হাদীস বিএন


সুনান আবী দাউদ





সুনান আবী দাউদ (3355)


حَدَّثَنَا حُسَيْنُ بْنُ الأَسْوَدِ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ، أَخْبَرَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ سِمَاكٍ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ وَالأَوَّلُ أَتَمُّ لَمْ يَذْكُرْ ‏ "‏ بِسِعْرِ يَوْمِهَا ‏"‏ ‏.‏




সিমাক (রাহিমাহুল্লাহ) তার সানাদ হতে বর্ণিত, অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন। কিন্তু (আরবি) বাক্যাংশটুকু উল্লেখ করেননি। তবে পূর্ববর্তী বর্ণনাটি পুর্ণাঙ্গ।



আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (3354)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف كسابقه. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، وعُبيد الله: هو ابن موسى العَبْسي.









সুনান আবী দাউদ (3356)


حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ سَمُرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الْحَيَوَانِ بِالْحَيَوَانِ نَسِيئَةً ‏.‏




সামুরাহ (রা:) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পশুর বিনিময়ে পশু ধারে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।



সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২৭০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2821، 2822) ، وللحدیث شواھد عند ابن حبان (1113) وغیرہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أن الحسن -وهو البصري- لم يصرح بسماعه من سمرة. قتادة: هو ابن دعامة، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٧٠)، والترمذي (١٢٨١)، والنسائي (٤٦٢٠) من طريق قتادة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠١٤٣). وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد (١٤٣٣١)، وابن ماجه (٢٢٧١) وآخر من حديث ابن عُمر عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٦٠ وهو حسن في الشواهد. وثالث من حديث ابن عباس عند ابن حبان (٥٠٢٨). وإسناده صحيح. قال الترمذي: والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي-ﷺ ﷺ وغيرهم في بيع الحيوان بالحيوان نسيئة، وهو قول سفيان الثوري وأهل الكوفة، وبه يقول أحمد. ورخَّص بعض أهل العلم من أصحاب النبي ﷺ وغيرهم في بيع الحيوان بالحيوان نسيئة، وهو قول الشافعي وإسحاق. وقد ذكر البغوي في "شرح السنة" ٨/ ٧٤ أن ممن رخص في بيع الحيوان بالحيوان نسيئة علي وابن عمر، وأنه إليه ذهب سعيد بن المسيب وابن سيرين والزهري، وأنه قول الشافعي وإسحاق، سواء كان الجنس واحداً أو مختلفاً، مأكول اللحم أو غير مأكول اللحم، وسواء باع واحداً بواحد أو باثنين فأكثر. ونقل عن مالك أنه قال: إن كان الجنس مختلفاً يجوز، وإن كان متفقاً فلا. وذكر أن حجة القائلين بالجواز حديث عبد الله بن عمرو بن العاص -وهو الآتي عند المصنف بعد هذا الحديث-.









সুনান আবী দাউদ (3357)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ سَلَمَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ يَزِيدَ بْنَ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ مُسْلِمِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنْ أَبِي سُفْيَانَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ حَرِيشٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَهُ أَنْ يُجَهِّزَ جَيْشًا فَنَفِدَتِ الإِبِلُ فَأَمَرَهُ أَنْ يَأْخُذَ فِي قِلاَصِ الصَّدَقَةِ فَكَانَ يَأْخُذُ الْبَعِيرَ بِالْبَعِيرَيْنِ إِلَى إِبِلِ الصَّدَقَةِ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘আস (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে একটি অভিযানের জন্য সৈন্য প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন। সৈন্য প্রস্তুতে উটের অভাব দেখা দিলো। তিনি তাকে যাকাতের উট প্রাপ্তি সাপেক্ষে উট ধার নিতে বললেন। তদানুযায়ী তিনি যাকাতের উট প্রাপ্তি সাপেক্ষে দুই দুইটি উটের বিনিময়ে এক একটি উট গ্রহণ করলেন।



দুর্বলঃ মিশকাত (২৮২৩)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، عمرو بن حریش مجہول الحال کما فی التقریب (5010) ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 121)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، وهذا إسناد فيه ضعف واضطراب كما بيناه في "مسند أحمد" (٦٥٩٣). عَمرو بن حريش مجهول، لكنه متابع. حفص بن عمر: هو أبو عمر الحوضي. وأخرجه الدارقطني (٣٠٥٤) و (٣٠٥٥)، والحاكم ٢/ ٥٦ - ٥٧، والبيهقي ٥/ ٢٨٧ - ٢٨٨ من طريق أبي عمر حفص بن عمر الحوضي، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٦٥٩٣)، والدارقطني (٣٠٥٣) من طريق جرير بن حازم، وأحمد (٧٠٢٥) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عن أبي سفيان، عن مسلم بن جبير، عن عمرو بن الحريش، عن عبد الله بن عمرو بن العاص. فأسقطا من الإسناد يزيد بن أبي حبيب، وقدّما أبا سفيان على مسلم بن جبير. وانظر تمام تخريجه وبيان الاختلاف فيه في "المسند". وله طريق أخرى يقوى بها أخرجها الدارقطني (٣٠٥٢)، ومن طريقه البيهقي ٥/ ٢٨٧ - ٢٨٨ من طريق ابن وهب، عن ابن جريج، أن عمرو بن شعيب أخبره، عن أبيه عن عبد الله بن عمرو. وإسناده حسن، وقد قواه الحافظ في "الفتح" ٤/ ٤١٩. وانظر فقه الحديث عند الحديث السابق. قوله: قِلاص: هو جَمعُ قلوص، وهي الفتية من الإبل.









সুনান আবী দাউদ (3358)


حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدٍ الْهَمْدَانِيُّ، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ الثَّقَفِيُّ، أَنَّ اللَّيْثَ، حَدَّثَهُمْ عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اشْتَرَى عَبْدًا بِعَبْدَيْنِ ‏.‏




জাবির (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’টি গোলামের বিনময়ে একটি গোলাম কিনেছেন।



সহীহঃ তিরমিযী (১২৬২)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1602)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وعنعنة أي الزبير هنا محمولة على الاتصال لأنها من رواية الليث -وهو ابن سعد- عنه، ولم يرو عنه الليث بن سعد إلا ما ثبت لديه أنه سمعه من جابر كما بينه ابن حزم في "المحلى" ٧/ ٣٩٦. وأخرجه مسلم (١٦٠٢)، والترمذي (١٢٨٣) و (١٦٨٦)، والنسائي (٤١٨٤) و (٤٦٢١) من طريق الليث بن سعد، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٧٧٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٥٥٠). وانظر فقه الحديث في "تهذيب السنن" ٩/ ١٤٩ - ١٥٠.









সুনান আবী দাউদ (3359)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَزِيدَ، أَنَّ زَيْدًا أَبَا عَيَّاشٍ، أَخْبَرَهُ أَنَّهُ، سَأَلَ سَعْدَ بْنَ أَبِي وَقَّاصٍ عَنِ الْبَيْضَاءِ، بِالسُّلْتِ فَقَالَ لَهُ سَعْدٌ أَيُّهُمَا أَفْضَلُ قَالَ الْبَيْضَاءُ ‏.‏ فَنَهَاهُ عَنْ ذَلِكَ وَقَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُسْأَلُ عَنْ شِرَاءِ التَّمْرِ بِالرُّطَبِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ أَيَنْقُصُ الرُّطَبُ إِذَا يَبِسَ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا نَعَمْ فَنَهَاهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ إِسْمَاعِيلُ بْنُ أُمَيَّةَ نَحْوَ مَالِكٍ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, যায়িদ আবূ ‘আইয়াশ (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে জানিয়েছেন, তিনি সা’দ ইবনু আবূ ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বার্লির বিনিময়ে গম কেনা-বেচা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন, উভয়ের মধ্যে কোনটি অধিক উত্তম? তিনি বললেন, গম। বর্ণনাকারী বলেন, সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়িদকে এর বিনিময় করতে নিষেধ করলেন। তিনি (সা’দ) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট পাকা খেজুরের বিনিময়ে খুরমা ক্রয় করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে শুনেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেনঃ পাকা খেজুর শুকানো হলে কি ঘাটতি হয়? সাহাবীগণ বললেন, হাঁ। অতঃপর তিনি এরূপ বিনিময় করতে নিষেধ করলেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইসমাঈল ইবনু উমাইয়্যাহ এ হাদীস মালিকের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।



সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২৬৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2820) ، أخرجہ الترمذي (1225 وسندہ حسن) والنسائي (4549 وسندہ حسن) وابن ماجہ (2264 وسندہ حسن)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي، زيد أبو عياش وثقه الدارقطني، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحح له هو وشيخه ابن خزيمة، والحاكم. والحديث في "الموطأ" ٢/ ٦٢٤. عبد الله ابن يزيد: هو مولى الأسود بن سفيان. ومن طريق مالك أخرجه ابن ماجه (٢٢٦٤)، والترمذي (١٢٢٨) و (١٢٢٩)، والنسائي (٤٥٤٥). وقال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٥١٥)، و "صحيح ابن حبان" (٤٩٩٧). وانظر ما بعده. البيضاء: الحسّنطة، والسلت: ضربٌ من الشعير أبيض لا قشر له. أفأده في "النهاية".









সুনান আবী দাউদ (3360)


حَدَّثَنَا الرَّبِيعُ بْنُ نَافِعٍ أَبُو تَوْبَةَ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ، - يَعْنِي ابْنَ سَلاَّمٍ - عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ، أَنَّ أَبَا عَيَّاشٍ، أَخْبَرَهُ أَنَّهُ، سَمِعَ سَعْدَ بْنَ أَبِي وَقَّاصٍ، يَقُولُ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ بَيْعِ الرُّطَبِ بِالتَّمْرِ نَسِيئَةً ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ عِمْرَانُ بْنُ أَبِي أَنَسٍ عَنْ مَوْلًى لِبَنِي مَخْزُومٍ عَنْ سَعْدٍ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَهُ ‏.‏




সা’দ ইবনু আবূ ওয়াক্কাস (রা:) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাকা খেজুরকে খুরমার বিনিময়ে বাকিতে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।



শাযঃ ইরওয়া (৫/১৯৯-২০০)।



ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, উক্ত হাদীস ‘ইমরান ইবনু আবূ আনাস বনূ মাখযূমের মুক্তদাস সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে।



সহীহঃ এতে বাকীতে কথা নেই। ইরওয়া (ঐ)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح ليس فيه نسيئة




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي كسابقه دون قوله: نسيئة، فقد قال الدارقطني في "سننه" بعد الحديث (٢٩٩٤): وخالفه (يعني يحيى بن أبي كثير) مالك وإسماعيل بن أمية والضحاك ابن عثمان وأسامة بن زيد، رووه عن عبد الله بن يزيد، ولم يقولوا فيه: نسيئة، واجتماع هؤلاء الأربعة على خلاف ما رواه يحيى يدل على ضبطهم للحديث، وفيهم إمام حافظ، وهو مالك بن أنس. وأخرجه النسائي (٤٥٤٦) من طريق إسماعيل بن أمية، عن عبد الله بن يزيد، به. ولم يقل فيه: نسيئة. كرواية مالك في الحديث السابق.









সুনান আবী দাউদ (3361)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي زَائِدَةَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الثَّمَرِ بِالتَّمْرِ كَيْلاً وَعَنْ بَيْعِ الْعِنَبِ بِالزَّبِيبِ كَيْلاً وَعَنْ بَيْعِ الزَّرْعِ بِالْحِنْطَةِ كَيْلاً ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রা:) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গাছের খেজুর আন্দাজ করে খেজুরের বিনিময়ে ক্রয়-বিক্রয় করতে, আঙ্গুরকে কিশমিশের বিনিময়ে অনুমান করে ক্রয়-বিক্রয় করতে এবং খেতের ফসল গমের মাধ্যমে অনুমানে ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন।



সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২৬৫)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2171، 2205) صحیح مسلم (1542)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هوْ ابن عمر العمري، وابن أبي زائدة: هو يحيى ابن زكريا بن أبي زائدة. وأخرجه بنحوه البخاري (٢١٧١) و (٢١٧٢) و (٢١٨٥) و (٢٢٠٥)، ومسلم (١٥٤٢)، وابن ماجه (٢٢٦٥)، والنسائي (٤٥٣٣) و (٤٥٣٤) و (٤٥٤٩) من طرق عن نافع، به. وجاء عندهم جميعاً أن رسول الله ﷺ نهى عن بيع المزابنة، والمزابنة أن يبيع … وهو في "مسند أحمد" (٤٤٩٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٨). وأخرجه بنحوه كذلك أحمد (٤٥٤١)، ومسلم (١٥٣٤)، والنسائي (٤٥٣٢) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه. قال البغوي في "شرح السنة" ٨/ ٨٣: وأصل المزابنة من "الزبْن" وهو الدفع، وذلك أن أحد المتبايعين إذا وقف على غبن فيما اشتراه أراد فسخ العقد، وأراد الغابن إمضاءه فتزابنا، أي: تدافعا، فكل واحد منهما يدفع صاحبه عن حقه، وخصّ بيع الثمر على رؤوس النخل بجنسه بهذا الاسم، لأن المساواة بينهما شرط، وما على الشجر لا يُحصر بكيل ولا وزن، وإنما يكون تقديره بالخرص، وهو حدسٌ وظن، لا يؤمن فيه من التفاوت، فأما إذا باع الثمرة على الشجر بجنس آخر من الثمار على الأرض، أو على الشجر، يجوز، لأن المماثلة يينهما غير شرط والتقابض شرط في المجلس، فقبض ما على الأرض بالنقل، وقبض ما على الشجر بالتخلية. وقال: العمل على هذا عند عامة أهل العلم أن المزابنة باطلة.









সুনান আবী দাউদ (3362)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، أَخْبَرَنِي خَارِجَةُ بْنُ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَخَّصَ فِي بَيْعِ الْعَرَايَا بِالتَّمْرِ وَالرُّطَبِ ‏.‏




খারিজাহ ইবনু যায়িদ ইবনু সাবিত (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আরিয়া পদ্ধতিতে খুরমা ও খেজুর ক্রয়-বিক্রয়ের অনুমতি দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4541 وسندہ صحیح) ورواہ البخاري (2173) ومسلم (1539)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن شهاب: هو محمد بن مُسلم بن عُبيد الله الزهري، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن وهب: هو عَبد الله. وأخرجه النسائي (٤٥٣٧) من طريق عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٢١٧٣) و (٢١٨٤)، ومسلم (١٥٣٩)، وابن ماجه (٢٢٦٨) و (٢٢٦٩)، والترمذي (١٣٤٦) و (١٣٤٧) و (١٣٥٠)، والنسائي (٤٥٣٢) و (٤٥٣٦) و (٤٥٣٨ - ٤٥٤٠) من طريق عبد الله بن عمر بن الخطاب، عن زيد بن ثابت. ووقع عند البخاري في الموضع الثاني ومسلم في بعض طرقه والنسائي (٤٥٤٠) زيادة: ولم يرحض في غير ذلك. وهو في "مسند أحمد" (٤٤٩٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٠٤). قال الخطابي: ذكروا في معنى اشتقاقها قولين (يعني العرايا): أحدهما: أنها مأخوذة من قول القائل: أعريتُ الرجل النخلة، أي: أطعمته ثمرها، يعروها متى شاء، أي: يأتيها فيكل رطبها، يقال: عروت الرجل: إذا أتيته تطلب معروفه، كما يقال: طلب إلي فأطلبته. وسألني فأسالته. والقول الآخر: إنما سميت عرية لأن الرجل يُعريها من جملة نخله، أي: يستثنيها لا يبيعها مع النخل، فربما أكلها وربما وهبها لغيره أو فعل بها ما شاء. ثم قال الخطابي: وإنما جاء تحريم المزابنة فيما كان من التمر موضوعاً على وجه الأرض، وجاءت الرخصة في بيع العرايا فيما كان منها على رؤوس الشجر في مقدار معلوم منه بكمية لا يُزاد عليها، وذلك من أجل ضرورة أو مصلحة فيس أحدهما مناقضاً للآخر أو مبطلاً له. وانظر "فتح الباري" ٤/ ٣٩٠ - ٣٩٣.









সুনান আবী দাউদ (3363)


حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا ابْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ بَشِيرِ بْنِ يَسَارٍ، عَنْ سَهْلِ بْنِ أَبِي حَثْمَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الثَّمَرِ بِالتَّمْرِ وَرَخَّصَ فِي الْعَرَايَا أَنْ تُبَاعَ بِخَرْصِهَا يَأْكُلُهَا أَهْلُهَا رُطَبًا ‏.‏




সাহল আবূ হাসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুকনা খেজুরের বিনিময়ে তাজা খেজুর বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। তিনি ‘আরিয়া পদ্ধতিতে ক্রয়-বিক্রয়ের অনুমতি দিয়েছেন। যাতে ক্রেতার পরিবার তাজা ফল খেতে পারে।



সহীহঃ নাসায়ী (৪৫৩২)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2191) صحیح مسلم (1540)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن عُيينة: هو سفيان، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري. وأخرجه البخاري (٢١٩١)، ومسلم (١٥٤٠)، والنسائي (٤٥٤٢) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، به. وأخرجه البخاري (٢٣٨٤)، ومسلم (١٥٤٠)، والترمذي (١٣٥١)، والنسائي (٤٥٤٣) من طريق الوليد بن كثير، عن بُشير بن يسار، عن رافع بن خديج وسهل بن أبي حثمة. وأخرجه مسلم (١٥٤٠) من طريق الليث بن سعد، ومن طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، كلاهما عن يحيى بن سعيد، عن بُشير بن يسار، عن أصحاب رسول الله ﷺ-ﷺ وقال الثقفي: بعض أصحاب رسول الله ﷺ. وهو في "مسند أحمد" (١٦٠٩٢)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٠٢).









সুনান আবী দাউদ (3364)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، حَدَّثَنَا مَالِكٌ، عَنْ دَاوُدَ بْنِ الْحُصَيْنِ، عَنْ مَوْلَى ابْنِ أَبِي أَحْمَدَقَالَ أَبُو دَاوُدَ وَقَالَ لَنَا الْقَعْنَبِيُّ فِيمَا قَرَأَ عَلَى مَالِكٍ عَنْ أَبِي سُفْيَانَ وَاسْمُهُ قُزْمَانُ مَوْلَى ابْنِ أَبِي أَحْمَدَ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رَخَّصَ فِي بَيْعِ الْعَرَايَا فِيمَا دُونَ خَمْسَةِ أَوْسُقٍ أَوْ فِي خَمْسَةِ أَوْسُقٍ شَكَّ دَاوُدُ بْنُ الْحُصَيْنِ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ حَدِيثُ جَابِرٍ إِلَى أَرْبَعَةِ أَوْسُقٍ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ(রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঁচ ওয়াসাকের কম বা পাঁচ ওয়াসাক পরিমাণে ‘আরিয়্যা পদ্ধতিতে ক্রয়-বিক্রয়ের অনুমতি দিয়েছেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণিত হাদীসে ‘চার ওয়াসাক’ উল্লেখ রয়েছে।



সহীহঃ নাসায়ী (৪২৩৩, ৪৫৩৩)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2382) صحیح مسلم (1541)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك " ٢/ ٦٢٠، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢١٩٠)، ومسلم (١٥٤١)، والترمذي (١٣٤٨) و (١٣٤٩)، والنسائي (٤٥٤١). وهو في "مسند أحمد" (٧٢٣٦)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٠٦).









সুনান আবী দাউদ (3365)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سَعِيدٍ الْهَمْدَانِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ الْحَارِثِ، عَنْ عَبْدِ رَبِّهِ بْنِ سَعِيدٍ الأَنْصَارِيِّ، أَنَّهُ قَالَ الْعَرِيَّةُ الرَّجُلُ يُعْرِي الرَّجُلَ النَّخْلَةَ أَوِ الرَّجُلُ يَسْتَثْنِي مِنْ مَالِهِ النَّخْلَةَ أَوْ الاِثْنَتَيْنِ يَأْكُلُهَا فَيَبِيعُهَا بِتَمْرٍ ‏.‏




‘আস ইবনুল হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) হতে রাব্বিহি ইবনু সা’ঈদ আল-আনসারীর সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আরিয়্যা হচ্ছে কেউ অন্য কোন ব্যক্তিকে তার বাগানের একটি খেজুর গাছ দান করলো অথবা কেউ তার খেজুর বাগান থেকে কাউকে একটি বা দু’টি খেজুর গাছ এই বলে নির্দিষ্ট করলো যে, এই গাছের ফল সে নিবে। অতঃপর প্রকৃত মালিক শুকনা খেজুরের বিনিময়ে দান করা খেজুর গাছের তাজা ফল ক্রয় করলো।



সহীহঃ নাসায়ী (৪৫৪১, ৪২৩১)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. ابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه البيهقي ٥/ ٣١٠ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وقد ذكر الحافظ ابن حجر في "الفتح" ٤/ ٣٩١ صوراً أخرى للعرية.









সুনান আবী দাউদ (3366)


حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، عَنْ عَبْدَةَ، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، قَالَ الْعَرَايَا أَنْ يَهَبَ الرَّجُلُ، لِلرَّجُلِ النَّخَلاَتِ فَيَشُقَّ عَلَيْهِ أَنْ يَقُومَ عَلَيْهَا فَيَبِيعَهَا بِمِثْلِ خَرْصِهَا ‏.‏




ইবনু ইসহাক্ব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ‘আরিয়্যা হলো- কোন ব্যক্তি তার কিছু খেজুর গাছ অন্য কাউকে দান করলো। অতঃপর দাতার নিকট এটা অপ্রিয় মনে হলো যে, (গ্রহীতা) ব্যক্তি এ গাছের কাছে আসুক। এমতাবস্থায় সে (গ্রহীতা) ব্যক্তি তার গাছের খেজুর অনুমান করে শুকনা খেজুরের বিনিময়ে মালিকের কাছে বিক্রি করে দিলো (এটাই ‘আরিয়্যা)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد مقطوع




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات. ابن إسحاق: هو محمد بن إسحاق بن يسار المطلبي مولاهم صاحب "السيرة النبوية"، وعَبْدة: هو ابن سليمان. وانظر ما قبله.









সুনান আবী দাউদ (3367)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الثِّمَارِ حَتَّى يَبْدُوَ صَلاَحُهَا نَهَى الْبَائِعَ وَالْمُشْتَرِيَ ‏.‏




আবদুল্লাহ ইবনু ‘উমার (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গাছের ফল উপযোগী হওয়ার পূর্বে ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বিক্রেতা এবং ক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।



সহীহঃ ইবনু মাজাহ (২২১৪)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2194) صحیح مسلم (1534)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٦١٨. وأخرجه البخاري (٢١٩٤)، ومسلم (١٥٣٤)، وابن ماجه (٢٢١٤)، والنسائي (٤٥١٩) من طرق عن نافع، به. وأخرجه البخاري (٢١٨٣) و (٢١٩٩) ومسلم بإثر (١٥٣٨)، والنسائي (٤٥٢٠) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، والبخاري (١٤٨٦)، ومسلم (١٥٣٤) من طريق عبد الله بن دينار، كلاهما عن ابن عمر. وأخرجه البخاري (٢٢٤٧) و (٢٢٤٩) من طريق أبي البختري، عن ابن عمر قال: نُهي عن بيع النخل حتى يصلح، وعن بيع الوَرِقِ نَساءً بناجزِ، أي: عن بيع الوَرق وهو الفضة بالذهب نَساء: تاخيراً. هو في "مسند أحمد" (٤٥٢٥) و (٦٠٥٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٨١) و (٤٩٨٩). وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٣٤٦٧). قال الخطابي: الثمرة إذا بدا صلاحها أمنت العاهة غالباً وما دامت وهي رخوة رَخْصة -أي: رطبة- قبل أن يشتد حبها أو يبدو صلاحها فإنها بعرض الآفات، وكان نهيه البائع عن ذلك لأحد وجهين: أحدهما: احتياطاً له بأن يدعها حتى يتبين صلاحها، فيزداد قيمتها ويكثر نفعه منها. وهو إذا تعجّل ثمنها لم يكن فيها طائل لقلّته، فكان ذلك نوعاً من إضاعة المال. والوجه الآخر: أن يكون ذلك مناصحة لأخيه المسلم، واحتياطاً لمال المشتري لئلا ينالها الآفة، فيبور ماله، أو يطالبه برد الثمن من أجل الحاجة، فيكون بينهما في ذلك الشر والخلاف، وقد لا يطيب للبائع مال أخيه منه في الورع إن كان لا قيمة له في الحال، إذ لا يقع له قيمة فيصير كأنه نوع من أكل المال بالباطل. وأما نهيه المشتري: فمن أجل المخاطرة والتغرير بماله، لأنها ربما تلفت بأن تنالها العاهة فيذهب ماله، فنهى عن هذا البيع تحصيناً للأموال، وكراهة للتغرير. ولم يختلف العلماء أنه إذا باعها أو شرط عليه القطع جاز بيعها، وإن لم يبد صلاحها، وإنما انصرف النهي إلى البيع قبل بدوّ الصلاح من التبقية، إلا أن الفقهاء اختلفوا فيما إذا باعها بعد بدوِّ الصلاح. فقال أبو حنيفة: البيع جائز على الإطلاق. وعليه القطع. فيكون في معنى من شرط القطع. وقال الشافعي: البيع جائز، وعلى البائع تركها على الشجر حتى تبلغ إناها، وجعل العرف فيها كالشرط، واستدل بما روي عن النبي-ﷺ من طريق حميد عن أنس: أنه نهى عن بيع الثمرة حتى يبدو صلاحها. وقال: أرأيت إن منع له الثمرة، فبم يأخذ أحدكم مال أخيه؟ " قال: فدل ذلك على أن حكم الثمرة التبقية، ولو كان حكمها القطع، لم يكن يقع معه منع الثمرة.









সুনান আবী দাউদ (3368)


حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ النَّخْلِ حَتَّى يَزْهُوَ وَعَنِ السُّنْبُلِ حَتَّى يَبْيَضَّ وَيَأْمَنَ الْعَاهَةَ نَهَى الْبَائِعَ وَالْمُشْتَرِيَ ‏.‏




ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লাল বা হলুদ বর্ণ হওয়া পর্যন্ত খেজুর বিক্রি করতে এবং শীষ জাতীয় বস্তু (পাকার পূর্বে) ক্রয়–বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন। অবশ্য প্রাকৃতিক দূর্যোগে বিনষ্ট হওয়ার সময় অতিক্রান্ত হলে ক্রয়-বিক্রয় করা যাবে। তিনি ক্রেতা-বিক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।



সহীহ : তিরমিযী (১২৪৯-১২৫০)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1535)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح، أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وابن عُلية: هو إسماعيل بن إبراهيم بن مقسم، المعروف بابن عُلية. وأخرجه مسلم (١٥٣٥)، والترمذي (١٢٧٠)، والنسائي (٤٥٢٠) من طريق إسماعيل ابن علية، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٤٤٩٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٤). وانظر ما قبله. قال في "القاموس": زها البُسر: تلوَّن، كأزهى.









সুনান আবী দাউদ (3369)


حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ النَّمَرِيُّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ خُمَيْرٍ، عَنْ مَوْلًى، لِقُرَيْشٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ بَيْعِ الْغَنَائِمِ حَتَّى تُقْسَمَ وَعَنْ بَيْعِ النَّخْلِ حَتَّى تُحْرَزَ مِنْ كُلِّ عَارِضٍ وَأَنْ يُصَلِّيَ الرَّجُلُ بِغَيْرِ حِزَامٍ ‏.‏




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গণীমাতের মাল বণ্টনের পূর্বে ক্রয়-বিক্রয় করতে, সব ধরনের বালা-মুসিবত দূর হওয়ার পূর্বে খেজুর ক্রয়-বিক্রয় করতে এবং কোমরবন্ধ ব্যতিত সলাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مولی لقریش: مجہول کما قال المنذري (عون المعبود 260/3) ، (انوار الصحیفہ ص 121)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الراوي عن أبي هريرة. وأخرجه أحمد (٩٠١٧) و (٩٩٠٩) و (١٠١٠٥)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ٢/ ٢٠ من طرق عن شعبة بن الحجاج، بهذا الإسناد. وأخرجه قطعة النهي عن بيع المغانم حتى تُقسم: ابنُ أبي شيبة ١٢/ ٤٣٧ من طريق شعبة، به. وأخرج قطعة الاحتزام: البيهقي ٢/ ٢٤٠ من طريق شعبة، به. وأخرج مسلم (١٥٣٨) من طريق عبد الرحمن بن أبي نُعم، ومسلم أيضاً بإثر (١٥٣٩) وابن ماجه (٢٢١٥)، والنسائي (٤٥٢١) من طريق سعيد بن المسيب وأبي سلمة ابن عبد الرحمن، ثلاثتهم عن أبي هريرة رفعه: "لا تبتاعوا الثمر حتى يَبْدُوَ صلاحُه". وسيأتي عند المصنف برقم (٣٣٧٦) من طريق الأعرج، عن أبي هريرة: أن النبي-ﷺ نهى عن بيع الغرر. وهو في "صحيح مسلم" (١٥١٣). وبيع الغرر يدخل فيه بيع الغنائم حتى تُقسم وبيع النخل حتى يُحرَزَ، لأن كلاهما من بيوع الغرر التي فيها جهالة. ويشهد لقطعة النهي عن الصلاة بغير حزام حديث سلمة بن الأكوع السالف عند المصنف برقم (٦٣٢) قال: قلت: يا رسول الله ﷺ، إني رجلٌ أصيدُ، أفأصلي في القميص الواحد؟، قال: "نعم" وازرُزه ولو بشوكة". وإسناده حسن. وقوله: بغير حزام، أي: من غير أن يشد ثوبه عليه، لأنهم كانوا قلّما يتسَرْولُون، وإذا لم يُشَدّ الوسط، ربما بدت العورة. انظر"النهاية".









সুনান আবী দাউদ (3370)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ، مُحَمَّدُ بْنُ خَلاَّدٍ الْبَاهِلِيُّ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ سَلِيمِ بْنِ حَيَّانَ، أَخْبَرَنَا سَعِيدُ بْنُ مِينَاءَ، قَالَ سَمِعْتُ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ تُبَاعَ الثَّمَرَةُ حَتَّى تُشَقِّحَ ‏.‏ قِيلَ وَمَا تُشَقِّحُ قَالَ تَحْمَارُّ وَتَصْفَارُّ وَيُؤْكَلُ مِنْهَا ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘মুশাক্কাহ’ না হওয়া পর্যন্ত ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)–কে ‘মুশাক্কাহ’ শব্দের অর্থ জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন, এর অর্থ হল লাল ও হলুদ বর্ণ ধারণ করা এবং তা খাওয়ার উপযোগী হওয়া।



সহীহ : আহাদীসূল বুযূ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2196) صحیح مسلم (1536 بعد ح1543)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو القطّان. وأخرجه البخاري (٢١٩٦) من طريق يحيى بن سعد، ومسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق بهز بن أسد، كلاهما عن سليم بن حيان، به. لكن جاء في رواية بهز: قلت لسعيد: ما تُشقح؟ قال: تَحْمارُّ وتَصْفارُّ، ويؤكل منهما. فجعل هذا التفسير من كلام سعيد بن ميناء. وهذا محتمل في رواية يحيى بن سعيد أيضاً. وأخرجه مسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق أبو الوليد المكي وعطاء بن أبي رباح، عن جابر بلفظ: نهى رسول الله ﷺ-ﷺ أن يُشترى النخل حتى يُشْقِه، والإشقاه أن يحمّر أو يصفّر أو يؤكل منه شيء، وهذا يحتمل أن يكون من تفسيره ﷺ، ويحتمل أن يكون من جابر، وربما كان من عطاء أو من دونه. وهو في "مسند أحمد" (١٤٤٣٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٢). وأخرجه مسلم (١٥٣٦) من طريق أبي الزبير، ومسلم (١٥٣٦) والنسائي (٣٩٢١) من طريق عمرو بن دينار كلاهما عن جابر قال: نهى رسول الله ﷺ-ﷺ عن بيع الثمر حتى يطيب. وقال عمرو بن دينار: حتى يبدوَ صلاحُه. وسيأتي برقم (٣٣٧٣) بلفظ: أن النبي-ﷺ نهى عن بيع الثمر حتى يبدو صلاحه. وانظر تمام تخريجه هناك. قال الخطابي: التشقيح: تغتر لونها إلى الصفرة والحُمرة، والشقحة: لون غير خالص في الحمرة والصفرة، وإنما هي تغير لونه في كُمودة، ومنه قيل: قبيح شقيح، أي: تغير اللون إلى السماجة والقُبح. وإنما قال: تَحْمارُّ وتَصْفارُّ، لأنه لم يُرد به اللون الخالص، وإنما يُستعمل ذلك في اللون المتميل، يقال: ما زال يحْمارّ وجهه ويَصْفارّ، إذا كان يضرب مرة إلى الصفرة ومرة إلى الحمرة، فإذا أرادوا أنه قد تمكن واستقر قالوا: تحمَّر وتصفَّر. وفي قوله: "حتى تشقح" دليل على أن الاعتبار في بدوّ الصلاح إنما هو بحدوث الحمرة في الثمرة دون إتيان الوقت الذي يكون فيه صلاح الثمار غالباً.









সুনান আবী দাউদ (3371)


حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ، عَنْ حَمَّادِ بْنِ سَلَمَةَ، عَنْ حُمَيْدٍ، عَنْ أَنَسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الْعِنَبِ حَتَّى يَسْوَدَّ وَعَنْ بَيْعِ الْحَبِّ حَتَّى يَشْتَدَّ ‏.‏




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আঙ্গুর কালো রং ধারণ করার আগে এবং খাদ্যশষ্য পুষ্ট হওয়ার আগে ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২১৭)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، مشکوۃ المصابیح (2862) ، حمید عنعن لکنہ کان یدلس عن ثابت البناني عن أنس رضي اللہ عنہ وثابت البناني ثقۃ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وأبو الوليد: هو هشام ابن عبد الملك الطيالسي، والحسن بن علي: هو الخلال. وأخرجه ابن ماجه (٢٢١٧)، والتر مذي (١٢٧٢) من طرق عن حماد بن سلمة، به. وهو في "مسند أحمد" (١٣٣١٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٣).









সুনান আবী দাউদ (3372)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَنْبَسَةُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنِي يُونُسُ، قَالَ سَأَلْتُ أَبَا الزِّنَادِ عَنْ بَيْعِ الثَّمَرِ، قَبْلَ أَنْ يَبْدُوَ، صَلاَحُهُ وَمَا ذُكِرَ فِي ذَلِكَ فَقَالَ كَانَ عُرْوَةُ بْنُ الزُّبَيْرِ يُحَدِّثُ عَنْ سَهْلِ بْنِ أَبِي حَثْمَةَ عَنْ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ قَالَ كَانَ النَّاسُ يَتَبَايَعُونَ الثِّمَارَ قَبْلَ أَنْ يَبْدُوَ صَلاَحُهَا فَإِذَا جَدَّ النَّاسُ وَحَضَرَ تَقَاضِيهِمْ قَالَ الْمُبْتَاعُ قَدْ أَصَابَ الثَّمَرَ الدُّمَانُ وَأَصَابَهُ قُشَامٌ وَأَصَابَهُ مُرَاضٌ عَاهَاتٌ يَحْتَجُّونَ بِهَا فَلَمَّا كَثُرَتْ خُصُومَتُهُمْ عِنْدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَالْمَشُورَةِ يُشِيرُ بِهَا ‏ "‏ فَإِمَّا لاَ فَلاَ تَتَبَايَعُوا الثَّمَرَةَ حَتَّى يَبْدُوَ صَلاَحُهَا ‏"‏ ‏.‏ لِكَثْرَةِ خُصُومَتِهِمْ وَاخْتِلاَفِهِمْ ‏.‏




ইউনুস (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবুয যিনাদকে উপযোগী হওয়ার পূর্বে ফল ক্রয়-বিক্রয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন, ‘উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) সাহল ইবনু হাসামাহ হতে যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেন যে, যায়িদ বলেছেন, লোকেরা ফল (খাওয়া ও ব্যবহার করার) উপযোগী হওয়ার পূর্বে ক্রয়-বিক্রয় করতো। তাদের ফল কাটার সময় ক্রেতা এসে বলত, ফলে মড়ক লেগেছে, পোকা ধরেছে, রোগ হয়েছে। সে এসব অজুহাত দাঁড় করিয়ে মূল্য কম দেয়ার চেষ্টা করতো অথবা মোটেই দিতে চাইতো না। একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে তাদের অত্যধিক ঝগড়া হলে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে পরামর্শ দিলেন যে, ফল পরিপক্ক না হওয়া পর্যন্ত ক্রয়-বিক্রয় করো না। এ নির্দেশ ছিলো তাদের অধিক ঝগড়া ও মতবিরোধ এড়ানোর জন্য।



সহীহ : আহাদীসুল বুয়ূ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث حسن، عنبسة بن خالد -وهو الأيلي- متابع. وقال أحمد بن صالح المصري فيما نقله الخطيب في "تاريخه" ٤/ ١٩٨: حدثت أحمد بن حنبل بحديث زيد ابن ثابت في بيع الثمار، فأعجبه واستزادني مثله. وأخرجه الدارقطني (٢٨٣٣)، والخطيب في تاريخه، ٤/ ١٩٨ من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو عوانة (٥٠٤١)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٢٨، والدارقطني (٢٨٣٣) و (٢٩٤٦)، والبيهقي ٥/ ٣٠١ من طريق أبي زرعة وهب الله بن راشد الحَجْري، عن يونس بن يزيد، به. وأبو زرعة وهب الله بن راشد حديثه حسن في المتابعات. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٤٧٨٨) من طريق محمد بن حميد الرازي، عن هارون بن المغيرة، والبخاري تعليقاً بإثر (٢١٩٣) من طريق علي بن بحر، عن حكّام -هو ابن سَلْم- كلاهما عن عنبسة بن خالد، عن زكريا بن خالد، عن أبي الزناد، به. فذكرا زكريا بن خالد بدل: يونس بن يزيد! وأخرجه الذهلي في "الزهريات" كما في "تغليق التعليق" ٣/ ٢٦١ عن أبي صالح -وهو عبد الله بن صالح كاتب الليث-، عن الليث بن سعْد، عن أبي الزناد، به. وأبو صالح حسن الحديث في المتابعات، وقد علقه البخاري في "صحيحه" (٢١٩٣) بصيغة الجزم. قوله: الدَّمان: قال في "النهاية": هو بالفتح وتخفيف الميم: فساد الثمر وعفنُه قبل إدراكه، حتى يسودَّ، من الدِّمْن وهو السِّرْقين -وهو ما تُدمَلُ به الأرض- … قال: ويقال: الدِّمال باللام أيضاً بمعناه، هكذا قيدهُ الجوهري وغيره بالفتح، والذي جاء في "غريب الخطابي" بالضم، وكأنه أشبه، لأن ما كان من الأدواء والعاهات فهو بالضم كالسُّعال والنُّحاز والزُّكام، وقد جاء في الحديث: القُشام والمُراض، وهما من آفات الثمرة، ولا خلاف في ضمهما، وقيل: هما لغتان. والقشام: شيء يصيبه حتى لا يرطب، وقال الأصمعي: هو أن ينتقص ثمر النخل قبل أن تصير بلحاً. وقوله: جدَّ الناسُ، أي: قطعوا الثمار.









সুনান আবী দাউদ (3373)


حَدَّثَنَا إِسْحَاقُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ الطَّالْقَانِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ الثَّمَرِ حَتَّى يَبْدُوَ صَلاَحُهُ وَلاَ يُبَاعُ إِلاَّ بِالدِّينَارِ أَوْ بِالدِّرْهَمِ إِلاَّ الْعَرَايَا ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপযোগী হওয়ার পূর্বে খেজুর ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন। আর এর ক্রয়-বিক্রয় অবশ্যই দীনার বা দিরহামের মাধ্যমে হবে। তবে ‘আরিয়্যার’ অনুমতি আছে।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২১৬)




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2381) صحیح مسلم (1536 بعد ح1543)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز بن جُريج، وسفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه البخاري (٢١٨٩) و (٢٣٨١)، ومسلم بإثر (١٥٤٣)، وابن ماجه (٢٢١٦)،والنسائي (٣٨٧٩) و (٤٥٢٣) و (٤٥٢٤) و (٤٥٥٠) من طريق ابن جريج، به. وقرن البخاري في الموضع الأول ومسلم في إحدى رواياته، والنسائي في الموضعين الأول والثالث بعطاء أبا الزبير، وهو محمد بن مسلم بن تدرس المكي. وأخرجه البخاري (١٤٨٧)، ومسلم بإثر (١٥٤٣) من طريقين عن عطاء بن أبي رباح، به. ولفظ رواية مسلم كرواية سعيد بن ميناء السالفة عند المصنف برقم (٣٣٧٠). وأخرج مسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق أبي الزبير وسعيد بن ميناء والنسائي (٤٦٣٤) من طريق أبي الزبير، كلاهما، عن جابر … ورَخَّص في العرايا. قلنا: يعني رسول الله ﷺ. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٥٨) و (١٤٨٧٦)، و "صحيح ابن حبان" (٤٩٩٢). وانظر ما سلف برقم (٣٣٧٠).









সুনান আবী দাউদ (3374)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَيَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ حُمَيْدٍ الأَعْرَجِ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَتِيقٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ بَيْعِ السِّنِينَ وَوَضَعَ الْجَوَائِحَ ‏.‏ قَالَ أَبُو دَاوُدَ لَمْ يَصِحَّ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي الثُّلُثِ شَىْءٌ وَهُوَ رَأْىُ أَهْلِ الْمَدِينَةِ ‏.‏




জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন গাছের বা বাগানের ফল কয়েক বছরের জন্য অগ্রিম ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন এবং ক্ষতিপূরণের জন্য মূল্য কর্তনের ব্যবস্থা রেখেছেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ‘এক-তৃতীয়াংশ পরিমাণ ক্ষতিপূরণের কথাটি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর দিকে সম্পৃক্ত করা সঠিক নয়। এটা মদীনাহ্‌বাসীদের মত।



সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২১৮)।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1554 بعد ح1555)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حُميد الأعرج:. هو ابن قيس المكي، وسفيان: هو ابن عُيينة. وأخرج الشطر الأول منه وهو النهي عن بيع السنين: مسلم بإثر (١٥٤٣)، وابن ماجه (٢٢١٨)، والنسائي (٤٥٣١) و (٤٦٢٧) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن جابر. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٢٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٥). وانظر ما بعده. وأخرج الشطر الثاني منه، وهو وضع الجوائح: مسلم بإثر (١٥٥٥)، والنسائي (٤٥٢٩) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٢٠)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٣١). وسيأتي ذكر وضع الجوائح بلفظ آخر عند المصنف برقم (٣٤٧٠). قال الخطابي: بيع السنين: هو أن يبيع الرجل ما تثمره النخلة أو النخلات بأعيانها سنين ثلاثاً أو أربعاً أو أكثر منها، وهذا غرر، لأنه يبيع شيئاً غير موجود ولا مخلوق حال العقد، ولا يُدرى هل يكون ذلك أم لا، وهل يتم النخل أم لا؟ وهذا في بيوع الأعيان فأما في بيوع الصفات فهو جائز مثل أن يسُلف في الشيء إلى ثلاث سنين أو أربع أو أكثر ما دامت المدة معلومة إذا كان الشيء المُسلَف فيه غالباً وجوده عند وقت محل السلف. وأما قوله: وضع الجوائح، هكذا رواه أبو داود، ورواه الشافعي عن سفيان بإسناده فقال: وأمر بوضع الجوائح، والجوائح: هي الآفات التي تصيب الثمار فتهلكها، يقال: جاحهم الدّهر يجوحهم واجتاحهم الزمان إذا أصابهم بمكروه عظيم. قال الشيخ [هو الخطابي]: وأمره بوضع الجوائح عند أكثر الفقهاء أمر ندب واستحباب من طريق المعروف والإحسان، لا على سبيل الوجوب والإلزام. وقال أحمد بن حنبل وأبو عبيد في جماعة من أهل الحديث: وضع الجائحة لازم للبيع إذا باع الثمرة فأصابته الآفة فهلكت. وقال مالك: يوضع في الثلث فصاعداً، ولا يوضع فيما هو أقل من الثلث. قال أصحابه: ومعنى هذا الكلام أن الجائحة إذا كانت دون الثلث كان من مال المشتري، وما كان أكثر من الثلث فهو من مال البائع. واستدل من تأول الحديث على معنى الندب والاستحباب دون الإيجاب بأنه أمر حدث بعد استقرار ملك المشتري عليها، فلو أراد أن يبيعها أو يهبها لصح ذلك منه فيها، وقد نهى رسول الله ﷺ عن ربح ما لم يُضمن، فإذا صح بيعها ثبت أنها من ضمانه، وقد نهى رسول الله ﷺ عن بيع الثمرة قبل بدوِّ صلاحها، فلو كانت الجائحة بعد بدوِّ لصلاح من مال البائع لم يكن لهذا النهي فائدة.