সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ يَحْيَى، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ يَحْيَى بْنِ حَبَّانَ، عَنْ لُؤْلُؤَةَ، عَنْ أَبِي صِرْمَةَ، - قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَالَ غَيْرُ قُتَيْبَةَ فِي هَذَا الْحَدِيثِ عَنْ أَبِي صِرْمَةَ صَاحِبِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم - عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ " مَنْ ضَارَّ أَضَرَّ اللَّهُ بِهِ وَمَنْ شَاقَّ شَاقَّ اللَّهُ عَلَيْهِ " .
নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথী আবূ সিরমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কেউ অপরের ক্ষতি করলে আল্লাহ্ তার ক্ষতিসাধন করবেন। কেউ অযৌক্তিকভাবে কারো বিরোধীতা করলে আল্লাহ্ তার বিরোধী হবেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1940) ابن ماجہ (2342) ، لؤلؤۃ لم یوثقھا غیرالترمذي ، وللحدیث شواھد کثیرۃ کلھا ضعیفۃ ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة لؤلؤة، فقد ذكرها الحافظ الذهبي في "الميزان" ٤/ ٦١٠ في المجهولات. يحيى: هو ابن سعيد الأنصاري. وأخرجه ابن ماجه (٢٣٤٢)، والترمذي (٢٠٥٤) من طريق الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب. وهو في "مسند أحمد" (١٥٧٥٥). وفي الباب عن عبادة بن الصامت عند ابن ماجه (٢٣٤٠) أن النبي ﷺ قضى أن لا ضرر ولا ضرار. وإسناده ضعيف. وقد ذكرنا هناك كلامَ الأئمة في تقوية هذا الخبر، وذكرنا هناك أيضاً تمام شواهد الحديث بنوع من التفصيل، فراجعه. وانظر "جامع العلوم والحكم" للحافظ ابن رجب ٢/ ٢٠٧ - ٢٢٥ بتحقيقنا.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْعَتَكِيُّ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، حَدَّثَنَا وَاصِلٌ، مَوْلَى أَبِي عُيَيْنَةَ قَالَ سَمِعْتُ أَبَا جَعْفَرٍ، مُحَمَّدَ بْنَ عَلِيٍّ يُحَدِّثُ عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ، أَنَّهُ كَانَتْ لَهُ عَضُدٌ مِنْ نَخْلٍ فِي حَائِطِ رَجُلٍ مِنَ الأَنْصَارِ قَالَ وَمَعَ الرَّجُلِ أَهْلُهُ قَالَ فَكَانَ سَمُرَةُ يَدْخُلُ إِلَى نَخْلِهِ فَيَتَأَذَّى بِهِ وَيَشُقُّ عَلَيْهِ فَطَلَبَ إِلَيْهِ أَنْ يَبِيعَهُ فَأَبَى فَطَلَبَ إِلَيْهِ أَنْ يُنَاقِلَهُ فَأَبَى فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ فَطَلَبَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَبِيعَهُ فَأَبَى فَطَلَبَ إِلَيْهِ أَنْ يُنَاقِلَهُ فَأَبَى . قَالَ " فَهَبْهُ لَهُ وَلَكَ كَذَا وَكَذَا " . أَمْرًا رَغَّبَهُ فِيهِ فَأَبَى فَقَالَ " أَنْتَ مُضَارٌّ " . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لِلأَنْصَارِيِّ " اذْهَبْ فَاقْلَعْ نَخْلَهُ " .
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈক আনসারীর বাগানে তার কিছু খেজুর গাছ ছিলো। আনসারী তার পরিবারসহ এখানে বাস করতেন। সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাগানে আসা-যাওয়া করতেন। এতে আনসারী অসুবিধাবোধ করতেন। তিনি তার খেজুর গাছগুলো ক্রয় করতে চাইলেন, কিন্তু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এতে সম্মত হলেন না। আনসারী তাকে এটা বদল করার জন্য প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু তিনি এ প্রস্তাবেও সম্মত হলেন না। আনসারী নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে ঘটনাটি জানালেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডেকে এনে এটা বিক্রি করে দেয়ার কথা বললেন, কিন্তু তিনি সম্মত হলেন না। তিনি এটা বদল করার প্রস্তাব দিলেন, সামুরাহ তাও মানলেন না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি তাকে এটা দান করো। তিনি তাকে উৎসাহিত করে বললেনঃ তোমার জন্য এই এই জিনিস রয়েছে। কিন্তু তাতেও তিনি সম্মত হলেন না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ তুমি কষ্টদানকারী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারীকে বললেনঃ যাও, তুমি তার খেজুর গাছগুলো উপড়ে ফেলে দাও। [৩৬৩৬]
দূর্বল : মিশকাত (৩০০৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، قال ابن الترکماني فی الجوھر النقي: ’’ ذکر ابن حزم أنہ منقطع لأن محمد بن علي لا سماع لہ من سمرۃ‘‘ (6 / 157) ، (انوار الصحیفہ ص 129)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه. أبو جعفر محمد بن علي -وهو ابن الحسين بن علي ابن أبي طالب الباقر- لم يدرك السماع من سمرة بن جندب، فقد ذكر أحمد بن البرقي أن مولد أبي جعفر كان سنة ست وخمسين. وكانت وفاةُ سمرة على أعلى تقدير سنة ستين، فيكون عمر أبي جعفر عند وفاة سمرة خمس سنين. ومما يؤيد ذلك أن أباه علي زين العابدين كان عمره يوم كربلاء سنة إحدى وستين ثلاثة وعشرين عاماً، وبذلك يكون عُمر زين العابدين يوم ولد له أبو جعفر ثمانية عشر عاما. وهو معقول. وقال المنذري في "مختصر السنن": في سماع الباقر من سمرة بن جندب نظر، وقد نقل في مولده ووفاة سمرة ما يتعذّر معه سماعه منه، وقيل فيه: ما يمكن معه السماع منه، والله ﷿ أعلم. وأخرجه البيهقي ٦/ ١٥٧ من طريق أبي الربيع سليمان بن داود العتكي، بهذا الإسناد. وفي الباب عن رجل من أصحاب النبي ﷺ، سلف عند المصنف برقم (٣٠٧٤) و (٣٠٧٥) وإسناده حسن. قال الخطابي: رواه أبو داود: عضداً، انما هو: عضيد من نخيل، يريد نخلاً لم تَبسُق ولم تَطُل، قال الأصمعي: إذا صار للنخلة جذع يتناول منه المتناولُ فتلك النخلةُ العَضيدُ، وجمعُه عَضِيداتٌ. وفيه من العلم أنه أمر بإزالة الضرر عنه، وليس في هذا الخبر أنه قلع نخله، ويشبه أن يكون أنه إنما قال ذلك ليردعه به عن الإضرار.
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ، حَدَّثَهُ أَنَّ رَجُلاً خَاصَمَ الزُّبَيْرَ فِي شِرَاجِ الْحَرَّةِ الَّتِي يَسْقُونَ بِهَا فَقَالَ الأَنْصَارِيُّ سَرِّحِ الْمَاءَ يَمُرُّ . فَأَبَى عَلَيْهِ الزُّبَيْرُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لِلزُّبَيْرِ " اسْقِ يَا زُبَيْرُ ثُمَّ أَرْسِلْ إِلَى جَارِكَ " . فَغَضِبَ الأَنْصَارِيُّ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنْ كَانَ ابْنَ عَمَّتِكَ فَتَلَوَّنَ وَجْهُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ قَالَ " اسْقِ ثُمَّ احْبِسِ الْمَاءَ حَتَّى يَرْجِعَ إِلَى الْجَدْرِ " . فَقَالَ الزُّبَيْرُ فَوَاللَّهِ إِنِّي لأَحْسِبُ هَذِهِ الآيَةَ نَزَلَتْ فِي ذَلِكَ { فَلاَ وَرَبِّكَ لاَ يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ } الآيَةَ .
‘আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, হাররা নামক স্থান হতে প্রবাহিত পানির বণ্টন নিয়ে যুবাইরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে এক ব্যক্তির বিবাদ হলো। আনসারী লোকটি বললো, পানিকে প্রবাহিত হয়ে আসতে দাও। কিন্তু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এতে সম্মত হলেন না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুবাইরকে বললেনঃ হে যুবাইর! তোমার জমিতে পানি দাও; অতঃপর তোমার প্রতিবেশীর জমির দিকে তা ছেড়ে দাও। বর্ণনাকারী বলেন, এ কথায় আনসারী রাগান্বিত হয়ে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! সে আপনার ফুফাতো ভাই সেজন্য পক্ষপাতিত্ব করছেন! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেলো। তিনি বললেনঃ তোমার জমিতে পানি দাও, অতঃপর তা আটকে রাখো যাতে আইল পর্যন্ত পৌঁছে। যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম! আমার মতে এই ঘটনাকে কেন্দ্র করেই এ আয়াত অবতীর্ণ হয়েছেঃ “না, হে মুহাম্মাদ! আপনার রবের কসম, এরা কিছুতেই ঈমানদার হতে পারে না, যতক্ষণ তারা তাদের পারস্পরিক বিবাদে আপনাকে বিচারপতিরূপে মেনে না নিবে। অতঃপর আপনি ফায়সালা করবেন, সে সম্পর্কে তারা নিজেদের মনে কোনরূপ কুণ্ঠাবোধ করবে না; বরং তার সামনে নিজেদেরকে পূর্ণরূপে সোপর্দ করবে” (সূরাহ আন-নিসাঃ ৬৫)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2359، 2360) صحیح مسلم (2357)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عروة: هو ابن الزبير بن العوّام، والزهري: هو محمد بن مسلم ابن شهاب، والليث: هو ابن سعْد، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه البخاري (٢٣٥٩)، ومسلم (٢٣٥٧)، وابن ماجه (١٥) و (٢٤٨٠)، والترمذي (١٤١٤) و (٣٢٧٦)، والنسائي (٥٤١٦) من طريق الليث بن سعد، بهذا الاسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦١١٦)، و"صحيح ابن حبان" (٢٤). وأخرجه البخاري (٢٧٠٨) من طريق شعيب بن أبي حمزة، و (٢٣٦١) و (٤٥٨٥) من طريق معمر بن راشد، و (٢٣٦٢) من طريق ابن جريج، ثلاثتهم عن الزهري، عن عروة بن الزبير، عن أبيه الزبير. وقد كان عمر عروة عند مقتل أبيه ثلاث عشرة سنة، وجزم البخاري بسماعه منه في "تاريخه" ٧/ ٣١، وذكر مسلم في "التمييز" أن عروة حفظ عن أبيه فمن دونهما من الصحابة. وهو في "مسند أحمد" (١٤١٩). وأخرجه النسائي (٥٤٠٧) من طريق عبد الله بن وهب، عن يونس بن يزيد والليث بن سعد، عن ابن شهاب الزهري، عن عروة بن الزبير، عن عبد الله بن الزبير، عن الزبير بن العوام. قال أبو حاتم في "العلل" ١/ ٣٩٥: أخطأ ابن وهب في هذا الحديث. الليث لا يقول: عن الزبير. وقال الحافظ في "الفتح" ٥/ ٣٥: وكأن ابنَ وهب حمل رواية الليث على رواية يونس، إلا فرواية الليث ليس فيها ذكر الزبير، والله أعلم. قال الخطابي: شراج الحرة: مجاري الماء الذي يسيل منها، واحده شرج. قال: وفيه من الفقه أن أصلَ المياه -الأودية والسيول التي لا تُملَكُ منابعُها ولم تستنبط بحفر وعمل- الإباحةُ، وأن الناس شَرعٌ، سواء في الارتفاق بها، وأن من سَبَق إلى شيء منها، فأحرزه، كان أحقَّ بهِ من غيره. وفيه دليلٌ على أن أهلَ الشِّرب الأعلى مُقدَّمون على من هو أسفل لسبقه إليه، وأنه ليس للأعلى أن يحبسهُ عن الأسفل إذا أخذ حاجتَه منه. فأما إذا كان أصلُ منبع الماء ملكاً لقوم، وهم فيه شركاء، أو كانت أيديهم عليه معاً، فإن الأعلى والأسفل فيه سواء، فإن اصطلحوا على أن يكون نُوَباً بينهم، فهو على ما تراضوا به. وإن تشاحُّوا اقترعوا، فمن خرجت له القرعة، كان مبدوءاً به. وقد اختلف الناسُ في تأويل هذا الحديث: فذهب بعضهم إلى أن القول الأول إنما كان من رسول الله ﷺ على وجه المشورة للزبير، وعلى سبيل المسألة في أن يطيب نفساً لجاره الأنصاري، دون أن يكون ذلك منه حكماً عليه، فلما خالفه الأنصاري، حكم عليه بالواجب من حكم الدين. وذهب بعضُهم إلى أنه قد كفر حين ظن برسول الله ﷺ المحاباة للزبير. إذ كان ابنَ عمته. وأن ذلك القول منه كان ارتداداً عن الدين، وإذا ارتد عن الإسلام زال ملكه عن ماله، وكان فيئا، فصرفه رسول الله ﷺ إلى الزبير إذ كان له أن يضع الفيء حيث أراه الله تعالى. وفيه مستند لمن رأى جواز نسخ الشيء قبل العمل به. وقال المنذري في "مختصر السنن": الحرة: كل أرض ذات حجارة سود، وذلك لشدة حرّها ووهج الشمس فيها. والجدْر: بفتح الجيم وسكون الدال المهملة، أي: الجدار. وقوله: أن كان ابنَ عمتك. هو بفتح همزة أن المخففة، وهي للتعليل، كأنه قال: حكمت له بالتقديم لأجل أنه ابن عمتك، وكانت أم الزبير صفية بنت عبد المطلب.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنِ الْوَلِيدِ، - يَعْنِي ابْنَ كَثِيرٍ - عَنْ أَبِي مَالِكِ بْنِ ثَعْلَبَةَ، عَنْ أَبِيهِ، ثَعْلَبَةَ بْنِ أَبِي مَالِكٍ أَنَّهُ سَمِعَ كُبَرَاءَهُمْ، يَذْكُرُونَ أَنَّ رَجُلاً، مِنْ قُرَيْشٍ كَانَ لَهُ سَهْمٌ فِي بَنِي قُرَيْظَةَ فَخَاصَمَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي مَهْزُورٍ - يَعْنِي السَّيْلَ الَّذِي يَقْتَسِمُونَ مَاءَهُ - فَقَضَى بَيْنَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّ الْمَاءَ إِلَى الْكَعْبَيْنِ لاَ يَحْبِسُ الأَعْلَى عَلَى الأَسْفَلِ .
সা‘লাবা ইবনু আবূ মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি তার মুরুব্বীদের আলোচনা করতে শুনেছেন, কুরাইশ বংশের এক ব্যক্তির ইয়াহুদী বনী কুরাইযাহ্র পানির সাথে অংশীদার ছিলো। সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট মাহযূর মাঠ হতে প্রবাহিত পানি সম্পর্কে অভিযোগ করলো, যাতে বৃষ্টির পানি এসে জমা হতো। এর পানি সবাই বণ্টন করে নিয়ে যেতো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে ফায়সালা দিলেনঃ প্রথম ব্যক্তি পায়ের গোছা পর্যন্ত জমিতে পানি জমা করবে। অতঃপর উচ্চ ভূমির মালিক নিম্ন ভূমির মালিকের দিকে পানির প্রবাহে বাধা সৃষ্টি করতে পারবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، رواہ ابن ماجہ (2481 وسندہ حسن) والحدیث الآتي (3639) شاھد لہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة حال أبي مالك -وقيل: مالك، وهو الأشهر في اسمه- بن ثعلبة. وثعلبة مختلف في صحبته. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٨١) من طريق زكريا بن منظور بن ثعلبة بن أبي مالك، عن محمد بن عقبة بن أبي مالك، عن عمه ثعلبة بن أبي مالك. وزكريا بن منظور ضعيف. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٢٠٠)، ومن طريق ابن الأثير في "أسد الغابة" ١/ ٢٩٢ في ترجمة ثعلبة، عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن إسحاق بن إبراهيم، عن صفوان بن سُليم، عن ثعلبة بن أبي مالك، ويعقوب بن حميد ضعيف يعتبر به، وإسحاق بن إبراهيم -وهو ابن سعيد الصوّاف- لين الحديث. ويشهد له حديث عبد الله بن الزبير السالف قبله، والحديث الآتي بعده. ويشهد له كذلك حديث عائشة عند الحاكم ٢/ ٦٢ وصححه، وسكت عنه الذهبي، وهو كذلك. ومهزور: وادي بني قريظة.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، حَدَّثَنَا الْمُغِيرَةُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، حَدَّثَنِي أَبِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ الْحَارِثِ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى فِي السَّيْلِ الْمَهْزُورِ أَنْ يُمْسَكَ حَتَّى يَبْلُغَ الْكَعْبَيْنِ ثُمَّ يُرْسِلُ الأَعْلَى عَلَى الأَسْفَلِ .
আমর ইবনু শু‘আইব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা ও তার দাদার সূত্র হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাহযূর মাঠের পানি সম্পর্কে এই ফায়সালা দিয়েছেনঃ পায়ের গোছা ডুবে যাওয়ার পরিমাণ হওয়া পর্যন্ত এর পানি আটকিয়ে রাখা যাবে। অতঃপর উচ্চ ভূমির মালিক নিম্ন ভূমির মালিকের দিকে পানি ছেড়ে দিবে।[৩৬৩৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3005) ، رواہ ابن ماجہ (2482 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في الشواهد من أجل عبد الرحمن بن الحارث -وهو ابن عبد الله بن عياش المخزومي- فهو حسن الحديث في المتابعات والشواهد. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٨٢) عن أحمد بن عبدة، بهذا الإسناد. ويشهد له الحديثان السالفان قبله. وحديث عائشة عند الحاكم ٢/ ٦٢ وصححه وسكت عنه الذهبي، وهو كذلك.
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ خَالِدٍ، أَنَّ مُحَمَّدَ بْنَ عُثْمَانَ، حَدَّثَهُمْ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنْ أَبِي طُوَالَةَ، وَعَمْرِو بْنِ يَحْيَى، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ اخْتَصَمَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم رَجُلاَنِ فِي حَرِيمِ نَخْلَةٍ - فِي حَدِيثِ أَحَدِهِمَا فَأَمَرَ بِهَا فَذُرِعَتْ فَوُجِدَتْ سَبْعَةَ أَذْرُعٍ وَفِي حَدِيثِ الآخَرِ - فَوُجِدَتْ خَمْسَةَ أَذْرُعٍ فَقَضَى بِذَاكَ . قَالَ عَبْدُ الْعَزِيزِ فَأَمَرَ بِجَرِيدَةٍ مِنْ جَرِيدِهَا فَذُرِعَتْ .
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, দুই ব্যক্তি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট একটি খেজুর গাছের পরিধি সম্পর্কিত ঝগড়া নিয়ে হাযির হলো। এক বর্ণনায় রয়েছেঃ তিনি তা পরিমাপ করার আদেশ দিলেন। তদানুযায়ী মাপা হলো এবং পরিমাণে সাত গজ হলো। অপর বর্ণনা মোতাবেক এর পরিমাণ হলো পাঁচ গজ। তিনি তদনুযায়ী সিদ্ধান্ত দিলেন। ‘আবদুল ‘আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ খেজুর গাছের একটি ডাল দিয়ে মাপার আদেশ দিলে তা দিয়ে মাপা হয়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل عبد العزيز بن محمد -وهو الدراوردي- فهو صدوق لا بأس به. عمرو بن يحيى: هو ابن عمارة المازني، وأبو طوالة: هو عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر الأنصاري، ومحمد بن عثمان: هو التَّنُوخي أبو الجُماهر. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (١٨٩٨)، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٦/ ١٥٥ من طريق عبد العزيز بن محمد الدَّراوردي، عن عمرو بن يحيى المازني -وقُرن به عند البيهقي في أحد طريقيه أبوطوالة- به. الحريم: هو كل موضع تلزم حمايته، وحريم البئر وغيرها: ما حولها من حقوقها ومرافقها، وحريم الدار: ما أضيف إليها، وكان من حقوقها. وقوله: فقضى النبي ﷺ بذلك. قال في "عون المعبود" ١٠/ ٥٠: أي بأن يكون حريم شجر النخلة على قدر قامتها، فإن كانت النخلة سبعة أذرع يكون حريمها، أي: ما حواليها سبعة أذرع، وإن كانت أكثر من سبعة أذرع يكون حريمها مثلها، وإن كانت أقل من سبعة أذرع يكون حريمها مثلها في القلة، فلا يجوز لأحد أن يستولي على شيءٍ من حريمها وإن قل، ولكن له عمارة أو غيرها بعد حريمها، وكذلك الحكم لكل شجر من الأشجار، فيكون حريمه بقدر قامته.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدُ بْنُ مُسَرْهَدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ دَاوُدَ، سَمِعْتُ عَاصِمَ بْنَ رَجَاءِ بْنِ حَيْوَةَ، يُحَدِّثُ عَنْ دَاوُدَ بْنِ جَمِيلٍ، عَنْ كَثِيرِ بْنِ قَيْسٍ، قَالَ كُنْتُ جَالِسًا مَعَ أَبِي الدَّرْدَاءِ فِي مَسْجِدِ دِمَشْقَ فَجَاءَهُ رَجُلٌ فَقَالَ يَا أَبَا الدَّرْدَاءِ إِنِّي جِئْتُكَ مِنْ مَدِينَةِ الرَّسُولِ صلى الله عليه وسلم لِحَدِيثٍ بَلَغَنِي أَنَّكَ تُحَدِّثُهُ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَا جِئْتُ لِحَاجَةٍ . قَالَ فَإِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَطْلُبُ فِيهِ عِلْمًا سَلَكَ اللَّهُ بِهِ طَرِيقًا مِنْ طُرُقِ الْجَنَّةِ وَإِنَّ الْمَلاَئِكَةَ لَتَضَعُ أَجْنِحَتَهَا رِضًا لِطَالِبِ الْعِلْمِ وَإِنَّ الْعَالِمَ لَيَسْتَغْفِرُ لَهُ مَنْ فِي السَّمَوَاتِ وَمَنْ فِي الأَرْضِ وَالْحِيتَانُ فِي جَوْفِ الْمَاءِ وَإِنَّ فَضْلَ الْعَالِمِ عَلَى الْعَابِدِ كَفَضْلِ الْقَمَرِ لَيْلَةَ الْبَدْرِ عَلَى سَائِرِ الْكَوَاكِبِ وَإِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الأَنْبِيَاءِ وَإِنَّ الأَنْبِيَاءَ لَمْ يُوَرِّثُوا دِينَارًا وَلاَ دِرْهَمًا وَرَّثُوا الْعِلْمَ فَمَنْ أَخَذَهُ أَخَذَ بِحَظٍّ وَافِرٍ " .
কাসীর ইবনু (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি আবূ দারদার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সঙ্গে দামেশকের মাসজিদে বসা ছিলাম। তখন তার নিকট এক ব্যক্তি এসে বললো, হে আবূ দারদা! আমি একটি হাদীসের জন্য সুদূর মাদীনাতুর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে এসেছি। জানতে পারলাম, আপনি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে হাদীস বর্ণনা করেন। এ ছাড়া অন্য কোন উদ্দেশ্যে আমি আসিনি। আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বলতে শুনেছিঃ যে ব্যক্তি জ্ঞানার্জনের জন্য কোন পথ অবলম্বন করে, আল্লাহ্ তার পরিবর্তে তাকে জান্নাতের পথসমূহের মধ্যে কোন একটি পথে পৌঁছে দেন। ফেরেশতারা জ্ঞান অন্বেষণকারীর সন্তুষ্টির জন্য নিজেদের ডানা বিছিয়ে দেন। জ্ঞানীর জন্য আসমান ও যমীনের যারা আছে তারা আল্লাহর নিকট ক্ষমা ও দু‘আ প্রার্থনা করে, এমনকি পানির গভীরে বসবাসকারী মাছও। আবেদ (সাধারণ ইবাদাতগুজারী) ব্যক্তির উপর ‘আলিমের ফাযীলাত হলো যেমন সমস্ত তারকার উপর পূর্ণিমার চাঁদের মর্যাদা। জ্ঞানীরা হলেন নাবীদের উত্তরসূরি। নাবীগণ কোন দীনার বা দিরহাম মীরাসরূপে রেখে যান না; তারা উত্তরাধিকার সূত্রে রেখে যান শুধু ইল্ম। সুতরাং যে ইল্ম অর্জন করেছে সে পূর্ণ অংশ গ্রহণ করেছে।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (2682) ابن ماجہ (223) ، داود بن جمیل وشیخہ کثیر بن قیس: ضعیفان (تق: 1778،5624) ، وحدیث مسلم (2699) یغني عنہ ، وانظر ضعیف سنن الترمذي (2650) ص (317) ، (انوار الصحیفہ ص 130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن بشواهده كما بيناه في "مسند أحمد" (٢١٧١٥)، وهذا إسناد ضعيف لضعف كثير بن قيس. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٣) من طريق عبد الله بن داود الخريبي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٧١٦)، و "صحيح ابن حبان" (٨٨). وأخرجه الترمذي (٢٨٧٧) من طريق محمد بن يزيد الواسطي، عن عاصم بن رجاء بن حيوة، عن قيس بن كثير [قلنا: كذا سماه]، به. وقال الترمذي: ليس إسناده عندي بمتصل، هكذا حدَّثنا محمد بن خداش هذا الحديث، انما يُروى هذا الحديث عن عاصم بن رجاء بن حيوة، عن داود بن جميل، عن كثير بن قيس، عن أبي الدرداء، عن النبي ﷺ وهذا أصح من حديث محمود بن خداش، ورأى محمدُ بن إسماعيل هذا أصحَّ. وهو في "مسند أحمد" (٢١٧١٥). وأخرجه مختصراً ابن ماجه (٢٣٩) من طريق عثمان بن عطاء بن أبي مسلم الخراساني، عن أبيه، عن أبي الدرداء. وإسناده منقطع. عطاء بن أبي مسلم لم يسمع من أبو الدرداء، وعثمان ابنُه ضعيف. وانظر تتمة شواهده في "مسند أحمد" (٢١٧١٥). وانظر ما بعده. قال الخطابي: قوله: "إن الملائكة لتضع أجنحتها لطالب العلم" ويتأول على وجوه، أحدها: أن يكون وضعُها الأجنحة بمعنى التواضع والخشوع تعظيماً لحقه وتوقيراً لعلمه، كقوله تعالى: ﴿وَاخْفِضْ لَهُمَا جَنَاحَ الذُّلِّ مِنَ الرَّحْمَةِ﴾ [الإسراء:٢٤] وقيل: وضعُ الجَناح معناه الكف عن الطيران للنزول عنده، كقوله: "ما من قوم يذكرون الله إلا حفّت بهم الملائكة وغشيتهم الرحمة"، وقيل: معناه بسط الجناح وفرشها لطالب العلم لتحمله عليها فتبلغه حيث يؤُم ويقصِد من البقاع في طلبه، ومعناه: المعونة وتيسير السعي له في طلب العلم، والله أعلم. وقيل في قوله: "وتستغفر له الحيتان في جوف الماء": إن الله قد قيّض للحيتان وغيرها من أنواع الحيوان بالعلم على. ألسنة العلماء أنواعاً مِن المنافع والمصالح والإرفاق. فهم الذين بيَّنوا الحكم فيها فيما يحل ويحرم فيها، وأرشدوا إلى المصلحة في بابها، وأوصَوا بالإحسانِ إليها، ونفي الضرر عنها، فألهمها اللهُ الإستغفارَ للعلماء، مجازاة لهم على حسن صنيعهم بها وشفقتهم عليها. وقال القاضي: شبه العالم بالبدر، والعابد بالكواكب، لأن مال العبادة ونورها لا يتعدى من العابد، ونور العالم يتعدى إلى غيره فيستضيء بنوره المتلقى عن النبي ﷺ، كالقمر تلقى نوره من نور الشمس من خالقها ﷿.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْوَزِيرِ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، قَالَ لَقِيتُ شَبِيبَ بْنَ شَيْبَةَ فَحَدَّثَنِي بِهِ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي سَوْدَةَ، عَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ، - يَعْنِي عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم - بِمَعْنَاهُ .
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্র হতে বর্ণিত, উপরোল্লিখিত হাদীস বর্ণিত হয়েছে। [৩৬৪২]
আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، شبیب بن شیبۃ: مجہول (تق: 2741) ، (انوار الصحیفہ ص 130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن، فإن كان شيخُ الوليد -وهو ابن مسلم- فيه شبيب بن شيبة، فالحديث حسن بشواهده كما بيناه في الطريق السالف قبله، وإن كان شعيبَ بن رُزيق كما في رواية عمرو بن عثمان الحمصي عن الوليد بن مسلم - وقد أشار إليها المزي في "تهذيب الكمال" قائلاً: وهو أشبه بالصواب فالإسناد حسن، وعلى آية حالٍ فإن للحديث شواهد ذكرناها في "مسند أحمد" (٢١٧١٥) يُحسن بها إن شاء الله تعالى.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زَائِدَةُ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَا مِنْ رَجُلٍ يَسْلُكُ طَرِيقًا يَطْلُبُ فِيهِ عِلْمًا إِلاَّ سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقَ الْجَنَّةِ وَمَنْ أَبْطَأَ بِهِ عَمَلُهُ لَمْ يُسْرِعْ بِهِ نَسَبُهُ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তি ইল্ম অর্জনের জন্য কোন পথ অবলম্বন করলে তার বিনিময়ে আল্লাহ্ তার জান্নাতের পথ সুগম করে দেন। যার আমল তাকে পিছিয়ে রেখেছে, তার বংশগৌরব তাকে এগিয়ে দিতে পারে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، رواہ مسلم (2699) مطولًا
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو صالح: هو ذكوان السمان، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وزائدة: هو ابن قُدامة. وأخرجه بأطول مما ها هنا مسلم (٢٦٩٩)، وابن ماجه (٢٢٥)، والترمذي (٢٨٣٧) و (٣١٧٤) من طريق الأعمش، به. وهو في "مسند أحمد" (٧٤٢٧)، و"صحيح ابن حبان" (٨٤). قال النووي في "شرح مسلم": "من بطأ به عملُه لم يُسرع به نسبه" معناه: من كان عمله ناقصاً، لم يُلحقه بمرتبةِ أصحاب الأعمال، فينبغي أن لا يتكل على شرف النسب وفضيلةِ الآباء ويُقَصِّرَ في العمل.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ ثَابِتٍ الْمَرْوَزِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، أَخْبَرَنِي ابْنُ أَبِي نَمْلَةَ الأَنْصَارِيُّ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّهُ بَيْنَمَا هُوَ جَالِسٌ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَعِنْدَهُ رَجُلٌ مِنَ الْيَهُودِ مُرَّ بِجَنَازَةٍ فَقَالَ يَا مُحَمَّدُ هَلْ تَتَكَلَّمُ هَذِهِ الْجَنَازَةُ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " اللَّهُ أَعْلَمُ " . فَقَالَ الْيَهُودِيُّ إِنَّهَا تَتَكَلَّمُ . فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَا حَدَّثَكُمْ أَهْلُ الْكِتَابِ فَلاَ تُصَدِّقُوهُمْ وَلاَ تُكَذِّبُوهُمْ وَقُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ فَإِنْ كَانَ بَاطِلاً لَمْ تُصَدِّقُوهُ وَإِنْ كَانَ حَقًّا لَمْ تُكَذِّبُوهُ " .
ইবনু আবূ নামলাহ আল-আনসারী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, একদা আবূ নাম্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসা ছিলেন। এ সময় এক ইয়াহুদীও তাঁর নিকট বসা ছিল। তাঁর সামনে দিয়ে একটি লাশ নিয়ে যাওয়া হলো। ইয়াহুদী বললো, হে মুহাম্মাদ! এই জানাযা (লাশ) কি কথা বলতে পারে? নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আল্লাহই অধিক জ্ঞাত। ইয়াহুদী বললো, সে (কবরে) কথা বলবে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কিতাবধারীরা তোমাদের যেসব কথাবার্তা বলে তা তোমরা বিশ্বাসও করো না এবং মিথ্যাও ভেবো না। তোমরা বলো, আমরা আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান এনেছি। তাদের কথা যদি বাতিল হয় তাহলে তা বিশ্বাস করলে না আর যদি সত্য হয়ে থাকে তাহলে তোমরা মিথ্যাও মনে করলে না। [৩৬৪৪]
দুর্বলঃ যঈফাহ (১৯৯১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نملۃ بن أبي نملۃ مستور کما فی التحریر (7189) وثقہ ابن حبان وحدہ (485/5) ، (انوار الصحیفہ ص 130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن. ابن أبي نملة -واسمه نملة- روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات" فهو حسن الحديث. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٠١٦٠) و (١٩٢١٤) و (٢٠٠٥٩). وأخرجه أحمد (١٧٢٢٥)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" ١/ ٣٨٠، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢١٢١)، والدولابي في "الكنى" ١/ ٥٨، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٥١٩٧) و (٥١٩٨)، وابن حبان (٦٢٥٧) والطبراني في "الكبير" ٢٢/ (٨٧٤ - ٨٧٩)، والبيهقي في "السنن الكبرى" ٢/ ١٠، وفي "شعب الإيمان" (٥٢٠٦)، والبغوي في "شرح السنة" (١٢٤)، وفي "التفسير" ٥/ ١٩٦، وابن الأثير في "أسد الغابة" ٦/ ٣١٥، والمزي في "تهذيب الكمال" ٣٤/ ٣٥٤ كلاهما في ترجمة أبي نملة، في طرق عن ابن شهاب الزهري، به. وقوله: "ما حدثكم أهل الكتاب فلا تصدقوهم ولا تكذبوهم" هذا خاص بما هو مسكوت عنه في شريعتنا، لا هو مما علمنا صحته مما بأيدينا مما يشهد له بالصدق، ولا هو مما علمنا كذبه بما عندنا مما يخالفه، فالمسكوت عنه لا نؤمن به ولا نكذبه وتجوز حكايته، فقد روى البخاري (٣٤٦١) من حديث عبد الله بن عمرو أن النبي ﷺ قال: " بلغوا عني ولو آية، وحدثوا عن بني إسرائيل ولا حرج، ومن كذب علي متعمداً فليتبوأ مقعده من النار". لكن ينبغي التنبه إلى أن إباحة التحدث عنهم فيما ليس عندنا دليل على صدقه ولا كذبه شيء، وذكر ذلك في تفسير القرآن وجعله قولاً أو رواية في معنى الآيات، أو في تعيين ما لم يعين فيها أو في تفصيل ما أجمل فيها شيء آخر، لأن في إثبات مثل ذلك بجوار كلام الله ما يوهم أن هذا الذي لا نعرف صدقه ولا كذبه مبين لمعنى قول الله سبحانه، ومفصل لما أجمل فيه، وحاشا لله ولكتابه من ذلك.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ خَارِجَةَ، - يَعْنِي ابْنَ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ - قَالَ قَالَ زَيْدُ بْنُ ثَابِتٍ أَمَرَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَتَعَلَّمْتُ لَهُ كِتَابَ يَهُودَ وَقَالَ " إِنِّي وَاللَّهِ مَا آمَنُ يَهُودَ عَلَى كِتَابِي " . فَتَعَلَّمْتُهُ فَلَمْ يَمُرَّ بِي إِلاَّ نِصْفُ شَهْرٍ حَتَّى حَذَقْتُهُ فَكُنْتُ أَكْتُبُ لَهُ إِذَا كَتَبَ وَأَقْرَأُ لَهُ إِذَا كُتِبَ إِلَيْهِ .
যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়াহুদীদের লেখা (ভাষা) শিখার আদেশ দিলেন। আমি তদনুযায়ী ইয়াহুদীদের লেখা শিখলাম। তিনি বললেনঃ আল্লাহ্র শপথ! ইয়াহুদীরা আমার পক্ষ হতে সঠিক লিখবে বলে আমার বিশ্বাস হচ্ছে না। বর্ণনাকারী বলেন, পনের দিন যেতে না যেতেই আমি তাদের লেখা আয়ত্ত করে ফেললাম। তিনি চিঠিপত্র লেখানোর ইচ্ছা করলে আমি লিখে দিতাম এবং তার নিকট চিঠিপত্র এলে আমি তা তাঁকে পড়ে শুনাতাম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ الترمذي (2715 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح. وهذا إسناد حسن من أجل ابن أبي الزناد -واسمه عبد الرحمن-. أبو الزناد: هو عبد الله بن ذكوان. وأخرجه الترمذي (٢٩١٢) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث حسن صحيح. وعلقه البخاري (٧١٩٥) بصيغة الجزم. وهو في "مسند أحمد" (٢١٦١٨). وأخرجه أحمد (٢١٥٨٧)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٢٠٣٨)، وابن حبان (٧١٣٦) من طريق الأعمش، عن ثابت بن عُبيد، عن زيد بن ثابت قال: قال لي رسول الله ﷺ: "تُحسن السُّريانية؟ إنها تأتيني كتب" قال: قلت: لا، قال: "فتعلَّمْها" فتعلمتها في سبعة يوماً. وهذا إسناد صحيح. وثابت بن عبيد نص البخاري على سماعه من مولاه زيد بن ثابت في "تاريخه "الكبير"، وأخرج في "الأدب المفرد" (٢٨٦) ما يفيد أكثر من سماعه من زيد بن ثابت، خلافا لما ظنه الذهبي في "تاريخ الإسلام" من أن روايته عن مولاه منقطعة. وانظر تمام تخريجه من هذا الطريق الثاني في "المسند" و"صحيح ابن حبان".
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ قَالاَ حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ الأَخْنَسِ، عَنِ الْوَلِيدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي مُغِيثٍ، عَنْ يُوسُفَ بْنِ مَاهَكَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، قَالَ كُنْتُ أَكْتُبُ كُلَّ شَىْءٍ أَسْمَعُهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أُرِيدُ حِفْظَهُ فَنَهَتْنِي قُرَيْشٌ وَقَالُوا أَتَكْتُبُ كُلَّ شَىْءٍ تَسْمَعُهُ وَرَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَشَرٌ يَتَكَلَّمُ فِي الْغَضَبِ وَالرِّضَا فَأَمْسَكْتُ عَنِ الْكِتَابِ فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَوْمَأَ بِأُصْبُعِهِ إِلَى فِيهِ فَقَالَ " اكْتُبْ فَوَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ مَا يَخْرُجُ مِنْهُ إِلاَّ حَقٌّ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যা কিছু শুনতাম লিখে রাখতাম। মনে রাখার জন্যই আমি এরূপ করতাম। কুরাইশরা আমাকে সবকিছু লিখতে বারণ করলেন এবং বললেন, তুমি কি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হতে শোনা সবকিছুই লিখে রাখো? তিনি তো একজন মানুষ, রাগ ও শান্ত উভয় অবস্থায় কথা বলে থাকেন। সুতরাং আমি লেখা স্থগিত রাখলাম। আমি এটা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলাম। তিনি আঙ্গুল দিয়ে তাঁর মুখের দিকে ইশারা করে বললেনঃ তুমি লিখে রাখো, সেই সত্তার শপথ, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! এ মুখ হতে সর্বাবস্থায় সত্য ব্যতীত অন্য কিছু বের হয় না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح يحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه ابن أبي شيبة ٩/ ٤٩ - ٥٠، وأحمد (٦٥١٠)، والدارمي (٤٨٤)، والحاكم ١/ ١٠٥ - ١٠٦، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" ص ٨٩ - ٩٠، والخطيب في "تقييد العلم" ص٨٠، والمزي في "تهذيب الكمال" ٣١/ ٣٨ - ٣٩ من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٦٩٣٠)، والحاكم ١/ ١٠٥، وابن عبد البر ص ٨٩ من طريق عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. وأخرجه الحاكم ١/ ١٠٥ من طريق عمرو بن شعيب، عن مجاهد، عن عبد الله ابن عمرو.
حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ، أَخْبَرَنَا أَبُو أَحْمَدَ، حَدَّثَنَا كَثِيرُ بْنُ زَيْدٍ، عَنِ الْمُطَّلِبِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ حَنْطَبٍ، قَالَ دَخَلَ زَيْدُ بْنُ ثَابِتٍ عَلَى مُعَاوِيَةَ فَسَأَلَهُ عَنْ حَدِيثٍ، فَأَمَرَ إِنْسَانًا يَكْتُبُهُ فَقَالَ لَهُ زَيْدٌ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَنَا أَنْ لاَ نَكْتُبَ شَيْئًا مِنْ حَدِيثِهِ فَمَحَاهُ .
আল-মুত্তালিব ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু হানতাব (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলেন। মু’আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে একটি হাদীস সম্পর্কে প্রশ্ন করলেন এবং এক ব্যক্তিকে তা লিখে রাখার আদেশ দিলেন। যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে হাদীস না লিখতে আদেশ দিয়েছেন এবং যা লেখা হয়েছিল তাও মুছে দিলেন। [৩৬৪৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، المطلب لم یسمع من زید بن ثابت رضي اللّٰہ عنہ (انظر جامع التحصیل ص281) ولم یلق معاویۃ رضي اللّٰہ عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه، المطلب بن عبد الله بن حنطب لم يسمع من زيد ابن ثابت. أبو أحمد: هو محمد بن عبد الله الزبيري. وأخرجه أحمد (٢١٥٧٩)، والخطيب البغدادي في "تقييد العلم" ص ٣٥، وابن عبد البر في "جامع بيان العلم" ١/ ٦٣ من طريق كثير بن زيد، به. وأخرج الدارمي (٤٧٤) من طريق عبد الله بن عون، عن محمد بن سيرين، عن زيد بن ثابت قصة امتناع زيد عن الكتابة لمروان بن الحكم، وهو أمير على المدينة، وليس فيها الحديث المرفوع. ويشهد للنهي عن الكتابة حديث أبي سعيد الخدري عند مسلم (٣٠٠٤) قال: قال رسول الله ﷺ: "لا تكتبوا عني، ومن كتب عني غير القرآن فليمحه". قال الخطابي: يشبه أن يكون النهي متقدماً وآخر الأمرين الأباحة. وقال النووي في "شرح مسلم": قال القاضي [يعني عياضاً]: كان بين السلف من الصحابة والتابعين اختلاف كثير في كتابة العلم فكرهها كثيرون منهم وأجازها أكثرهم، ثم أجمع المسلمون على جوازها وزال ذلك الخلاف، واختلفوا في المراد بهذا الحديث الوارد في النهي، فقيل: هو في حقٌ من يُوثق بحفظه ويخاف اتكاله على الكتابة إذا كتب، وتحمل الأحاديث الواردة بالإباحة على من لا يوثق بحفظه، كحديث: "اكتبوا لأبي شاه" وحديث صحيفة علي ﵁، وحديث كتاب عمرو بن حزم الذي فيه الفرائض والسنن والديات، وحديث كتاب الصدقة ونُصُب الزكاة الذي بعث به أبو بكر ﵁ أنساً ﵁ حين وجهه إلى البحرين، وحديث أبي هريرة أن ابن عمرو بن العاص كان يكتب ولا أكتب، وغير ذلك من الأحاديث. وقيل: إن حديث النهي منسوخ بهذه الأحاديث، وكان النهي حين خيف اختلاطه بالقرآن، فلما أُمن ذلك أَذِن في الكتابة. وقيل: إنما نهى عن كتابة الحديث مع القرآن في صحيفة واحدة، لئلا يختلط فيشتبه على القارئ، والله أعلم. وقال الإِمام ابن القيم في "تهذيب السنن" ٥/ ٢٤٥: قد صحَّ عن النبي ﷺ النهي عن الكتابة والإذن فيها، والإذن متأخر، فيكون ناسخاً لحديث النهي، فإن النبي ﷺ قال في غزاة الفتح: "اكتبوا لأبي شاه" يعني خطبته التي سأل أبو شاه كتابتها، وأذن لعبد الله ابن عمرو في الكتابة، وحديثه متأخر عن النهي، لأنه لم يزل يكتب، ومات وعنده كتابته وهي الصحيفة النبي ﷺ كان يُسميها الصادقة ولو كان النص عن الكتابة متاخراً، لمحاها عبد الله، لأمر النبي ﷺ ما كُتِبَ عنه غير القرآن، فلما لم يمحُها وأثبتها دل على أن الإذن في الكتابة متأخر عن النهي عنها، وهذا واضح والحمد لله. وكتب النبي ﷺ لعمرو بن حزم كتاباً عظيماً، فيه الديات وفرائض الزكاة وغيرها، وكتبه في الصدقات معروفة مثل كتاب عمر بن الخطاب وكتاب أبي بكر الصديق الذي دفعه إلى أنس ﵃. وقيل لعلي: هل خصكم رسول الله ﷺ بشيء، فقال: لا، والذي فلق الحبة وبرأ النسمة إلا ما في هذه الصحيفة، وكان فيها العُقول وفِكاك الأسير، وأن لا يُقتل مسلم بكافر. وإنما نهى النبي ﷺ عن كتابة غير القرآن في أول الإسلام لئلا يختلط القرآن بغيره، فلما عُلِمَ القرآنُ وتميَّزَ، وأُفرِد بالضبط والحفظ، وأُمِنت عليه مفسدة الاختلاط، أُذِن في الكتابة. وقد قال بعضهم: إنما كان النهي عن كتابة مخصوصة، وهي أن يجمع بين كتابة الحديث والقرآن في صحيفة واحدة خشية الالتباس، وكان بعض السلف يكره الكتابة مطلقاً. وكان بعضهم يرخص فيها حتى يحفظ، فإذا حفظ محاها. وقد وقع الاتفاق على جواز الكتابة وإبقائها، ولولا الكتابة ما كان بأيدينا اليوم من السنة إلا أقلَّ القليل. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" ١/ ٢٠٤: وقد استقر الأمر، والإجماع انعقد على جواز كتابة العلم، بل على استحبابه، بل لا يبعد وجوبه على من خشي النسيان ممن يتعين عليه تبليغ العلم.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا أَبُو شِهَابٍ، عَنِ الْحَذَّاءِ، عَنْ أَبِي الْمُتَوَكِّلِ النَّاجِيِّ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ مَا كُنَّا نَكْتُبُ غَيْرَ التَّشَهُّدِ وَالْقُرْآنِ .
আবূ সাইদ আল-খুদরী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমরা তাশাহুদ ও আল-কুরআন ছাড়া আর কিছু লিখতাম না। [৩৬৪৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: شاذ
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو المتوكل الناجي: هو علي بن داود، والحذاء: هو خالد ابن مهران، وأبو شهاب: هو عبد ربه بن نافع الكناني الحنَّاط. وأخرجه الخطيب في "تقييد العلم" ص٩٣، وأبو إسماعيل الهروي في "ذم الكلام" (٥٩٠) من طريقين عن خالد الحذاء، به. وانظر معنى هذا الحديث عند الحديث السالف قبله. تنبيه: هذا الأثر أثبتناه من "تحفة الأشراف" (٤٢٥٨)، وأشار الحافظ المزي هناك إلى أنه في رواية أبي الحسن ابن العبد، ولم يذكره أبو القاسم.
حَدَّثَنَا مُؤَمَّلٌ، قَالَ حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، ح وَحَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ الْوَلِيدِ بْنِ مَزْيَدٍ، قَالَ أَخْبَرَنِي أَبِي، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو سَلَمَةَ، - يَعْنِي ابْنَ عَبْدِ الرَّحْمَنِ - قَالَ حَدَّثَنِي أَبُو هُرَيْرَةَ، قَالَ لَمَّا فُتِحَتْ مَكَّةُ قَامَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ الْخُطْبَةَ خُطْبَةَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ فَقَامَ رَجُلٌ مِنْ أَهْلِ الْيَمَنِ يُقَالُ لَهُ أَبُو شَاهٍ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ اكْتُبُوا لِي . فَقَالَ " اكْتُبُوا لأَبِي شَاهٍ " .
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাক্কাহ বিজয় হলে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন। অতঃপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষণ উল্লেখ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, আবূ শাহ নামক ইয়ামানের এক ব্যক্তি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনারা আমাকে লিখে দেয়ার ব্যবস্থা করে দিন। তিনি বলেনঃ তোমরা আবূ শাহকে লিখে দাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2434) صحیح مسلم (1355)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الوليد: هو ابن مسلم الدمشقي، ومؤمل: هو ابن الفضل الحرَّاني، والأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٥٨٢٤) عن العباس بن الوليد، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١١٢) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين حدَّثنا شيبان، عن يحيى بن أبي كثير بهذا الإسناد. وانظر ما سلف برقم (٢٠١٧)، وما سيأتي برقم (٤٥٠٥). وفي الباب عن أنس عند البخاري (١٠٨). وعن أبي هريرة عنده أيضاً (١١٠)، وهو حديث متواتر. تنبيه: هذا الحديثِ مع كلام أبي عمرو الاوزاعي الآتي بعده أثبتاهما من "تحفة الأشراف"، ومن هامش (هـ)، وأشار في "تحفة الأشراف" (١٥٣٨٣) إلى أنهما في رواية أبي الحسن ابن العبد وغيره، ولم يذكرهما أبو القاسم. (2) رجاله ثقات. وأبو عمرو: هو الأوزاعي، والوليد: هو ابن مسلم. وهو في رواية أبي الحسن ابن العبد، ولم يذكره أبو القاسم اللؤلؤي قاله المزي في الأطراف.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ سَهْلٍ الرَّمْلِيُّ، قَالَ حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، قَالَ قُلْتُ لأَبِي عَمْرٍو مَا يَكْتُبُوهُ قَالَ الْخُطْبَةَ الَّتِي سَمِعَهَا يَوْمَئِذٍ مِنْهُ .
আল-ওয়ালীদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমি আবূ ‘আমর (রাহিমাহুল্লাহ)-কে প্রশ্ন করলাম, তারা কী লিখেছেন? তিনি বলেন, সে সময়ে তিনি তাঁর যে ভাষণ শুনেছিলেন তা। [৩৬৫০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح مقطوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أبو عمرو الأوزاعي
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. خالد: هو ابن عبد الله الواسطي الطحان. وأخرجه البخاري (١٠٧)، وابن ماجه (٣٦)، والنسائي في "الكبرى، (٥٨٨١) من طريق جامع بن شداد، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، به. قال المناوي في "فيض القدير" ٦/ ٢١٤ وهذا وعيد شديد يفيد أن ذلك من أكبر الكبائر سيما في الدين وعليه الإجماع، ولا التفات إلى ما شذَّ به الكرامية من حِلِّ وضع الحديث في الترغيب والترهيب، واقتدى بهم بعض جهلة المتصوفة فأباحوه في ذلك ترغيبا في الخير بزعمهم الباطل، وهذه غباوة ظاهرة وجهالة متناهية. قال ابن جماعة وغيره: وهؤلاء أعظم الأصناف ضرراً وأكثر خطراً، إذ لسان حالهم يقول: الشريعة محتاجة لكذا فنكملها.
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عَوْنٍ، أَخْبَرَنَا خَالِدٌ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، - الْمَعْنَى - عَنْ بَيَانِ بْنِ بِشْرٍ، - قَالَ مُسَدَّدٌ أَبُو بِشْرٍ - عَنْ وَبَرَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ عَامِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قُلْتُ لِلزُّبَيْرِ مَا يَمْنَعُكَ أَنْ تُحَدِّثَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَمَا يُحَدِّثُ عَنْهُ أَصْحَابُهُ فَقَالَ أَمَا وَاللَّهِ لَقَدْ كَانَ لِي مِنْهُ وَجْهٌ وَمَنْزِلَةٌ وَلَكِنِّي سَمِعْتُهُ يَقُولُ " مَنْ كَذَبَ عَلَىَّ مُتَعَمِّدًا فَلْيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আপনি অন্যান্য সাহাবীদের মতো রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর হাদীস বর্ণনা করেন না কেন? তিনি বললেন, আল্লাহ্র কসম! আমি তাঁর নৈকট্য লাভ করেছি, তাঁর সাহচর্যে থেকেছি। কিন্তু আমি তাঁকে বলতে শুনেছিঃ যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার প্রতি মিথ্যা আরোপ করলো, সে (জাহান্নামের) আগুনে তার বাসস্থান নির্দিষ্ট করে নিলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (107)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف سهيل بن مهران -وهو سهيل بن أبي حزم- أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب. وأخرجه الترمذي (٣١٨٣)، والنسائي في "الكبرى، (٨٠٣٢) من طريق سهيل بن أبي حزم مهران، به. وقال الترمذي: هذا حديث غريب، وقد تكلم بعض أهل الحديث في سهيل بن أبي حزم. وهو في "شرح السنة" للبغوي (١٢٠). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ يَحْيَى، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِسْحَاقَ الْمُقْرِئُ الْحَضْرَمِيُّ، حَدَّثَنَا سُهَيْلُ بْنُ مِهْرَانَ، - أَخُو حَزْمٍ الْقُطَعِيِّ - حَدَّثَنَا أَبُو عِمْرَانَ، عَنْ جُنْدُبٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ قَالَ فِي كِتَابِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ بِرَأْيِهِ فَأَصَابَ فَقَدْ أَخْطَأَ " .
জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি কুরআনের ব্যাখ্যায় নিজ মনগড়া কথা বলে, তার কথা সঠিক হয়ে গেলেও সে ভুল করেছে। [৩৬৫২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، ترمذی(2952) ، سہیل بن مہران:ضعیف (تقریب التہذیب: 2672) ، (انوار الصحیفہ ص 130)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لضعف عبد الأعلى -وهو ابن عامر الثعلبي- أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليَشْكُري. وأخرجه أحمد (٢٠٦٩)، والترمذي (٣١٨١) و (٣١٨٢)، والنسائي في "الكبرى"، (٨٥٣٠) و (٨٠٣١)، بلفظ: "من قال في القرآن بغير علم -وفي رواية: برأيه- فليتبوأ مقعده من النار" وقال الترمذي: هذا حديث حسن. وصححه كذلك ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والايهام" ٥/ ٢٥٣. قلنا: كذا قال الترمذي وابن القطان مع أن في إسناده عبد الأعلى بن عامر الثعلبي، وهو ضعيف كما سبق، فقد ضعفه يحيى القطان وابن مهدي وأحمد وأبو زرعة وأبو حاتم. ثم إن ابن القطان نفسه قد ضعَّف حديثاً لابن عباس. سلف عند المصنف برقم (٣٢٠٨) بعبد الأعلى الثعلبي، فلا ندري ما وجه تصحيحه هذا الحديث هنا؟!! وانظر ما قبله. تنبيه: هذا الحديث أثبتناه من "تحفة الأشراف" (٥٥٤٣)، وأشار الحافظ المزي هناك إلى أنه في رواية أبي الحسن ابن العبد، ولم يذكره أبو القاسم. قال الطبري: ما كان من تأويل آي القرآن الذي لا يُدرك علمُه إلا بنص بيان رسول الله ﷺ أو بنصبه الدلالةَ عليه، فغيرُ جائز لأحد القْيلُ فيه برأيه، بل القائل في ذلك برأيه وإن أصابَ الحقَّ فيه، فمخطئ فيما كان من فعله بقيله فيه برأيه، لأن إصابته ليست إصابة موقن أنه محق، وإنما هو إصابة خارصٍ وظانٍّ، والقائل في دين الله بالظن قائل على الله ما لا يعلم، وقد حرَّم الله جل ثناؤه ذلك في كتابه على عباده، فقال: ﴿قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَنْ تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَنْ تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ﴾ [الأعراف:٣٣]
حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مَرْزُوقٍ، أَخْبَرَنَا شُعْبَةُ، عَنْ أَبِي عَقِيلٍ، هَاشِمِ بْنِ بِلاَلٍ عَنْ سَابِقِ بْنِ نَاجِيَةَ، عَنْ أَبِي سَلاَّمٍ، عَنْ رَجُلٍ، خَدَمَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا حَدَّثَ حَدِيثًا أَعَادَهُ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ .
আবূ সাল্লাম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক খাদেমের সূত্র হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন কথা বললে তা তিনবার পুনরাবৃত্তি করতেন। [৩৬৫৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، سابق بن ناجیۃ صحح لہ الحاکم والذھبي ووثقہ ابن حبان فھو حسن الحدیث
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة سابق بن ناجية، فلم يرو عنه غير أبي عَقيل هاشم بن بلال، ولم يوثقه غيرُ ابن حبان. وأخرجه البخاري في "تاريخه" ٤/ ٢٠١ عن عمرو بن مرزوق، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث أنس بن مالك عند البخاري (٩٤) و (٩٥)، والترمذي (٢٩٢١) أن النبي ﷺ كان إذا سلَّم سلَّم ثلاثاً، وإذا تكلم بكلمة أعادها ثلاثاً. وعلل ذلك في رواية البخاري الثانية بقوله: حتى تُفهم عنه. قال الحافظ في "الفتح" ١/ ١٨٩: قال ابن المُنيِّر: نبه البخاري بهذه الترجمة على الرد على من كرِه إعادة الحديث وأنكر على الطالب الاستعادة، وعده من البلادة، قال: والحق أن هذا يختلِفُ باختلاف القرائح، فلا عيب على المستفيد الذي لا يحفظ من مرة إذا استعاد، ولا عُذر للمفيد إذا لم يُعد، بل الإعادة عليه آكدُ من الابتداء، لأن الشروع ملزم. وقال ابنُ التين: فيه أن الثلاث غاية ما يقع به الاعتذار والبيان.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مَنْصُورٍ الطُّوسِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، قَالَ جَلَسَ أَبُو هُرَيْرَةَ إِلَى جَنْبِ حُجْرَةِ عَائِشَةَ - رضى الله عنها - وَهِيَ تُصَلِّي فَجَعَلَ يَقُولُ اسْمَعِي يَا رَبَّةَ الْحُجْرَةِ مَرَّتَيْنِ . فَلَمَّا قَضَتْ صَلاَتَهَا قَالَتْ أَلاَ تَعْجَبُ إِلَى هَذَا وَحَدِيثِهِ إِنْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَيُحَدِّثُ الْحَدِيثَ لَوْ شَاءَ الْعَادُّ أَنْ يُحْصِيَهُ أَحْصَاهُ .
‘উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরের পাশে এসে বসলেন। তিনি তখন সলাত আদায় করছিলেন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দু’বার বললেন, হে ঘরেরবাসিনী! শুনুন। ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সলাত শেষ করে ‘উরওয়াহ্কে বললেন, তুমি কি এ ব্যক্তি ও তার কথায় অবাক হচ্ছো না? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন কথা বললে এতো স্পষ্ট ও ধীরস্থিরভাবে বলতেন যে, কোন গণনাকারী তা গণনা করতে চাইলে অনায়াসেই তা গণনা করতে পারতো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3567) صحیح مسلم (2493)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣٥٦٧) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه مسلم بإثر (٣٠٠٣) من طريق سفيان بن عيينة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٨٦٥)، و "صحيح ابن حبان" (١٠٠) و (٧١٥٣). وانظر ما بعده.