সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي النَّضْرِ، عَنْ عُمَيْرٍ، مَوْلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ عَنْ أُمِّ الْفَضْلِ بِنْتِ الْحَارِثِ، أَنَّ نَاسًا، تَمَارَوْا عِنْدَهَا يَوْمَ عَرَفَةَ فِي صَوْمِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ بَعْضُهُمْ هُوَ صَائِمٌ . وَقَالَ بَعْضُهُمْ لَيْسَ بِصَائِمٍ . فَأَرْسَلَتْ إِلَيْهِ بِقَدَحِ لَبَنٍ وَهُوَ وَاقِفٌ عَلَى بَعِيرِهِ بِعَرَفَةَ فَشَرِبَ .
আল-হারিস কন্যা উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আরাফাহর দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওম পালন করেছেন কিনা এ নিয়ে কতিপয় লোক তার নিকট বিতর্ক করেন। তাদের কেউ বললেন, তিনি সওম রেখেছেন, আবার কতিপয় বললেন, তিনি সওম রাখেননি। সুতরাং আমি তাঁর কাছে এক পেয়ালা দুধ পাঠালাম, তখন তিনি তাঁর উষ্ট্রীর পিঠের উপর আরাফাহতে অবস্থান করছিলেন। তিনি দুধটুকু পান করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1988) صحیح مسلم (1123)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. القعنبيّ: هو عبد الله بن مسلمة، ومالك: هو ابن أنس، وأبو النضر: هو سالم بن أبي أمية. وهو عند مالك في "الموطأ"١/ ٣٧٥، ومن طريقه أخرجه البخاري (١٦٦١) و (١٩٨٨)، ومسلم (١١٢٣). وأخرجه البخاري (١٦٥٨) و (٥٦٠٤) و (٥٦١٨) و (٥٦٣٦)، ومسلم (١١٢٣) من طرق عيب أبي النضر، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٨٣٢) من طريق عبد الله بن عباس عن أم الفضل. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٨٦٩) و (٢٦٨٧٢)، و"صحيح ابن حبان " (٣٦٠٥) و (٣٦٠٦).
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ يَوْمُ عَاشُورَاءَ يَوْمًا تَصُومُهُ قُرَيْشٌ فِي الْجَاهِلِيَّةِ وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُهُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ فَلَمَّا قَدِمَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ صَامَهُ وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ فَلَمَّا فُرِضَ رَمَضَانُ كَانَ هُوَ الْفَرِيضَةَ وَتُرِكَ عَاشُورَاءُ فَمَنْ شَاءَ صَامَهُ وَمَنْ شَاءَ تَرَكَهُ .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহিলিয়াতের যুগে কুরাইশরা আশূরার সওম পালন করতো। জাহিলী যুগে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -ও এ দিন সওম রাখতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনায় এসে এ দিন সওম রেখেছেন এবং লোকদেরকেও সওম পালনের নির্দেশ দিয়েছেন। অত:পর রমযানের সওম ফরয হলে সেটিই ফরয হিসেবে বহাল হলো এবং আশূরার দিন সওম রাখার আবশ্যকতা পরিত্যক্ত হলো। ফলে যার ইচ্ছা সওম রাখতো এবং যার ইচ্ছা ত্যাগ করতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2002) صحیح مسلم (1125)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو عند مالك في "الموطأ"١/ ٢٩٩، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٠٠٢). وأخرجه البخاري (٣٨٣١) و (٤٥٠٤)، ومسلم (١١٢٥)، والترمذي (٧٦٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٥١) و (١٠٩٤٨) من طرق عن هشام بن عروة، به. وأخرجه مختصراً البخاري (١٥٩٢) و (١٨٩٣) و (٢٠٠١) و (٤٥٠٢)، ومسلم (١١٢٥)، وابن ماجه (١٧٣٣)، والنسائي (٢٨٥٠) و (٢٨٥٢) و (١٠٩٤٩) من طرق عن عروة بن الزبير، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠١١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢١). قال القرطبي: عاشوراء: معدول عن عاشرة للمبالغة والتعظيم، وهو في الأصل: صفة لليلة العاشرة، لأنه مأخوذ من العشر الذي هو اسم العقد واليوم مضاف إليها، فإذا قيل: يوم عاشوراء، فكأنه قيل: يوم الليلة العاشرة إلا أنهم لما عدلوا به عن الصفة غلبت عليه الاسمية، فاستغنوا عن الموصوف، فحذفوا الليلة، فصار هذا اللفظ علماً على اليوم العاشر.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ أَخْبَرَنِي نَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ كَانَ عَاشُورَاءُ يَوْمًا نَصُومُهُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ فَلَمَّا نَزَلَ رَمَضَانُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " هَذَا يَوْمٌ مِنْ أَيَّامِ اللَّهِ فَمَنْ شَاءَ صَامَهُ وَمَنْ شَاءَ تَرَكَهُ " .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আশূরা এমন দিন ছিলো যে, জাহিলী যুগে আমরা এ দিন সওম পালন করতাম। অতঃপর রমাযান মাসের সওম ফারয করা হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এটি আল্লাহর দিনসমূহের একটি দিন। কাজেই যার ইচ্ছা সওম রাখুক, আর যার ইচ্ছা তা ত্যাগ করুক।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (4501) صحیح مسلم (1126)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسَدي، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، وعُبيد الله: هو ابن عمر العمري، ونافع: هو مولى ابن عمر. وأخرجه البخاري (٤٥٠١)، ومسلم (١١٢٦) من طريق يحيى القطان، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٢٦) من طريق عُبيد الله، به. وأخرجه بنحوه مختصراً البخاري (١٨٩٢)، ومسلم (١١٢٦)، وابن ماجه (١٧٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٥٣) من طرق عن نافع، والبخاري (٢٠٠٠)، ومسلم (١١٢٦) من طرق سالم بن عبد الله، كلاهما عن ابن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٥٢٠٣)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢٢).
حَدَّثَنَا زِيَادُ بْنُ أَيُّوبَ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، حَدَّثَنَا أَبُو بِشْرٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ لَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ وَجَدَ الْيَهُودَ يَصُومُونَ عَاشُورَاءَ فَسُئِلُوا عَنْ ذَلِكَ فَقَالُوا هَذَا الْيَوْمُ الَّذِي أَظْهَرَ اللَّهُ فِيهِ مُوسَى عَلَى فِرْعَوْنَ وَنَحْنُ نَصُومُهُ تَعْظِيمًا لَهُ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " نَحْنُ أَوْلَى بِمُوسَى مِنْكُمْ " . وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনাহয় এসে ইয়াহুদীদের আশূরার দিন সওম পালনরত পেলেন। তাদেরকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তারা বললো, এটি একটি মহান দিন, যেদিন মহান আল্লাহ মূসা (আঃ)-কে ফেরাউনের উপর বিজয়ী করেছেন। সুতরাং এ মহান দিনের সম্মানার্থে আমরা সওম পালন করি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমাদের চাইতে আমরা মূসা (আঃ) -এর বেশি হকদার। অতঃপর তিনি ঐদিন সওম পালনের নির্দেশ দেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3943) صحیح مسلم (1130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هُشيم: هو ابن بَشير السُّلمي، وأبو بشر: هو جعفر بن إياس اليشكري. وأخرجه البخاري (٣٩٤٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٤٧) و (١١١٧٣) من طريق زياد بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٣٠) من طريق هُشيم، والبخاري (٤٦٨٠) و (٤٧٣٧)، ومسلم (١١٣٠) من طريق شعبة، كلاهما عن أبي بِشر، به. وأخرجه البخاري (٢٠٠٤) و (٣٣٩٧)، ومسلم (١١٣٠)، والنسائي (٢٨٤٨) و (٢٨٤٩) من طريق عبد الله بن سعيد بن جبير، وابن ماجه (١٧٣٤) من طريق أيوب، كلاهما عن سعيد بن جبير، به. وأخرج الترمذي (٧٦٥) من طريق الحسن البصري، عن ابن عباس، قال: أمرَ رسول الله ﷺ بصوم عاشوراء، يوم عاشِر. وقال: حديث حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٣١٦٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢٥). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ، أَنَّ إِسْمَاعِيلَ بْنَ أُمَيَّةَ الْقُرَشِيَّ، حَدَّثَهُ أَنَّهُ، سَمِعَ أَبَا غَطَفَانَ، يَقُولُ سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَبَّاسٍ، يَقُولُ حِينَ صَامَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ عَاشُورَاءَ وَأَمَرَنَا بِصِيَامِهِ قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّهُ يَوْمٌ تُعَظِّمُهُ الْيَهُودُ وَالنَّصَارَى . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " فَإِذَا كَانَ الْعَامُ الْمُقْبِلُ صُمْنَا يَوْمَ التَّاسِعِ " . فَلَمْ يَأْتِ الْعَامُ الْمُقْبِلُ حَتَّى تُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন নিজে আশূরার দিন সওম রাখলেন এবং আমাদেরকেও এ সওম পালনের নির্দেশ দেন, তখন লোকেরা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! ইয়াহুদী ও খৃষ্টানরা এ দিনটিকে সম্মান করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আগামী বছর এলে আমরা নবম দিনও সওম পালন করবো। কিন্ত আগামী বছর না আসতেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইনতিকাল করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1134)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله المصري، ويحيي بن أيوب: هو الغافقي المصري، وأبو غَطَفَان: هو ابن طَريف المُري. وأخرجه مسلم (١١٣٤) من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم، عن يحيي بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم أيضاً (١١٣٤) من طريق عبد الله بن عُمَير، عن ابن عباس مرفوعاً بلفظ: "لأصومن التاسع". وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ سَعِيدٍ - عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ غَلاَبٍ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، أَخْبَرَنِي حَاجِبُ بْنُ عُمَرَ، - جَمِيعًا الْمَعْنَى - عَنِ الْحَكَمِ بْنِ الأَعْرَجِ، قَالَ أَتَيْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ وَهُوَ مُتَوَسِّدٌ رِدَاءَهُ فِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ فَسَأَلْتُهُ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَاشُورَاءَ فَقَالَ إِذَا رَأَيْتَ هِلاَلَ الْمُحَرَّمِ فَاعْدُدْ فَإِذَا كَانَ يَوْمُ التَّاسِعِ فَأَصْبِحْ صَائِمًا . فَقُلْتُ كَذَا كَانَ مُحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ فَقَالَ كَذَلِكَ كَانَ مُحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ .
আল-হাকাম ইবনু আ‘রাজ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট এলাম। এ সময় তিনি মাসজিদুল হারামে তার চাঁদরে হেলান দেয়া অবস্থায় ছিলেন। আমি তাকে আশূরার সওম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, যখন তুমি মুহাররমের নতুন চাঁদ দেখবে, তখন থেকে গণনা করতে থাকবে। এভাবে যখন নবম দিন আসবে তখন সওম অবস্থায় ভোর করবে। আমি জিজ্ঞেস করলাম, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এভাবে সওম রাখতেন? তিনি বলেন, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1133)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مسرهد الأسَدي، ويحيى بن سعيد: هو القطان، ومعاوية بن غَلَاب: هو معاوية بن عمرو بن خالد بن غَلَاب، وإسماعيل: هو ابن إبراهيم الأسدي، والحكم بن الأعرج: هو الحكم بن عبد الله بن إسحاق البصري. وأخرجه مسلم (١١٣٣)، والنسائي في "الكبرى" (٢٨٧٢) من طريق يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١١٣٣)، والترمذي (٧٦٤) من طريق وكيع بن الجراح، عن حاجب بن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٢١٣٥)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٣٣). وانظر ما قبله. قال ابن القيم في "تهذيب السنن ": والصحيح أن المراد صوم التاسع مع العاشر لا نقل اليوم لما روى أحمد في "مسنده" (٢١٥٤) من حديث ابن عباس يرفعه إلى النبيَّ ﷺ قال: "خالفوا اليهود صوموا يوماً قبله أو يوماً بعده". وقال عطاء عن ابن عباس: "صوموا التاسع والعاشر، وخالفوا اليهود" ذكره البيهقي، وهو يبين أن قول ابن عباس: إذا رأيت هلال المحرم فاعدد، فإذا كان يوم التاسع فأصبح صائماً، أنه ليس المراد به: أن عاشوراء هو التاسع، بل أمره أن يصوم اليوم التاسع قبل عاشوراء.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمِنْهَالِ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ مَسْلَمَةَ، عَنْ عَمِّهِ، أَنَّ أَسْلَمَ، أَتَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ " صُمْتُمْ يَوْمَكُمْ هَذَا " . قَالُوا لاَ . قَالَ " فَأَتِمُّوا بَقِيَّةَ يَوْمِكُمْ وَاقْضُوهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ يَعْنِي يَوْمَ عَاشُورَاءَ .
‘আব্দুর রহমান ইবনু মাসলামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার চাচা হতে বর্ণিত, একদা আসলাম গোত্রের লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আগমন করলে তিনি বললেনঃ তোমরা কি তোমাদের এই দিনে সওম রেখেছো? তারা বললো, না। তিনি বললেনঃ দিনের বাকী অংশটুকু (পানাহার না করে) পূর্ণ করো এবং এদিনের সওম ক্বাযা করে নাও। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ আশূরার দিন। [২৪৪৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عبد الرحمٰن بن مسلمۃ مجہول ، انظر التحریر (3884) لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره دون قوله: "فاقضوه" فإنها زيادة تفرد بها عبد الرحمن ابن مسلمة -ويقال: ابن سلمة- الخزاعي، وهو مجهول. سعيد: هو ابن أبي عروبة، وقتادة: هو ابن دعامة السدوسي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٨٦٤) و (٢٨٦٥) من طريق سعيد، بهذا الإسناد. دون قوله: "واقضوه". وأخرجه النسائى أيضاً (٢٨٦٣) من طريق شعبة، عن قتادة، به. دون قوله: "واقضوه". وهو في "مسند أحمد" (٢٣٤٧٥). وله شاهد من حديث هند بن أسماء عند أحمد في "مسنده" (١٥٩٦٢). وانظر تتمة شواهده والكلام عليه في "المسند".
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَمُسَدَّدٌ، - وَالإِخْبَارُ فِي حَدِيثِ أَحْمَدَ - قَالُوا حَدَّثَنَا سُفْيَانُ قَالَ سَمِعْتُ عَمْرًا قَالَ أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ أَوْسٍ سَمِعَهُ مِنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو قَالَ قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَحَبُّ الصِّيَامِ إِلَى اللَّهِ تَعَالَى صِيَامُ دَاوُدَ وَأَحَبُّ الصَّلاَةِ إِلَى اللَّهِ صَلاَةُ دَاوُدَ كَانَ يَنَامُ نِصْفَهُ وَيَقُومُ ثُلُثَهُ وَيَنَامُ سُدُسَهُ وَكَانَ يُفْطِرُ يَوْمًا وَيَصُومُ يَوْمًا " .
‘আব্দুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেনঃ আল্লাহর নিকট সর্বোত্তম সওম হলো দাঊদ (আঃ) -এর সওম এবং আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় সলাত হলো দাঊদ (আঃ) -এর সলাত। তিনি রাতের অর্ধেক অংশ ঘুমাতেন এবং এক-তৃতীয়াংশ ক্বিয়াম করতেন। আবার এক ষষ্ঠমাংশ ঘুমাতেন। আর তিনি একদিন সওম ত্যাগ করতেন এবং একদিন সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1131) صحیح مسلم (1159)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. محمد بن عيسى: هو ابن نَجِيح البغدادي، ومُسدَّد: هو ابنُ مسرهد الأسَدي، وسفيان: هو ابن عيينة، وعمرو: هو ابن دينار المكي. وأخرجه البخاري (١١٣١) و (٣٤٢٠)، ومسلم (١١٥٩)، وابن ماجه (١٧١٢)، والنسائي في "الكبرى" (١٣٢٩) و (٢٦٦٥) من طرق عن سفيان بن عيينة، ومسلم (١١٥٩) من طريق ابن جريج، كلاهما عن عمرو بن دينار، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١١٥٣) و (١٩٧٤ - ١٩٨٠) و (٣٤١٨ - ٣٤٢٠) و (٥٠٥٢) و (٦١٣٤) و (٦٢٧٧)، ومسلم (١١٥٩)، والترمذي (٧٨٠)، والنسائي (٢٧٠٩ - ٢٧٢٤) من طرق عن عبد الله بن عمرو بن العاص. واقتصروا جميعاً في رواياتهم على ذكر صوم داود دون صلاته، وعندهم أن هذا الحديث ضمن قصة لعبد الله بن عمرو نفسه. وهو في "مسند أحمد" (٦٤٩١)، و"صحيح ابن حبان" (٢٥٩٠). وانظر ما سلف برقم (٢٤٢٥) و (٢٤٢٧).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ أَنَسٍ، أَخِي مُحَمَّدٍ عَنِ ابْنِ مِلْحَانَ الْقَيْسِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنَا أَنْ نَصُومَ الْبِيضَ ثَلاَثَ عَشْرَةَ وَأَرْبَعَ عَشْرَةَ وَخَمْسَ عَشْرَةَ . قَالَ وَقَالَ " هُنَّ كَهَيْئَةِ الدَّهْرِ " .
ইবনু মিলহান আল-ক্বায়সী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আইয়ামে বীয অর্থৎ চাদেঁর ১৩, ১৪ ও ১৫ তারিখে সওম পালনে আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ এগুলো সারা বছর সওম রাখার সমতুল্য।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (2432-2434) ابن ماجہ (1707) ، ابن ملحان: عبدالملک بن قتادۃ مستور،لم یوثقہ غیر ابن حبان ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة ابن مِلحَان القَيْسِيُّ -وهو عبد الملك بن قتادة-. محمد بن كثير: هو العَبْدي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي، وأنس: هو ابن سيرين الأنصاري. وأخرجه ابن ماجه (١٧٠٧ م)، والنسائي في "الكبرى" (٢٧٥٢) من طريق همام، بهذا الإسناد. ورواية النسائي دون قوله: "هن كهيئة الدهر". وأخطأ شعبة في تسمية ابن مِلحَان القيسي كما أخرجه عند ابن ماجه (١٧٠٧) فقال: عن أنس، عن عبد الملك بن المِنهال، وعند النسائي في "الكبرى" (٢٧٥٠) قال: عن أنس، عن عبد الملك. ولم يُسمِّه، و (٢٧٥١) قال: عن أنس، عن ابن أبي المِنهَال، والصواب كما أسلفنا أنه: عبد الملك بن قتادة. والله أعلم. وهو في "مسند أحمد" (١٧٥١٤)، وفي "صحيح ابن حبان" (٣٦٥١). ويشهد له حديث قُرّة بن إياس عند أحمد في "مسنده" (١٥٥٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٥٢). وإسناده صحيح. وآخر عند أبي ذرّ عند أحمد (٢١٣٠١)، وابن ماجه (١٧٠٨)، والترمذي (٧٧٢). ورجاله ثقات لكن فيه انقطاع. وثالث عن جرير بن عبد الله عند النسائي في "الكبرى" (٢٧٤١). وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب " ٢/ ١٢٤. وفي الحث على صيام ثلاثة أيام من كل شهر أيضاً شواهد انظرها في "المسند" (١٧٥١٣). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَبُو كَامِلٍ، حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، حَدَّثَنَا شَيْبَانُ، عَنْ عَاصِمٍ، عَنْ زِرٍّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ - يَعْنِي مِنْ غُرَّةِ كُلِّ شَهْرٍ - ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ .
‘আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি মাসের প্রথম দিকে তিনদিন সওম পালন করতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2058) ، أخرجہ الترمذي (742 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل عاصم -وهو ابن أبي النَّجُود- فإنه حسن الحديث. أبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي، وشيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي المؤدب، وزر: هو ابن حُبيش، وعبد الله: هو ابن مسعود. وهو عند أبي داود الطيالسي في "مسنده" (٣٦٠) ومن طريقه أخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٧٧١)، وأخرجه الترمذي (٧٥٢) من طريق طلق بن غنام، كلاهما عن شيبان، بهذا الإسناد. وزاد الترمذي والنسائى: وقَلَّما كان يفطر يوم الجمعة، وقال الترمذي: حديث حسن غريب. وأخرجه النسائي (٢٦٨٩) من طريق أبي حمزة، عن عاصم، به. وزاد: وقلما يفطر يوم الجمعة. وهذه الزيادة أخرجها الطيالسي منفصلة برقم (٣٥٩)، ومن طريقه ابن ماجه (١٧٢٥). وهو في "مسند أحمد" (٣٨٦٠)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٤١) و (٣٦٤٥).
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ عَاصِمِ بْنِ بَهْدَلَةَ، عَنْ سَوَاءٍ الْخُزَاعِيِّ، عَنْ حَفْصَةَ، قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ مِنَ الشَّهْرِ الاِثْنَيْنِ وَالْخَمِيسِ وَالاِثْنَيْنِ مِنَ الْجُمُعَةِ الأُخْرَى .
হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি মাসে তিন দিন সওম রাখতেনঃ (প্রথম সপ্তাহে) সোমবার ও বৃহস্পতিবার এবং দ্বিতীয় সপ্তাহে সোমবার।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (2368 وسندہ حسن) سواء الخزاعي وثقہ ابن حبان وابن خزیمۃ بتصحیح حدیثہ فھو حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة حال سَوَاء الخُزاعي، ثم إن الإسناد منقطع بين عاصم -وهو ابن أبي النجود- وسَوَاء الخزاعي، بينهما المسيب بن رافع، أو معبد بن خالد، وعاصم بن أبي النَّجود تكلموا في حفظه، وقد اضطرب، وانظر تمام ذلك كما بيناه في "مسند أحمد" برقم (٢٦٤٦٠). حماد: هو ابن سلمة البصري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٦٨٧) من طريق النضر بن شُميل، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي أيضاً (٢٨٠٠) من طريق زائدة، عن عاصم، عن المسيّب، عن حفصة، به. مختصراً بلفظ: كان رسول الله ﷺ يصوم الاثنين والخميس. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٦٠) و (٢٦٤٦١).
حَدَّثَنَا زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ هُنَيْدَةَ الْخُزَاعِيِّ، عَنْ أُمِّهِ، قَالَتْ دَخَلْتُ عَلَى أُمِّ سَلَمَةَ فَسَأَلْتُهَا عَنِ الصِّيَامِ فَقَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُنِي أَنْ أَصُومَ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ أَوَّلُهَا الاِثْنَيْنِ وَالْخَمِيسِ .
হুনাইদাহ আল-খুযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার মা হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কাছে গিয়ে সওম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে প্রতি মাসে তিন দিন সওম পালনের নির্দেশ দিতেন। মাসের প্রথম সপ্তাহের সোমবার ও বৃহস্পতিবার এবং (দ্বিতীয় সপ্তাহের) বৃহস্পতিবার। [২৪৫২]
মুনকারঃ মিশকাত (২০৬০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: منكر
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2060)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث ضعيف لاضطرابه كما سلف برقم (٢٤٣٧). وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٧٤٠) من طريق محمد بن فضيل، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٨٠).
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنْ يَزِيدَ الرِّشْكِ، عَنْ مُعَاذَةَ، قَالَتْ قُلْتُ لِعَائِشَةَ أَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَصُومُ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ قَالَتْ نَعَمْ . قُلْتُ مِنْ أَىِّ شَهْرٍ كَانَ يَصُومُ قَالَتْ مَا كَانَ يُبَالِي مِنْ أَىِّ أَيَّامِ الشَّهْرِ كَانَ يَصُومُ .
মু‘আযাহ (রাহঃ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে জিজ্ঞেস করি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি প্রত্যেক মাসে তিন দিন সওম পালন করতেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ। আমি জিজ্ঞেস করি , মাসের কোন্ কোন্ দিনে সওম রাখতেন? তিনি বললেন, তিনি নির্দিধায় যে কোন তিন দিন সওম রাখতেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1160)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّدٌ: هو ابن مُسَرهَد الأسدي ، وعبد الوارث: هو ابن سعيد، ويزيد الرّشك -والرشك: القسَّام بلغة أهل البصرة-: هو يزيد بن أبي يزيد الضُّبَعي مولاهم، ومُعَاذَة: هي بنت عبد الله العدوية. وأخرجه مسلم (١١٦٠) من طريق عبد الوارث، وابن ماجه (١٧٠٩)، والترمذي (٧٧٣) من طريق شعبة، كلاهما عن يزيد الرِّشْك، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥١٢٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٥٤) و (٣٦٥٧).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي ابْنُ لَهِيعَةَ، وَيَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرِ بْنِ حَزْمٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ حَفْصَةَ، زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " مَنْ لَمْ يُجْمِعِ الصِّيَامَ قَبْلَ الْفَجْرِ فَلاَ صِيَامَ لَهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ اللَّيْثُ وَإِسْحَاقُ بْنُ حَازِمٍ أَيْضًا جَمِيعًا عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ مِثْلَهُ وَوَقَفَهُ عَلَى حَفْصَةَ مَعْمَرٌ وَالزُّبَيْدِيُّ وَابْنُ عُيَيْنَةَ وَيُونُسُ الأَيْلِيُّ كُلُّهُمْ عَنِ الزُّهْرِيِّ .
নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি ফাজরের পূর্বে সওমের নিয়্যাত করেনি তার সওম হয়নি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (730) نسائی (2333) ابن ماجہ (1700) ، ابن شھاب الزھري مدلس وعنعن ، و الموقوف صحیح ، انظر سنن النسائي (2338،2345) ، (انوار الصحیفہ ص 90)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح. ورواية ابن وهب عن ابن لهيعة -وهو عبد الله الحضرمي- قوية، ثم هو متابع، وباقي رجاله ثقات، إلا أنه قد اختلف في رفعه ووقفه، ورجَّح وقفه الأئمة أبو حاتم والبخاري والترمذي والنسائي وغيرهم، وعمل بظاهر الإسناد جماعة من الأئمة، فصحَّحوا الحديث، منهم ابن خزيمة وابن حبان والدارقطني والخطابي والحاكم وابن حزم والبيهقي وابن العربي، وروى له الدارقطني طريقا آخر (٢٢١٣) وقال: رجالها ثقات. أحمد بن صالح: هو المِصْريُّ، ويحيى بن أيوب: هو الغافقي، وابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري. وأخرجه الترمذي (٧٣٩) من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم، والنسائي في "الكبرى" (٢٦٥٢) و (٢٦٥٣) من طريق الليث بن سعد، كلاهما عن يحيى بن أيوب وحده، بهذا الإسناد. ولم يذكر النسائي في الموضع الأول ابن شهاب الزهري. وأخرجه النسائي (٢٦٥٤) من طريق أشهب بن عبد العزيز، وابن ماجه (١٧٠٠) من طريق إسحاق بن حازم، كلاهما، عن عبد الله بن أبي بكر، به. وسقط من إسناد ابن ماجه اسم الزهري. وأخرجه النسائي (٢٦٥٥) من طريق ابن جريج، عن ابن شهاب الزهري، به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٢٦٥٦) من طريق عُبيد الله بن عمر، و (٢٦٥٧) من طريق يونس، و (٢٦٥٨) من طريق معمر، ثلاثتهم عن ابن شهاب، به. موقوفاً وأخرجه موقوفاً كذلك النسائي (٢٦٥٩) من طريق سفيان بن عيينة، ومعمر، عن الزهري، عن حمزة بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، عن حفصة. وأخرجه موقوفاً أيضاً النسائي (٢٦٦٠) و (٢٦٦١) من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن حمزة بن عبد الله، عن حفصة. وأخرجه النسائي أيضاً (٢٦٦٢) من طريق مالك، عن ابن شهاب، عن عائشة وحفصة، به. موقوفاً. وأخرجه مالك في "الموطأ" ١/ ٢٨٨، ومن طريقه النسائي (٢٦٦٣)، والبيهقي في "الكبرى" ٦/ ٢٢٧ - ٢٢٨ عن نافع، عن ابن عمر قوله. وتابع مالكاً عُبيد الله بن عمر العمري عند النسائي (٢٦٦٤)، وموسى بن عقبة عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٥٥، كلاهما عن نافع، عن ابن عمر قوله. وقد بسطنا الكلام عليه في "مسند أحمد" (٢٦٤٥٧)، فانظره. قال الخطابي: معنى الإجماع أو إحكام النية والعزيمة، يقال: أجمعت الرأي وأزمعت بمعنى واحد، وفيه بيان "أن من تأخرت نيته للصوم عن أول وقته فإن صومه فاسد، وقال أصحاب الرأي: إذا نوى الفرض قبل زوال الشمس أجزأه، وقالوا في صوم النذر والكفارة والقضاء: إن عليه تقديم النية قبل الفجر، وقال صاحب "المغني" ٤/ ٣٣٧: وتعتبر النية لكل يوم، وهو مذهب أبي حنيفة والشافعي وأحمد وابن المنذر، وعن أحمد: أنه تجزئه نية واحدة لجميع الشهر إذا نوى صوم جميعه، وهو مذهب مالك وإسحاق.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، ح وَحَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، جَمِيعًا عَنْ طَلْحَةَ بْنِ يَحْيَى، عَنْ عَائِشَةَ بِنْتِ طَلْحَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا دَخَلَ عَلَىَّ قَالَ " هَلْ عِنْدَكُمْ طَعَامٌ " . فَإِذَا قُلْنَا لاَ قَالَ " إِنِّي صَائِمٌ " . زَادَ وَكِيعٌ فَدَخَلَ عَلَيْنَا يَوْمًا آخَرَ فَقُلْنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ أُهْدِيَ لَنَا حَيْسٌ فَحَبَسْنَاهُ لَكَ . فَقَالَ " أَدْنِيهِ " . قَالَ طَلْحَةُ فَأَصْبَحَ صَائِمًا وَأَفْطَرَ .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এসে বলতেনঃ তোমাদের কাছে কোন খাবার আছে কি? আমরা না বললে তিনি বলতেনঃ আমি সওম রাখলাম। একদিন তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে আগমন করলে আমরা বলি, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদেকে কিছু ‘হাইস’’ হাদিয়া দেয়া হয়েছে। আমরা তা আপনার জন্য রেখে দিয়েছি। তিনি বললেনঃ তা আমার কাছে নিয়ে এসো। অথচ তিনি সওম অবস্থায় ভোর করেছেন, পরে তা খেয়ে ইফতার করলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1154)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي. سفيان: هو ابن سعيد الثوري، ووكيع: هو ابن الجراح الرؤاسي، وطلحة بن يحيى: هو ابن طلحة بن عبيد الله التيمي. وأخرجه مسلم (١١٥٤)، والترمذي (٧٤٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٦٤٨) من طريق وكيع، ومسلم (١١٥٤) (١٦٩) من طريق عبد الواحد بن زياد، والترمذي (٧٤٣)، والنسائي (٢٦٤٦) و (٣٢٨٦) من طريق سفيان، والنسائي (٢٦٤٧) من طريق يحيي بن سعيد القطان، و (٢٦٤٩) من طريق القاسم بن معن، خمستهم عن طلحة بن يحيي، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (١٧٠١)، والنسائي في "الكبرى" (٢٦٤٤) من طريق شريك، عن طلحة بن يحيي، عن مجاهد، عن عائشة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٢٠)، و"صحيح ابن حبان" (٣٦٢٨) و (٣٦٢٩). وانظر لزاماً تمام كلامنا عليه في "المسند".
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرُ بْنُ عَبْدِ الْحَمِيدِ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَارِثِ، عَنْ أُمِّ هَانِئٍ، قَالَتْ لَمَّا كَانَ يَوْمُ الْفَتْحِ فَتْحِ مَكَّةَ جَاءَتْ فَاطِمَةُ فَجَلَسَتْ عَنْ يَسَارِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأُمُّ هَانِئٍ عَنْ يَمِينِهِ قَالَتْ فَجَاءَتِ الْوَلِيدَةُ بِإِنَاءٍ فِيهِ شَرَابٌ فَنَاوَلَتْهُ فَشَرِبَ مِنْهُ ثُمَّ نَاوَلَهُ أُمَّ هَانِئٍ فَشَرِبَتْ مِنْهُ فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ لَقَدْ أَفْطَرْتُ وَكُنْتُ صَائِمَةً . فَقَالَ لَهَا " أَكُنْتِ تَقْضِينَ شَيْئًا " . قَالَتْ لاَ . قَالَ " فَلاَ يَضُرُّكِ إِنْ كَانَ تَطَوُّعًا " .
উম্মু হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মাক্কাহ বিজয়ের দিন ফাত্বিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর বাম পাশে বসলেন আর উম্মু হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসলেন তাঁর ডান পাশে। বর্ণনাকারী বলেন, এক দাসী এক পাত্র পানীয় এনে তাঁকে দিলে তিনি তা থেকে কিছু পান করার পর উম্মু হানীর দিকে পাত্রটি এগিয়ে দিলেন এবং তিনি তা থেকে পান করলেন। উম্মু হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন হে আল্লাহর রাসূল! আমি যে এখন ইফতার করলাম, আমি তো সওম রেখেছিলাম! তিনি জিজ্ঞেস করলেনঃ তুমি কি এগুলো ক্বাযা করতে চাও? তিনি বললেন, না। তিনি বললেনঃ যদি তা নফল (সওম) হয় তাহলে কোন ক্ষতি নেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، یزید بن أبي زیاد ضعیف ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ عندالترمذي (731،732) وغیرہ ، (انوار الصحیفہ ص 91)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد - وهو القرشي الهاشمي، قال ابن التركماني في "الجوهر النقي" ٢٧٨/ ٤: هذا الحديث مضطرب متناً وسنداً، أما اضطراب متنه فظاهر، وقد ذكر فيه أنه كان يوم الفتح، وهي أسلمت عام الفتح، وكان الفتح في رمضان، فكيف يلزمها قضاؤه، وأما اضطراب سنده: فاختلف على سماك فيه، فتارةً رواه عن أبي صالح باذام مولى أم هانئ وهو ضعيف، وتارةً عن جَعدة، وتارةً عن هارون، وكلاهما مجهول. وأخرجه الترمذي (٧٤٠) و (٧٤١)، والنسائي في "الكبرى" (٣٢٨٨) و (٣٢٨٩) و (٣٢٩٠) و (٣٢٩٢) من طريق ابن أم هانئ عن أم هانئ. وسماه الترمذي في روايته الثانية والنسائي في الروايتين الأولى والثانية: جعدة، وهو ابن ابن أم هانئ. وأخرجه النسائي (٣٢٩١) من طريق سماك بن حرب، عن هارون بن أم هانئ، عن أم هانئ. وأخرجه الترمذي (٧٤١)، والنسائي (٣٢٨٩) من طريق شعبة، عن جعدة، عن أهله وأبي صالح باذام، عن أم هانئ. وقال الحافظ ابن حجر في "التلخيص" ٢/ ٢١١: ومما يدل على غلط سِمَاك فيه أنه قال في بعض الروايات عنه: إن ذلك كان يوم الفتح، وهي عند النسائي (٣٢٩٠)، والطبراني ٢٢/ (٩٩٣)، ويوم الفتح كان في رمضان فكيف يتصور قضاء رمضان في رمضان.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي حَيْوَةُ بْنُ شُرَيْحٍ، عَنِ ابْنِ الْهَادِ، عَنْ زُمَيْلٍ، مَوْلَى عُرْوَةَ عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ أُهْدِيَ لِي وَلِحَفْصَةَ طَعَامٌ وَكُنَّا صَائِمَتَيْنِ فَأَفْطَرْنَا ثُمَّ دَخَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْنَا لَهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّا أُهْدِيَتْ لَنَا هَدِيَّةٌ فَاشْتَهَيْنَاهَا فَأَفْطَرْنَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ عَلَيْكُمَا صُومَا مَكَانَهُ يَوْمًا آخَرَ " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমাকে ও হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে কিছু খাবার উপঢৌকন দেয়া হয়। তখন আমরা দু’জনেই সওম অবস্থায় ছিলাম। আমরা সওম ভাঙ্গলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলে আমরা তাঁকে বললাম হে, আল্লাহর রাসূল! আমাদেরকে হাদিয়া দেয়া হয়েছিল। আমাদের তা খেতে ইচ্ছে হওয়ায় আমরা তা খেয়ে সওম ভেঙ্গে ফেলি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কোন অসুবিধা নেই, তবে এর পরিবর্তে অন্য দিন সওম রেখে নিবে। [২৪৫৭]
দুর্বলঃ যঈফ সুনান আত-তিরমিযী (১১৮/৭৩৮) পরবর্তী দিন শব্দে, যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর (৬৩০৩), মিশকাত (২০৮০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، زمیل مجہول (تق: 2036) وقال البخاري: ’’ ولا یعرف لزمیل سماع من عروۃ ولا لیزید من زمیل ولا تقوم بہ الحجۃ ‘‘ (التاریخ الکبیر 450/3) ، وللحدیث شاہد ضعیف عند الترمذي (735) ، (انوار الصحیفہ ص 91)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة زُمَيل - وهو ابن عباس الأسَدي مولى عروة بن الزبير - وباقي رجاله ثقات. ابن الهاد: هو يزيد بن عبد الله الليثي. وأخرجه النسائى في "الكبرى" (٣٢٧٧) من طريق عبد الله بن وَهب، بهذا الإسناد. وله طريق آخر رجاله ثقات أخرجه النسائى (٣٢٨٢)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ١٠٩، وابن حبان (٣٥١٧)، وابن حزم في "المحلى" ٦/ ٢٧٠، وابن عبد البر في "التمهد" ١٢/ ٧٠ - ٧١ من طرق عن ابن وهب، حدثني جرير بن حازم، عن يحيي ابن سعيد، عن عمرة، عن عائشة. وهذا إسناد موصول رجاله ثقات رجال صحيح، إلا أن البيهقي ٤/ ٢٨٠ - ٢٨١ قال: وجرير بن حازم وإن كان من الثقات فهو واهم فيه، وقد خطأه في ذلك الإمام أحمد وعلي بن المديني، والمحفوظ: عن يحيي بن سعيد، عن الزهري، عن عائشة: مرسلاً، لكن ابن حزم صحح الحديث في كتابه "المحلى" ٦/ ٢٧٠ ولم يلتفت إلى هذه العلة، فقال: لم يخفَ عليا قول من قال: إن جرير بن حازم أخطأ في هذا الخبر، إلا أن هذا ليس بشيء لأن جريراً ثقة، ودعوى الخطأ باطلة، إلا أن يُقيم المدعي له برهاناً على صحة دعواه، وليس انفرادُ جَرير بإسناده علة، لأنه ثقة. وممن صحح الحديث أيضاً ابن حبان. وأخرجه الترمذي (٧٤٤)، والنسائي (٣٢٧٨) و (٣٢٧٩) و (٣٢٨١) من طريق الزهري، عن عروة، عن عائشة. موصولاً. وقال الترمذي: وروى صالحُ بن أبي الأخضر ومحمد بن أبي حفصة هذا الحديث، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة مثلَ هذا، وروى مالك بن أنس ومعمر وعُبَيد الله بن عُمر وزياد بن سعد وغير واحدٍ من الحفاظ عن الزهري، عن عائشة مُرسلاً. ولم يذكروا فيه: عن عروة، وهذا أصح، لأنه روي عن ابن جريج، قال: سألت الزهري فقلت لهُ: أحدثك عروة، عن عائشة؟ قال: لم أسْمَع من عروة في هذا شيئاً، ولكن سمعتُ في خلافة سليمان بن عبد الملك من ناس عن بعض من سأل عائشة عن هذا الحديث. وقال الترمذي بإثر (٧٤٥): وقد ذهب قومٌ من أهل العلم من أصحاب النبي ﷺ وغيرهم إلى هذا الحديث؛ فرأوا عليه القضاء إذا أفطَرَ، وهو قول مالك بن أنس. انظر "شرح معاني الآثار" ٢/ ١١١. وقد بسطنا الكلام على الحديث في "مسند أحمد" (٢٥٠٩٤) فانظره لزاماً. قلنا: وفي الباب عن ابن عباس موقوفاً عند ابن أبي شيبة ٣/ ٢٩، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ١١١ قال: يقضي يوماً مكانه. رجاله ثقات رجال الشيخين. وعن أنس بن سيرين عند ابن أبي شيبة ٢٩/ ٣: أنه صام يوم عرفة فعطش عطشاً شديداً فأفطر، فسأل عدة من أصحاب النبي ﷺ فأمروه أن يقضى يوماً مكانَه. ورجالُه ثقات. وعن أنس بن سيرين أيضاً عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ١١١ قال: صمتُ يومَ عرفة فجهدني الصوم فأفطرت، فسألت عن ذلك عبد الله بن عمر، فقال: يوماً آخر مكانه. وقوله: "صوماً مكانه يوماً آخر" قال السندي على "حاشية المسند": وهذا يدل على جواز الإفطار للمتطوع لكن بشرط أن يقضي، وبه قال بعض أهل العلم، وهو أقرب إلى التوفيق بين الأدلة بخلاف قول من لا يرى جواز الإفطار أو لا يرى لزوم القضاء، وفي "التمهيد" ١٢/ ٢٧٠: اختلف الفقهاء في هذا الباب، فقال مالك وأصحابه: من أصبح صائماً متطوعاً فأفطر متعمداً فعليه القضاء، وكذلك قال أبو حنيفة وأبو ثور، وقال الشافعي وأصحابه وأحمد وإسحاق: استُحِب له أن لا يفطر، فإن أفطر فلا قضاء عليه، قال الثوري: أحبُّ إليِّ أن يقضي.
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ هَمَّامِ بْنِ مُنَبِّهٍ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ تَصُومُ الْمَرْأَةُ وَبَعْلُهَا شَاهِدٌ إِلاَّ بِإِذْنِهِ غَيْرَ رَمَضَانَ وَلاَ تَأْذَنُ فِي بَيْتِهِ وَهُوَ شَاهِدٌ إِلاَّ بِإِذْنِهِ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ স্বামীর উপস্থিতিতে তার সম্মতি ছাড়া স্ত্রী রমাযান মাসের সওম ব্যতীত নফল সওম রাখবে না এবং তার উপস্থিতিতে তার সম্মতি ছাড়া অন্য কোন ব্যক্তিকে তার ঘরে আসার অনুমতি দিবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح ق دون ذكر رمضان
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5192) صحیح مسلم (1026)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عبد الرزاق: هو الصنعاني، ومعمر: هو ابن راشد. وهو عند عبد الرزاق في "مصنفه" (٧٨٨٦)، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٠٢٦). وأخرجه البخاري (٥١٩٢) من طريق عبد الله بن المبارك، عن معمر، به. واقتصر على ذكر الصوم. وأخرجه البخاري (٥١٩٥)، وابن ماجه (١٧٦١)، والترمذي (٧٩٢)، والنسائي في "الكبرى" (٢٩٣٣) و (٣٢٧٥) من طريق الأعرج، والنسائي (٢٩٣٢) و (٣٢٧٤) من طريق أبي عثمان، كلاهما عن أبي هريرة، به. واقتصر جميعهم دون البخاري على ذكر الصوم. وهو في "مسند أحمد" (٨١٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٥٧٢) و (٣٥٧٣). وقوله: "وهو شاهد إلا بإذنه". قال الحافظ في "الفتح": وهذا القيد لا مفهوم له، بل خرج مخرج الغالب وإلا فغيبة الزوج لا تقتضي، الإباحة للمرأة أن تأذن لمن يدخل بيته، بل يتأكد حينئذ عليها المنع لثبوت الأحاديث الواردة في النهي عن الدخول على المغيبات، أي: من غاب عنها زوجها. وقال النووي: في هذا الحديث إشارة إلى أنه لا يفتات على الزوج بالإذن في بيته إلا بإذنه، وهو محمول على ما تعلم رضا الزوج به، أما لو علمت رضا الزوج بذلك فلا حرج عليها، كمن جرت عادته بإدخال الضيفان موضعاً معداً لهم سواء كان حاضراً أم غائباً، فلا يفتقر إدخالهم إلى إذن خاص لذلك.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ، قَالَ جَاءَتِ امْرَأَةٌ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَنَحْنُ عِنْدَهُ فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ زَوْجِي صَفْوَانَ بْنَ الْمُعَطَّلِ يَضْرِبُنِي إِذَا صَلَّيْتُ وَيُفَطِّرُنِي إِذَا صُمْتُ وَلاَ يُصَلِّي صَلاَةَ الْفَجْرِ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ . قَالَ وَصَفْوَانُ عِنْدَهُ . قَالَ فَسَأَلَهُ عَمَّا قَالَتْ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَمَّا قَوْلُهَا يَضْرِبُنِي إِذَا صَلَّيْتُ فَإِنَّهَا تَقْرَأُ بِسُورَتَيْنِ وَقَدْ نَهَيْتُهَا . قَالَ فَقَالَ " لَوْ كَانَتْ سُورَةً وَاحِدَةً لَكَفَتِ النَّاسَ " . وَأَمَّا قَوْلُهَا يُفَطِّرُنِي فَإِنَّهَا تَنْطَلِقُ فَتَصُومُ وَأَنَا رَجُلٌ شَابٌّ فَلاَ أَصْبِرُ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَئِذٍ " لاَ تَصُومُ امْرَأَةٌ إِلاَّ بِإِذْنِ زَوْجِهَا " . وَأَمَّا قَوْلُهَا إِنِّي لاَ أُصَلِّي حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ فَإِنَّا أَهْلُ بَيْتٍ قَدْ عُرِفَ لَنَا ذَاكَ لاَ نَكَادُ نَسْتَيْقِظُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ . قَالَ " فَإِذَا اسْتَيْقَظْتَ فَصَلِّ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ حَمَّادٌ - يَعْنِي ابْنَ سَلَمَةَ - عَنْ حُمَيْدٍ أَوْ ثَابِتٍ عَنْ أَبِي الْمُتَوَكِّلِ .
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। এমন সময় তার কাছে এক মহিলা এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্বামী সাফওয়ান ইবনু মু‘আত্তাল যখন আমি সলাত আদায় করি তখন আমাকে প্রহার করে। আমি সওম রাখলে সে আমাকে সওম ভঙ্গ করায় এবং সূর্য উঠার পূর্বে সে ফাজরের সলাত আদায় করে না। বর্ণনাকারী বলেন, সেখানে সাফওয়ানও উপস্থিত ছিলেন। তার স্ত্রী তার বিরুদ্ধে যেসব অভিযোগ করেছে সে সম্পর্কে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন। জবাবে তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! তার অভিযোগ হলো, ‘আমি যখন সলাত আদায় করি সে আমাকে প্রহার করে’, কারণ হচ্ছে, সে এমন দু’টি দীর্ঘ সূরাহ দিয়ে সলাত আদায় করে যা পাঠ করতে আমি তাকে নিষেধ করি। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি বললেনঃ (ফাতিহার পর) সংক্ষিপ্ত একটি সূরাহই লোকদের জন্য যথেষ্ঠ। তার অভিযোগ, ‘আমাকে সওম ভাঙ্গতে বাধ্য করে’, ব্যাপার এই যে, সে প্রায়ই সওম রাখে। আমি একজন যুবক, ধৈর্যধারণ করতে পারিনা। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দিনই বললেনঃ কোন নারী তার স্বামীর অনুমতি ছাড়া (নাফল) সওম রাখবে না। এবং তার অভিযোগ, ‘সূর্য উঠার পূর্বে আমি (ফাজরের) সলাত আদায় করি না’, কারণ হলো, আমার পরিবারের লোকেরা সর্বদা কাজে (পানি সরবরাহে) ব্যস্ত থাকে। ফলে সূর্য উঠার আগে আমরা ঘুম থেকে জাগতে পারি না। তার কথা শুনে তিনি বললেনঃ যখনই তুমি জাগ্রত হবে তখনই সলাত আদায় করে নিবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (1762) ، الأعمش مدلس وعنعن ، (انوار الصحیفہ ص 91)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وقد صحح إسناده الحافظ في "الإصابة" ٣/ ٤٤١. جرير: هو ابن عبد الحميد بن قرط الضبي، والأعمش: هو سليمان بن مِهران، وأبو صالح: هو ذكوان السمان. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٢٠٤٤)، والحاكم في "المستدرك" ١/ ٤٣٦، والبيهقي في "السنن" ٤/ ٣٠٣ من طريق عثمان، بهذا الإسناد. وصححه الحاكم على شرط الشيخين وسكت عنه الذهبي. وأخرجه أبو يعلى (١٠٣٧)، وابن حبان (١٤٨٨) من طريقين، عن جرير، به. وأخرجه ابن ماجه (١٧٦٢) من طريق أبي عوانة، عن الأعمش، بلفظ: نهى رسول الله ﷺ النساء أن يَصُمنَ إلا بإذن أزواجِهن. وهو في "مسند أحمد" (١١٧٥٩). قال الخطابي: في هذا الحديث من الفقه أن منافع المتعة والعشرة من الزوجة مملوكة للزوج في عامة الأوقات، وأن حقها في نفسها محصور في وقت دون وقت. وفيه دليل على أنها لو أحرمت بالحج كان له منعها وحصرها، لأن حقه عليها معجل، وحق الحج متراخٍ، وإلى هذا ذهب عطاء بن أبي رباح، ولم يختلف العلماء في أن له منعها من حج التطوع. وقوله: فإذا استيقظت فصل، ثم تركه التعنيف له في ذلك أمر عجيب من لطف الله سبحانه بعباده، ومن لطف نبيه ورفقه بأمته، ويشبه أن يكون ذلك منه على معنى ملكة الطبع واستيلاء العادة، فصار كالشيء المعجوز عنه، وكان صاحبه في ذلك بمنزلة من يُغمى عليه، فعذر فيه، ولم يؤنب عليه. ويحتمل أن يكون ذلك إنما كان يصيبه في بعض الأوقات دون بعض، وذلك إذا لم يكن بحضرته من يوقظه ويبعثه من المنام، فيتمادى به النوم حتى تطلع الشمس دون أن يكون ذلك منه في عامة الأوقات، فإنه قد يبعد أن يبقى الإنسان على هذا في دائم الأوقات، وليس بحضرته أحد لا يصلح هذا القدر من شأنه، ولا يراعي مثل هذا من حاله، ولا يجوز أن يظن به الامتناع من الصلاة في وقتها ذلك مع زوال العذر بوقوع التنبيه والإيقاظ ممن يحضره ويشاهده. والله أعلم.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو خَالِدٍ، عَنْ هِشَامٍ، عَنِ ابْنِ سِيرِينَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِذَا دُعِيَ أَحَدُكُمْ فَلْيُجِبْ فَإِنْ كَانَ مُفْطِرًا فَلْيَطْعَمْ وَإِنْ كَانَ صَائِمًا فَلْيُصَلِّ " . قَالَ هِشَامٌ وَالصَّلاَةُ الدُّعَاءُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ حَفْصُ بْنُ غِيَاثٍ أَيْضًا عَنْ هِشَامٍ .
আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহ আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কাউকে খাওয়ার দাওয়াত দেয়া হলে সে যেন তাতে যোগদান করে। সে রোযাহীন হলে যেন খাবার খায়, আর সওম রেখে থাকলে যেন দাওয়াতকারীর জন্য দু‘আ করে। হিশাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এখানে ‘সলাত’ অর্থ দু‘আ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1431)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي. أبو خالد -وهو سُلَيمان بن حَيان الأزدي- صدوق لا بأس به. هشام: هو ابن حسان الأزدي، وابن سيرين: هو محمد الأنصاري. وأخرجه مسلم (١٤٣١)، والنسائي في "الكبرى" (٣٢٥٧) و (٦٥٧٦) من طريقين عن هشام بن حسَّان، به. وأخرجه الترمذي (٧٩٠) من طريق أيوب، عن ابن سيرين، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٧٤٩)، و"صحيح ابن حبان" (٥٣٠٦). وانظر ما بعده.