأخرجه من فعل عائشة مسلم في "صحيحه" (٢٩٧) من طريقين عن الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن عروة وعمرة بنت عبد الرحمن، أن عائشة زوج النبي ﷺ قالت: إن كنت لأدخل البيت للحاجة والمريض فيه فما أسأل عنه إلا وأنا مارة، وإن كان رسول الله ﷺ لَيُدخِلُ عليَّ رأسه وهو في المسجد فأرجله، وكان لا يدخل البيت إلا لحاجة إذا كان معتكفاً.









সুনান আবী দাউদ (2473)


حَدَّثَنَا وَهْبُ بْنُ بَقِيَّةَ، أَخْبَرَنَا خَالِدٌ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ إِسْحَاقَ - عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّهَا قَالَتِ السُّنَّةُ عَلَى الْمُعْتَكِفِ أَنْ لاَ يَعُودَ مَرِيضًا وَلاَ يَشْهَدَ جَنَازَةً وَلاَ يَمَسَّ امْرَأَةً وَلاَ يُبَاشِرَهَا وَلاَ يَخْرُجَ لِحَاجَةٍ إِلاَّ لِمَا لاَ بُدَّ مِنْهُ وَلاَ اعْتِكَافَ إِلاَّ بِصَوْمٍ وَلاَ اعْتِكَافَ إِلاَّ فِي مَسْجِدٍ جَامِعٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ غَيْرُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ إِسْحَاقَ لاَ يَقُولُ فِيهِ قَالَتِ السُّنَّةُ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ جَعَلَهُ قَوْلَ عَائِشَةَ ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ই‘তিকাফকারীর জন্য সুন্নাত হলোঃ সে কোন রোগী দেখতে যাবে না, জানাযায় অংশগ্রহণ করবে না, স্ত্রীকে স্পর্শ করবে না, তার সাথে সহবাস করবে না এবং অধিক প্রয়োজন ছাড়া বাইরে যাবে না, সওম না রেখে ই‘তিকাফ করবে না এবং জামে মাসজিদে ই‘তিকাফ করবে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘উল্লিখিত বিষয়গুলোকে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুন্নাত বলেছেন’ এ কথাটি ‘আবদুর রহমান ইবনু ইসহাক্ব ব্যতীত অন্য কেউ বলেননি। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তিনি একে ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর উক্তি হিসেবে চিহ্নিত করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، الزھري صرح بالسماع عند الطبراني في مسند الشامیین (2910)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. عبد الرحمن بن إسحاق مختلفَ فيه، وثقه يحيى بن معين وأثنى عليه غيره، وتكلم فيه بعضُهم، فهو حسن الحديث، وقد أخرج له مسلم حديثاً واحداً متابعة. وقول أبي داود بإثره غير عبد الرحمن بن إسحاق لا يقول فيه: قالت: السنة، جعله من قول عائشة فيه نظر. فقد روى الحديث البيهقى في "سننه" ٤/ ٣١٥ و٣٢٠ من طريق الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، به. وفيه: إن السنة في المعتكف أن لا يخرج إلا للحاجة التي لا بد منها، ولا يعود مريضاً، ولا يمسَّ امرأة ولا يباشرها، ولا اعتكافَ إلا في مسجد جماعه، والسنة فيمن اعتكف الصومُ. وأخرجه الدارقطني (٢٣٦٣) عن عبد الملك بن جريج، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير عن عائشة، أنها أخبرتهما: أن رسول الله ﷺ كان يعتكف العشر الأواخر من شهر رمضان حتى توفاه الله، ثم اعتكفَهنَّ أزواجه من بعده، وأن السنة للمعتكف أن لا يخرج إلا لحاجة الإنسان، ولا يتغ جِنازة، ولا يعود مريضاً، ولا يمس امرأةً، ولا يباشرها، ولا اعتكاف إلا في مسجدِ جماعةٍ، ويأمر مَن اعتكف أن يصومَ. وذكر البيهقي في "السنن" ٤/ ٣٢١ أن كثيراً من الحفاظ يقولون: إن هذا الكلام قولُ مَن دُون عائشةَ، وأن من أدرجه في الحديث وهمَ فيه، فقد رواه سفيان الثوري عن هشام بن عروة، عن عروة، قال: المعتكف لا يشهد جنازه ولا يعود مريضاً ولا يجيبُ دعوة ولا اعتكاف إلا بصيام. قال ابن التركماني: جَعلُ هذا الكلام من قول مَن دونَ عائشةَ دعوى، بل هو معطوف على ما تقدَّم من قولها: السنة كذا وكذا، وهذا عند المحدثين من قسم المرفوع. رواه عروة عن عائشة مرةً، وأفتى به مرة أخرى، وقد أخرجه الدارقطني (٢٣٦٣) من حديث القاسم بن معن، عن ابن جريج، عن الزهري، بسنده. وفي آخره: ويؤمَرُ من اعتكف أن يصومَ. وأخرجه أيضاً (٢٣٦٤) من حديث الحجاج، عن ابن جريج، بسنده. وفي آخره: وسنةُ من اعتكف أن يصومَ. وانظر كلام الحافظ في"الفتح" ٤/ ٢٧٣. قال الخطابي في "المعالم": قولها: السنة، إن كانت أرادت بذلك إضافة هذه الأمور إلى النبي ﷺ قولاً أو فعلاً، فهي نصوص لا يجوز خلافها، وإن كانت أرادت الفتيا على معاني ما عقلت من السنة فقد خالفها بعض الصحابة في بعض هذه الأمور، والصحابة إذا اختلفوا في مسألة كان سبيلها النظر … ويشبه أن يكون أرادت بقولها: لا يعود مريضاً، أي: لا يخرج من معتكفه قاصداً عيادته وأنه لا يضيق عليه أن يمر به فيسأله غير معرج عليه كما في الحديث السالف. وقولها: لا اعتكاف إلا في مسجد جامع، فقد يحتمل أن يكون معناه نفي الفضيلة والكمال وإنما يكره الاعتكاف في غير الجامع لمن نذر اعتكافاً أكثر من جمعة لئلا تفوته صلاة الجمعة، فأما من كان اعتكافه دون ذلك فلا بأس به، والجامع وغيره سواء في ذلك. والله أعلم.









সুনান আবী দাউদ (2474)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بُدَيْلٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ عُمَرَ، - رضى الله عنه - جَعَلَ عَلَيْهِ أَنْ يَعْتَكِفَ فِي الْجَاهِلِيَّةِ لَيْلَةً أَوْ يَوْمًا عِنْدَ الْكَعْبَةِ فَسَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏ "‏ اعْتَكِفْ وَصُمْ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাহিলী যুগে মানত করেছিলেন যে, তিনি এক রাত বা এক দিন কা‘বা ঘরের চত্বরে ই‘তিকাফ করবেন। তিনি এ বিষয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেনঃ ই‘তিকাফ করো এবং সওম পালন করো।



সহীহঃ তবে “অথবা একদিন” এবং “সওম পালন করো” - এ কথাটুকু বাদে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح دون قوله أو يوما وقوله وصم ق




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال أبو بکر النیسا بوري: ’’ ھذا حدیث منکروابن بدیل ضعیف الحدیث‘‘ (سنن الدارقطني 200/2،201) ، والحدیث الصحیح لیس فیہ ’’وصم ‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 91)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح بغير هذه السياقة، وهذا إسناد ضعيف، في سنده عبد الله بن بُديل -وهو الخزاعي، ويقال: الليثي المكي- وهو ضعيف، وقد ذكر ابن عدي والدارقطني أنه تفرد بذلك عن عمرو بن دينار، وروايةُ مَن روى يوماً شاذة. وقد رواه البخاري (٢٠٣٢)، ومسلم (١٦٥٦) من طرق عن يحيى بن سعيد القطان، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، أن عمر سأل النبي ﷺ قال: كنت نذرت في الجاهلية أن أعتكف ليلةً في المسجد الحرام؟ فقال: أوفِ بنذرك. وسيأتي عند المصنف برقم (٣٣٢٥). قال النووي في "شرح مسلم": اختلف العلماءُ في صحة نذر الكافر فقال مالك وأبو حنيفة وسائر الكوفيين وجمهور أصحابنا: لا يصح، وقال الميرة المخزومي وأبو ثور والبخاري وابن جرير وبعض أصحابنا: يصح، وحجتهم ظاهر حديث عمر هذا، وأجاب الأولون عنه: أنه محمول على الاستحباب، أي: يستحب لك أن تفعل الآن مثل ذلك الذي نذرته في الجاهلية.









সুনান আবী দাউদ (2475)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبَانَ بْنِ صَالِحٍ الْقُرَشِيِّ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مُحَمَّدٍ، - يَعْنِي الْعَنْقَزِيَّ - عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُدَيْلٍ، بِإِسْنَادِهِ نَحْوَهُ قَالَ فَبَيْنَمَا هُوَ مُعْتَكِفٌ إِذْ كَبَّرَ النَّاسُ فَقَالَ مَا هَذَا يَا عَبْدَ اللَّهِ قَالَ سَبْىُ هَوَازِنَ أَعْتَقَهُمُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم قَالَ وَتِلْكَ الْجَارِيَةُ ‏.‏ فَأَرْسَلَهَا مَعَهُمْ ‏.‏




‘আবদুল্লাহ ইবনু বুদাইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, উক্ত সানাদে পূর্বোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। একদা ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ই‘তিকাফরত অবস্থায় মাসজিদের বাইরে লোকদের তাকবীর ধ্বনি শুনে জিজ্ঞেস করলেন, হে ‘আব্দুল্লাহ! এটা কিসের শব্দ? তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাওয়াযিন গোত্রের বন্দীদের মুক্ত করে দিয়েছেন। তিনি বললেন, তুমি এ দাসীটিকেও (মুক্ত করে) তাদের সাথে পাঠিয়ে দাও।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، انظر الحدیث السابق (2474) ، وقصۃ عتق سبي ھوازن صحیحۃ،انظر صحیح البخاري (4318،4319) ، (انوار الصحیفہ ص 91)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون قوله: "وصم" كما سلف قبله. عمرو بن محمد: هو العَنقَزي. وأخرجه بنحوه مسلم (١٦٥٦) من طريق أيوب السختياني، عن نافع، عن ابن عمر. وليس فيه ذكر الصيام.









সুনান আবী দাউদ (2476)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا يَزِيدُ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتِ اعْتَكَفَتْ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم امْرَأَةٌ مِنْ أَزْوَاجِهِ فَكَانَتْ تَرَى الصُّفْرَةَ وَالْحُمْرَةَ فَرُبَّمَا وَضَعْنَا الطَّسْتَ تَحْتَهَا وَهِيَ تُصَلِّي ‏.‏




‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে তাঁর কোন এক স্ত্রী ই‘তিকাফ করেছিলেন। তাঁর স্রাবের রক্তের রং হলুদ ও লাল দেখা যেতো। আর আমরা কখনো তার (দু’ পায়ের মাঝে) একটি পাত্র রেখে দিতাম। এ অবস্থায় তিনি সলাত আদায় করতেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2037)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمد بن عيسى: هو ابن نَجيح البغدادي، ويزيد: هو ابن زُريع، وخالد: هو ابن مِهران الحذَّاء، وعكرمة: هو مولى ابن عباس. وأخرجه البخاري (٣١٠) و (٢٠٣٧) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (١٧٨٠)، والنساني في "الكبرى" (٣٣٣٢) من طرق عن يزيد ابن زريع، به. وأخرجه البخاري (٣٠٩) و (٣١١) من طريقين عن خالد الحذاء، به. ورواية البخاري الثانية مختصره. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٩٩٨).









সুনান আবী দাউদ (2477)


حَدَّثَنَا مُؤَمَّلُ بْنُ الْفَضْلِ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، - يَعْنِي ابْنَ مُسْلِمٍ - عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، أَنَّ أَعْرَابِيًّا، سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْهِجْرَةِ فَقَالَ ‏"‏ وَيْحَكَ إِنَّ شَأْنَ الْهِجْرَةِ شَدِيدٌ فَهَلْ لَكَ مِنْ إِبِلٍ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَهَلْ تُؤَدِّي صَدَقَتَهَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَاعْمَلْ مِنْ وَرَاءِ الْبِحَارِ فَإِنَّ اللَّهَ لَنْ يَتِرَكَ مِنْ عَمَلِكَ شَيْئًا ‏"‏ ‏.‏




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈক গ্রাম্যলোক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে হিজরাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃহায়! হিজরাতের বিষয়টি খুবই কঠিন। তোমার উট আছে কি? সে বললো হাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি এর সদাক্বাহ দিয়ে থাকো? সে বললো, হাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃতুমি নদীর ওপারে থেকে আমল করে যাও। আল্লাহ তোমার আমলের নেকী কিছুই কমাবেন না।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6165) صحیح مسلم (1865)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد صرح الوليد بن مسلم بسماعه في كل طبقات الإسناد عند مسلم وغيره. وأخرجه البخاري (١٤٥٢)، ومسلم (١٨٦٥)، والنسائي في "الكبرى" (٧٧٣٩)، و (٨٦٤٦) من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١١١٠٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٢٤٩). قال الخطابي: وقوله: "لن يترك" معناه: لن يَنقُصَك، ومن هذا قوله تعالى: ﴿وَلَنْ يَتِرَكُمْ أَعْمَالَكُمْ﴾ [محمد: ٣٥]، والمعنى: أنك قد تدرك بالنية أجر المهاجر وإن أقمتَ من وراء البحار، وسكنت أقصى الأرض. وفيه دلالة على أن الهجرة إنما كان وجوبها على من أطاقها دون من لا يقدر عليها.









সুনান আবী দাউদ (2478)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ، وَعُثْمَانُ، ابْنَا أَبِي شَيْبَةَ قَالاَ حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنِ الْمِقْدَامِ بْنِ شُرَيْحٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ سَأَلْتُ عَائِشَةَ - رضى الله عنها - عَنِ الْبَدَاوَةِ، فَقَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَبْدُو إِلَى هَذِهِ التِّلاَعِ وَإِنَّهُ أَرَادَ الْبَدَاوَةَ مَرَّةً فَأَرْسَلَ إِلَىَّ نَاقَةً مُحَرَّمَةً مِنْ إِبِلِ الصَّدَقَةِ فَقَالَ لِي ‏ "‏ يَا عَائِشَةُ ارْفُقِي فَإِنَّ الرِّفْقَ لَمْ يَكُنْ فِي شَىْءٍ قَطُّ إِلاَّ زَانَهُ وَلاَ نُزِعَ مِنْ شَىْءٍ قَطُّ إِلاَّ شَانَهُ ‏"‏ ‏.‏




আল-মিক্বদাম ইবনু শুরাইহ (রঃ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি "আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে ইবাদাতের উদ্দেশে নির্জনবাস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্জনবাসের জন্য এ টিলাভূমিতে যেতেন। তিনি একবার নির্জনবাসে যাওয়ার ইচ্ছা করেন এবং আমার কাছে সদাক্বাহ্‌র একটি আনাড়ী উট পাঠিয়ে দেন। তিনি বললেনঃহে 'আশিয়াহ! সদয় হও। কেননা সহানুভূতি কোন জিনিষের সৌন্দর্যই বৃদ্ধি করে। আর সহানুভূতি উঠে গেলে তা ত্রুটিযুক্ত হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح م دون جملة التلاع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، شریک القاضي تابعہ شعبۃ عند مسلم (2594)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- وإن كان سيئ الحفظ، قد توبع. وأخرجه بنحوه مسلم (٢٥٩٤) من طريق شعبة بن الحجاج، عن المقدام بن شريح، به. لكن ليس فيه ذكر البداوة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٣٠٧) و (٢٤٨٠٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٠). وقد جاء في طريق أحمد الثاني: أن النبي ﷺ خرج إلى البادية إلى إبل الصدقة من طريق إسرائيل عن المقدام. وسيتكرر برقم (٤٨٠٨). قال الخطابي: البداوة: الخروج إلى البدو، والمقام به، وفيه لغتان: البداوة بفتح الباء، والبداوة بكسرها. والناقة المُحرّمة هي التي لم تُركب ولم تذلل فهي غير وطيئة، ويقال: أعرابي محرّم إذا كان جلفاً لم يخالط أهل الحضر، والتلاع: جمع تلعة، وهي ما ارتفع من الأرض وغَلُظ، وكان ما سفل منها مسيلاً لمائها.









সুনান আবী দাউদ (2479)


حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، أَخْبَرَنَا عِيسَى، عَنْ حَرِيزِ بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي عَوْفٍ، عَنْ أَبِي هِنْدٍ، عَنْ مُعَاوِيَةَ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ لاَ تَنْقَطِعُ الْهِجْرَةُ حَتَّى تَنْقَطِعَ التَّوْبَةُ وَلاَ تَنْقَطِعُ التَّوْبَةُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ مِنْ مَغْرِبِهَا ‏"‏ ‏.‏




মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছি: তাওবাহ্‌র দরজা বন্ধ না হওয়া পর্যন্ত হিজরাত শেষ হবে না। আর তাওবাহ্‌র দরজা বন্ধ হবে না যতক্ষণ পশ্চিম দিক হতে সূর্য উদিত না হয়।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2346) ، وللحدیث شاھد عند أحمد (1/192) والطحاوي في مشکل الآثار (3/259)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي هند -وهو البجلي- ولكنه متابع. عيسى: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٨٦٥٨) من طريق حريز بن عثمان، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٩٠٦). وأخرجه أحمد (١٦٧١) من طريق مالك بن يخامر، عن معاوية بن أبي سفيان وعبد الرحمن بن عوف وعبد الله بن عمرو بن العاص. وإسناده حسن. وقوله: لا تنقطع الهجرة … معناه: لا تنقطع الهجرة من دار الكفر إلى دار الإسلام إلى يوم القيامة. قال الإمام البغوي في "شرح السنة" في الجمع بين هذا الحديث وبين حديث ابن عباس: "لا هجرة بعد الفتح": إن قوله: "لا هجرة بعد الفتح" أراد به من مكة إلى المدينة، وإن قوله: "لا تنقطع الهجرة" أراد بها هجرة من أسلم في دار الكفر عليه أن يفارق تلك الدار ويخرج من بنيهم إلى دار الإسلام. وقد فصل الحافظ في "الفتح" في هذه المسألة، فقال: فمن به (أي: في البلد التي لم يفتحها المسلمون) من المسلمين أحد ثلاثة: الأول: قادر على الهجرة منها لا يمكنه إظهار دينه بها، ولا أداء واجباته، فالهجرة منه واجبة. الثاني: قادر، لكنه يمكنه إظهار دينه وأداء واجباته، فمستحبة لتكثير المسلمين بها ومعونتهم … الثالث: عاجز يُعْذَر من أسر أو مرض أو غيره، فتجوز له الإقامة، فإن حمل على نفسه وتكلف الخروج منها أجر.









সুনান আবী দাউদ (2480)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ الْفَتْحِ فَتْحِ مَكَّةَ ‏ "‏ لاَ هِجْرَةَ وَلَكِنْ جِهَادٌ وَنِيَّةٌ وَإِذَا اسْتُنْفِرْتُمْ فَانْفِرُوا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু 'আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ইবনু 'আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণিত। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাক্কাহ বিজয়ের দিন বলেছেন: আর হিজরাত নেই। কিন্তু জিহাদ ও নিয়্যাত থাকবে। এরপর তোমাদের জিহাদের জন্য বেরিয়ে পড়ার নির্দেশ দেয়া হলে তোমরা বেরিয়ে পড়বে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2018)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد الضبّي، ومنصور: هو ابن المعتمر، ومجاهد: هو ابن جبْر المكي، وطاووس: هو ابن كيسان اليماني. وأخرجه البخاري (١٨٣٤)، ومسلم (١٣٥٣)، وبإثر الحديث (١٨٦٣)، والترمذي (١٥٩٠)، والنسائي (٤١٧٠) من طريق منصور بن المعتمر، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٩٩١)، وابن حبان (٣٧٢٠). وأخرج ابن ماجه (٢٧٧٣) من طريق أبي صالح السمان، عن ابن عباس رفعه: "إذا استنفرتم فانفروا". وقوله: ولكن جهاد ونية. قال النووي: يريد أن الخير الذي انقطع بانقطاع الهجرة يمكن تحصيله بالجهاد والنية الصالحة، وإذا أمركم الإمام بالخروج إلى الجهاد ونحوه من الأعمال الصالحة، فاخرجوا إليه.