সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا حَجَّاجُ بْنُ مِنْهَالٍ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، بِمَعْنَى إِسْنَادِهِ أَنَّ رَجُلَيْنِ، ادَّعَيَا بَعِيرًا عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَبَعَثَ كُلُّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا شَاهِدَيْنِ فَقَسَمَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بَيْنَهُمَا نِصْفَيْنِ .
ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, দুই ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একই উটের মালিকানা দাবি করলো। উভয়ে দু’জন করে সাক্ষীও পেশ করলো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটটি উভয়ের মধ্যে সমানভাগে বন্টন করলেন। [৩৬১৫]
দুর্বল : মিশকাত (৩৭৭২)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3772) ، انظر الحدیث السابق (3613)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث معلٌّ كما بيناه في "مسند أحمد" (١٩٦٠٣). وأخرجه ابن أبي شيبة ١٠/ ١٨٤، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٧٥٤)، وابن الغطريف في "جزئه" (١٤) من طريق عفان، وأبو يعلى (٧٢٨٠)، والطحاوي (٤٧٥٥)، والحاكم ٤/ ٩٥، والبيهقي ١٠/ ٢٥٧، ٢٥٩، وفي "السنن الصغرى" (٤٣٤١) من طريق هدبة بن خالد، كلاهما عن همام، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد في "العلل"، (٢٧١) و (٣٦٩) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن همام، عن قتادة، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه مرسلاً لم يذكر أبا موسى في الإسناد. وانظر سابقيه.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مِنْهَالٍ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عَرُوبَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ خِلاَسٍ، عَنْ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَجُلَيْنِ، اخْتَصَمَا فِي مَتَاعٍ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم لَيْسَ لِوَاحِدٍ مِنْهُمَا بَيِّنَةٌ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " اسْتَهِمَا عَلَى الْيَمِينِ مَا كَانَ أَحَبَّا ذَلِكَ أَوْ كَرِهَا " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা দু’ ব্যক্তি একটি জিনিসের মালিকানার দাবি নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাদের বিবাদ পেশ করলো। তাদের উভয়েরই কোন প্রমাণ ছিলো না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃলটারীর মাধ্যমে নির্ধারণ করো কে কসম করবে, চাই তারা এটা পছন্দ করুক বা না করুক।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2329،2346) ، قتادۃ وسعید بن أبي عروبۃ مدلسان وعنعنا ، (انوار الصحیفہ ص 128، 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو رافع: هو نُفيع الصائغ، وخِلاس: هو ابن عمرو الهَجَري، ابن أبي عروبة: هو سعيد. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٤٦) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى، والنسائي في "الكبرى" (٥٩٥٧) من طريق إسحاق بن يوسف الأزرق، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٠٣٤٧). وانظر تالييه. قال الخطابي: معنى الاستهام هنا الاقتراع، يريد أنهما يقترعان فأيهما خرجت له القرعة حَلَفَ وأخذ ما ادعاه، وروي ما يشبه هذا عن علي ﵁.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، وَسَلَمَةُ بْنُ شَبِيبٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، - قَالَ أَحْمَدُ قَالَ - حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ، عَنْ هَمَّامِ بْنِ مُنَبِّهٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِذَا كَرِهَ الاِثْنَانِ الْيَمِينَ أَوِ اسْتَحَبَّاهَا فَلْيَسْتَهِمَا عَلَيْهَا " . قَالَ سَلَمَةُ قَالَ أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ وَقَالَ إِذَا أُكْرِهَ الاِثْنَانِ عَلَى الْيَمِينِ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ (বাদী-বিবাদী) উভয়েই কসম করা অপছন্দ বা পছন্দ করলে উভয়ের মধ্যে কে কসম করবে তা লটারীর মাধ্যমে নির্ধারণ করবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أصلہ عند البخاري (2574) بغیر ھذا اللفظ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٨٢٠٩). وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٥٢١٢)، ومن طريق البخاري (٢٦٧٤)، والنسائي في "الكبرى" (٥٩٥٨) لكن بلفظ: أن النبي ﷺ عرض على قوم اليمين فأسرعوا، فأمر أن يُسهم بينهم في اليمين، أيهم يحلف. قال الخطابي وغيره: الإكراه هنا لا يُراد به حقيقته، لأن الإنسان لا يكره على اليمين، وإنما المعنى: إذا توجهت اليمين على اثنين، وأرادا الحلف. سواء كانا كارهين لذلك بقلبيهما وهو معنى الإكراه، أو مختارين لذلك بقلبيهما وهو معنى الاستحباب، وتنازعا: أيهما يبدأ، فلا يقدم أحدهما على الآخر بالتشهي بل بالقرعة وهو المراد بقوله: فليستهما، أي؟ فليقترعا.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ الْحَارِثِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي عَرُوبَةَ، بِإِسْنَادِ ابْنِ مِنْهَالٍ مِثْلَهُ قَالَ فِي دَابَّةٍ وَلَيْسَ لَهُمَا بَيِّنَةٌ فَأَمَرَهُمَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَسْتَهِمَا عَلَى الْيَمِينِ .
সাঈদ ইবনু আবূ আরূবাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে ইবনু মিনহালের সূত্র হতে বর্ণিত, অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি বলেন, বিবাদটি ছিলো একটি পশুকে কেন্দ্র করে। বাদী-বিবাদী উভয়েরই কোন সাক্ষী ছিলো না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শপথ কে করবে তা লটারীর মাধ্যমে নির্ধারণের আদেশ দিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2329) ، قال معاذ: قتادۃ وسعید بن أبي عروبۃ مدلسان وعنعنا ، (انوار الصحیفہ ص 128، 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مصنف ابن أبي شيبة" ٦/ ٣١٨، وعنه ابن ماجه (٢٣٢٩). وأخرجه النسائي (٥٩٥٦) عن عمرو بن علي الفلاس، عن خالد بن الحارث، بهذا الإسناد. وانظر سابقيه.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ الْقَعْنَبِيُّ، حَدَّثَنَا نَافِعُ بْنُ عُمَرَ، عَنِ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ، قَالَ كَتَبَ إِلَىَّ ابْنُ عَبَّاسٍ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى بِالْيَمِينِ عَلَى الْمُدَّعَى عَلَيْهِ .
ইবনু আবূ মুলাইকাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে লিখে পাঠালেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিবাদীকে কসম খাওয়ানোর আদেশ দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2514، 1711)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. ابن أبي مُليكة: هو عَبد الله بن عُبيد الله. وأخرجه البخاري (٢٥١٤) و (٢٦٦٨)، ومسلم (١٧١١)، والترمذي (١٣٩١)، والنسائي (٥٤٢٥) من طرق عن نافع بن عمر، به. وزاد النسائي في روايته قصة هذه المكاتبة. وأخرجه بنحوه البخاري (٤٥٥٢)، ومسلم (١٧١١)، وابن ماجه (٢٣٢١) من طريق ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، به. وذكره البخاري ضمن القصة المشار إليها. وهو في "مسند أحمد" (٣١٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٨٣). وروى البيهقي في "سننه، ١٠/ ٢٥٢ بإسناد حسن من حديث ابن عباس رفعه: "لو يُعطى الناسُ بدعواهم … ولكن البينة على المدعي واليمين على من أنكر". قال ابن المنذر في "الإجماع، ص ٧٥: أجمع أهل العلم على أن البينة على المدَّعي واليمين على المدَّعَى عليه.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، حَدَّثَنَا عَطَاءُ بْنُ السَّائِبِ، عَنْ أَبِي يَحْيَى، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ - يَعْنِي لِرَجُلٍ حَلَّفَهُ - " احْلِفْ بِاللَّهِ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ مَا لَهُ عِنْدَكَ شَىْءٌ " . يَعْنِي لِلْمُدَّعِي . قَالَ أَبُو دَاوُدَ أَبُو يَحْيَى اسْمُهُ زِيَادٌ كُوفِيٌّ ثِقَةٌ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে শপথ করানোর সময় বললেনঃ সেই আল্লাহ্র শপথ করো যিনি ছাড়া কোন ইলাহ নেই, তোমার নিকট বাদীর কোন পাওনা নেই। তিনি বিবাদীকে এই শপথ করিয়েছিলেন।
সানাদ দূর্বল : মিশকাত(৩৭৭৪)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3774) ، انظر الحدیث السابق (3275)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. عطاء بن السائب اختلط بأخرة، وقد تفرد بهذا الحديث، وعدَّ الحافظ الذهبي في "ميزان الاعتدال" هذا الحديث من مناكيره، وقد اضطرب في متن الحديث كما أوضحناه في "مسند أحمد" (٢٢٨٠). واختلف عليه في إسناده كذلك، فقد رواه حماد بن سلمة وعبد الوارث والثوري وجرير وشريك -فيما قاله البيهقي ١٠/ ٣٧ - ، عن عطاء، عن أبي يحيى، عن ابن عباس، ورواه شعبة عن عطاء ابن السائب، عن أبي البختري، عن عَبيدة السلماني، عن ابن الزبير. أبو الأحوص: هو سلاّم بن سليم، وأبو يحيى: هو زياد المكي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٩٦٤) عن هناد بن السري، عن أبي الأحوص، به، وهو في "مسند أحمد" (٢٦٩٥). وانظر ما سلف برقم (٣٢٧٥). وقد صح في صيغة اليمين هذه عن ابن عباس في قصة الملاعنة عند البيهقي ٧/ ٣٩٥ أن النبي ﷺ قال لهلال بن أمية وقد قذف امرأته: "احلف بالله الذي لا إله إلا هو إني لصادق".
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عِيسَى، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا الأَعْمَشُ، عَنْ شَقِيقٍ، عَنِ الأَشْعَثِ، قَالَ كَانَ بَيْنِي وَبَيْنَ رَجُلٍ مِنَ الْيَهُودِ أَرْضٌ فَجَحَدَنِي فَقَدَّمْتُهُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لِيَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " أَلَكَ بَيِّنَةٌ " . قُلْتُ لاَ . قَالَ لِلْيَهُودِيِّ " احْلِفْ " . قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِذًا يَحْلِفَ وَيَذْهَبَ بِمَالِي . فَأَنْزَلَ اللَّهُ { إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ } إِلَى آخِرِ الآيَةِ .
আল-আশ’আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং এক ইয়াহুদী এক খন্ড জমির মালিক ছিলাম। সে আমার মালিকানা অস্বীকার করলে আমি তাকে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে যাই। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেনঃ তোমার কি সাক্ষী আছে? আমি বললাম, না। তিনি ইয়াহুদীকে বললেনঃ কসম খাও। আমি বললাম, হে আল্লাহ্র রাসূল! সে যখনই শপথ করবে, আমি আমার সম্পত্তি হতে বঞ্চিত হবো। অতঃপর মহান আল্লাহ্ অবতীর্ন করলেন : “যারা আল্লাহ্র সাথে কৃত ওয়াদা ও নিজেদের শপথসমূহ সামান্য মূল্যে বিক্রি করে, আর পরকালে তাদের জন্য কোন অংশ নেই। ক্বিয়ামাতের দিন আল্লাহ্ তাদের সাথে কথা বলবেন না, তাদের প্রতি তাকিয়ে দেখবেন না, আর তাদেরকে পবিত্র করবেন না। তাদের জন্য কঠিন ও পীড়াদায়ক শাস্তি রয়েছে।” (সূরাহ আল-‘ইমরান : ৭৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2616، 2617) صحیح مسلم (138) ، مشکوۃ المصابیح (3775) ، انظر الحدیث السابق (3243)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو مكرر الحديث السالف برقم (٣٢٤٣).
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا الْفِرْيَابِيُّ، حَدَّثَنَا الْحَارِثُ بْنُ سُلَيْمَانَ، حَدَّثَنِي كُرْدُوسٌ، عَنِ الأَشْعَثِ بْنِ قَيْسٍ، أَنَّ رَجُلاً، مِنْ كِنْدَةَ وَرَجُلاً مِنْ حَضْرَمَوْتَ اخْتَصَمَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي أَرْضٍ مِنَ الْيَمَنِ فَقَالَ الْحَضْرَمِيُّ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ أَرْضِي اغْتَصَبَنِيهَا أَبُو هَذَا وَهِيَ فِي يَدِهِ . قَالَ " هَلْ لَكَ بَيِّنَةٌ " . قَالَ لاَ وَلَكِنْ أُحَلِّفُهُ وَاللَّهِ مَا يَعْلَمُ أَنَّهَا أَرْضِي اغْتَصَبَنِيهَا أَبُوهُ . فَتَهَيَّأَ الْكِنْدِيُّ يَعْنِي لِلْيَمِينِ . وَسَاقَ الْحَدِيثَ .
আল-আশ’আস ইবনু ক্বায়িস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, কিনদা এলাকার জনৈক ব্যক্তি ও হাদরামওতের এক লোক ইয়ামান হতে জমি সংক্রান্ত ঝগড়া নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্হিত হলো। হাদরামী বললো, হে আল্লাহ্র রাসূল! তার পিতা আমার জমি ছিনিয়ে নিয়েছিলো, বর্তমানে তা তার দখলে রয়েছে। তিনি বললেনঃ তোমার কোন সাক্ষী আছে কি? হাদরামী বললো, না। কিন্তু আমি তাকে শপথ করে বলতে পারি, আল্লাহ্ জানেন যে, তা আমার জমি এবং তার পিতা আমার এই জমিটা জবরদখর করে নিয়েছে - তাও সে অবহিত আছে। অতঃপর কিনদী শপথ করার জন্য তৈরী হলো। এভাবে হাদীসের শেষ পর্যন্ত বর্ণিত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3776) ، انظر الحدیث السابق (3244)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. وهو مكرر الحديث السالف برقم (٣٢٤٤).
حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ سِمَاكٍ، عَنْ عَلْقَمَةَ بْنِ وَائِلِ بْنِ حُجْرٍ الْحَضْرَمِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ جَاءَ رَجُلٌ مِنْ حَضْرَمَوْتَ وَرَجُلٌ مِنْ كِنْدَةَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ الْحَضْرَمِيُّ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ هَذَا غَلَبَنِي عَلَى أَرْضٍ كَانَتْ لأَبِي فَقَالَ الْكِنْدِيُّ هِيَ أَرْضِي فِي يَدِي أَزْرَعُهَا لَيْسَ لَهُ فِيهَا حَقٌّ . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم لِلْحَضْرَمِيِّ " أَلَكَ بَيِّنَةٌ " . قَالَ لاَ . قَالَ " فَلَكَ يَمِينُهُ " . فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّهُ فَاجِرٌ لَيْسَ يُبَالِي مَا حَلَفَ لَيْسَ يَتَوَرَّعُ مِنْ شَىْءٍ . فَقَالَ " لَيْسَ لَكَ مِنْهُ إِلاَّ ذَلِكَ " .
আলক্বামাহ ইবনু ওয়াইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা হাদরামাওতের এক লোক ও কিনদার এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্হিত হলো। হাদরামী বললো, হে আল্লাহ্র রাসূল! এ লোক আমার পিতার এক খন্ড জমি জবরদখল করে নিয়েছে। কিনদী বললো, এটা আমার জমি, আমার হাতে আছে এবং আমিই তা চাষাবাদ করে আসছি, এর উপর তার কোন অধিকার নেই। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাদরামীকে বললেনঃ তোমার কি কোন সাক্ষী আছে? সে বললো, না। তিনি বললেনঃ তবে তোমাকে তার শপথের উপর নির্ভর করতে হবে। হাদরামী বললো, হে আল্লাহ্র রাসূল! সে তো এক পাপাচারী, কি শপথ করছে তা পরোয়া করবে না এবং কোন কিছু থেকেই সে বিরত হয় না। তিনি বললেনঃ তোমার কিছুই করার নেই, তোমাকে তার শপথের উপরই নির্ভর করতে হবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (139)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو مكرر الحديث السالف برقم (٣٢٤٥).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، حَدَّثَنَا رَجُلٌ، مِنْ مُزَيْنَةَ - وَنَحْنُ عِنْدَ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ - عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَعْنِي لِلْيَهُودِ " أَنْشُدُكُمْ بِاللَّهِ الَّذِي أَنْزَلَ التَّوْرَاةَ عَلَى مُوسَى مَا تَجِدُونَ فِي التَّوْرَاةِ عَلَى مَنْ زَنَى " . وَسَاقَ الْحَدِيثَ فِي قِصَّةِ الرَّجْمِ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইয়াহুদীদেরকে বললেনঃ আমি তোমাদেরকে সেই আল্লাহ্র কসম দিয়ে বলছি, যিনি মূসা (আঃ)-এর উপর তাওরাত অবতীর্ণ করেছেন! তোমরা ব্যভিচারীর জন্য তাওরাতে কী ধরনের শাস্তির উল্লেখ দেখতে পাও? পুরো হাদীসটি রজম সংক্রান্ত ঘটনায় বর্ণিত হয়েছে। [৩৬২৪]
দূর্বল : ইরওয়া (৯৫৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، وانظر الحدیث السابق نحوہ (488) ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن، شيخ الزهري -وإن كان مبهماً- قد أثنى عليه الزهري فذكر أنه ممن يتبع العلم ويعيه كما سيأتي بعده، وذكر ابن المبارك عند الطبري في "تفسيره" ٢/ ٢٣٣ عن الزهري أن سعيد بن المسيب كان يوقره، وقد شهد أبوه الحديبية، فإبهام مثله لا يضر. وسيأتي مطولاً برقم (٤٤٥٠)، ويأتي تخريجه هناك. وانظر ما سلف برقم (٤٨٨)، وما بعده.
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ يَحْيَى أَبُو الأَصْبَغِ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدٌ، - يَعْنِي ابْنَ سَلَمَةَ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِهَذَا الْحَدِيثِ وَبِإِسْنَادِهِ قَالَ حَدَّثَنِي رَجُلٌ، مِنْ مُزَيْنَةَ مِمَّنْ كَانَ يَتَّبِعُ الْعِلْمَ وَيَعِيهِ يُحَدِّثُ سَعِيدَ بْنَ الْمُسَيَّبِ وَسَاقَ الْحَدِيثَ بِمَعْنَاهُ .
আয-যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, এ সানাদে উপরোক্ত হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত। এতে রয়েছে : মুযাইনাহ গোত্রের এক লোক যিনি জ্ঞানের অনুসরণ করেন এবং তার স্মৃতিশক্তি হতে বলেন যে, সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব (রাহিমাহুল্লাহ) এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। অতঃপর বর্ণনাকারী অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেন। [৩৬২৫]
দূর্বল : এর পূর্বেরটি দেখুন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، وانظر الحدیث السابق نحوہ (488) ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن كسابقه. وسيأتي تخريجه برقم (٤٤٥٠).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لَهُ يَعْنِي لاِبْنِ صُورِيَا " أُذَكِّرُكُمْ بِاللَّهِ الَّذِي نَجَّاكُمْ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ وَأَقْطَعَكُمُ الْبَحْرَ وَظَلَّلَ عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَأَنْزَلَ عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَى وَأَنْزَلَ عَلَيْكُمُ التَّوْرَاةَ عَلَى مُوسَى أَتَجِدُونَ فِي كِتَابِكُمُ الرَّجْمَ " . قَالَ ذَكَّرْتَنِي بِعَظِيمٍ وَلاَ يَسَعُنِي أَنْ أَكْذِبَكَ . وَسَاقَ الْحَدِيثَ .
‘ইকরিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইবনু সূরিয়াকে বললেনঃ ঐ আল্লাহ্র কসম করে তোমাদেরকে স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি যিনি ফেরাউন বাহিনীর অত্যাচার হতে তোমাদের মুক্তি দিয়েছেন, সাগর পার করে দিয়েছেন, তোমাদের উপর মেঘমালার ছায়াদান করেছেন, ‘মান্না’ ও ‘সালওয়া’ নামক খাদ্য অবতীর্ণ করেছেন এবং তোমাদের উপর মূসা (আঃ)-এর মাধ্যমে তাওরাত অবতীর্ণ করেছেন! বলো, তোমরা কি তোমাদের সেই কিতাবে রজমের শাস্তির আদেশ দেখতে পাও? ইবনু সূরিয়া বললো, আপনি একটি বিশেষ গুরুত্বপূর্ণ কিতাবের বরাত দিয়েছেন। আপনার প্রশ্নের মিথ্যা উত্তর দেয়া আমার পক্ষে সম্ভব নয়। অতঃপর বর্ণনাকারী পূর্ণ হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، سعید وقتادۃ مدلسان وعنعنا ، والسند مرسل ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه مرسلٌ. قال الزيلعي في "نصب الراية" ٤/ ١٣٠: جعله شيخنا علاء الدين مسنداً من رواية ابن عباس مقلداً لغيره في ذلك، وهو وهم، ولم يخرجه أبو داود إلا مرسلاً هكذا ذكره في كتاب الأقضية.
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ بْنُ نَجْدَةَ، وَمُوسَى بْنُ مَرْوَانَ الرَّقِّيُّ، قَالاَ حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ بْنُ الْوَلِيدِ، عَنْ بَحِيرِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ خَالِدِ بْنِ مَعْدَانَ، عَنْ سَيْفٍ، عَنْ عَوْفِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّهُ حَدَّثَهُمْ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَضَى بَيْنَ رَجُلَيْنِ . فَقَالَ الْمَقْضِيُّ عَلَيْهِ لَمَّا أَدْبَرَ حَسْبِيَ اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " إِنَّ اللَّهَ يَلُومُ عَلَى الْعَجْزِ وَلَكِنْ عَلَيْكَ بِالْكَيْسِ فَإِذَا غَلَبَكَ أَمْرٌ فَقُلْ حَسْبِيَ اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ " .
‘আওফ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ব্যক্তির মাঝে ফায়সালা দিলেন। যার বিপক্ষে ফায়সালা দেয়া হলো সে পিঠ ফিরিয়ে চলে যাওয়ার সময় বললোঃ আল্লাহ্ই আমার জন্য যথেষ্ট, তিনিই সর্বোত্তম অভিভাবক। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ নিশ্চয়ই মহান আল্লাহ্ বোকামীর জন্য তিরস্কার করেন। কিন্তু তোমার তো চতুর হওয়া উচিত। যদি কোন কারণে তুমি পরাজিত হতে তখন বলতে, আল্লাহ্ই আমার জন্য যথেষ্ট, তিনিই সর্বোত্তম অভিভাবক।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، وروایۃ بقیۃ بن الولید الحمصی عن بحیر بن سعد محمولۃ علی السماع
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف بقية بن الوليد على ضعفه مدلس وقد عنعن، سيف -وهو الشامي- قال الذهبي: لا يعرف. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (١٠٣٨٧) من طريق بقية بن الوليد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٩٨٣). وفي الباب عن الزهري مرسلاً عند البيهقي ١٠/ ١٨١ ورجاله ثقات. قال المنذري: العجز ترك ما يجب فعله بالتسويف، وهو عام في أمور الدنيا والدين. والكيس في الأمور يجري مجرى الرفق والفطنة، والكيس: العقل.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ النُّفَيْلِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ وَبْرِ بْنِ أَبِي دُلَيْلَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ مَيْمُونٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ الشَّرِيدِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لَىُّ الْوَاجِدِ يُحِلُّ عِرْضَهُ وَعُقُوبَتَهُ " . قَالَ ابْنُ الْمُبَارَكِ يُحِلُّ عِرْضَهُ يُغَلَّظُ لَهُ وَعُقُوبَتَهُ يُحْبَسُ لَهُ .
আমর ইবনুশ শারীদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ সচ্ছল ব্যক্তি ঋণ পরিশোধ না করলে তার মান-সম্মানের উপর হস্তক্ষেপ করা যায় এবং তাকে শাস্তি দেয়া যায়। ইবনুল মুবারক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এর অর্থ হলো, তার প্রতি কঠোরতা প্রদর্শন করা বৈধ এবং অর্থ তাকে আটক করা যাবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (2919) ، أخرجہ النسائي (4693 وسندہ صحیح) ورواہ ابن ماجہ (2427 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. محمد بن ميمون -وهو ابن مسيكة- روى عنه وبْر الطائفي وأثنى عليه خيراً، وقال أبو حاتم: روى عنه الطائفيون، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحح له هذا الحديث، وحسن هذا الإسناد الحافظ في "الفتح" ٥/ ٦٢. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٢٧)، والنسائي (٤٦٨٩) و (٤٦٩٠) من طريق وبْر بن أبي دليلة. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٤٦)، و "صحيح ابن حبان"، (٥٠٨٩). وعلقه البخاري قبل الحديث (٢٤٠١). قال الخطابي: في الحديث دليل على أن المعسر لا حبس عليه، لأنه إنما أباح حبسه إذا كان واجداً، والمُعدِمُ غير واجد فلا حبس عليه. وقد اختلف الناس في هذا، فكان شريح يرى حبس المليء والمعدم، إلى هذا ذهب أصحابُ الرأي. وقال مالك: لا حبس على معسر، إنما حظه الإنظار، ومذهب الشافعي: أن من كان ظاهرُ حالِه العسر، فلا يُحبس، ومن كان ظاهرُ حاله اليسار حُبِس إذا امتنع من أداء الحق، ومن أصحابه من يدعي فيه زيادة شرط، وقد بينه.
حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ أَسَدٍ، حَدَّثَنَا النَّضْرُ بْنُ شُمَيْلٍ، أَخْبَرَنَا هِرْمَاسُ بْنُ حَبِيبٍ، - رَجُلٌ مِنْ أَهْلِ الْبَادِيَةِ - عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بِغَرِيمٍ لِي فَقَالَ لِي " الْزَمْهُ " . ثُمَّ قَالَ لِي " يَا أَخَا بَنِي تَمِيمٍ مَا تُرِيدُ أَنْ تَفْعَلَ بِأَسِيرِكَ " .
হিরমাস ইবনু হাবীব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার এক ঋণগ্রহীতাকে নিয়ে এলাম। তিনি আমাকে বললেনঃ তুমি তার পিছনে লেগে থাকো। অতঃপর তিনি বললেনঃ হে তামীম গোত্রের সরদার! তোমার কয়েদীকে তুমি কি করতে চাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن ماجہ (2428) ، ھرماس بن حبیب: مجہول (دیوان الضعفاء للذھبي: 323) وأبوہ مجہول (تق: 1114) ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لجهالة الهرماس بن حبيب وأبيه. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٢٨) من طريق النضر بن شميل، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى الرَّازِيُّ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنْ بَهْزِ بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حَبَسَ رَجُلاً فِي تُهْمَةٍ .
বাহ্য ইবনু (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে অনুমানের ভিত্তিতে আটক করেছিলেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3785) ، أخرجہ الترمذي (1417 وسندہ حسن) ورواہ النسائي (4879، 4880 وسندھما حسن) عبد الرزاق صرح بالسماع عند ابن الجارود (1003)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. بهز بن حكيم وأبوه صدوقان. وأخرجه الترمذي (١٤٧٦)، والنسائي (٤٨٧٥) و (٤٨٧٦) من طريق بهز بن حكيم، به. وقال الترمذي: حديث بهز عن أبيه عن جده حديث حسن. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٠١٩). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ قُدَامَةَ، وَمُؤَمَّلُ بْنُ هِشَامٍ، - قَالَ ابْنُ قُدَامَةَ - حَدَّثَنِي إِسْمَاعِيلُ، عَنْ بَهْزِ بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، - قَالَ ابْنُ قُدَامَةَ - إِنَّ أَخَاهُ أَوْ عَمَّهُ وَقَالَ مُؤَمَّلٌ - إِنَّهُ قَامَ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ يَخْطُبُ فَقَالَ جِيرَانِي بِمَا أَخَذُوا . فَأَعْرَضَ عَنْهُ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ ذَكَرَ شَيْئًا فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " خَلُّوا لَهُ عَنْ جِيرَانِهِ " . لَمْ يَذْكُرْ مُؤَمَّلٌ وَهُوَ يَخْطُبُ .
বাহ্য ইবনু হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে পর্যায়ক্রমে তার পিতা ও দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি অর্থাৎ ইবনু কুদামাহ্র বর্ণনা মোতাবেক বাহ্য ইবনু হাকীমের দাদার ভাই বা তার চাচা, আর মু’আম্মালের বর্ণনা মোতাবেক বাহ্যের দাদা মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খুত্ববাহ প্রদানের সময় তাঁর সামনে দাঁড়িয়ে বললেন, পুলিশ আমার প্রতিবেশীকে কেন আটকে রেখেছে? কথাটা তিনি দু’বার বললেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’বারই তার কথায় ভ্রুক্ষেপ করলেন না। অতঃপর তিনি কিছু একটা বললে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তার প্রতিবেশীকে ছেড়ে দাও।
সানাদ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن كسابقه. إسماعيل: هو ابن إبراهيم بن مِقْسَم، المعروف بابن عُليَّه. وانظر ما قبله. قال الخطابي: فيه دليل على أن الحبس على ضربين: حبس عقوبة وحبس استظهار، فالعقوبة لا تكون إلا في واجب، وأما ما كان في تهمة، فإنما يُستظهرُ بذلك ليستكشف به عما وراءه. وقد روي: أنه حبس رجلاً في تهمة ساعة من نهار، ثم خلى سبيله.
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ سَعْدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا عَمِّي، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنِ ابْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ أَبِي نُعَيْمٍ، وَهْبِ بْنِ كَيْسَانَ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، أَنَّهُ سَمِعَهُ يُحَدِّثُ، قَالَ أَرَدْتُ الْخُرُوجَ إِلَى خَيْبَرَ فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَسَلَّمْتُ عَلَيْهِ وَقُلْتُ لَهُ إِنِّي أَرَدْتُ الْخُرُوجَ إِلَى خَيْبَرَ . فَقَالَ " إِذَا أَتَيْتَ وَكِيلِي فَخُذْ مِنْهُ خَمْسَةَ عَشَرَ وَسْقًا فَإِنِ ابْتَغَى مِنْكَ آيَةً فَضَعْ يَدَكَ عَلَى تَرْقُوَتِهِ " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, বর্ণনাকারী আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছেন। জাবির বলেছেন, আমি খায়বার এলাকায় যাওয়ার ইচ্ছা করলাম। অতএব আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তাঁকে সালাম দিয়ে বললাম, আমি খায়বারে যেতে চাই। তিনি বললেনঃ যখন তুমি আমার প্রতিনিধির নিকট আসবে তখন তার কাছ হতে পনেরো ওয়াসক নিবে। সে তোমার নিকট এর প্রমাণ চাইলে তুমি তার কন্ঠনালীতে হাত রাখবে। [৩৬৩২]
দূর্বল : মিশকাত (২৯৩৫)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ابن إسحاق عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. ابن إسحاق -وهو محمد بن إسحاق بن يسار المطلبي مولاهم - مدلس ولم يصرح بالسماع، وهو كذلك في سائر أصولنا الخطية وكذا في سائر مصادر تخريج الحديث، لكن جاء عند الزيلعي في "نصب الراية" ٤/ ٩٤ - وقد عزاه لأبي داود-: عن ابن إسحاق، حدثني وهب بن كيسان. وهو غريب، ولم يتابعه على ذلك أحد ممن عزاه لأبي داود. ومع ذلك فقد حسَّن إسنادَه الحافظُ في "التلخيمى الحبير" ٣/ ٥١، وسكت عنه عبد الحق الاشبيلي مصححاً له. وعلق البخاريُّ طرفاً منه قبل الحديث (٣١٣١) بلفظ: وما أعطى جابرَ بن عبد الله من تمر خيبر. وعمُّ عُبيد الله: هو يعقوب. وأخرجه أبو بكر بن أبي عاصم في "البيوع" كما في تغليق التعليق" ٣/ ٤٧٧، والحسين بن إسماعيل المحاملي في "المحامليات" كما في "هدي الساري" ص ٤٨، والدارقطني (٤٣٠٤) والبيهقي ٦/ ٨٠، وابن حجر في "تغليق التعليق" ٣/ ٤٧٦ - ٤٧٧ من طريق عُبيد الله بن سعد، بهذا الإسناد. وقد صح في مشروعية الوكالة غير ما حديث، منها حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (١٤٣٨)، ومسلم (١٠٢٣) عن النبي ﷺ قال: "الخازن المسلم الأمين، الذي يُنْفِذ ما أُمر به كاملاً مُوفَّراً طيباً به نفسه، فيدفعُه إلى الذي أمر له به، أحدُ المتصدقين". وقد سلف عند المصنف برقم (١٦٨٤). وبعد أن ذكر الحافظ ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" ٢/ ٦٢ هذا الحديث مع حديث ابن إسحاق قال: ففي ذلك دلالة على مشروعية التوكيل في الجملة مع الإجماع على ذلك. الترقوة: العظم الذي بين ثُغرة النحر والعاتق، وهما ترقوتان من الجانبين، وقيل: مقدم الحلق في أعلى الصدر حيث يرقى فيه النفس.
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا الْمُثَنَّى بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا قَتَادَةُ، عَنْ بُشَيْرِ بْنِ كَعْبٍ الْعَدَوِيِّ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " إِذَا تَدَارَأْتُمْ فِي طَرِيقٍ فَاجْعَلُوهُ سَبْعَةَ أَذْرُعٍ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা রাস্তা নিয়ে মতভেদ করলে তা সাত গজ পরিমান চ্যাপ্টা করো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، أصلہ عند مسلم (1613) والبخاري (2473) نحو المعنٰی
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٣٨)، والترمذي (١٤٠٦) من طريقين عن المثنى بن سعيد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وأخرجه الترمذي (١٤٠٥) عن أبي كريب، عن وكيع، عن المثنى بن سعيد، عن قتادة، عن بشير بن نَهيك، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: وروى بعضهم هذا الحديث عن قتادة، عن بشير بن نَهيك، عن أبي هريرة. وهو غير محفوظ. وهو في "مسند أحمد" (٩٥٣٧). وأخرجه البخاري (٢٤٧٣) من طريق الزبير بن خرِّيت، عن عكرمة، ومسلم (١٦١٣) من طريق عبد الله بن الحارث، كلاهما عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧١٢٦) و (١٠٤١٧)، و"صحيح ابن حبان" (٥٠٦٧). قال الخطابي: هذا في الطرق الشارعة والسبل النافذة التي كثر فيها المارة، أمر بتوسعتها لئلا تضيق عن الحمولة دون الأزقة الروابع التي لا تنفذ، ودون الطرق التي يدخل منها القومُ إلى بيوتهم إذا اقتسم الشركاء بينهم ربعاً وأحرزوا حصصهم، وتركوا بينهم طريقاً منه إليها. ويشبه أن يكونَ هذا على معنى الإرفاق والاستصلاح دون الحصر والتحديد.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَابْنُ أَبِي خَلَفٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " إِذَا اسْتَأْذَنَ أَحَدُكُمْ أَخَاهُ أَنْ يَغْرِزَ خَشَبَةً فِي جِدَارِهِ فَلاَ يَمْنَعْهُ " . فَنَكَسُوا فَقَالَ مَا لِي أَرَاكُمْ قَدْ أَعْرَضْتُمْ لأُلْقِيَنَّهَا بَيْنَ أَكْتَافِكُمْ . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَذَا حَدِيثُ ابْنِ أَبِي خَلَفٍ وَهُوَ أَتَمُّ .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমাদের কেউ তার অপর ভাইয়ের নিকট তার দেয়ালের সাথে খুঁটি গাড়ার অনুমতি প্রার্থনা করলে সে যেন তাকে নিষেধ না করে। এ হাদীস শুনে লোকেরা ঘাড় নীচু করলো। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, কি ব্যাপার! তোমরা এ হাদীস হতে মুখ ফিরিয়ে নিচ্ছো? আমি তোমাদের জন্য এ হাদীস শিরোধার্য করে দিবো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2463) صحیح مسلم (1609)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الأعرج: هو عبد الرحمن بن هُرمُز، وسفيان: هو ابن عيينة، وابن أبي خلف: هو محمد بن أحمد بن أبي خلف السلمي مولاهم، ومُسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد. وأخرجه البخاري (٢٤٦٣)، ومسلم (١٦٠٩)، وابن ماجه (٢٣٣٥)، والترمذي (١٤٠٣) من طرق عن الزهري، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٢٧٨)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٥)، قال الخطابي في "معالم السنن": عامة العلماء يذهبون في تأويله إلى أنه ليس بإيجاب يُحمل عليه الناسُ من جهةِ الحكم، وإنما هو من باب المعروف وحسن الجرار، إلا أحمد بن حنبل فإنه رآه على الوجوب، وقال: على الحكام أن يقضوا به على الجار ويُمضوه عليه إن امتنع منه. قلنا: وذكر الحافظ في "الفتح" أن إسحاق بن راهويه يقول بقول أحمد وكذا ابنُ حبيب من المالكية والشافعي في القديم، وذكر أن الشافعي في الجديد عنه قولان: أشهرهما اشتراط إذن المالك. وقول أبي هريرة: لألقينها بين أكتافكم، قال الخطابي في "أعلام الحديث" ٢/ ١٢٢٨: كأنه يقول: إن لم تقبلوه، فتتلقوه بأيديكم راضين، حملتُه على رقابكم كارهين.