সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا عَطَاءُ بْنُ السَّائِبِ، عَنْ أَبِي يَحْيَى، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، : أَنَّ رَجُلَيْنِ، اخْتَصَمَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَسَأَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم الطَّالِبَ الْبَيِّنَةَ، فَلَمْ تَكُنْ لَهُ بَيِّنَةٌ فَاسْتَحْلَفَ الْمَطْلُوبَ فَحَلَفَ بِاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم : " بَلَى قَدْ فَعَلْتَ، وَلَكِنْ قَدْ غُفِرَ لَكَ بِإِخْلاَصِ قَوْلِ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : يُرَادُ مِنْ هَذَا الْحَدِيثِ أَنَّهُ لَمْ يَأْمُرْهُ بِالْكَفَّارَةِ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা দুই ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে তাদের বিবাদ পেশ করলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাদীর কাছে প্রমাণ চাইলেন। কিন্তু তার কাছে প্রমাণ ছিল না। তিনি বিবাদীকে শপথ করতে বললে সে বললো, মহান আল্লাহ্র নামে শপথ, যিনি ছাড়া কোন ইলাহ নেই! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, হাঁ, তুমি তো (মিথ্যা শপথ) করেছো। কিন্তু তোমাকে নিষ্ঠার সাথে “লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ” বলার কারনে ক্ষমা করা হয়েছে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ হাদীস দ্বারা জানা যায়, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কাফফারাহ প্রদানের নির্দেশ দেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. عطاء بن السائب اختلط بأخرة، ولا يحتمل مثل هذا المتن وقد عد الإِمام الذهبي هذا الحديث في "ميزان الاعتدال" ٣/ ٧٢ من مناكيره. حماد: هو ابن سلمة، أبو يحيى: هو زياد مولى الأنصار. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٩٦٣) و (٥٩٦٤) من طريق عطاء بن السائب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٨٠). وفي الباب عن عبد الله بن الزبير عند أحمد (١٦١٠١)، والنسائي في "الكبرى" (٥٩٦٢): أن رجلاً حلف باللهِ الذي لا إله إلا هو كاذبا فغفر له. وسنده ضعيف، اضطرب فيه عطاء بن السائب. قال شعبة أحد رواته: من قبل التوحيد، قال السندي: أي: من أجل اشتمال حلفه على لا إله إلا هو، ففيه ترغيب في قول لا إله إلا الله. وعن عبد الله بن عمر عند أحمد (٥٣٦١) وفي سنده انقطاع.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، حَدَّثَنَا غَيْلاَنُ بْنُ جَرِيرٍ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ : " إِنِّي وَاللَّهِ إِنْ شَاءَ اللَّهُ لاَ أَحْلِفُ عَلَى يَمِينٍ فَأَرَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا إِلاَّ كَفَّرْتُ عَنْ يَمِينِي، وَأَتَيْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ " . أَوْ قَالَ : " إِلاَّ أَتَيْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ وَكَفَّرْتُ يَمِينِي " .
আবূ বুরদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আল্লাহ্র শপথ! আমি কোন কাজের শপথ করার পর তার বিপরীত দিকে কল্যাণ দেখতে পেলে ইন শা আল্লাহ্ আমি শপথ ভঙ্গ করে কাফফারাহ প্রদান করবো এবং অধিকতর কল্যাণকর কাজটি করবো। অথবা তিনি বলেছেন, আমি অধিকতর কল্যাণকর কাজটি করবো এবং আমার শপথ ভঙ্গের কাফফারাহ আদায় করবো।
সহীহ : ইবনু মাজাহ (২১০৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6623) صحیح مسلم (1649)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حماد: هو ابن زيد بن درهم، وأبو بردة: هو عامر بن عبد الله ابن قيس الأشعري. وأخرجه البخاري (٦٦٢٣) و (٦٧١٨) و (٦٧١٩)، ومسلم (١٦٤٩)، وابن ماجه (٢١٠٧)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٠٣) من طريق أبي بردة، به. وأخرجه البخاري (٣١٣٣)، ومسلم (١٦٤٩)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٥٢) من طريق زَهْدَم بن مُضرِّبٍ عن أبي موسى، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٥٥٨). قال العيني في "عمدة القاري" ٢٣/ ٢٢٥: اختلف العلماء في جواز الكفارة قبل الحنث فقال ربيعة ومالك والثوري والليث والأوزاعي: تجزىْ قبل الحنث، وبه قال أحمد وإسحاق وأبو ثور، وروي مثله عن ابن عباس وعائشة وابن عمر، وقال الشافعي: يجوز تقديم الرقبة والكسوة والطعام قبل الحنث ولا يجوز تقديم الصوم، وقال أبو حنيفة وأصحابه لا تجزئ الكفارة قبل الحنث وهو مذهب أشهب من المالكية وداود الظاهري.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ الْبَزَّازُ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا يُونُسُ، وَمَنْصُورٌ، - يَعْنِي ابْنَ زَاذَانَ - عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَمُرَةَ، قَالَ قَالَ لِيَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم : " يَا عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ سَمُرَةَ إِذَا حَلَفْتَ عَلَى يَمِينٍ فَرَأَيْتَ غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا، فَأْتِ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ وَكَفِّرْ يَمِينَكَ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : سَمِعْتُ أَحْمَدَ يُرَخِّصُ فِيهَا الْكَفَّارَةَ قَبْلَ الْحِنْثِ .
আবদুর রহমান ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেনঃ হে ‘আবদুর রহমান ইবনু সামুরাহ! তুমি কোন বিষয়ে শপথ করার পর তাঁর বিপরীতে কল্যাণ দেখতে পেলে তুমি কল্যাণকর কাজটি করবে এবং শপথ ভঙ্গের কাফফারাহ আদায় করবে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) শপথ ভঙ্গের পূর্বেই কাফফারাহ আদায় জায়িয মনে করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6722) صحیح مسلم (1652)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هشيم: هو ابن بشير بن القاسم بن دينار، ويونس: هو ابن عبيد بن دينار، والحسن: هو ابن أبي الحسن يسار البصري. وأخرجه البخاري (٧١٤٧)، ومسلم (١٦٥٢)، والترمذي (١٦٠٩) من طريق يونس، ومسلم (١٦٥٢) من طريق منصور، كلاهما عن الحسن، به. وأخرجه البخاري (٦٧٢٢) من طريق عبد الله بن عون، عن الحسن، به. وأخرجه البخاري (٦٦٢٢) و (٧١٤٦)، ومسلم (١٦٥٢)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٠٦) و (٤٧٠٧) من طرق عن الحسن البصري، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٦١٦)، و "صحيح ابن حبان" (٤٣٤٨). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ خَلَفٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَمُرَةَ، نَحْوَهُ قَالَ : " فَكَفِّرْ عَنْ يَمِينِكَ، ثُمَّ ائْتِ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : أَحَادِيثُ أَبِي مُوسَى الأَشْعَرِيِّ وَعَدِيِّ بْنِ حَاتِمٍ وَأَبِي هُرَيْرَةَ فِي هَذَا الْحَدِيثِ رُوِيَ عَنْ كُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمْ فِي بَعْضِ الرِّوَايَةِ الْحِنْثُ قَبْلَ الْكَفَّارَةِ وَفِي بَعْضِ الرِّوَايَةِ الْكَفَّارَةُ قَبْلَ الْحِنْثِ .
‘আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, পূর্বের হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। এতে আছে : “প্রথমে কাফফারাহ দিবে, তারপর কল্যাণকর কাজটি করবে”। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এ অনুচ্ছেদে আবূ মূসা আল-আশ’আরী, ‘আদী ইবনু হাতিম ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে যেসব হাদীস বর্ণিত হয়েছে তার কতগুলোতে রয়েছে, শপথ ভঙ্গের পর কাফফারাহ আদায় করবে, আর কতগুলোতে রয়েছে, শপথ ভঙ্গের আগে কাফফারাহ আদায় করবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1652)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٦٥٢)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٠٨) من طريق قتادة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٦٢٧). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، قَالَ قَرَأْتُ عَلَى أَنَسِ بْنِ عِيَاضٍ حَدَّثَنِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ حَرْمَلَةَ، عَنْ أُمِّ حَبِيبٍ بِنْتِ ذُؤَيْبِ بْنِ قَيْسٍ الْمُزَنِيَّةِ، - وَكَانَتْ تَحْتَ رَجُلٍ مِنْهُمْ مِنْ أَسْلَمَ ثُمَّ كَانَتْ تَحْتَ ابْنِ أَخٍ لِصَفِيَّةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ابْنُ حَرْمَلَةَ : فَوَهَبَتْ لَنَا أُمُّ حَبِيبٍ صَاعًا - حَدَّثَتْنَا عَنِ ابْنِ أَخِي صَفِيَّةَ عَنْ صَفِيَّةَ أَنَّهُ صَاعُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَنَسٌ : فَجَرَّبْتُهُ، أَوْ قَالَ فَحَزَرْتُهُ فَوَجَدْتُهُ مُدَّيْنِ وَنِصْفًا بِمُدِّ هِشَامٍ .
আবদুর রহমান ইবনু হারমালাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মু হাবীব আমাদেরকে একটি সা’ দিলেন। তিনি আমাদেরকে তার দ্বিতীয় স্বামী সাফিয়্যাহ্র ভ্রাতুষ্পুত্রের সূত্রে বলেন, তিনি সাফিয়্যাহ্র সূত্রে বলেছেন, এটি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সা’। আনাস (ইবনু ইয়াদ) বলেন, আমি তা যাচাই করে দেখেছি, তার ওজন হিশাম ইবনু ‘আবদুল মালিকের যুগের আড়াই মুদ্দের সমান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أم حبیب مستورۃ (أي مجہولۃ الحال) وابن أخي صفیۃ: ’’ لا یعرف‘‘ (تق: 8713،8497) ، (انوار الصحیفہ ص 119)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف الجهالة. أم حبيب بنت ذؤيب بن قيس المزينة، وابن أخي صفية لا يعرف. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات "الكبرى" ٨/ ٤٩١، والمزي في ترجمة أم حبيبة بنت ذؤيب في "تهذيب الكمال" من طريق أنس بن عياض، بهذا الإسناد. وهشامٌ الذي ورد ذكره في الأثر هو ابن عبد الملك بن مروان.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ خَلاَّدٍ أَبُو عُمَرَ، قَالَ : كَانَ عِنْدَنَا مَكُّوكٌ يُقَالُ لَهُ مَكُّوكُ خَالِدٍ وَكَانَ كَيْلَجَتَيْنِ بِكَيْلَجَةِ هَارُونَ، قَالَ مُحَمَّدٌ : صَاعُ خَالِدٍ صَاعُ هِشَامٍ يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الْمَلِكِ .
মুহাম্মাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু খাল্লাদ আবূ ‘আমর (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, “মাক্কূক খালিদ” নামে আমাদের একটি মাক্কূক ছিল। তা ছিল হারূনুর রশীদের আমলের পরিমাপকের দ্বিগুণ। মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, খালিদের সা’ ছিল হিশাম ইবনু মালিকের সা’।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، خالد ھو ابن عبد اللہ القسري
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: هذا الأثر والذي بعده أثبتناه من (أ) و (هـ)، وأشار الحافظ في نسخته المرموز لها بـ (أ) إلى أنه في رواية ابن العبد أيضاً. ولم يشر إلى غيرها مع أنه في (هـ) عندنا، وهي برواية ابن داسه. محمد بن محمد بن خلاّد الباهلي أبو عمر البصري: ابن أخي أبي بكر بن خلاد، ذكره ابن حبان في "الثقات" ٩/ ١١٥ وقال: كان راوياً لمعن بن عيسى يُغْرِب، وقال مسلمة بن القاسم: بصري ثقة.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ خَلاَّدٍ أَبُو عُمَرَ، حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، عَنْ أُمَيَّةَ بْنِ خَالِدٍ، قَالَ : لَمَّا وُلِّيَ خَالِدٌ الْقَسْرِيُّ أَضْعَفَ الصَّاعَ فَصَارَ الصَّاعُ سِتَّةَ عَشَرَ رَطْلاً . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : مُحَمَّدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ خَلاَّدٍ قَتَلَهُ الزِّنْجُ صَبْرًا، فَقَالَ بِيَدِهِ هَكَذَا وَمَدَّ أَبُو دَاوُدَ يَدَهُ وَجَعَلَ بُطُونَ كَفَّيْهِ إِلَى الأَرْضِ، قَالَ : وَرَأَيْتُهُ فِي النَّوْمِ فَقُلْتُ : مَا فَعَلَ اللَّهُ بِكَ قَالَ : أَدْخَلَنِي الْجَنَّةَ . فَقُلْتُ : فَلَمْ يَضُرَّكَ الْوَقْفُ .
উমাইয়্যাহ ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, খালিদ আল-কাসরী গভর্ণর হয়ে সা’-কে দ্বিগুণ করলেন। তাতে এক সা’ ষোল রতলের সমান হয়। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, মুহাম্মাদ ইবনু মুহাম্মাদ খাল্লাদকে নিগ্রোরা বন্দী করে হত্যা করে। তিনি তার হাতের ইশারায় বলেন, এভাবে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) তার হাত প্রসারিত করেন এবং দু’হাতের তালু মাটির দিকে উপুর করে বলেন, আমি তাকে স্বপ্নে দেখে জিজ্ঞেস করলাম, আল্লাহ্ আপনার সাথে কেমন ব্যবহার করেছেন? তিনি বলেন, আল্লাহ্ আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করিয়েছেন। আমি বললাম, তাহলে আপনার বন্দী অবস্থা আপনার অনিষ্ট করতে পারেনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: خالد القسري: هو خالد بن عبد الله بن يزيد بن أسد، أمير الحجاز ثم الكوفة. وقوله: "أضعف الصاع": قال في "عون المعبود": هذا ليس فيه حجة؟ والصحيح أن الصالح خمسة أرطال وثلث رطل فقط، والدليل عليه نقل أهل المدينة خلفا عن سلف، قال الإِمام العيني في "عمدة القاري": لما اجتمع أبو يوسف مع مالك في المدينة فوقعت بينهما المناظرة في قدر الصاع فزعم أبو يوسف أنه ثمانية أرطال، وقام مالك ودخل بيته وأخرج صاعاً. وقال: هذا صاع النبي ﷺ، قال أبو يوسف: فوجدته خمسة أرطال وثلث، فرجع أبو يوسف إلى قول مالك وخالف صاحبيه، رواه البيهقي بسند جيد.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنِ الْحَجَّاجِ الصَّوَّافِ، حَدَّثَنِي يَحْيَى بْنُ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ هِلاَلِ بْنِ أَبِي مَيْمُونَةَ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ الْحَكَمِ السُّلَمِيِّ، قَالَ قُلْتُ : يَا رَسُولَ اللَّهِ جَارِيَةٌ لِي صَكَكْتُهَا صَكَّةً . فَعَظَّمَ ذَلِكَ عَلَىَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ أَفَلاَ أُعْتِقُهَا قَالَ : " ائْتِنِي بِهَا " . قَالَ : فَجِئْتُ بِهَا قَالَ : " أَيْنَ اللَّهُ " . قَالَتْ : فِي السَّمَاءِ . قَالَ : " مَنْ أَنَا " . قَالَتْ : أَنْتَ رَسُولُ اللَّهِ . قَالَ : " أَعْتِقْهَا فَإِنَّهَا مُؤْمِنَةٌ "
মু’আবিয়াহ ইবনুল হাকাম আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি বলি, হে আল্লাহ্র রাসূল! আমার একটি বাঁদী আছে। আমি তাকে জোরে থাপ্পর মেরেছি। রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে এটা কষ্টদায়ক মনে হল। আমি বললাম, তাকে আযাদ করে দেই? তিনি বললেনঃ তাকে আমার কাছে নিয়ে আসো। বর্ণনাকারী বলেন, আমি তাকে নিয়ে এলে তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন : আমি কে? সে বললো, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি আমাকে বললেনঃ তাকে আযাদ করে দাও, কারন সে মুমিন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (537) ، انظر الحدیث السابق (930)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مسدَّد: هو مسدَّد بن مسرهد بن مسربل بن مستورد، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، والحجاج الصوّاف: هو حجاج بن أبي عثمان الصواف. وقد سلف برقم (٩٣٠). وانظر تخريجه هناك.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنِ الشَّرِيدِ، : أَنَّ أُمَّهُ، أَوْصَتْهُ أَنْ يُعْتِقَ، عَنْهَا رَقَبَةً مُؤْمِنَةً فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ : يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ أُمِّي أَوْصَتْ أَنْ أُعْتِقَ عَنْهَا رَقَبَةً مُؤْمِنَةً وَعِنْدِي جَارِيَةٌ سَوْدَاءُ نُوبِيَّةٌ فَذَكَرَ نَحْوَهُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : خَالِدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ أَرْسَلَهُ لَمْ يَذْكُرِ الشَّرِيدَ .
আশ-শারীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা তার মা তাকে একটি মুমিন বাঁদী আযাদ করতে তাকে ওসিয়াত করেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বললেন, হে আল্লাহ্র রাসূল! আমার মা তার পক্ষ হতে একটি মুমিন ক্রীতদাসী আযাদ করতে আমাকে ওসিয়াত করেছেন। কিন্তু আমার কাছে নুবা এলাকার একটি হাবশী ক্রীতদাসী আছে। এরপর হাদীসের বাকী অংশ উপরের হাদীসের শেষাংশের অনুরূপ। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, খালিদ ইবনু ‘আবদুল্লাহ এটি মুরসালভাবে বর্ণনা করেছেন এবং আশ-শারীদের নাম উল্লেখ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (3683 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. الشريد: هو ابن سُويد الثقفي، وحماد: هو ابن سلمة بن دينار، ومحمد بن عمرو: هو ابن علقمة الليثي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٤٤٧) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٤٥)، و"صحيح ابن حبان" (١٨٩). وانظر تخريج الحديث السالف برقم (٩٣٠). تنببه: اختصر اللؤلؤي روايته لهذا الحديث إلى قوله: سوداء نُوبيَة، ثم قال: فذكر نحوه. وجاء الحديث بتمامه في رواية ابن داسه وابن العبد.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ يَعْقُوبَ الْجُوزَجَانِيُّ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، قَالَ أَخْبَرَنِي الْمَسْعُودِيُّ، عَنْ عَوْنِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، : أَنَّ رَجُلاً، أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بِجَارِيَةٍ سَوْدَاءَ فَقَالَ : يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ عَلَىَّ رَقَبَةً مُؤْمِنَةً . فَقَالَ لَهَا : " أَيْنَ اللَّهُ " . فَأَشَارَتْ إِلَى السَّمَاءِ بِأُصْبُعِهَا . فَقَالَ لَهَا : " فَمَنْ أَنَا " . فَأَشَارَتْ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَإِلَى السَّمَاءِ، يَعْنِي أَنْتَ رَسُولُ اللَّهِ . فَقَالَ : " أَعْتِقْهَا فَإِنَّهَا مُؤْمِنَةٌ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তি একটি কালো দাসী নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে এসে বললো, হে আল্লাহ্র রাসুল! আমাকে একটি মুমিন দাসী আযাদ করতে হবে। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাসীটিকে জিজ্ঞেস করলেন : আল্লাহ্ কোথায়? সে তার হাতের আঙ্গুল দিয়ে আসমানের দিকে ইশারা করলো। তিনি তাকে পুনরায় জিজ্ঞেস করলেন : আমি কে? সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আকাশের দিকে ইশারা করে বললো, আপনি আল্লাহ্র রাসুল। তিনি বলেনঃ তুমি তাকে আযাদ করে দাও কেননা সে মুমিন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، المسعودي اختلط قبل موتہ (تق: 3919) وسماع یزید بن ھارون منہ بعد اختلاطہ (الکواکب النیرات ص55 ت 35) ، (انوار الصحیفہ ص 119، 120)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، المسعودي: -وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة- وإن كان اختَلَطَ ويزيد بن هارون ممن روى عنه بعد الاختلاط، روى عنه هذا الحديث أيضاً عبد الله بن رجاء، وهو ممن سمع منه قبل الاختلاط. وقد حسَّن الحافظ الذهبي إسناد هذا الحديث في "العلو للعلي الغفار". وأخرجه أحمد وابن خزيمة في "التوحيد" ١/ ٢٨٤ - ٢٨٥، والبيهقي ٧/ ٣٨٨، وابن عبد البر في "التمهيد" ٩/ ١١٥ من طرق عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد إلا أنهم قالوا في إسناده: عن عُبِيد الله بن عبد الله بن عتبة -وهو أخوه-، بدل: عبد الله ابن عتبة. وأخرجه ابن خزيمة ١/ ٢٨٥ - ٢٨٦ من طريق أسد بن موسى، و١/ ٢٨٦ من طريق أبي داود الطيالسي، والطبراني في "الأوسط" (٢٥٩٨) من طريق عبد الله بن رجاء، ثلاثتهم عن المسعودي، عن أخيه عُبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي هريرة. وأخرجه مالك في "الموطأ" عن ابن شهاب الزهري عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود: أن رجلاً من الأنصار جاء إلى رسول الله ﷺ بجارية له سوداء، فقال: يا رسول الله إن علي رقبة مؤمنة، فإن كنت تراها مؤمنة أعتقها، فقال لها رسول الله ﷺ: "أتشهدين أن لا إله إلا الله" قالت: نعم، قال: "أتشهدين أن محمداً رسول الله" قالت: نعم، قال: "أتؤمنين بالبعث بعد الموت" قالت: نعم، فقال رسول الله ﷺ: "أعتقها". وهذا مرسل صحيح الإسناد، وتابع مالكاً على إرساله يونس بن يزيد عند البيهقي ١٠/ ٥٧. ووصله معمر عن الزهري عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عن رجل من الأنصار أنه جاء بأمة سوداء وقال: يا رسول الله إن علي رقبة مؤمنة، فإن كنت ترى هذه مؤمنة أعتقها، فقال لها رسول الله ﷺ: "أتشهدين أن لا إله إلا الله" قالت: نعم، قال: "أتشهدين أني رسول الله" قالت: نعم، قال: "أتؤمنين بالبعث بعد الموت" قالت: نعم، قال: "أعتقها". أخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (١٦٨١٤)، ومن طريقه أحمد في "المسند" (١٥٧٤٣)، وابن خزيمة في "التوحيد"١/ ٢٨٦ - ٢٨٧. وأخرجه ابن خزيمة في "التوحيد" ١/ ٢٨٣ - ٢٨٤ من طريق زياد بن الربيع، عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة … إلا أنه قال فيه: فرفعت رأسها، فقالت: في السماء … وهذا إسناد حسن لولا أن محمد بن عمرو بن علقمة قد اختُلف عنه فيه، فقد رواه مرة عن أبي سلمة، عن الشريد كما في الحديث السالف قبله.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ : " وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا، وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا، وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا " . ثُمَّ قَالَ : " إِنْ شَاءَ اللَّهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : وَقَدْ أَسْنَدَ هَذَا الْحَدِيثَ غَيْرُ وَاحِدٍ عَنْ شَرِيكٍ عَنْ سِمَاكٍ عَنْ عِكْرِمَةَ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ أَسْنَدَهُ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَقَالَ الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ عَنْ شَرِيكٍ : ثُمَّ لَمْ يَغْزُهُمْ .
‘ইকরিমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহর শপথ! আমি অবশ্যই কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো। আল্লাহর শপথ! আমি অবশ্যই কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো। আল্লাহর শপথ! অবশ্যই কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো। অতঃপর তিনি ইন শা আল্লাহ্ বললেন।
সহীহ।
আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আল-ওয়ালীদ বিন মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) শারীক হতে বর্ণনা করেছেন যে, অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، السند مرسل،عکرمۃ من التابعین ، وروایۃ شریک القاضي ضعیفۃ،شریک عنعن ، وانظر (ح 68) ، (انوار الصحیفہ ص 120)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. شريك -وهو ابن عبد الله- سيئ الحفظ، وسماك -وهو ابن حرب- في روايته عن عكرمة اضطراب. ثم هو مرسل؛ وقد روي موصولاً كما أشار إليه المصنف بإثر الحديث. لكن قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل" ١/ ٤٤٠: المرسل أشبه. وأخرجه ابن عدي في "الكامل" ٢/ ٧٤٣، والبيهقي في "الكبرى" ١٠/ ٤٧ من طريقين عن شريك، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو يعلى (٢٦٧٤)، والطحاوي في "مشكلل الآثار" (١٩٣٠) و (١٩٣١)، والطبراني (١١٧٤٢)، وابن عدي في "الكامل" ٢/ ٧٤٣، والبيهقي ١٠/ ٤٧ من طرق عن شريك، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس موصولاً. وأخرجه الطبراني في "المعجم الأوسط" (١٠٠٤) من طريق سفيان بن مسعود، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس موصولاً. وأخرجه ابن عدي في "الكامل" ٥/ ١٩٣٧ من طريق عبد الواحد بن صفوان عن عكرمة، عن ابن عباس موصولاً. وعبد الواحد بن صفوان قال عنه ابن عدي: عامة ما يرويه مما لا يتابع عليه. وقد أورد عبد الحق الإشبيلي هذه الطريق في "الأحكام الوسطى" وقال: عبد الواحد بن صفوان ليس بشيء، والصحيح مرسل. ووافقه ابن القطان ٢/ ٣٢٩.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ بِشْرٍ، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، يَرْفَعُهُ قَالَ : " وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا " . ثُمَّ قَالَ : " إِنْ شَاءَ اللَّهُ " . ثُمَّ قَالَ : " وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا إِنْ شَاءَ اللَّهُ " . ثُمَّ قَالَ : " وَاللَّهِ لأَغْزُوَنَّ قُرَيْشًا " . ثُمَّ سَكَتَ ثُمَّ قَالَ : " إِنْ شَاءَ اللَّهُ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : زَادَ فِيهِ الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ عَنْ شَرِيكٍ قَالَ : ثُمَّ لَمْ يَغْزُهُمْ .
‘ইকরিমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আল্লাহর শপথ! আমি কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো। অতঃপর তিনি বললেন, ইন শা আল্লাহ্। পুনরায় তিনি বললেনঃ আল্লাহর শপথ! অবশ্যই আমি কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো ইন শা আল্লাহু তা’আলা। অতঃপর তিনি বললেনঃ আল্লাহর শপথ! আমি অচিরেই কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবো। তিনি কিছুক্ষণ চুপ থাকার পর বললেনঃ ইন শা আল্লাহ্। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) শারীক (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে হাদীসের শেষাংশে বর্ণনা করছেন, ‘অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করেননি’।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، السند مرسل،عکرمۃ من التابعین ، وروایۃ شریک القاضي ضعیفۃ،شریک عنعن ، وانظر (ح 68) ، (انوار الصحیفہ ص 120)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. ابن بشر: هو محمد بن بشر العبدي، ومسعر: هو ابن كدام ابن ظهير الهلالي. وأخرجه عبد الرزاق (١١٣٠٦) و (١٦١٢٣)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (١٩٢٩)، والبيهقي ١٠/ ٤٨ من طرق عن مسعر، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو يعلى (٢٦٧٥)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (١٩٢٨)، وابن حبان (٤٣٤٣)، وأبو نعيم في "الحلية" ٣/ ٣٤٤ و ٧/ ٢٤١، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" ٧/ ٤٠٤ من طرق عن مسعر، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس موصولاً. وانظر ما قبه.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا جَرِيرُ بْنُ عَبْدِ الْحَمِيدِ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُرَّةَ، قَالَ عُثْمَانُ الْهَمْدَانِيُّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، قَالَ : أَخَذَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عَنِ النَّذْرِ ثُمَّ اتَّفَقَا وَيَقُولُ : " لاَ يَرُدُّ شَيْئًا، وَإِنَّمَا يُسْتَخْرَجُ بِهِ مِنَ الْبَخِيلِ " . قَالَ مُسَدَّدٌ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم : " النَّذْرُ لاَ يَرُدُّ شَيْئًا " .
আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানত করতে নিষেধ করে বলেনঃ মানত (তাকদীরের) কোন কিছুই পরিবর্তন করতে পারে না, শুধু কৃপণের কিছু সম্পদ ব্যয় হয় মাত্র। মুসাদ্দাদের বর্ণনায় রয়েছেঃ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মানত কোন কিছুই প্রতিহত করতে পারে না।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২১২২)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6608) صحیح مسلم (1639)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري، وعبد الله بن مرة: هو الهمداني الخارفي. وأخرجه البخاري (٦٦٠٨) و (٦٦٩٣)، ومسلم (١٦٣٩)، وابن ماجه (٢١٢٢)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٢٤) و (٤٧٢٥) و (٤٧٢٦) من طرق عن منصور بهذا الإسناد. بعضهم يقول: "من البخيل"، وبعضهم يقول: "من الشحيح"، وبعضهم يقول: "اللئيم"، ورواية ابن ماجه دون قوله: "لا يرد شيئاً". وهو في "مسند أحمد" (٥٢٧٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٧٥) و (٤٣٧٧). وأخرجه البخاري (٦٦٩٢) من طريق سعد بن الحارث، ومسلم (١٦٣٩) (3) من طريق عبد الله بن دينار، كلاهما عن ابن عمر. قال القرطبي في "المفهم": النذر من العقود المأمور بالوفاء بها، المثني على فاعلها، وأعلى أنواعه ما كان غير معلق على شيءِ، كمن يعافى من مرض، فقال: لله علي أن أصوم كذا أو أتصدق بكذا شكراً لله تعالى، ويليه المعلق على فعل طاعة كإن شفى الله مريضي صمتُ كذا أو صليت كذا، وما عدا هذا من أنواعه كنذر اللجاج كمن يستثقل عبده، فينذر أن يعتقه ليتخلص من صحبته، فلا يقصد القربة بذلك، أو يحمل على نفسه، فينذر صلاة كثيرة أو صوماً مما يشق عليه فعله ويتضرر بفعله فإن ذلك يكره وقد يبلغ بعضه التحريم. وقال في "المفهم": يحمل ما ورد في الأحاديث من النهي عن نذر المجازاة، فقال: هذا محله أن تقول مثلاً: إن شفى الله مريضي، فعلي صدقة كذا، ووجه الكراهة أنه لما وقف فعل القربة المذكور على حصول الفرض المذكور ظهر أنه لم يتمحض له نية التقرب إلى الله تعالى لما صدر منه، بل سلك فيها مسلك المعاوضة، ويوضحه أنه لو لم يشف مريضه لم يتصدق بما علقه على شفائه، وهذه حالة البخيل، فإنه لا يخرج من ماله شيئاً إلا بعوض عاجل يزيد على ما أخرج غالباً، وهذا المعنى هو المشار إليه في الحديث لقوله: "وإنما يستخرج به من البخيل" ما لم يكن البخيل يخرجه.
حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ، قَالَ قُرِئَ عَلَى الْحَارِثِ بْنِ مِسْكِينٍ وَأَنَا شَاهِدٌ، أَخْبَرَكُمُ ابْنُ وَهْبٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي مَالِكٌ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ هُرْمُزَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ : " لاَ يَأْتِي ابْنَ آدَمَ النَّذْرُ الْقَدَرَ بِشَىْءٍ لَمْ أَكُنْ قَدَّرْتُهُ لَهُ، وَلَكِنْ يُلْقِيهِ النَّذْرُ الْقَدَرَ قَدَّرْتُهُ يُسْتَخْرَجُ مِنَ الْبَخِيلِ يُؤْتَى عَلَيْهِ مَا لَمْ يَكُنْ يُؤْتَى مِنْ قَبْلُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ (আল্লাহ্ বলেন) মানত আদম সন্তানের তাক্বদীরকে এমন কিছু দিতে পারে না – যা আমি তার জন্য নির্ধারণ করিনি। বরং আমি তার তাক্বদীরে যা নির্ধারণ করেছি কেবল তাই মানত তাকে এনে দেয়। তা কৃপণের ধন থেকে কিছু পরিমাণ বের করে আনে এবং তার নিকট তা নিয়ে আসে যা আগে তার কাছে আসেনি।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২১২৩)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6694) صحیح مسلم (1640)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله، وأبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان، وعبد الرحمن بن هرمز: هو الأعرج. وأخرجه البخاري (٦٦٩٤)، ومسلم (١٦٤٠) (٧)، وابن ماجه (٢١٢٣)، والنسائي في "الكبرى" (٤٧٢٧) من طريقين عن عبد الرحمن بن هرمز، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٦٥٩) من طريق همام بن منبه، ومسلم (١٦٤٠) (٥) و (٦)، والترمذي (١٦١٩)، والنسائي (٤٧٢٨) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي، كلاهما، عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٢٠٨) و (٧٢٩٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٧٦). تنبيه: هذا الحديث أثبتناه من (أ) و (هـ)، وأشار في (أ) إلى أنه في رواية ابن العبد، قلنا: وهو أيضاً في رواية ابن داسه، لأن (هـ) عندنا بروايته.
حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ طَلْحَةَ بْنِ عَبْدِ الْمَلِكِ الأَيْلِيِّ، عَنِ الْقَاسِمِ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم : " مَنْ نَذَرَ أَنْ يُطِيعَ اللَّهَ فَلْيُطِعْهُ، وَمَنْ نَذَرَ أَنْ يَعْصِيَ اللَّهَ فَلاَ يَعْصِهِ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লালাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি আল্লাহ্র আনুগত্যের মানত করে, সে যেন তাঁর আনুগত্য করে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ্র নাফরমানীর মানত করে, সে যেন তা না করে।
সহীহঃ ইবুন মাজাহ (২১২৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (6696، 6700)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. القاسم: هو ابن محمد بن أبي بكر الصديق. وهو في "الموطأ" ٢/ ٤٧٦. وأخرجه البخاري (٦٦٩٦) و (٦٧٠٠)، وابن ماجه (٢١٢٦)، والترمذي (١٦٠٥) و (١٦٠٦)،والنسائي في "الكبرى" (٤٧٢٩) و (٤٧٣٠) و (٤٧٣١) من طريقين عن طلحة بن عبد الملك الأيلي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠٧٥)، و "صحيح ابن حبان" (٤٣٨٧).
حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ أَبُو مَعْمَرٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ : " لاَ نَذْرَ فِي مَعْصِيَةٍ، وَكَفَّارَتُهُ كَفَّارَةُ يَمِينٍ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ গুনাহের কাজে মানত করা জায়িয নাই। (কেউ করলে) এর কাফফারাহ হবে শপথ ভঙ্গের কাফফারাহ্র সমান।
সহীহঃ ইবুন মাজাহ (২১২৫)।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، الزھري صرح بالسماع عند النسائي (3869 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، لانقطاعه. الزهري -وهو محمد بن مسلم- لم يسمعه من أبي سلمة - وهو ابن عبد الرحمن فيما قاله أبو داود والترمذي، ونقله عن الإِمام البخاري في "جامعه" و"العلل" ٢/ ٦٥١، والواسطة بينهما سليمان بن أرقم فقد رواه محمد بن أبي عتيق وموسى بن عقبة كلاهما عن الزهري، عن سليمان ابن أرقم عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن عائشة، وسيمان بن أرقم متروك الحديث. قال الدارقطني في "العلل" الورقة ٧٣: هذا الحديث روي عن الزهري عن أبي سلمة، عن عائشة مرفوعاً، وروي عن الزهري قال: حدَّث أبو سلمة، وروي عن الزهري، عن سليمان بن أرقم، عن يحيى بن كثير، عن أبي سلمة عن عائشة، وهذا هو الصحيح. وقال الحافظ في "الفتح" ١١/ ٥٨٧ بعد أورد الحديث: أخرجه عن أصحاب السنن ورواته ثقات، لكنه معلول، فإن الزهري رواه عن أبي سلمة، ثم بين أنه حمله عن سليمان ابن أرقم، عن يحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة، فدلسه بإسقاط اثنين، وحسَّن الظن بسليمان بن أرقم، وهو عند غيره ضعيف باتفاقهم. لكن تابع الزهري على روايته يحيى بن أبي كثير عند الطيالسي (١٤٨٤) فقد رواه عن أبي سلمة، عن عائشة. وإسناده صحيح. وأخرجه الترمذي (١٦٠٣)، والنسائي في "المجتبى" (٣٨٣٥ - ٣٨٣٨) من طرق عن يونس بن يزيد الأيلي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٠٩٨). وانظر ما بعده. وله شاهد من حديث ابن عباس بسند قوي عند ابن الجارود (٩٣٥) ومن طريقه البيهقي ١٠/ ٧٢ رفعه: "النذر نذران، فما كان لله، فكلفارته الوفاء، وما كان للشيطان فلا وفاء فيه، وعليه كفارة يمين". وفي الباب حديث عقبة بن عامر مرفوعاً عند مسلم (١٦٤٥) وسيرد عند أبي داود (٣٢٢٤) ولفظه "كفارة النذر كفارة يمين". وفي "المغني" لابن قدامة ١٣/ ٦٢٤: نذر المعصية لا يحل الوفاء به إجماعاً … ويجب على الناذر كفارة يمين، روي نحو هذا عن ابن مسعود وابن عباس وجابر وعمران بن حُصين وسمرة بن جندب، وبه قال الثوري وأبو حنيفة وأصحابه. وروي عن أحمد ما يدل على أنه لا كفارة عليه، فإنه قال فيمن نذر: ليهدمن دار غيره لبنة لبنة: لا كفارة عليه، وهذا في معناه وروي هذا عن مسروق والشعبي وهو مذهب مالك والشافعي … وانظر لزاماً "تهذيب السنن" لابن القيم ٤/ ٣٧٣ - ٣٧٦.
حَدَّثَنَا ابْنُ السَّرْحِ، قَالَ حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، بِمَعْنَاهُ وَإِسْنَادِهِ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمِعْتُ أَحْمَدَ بْنَ شَبُّويَةَ، يَقُولُ قَالَ ابْنُ الْمُبَارَكِ - يَعْنِي فِي هَذَا الْحَدِيثِ - حَدَّثَ أَبُو سَلَمَةَ، فَدَلَّ ذَلِكَ عَلَى أَنَّ الزُّهْرِيَّ، لَمْ يَسْمَعْهُ مِنْ أَبِي سَلَمَةَ، وَقَالَ أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدٍ : وَتَصْدِيقُ ذَلِكَ مَا حَدَّثَنَا أَيُّوبُ - يَعْنِي ابْنَ سُلَيْمَانَ - قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمِعْتُ أَحْمَدَ بْنَ حَنْبَلٍ يَقُولُ : أَفْسَدُوا عَلَيْنَا هَذَا الْحَدِيثَ . قِيلَ لَهُ : وَصَحَّ إِفْسَادُهُ عِنْدَكَ وَهَلْ رَوَاهُ غَيْرُ ابْنِ أَبِي أُوَيْسٍ قَالَ : أَيُّوبُ كَانَ أَمْثَلَ مِنْهُ . يَعْنِي أَيُّوبَ بْنَ سُلَيْمَانَ بْنِ بِلاَلٍ، وَقَدْ رَوَاهُ أَيُّوبُ .
আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমি আহমাদ ইবনু শাব্বুয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) কে বলতে শুনেছি, ইবনুল মুবারক(রাহিমাহুল্লাহ) এ হাদীস সম্পর্কে বলেছেন, যুহরী এ হাদীসটি আবূ সালামাহ্র কাছে শোনেননি। আবূ দাঊদ(রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি আহ্মাদ ইবনু হাম্বল(রাহিমাহুল্লাহ) – কে বলতে শুনেছি, তারা আমাদের জন্য হাদীসকে ত্রুটিযুক্তভাবে বর্ণনা করেছে- সুতরাং একথা কি সঠিক? আর ইবনু আবূ উয়াইস ছাড়া অপর কেউ কি হাদীসটি বর্ণনা করেছেন? তিনি উত্তরে বলেন, বিশ্বস্ততায় আইয়ুব ইবনু সুলাইমান ইবনু বিলাল আবূ উয়াইসের সম-পর্যায়ের। হাদীসটি আইয়ুবও বর্ণনা করেছেন।
আমি এটি সহীহ ও যঈফেও পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (3290)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح كسابقه. ابن السرح: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله، وابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه ابن ماجه (٢١٢٥)، والنسائي في "المجتبى" (٣٨٣٤) من طريق ابن وهب، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. تنبيه: هذا الطريق أثبتناه من (أ) و (هـ)، وأشار في (أ) إلى أنه في رواية ابن العبد. وذكر المزي في "الأطراف" (١٧٧٧٠): أنه في رواية ابن داسه أيضاً. قلنا: هو عندنا في (هـ) وهي بروايته.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدٍ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنَا أَيُّوبُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ أَبِي أُوَيْسٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ بِلاَلٍ، عَنِ ابْنِ أَبِي عَتِيقٍ، وَمُوسَى بْنِ عُقْبَةَ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ أَرْقَمَ، أَنَّ يَحْيَى بْنَ أَبِي كَثِيرٍ، أَخْبَرَهُ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم : " لاَ نَذْرَ فِي مَعْصِيَةٍ، وَكَفَّارَتُهُ كَفَّارَةُ يَمِينٍ " . قَالَ أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدٍ الْمَرْوَزِيُّ : إِنَّمَا الْحَدِيثُ حَدِيثُ عَلِيِّ بْنِ الْمُبَارَكِ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ الزُّبَيْرِ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم . أَرَادَ أَنَّ سُلَيْمَانَ بْنَ أَرْقَمَ وَهِمَ فِيهِ وَحَمَلَهُ عَنْهُ الزُّهْرِيُّ وَأَرْسَلَهُ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ عَنْ عَائِشَةَ رَحِمَهَا اللَّهُ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ : رَوَى بَقِيَّةُ عَنِ الأَوْزَاعِيِّ عَنْ يَحْيَى عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ الزُّبَيْرِ بِإِسْنَادِ عَلِيِّ بْنِ الْمُبَارَكِ مِثْلَهُ .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ পাপকাজে কোন মানত নেই। এর কাফফারাহ শপথ ভঙ্গের কাফফারার অনুরূপ। আহ্মাদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-মারওয়াযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সঠিক সানাদ হলোঃ ‘আলী ইবনুল মুবারক – ইয়াহ্ইয়া ইবনু আবূ কাসির – মুহাম্মাদ ইবনুয যুবাইর - তার পিতা - ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) – নাবী(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আল-মারওয়াযী এর দ্বারা বুঝাতে চেয়েছেন যে, এ হাদীস সম্পর্কে সুলাইমান ইবনু আরক্বাম সন্দিহান। তার থেকে আয-যুহরী হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু মুরসালভাবে আবূ সালামা – ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, বাক্বিয়্যাহ এ হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-আওযাই-ইয়াহ্ইয়া-মুহাম্মাদ ইবনুয যুবাইর – ‘আলী ইবনুল মুবারকের সানাদে পূর্বের হাদীসের অনুরূপ।
সহীহঃ পূর্বেরটি দ্বারা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (3435، 3441) ، و للحدیث شواھد منھا الحدیث السابق (3290)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف جداً، سليمان بن أرقم متروك الحديث. لكن روي الحديث من طريق آخر صحيح كما أشرنا إليه في الطريق الذي قبله. وأخرجه الترمذي (١٦٥٤)، والنسائي (٣٨٣٩) من طريقين عن أيوب بن سليمان، بهذا الإسناد. وقد بسطنا القول في تخريجه في "مسند أحمد" (٢٦٠٩٨) فارجع إليه.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ، قَالَ أَخْبَرَنِي يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الأَنْصَارِيُّ، أَخْبَرَنِي عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ زَحْرٍ، أَنَّ أَبَا سَعِيدٍ، أَخْبَرَهُ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ مَالِكٍ أَخْبَرَهُ أَنَّ عُقْبَةَ بْنَ عَامِرٍ أَخْبَرَهُ : أَنَّهُ، سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَنْ أُخْتٍ لَهُ نَذَرَتْ أَنْ تَحُجَّ حَافِيَةً غَيْرَ مُخْتَمِرَةٍ فَقَالَ : " مُرُوهَا فَلْتَخْتَمِرْ وَلْتَرْكَبْ، وَلْتَصُمْ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ " .
উক্ববাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার বোন পদব্রজে এবং খালি মাথায় হাজ্জ করার মানত করেছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তাকে ওড়না পরতে, যানবাহনে আরোহণ করতে এবং তিন দিন সওম পালন করতে আদেশ করো।
দুর্বলঃ ইবনু মাজাহ (২১৩৪), যইফ সুনান আত-তিরমিযী, যইফ সুনান নাসায়ী, ইরওয়া (২৫৯২), মিশকাত (৩৪৪২)।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، ترمذی (1544) نسائی (3846) ابن ماجہ (2134) ، عبیداللّٰہ بن زحر ضعیف و قال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 54/5) وقال الحافظ ابن حجر: اتفق الأکثر علی توثیقہ (نتائج الأفکار 303/2) وھو خطأ بل ضعفہ الجمھور کما قال الھیثمي وتابعہ بکر بن سوادۃ (أحمد 147/4) ولکن فی السند إلیہ: ابن لھیعۃ وھو ضعیف من جھۃ حفظہ ، (انوار الصحیفہ ص 120)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح دون قوله: "ولتصم ثلاثة أيام" وهذا إسناد ضعيف، عُبيد الله ابن زحر مختلف فيه والأكثر على تضعيفه. أبو سعيد: هو الرُّعيني جُعْثُل بن هاعان، وعبد الله بن مالك: هو اليَحْصبي. وأخرجه ابن ماجه (٢١٣٤)، والترمذي (١٦٢٥)، والنسائي (٣٨١٥) من طرق عن يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد، وقال الترمذي: هذا حديث حسن، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق. وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١٢٩، والطبراني ١٧/ (٨٨٦) دون قوله: "ولتصم ثلاثة أيام" وسنده حسن. وهو في "مسند أحمد" (١٧٣٠٦) وانظر تمام الكلام عليه فيه. والصحيح عن عقبة بن عامر في كفارة النذر ما أخرجه مسلم (١٦٤٥)، وسيأتي عند المصنف برقم (٣٣٢٣) و (٣٣٢٤)، ولفظه: "كفارة النذر كفارة اليمين". فقد أطلق في هذا الحديث ولم يقيده بالصوم. وقد جاء تقييده بالهدي بدل الصوم في حديث ابن عباس: أن أخت عقبة بن عامر نذرت … وسيأتي عند المصنف برقم (٣٢٩٦). وإسناده صحيح. وانظر ما بعده وما سيأتي برقم (٣٢٩٩).
حَدَّثَنَا مَخْلَدُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، حَدَّثَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، قَالَ كَتَبَ إِلَىَّ يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ أَخْبَرَنِي عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ زَحْرٍ، مَوْلَى لِبَنِي ضَمْرَةَ - وَكَانَ أَيَّمَا رَجُلٍ - أَنَّ أَبَا سَعِيدٍ الرُّعَيْنِيَّ أَخْبَرَهُ بِإِسْنَادِ يَحْيَى وَمَعْنَاهُ .
মাখলাদ ইবনু খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আবূ সাইদ আর-রু’আইনী উপরোক্ত হাদীস ইয়াহ্ইয়া ইবনু সাইদ কর্তৃক বর্ণিত সানাদের অনুরূপ সানাদে একই হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، ترمذی (1544) نسائی (3846) ابن ماجہ (2134) ، عبیداللّٰہ بن زحر ضعیف و قال الھیثمي: وضعفہ الجمھور (مجمع الزوائد 54/5) وقال الحافظ ابن حجر: اتفق الأکثر علی توثیقہ (نتائج الأفکار 303/2) وھو خطأ بل ضعفہ الجمھور کما قال الھیثمي وتابعہ بکر بن سوادۃ (أحمد 147/4) ولکن فی السند إلیہ: ابن لھیعۃ وھو ضعیف من جھۃ حفظہ ، (انوار الصحیفہ ص 120)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح كسابقه دون ذكر الصوم فيه. ابن جُرَيْج: هو عبد الملك بن عبد العزيز. وانظر ما قبله.