হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (3335)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، ح وَحَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَنْبَسَةُ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، قَالَ قَالَ ابْنُ الْمُسَيَّبِ إِنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏"‏ الْحَلِفُ مَنْفَقَةٌ لِلسِّلْعَةِ مَمْحَقَةٌ لِلْبَرَكَةِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ ابْنُ السَّرْحِ ‏"‏ لِلْكَسْبِ ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি : কসম কাটলে অধিক মাল বিক্রিতে সহায়ক হতে পারে কিন্তু তা বরকত দূর করে দেয়। ইবনুস সারহির বর্ণনায় রয়েছে : উপার্জনে (বরকত) দূর করে দেয়। হাদীসটি তিনি সা‘ঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব ও আবূ হুরায়রা সূত্রে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছ থেকে বর্ণনা করেছেন।



সহীহ : নাসায়ী (৪৪৬১, ৪১৫৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2087) صحیح مسلم (1606)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح من جهة ابن وهب -وهو عبد الله-، فأما عنبسة -وهو ابن خالد بن يزيد الأيلي- فضعيف. وأخرجه البخاري (٢٠٨٧)، ومسلم (١٦٠٦)، والنسائي (٤٤٦١) من طريق ابن شهاب الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٢٠٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٠٦) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحُرقي مولاهم، عن أبي هريرة مقيداً باليمين الكاذبة. تنبيه: من قوله: قال: "اللهم هل بلّغت … " إلى آخر الحديث أثتناه من (هـ) وحدها. وقوله: "الحلف" بفتح الحاء وكسر اللام: اليمين الكاذبة على البيع، وفي رواية مسلم: "اليمين" ولأحمد "اليمين الكاذبة". "منفقة": مفعلة من: نفقَ البيعُ: راج ضد كسد. "للسلعة" بكسر السين: البضاعة، أي: رواج لها. ممحقة: مفعلة من المحق، أي: مذهبة للبركة، أي: مَظنَّة للمحق وهو النقص والمحو والإبطال. قال الراغب: فحق المسلم أن يتحاشى من الاستعانة باليمين في الحق، وأن يتحقق قدر المقسم به، ويعلم أن الأعراض الدنيوية أخسُّ من أن يُفزع فيها إلى الحلف بالله، فإنه إذا قال: والله إنه لكذا تقديره: إن ذلك حق كما أن وجود الله حق، وهذا الكلام يتحاشى منه من في قلبه حبة خردل من تعظيم الله ﴿وَلَا تَشْتَرُوا بِآيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا﴾ [البقرة:٤١]









সুনান আবী দাউদ (3336)


حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُعَاذٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ سِمَاكِ بْنِ حَرْبٍ، حَدَّثَنِي سُوَيْدُ بْنُ قَيْسٍ، قَالَ جَلَبْتُ أَنَا وَمَخْرَمَةُ الْعَبْدِيُّ، بَزًّا مِنْ هَجَرَ فَأَتَيْنَا بِهِ مَكَّةَ فَجَاءَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَمْشِي فَسَاوَمَنَا بِسَرَاوِيلَ فَبِعْنَاهُ وَثَمَّ رَجُلٌ يَزِنُ بِالأَجْرِ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ زِنْ وَأَرْجِحْ ‏"‏ ‏.‏




সুওয়াইদ ইবনু ক্বায়িস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি এবং মাখরাফাহ আল-‘আবদী ‘হাজার’ নামক স্থান থেকে ব্যবসায়ের জন্য কাপড় কিনে আনি। অতঃপর আমরা তা মক্কায় নিয়ে আসি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেঁটে আমাদের কাছে আসলেন। তিনি আমাদের সাথে একটি পাজামার দর করলেন, আমরা সেটি তাঁর কাছে বিক্রি করলাম। এ সময় এক ব্যক্তি পারিশ্রমিকের বিনিময়ে (জিনিসপত্র) ওজন করে দিচ্ছিল। তিনি তাকে বলেনঃ ওজন করো এবং একটু বেশী দাও।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২২০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2924) ، انظر الحدیث الآتي (3337)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل سماك بن حرب. سفيان: هو ابن سعيد الثوري. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٢٠) و (٣٥٧٩)، والترمذي (١٣٥٣)، والنسائي (٤٥٩٢) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث سويد حديث حسن صحيح. وأهل العلم يستحبون الرُّجحان في الوزن. ورواية ابن ماجه الثانية مختصرة بلفظ: أتانا النبي ﷺ فسَاومنا سراويل. وهو في "مسند أحمد" (١٩٠٩٨). وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "زن وأرجِح" فيه دليل على جواز هبة المشاع، وذلك أن مقدار الرجحان هبة منه للبائع، وهو غير متميز من جملة الثمن. وفيه دليل على جواز أخذ الأجرة على الوزن والكيل، وفي معناهما أجرة القسام والحاسب، وكان سعيد بن المسيب ينهى عن أجرة القسام وكرهها أحمد بن حنبل. قال الشيخ: وفي مخاطبة النبي ﷺ وأمره إياه به كالدليل على أن وزن الثمن على المشتري، فإذا كان الوزن عليه، لأن الإبقاء يلزمه، فقد دل على أن أجرة الوازن عليه، فإذا كان على المشتري فقياسه في السلعة المبيعة أن تكون على البائع.









সুনান আবী দাউদ (3337)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، وَمُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، - الْمَعْنَى قَرِيبٌ - قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سِمَاكِ بْنِ حَرْبٍ، عَنْ أَبِي صَفْوَانَ بْنِ عُمَيْرَةَ، قَالَ أَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِمَكَّةَ قَبْلَ أَنْ يُهَاجِرَ بِهَذَا الْحَدِيثِ وَلَمْ يَذْكُرْ يَزِنُ بِالأَجْرِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ قَيْسٌ كَمَا قَالَ سُفْيَانُ وَالْقَوْلُ قَوْلُ سُفْيَانَ ‏.‏




আবূ সাফওয়ান ইবনু ‘উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আসলাম তখনও তিনি (মাদীনাহ‌্য়) হিজরাত করেননি। এরপর হাদীসের বাকী অংশ উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ। কিন্তু এই বর্ণনায় : “পারিশ্রমিকের বিনিময়ে” কথাটি উল্লেখ নেই। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ক্বায়িসও সুফিয়ানের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তবে সুফিয়ানের বর্ণনা সঠিক।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২২১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد خالف فيه شعبةُ -وهو ابن الحجاج- سفيانَ الثوريَّ في الإسناد السابق، حيث رواه شعبةُ عن سماك بن حرب، عن أبي صفوان بن عميرة، وقول سفيان مقدم على قول شعبة فيما قاله شعبة نفسه كلما في الروايتين الآتيتين. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٢١)، والنسائي (٤٥٩٣) من طريق شعبة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٠٩٩). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (3338)


حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي رِزْمَةَ، سَمِعْتُ أَبِي يَقُولُ، قَالَ رَجُلٌ لِشُعْبَةَ خَالَفَكَ سُفْيَانُ ‏.‏ قَالَ دَمَغْتَنِي ‏.‏ وَبَلَغَنِي عَنْ يَحْيَى بْنِ مَعِينٍ قَالَ كُلُّ مَنْ خَالَفَ سُفْيَانَ فَالْقَوْلُ قَوْلُ سُفْيَانَ ‏.‏




ইবনু আবূ রিযমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, এক ব্যক্তি শু‘বাহকে বললেন, সুফিয়ান আপনার বিপরীত করেছেন। তিনি বললেন, তুমি আমার মস্তিষ্ক খেয়েছো! ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ইয়াহইয়া ইবনু মা‘ঈন থেকে জানতে পেরেছি, তিনি বলেছেন, কেউ সুফিয়ানের বিপরীত বর্ণনা করলে সুফিয়ানের বর্ণনাই নির্ভরযোগ্য গণ্য হবে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. ابن أبي رِزْمة: هو محمد بن عبد العزيز بن أبي رِزمة.









সুনান আবী দাউদ (3339)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ شُعْبَةَ، قَالَ كَانَ سُفْيَانُ أَحْفَظَ مِنِّي ‏.‏




শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, সুফিয়ানের স্মরণশক্তি আমার স্মরণশক্তির চেয়ে অধিক মজবুত।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. وكيع: هو ابن الجرّاح الرؤاسي.









সুনান আবী দাউদ (3340)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ دُكَيْنٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ حَنْظَلَةَ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ الْوَزْنُ وَزْنُ أَهْلِ مَكَّةَ وَالْمِكْيَالُ مِكْيَالُ أَهْلِ الْمَدِينَةِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَذَا رَوَاهُ الْفِرْيَابِيُّ وَأَبُو أَحْمَدَ عَنْ سُفْيَانَ وَافَقَهُمَا فِي الْمَتْنِ وَقَالَ أَبُو أَحْمَدَ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ مَكَانَ ابْنِ عُمَرَ وَرَوَاهُ الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ عَنْ حَنْظَلَةَ قَالَ ‏"‏ وَزْنُ الْمَدِينَةِ وَمِكْيَالُ مَكَّةَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَاخْتُلِفَ فِي الْمَتْنِ فِي حَدِيثِ مَالِكِ بْنِ دِينَارٍ عَنْ عَطَاءٍ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي هَذَا ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ ওজনের ক্ষেত্রে মক্কাবাসীদের ওজন মানসম্মত এবং পরিমাপে মদীনাহ্‌বাসীদের পরিমাপ মানসম্মত। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আল-ফিরয়ারী এবং আবূ আহমদ এ হাদীস সুফিয়ান থেকে এভাবেই বর্ণনা করেছেন। আর ইবনু দুকাইন হাদীসের মতনে উভয়ের সাথে একমত হয়েছেন। আবূ আহমদ ইবনু ‘উমারের পরিবর্তে ইবনু ‘আব্বসের নাম উল্লেখ করেছেন। ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম এ হাদীস হানযালাহ হতে বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে : মাদীনাহ্‌র ওজন ও মক্কার পরিমাপ মানসম্মত। ইমাম আবূ দাঊদ বলেন, ‘আত্বা হতে মালিক ইবনু দীনার কর্তৃক বর্ণিত নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর এ হাদীসের মতনে মতভেদ আছে।



সহীহ : নাসায়ী (৪৫৯৪, ৪২৮১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، نسائی (2521ب،4598) ، الثوري عنعن وتابعہ الولید بن مسلم والولید مدلس وعنعن أیضًا ، (انوار الصحیفہ ص 120)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. طاووس: هبر ابن كيسان اليماني، وحنظلة: هو ابن أبي سفيان، وسفيان: هو الثوري. وابن دُكَين: هو أبو نعيم الفضل بن دُكَين. وقد صحح هذا الحديث الدارقطني والنووي وابن دقيق العيد والعلائي فيما نقله عنهم المناوي في "فيض القدير" ٦/ ٣٧٤. وأخرجه النسائي (٢٥٢٠) و (٤٥٩٤) من طريق أبي نعيم الفضل بن دُكين، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٣٢٨٣). قال الخطابي: إنما جاء الحديث في نوع ما يتعلق به أحكام الشريعة في حقوق الله سبحانه دون ما يتعامل به الناس في بياعاتهم وأمور معاشهم، فقوله: "الوزن وزن أهل مكة" يريد وزن الذهب والفضة خصوصاً دون سائر الأوزان، ومعناه أن الوزن الذي يتعلق به حق الزكاة في النقود وزن أهل مكة، وهي دراهم الإسلام المعدَّلة منها العشرة بسبعة مثاقيل، فإذا ملك رجل منها مئتي درهم وجبت فيها الزكاة، وذلك أن الدراهم مختلفة الأوزان في بعض البلدان والأماكن … والدرهم الوزان الذي هو من دراهم الإسلام الجائزة بينهم في عامة البلدان: ستة دوانيق. وهو نقد أهل مكة ووزنهم الجائز بينهم … قال: وأما الدنانير فمشهور من أمرها أنها كانت تحمل إليهم من بلاد الروم، وكانت العرب تسميها الهِرَقْلية … فلما أراد عبدُ الملك بن مروان ضرب الدنانير والدراهم سأل عن أوزان الجاهلية، فأجمعوا له على أن المثقال اثنان وعشرون قيراطاً إلا حبة بالشامي، وأن العشرة دراهم وزن سبعة مثاقيل، فضربها على ذلك. قال: فأما أوزان الأرطال والأمناء، فهو بمعزل عن هذا، وللناس فيها عادات مختلفة في البلدان قد أقِرَّوا عليها، مع تباينها واختلافها، كالشامي والحجازي والعراقي … وكل من أهل هذه البلدان محمول على عرف بلده وعادة قومة، لا يُنقَل عنها، ولا يُحمل على سواها، وليست كالدراهم والدنانير التي حُمل الناس فيها على عيارٍ واحدٍ وحكمٍ سواء … ثم قال: وأما قوله: "والمكيال مكيال أهل المدينة" فإنما هو الصاع الذي يتعلق به وجوب الكفارات، ويجب إخراج صدقة الفطر به، ويكون تقدير النفقات وما في معناها بعياره، والله أعلم. وللناس صيعان مختلفة: فصاع أهل الحجاز خمسة أرطال وثلث بالعراقي. وصاع أهل البيت -فيما يذكلره زعماء الشيعة- تسعة أرطال وثلث، وينسبونه إلى جعفر بن محمد، وصاع أهل العراق ثمانية أرطال، وهو صاع الحجاج الذي سعّر به على أهل الأسواق. ولما ولي خالد بن عبد الله القسري العراق ضاعف الصاع فبلغ به ستة عر رطلاً. فإذا جاء باب المعاملات حملنا الصاع العراقي على الصاع المتعارف المشهور عند أهل بلاده، والحجازي على الصاع المعروف ببلاد الحجاز، وكذلك كل أهل بلد على عرف أهله. وإذا جاءت الشريعة وأحكامها فهو صاع المدينة، فهو معنى الحديث ووجهه عندي، والله أعلم. قلنا: مقدار ما سبَق ذكره من المكاييل والأوزان بالمقاييس المعاصرة كما سيأتى: أما الدرهم فيساوي (٢.٩٧٥) غم. وأما الدينار فيساوي (٤.٢٥) غم. والقيراط يساوي (٠.٢٤٧٥) غم إذا اعتبرنا المثقال مقسماً إلى اثنين وعشرين قيراطا. والحبة تساوي (٠.٠٥٩) غم من الذهب. والعشرة دراهم تساوي (٢.٩٧٥ × ١٠) (٢٩.٧٥) غم. والرطل البغدادي يساوي (٤٠٨) غم، وعليه يكون الصالح البغدادي (٢١٧٦) غم وتحسب سائر الصيعان على أساس الرطل البغدادي.









সুনান আবী দাউদ (3341)


حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مَنْصُورٍ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ مَسْرُوقٍ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ سَمْعَانَ، عَنْ سَمُرَةَ، قَالَ خَطَبَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏"‏ هَا هُنَا أَحَدٌ مِنْ بَنِي فُلاَنٍ ‏"‏ ‏.‏ فَلَمْ يُجِبْهُ أَحَدٌ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ هَا هُنَا أَحَدٌ مِنْ بَنِي فُلاَنٍ ‏"‏ ‏.‏ فَلَمْ يُجِبْهُ أَحَدٌ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ هَا هُنَا أَحَدٌ مِنْ بَنِي فُلاَنٍ ‏"‏ ‏.‏ فَقَامَ رَجُلٌ فَقَالَ أَنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ فَقَالَ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَا مَنَعَكَ أَنْ تُجِيبَنِي فِي الْمَرَّتَيْنِ الأُولَيَيْنِ أَمَا إِنِّي لَمْ أُنَوِّهْ بِكُمْ إِلاَّ خَيْرًا إِنَّ صَاحِبَكُمْ مَأْسُورٌ بِدَيْنِهِ ‏"‏ ‏.‏ فَلَقَدْ رَأَيْتُهُ أَدَّى عَنْهُ حَتَّى مَا بَقِيَ أَحَدٌ يَطْلُبُهُ بِشَىْءٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ سَمْعَانُ بْنُ مُشَنَّجٍ ‏.‏




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুত্ববাহ প্রদানের সময় জিজ্ঞেস করলেন : এখানে অমুক গোত্রের কেউ আছে কি? এতে কেউ সাড়া দিলো না। তিনি পুনরায় জিজ্ঞেস করলেন : এখানে অমুক গোত্রের কেউ আছে কি? এবারও কেউ সাড়া দিলো না। তিনি আবার জিজ্ঞেস করলেন : এখানে অমুক গোত্রের কোন লোক আছে কি? তখন এক ব্যক্তি উঠে বললো, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আমি উপস্থিত আছি। তিনি বললেনঃ প্রথম দু’বারের ডাকে তোমাকে সাড়া দিতে কিসে বাধা দিয়েছে? আমি তোমাদেরকে একমাত্র কল্যাণের জন্যই আহবান করি। তোমাদের গোত্রের এ লোক ঋণের কারণে আটক রয়েছে। সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি দেখলাম, ঐ ব্যক্তি তার পক্ষ হতে সব ঋণ পরিশোধ করে দিয়েছে। ফলে তার কোন পাওনাদারই বাকী থাকলো না। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সাম‘আনের পিতার নাম মুশান্নাজ।



হাসান : নাসায়ী (৪৬৮৪, ৪৩৬৮)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4689) ، قال البخاري:’’ لا نعرف لسمعان سماعًا من سمرۃ ولاللشعبي سماعًا منہ‘‘ (التاریخ الکبیر 204/4) ، (انوار الصحیفہ ص 121)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل سمعان -وهو ابن مُشَنَّج- فقد وثقه ابن ماكولا والعجلي، وذكره ابن خلفون وابن حبان في "الثقات"، ورواه غير واحد عن الشعبي -وهو عامر بن شَراحيل- عن سمرة بن جندب، دون ذكر سمعان بن مُشَنَّج، وسماع الشعبي عن سمرة محتمل، فقد ولد الشعبي في حدود سنة عشرين، وتوفي سمرة سنة ثمان وخمسين، بل قد وقع تصريحه بسماعه من سمرة عند الطيالسي (٨٩١) عن شعبة، عن فراس بن يحيى، عنه، وعليه يكون إسناده صحيحاً إن شاء الله، ويكون الشعبي سمعه على الوجهين، والله تعالى أعلم. وأخرجه عبد الرزاق (١٥٢٦٣)، وأحمد (٢٠٢٣١) و (٢٠٢٣٣)، وابنه عبد الله في زياداته على "المسند" (٢٠٢٣٤)، والنسائي (٤٦٨٥)، والروياني في "مسنده" (٨٤٥) والطبراني في "الكبير" (٦٧٥٥)، والحاكم ٢/ ٢٦، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٢/ ١٣٦ - ١٣٧ في ترجمة سمعان، من طريق سعيد بن مسروق الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٦٧٥٥) من طريق سعيد الوراق، و (٦٧٥٦) من طريق وكيع، كلاهما عن سفيان الثوري، عن أبيه، عن الشعبي، عن سمرة. دون ذكر سمعان. وأخرجه الطيالسي (٨٩١) و (٨٩٢) وأحمد (٢٠٢٣٢)، والطبراني (٦٧٥٠ - ٦٧٥٣)، والحاكم ٢/ ٢٥ من طريق فراس بن يحيى، وأحمد (٢٠١٢٤)، والطبراني (٦٧٥٤)، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ٧٦، وفي "شعب الإيمان" (٥٥٤٥) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، والطبراني في "الأوسط" (٣٠٧٠) من طريق العلاء بن عبد الكريم، ثلاثتهم عن الشعبي، عن سمرة بن جندب. دون ذكر سمعان في إسناده. وفي باب حبس الميت بدينه عن أبي هريرة عند ابن ماجه (٢٤١٣)، والترمذي (١١٠١) و (١١٠٢) وهو حديث صحيح، ولفظه: "نفس المؤمن معلقة بدينه حتى يُقضى عنه". وعن سعد بن الأطول عند ابن ماجه (٢٤٣٣)، وهو حديث صحيح. وانظر تمام شواهده في "مسند أحمد" (٢٠٠٧٦).









সুনান আবী দাউদ (3342)


حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنِي سَعِيدُ بْنُ أَبِي أَيُّوبَ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا عَبْدِ اللَّهِ الْقُرَشِيَّ، يَقُولُ سَمِعْتُ أَبَا بُرْدَةَ بْنَ أَبِي مُوسَى الأَشْعَرِيَّ، يَقُولُ عَنْ أَبِيهِ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ ‏ "‏ إِنَّ أَعْظَمَ الذُّنُوبِ عِنْدَ اللَّهِ أَنْ يَلْقَاهُ بِهَا عَبْدٌ - بَعْدَ الْكَبَائِرِ الَّتِي نَهَى اللَّهُ عَنْهَا - أَنْ يَمُوتَ رَجُلٌ وَعَلَيْهِ دَيْنٌ لاَ يَدَعُ لَهُ قَضَاءً ‏"‏ ‏.‏




আবূ বুরদাহ ইবনু মূসা আল-আশ‘আরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহ্‌র নিকট নিষিদ্ধ কবীরাহ গুনাহসমূহের পরে সবচেয়ে বড় গুনাহ হলো, কোন ব্যক্তি ঋণগ্রস্ত অবস্থায় মৃত্যুবরণ করে আল্লাহ্‌র দরবারে উপস্থিত হওয়া এবং এই ঋণ পরিশোধের কোন ব্যবস্থা না করে যাওয়া।



দুর্বল : মিশকাত (২৯২২), যঈফ আল-জামি‘উস সাগীর(১৩৯২)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو عبد اللّٰہ القرشي لم أجد من وثقہ وھو: ’’ مجہول ‘‘کما فی التحریر (8210) ، (انوار الصحیفہ ص 121)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة حال أبي عبد الله القُرشي. وأخرجه أحمد (١٩٤٩٥)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (٥٥٤١) و (٥٥٤٢)، والمزي في ترجمة أبي عبد الله القرشي من "تهذيب الكمال" من طريق سعيد بن أبي أيوب، بهذا الإسناد.









সুনান আবী দাউদ (3343)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُتَوَكِّلِ الْعَسْقَلاَنِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لاَ يُصَلِّي عَلَى رَجُلٍ مَاتَ وَعَلَيْهِ دَيْنٌ فَأُتِيَ بِمَيِّتٍ فَقَالَ ‏"‏ أَعَلَيْهِ دَيْنٌ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا نَعَمْ دِينَارَانِ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ صَلُّوا عَلَى صَاحِبِكُمْ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ أَبُو قَتَادَةَ الأَنْصَارِيُّ هُمَا عَلَىَّ يَا رَسُولَ اللَّهِ ‏.‏ قَالَ فَصَلَّى عَلَيْهِ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا فَتَحَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏"‏ أَنَا أَوْلَى بِكُلِّ مُؤْمِنٍ مِنْ نَفْسِهِ فَمَنْ تَرَكَ دَيْنًا فَعَلَىَّ قَضَاؤُهُ وَمَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কোন ব্যক্তি ঋণগ্রস্ত অবস্থায় মারা গেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজে তার জানাযা পড়তেন না। একদা তাঁর নিকট একটি লাশ আনা হলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন : তার উপর কোন ঋণ আছে কি? সাহাবীগণ বললেন, হাঁ, দুই দীনার ঋণ আছে। তিনি বললেনঃ তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জানাযা আদায় করো। তখন আবূ ক্বাতাদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! ঋণ পরিশোধের যিম্মা আমি নিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জানাযা পড়লেন। পরবর্তীতে আল্লাহ্‌ যখন তাঁর রাসূলকে বিভিন্ন যুদ্ধে বিজয়ী করলেন, তখন তিনি বললেনঃ আমি প্রত্যেক মুমিনের তার নিজের সত্তার চাইতে অধিক প্রিয়। সুতরাং কেউ ঋণ রেখে মারা গেলে তা পরিশোধের দায়িত্ব আমার। আর কেউ সম্পদ রেখে মারা গেলে তা তার উত্তরাধিকারদের প্রাপ্য।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (৪৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، وللحدیث شواھد عند أحمد (3/330) والحاکم (2/57، 58) وغیرھما، انظر الحدیث السابق (2954)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٥٢٥٧)، ومن طريقه أخرجه النسائي (١٩٦٢). وهو في "صحيح ابن حبان" (٣٠٦٤). وأخرجه البخاري (٥٣٧١)، ومسلم (١٦١٩)، وابن ماجه (٢٤١٥)، والترمذي (١٠٩٣)، والنسائي (١٩٦٣) من طرق عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ومثل هذا الاختلاف لا يضر، لأنه اختلاف في تعيين صحابي، وهم كلهم عدول. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٩٩) و (٩٨٤٨)، و"صحيح ابن حبان"، (٣٠٦٣). والشطر الثاني منه سلف عند المصنف برقم (٢٩٥٤) و (٢٩٥٦). قال الخطابي: فيه من الففه جواز الضمان عن الميت -ترك وفاء بقدر الدين أو لم يترك- وهذا قول الشافعي وإليه ذهب ابن أبي ليلى. وقال أبو حنيفة: إذا ضمن عن الميت شيئا لم يترك له وفاء لم يلزم الضامن، لأن الميت منه بريء، وإن ترك وفاء لزمه ذلك، وإن ترك وفاء ببعضه لزمه بقدر ذلك. وقال الحافظ في "الفتح" ٩/ ٥١٦: وأراد المصنف (يعني الإِمام البخاري) بإدخاله في أبواب النفقات الإشارة إلى أن من مات، وله أولاد، ولم يترك لهم -شيئاً، فإن نفقتهم تجب في بيت مال المسلمين.









সুনান আবী দাউদ (3344)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ شَرِيكٍ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، رَفَعَهُ - قَالَ عُثْمَانُ وَحَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ شَرِيكٍ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، - عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ قَالَ اشْتَرَى مِنْ عِيرٍ تَبِيعًا وَلَيْسَ عِنْدَهُ ثَمَنُهُ فَأُرْبِحَ فِيهِ فَبَاعَهُ فَتَصَدَّقَ بِالرِّبْحِ عَلَى أَرَامِلِ بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ وَقَالَ لاَ أَشْتَرِي بَعْدَهَا شَيْئًا إِلاَّ وَعِنْدِي ثَمَنُهُ ‏.‏




ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে : একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যবসায়ী কাফেলার কাছ থেকে জিনিস কিনলেন। কিন্তু তখন তাঁর কাছে এর মূল্য পরিশোধের মত কিছুই ছিল না (বাকীতে কিনলেন)। পরে তিনি জিনিসগুলো লাভে বিক্রি করলেন। তিনি লাভের অংশটা ‘আবদুল মুত্তালিব গোত্রের বিধবা ও দরিদ্রদের মাঝে বণ্টন করে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেনঃ আমি এখন থেকে এমন কোন জিনিস ক্রয় করবো না, যার মূল্য পরিশোধের অর্থ আমার কাছে নেই।



সহীহ : যঈফাহ (৪৭৬৬)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سماک ضعیف عن عکرمۃ وحسن الحدیث عن غیرہ ، (انوار الصحیفہ ص 121)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- سيىء الحفظ، وسماك -وهو ابن حرب- في روايته عن عكرمة اضطراب. وقد ضعفه ابن حزم في "المحلى" ٩/ ٦٤، وابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" ٣/ ٣٠١ - ٣٠٢، وصححه الحاكم ٢/ ٢٤! فلم يصب. وأخرجه ابن أبي شيبة ٧/ ١٨، وأحمد (٢٠٩٣)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٣ والطبر اني في "الكبير" (١١٧٤٣) وفي "الأوسط" (٥٠٨٩)، والحاكم ٢/ ٢٤، والبيهقي ٥/ ٣٥٦ من طريق شريك النخعي، بهذا الإسناد.









সুনান আবী দাউদ (3345)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَطْلُ الْغَنِيِّ ظُلْمٌ وَإِذَا أُتْبِعَ أَحَدُكُمْ عَلَى مَلِيءٍ فَلْيَتْبَعْ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ সচ্ছল ব্যক্তির জন্য দেনা পরিশোধে গড়িমসি করা অন্যায়। আর তোমাদের কোন (সচ্ছল) ব্যক্তিকে কারোর ঋণ পরিশোধের দায়িত্ব ন্যস্ত করা হলে সে যেন তা মেনে নেয়।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২৪০৩)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2287) صحیح مسلم (1564)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، الأعرج: هو عبد الرحمن بن هُرمُز، وأبو الزناد: هو عبد الله ابن ذكوان. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٦٧٤، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٢٨٧)، ومسلم (١٥٦٤)، والترمذي (١٣٥٦)، والنسائي (٤٦٩١). وأخرجه ابن ماجه (٢٤٠٣)، والنسائي (٤٦٨٨) من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد، به. بلفظ: "الظلمُ مطلُ الغني، وإذا أتبع أحدكم على مليء فليتبع". وأخرجه البخاري (٢٤٠٠)، ومسلم (١٥٦٤) من طريق همام بن منبه، عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧٣٣٦) و (٧٥٤١)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٥٣). قال الخطابي: قوله: "مطل الغني ظلم" دلالته أنه إذا لم يكن غنياً يجد ما يقضيه لم يكن ظالماً، وإذا لم يكن ظالماً بم يجز حبسُه، لأن الحبس عقوبة، ولا عقوبة على غير ظالم. وقوله: "أُتبع" يريد: إذا أُحيل، وأصحاب الحديث يقولون: "إذا اتُّبعَ" بتشديد التاء، وهو غلط، وصوابه: "أُتْبعَ" ساكنة التاء على وزن أفعل، ومعناه: إذا أُحيل أحدكم على مليء فليحتل، يقال: تبعت الرجل بحقى أتبعتُه تباعة: إذا طالبتَه، وأنا تبيعُه، ومنه قوله تعالى: ﴿ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا﴾ [الإسراء:٦٩]. وفيه من الفقه إثبات الحوالة، وفيه دليل على أن الحق يتحول بها إلى المحال عليه، ويسقط عن المُحيل، ولا يكون عليه للمحتال سبيل عند موت المحال عليه أو إفلاسه، وذلك لأنه قد اشترط عليه الملاءمة، والحوالة قد تصح حكماً على المليء، فكان فائدة الشرط ما قلناه، والله أعلم. وقد يستدل بهذا الحديث من يذهب إلى أن له الرجوع على المحيل إذا مات أو أفلس المُحال عليه، ويتأوله على غير وجهه الأول بأن يقول: إنما أمر بأن يتبعه إذا كان مليئاً، والمفلس غير مليء فليكن غير متبع به. قال الشيخ: والدلالة على الوجه الأول هي الصحيحة، لأنه إنما اشترط له الملاءة وقت الحوالة لا فيما بعدها لأن (إذا) كلمة شرط موفت فالحكم يتعلق بتلك الحال لا بما بعدها، والله أعلم. وقوله: "فليتبع" معناه: فليحتل، وهذا ليس على الوجوب، وإنما هو على الإذن له والإباحة فيه إن اختار ذلك وشاءه، وزعم داود أن المحال عليه إن كان مليئاً كان واجبا على الطالب أن يحوّل ما له عليه ويكره على ذلك إن أباه. وقد اختلف العلماء في عود الحق إلى ذمة الغريم إذا مات المحال عليه أو أفلس، فقال أصحاب الرأي: إذا مات ولم يترك وفاء أو أفلس حياً، فإن المحتال يرجع به على الغريم. وقال مالك والشافعي وأحمد وأبو عبيد وأبو ثور: لا يرجع. واحتجوا كلهم بهذا الحديث. وفيه قول ثالث، ذكره ابن المنذر عن بعضهم فلا أحفظه: أنه لا يرجع ما دام حياً، فإن الرجل يُوسر ويُعسر ما دام حياً، فإذا مات ولم يترك وفاء رجع به عليه.









সুনান আবী দাউদ (3346)


حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ، قَالَ اسْتَسْلَفَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَكْرًا فَجَاءَتْهُ إِبِلٌ مِنَ الصَّدَقَةِ فَأَمَرَنِي أَنْ أَقْضِيَ الرَّجُلَ بَكْرَهُ فَقُلْتُ لَمْ أَجِدْ فِي الإِبِلِ إِلاَّ جَمَلاً خِيَارًا رَبَاعِيًّا ‏.‏ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَعْطِهِ إِيَّاهُ فَإِنَّ خِيَارَ النَّاسِ أَحْسَنُهُمْ قَضَاءً ‏"‏ ‏.‏




আবূ রাফি‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ছোট উট ধার নিলেন। অতঃপর তাঁর নিকট যাকাতের উট এলে তিনি আমাকে উঠতি বয়সের একটি উট দিয়ে ঋণ পরিশোধের নির্দেশ দিলেন। আমি বললাম, (বাইতুল মালে) কেবল ছয়-সাত বছর বয়সের উট আছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তাকে তাই দাও। কারণ মানুষের মধ্যে ঐ ব্যক্তি উত্তম যে উত্তমরূপে দেনা পরিশোধ করে।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২৮৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1600)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٦٨٠. وأخرجه مسلم (١٦٠٠)، وابن ماجه (٢٢٨٥)، والترمذي (١٣٦٦) والنسائي (٤٦١٧) من طريق زيد بن أسلم، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٧١٨١). وفي الباب عن أبي هريرة عند البخاري (٢٣٩٠): أن رجلاً تقاضى رسول الله ﷺ، فأغلظ له، فهمَّ به أصحابه، فقال: دعوه، فإن لصاحب الحق مقالاً، واشتروا له بعيراً فأعطوه إياه، وقالوا: لا نجد إلا أفضل من سنه، قال: "اشتروه فأعطوه إياه، فإن خيركم أحسنكم قضاة". قال الحافظ: وفيه جواز وفاء ما هو أفضل من المثل المقترض إذا لم تقع شرطية ذلك في العقد، فيحرم حينئذ اتفاقاً وبه قال الجمهور، وعن المالكية تفصيل في الزيادة، إن كانت بالعدد منعت، وإن كانت بالوصف جازت. وفيه أن الاقتراض في البر والطاعة وكذا الأمور المباحة لا يُعاب، وأن للإمام أن يقترض على بيت المال لحاجة بعض المحتاجين ليوفي ذلك من مال الصدقات. قال الخطابي: (البَكْر) في الإبل بمنزلة الغلام من الذكور. و (القلوص): بمنزلة الجارية من الإناث. و (الرباعي) من الإبل: هو الذي أتت عليه ست سنين ودخل في السنة السابعة فإذا طلعت رباعيته قيل للذكر: رباع والأنثى رباعية خفيفة الياء. وفيه من الفقه: جواز تقديم الصدقة قبل مَحِلِّها، وذلك أن النبي ﷺ لا يحلُّ له الصدقةُ، فلا يجوز أن يقضي من أهل الصدقة شيئاً كان لنفسه، فدل أنه إنما استسلف لأهل الصدقة من أرباب الأموال، وهو استدلال الشافعي. وقد اختلف العلماء في جواز تقديم الصدقة على محل وقتها، فأجازه الأوزاعي وأصحاب الرأي وأحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه. وقال الشافعي: يجوز أن يعجل صدقة سنة واحدة، وقال مالك: لا يجوز أن يخرجها قبل حلول الحول، وكرهه سفيان الثوري. وقال الإِمام الثوري: يجوز للمقرض أخذ الزيادة سواء زاد في الصفة أو في العدد، ومذهب مالك أن الزيادة في العدد منهي عنها، وحجة أصحابنا عموم قوله ﷺ: "فإن خير الناس أحسنهم قضاءً". وفي الحديث دليل على أن رد الأجود في القرض أو الدين من السنة ومكارم الأخلاق وليس هو من قرض جر منفعة، لأن المنهي عنه ما كان مشروطاً في عقد القرض.









সুনান আবী দাউদ (3347)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنْ مُحَارِبِ بْنِ دِثَارٍ، قَالَ سَمِعْتُ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كَانَ لِي عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم دَيْنٌ فَقَضَانِي وَزَادَنِي ‏.




মুহাবির ইবনু দিসার (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আমার কিছু পাওনা ছিল। তিনি আমার পাওনা পরিশোধ করলেন এবং কিছু বেশী দিলেন।



সহীহঃ নাসায়ী (৪৫৯১, ৪২৭৮)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (443) صحیح مسلم (715 بعد ح1599) ، مشکوۃ المصابیح (2925)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مِسعَر: هو ابن كدام، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وهو في "مسند أحمد" (١٤٤٣٢). وأخرجه البخاري (٤٤٣) و (٢٣٩٤) و (٢٦٠٣)، والنسائي (٤٥٩١) من طريق مسعر ابن كدام، ومسلم (٧١٥) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن محارب بن دثار، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢٣٥)، و"صحيح ابن حبان"، (٢٤٩٦). وأخرجه بنحوه البخاري (٢٦٠٤)، ومسلم بإثر (١٥٩٩)، والنسائي (٤٥٩٠) من طريق شعبة، عن محارب بن دثار، عن جابر قال: وَزَنَ لي رسول الله ﷺ ثمن البعير فأرجح لي. لفظ مسلم. وأخرجه بنحو رواية شعبة البخاري (٢٥٩٧) من طريق وهب بن كيسان، ومسلم بإثر (١٥٩٩) من طريق سالم بن أبي الجعد، وبإثر (١٥٩٩) من طريق أبي نضرة، وبإثر (١٥٩٩) كذلك من طريق أبي الزبير، أربعتهم عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٩٢) و (١٤١٩٥)، و"صحيح ابن حبان" (٢٧١٥). قال البغوي في "شرح السنة" ٨/ ١٩٢ عند حديث أبي رافع مولى رسول الله ﷺ حين قال له رسول الله ﷺ لما أخبره أنه لم يجد إلا أحسن من الجمل الذي استسلفه رسول الله ﷺ من الأعرابي: "أعطِه إياه"، قال البغوي: فيه دليل على أن من استقرض شيئاً فردَّه أحسن أو أكثر من غير شرط، كان محسنا، ويحل ذلك للمُقرض، قال النبي ﷺ لبلال في قضاء ثمن جمل جابر: "اقضه وزده" واشترى رسول الله ﷺ سراويل، وثمَّ رجل يزن بالأجر، فقال للوزان: "زن وأرجح". قال: فأما إذا شرط في القرض أن يردَّ أكثر أو أفضل، أو في بلد آخر فهو حرام …









সুনান আবী দাউদ (3348)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، وَعَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسٍ، عَنْ عُمَرَ، - رضى الله عنه - قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ الذَّهَبُ بِالذَّهَبِ رِبًا إِلاَّ هَاءَ وَهَاءَ وَالْبُرُّ بِالْبُرِّ رِبًا إِلاَّ هَاءَ وَهَاءَ وَالتَّمْرُ بِالتَّمْرِ رِبًا إِلاَّ هَاءَ وَهَاءَ وَالشَّعِيرُ بِالشَّعِيرِ رِبًا إِلاَّ هَاءَ وَهَاءَ ‏"‏ ‏.‏




উমার (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বর্ণের বিনিময় স্বর্ণের সাথে যদি উভয় পক্ষ হতে নগদ আদান-প্রদান না হয়, তবে তা সুদের অন্তর্ভুক্ত হবে। গমের বিনিময় গমের সাথে, যদি উভয় পক্ষ হতে (সমান) আদান-প্রদান না হয়, তবে তা সুদের অন্তর্ভুক্ত হবে। খেজুরের বিনিময় খেজুরের সাথে, যদি উভয় পক্ষ হতে নগদ লেনদেন (সম-পরিমাণ) না হয়, তবে তা সুদের অন্তর্ভুক্ত। যবের বিনিময় যবের সাথে, যদি উভয় পক্ষ হতে নগদ লেনদেন (সম-পরিমাণ) না হয়, তবে তা সুদের অন্তর্ভুক্ত।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২৫৩)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2174) صحیح مسلم (1586)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٦٣٦ - ٦٣٧، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢١٧٤) وقد جاء في روايات "صحيح البخاري" لطريق مالك عدا روايةِ لأبي ذر الهروي: "الذهب بالذهب"، وفيه رد على ابن عبد البر في "التمهيد" ٦/ ٢٨٢ فيما ادعاه من عدم الاختلاف عن مالك في هذا الحديث، لأن الراوي عن مالك عند البخاري عبد الله ابن يوسف التِّنِّيسي، وهو من رواة "الموطأ"، وتابعه عبد الله بن وهب -وهو من رواة "الموطأ" كذلك- عند أبي عوانة (٥٣٨٣)، وسويد بن سعيد عند أبي يعلى (٢٣٤). وأخرجه البخاري (٢١٣٤)، ومسلم (١٥٨٦)، وابن ماجه (٢٢٥٣) و (٢٢٥٩)، والنسائي (٤٥٥٨) من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري، به. وكذلك جاء في روايات "صحيح البخاري" غير رواية أبي ذر الهروي وأبي الوقت: "الذهب بالذهب"، وهي الرواية التي شرح عليها العيني في "عمدة القاري"، والقسطلاني في "إرشاد الساري". وأخرجه البخاري (٢١٧٠) -دون قوله: "الذهب بالورق"-، ومسلم (١٥٨٦)، وابن ماجه (٢٢٦٠)، والترمذي (١٢٨٧) من طريق الليث بن سعد، عن الزهري، به وهو في "مسند أحمد" (١٦٢) و (٣١٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠١٣). وانظر تمام تخريجه والكلام عليه في "سنن ابن ماجه" بتحقيقنا. قال الخطابي: "هاء وهاء" معناه التقابض، وأصحاب الحديث يقولون: (ها وها) مقصورين، والصواب مدهما ونصب الألف منهما. وقوله: (هاء) إنما هو قول الرجل لصاحبه إذا ناوله الشيء: (هاك) أي: خذ، فأسقطوا الكاف منه وعوضوه المدّ بدلاً من الكاف، يقال للواحد: هاء، والاثنين: هاؤما، بزيادة الميم، وللجماعة: هاؤم، قال الله تعالى: ﴿هَاؤُمُ اقْرَءُوا كِتَابِيَهْ﴾ [الحاقة:١٩]، وهذا قول الليث بن المظفر.









সুনান আবী দাউদ (3349)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي الْخَلِيلِ، عَنْ مُسْلِمٍ الْمَكِّيِّ، عَنْ أَبِي الأَشْعَثِ الصَّنْعَانِيِّ، عَنْ عُبَادَةَ بْنِ الصَّامِتِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الذَّهَبُ بِالذَّهَبِ تِبْرُهَا وَعَيْنُهَا وَالْفِضَّةُ بِالْفِضَّةِ تِبْرُهَا وَعَيْنُهَا وَالْبُرُّ بِالْبُرِّ مُدْىٌ بِمُدْىٍ وَالشَّعِيرُ بِالشَّعِيرِ مُدْىٌ بِمُدْىٍ وَالتَّمْرُ بِالتَّمْرِ مُدْىٌ بِمُدْىٍ وَالْمِلْحُ بِالْمِلْحِ مُدْىٌ بِمُدْىٍ فَمَنْ زَادَ أَوِ ازْدَادَ فَقَدْ أَرْبَى وَلاَ بَأْسَ بِبَيْعِ الذَّهَبِ بِالْفِضَّةِ - وَالْفِضَّةُ أَكْثَرُهُمَا - يَدًا بِيَدٍ وَأَمَّا نَسِيئَةً فَلاَ وَلاَ بَأْسَ بِبَيْعِ الْبُرِّ بِالشَّعِيرِ وَالشَّعِيرُ أَكْثَرُهُمَا يَدًا بِيَدٍ وَأَمَّا نَسِيئَةً فَلاَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى هَذَا الْحَدِيثَ سَعِيدُ بْنُ أَبِي عَرُوبَةَ وَهِشَامٌ الدَّسْتَوَائِيُّ عَنْ قَتَادَةَ عَنْ مُسْلِمِ بْنِ يَسَارٍ بِإِسْنَادِهِ ‏.‏




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ স্বর্ণের বিনিময় স্বর্ণের সাথে সমান সমান হবে, চাই তা স্বর্ণের পাত হোক বা স্বর্ণের মুদ্রা এবং রূপার বিনিময় রূপার সাথে সমান সমান হবে, চাই তা রূপার পাত হোক বা রূপার মুদ্রা। গমের সাথে গমের বিনিময়, যবের সাথে যবের বিনিময়, খেজুরের সাথে খেজুরের বিনিময় এবং লবণের সাথে লবণের বিনিময় পরিমাণে ও ওজনে সমান হতে হবে। কেউ অতিরিক্ত দিলে বা নিলে তা সুদ সাব্যস্ত হবে। রূপার বিনিময়ে সোনা বা সোনার বিনিময়ে রূপার বিক্রি করার ক্ষেত্রে পরিমাণে কম-বেশী হওয়া দোষণীয় নয়, তবে আদান-প্রদান নগদে হতে হবে, বাকিতে বিনিময় হতে পারে না। যবের বিনিময়ে গম অথবা যব বিক্রি করার ক্ষেত্রেও পরিমাণে কম-বেশি হওয়া দোষণীয় নয়, তবে আদান-প্রদান নগদে হতে হবে, বাকিতে নয়। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সা’ঈদ ইবনু আবু ‘আরূবাহ ও হিশাম আদ-দাসতাওয়াঈ ক্বাতাদাহ হতে মুসলিম ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে তার সূত্রে উপরোক্ত হাদীস বর্ণনা করেছেন।



সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২৫৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث الآتي (3350)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الأشعث الصنعاني: هو شراحيل بن آدَة، ومسلم المكي: هو ابن يسار، وأبو الخليل: هو صالح بن أبي مريم، وقتادة: هو ابن دعامة، وهمام: هو ابن يحيى العوذي، والحسن بن علي: هو الخلال. وأخرجه النسائي (٤٥٦٤) من طريق أبي الخليل صالح بن أبي مريم، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٤ من طريق أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، كلاهما (أبو الخليل ومحمد بن سيرين) عن مسلم بن يسار المكي، به. وأخرجه النسائي (٤٥٦٣) من طريق قتادة، عن مسلم بن يسار، به. فأسقط من إسناده أبا الخليل!! وقال يحيى القطان ويحيى بن معين: لم يسمع قتادة من مسلم بن يسار. وأخرجه أحمد (٢٢٧٢٩)، وابن ماجه (٢٢٥٤)، والنسائي (٤٥٦٠) و (٤٥٦١) و (٤٥٦٢) من طريق سلمة بن علقمة التميمي، عن محمد بن سيرين، عن مسلم بن يسار وعبد الله بن عُبيد، عن عبادة بن الصامت. ومسلم بن يسار لم يسمع هذا الحديث من عبادة، بينه وبينه أبو الأشعث كما مضى، وكما في إسناد المصنف. وأخرجه أحمد (٢٢٧٢٤)، والنسائي (٤٥٦٦) من طريق حكيم بن جابر، عن عبادة بن الصامت. وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "تبرها وعينُها" التبْر: قطع الذهب والفضة قبل أن تُضرب وتطبع دراهم ودنانير، واحدتها: تبرة، ومن هذا قوله تعالى: ﴿إِنَّ هَؤُلَاءِ مُتَبَّرٌ مَا هُمْ فِيهِ وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ﴾ [الأعراف: ١٣٩]، والله أعلم. والعين: المضروب من الدراهم والدنانير، والمدي: مكيال يعرف ببلاد الشام وبلاد مصر يتعاملون به، وأحسبه خمسة عشر مكوكاً، والمكوك صاع ونصف. وحرَّم رسول الله ﷺ أن يباع مثقال ذهب عين بمثقال ذهب وشيء من تبر غير مضروب، وكذلك حرَّم التفاوت بين المضروب من الفضة وغير المضروب، وذلك معنى قوله: "تبرها وعينها" أي: كلاهما سواء، وهذا من باب معقول الفحوى، ثم زاده بياناً بما نسق عليه من قوله: "ولا بأس ببيع الذهب بالفضة والفضة أكثرهما يداً بيد" وكان ذلك من باب دليل الخطاب ومفهومه وكلا الوجهين بيان، وأهل اللغة يتفاهمون بها، ثم هو قول عامة المسلمين إلا ما روي عن أسامة بن زيد وابن عباس في جواز بيع الدرهم بالدرهمين، وقد روي عن ابن عباس أنه رجع عنه.









সুনান আবী দাউদ (3350)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَبِي الأَشْعَثِ الصَّنْعَانِيِّ، عَنْ عُبَادَةَ بْنِ الصَّامِتِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِهَذَا الْخَبَرِ يَزِيدُ وَيَنْقُصُ وَزَادَ قَالَ فَإِذَا اخْتَلَفَتْ هَذِهِ الأَصْنَافُ فَبِيعُوا كَيْفَ شِئْتُمْ إِذَا كَانَ يَدًا بِيَدٍ ‏.‏




‘উবাদাহ ইবনু সামিত (রা:) হতে বর্ণিত, পূর্বোক্ত হাদীসটি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে কিছুটা কম-বেশী করে বর্ণিত হয়েছে। এতে অতিরিক্ত রয়েছেঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ এসব ক্ষেত্রে একধরনের বস্তু অন্য ধরনের বস্তুর সাথে বিনিময় হলে তোমরা ইচ্ছামত পরিমাণ নির্ধারণ করতে পারো। তবে আদান-প্রদান হতে হবে নগদে।



সহীহ : এর পূর্বেরটি দেখুন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1587)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. أبو الأشعث الصنعاني: هو شراحيل بن آدَة، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي، وخالد: هو ابن مهران الحذاء، وسفيان: هو الثوري. وأخرجه مسلم (١٥٨٧)، والترمذي (١٢٨٤) من طريق أبي قلابة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٦٨٣) و (٢٢٧٢٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠١٥). وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (3351)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ وَأَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ قَالُوا حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ الْعَلاَءِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ يَزِيدَ، حَدَّثَنِي خَالِدُ بْنُ أَبِي عِمْرَانَ، عَنْ حَنَشٍ، عَنْ فَضَالَةَ بْنِ عُبَيْدٍ، قَالَ أُتِيَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَامَ خَيْبَرَ بِقِلاَدَةٍ فِيهَا ذَهَبٌ وَخَرَزٌ - قَالَ أَبُو بَكْرٍ وَابْنُ مَنِيعٍ فِيهَا خَرَزٌ مُعَلَّقَةٌ بِذَهَبٍ - ابْتَاعَهَا رَجُلٌ بِتِسْعَةِ دَنَانِيرَ أَوْ بِسَبْعَةِ دَنَانِيرَ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ حَتَّى تُمَيِّزَ بَيْنَهُ وَبَيْنَهُ ‏"‏ ‏.‏ فَقَالَ إِنَّمَا أَرَدْتُ الْحِجَارَةَ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ حَتَّى تُمَيِّزَ بَيْنَهُمَا ‏"‏ ‏.‏ قَالَ فَرَدَّهُ حَتَّى مُيِّزَ بَيْنَهُمَا ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ عِيسَى أَرَدْتُ التِّجَارَةَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَكَانَ فِي كِتَابِهِ الْحِجَارَةُ فَغَيَّرَهُ فَقَالَ التِّجَارَةَ ‏.‏




ফাদালাহ ইবনু ‘উবাইদ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, খায়বার বিজয়ের বছর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট একটি মালা আনা হলো। এতে স্বর্ণদানা ও পুঁতি ছিল। বর্ণনাকারী আবূ বাক্‌র ও ইবনু মানী’ বলেন, মালাটিতে স্বর্ণদানার সাথে পুঁতির দানা লটকানো ছিল। মালাটি এক ব্যক্তি নয় কিংবা সাত দীনারে কিনে ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ উভয় প্রকারের দানা পৃথক না করা পর্যন্ত ক্রয়-বিক্রয় করা যাবে না। লোকটি বললো, আমি শুধু পুঁতির দানাগুলো চাচ্ছি। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পুনরায় বললেনঃ উভয় প্রকার দানা পৃথক না করা পর্যন্ত ক্রয়-বিক্রয় করা যাবে না। অতঃপর সে মালাটি ফেরত দিলে তা থেকে সোনা পৃথক করা হলো। বর্ণনাকারী ইবনু ঈসা বলেন, আমি এর দ্বারা ব্যবসা বুঝেছি। ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু ঈসার নুস্‌খায় ‘হিজারাতা’ শব্দ ছিল। তিনি তা পরিবর্তন করে ‘তিজারাতা’ শব্দ বসিয়েছেন।



সহীহঃ তিরমিযী (১২৭৮)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1591)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حنش: هو ابن عبد الله -ويقال: ابن علي بن عمرو- السبئي الصنعاني، وسعيد بن يزيد: هو الحِمْيَري القِتباني، وابن المبارك: هو عبد الله، وابن العلاء: هو محمد بن العلاء أبو كريب مشهور بكنيته. وأخرجه مسلم (١٥٩١)، والترمذي (١٣٠٠) من طريق عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وأخرج مسلم (١٥٩١) من طريق عامر بن يحيى المعافري، عن حنش الصنعاني، قال: كنا مع فضالة بن عُبيد في غزوة، فطارت لي ولأصحابي قلادة فيها ذهب وورِق وجوهر، فأردت أن أشتريها، فسألت فضالة بن عبيد فقال: انزع ذهبها، فأجعله في كفة، واجعل ذهبك في كفة، ثم لا تأخذن إلا مثلاً بمثل، فإني سمعت رسول الله ﷺ يقول: "من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يأخذن إلا مثلاً بمثل". وأخرج نحو لفظ ابن المبارك مسلم (١٥٩١) من طريق عُلَيّ بن موسى اللخمي، عن فضالة بن عُبيد، إلا أنه قال في روايته: قال رسول الله ﷺ: "الذهب بالذهب وزناً بوزن". وهو في "شرح مشكل الآثار" (٦٠٩٦). وانظر تالييه. قال الترمذي: والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي ﷺ وغيرهم: لم يروا أن يباع السيف محلَّى أو مِنطقة مفضضة، أو مثل هذا، بدراهم حتى يُميَّز ويُفصَل، وهو قول ابن المبارك والشافعي وأحمد وإسحاق. وقد رخص بعض أهل العلم في ذلك من أصحاب النبي ﷺ وغيرهم. وقال الخطابي: وقال أبو حنيفة: إن كان الثمن أكثر مما فيه من الذهب جاز، وإن كان مثله أو أقل منه لم يجُز. وذهب مالك إلى نحو من هذا في القلة والكثرة إلا أنه حدّد الكثرة بالثلثين، والقلة بالثلث. وقال حماد بن أبي سليمان: لا بأس بأن تشتريه بالذهب، كان الثمن أقل أو أكثر.









সুনান আবী দাউদ (3352)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ أَبِي شُجَاعٍ، سَعِيدِ بْنِ يَزِيدَ عَنْ خَالِدِ بْنِ أَبِي عِمْرَانَ، عَنْ حَنَشٍ الصَّنْعَانِيِّ، عَنْ فَضَالَةَ بْنِ عُبَيْدٍ، قَالَ اشْتَرَيْتُ يَوْمَ خَيْبَرَ قِلاَدَةً بِاثْنَىْ عَشَرَ دِينَارًا فِيهَا ذَهَبٌ وَخَرَزٌ فَفَصَّلْتُهَا فَوَجَدْتُ فِيهَا أَكْثَرَ مِنَ اثْنَىْ عَشَرَ دِينَارًا فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ‏ "‏ لاَ تُبَاعُ حَتَّى تُفَصَّلَ ‏"‏ ‏.‏




ফাদালাহ ইবনু ‘উবাইদ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, খায়বার বিজয়ের দিন আমি বারো দীনারে একটি মালা ক্রয় করি। তাতে স্বর্ণ-দানা ও পুঁতি ছিল। আমি স্বর্ণ দানাগুলো পৃথক করে দেখি, তা পরিমাণে বারো দীনারের চেয়েও বেশি। বিষটি আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে জানালে তিনি বলেনঃ উভয় প্রকারের দানা পৃথক করার পূর্বে ক্রয়-বিক্রয় করা জায়িয নয়।



সহীহঃ এর পূর্বেরটি দেখুন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1591)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه الليث؟ هو ابن سعد. وأخرجه مسلم (١٥٩١)، والترمذي (١٢٩٩)، والنسائي (٤٥٧٣) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٤٥٧٤) من طريق هشيم بن بشير، عن الليث، عن خالد بن أبي عمران، به فأسقط من إسناده سعيد بن يزيد! وهو في "مسند أحمد" (٢٣٩٦٢). وانظر ما قبله، وما بعده.









সুনান আবী দাউদ (3353)


حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ أَبِي جَعْفَرٍ، عَنِ الْجُلاَحِ أَبِي كَثِيرٍ، حَدَّثَنِي حَنَشٌ الصَّنْعَانِيُّ، عَنْ فَضَالَةَ بْنِ عُبَيْدٍ، قَالَ كُنَّا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ خَيْبَرَ نُبَايِعُ الْيَهُودَ الأُوقِيَّةَ مِنَ الذَّهَبِ بِالدِّينَارِ ‏.‏ قَالَ غَيْرُ قُتَيْبَةَ بِالدِّينَارَيْنِ وَالثَّلاَثَةِ ‏.‏ ثُمَّ اتَّفَقَا فَقَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَبِيعُوا الذَّهَبَ بِالذَّهَبِ إِلاَّ وَزْنًا بِوَزْنٍ ‏"‏ ‏.‏




ফাদালাহ ইবনু ‘উবাইদ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা খায়বার বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে ছিলাম এবং ইয়াহুদীদের সাথে ক্রয়-বিক্রয় করছিলাম। আমরা তাদের থেকে এক দীনারের বিনিময়ে এক আওকিয়া সোনা কিনলাম। অধস্তন বর্ণনাকারী কুতাইবাহ ব্যতীত অন্যান্য বর্ণনাকারীগণ দুই বা তিন দীনারের কথা উল্লেখ করেছেন, অতঃপর সকলে এইরূপে বর্ণনা করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তোমারা সোনার বিনিময়ে সোনা ক্রয়-বিক্রয় করবে না দাড়ি-পাল্লার উভয় দিক ওজনে সমান না হলে।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1591)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل الجُلاح أبي كثير، فهو صدوق لا بأس به. ابن أبي جعفر: هو عُبيد الله، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه مسلم (١٥٩١) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وانظر سابقيه.









সুনান আবী দাউদ (3354)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، وَمُحَمَّدُ بْنُ مَحْبُوبٍ، - الْمَعْنَى وَاحِدٌ - قَالاَ حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ سِمَاكِ بْنِ حَرْبٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ كُنْتُ أَبِيعُ الإِبِلَ بِالْبَقِيعِ فَأَبِيعُ بِالدَّنَانِيرِ وَآخُذُ الدَّرَاهِمَ وَأَبِيعُ بِالدَّرَاهِمِ وَآخُذُ الدَّنَانِيرَ آخُذُ هَذِهِ مِنْ هَذِهِ وَأُعْطِي هَذِهِ مِنْ هَذِهِ فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي بَيْتِ حَفْصَةَ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ رُوَيْدَكَ أَسْأَلُكَ إِنِّي أَبِيعُ الإِبِلَ بِالْبَقِيعِ فَأَبِيعُ بِالدَّنَانِيرِ وَآخُذُ الدَّرَاهِمَ وَأَبِيعُ بِالدَّرَاهِمِ وَآخُذُ الدَّنَانِيرَ آخُذُ هَذِهِ مِنْ هَذِهِ وَأُعْطِي هَذِهِ مِنْ هَذِهِ ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ بَأْسَ أَنْ تَأْخُذَهَا بِسَعْرِ يَوْمِهَا مَا لَمْ تَفْتَرِقَا وَبَيْنَكُمَا شَىْءٌ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আল বাকী’ নামক বাজারে দীনারের বিনিময়ে উট বিক্রি করতাম, কিন্তু মূল্য গ্রহণের সময়ে আমি দীনারের পরিবর্তে দিরহাম নিতাম। আবার কখনও দিরহামের বিনিময়ে বিক্রি করে দীনার নিতাম। অর্থাৎ আমি কখনো এটার পরিবর্তে ওটা এবং কখনো ওটার পরিবর্তে এটা গ্রহণ করতাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি তখন হাফসাহ্‌র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে ছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমার দিকে দেখুন। আমি আপনার কাছে জানতে চাই। আমি আল বাকী’ নামক বাজারে দীনারের বিনিময়ে উট বিক্রি করে দিরহাম গ্রহণ করি এবং দিরহামের বিনিময়ে বিক্রি করে দীনার গ্রহণ করি। অর্থাৎ আমি এটার (দীনারের) পরিবর্তে ওটা (দিরহাম) গ্রহণ করি এবং ওটার (দীনারের) বিনিময়ে এটা (দিরহাম) গ্রহণ করি। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এরূপ গ্রহণে কোন অসুবিধা নেই, তবে সেদিনের বাজারদরে গ্রহণ করবে এবং কিছু অমীমাংসিত না রেখে পরস্পর পৃথক হওয়ার আগেই তা করবে।



দুর্বলঃ ইরওয়া (১৩২৬), মিশকাত (২৮৭১)।




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2871) ، أخرجہ الترمذي (1242 وسندہ حسن) والنسائي (4586 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لتفرد سماك بن حرب برفعه، وقد روى البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (١١٣٢٢) بسنده إلى شعبة بن الحجاج وقد سئل عن هذا الحديث فقال: عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، ولم يرفعه، وحدثنا قتادة عن سعيد بن المسيب، عن ابن عمر، ولم يرفعه، وحدثنا داود بن أبي هند، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر، ولم يرفعه. وحدثنا يحيى بن أبي إسحاق، عن سالم، عن ابن عمر، ولم يرفعه، ورفعه لنا سماك بن حرب، وأنا أفْرَقُه. وقال الدارقطني في "العلل" ٤/ ورقة ٧٥: لم يرفعه غير سماك، وسماك سيىء الحفظ. حماد: هو ابن سلمة. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٦٢) و (٢٢٦٢ م)، والترمذي (١٢٨٦)، والنسائي (٤٥٨٢) و (٤٥٨٣) و (٤٥٨٩) من طريق سماك بن حرب، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٨٨٣) و (٦٢٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٢٠)، وصححه ابن الجارود (٦٥٥)، والحاكم ٢/ ٤٤ كذلك! وقال ابن عبد البر في "التمهيد" ٦/ ٢٩٢: حديث ابن عمر ثابت صحيح!! وأخرجه بنحوه موقوفاً ابن أبي شيبة ٦/ ٣٣٢، وأبو يعلى (٥٦٥٤) من طريق ابن أبي زائدة، عن داود بن أبي هند، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر. وإسناده صحيح. قال الخطابي: اقتضاء الذهب من الفضة، والفضة من الذهب عن أثمان السلعة هو في الحقيقة بيع ما لم يقبض، فدل جوازه على أن النهي عن بيع ما لم يقبض إنما ورد في الأشياء التي يبتغى في بيعها وبالتصرف فيها الربح كما روى: أنه نهى عن ربح ما لم يضمن، واقتضاء الذهب من الفضة خارج عن هذا المعنى، لأنه إنما يراد به التقابض، والتقابض من حيث لا يَشُقُّ ولا يتعذر دون التصارت والترابح، ويبين لك صحة هذا المعنى قوله: "لا بأس أن تأخذها بسعر يومها" أي: لا تطلب فيها الربح ما لم تضمن، واشترط أن لا يتفرقا وبينهما شيء، لأن اقتضاء الدراهم من الدنانير صرف، وعقد الصرف. لا يصح إلا بالتقابض. وقد اختلف الناس في اقتضاء الدراهم من الدنانير، فذهب أكثر أهل العلم إلى جوازه، ومنع من ذلك أبو سلمة بن عبد الرحمن وابن شبرمة، وكان ابن أبي ليلى يكره ذلك إلا بسعر يومه، ولم يعتبر غيره السعر، ولم يتأولوا كان ذلك بأغلى أو بأرخص من سعر اليوم، والصواب ما ذهبت إليه، وهو منصوص في الحديث، ومعناه ما بينته لك فلا تذهب عنه، فإنه لا يجوز غير ذلك، والله أعلم.