সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ مُوسَى الْخُتَّلِيُّ، أَخْبَرَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ جَعْفَرٍ الْمَدَنِيُّ، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ عُثْمَانَ الشَّحَّامِ، عَنْ عِكْرِمَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا ابْنُ عَبَّاسٍ، أَنَّ أَعْمَى، كَانَتْ لَهُ أُمُّ وَلَدٍ تَشْتُمُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَتَقَعُ فِيهِ فَيَنْهَاهَا فَلاَ تَنْتَهِي وَيَزْجُرُهَا فَلاَ تَنْزَجِرُ - قَالَ - فَلَمَّا كَانَتْ ذَاتَ لَيْلَةٍ جَعَلَتْ تَقَعُ فِي النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَتَشْتِمُهُ فَأَخَذَ الْمِغْوَلَ فَوَضَعَهُ فِي بَطْنِهَا وَاتَّكَأَ عَلَيْهَا فَقَتَلَهَا فَوَقَعَ بَيْنَ رِجْلَيْهَا طِفْلٌ فَلَطَخَتْ مَا هُنَاكَ بِالدَّمِ فَلَمَّا أَصْبَحَ ذُكِرَ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَمَعَ النَّاسَ فَقَالَ " أَنْشُدُ اللَّهَ رَجُلاً فَعَلَ مَا فَعَلَ لِي عَلَيْهِ حَقٌّ إِلاَّ قَامَ " . فَقَامَ الأَعْمَى يَتَخَطَّى النَّاسَ وَهُوَ يَتَزَلْزَلُ حَتَّى قَعَدَ بَيْنَ يَدَىِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنَا صَاحِبُهَا كَانَتْ تَشْتِمُكَ وَتَقَعُ فِيكَ فَأَنْهَاهَا فَلاَ تَنْتَهِي وَأَزْجُرُهَا فَلاَ تَنْزَجِرُ وَلِي مِنْهَا ابْنَانِ مِثْلُ اللُّؤْلُؤَتَيْنِ وَكَانَتْ بِي رَفِيقَةً فَلَمَّا كَانَتِ الْبَارِحَةَ جَعَلَتْ تَشْتِمُكَ وَتَقَعُ فِيكَ فَأَخَذْتُ الْمِغْوَلَ فَوَضَعْتُهُ فِي بَطْنِهَا وَاتَّكَأْتُ عَلَيْهَا حَتَّى قَتَلْتُهَا . فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " أَلاَ اشْهَدُوا أَنَّ دَمَهَا هَدَرٌ " .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈক অন্ধ লোকের একটি ‘উম্মু ওয়ালাদ’ ক্রীতদাসী ছিল। সে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালি দিত এবং তার সম্পর্কে মন্দ কথা বলতো। অন্ধ লোকটি তাকে নিষেধ করা সত্ত্বেও সে বিরত হতোনা। সে তাকে ভর্ত্সনা করতো; কিন্তু তাতেও সে বিরত হতো না। একরাতে সে যখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালি দিতে শুরু করলো এবং তার সম্পর্কে মন্দ কথা বলতে লাগলো, সে একটি ধারালো ছোরা নিয়ে তার পেটে ঢুকিয়ে তাতে চাপ দিয়ে তাকে হত্যা করলো। তার দু’পায়ের মাঝখানে একটি শিশু পতিত হয়ে রক্তে রঞ্জিত হলো। ভোরবেলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘটনাটি অবহিত হয়ে লোকজনকে সমবেত করে বললেনঃ আমি আল্লাহর কসম করে বলছিঃ যে ব্যক্তি একাজ করেছে, সে যদি না দাঁড়ায়, তবে তার উপর আমার অধিকার আছে। একথা শুনে অন্ধ লোকটি মানুশের ভিড় ঠেলে কাঁপতে কাঁপতে সামনে অগ্রসর হয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সামনে এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি সেই নিহত দাসীর মনিব। সে আপনাকে গালাগালি করতো এবং আপনার সম্পর্কে অপমানজনক কথা বলতো। আমি নিষেধ করতাম কিন্তু সে বিরত হতোনা। আমি তাকে ধমক দিতাম; কিন্তু সে তাতেও বিরত হতোনা। তার গর্ভজাত মুক্তার মত আমার দুতি ছেলে আছে, আর সে আমার খুব প্রিয়পাত্রী ছিল। গতরাতে সে আপনাকে গালাগালি শুরু করে এবং আপনার সম্পর্কে অপমানজনক কথা বললে আমি তখন একটি ধারালো ছুরি নিয়ে তার পেটে স্থাপন করে তাতে চাপ দিয়ে তাকে হত্যা করে ফেলি। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা সাক্ষী থাকো, তার রক্ত বৃথা গেলো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (4075 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل عثمان الشحام، فهو صدوق لا بأس به وباقي رجاله ثقات. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق الشيعي. وأخرجه بنحوه النسائي في "الكبرى" (٣٥١٩) من طريق عباد بن موسى الخُتلي، بهذا الإسناد. المِغوَل: شبه سيف قصير، يشتمل به الرجل تحت ثيابه فيغطيه، وقيل: هو حديدة دقيقة لها حد ماضٍ وقَفَا، وقيل: هو سوط في جوفه سيف دقيق يشده الفاتك على وسطه ليغتال به الناس. قال الخطابي: وفيه بيان أن ساب النبي ﷺ مهدر الدم، وذلك أن السبّ منها لرسول الله ﷺ ارتداد عن الدين، ولا أعلم أحداً من المسلمين اختلف في وجوب قتله، ولكن إذا كان السابّ ذمياً فقد اختلفوا فيه: فقال مالك بن أنس: من شتم النبي ﷺ من اليهود والنصارى قتل إلا أن يسلم، وكذلك قال أحمد بن حنبل. وقال الشافعي: يقتل الذِّمِّي إذا سبَّ النبي ﷺ وتبرأ منه الذمة، واحتج في ذلك بخبر كعب بن الأشرف. وحكي عن أبي حنيفة أنه قال: لا يقُتل الذمي بشتم النبي ﷺ، ما هم عليه من الشرك أعظم.
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْجَرَّاحِ، عَنْ جَرِيرٍ، عَنْ مُغِيرَةَ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْ عَلِيٍّ، رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ يَهُودِيَّةً، كَانَتْ تَشْتِمُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَتَقَعُ فِيهِ فَخَنَقَهَا رَجُلٌ حَتَّى مَاتَتْ فَأَبْطَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم دَمَهَا .
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ইয়াহুদী মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে গালাগালি করতো এবং তাঁর সম্পর্কে মন্দ কথা বলতো। একদা জনৈক ব্যক্তি তাকে গলা টিপে হত্যা করে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার রক্ত বাতিল বলে ঘোষণা করেন। [৪৩৬১]
সানাদ দুর্বলঃ ইরওয়া হা/১২৫১।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، مغیرۃ عنعن و جریر ھو ابن عبدالحمید الضبي ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن قال المنذري في "اختصار السنن" ٦/ ٢٠٠: ذكر بعضهم أن الشعبي سمع من علي بن أبي طالب، وقال غيره: إنه رآه. والشعبي: هو عامر بن شَرَاحيل، ومُغيرة: هو ابن مِقْسَم، وجرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه البيهقي ٧/ ٦٠ و ٩/ ٢٠٠، والضياء المقدسي في المختارة" (٥٤٧) من طريق أبي داود، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبى شيبة ١٤/ ٢١٣ عن جرير بن عبد الحميد، عن مغيرة بن مقِسم، عن الشعبي قال: كان رجل من المسلمين أعمى، فكان يأوي إلى امرأة يهودية … فذكر القصة مرسلة، ولم يذكر علي بن أبي طالب. وقد أخرج هذه القصة نفسَها ابنُ سعد في "الطبقات الكبرى" ٤/ ٢١٠ عن قبيصة ابن عُقبة، عن يونس بن أبي إسحاق السبعي، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن مَعقِل مرسلاً قال: نزل ابن أم مكتوم على يهودية بالمدينة … فذكرها إلا أنه قال: تؤذيه في الله ورسوله. وسمى الرجل ابنَ أم مكتوم. وهذه الرواية -وإن كانت مرسلة- رجالها ثقات، وتؤيد رواية المصنف، فباجتماع الروايتين يتقوى الحديث. على أن مراسيل الشعبي وحدها حجة عند عدد من أهل العلم كابن المديني والعجلي انظر "شرح العلل" لابن رجب ١/ ٢٩٦، و"الصارم المسلول" لابن تيمية ص ٦٥ - ٦٦.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ يُونُسَ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلاَلٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ح وَحَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، وَنُصَيْرُ بْنُ الْفَرَجِ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ زُرَيْعٍ، عَنْ يُونُسَ بْنِ عُبَيْدٍ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ هِلاَلٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُطَرِّفٍ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ، قَالَ كُنْتُ عِنْدَ أَبِي بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فَتَغَيَّظَ عَلَى رَجُلٍ فَاشْتَدَّ عَلَيْهِ فَقُلْتُ تَأْذَنُ لِي يَا خَلِيفَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَضْرِبُ عُنُقَهُ قَالَ فَأَذْهَبَتْ كَلِمَتِي غَضَبَهُ فَقَامَ فَدَخَلَ فَأَرْسَلَ إِلَىَّ فَقَالَ مَا الَّذِي قُلْتَ آنِفًا قُلْتُ ائْذَنْ لِي أَضْرِبْ عُنُقَهُ . قَالَ أَكُنْتَ فَاعِلاً لَوْ أَمَرْتُكَ قُلْتُ نَعَمْ . قَالَ لاَ وَاللَّهِ مَا كَانَتْ لِبَشَرٍ بَعْدَ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَبُو دَاوُدَ هَذَا لَفْظُ يَزِيدَ قَالَ أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ أَىْ لَمْ يَكُنْ لأَبِي بَكْرٍ أَنْ يَقْتُلَ رَجُلاً إِلاَّ بِإِحْدَى الثَّلاَثِ الَّتِي قَالَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كُفْرٌ بَعْدَ إِيمَانٍ أَوْ زِنًا بَعْدَ إِحْصَانٍ أَوْ قَتْلُ نَفْسٍ بِغَيْرِ نَفْسٍ وَكَانَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَقْتُلَ .
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তখন তিনি একটি লোকের প্রতি খুবই ক্রোধান্বিত হলেন। আমি তাকে বললাম, হে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর খালিফাহ! আমাকে অনুমতি দিন, তাকে হত্যা করি। তিনি বলেন, আমার একথায় তার ক্রোধ দূর হলো। তিনি উঠে বাড়ির ভেতরে চলে গেলেন। অতঃপর তিনি লোক পাঠিয়ে আমাকে (ডেকে নিয়ে) প্রশ্ন করেন, তুমি এইমাত্র কি বলেছ? আমি বললাম, আমাকে অনুমতি দিন, আমি তাকে হত্যা করি। তিনি প্রশ্ন করেন, আমি যদি তোমাকে আদেশ করতাম, তুমি কি তাই করতে? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, না, আল্লাহর কসম! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পরে অন্য কোন মানবের এ অধিকার নেই।
ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, এই মুল পাঠ বর্ণনাকারী ইয়াযীদ। আহ্মাদ ইবনু হাম্বল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অর্থাৎ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে তিনটি অপরাধের কোনটিতে লিপ্ত ব্যক্তিকে হত্যা করার কথা বলেছেন, তাদের ছাড়া অন্য কাউকে হত্যা করা আবূ বাক্রের জন্য বৈধ নয়ঃ কেউ ধর্ম ত্যাগ করলে, বিবাহিত ব্যাক্তি যেনা করলে এবং নিরপরাধ ব্যাক্তির হত্যাকারী। তবে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর হত্যা করার কর্তৃত্ব ছিল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، وللحدیث شاھد عند النسائي (4076 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناد الموصول قوي. عبدُ الله بن مُطرِّف -وهو ابن عبد الله بن الشِّخِّير- روى عنه حميد بن هلال وعطية السراج وقتادة بن دعامة وغيرهم، وذكره ابن حبان وابن خلفون في "الثقات" وقال: كان رجلاً صالحاً، وقد صحح إسناده شيخ الإِسلام ابن تيمية في "الصارم المسلول" ص٩٩. وهو متابع كما سيأتي. يونس: هو ابن عُبيد، وحماد: هو ابن سلمة، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٥٢٦) من طريق يزيد بن زريع، بهذا الإسناد. وقال بعد أن ساقه من وجوه هذا آخرها: هذا أحسن هذه الأحاديث وأجودها. وهو في "مسند أحمد" (٦١). وأخرجه النسائي (٣٥٢٠) من طريق شعبة، عن توبة العنبري، عن أبي سوار عبد الله بن قدامة العنبري، عن أبي برزة الأسلمي قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق، فقلت: أقتُله؟ فانتهرني، وقال: ليس هذا لأحد بعد رسول الله ﷺ. وهو في "مسند أحمد" (٥٤). وقد فَسَّر الإمامُ أحمد كلام أبي بكر الصديق هذا كما ذكر المصنف بإثره. وقال ابن حزم في المحلى" ١١/ ٤١٠: وأراد أيضاً معنى آخر كما رويناه مبيناً بلا إشكال ثم ساق بسنده إلى أبي السوار القاضي عن أبي برزة قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق، قلت: ألا أقتله؟ فقال أبو بكر: ليس هذا إلا لمن شتم النبي ﷺ، فبين أبو بكر الصديق ﵁ أنه لا يُقتل من شتمه، لكن يقتل من شتم النبي ﷺ.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ قَوْمًا، مِنْ عُكْلٍ - أَوْ قَالَ مِنْ عُرَيْنَةَ - قَدِمُوا عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَاجْتَوَوُا الْمَدِينَةَ فَأَمَرَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِلِقَاحٍ وَأَمَرَهُمْ أَنْ يَشْرَبُوا مِنْ أَبْوَالِهَا وَأَلْبَانِهَا فَانْطَلَقُوا فَلَمَّا صَحُّوا قَتَلُوا رَاعِيَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَاسْتَاقُوا النَّعَمَ فَبَلَغَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم خَبَرُهُمْ مِنْ أَوَّلِ النَّهَارِ فَأَرْسَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي آثَارِهِمْ فَمَا ارْتَفَعَ النَّهَارُ حَتَّى جِيءَ بِهِمْ فَأَمَرَ بِهِمْ فَقُطِعَتْ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ وَسُمِّرَ أَعْيُنُهُمْ وَأُلْقُوا فِي الْحَرَّةِ يَسْتَسْقُونَ فَلاَ يُسْقَوْنَ . قَالَ أَبُو قِلاَبَةَ فَهَؤُلاَءِ قَوْمٌ سَرَقُوا وَقَتَلُوا وَكَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَحَارَبُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, উকল অথবা উরাইনাহ গোত্রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট আসলো। মদিনায় বসবাস তাদের পক্ষে অনুপযোগী হওয়ায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে উতের পালের নিকট গিয়ে এগুলর পেশাব ও দুধ পান করতে আদেশ দেন। অতএব তারা সেখানে চলে গেলো। পরে তারা সুস্থ হয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর রাখালকে হত্যা করে এবং উট পাল্কে তাড়িয়ে নিয়ে যায়। দিনের প্রথমভাগে এ খবর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট পৌঁছে। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের পিছনে লোক পাঠান। উঠন্ত বেলায় তাদের ধরে নিয়ে আসা হয়। তাঁর আদেশে তাদের হাত পা কাতা হয় এবং লৌহ শলাকা তাদের চোখে বিদ্ধ করে উত্তপ্ত রদে ফেলে রাখা হয়। তারা পানি চাইলেও তা দেয়া হয়নি। আবূ ক্বিলাবাহ বলেন, এরা এমন একটি গোত্রের, যারা চুরি করেছে, ঈমান আনার পর কুফরী করেছে এবং সর্বোপরি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করেছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (233) صحیح مسلم (1671)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي، وأيوب: هو ابن أبي تيمية السختياني، وحماد: هو ابن زيد. وأخرجه البخاري (٢٣٣) و (٦٨٠٥) من طريق حماد بن زيد، والنسائي في "الكبرى" (٣٤٧٦) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن أيوب السختياني، به. وأخرجه البخاري (٤٦١٠) و (٦٨٩٩)، ومسلم (١٦٧١)، والنسائي (٣٤٧٣) من طريق سلمان أبي رجاء مولى أبي قلابة، عن أبي قلابة، به. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٧٥٢٦) من طريق عبد العزيز بن صهيب، ومسلم (١٦٧١) من طريق معاوية بن قرة، والنسائي (٢٩١) و (٣٤٨٤) من طريق يحيى بن سيد، ثلاثتهم عن أنس. لكن قال النسائي عن رواية يحيى بن سيد: لا نعلم أحداً قال: عن يحيى بن سعيد، عن أنس بن مالك في هذا الحديث غير طلحة بن مُصرَّف، والصواب عندنا -والله أعلم-: عن يحيى بن سعيد عن سيد بن المسيب. مرسل. قلنا: وقد أخرج هذه الطريق المرسلة برقم (٣٤٨٥). وأخرج مسلم (١٦٧١)، والترمذي (٧٣)، والنسائي (٣٤٩٢) من طريق سليمان التيمي، عن أنس قال: إنما سمل رسولُ الله ﷺ أعيُن أولئك؛ لأنهم سملُوا أعيُن الرعاء. وهو في "مسند أحمد" (١٢٠٤٢) و (١٢٦٣٩)، و"صحيح ابن حبان" (١٣٨٦) و (٤٤٦٧) و (٤٤٧٤). وانظر ما سيأتي بالأرقام (٤٣٦٥ - ٤٣٦٨). قال الخطابي: قوله: فاجتووا: معناه: عافُوا المقام بالمدينة وأصابهم بها الجوى في بطونهم، يقال: اجتويتُ المكان: إذا كرهتَ الإقامة به لضرر يلحقك فيه. واللقاح: ذوات الدَّرِّ من الإبل، واحدتُها لِقحة. قوله: سَمَر أعينهم، يريد: أنه كحلهم بمسامير محماة، والمشهور من هذا في أكثر الروايات: سمل -باللام- أي: فقأ أعينهم، قال أبو ذؤيب: فالعين بعدهم كأن حِداقها … سمِلت بشوك فهي عُور تدمع قال الخطابي: وفي الحديث من الفقه أن إبل الصدقة قد يجوز لأبناء السبيل شرب ألبانها، وذلك أن هذه اللقاح كانت من إبل الصدقة، روي ذلك في هذا الحديث من غير هذا الطريق. قال: وفيه إباحة التداوي بالمحرم عند الضرورة؛ لأن الأبوالَ كلها نجسة من مأكول اللحم وغير مأكوله. وقال الخطابي أيضاً: وقد اختلف الناس في تأويل هذا الصنيع من رسول الله ﷺ، وقد روي عن ابن سيرين أن هذا إنما كان منه قبل أن تنزل الحدود، فوعظه ونهاه عن المُثلة فلم يَعُد. قال: وروى سليمان التيمي عن أنس: أن النبي ﷺ إنما سَمَل أولئك لأنهم سَمَلوا أعيُن الرعاة. يريد أنه إنما اقتص منهم على أمثال فعلهم. قلنا: وقد ذكر الحافظ في "الفتح" ١/ ٢٤١ أن النسخ هو الأصح على وفق ما قال ابن سيرين لما رواه أبو هريرة عند البخاري من النهي عن التعذيب بالنار بعد الإذن فيه، وأن قصة العرنيين كانت قبل إسلام أبي هريرة، وقد حضر الإذن ثم النهي. وذكر أنه مال إلى هذا القول البخاري. وحكاه إمام الحرمين في "النهاية" عن الشافعي. وانظر لزاماً تمام الكلام على فقهه عند الحديث الآتي برقم (٤٣٦٦).
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا وُهَيْبٌ، عَنْ أَيُّوبَ، بِإِسْنَادِهِ بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فِيهِ فَأَمَرَ بِمَسَامِيرَ فَأُحْمِيَتْ فَكَحَلَهُمْ وَقَطَّعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ وَمَا حَسَمَهُمْ .
আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। বর্ণনাকারী বলেন, তাঁর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আদেশে লৌহ শলাকা উত্তপ্ত করা হয়, তাদের চোখে ফুঁড়ে দেয়া হয়, হাত-পা কেটে দেয়া হয়, এবং তাদের রক্তপ্রবাহ বন্ধ করেননি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4364)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وُهَيب: هو ابن خالد. وأخرجه البخاري (٣٠١٨) و (٦٨٠٤) من طريق وهيب بن خالد، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. والحسم: كيُّ العرق بالنار ليقطع الدم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ بْنِ سُفْيَانَ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ، حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنْ يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ أَبِي كَثِيرٍ - عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ قَالَ فِيهِ فَبَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي طَلَبِهِمْ قَافَةً فَأُتِيَ بِهِمْ . قَالَ فَأَنْزَلَ اللَّهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى فِي ذَلِكَ { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا } الآيَةَ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। তিনি তাতে বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের অনুসন্ধানে পদচিহ্ন বিশারদ একদল লোক পাঠালেন। পরে তাদেরকে ধরে নিয়ে আসা হোল। এ সম্পর্কে মহান আল্লাহ এ আয়াত নাযিল করেনঃ “যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করে আর পৃথিবীতে অশান্তি সৃষ্টি করে বেরায়, তাদের শাস্তি হোল, তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলে চড়ানো হবে অথবা তাদের একদিকের হাত এবং অপরদিকের পা কেটে ফেলা হবে অথবা ভূপৃষ্ঠ হতে নির্বাসিত (কারাগারে আবদ্ধ) করা হবে। এতাই তাদের ইহকালের অপমান, আর পরকালে তাদের কঠোর শাস্তি ভোগ করতে হবে” (সূরাহ আল্-মায়িদাহঃ ৩৩)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، انظر الحدیث السابق (4364)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. الوليد -وهو ابن مسلم الدمشقي- قد صرح بالتحديث في جميع طبقات الإسناد عند البخاري فانتفت شبهة تدليسه للتسوية. ثم هو متابع. وأخرجه البخاري (٦٨٠٢) و (٦٨٠٣)، والنسائي في "الكبرى" (٣٤٧٤) و (١١٠٧٨) من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٣٤٧٥) من طريق محمَّد بن يوسف الفريابي، ومسلم (١٦٧١) من طريق مسكين بن بكير الحراني، كلاهما عن الأوزاعي، به. وهو في "مسند أحمد" (١٣٠٤٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٦٧). وانظر سابقيه. قال الخطابي: القافة: جمع قائف، وهو الذي يتبع الأثر، ويطلب الضالَة والهارب. قلت [القائل الخطابي]: وقد اختلف الناسُ فيمن نزلت فيه هذه الآية، فروي مُدرجاً في هذا الخبر أنها نزلت في هؤلاء، وقد ذكر أبو قِلابة أن هؤلاء قوم سرقوا وقتلوا وكفروا بعد إيمانهم وحاربوا الله ورسوله. وذهب الحسن البصري أيضاً إلى أن هذه الآية إنما نزلت في الكفار دون المسلمين، وذلك أن المسلم لا يُحارب الله ورسولَه [قلنا: ونقل الحافظ في "الفتح" ١٢/ ١٠٩ عن ابن بطال أن البخاري ذهب إلى ذلك، وأنه ذهب إلى ذلك أيضاً عطاء والضحَّاك والزهري] قلنا: وسيأتي بسند حسن عن ابن عباس أن هذه الآية نزلت في المشركين برقم (٤٣٧٢)، قال الخطابي: وقال أكثر العلماء: نزلت الآية في أهل الإِسلام، والدليل على ذلك قوله تعالى: ﴿إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ قَبْلِ أَنْ تَقْدِرُوا عَلَيْهِمْ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ﴾ [المائدة: ٣٤] والإسلام يحقِن الدم قبل القدرة وبعدها، فعُلِمَ أن المراد به المسلمون. فأما قوله: ﴿يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ﴾ فمعناه: يحاربون المسلمين الذين هم حزبُ الله وحزبُ رسوله، فأضيف ذلك إلى اللهِ وإلى الرسولِ إذ كان هذا الفعلُ في الخلاف لأمرهما راجعاً إلى مخالفتهما، وهذا كقوله ﷺ: "من آذى لي ولياً فقد بادرني بالمحاربة". وانظر "المغني" ١٢/ ٤٧٣ لابن قدامة المقدسي.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، أَخْبَرَنَا ثَابِتٌ، وَقَتَادَةُ، وَحُمَيْدٌ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، ذَكَرَ هَذَا الْحَدِيثَ قَالَ أَنَسٌ فَلَقَدْ رَأَيْتُ أَحَدَهُمْ يَكْدِمُ الأَرْضَ بِفِيهِ عَطَشًا حَتَّى مَاتُوا .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি এ হাদীস প্রসঙ্গে বলেন, বিপরীত দিক হতে তাদের হাত-পা কর্তন করা হয়। হাদীসের প্রথমাংশে তিনি বলেন, তারা উট ছিনতাই করে এবং ইসলাম ধর্ম ত্যাগ করে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাদের একজনকে পিপাসার যন্ত্রণায় মুখ দিয়ে মাটি কামড়াতে দেখেছি। অবশেষে তারা মারা যায়।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ الترمذي (72 وسندہ حسن) والنسائي (4039 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وقتادة: هو ابن دِعامة السَّدُوسِيُّ، وثابت: هو ابن أسلم البُناني، وحماد: هو ابن سلمة. وأخرجه مختصراً الترمذي (٧٢) و (١٩٥١) و (٢١٦٤) من طريق حماد بن سلمة، به وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٨٣) من طريق حماد بن سلمة، عن قتادة وثابت، به. وأخرجه البخارىٍ (٥٦٨٥) من طريق سلام بن مسكين، عن ثابت وحده، به. وأخرجه البخاري (٤١٩٢) و (٥٧٢٧)، ومسلم (١٦٧١)، والنسائي (٢٩٠) و (٣٤٨١) و (٣٤٨٢) من طريق سعيد بن أبي عروبة، والبخاري (٥٦٨٦)، ومسلم (١٦٧١) من طريق همام بن يحيى، والبخاري (١٥٠١) من طريق شعبة بن الحجاج، ثلاثتهم عن قتادة وحده، به. وأخرجه مسلم (١٦٧١)، والنسائي (٧٥٢٧) من طريق هُشَيم بن بشير، وابن ماجه (٢٥٧٨) و (٣٥٠٣) من طريق عبد الوهَّاب الثقنى، والنسائي (٣٤٧٧) من طريق عَبد الله بن عُمر وغيره، و (٣٤٧٨) و (٧٥٢٤) من طريق إسماعيل بن جعفر المدني، و (٣٤٧٩) و (٧٥٢٥) من طريق خالد بن الحارث و (٣٤٨٠) من طريق ابن أبي عدي، كلهم عن حميد الطويل وحده، به. وهو في "مسند أحمد" (١٤٠٦١). وانظر ما سلف برقم (٤٣٦٤). قال الخطابي: قوله: يكدم الأرض، أي: يتناولها بفمه وبَعَضُّ عليها بأسنانه، وأصل الكدم: العَضُّ، والعرب تقول في قلة المرعى: ما بقيت عندنا إلا كُدامة ترعاها الإبل، أي: مقدار ما تتناوله بمقاديم أسنانها.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عَدِيٍّ، عَنْ هِشَامٍ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، بِهَذَا الْحَدِيثِ نَحْوَهُ زَادَ ثُمَّ نَهَى عَنِ الْمُثْلَةِ وَلَمْ يَذْكُرْ مِنْ خِلاَفٍ . وَرَوَاهُ شُعْبَةُ عَنْ قَتَادَةَ وَسَلاَّمِ بْنِ مِسْكِينٍ عَنْ ثَابِتٍ جَمِيعًا عَنْ أَنَسٍ لَمْ يَذْكُرَا مِنْ خِلاَفٍ . وَلَمْ أَجِدْ فِي حَدِيثِ أَحَدٍ قَطَعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ مِنْ خِلاَفٍ . إِلاَّ فِي حَدِيثِ حَمَّادِ بْنِ سَلَمَةَ .
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণিত। এতে আরো আছেঃ অতঃপর তিনি অঙ্গহানি নিষিদ্ধ করেন। এ বর্ণনায় ‘বিপরীত দিক হতে’ কথাটুকুর উল্লেখ নেই। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অন্যান্য বর্ণনাকারীও এ অংশটুকু উল্লেখ করেননি। আমি হাম্মাদ ইবনু সালামাহর হাদীস ব্যতীত আর কারোর বর্ণনায় ‘বিপরীত দিক হতে তাদের হাত-পা কাটার’ কথা পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (1501، 5685)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. هشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّسْتُوائي، وابن أبي عدي: هو محمَّد بن إبراهيم. وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٤٣٦٤).
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرٌو، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي هِلاَلٍ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، - قَالَ أَحْمَدُ هُوَ يَعْنِي عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ - عَنِ ابْنِ عُمَرَ أَنَّ نَاسًا أَغَارُوا عَلَى إِبِلِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَاسْتَاقُوهَا وَارْتَدُّوا عَنِ الإِسْلاَمِ وَقَتَلُوا رَاعِيَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مُؤْمِنًا فَبَعَثَ فِي آثَارِهِمْ فَأُخِذُوا فَقَطَعَ أَيْدِيَهُمْ وَأَرْجُلَهُمْ وَسَمَلَ أَعْيُنَهُمْ . قَالَ وَنَزَلَتْ فِيهِمْ آيَةُ الْمُحَارَبَةِ وَهُمُ الَّذِينَ أَخْبَرَ عَنْهُمْ أَنَسُ بْنُ مَالِكٍ الْحَجَّاجَ حِينَ سَأَلَهُ .
ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদল লোক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উট লুট করে নিয়ে যায়, ইসলাম ধর্মত্যাগ করে মুরতাদ হয়ে যায় এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর একজন ঈমানদার রাখালকে হত্যা করে। অতঃপর তিনি তাদের পিছনে লোক পাঠান! তাদের ধরে নিয়ে আসা হলে তিনি তাদের হাত-পা কেটে দেন এবং চোখ উপড়ে ফেলেন। ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এদের সম্পর্কে ‘মুহারাবার’ আয়াত (৫:৩৩) নাযিল হয়। হাজ্জাজ যখন আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে এদের সম্পর্কে প্রশ্ন করেন, তখন তিনি এদের সম্পর্কিত হাদীসটি বর্ণনা করেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، أخرجہ النسائي (4046)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عَبد الله بن عُبيد الله بن عمر بن الخطاب، وقد اختُلف عن أبي الزناد -وهو عبد الله بن ذكوان- في وصله وإرساله، وصله عنه سعيد بن أبي هلال، وأرسله محمَّد بن عجلان كما في الطريق الآتية بعده. عمرو: هو ابن الحارث. وأخرجه مختصراً النسائي في "الكبرى" (٣٤٩٠) من طريق ابن وهب، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ الْعَجْلاَنِ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَمَّا قَطَعَ الَّذِينَ سَرَقُوا لِقَاحَهُ وَسَمَلَ أَعْيُنَهُمْ بِالنَّارِ عَاتَبَهُ اللَّهُ تَعَالَى فِي ذَلِكَ فَأَنْزَلَ اللَّهُ تَعَالَى { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا } الآيَةَ .
আবূয-যিনাদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উট চুরি করেছিল তিনি তাদের হাত-পা কাটলে এবং আগুন দিয়ে তাদের চোখ উৎপাটন করলে আল্লাহ তাঁর প্রতি অসন্তুষ্ট প্রকাশ করেন এবং আয়াত নাযিল করেনঃ “ যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরূদ্ধে যুদ্ধ করে এবং পৃথিবীতে ধবংসাত্মক কাজ করে বেড়ায় তাদের শাস্তি এই যে, তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলীবিদ্ধ করা হবে....” (সূরাহ আল-মায়িদাহঃ ৩৩)। [৪৩৬৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4047) ، السند مرسل وابن عجلان عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، لكنه مرسل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٩١) عن أحمد بن عمر وبن السرح، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا ح، وَحَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سِيرِينَ، قَالَ كَانَ هَذَا قَبْلَ أَنْ تَنْزِلَ الْحُدُودُ يَعْنِي حَدِيثَ أَنَسٍ .
মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণিত হাদীসের ঘটনাটি ঘটেছিল আয়াত নাযিল হওয়ার পূর্বে। [৪৩৭০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (5686)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: أثر صحيح الإسناد. قتادة: هو ابن دعامة السدوسي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْذي. وأخرجه البخاري بإثر الحديث (٥٦٨٦) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ ثَابِتٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ حُسَيْنٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ يَزِيدَ النَّحْوِيِّ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ { إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ مِنْ خِلاَفٍ أَوْ يُنْفَوْا مِنَ الأَرْضِ } إِلَى قَوْلِهِ { غَفُورٌ رَحِيمٌ } نَزَلَتْ هَذِهِ الآيَةُ فِي الْمُشْرِكِينَ فَمَنْ تَابَ مِنْهُمْ قَبْلَ أَنْ يُقْدَرَ عَلَيْهِ لَمْ يَمْنَعْهُ ذَلِكَ أَنْ يُقَامَ فِيهِ الْحَدُّ الَّذِي أَصَابَهُ .
ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, “যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করে আর যমীনে অশান্তি সৃষ্টি করে বেড়ায়, তাদের শাস্তি হলোঃ তাদের হত্যা করা হবে অথবা শূলে চড়ানো হবে অথবা তাদের একদিকের হাত ও অপরদিকের পা কেটে ফেলা হবে অথবা যমীন হতে নির্বাসিত করা হবে, .....নিশ্চয়ই আল্লাহ ক্ষমাশীল ও করুণাময়” (সূরাহ আল-মায়িদাহঃ ৩৩-৩৪) আয়াত দু’টি মুশরিকদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। তবে তাদের মধ্যে কেউ যদি তাওবাহ করে ফিরে আসে তাকে নিয়ন্ত্রনে আনার পূর্বে তার উপর নির্ধারিত শাস্তি বাস্তবায়নে কোন বাধা থাকবে না।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (4051 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده حسن من أجل علي بن حُسين -وهو ابن واقد المروزي- فهو صدوق حسن الحديث. وقد حسَّن إسناد. الحافظ في "التلخيص" ٤/ ٧٢. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٣٤٩٥) من طريق علي بن الحسين بن واقد، بهذا الإسناد. وقد سلف ذكر اختلاف أهل العلم فيمن نزلت فيه هذه الآيات برقم (٤٣٦٦).
حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَوْهَبٍ الْهَمْدَانِيُّ، قَالَ حَدَّثَنِي ح، وَحَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ الثَّقَفِيُّ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ قُرَيْشًا، أَهَمَّهُمْ شَأْنُ الْمَرْأَةِ الْمَخْزُومِيَّةِ الَّتِي سَرَقَتْ فَقَالُوا مَنْ يُكَلِّمُ فِيهَا تَعْنِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . قَالُوا وَمَنْ يَجْتَرِئُ إِلاَّ أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ حِبُّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَكَلَّمَهُ أُسَامَةُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " يَا أُسَامَةُ أَتَشْفَعُ فِي حَدٍّ مِنْ حُدُودِ اللَّهِ " . ثُمَّ قَامَ فَاخْتَطَبَ فَقَالَ " إِنَّمَا هَلَكَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ أَنَّهُمْ كَانُوا إِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الشَّرِيفُ تَرَكُوهُ وَإِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الضَّعِيفُ أَقَامُوا عَلَيْهِ الْحَدَّ وَايْمُ اللَّهِ لَوْ أَنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ مُحَمَّدٍ سَرَقَتْ لَقَطَعْتُ يَدَهَا " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জনৈকা মাখযূমী মহিলার চুরি সংক্রান্ত অপরাধ কুরাইশদের দুশ্চিন্তাগ্রস্ত করে তুললে তারা বললো, এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সঙ্গে কে আলোচনা করবে? তারা বললো, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর প্রিয়পাত্র উসামাহ ইবনু যায়িদ-ই এ প্রসঙ্গে কথা বলতে সাহস করতে পারে। অতঃপর উসামাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট একথা বলাতে তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ হে উসামাহ! তুমি কি মহান আল্লাহর নির্ধারিত শাস্তি মওকুফের সুপারিশ করছো? অতঃপর তিনি ভাষণ দিতে দাঁড়িয়ে বলেনঃ তোমাদের পূর্ববর্তী জাতিরা এজন্য ধবংস হয়েছে যে, তাদের মধ্যকার মর্যাদাশীল কেউ চুরি করলে তারা তাকে ছেড়ে দিতো, আর তাদের দুর্বল কেউ চুরি করলে তার উপর শাস্তি বাস্তবায়িত করতো। আমি আল্লাহর কসম করে বলছি! মুহাম্মাদের কন্যা ফাত্বিমাহও যদি চুরি করতো, তাহলে অবশ্যই আমি তার হাত কাটতাম।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3732) صحیح مسلم (1688)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُروة: هو ابن الزبير بن العوَّام، وابن شهاب: هو محمَّد بن مسلم ابن شهاب الزهري، والليث: هو ابن سعد. وأخرجه البخاري (٣٤٧٥) و (٣٧٣٢) و (٣٧٣٣) و (٤٣٠٤) و (٦٧٨٧) و (٦٧٨٨)، ومسلم (١٦٨٨)، وابن ماجه (٢٥٤٧)، والترمذي (١٤٩٣)، والنسائي في "الكبرى" (٧٣٤١ - ٧٣٤٩) من طرق عن الزهري، به. إلا أن النسائي في الموضع الثاني قال: أتي النبيُّ ﷺ بسَارق، وهو مخالف لرواية الجماعة عن الزهري. وهو في "مسند أحمد" (٢٤١٣٨) و (٢٥٢٩٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٤٠٢). وانظر ما بعده. قال الخطابي: إنما أنكر عليه الشفاعة في الحد، لأنه إنما تشفع إليه بعد أن بلغ ذلك رسولَ الله ﷺ، وارتفعوا إليه فيه، فأما قبل أن يبلغ الإِمام فإن الشفاعة جائزة والستر على المذنبين مندوب إليه. وقد روي ذلك عن الزبير بن العوام وابن عباس، وهو مذهب الأوزاعي. وقال أحمد بن حنبل: تشفع في الحد ما لم يبلغ السلطان، وقال مالك بن أنس: من لم يُعرف بأذى الناس وإنما كانت تلك منه زلة، فلا بأس أن يُشفع له ما لم يبلغ الإِمام. وفيه دليل على أن القطع لا يزول عن السارق بأن يُوهب له المتاع، ولو كان ذلك مسقطاً عنه الحد لأشبه أن يطلب أسامة إلى المسروق منه أن يهبه منها، فيكون ذلك أعود عليها من الشفاعة.
حَدَّثَنَا عَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ، وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ كَانَتِ امْرَأَةٌ مَخْزُومِيَّةٌ تَسْتَعِيرُ الْمَتَاعَ وَتَجْحَدُهُ فَأَمَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِقَطْعِ يَدِهَا وَقَصَّ نَحْوَ حَدِيثِ اللَّيْثِ قَالَ فَقَطَعَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَدَهَا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَى ابْنُ وَهْبٍ هَذَا الْحَدِيثَ عَنْ يُونُسَ عَنِ الزُّهْرِيِّ وَقَالَ فِيهِ كَمَا قَالَ اللَّيْثُ إِنَّ امْرَأَةً سَرَقَتْ فِي عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةِ الْفَتْحِ . وَرَوَاهُ اللَّيْثُ عَنْ يُونُسَ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ بِإِسْنَادِهِ فَقَالَ اسْتَعَارَتِ امْرَأَةٌ . وَرَوَى مَسْعُودُ بْنُ الأَسْوَدِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم نَحْوَ هَذَا الْخَبَرِ قَالَ سُرِقَتْ قَطِيفَةٌ مِنْ بَيْتِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَرَوَاهُ أَبُو الزُّبَيْرِ عَنْ جَابِرٍ أَنَّ امْرَأَةً سَرَقَتْ فَعَاذَتْ بِزَيْنَبَ بِنْتِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, জনৈক মাখযুমী মহিলা জিনিসপত্র ধার নিয়ে পরে তা অস্বীকার করতো। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কাটার আদেশ দিলেন। অতঃপর লাইস বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ। বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কেটে দেন। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু ওয়াহব এ হাদীস ইউনুসের সূত্রে যুহরী হতে বর্ণনা করে বলেনঃ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মাক্কাহ বিজয়কালে জনৈক মহিলা চুরি করে। লাইস ইউনুসের সূত্রে এবং ইবনু শিহাব সূত্রে এ হাদীস বর্ণনা করে বলেন, জনৈক মহিলা ধার নিতো। মাস‘উদ ইবনুল আস্ওয়াদ নিজস্ব সানাদে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে এর সমার্থক হাদীস বর্ণনা করে বলেনঃ মহিলাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ঘর হতে একটি মখমলের চাদর চুরি করে। ইমাম আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবূয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন যে, জনৈক নারী চুরি করে। অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কন্যা যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাধ্যমে মুক্তি চায়। হাদীসের বাকি অংশে ধার নেয়া অথবা চুরি করার কথা উল্লেখ আছে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (3475، 3732) صحیح مسلم (1688)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وهو في "مصنف عبد الرزاق" (١٨٨٣٠)، ومن طريقه أخرجه مسلم (١٦٨٨). وأخرجه بهذا اللفظ أيضاً النسائي في "الكبرى" (٧٣٤٠) من طريق سفيان بن عيينة، عن أيوب بن موسى، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٢٩٧). وسيتكرر برقم (٤٣٩٧). وانظر ما قبله وما سيأتي برقم (٤٣٩٦). قال النووي في "شرح مسلم" ١١/ ١٥٦ تعليقاً على قوله: كانت تستعير المتاع وتجحده: وقد ذكر مسلم هذا الحديث في سائر الطرق المصرحة بأنها سرقت، وقطعت بسبب السرقة، فيتعين حمل هذه الرواية على ذلك جمعاً بين الروايات، فإنها قضية واحدة مع أن جماعة من الأئمة قالوا: هذه الرواية شاذة، فإنها مخالفة لجماهير الرواة، والشاذة لا يعمل بها، قال العلماء: وإنما لم يذكر السرقة في هذه الرواية، لأن المقصود عند الراوي ذكر منع الشفاعة في الحدود لا للإخبار عن السرقة، قال جماهير العلماء وفقهاء الأمصار: لا قطع على من جحد العارية، وتأولوا هذا الحديث بنحو ما ذكرته، وقال أحمد وإسحاق: يجب القطع في ذلك. وجاء في "المغني" ١٢/ ٤١٦ لابن قدامة: واختلفت الرواية عن أحمد في جحد العارية، فعنه عليه القطع وهو قول إسحاق لما روي عن عائشة أن امرأة كانت تستعير المتاع وتجحده … وعنه: لا قطع عليه، وهو قول الخرقي وأبي إسحاق بن شاقلا وأبي الخطاب وسائر الفقهاء وهو الصحيح إن شاء الله تعالى، لقول رسول الله ﷺ: "لا قطع على خائن".
حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ مُسَافِرٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ أَبِي فُدَيْكٍ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ زَيْدٍ، - نَسَبَهُ جَعْفَرٌ إِلَى سَعِيدِ بْنِ زَيْدِ بْنِ عَمْرِو بْنِ نُفَيْلٍ - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " أَقِيلُوا ذَوِي الْهَيْئَاتِ عَثَرَاتِهِمْ إِلاَّ الْحُدُودَ " .
‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা উত্তম গুণাবলীর অধিকারী লোকদের পদস্খলন (ছোটখাট ত্রুটি) এড়িয়ে যাও, হদ্দের অপরাধ ব্যতীত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3569)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث جيد بطرقه وشواهده كما أوضحناه في "مسند أحمد" (٢٥٤٧٤). وهذا إسناد اختلف فيه على ابن أبي فُديك كما بيناه هنا. وعبد الملك بن زيد -وهو ابن سعيد العدوي- مختلف فيه، لكنه لم ينفرد به. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٢٥٤) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن عبد الملك بن زيد المدني، عن محمَّد بن أبي بكر، عن أبيه، عن عمرة، عن عائشة، فزاد في إسناده أبا بكر بن محمَّد بن عمرو بن حزم. قال ابن حزم وقد أورد طرقه في "المحلى" ١١/ ٤٠٥: أحسنها كلها حديث عبد الرحمن بن مهدي، فهو جيد، والحجة به قائمة. وأخرجه النسائي أيضاً (٧٢٥٣) من طريق عطاف بن خالد عن عبد الرحمن بن محمَّد بن أبي بكر بن محمَّد، عن أبيه، عن عمرة، عن عائشة. لم يذكر أبا بكر ابن حزم. وقد بسطنا بيان شواهد هذا الحديث في "مسند أحمد" (٢٥٤٧٤). وأصحها حديث ابن عمر عند السهمي في "تاريخ جرجان" ص ١٦٤ بلفظ: "أقيلوا ذوي الهيئات عثراتهم" وإسناده حسن. قال الخطابي: قال الشافعي في تفسير ذي الهيئة: من لم يظهر منه ريبة. وفيه دليل على أن الإِمام مُخيَّر في التعزير، إن شاء عزّر وإن شاه ترك، ولو كان التعزير واجباً كالحد، لكان ذو الهيئة وغيره في ذلك سواء. وقال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٨٨: ويستفاد منه جواز الشفاعة فيما يقتضي التعزير، وقد نقل ابن عبد البر وغيره فيه الاتفاق.
حَدَّثَنَا سُلَيْمَانُ بْنُ دَاوُدَ الْمَهْرِيُّ، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، قَالَ سَمِعْتُ ابْنَ جُرَيْجٍ، يُحَدِّثُ عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " تَعَافَوُا الْحُدُودَ فِيمَا بَيْنَكُمْ فَمَا بَلَغَنِي مِنْ حَدٍّ فَقَدْ وَجَبَ " .
‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আমর ইবনুল ‘আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা আপসে তোমাদের মধ্যে সংঘটিত হদ্দ সংশ্লিষ্ট অপরাধ গোপন রাখো। অন্যথায় তা আমার নিকট পৌঁছালে তার শাস্তি বাস্তবায়িত হবেই।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4890) ، ابن جریج عنعن ، والحدیث الآتي (الأصل: 4394) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف. ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز المكي- مدلس وقد عنعن. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٣٣١) و (٧٣٣٢) من طريق ابن جريج، بهذا الإسناد. وله شاهد من حديث هزال الآتي بعده وهو حديث صحيح لغيره. وآخر من حديث صفوان بن أمية، سيأتي عند المصنف برقم (٤٣٩٤) وهو حديث صحيح بطرقه. وثالث من حديث علي بن أبي طالب عند أبي يعلى (٣٢٨). وفيه راوٍ لا يُعرف. وروي موقوفاً عليه عند ابن أبي شيبة ٩/ ٤٦٥ وفي إسناده انقطاع، وحسنه الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٨٨ ولم يصب. ورابع موقوف عند ابن أبي شيبة ٩/ ٤٦٨ عن عكرمة عن ابن عباس وعمار والزبير أنهم أخذوا سارقاً فخلَّوا سبيله، فقلت لابن عباس: بئسما صنعتم حين خليتم سبيله، فقال: لا أم لك، أما لو كنت أنت لسرّك أن يُخلَّى سبيلُك. وإسناده صحيح. وخامس عن الزبير وحده موقوفاً عليه أيضاً عند ابن أبي شيبة ٩/ ٤٦٤ - ٤٦٥ وإسناده حسن كما قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٨٧. وسادس موقوف كذلك عن أبي بكر الصديق عند ابن سعد في "الطبقات" ٥/ ١٣، وابن أبي شيبة ٩/ ٤٦٧ قال: لو أخذت سارقاً لأحببت أن يستره الله. وإسناده صحيح كما قال الحافظ في "الإصابة" ٢/ ٦٢٩. كما يشهد له عموم قوله ﷺ: "من ستر مسلماً ستره الله يوم القيامة" وسيأتي عند المصنف برقم (٤٨٩٣) وهو في "الصحيحين".
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ نُعَيْمٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ مَاعِزًا، أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَقَرَّ عِنْدَهُ أَرْبَعَ مَرَّاتٍ فَأَمَرَ بِرَجْمِهِ وَقَالَ لِهَزَّالٍ " لَوْ سَتَرْتَهُ بِثَوْبِكَ كَانَ خَيْرًا لَكَ " .
ইয়াযীদ ইবনু সু’আইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, মাঈয নামক জনৈক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে চারবার (যেনার কথা) স্বীকার করে। সুতরাং তিনি তাকে পাথর মেরে হত্যা করার আদেশ দেন। আর তিনি হাযযালকে বলেন, তুমি যদি এটা তোমার কাপড় দিয়ে ঢেকে রাখতে, তাহলে তোমার কল্যাণ হতো। [৪৩৭৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3567) ، روایۃ یحیی بن سعید القطان عن سفیان الثوري محمولۃ علی السماع
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن. نعيم بن هزال بن يزيد مختلف في صحته، وقد روى عنه ابنه يزيد ومحمد بن المنكدر، وذكره ابن حبان في "الثقات". وابنه يزيد صدوق حسن الحديث. سفيان: هو الثوري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٢٣٤) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه أيضاً (٧٢٣٥) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمَّد بن المنكدر، عن ابن هزال -وهو نُعيم- عن أبيه. وهو في "مسند أحمد" (٢١٨٩٠ - ٢١٨٩٥) وانظر تمام تخريجه وتفصيل طرقه هناك. وانظر ما سيأتي برقم (٤٤١٨). ويشهد له مرسل سعيد بن المسيب عند مالك في "الموطأ" ٢/ ٨٢١، ومن طريقه النسائي "الكبرى" (٧٢٣٧). ومراسيل ابن المسيب حجة عند أكثر أهل العلم. وفي باب ستر المسلم عدة أحاديث، منها: حديث عبد الله بن عمر الآتي عند المصنف برقم (٤٨٩٣). وحديث أبي هريرة عند مسلم (٢٦٩٩) وأحاديث غيرها انظرها في "مسند أحمد" (٢١٨٩٠). وانظر ما بعده. وهزَّال: أسلمي له صحبة، سكن المدينة، وكان مالك أبو ماعز قد أوصى هزالاً بابنه ماعز، وكان في حجره يكفله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنِ ابْنِ الْمُنْكَدِرِ، أَنَّ هَزَّالاً، أَمَرَ مَاعِزًا أَنْ يَأْتِيَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَيُخْبِرَهُ .
ইবনুল মুনকাদির (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, হাযযাল মাঈযকে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে (তার অপরাধের কথা) তাঁকে অবহিত করতে আদেশ দেন। [৪৩৭৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، مشکوۃ المصابیح (3567) ، انظر الحدیث السابق (4377)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد سمعه محمَّد بن المنكدر من نعيم بن هزال. يحيى: هو ابن سعيد الأنصاري. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٢٣٦) من طريق عبد الله بن المبارك، عن يحيى ابن سعيد الأنصاري، به. وأخرجه أيضاً (٧٢٣٥) من طريق شعبة بن الحجاج، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمَّد بن المنكدر، عن نعيم بن هزال، عن أبيه. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى بْنِ فَارِسٍ، حَدَّثَنَا الْفِرْيَابِيُّ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا سِمَاكُ بْنُ حَرْبٍ، عَنْ عَلْقَمَةَ بْنِ وَائِلٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ امْرَأَةً، خَرَجَتْ عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم تُرِيدُ الصَّلاَةَ فَتَلَقَّاهَا رَجُلٌ فَتَجَلَّلَهَا فَقَضَى حَاجَتَهُ مِنْهَا فَصَاحَتْ وَانْطَلَقَ فَمَرَّ عَلَيْهَا رَجُلٌ فَقَالَتْ إِنَّ ذَاكَ فَعَلَ بِي كَذَا وَكَذَا وَمَرَّتْ عِصَابَةٌ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ فَقَالَتْ إِنَّ ذَلِكَ الرَّجُلَ فَعَلَ بِي كَذَا وَكَذَا . فَانْطَلَقُوا فَأَخَذُوا الرَّجُلَ الَّذِي ظَنَّتْ أَنَّهُ وَقَعَ عَلَيْهَا فَأَتَوْهَا بِهِ فَقَالَتْ نَعَمْ هُوَ هَذَا . فَأَتَوْا بِهِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا أَمَرَ بِهِ قَامَ صَاحِبُهَا الَّذِي وَقَعَ عَلَيْهَا فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنَا صَاحِبُهَا . فَقَالَ " اذْهَبِي فَقَدْ غَفَرَ اللَّهُ لَكِ " . وَقَالَ لِلرَّجُلِ قَوْلاً حَسَنًا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ يَعْنِي الرَّجُلَ الْمَأْخُوذَ وَقَالَ لِلرَّجُلِ الَّذِي وَقَعَ عَلَيْهَا " ارْجُمُوهُ " . فَقَالَ " لَقَدْ تَابَ تَوْبَةً لَوْ تَابَهَا أَهْلُ الْمَدِينَةِ لَقُبِلَ مِنْهُمْ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ أَسْبَاطُ بْنُ نَصْرٍ أَيْضًا عَنْ سِمَاكٍ .
‘আলক্বামাহ ইবনু ওয়াইল (রাহিমাহুল্লাহ) হতে তার পিতা হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে জনৈকা মহিলা সলাত আদায়ের উদ্দেশে যাচ্ছিল। পথিমধ্যে এক ব্যক্তি তাকে নাগালে পেয়ে তার উপর চেপে বসে তাকে ধর্ষণ করে। সে চিৎকার দিলে লোকটি সরে পড়ে। এ সময় অপর এক ব্যক্তি তার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। সে (ভুলবশত) বললো, এ লোকটি আমার সঙ্গে এরূপ করেছে। এ সময় মুহাজিরদের একটি দল এ পথ দিয়ে যাচ্ছিলেন। স্ত্রীলোকটি বললো, এ লোকটি আমার সঙ্গে এরূপ করেছে। অতএব যার সম্পর্কে মহিলাটি অভিযোগ করেছে তারা দ্রুত এগিয়ে লোকটিকে ধরলো। অতঃপর তারা তাকে তার নিকট নিয়ে আসলে সে বললো, হাঁ, এ সেই ব্যক্তি। তারা তাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট উপস্থিত হলেন। তিনি তার সম্পর্কে ফায়সালা করতেই আসল অপরাধী দাঁড়িয়ে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমিই অপরাধী। তিনি ধর্ষিতা মহিলাটিকে বললেনঃ তুমি চলে যাও, আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করেছেন আর নির্দোষ ব্যক্তি সম্পর্কে উত্তম কথা বললেন। যে ধর্ষণের অপরাধী তার ব্যাপারে তিনি বললেনঃ তোমরা একে পাথর মারো। তিনি (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ সে এমন তাওবাহ করেছে যে, মাদীনাহবাসী যদি এরূপ তাওবাহ করে, তবে তাদের পক্ষ হতে তা অবশ্যই কবুল হবে। [৪৩৭৮]
হাসান, এ কথাটি বাদেঃ “তোমরা একে পাথর মারো।” অগ্রাধিকারযোগ্য কথা হলো, তাকে পাথর মারা হয়নি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن دون قوله ارجموه والأرجح أنه لم يرجم
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، مشکوۃ المصابیح (3572) ، أخرجہ الترمذي (1454 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات لكن سماك بن حرب تفرد به، ولا يُحتمل تفرّد مثله، ثم إنه قد اضطرب في متنه. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والفريابي: هو محمَّد بن يوسف. وأخرجه الترمذي (١٥٢٠) عن محمَّد بن يحيى النيسابوري، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث حسن غريب صحيح! وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٧٢٧٠) من طريق أسباط بن نصر، عن سماك، به. غير أنه قال في روايته: فقال عمر: أرجُم الذي اعترف بالزنى؟ فأبى رسولُ الله ﷺ قال: "لا، إنه قد تاب إلى الله". وجاء عند غيره من رواية أسباط: فقالوا: أنرجمه؟ فقال: "لقد تاب توبة لو تابها أهل المدينة قبل منهم". وقد أورده البيهقي من هذا الوجه الثاني الذي فيه أنه ﷺ لم يرجمه ثم قال: وقد وُجد مثل اعترافه من ماعز والجهنية والغامدية، ولم يسقط حدودهم، وأحاديثهم أكثر وأشهر، والله أعلم. وكذا أورده الذهبي من هذا الوجه الثاني في "تذكرة الحفاظ" ٣/ ٩١٧: وقال: وهذا حديث منكر جداً على نظافة إسناده. وهو في "مسند أحمد" (٢٧٢٤٠) عن محمَّد بن عبد الله بن الزبير، عن إسرائيل. ولفظه كلفظ رواية أسباط.
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا حَمَّادٌ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، عَنْ أَبِي الْمُنْذِرِ، مَوْلَى أَبِي ذَرٍّ عَنْ أَبِي أُمَيَّةَ الْمَخْزُومِيِّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أُتِيَ بِلِصٍّ قَدِ اعْتَرَفَ اعْتِرَافًا وَلَمْ يُوجَدْ مَعَهُ مَتَاعٌ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَا إِخَالُكَ سَرَقْتَ " . قَالَ بَلَى . فَأَعَادَ عَلَيْهِ مَرَّتَيْنِ أَوْ ثَلاَثًا فَأَمَرَ بِهِ فَقُطِعَ وَجِيءَ بِهِ فَقَالَ " اسْتَغْفِرِ اللَّهَ وَتُبْ إِلَيْهِ " . فَقَالَ أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ فَقَالَ " اللَّهُمَّ تُبْ عَلَيْهِ " . ثَلاَثًا . قَالَ أَبُو دَاوُدَ رَوَاهُ عَمْرُو بْنُ عَاصِمٍ عَنْ هَمَّامٍ عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ عَنْ أَبِي أُمَيَّةَ رَجُلٍ مِنَ الأَنْصَارِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم .
আবূ উমাইয়্যাহ আল-মাখযূমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট একটি চোর ধরে আনা হলো। সে অপরাধের কথা স্বীকার করেছে কিন্তু তার নিকট কোন মাল পাওয়া যায়নি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমার মনে হয় তুমি চুরি করোনি। সে বললো, হ্যাঁ, আমি চুরি করেছি। তিনি দু’বার অথবা তিনবার তার নিকট একথার পুনরাবৃত্তি করলেন, কিন্তু সে বরাবর একই উত্তর দিলো। অতঃপর তিনি আদেশ করলে তার হাত কেটে আনা হলে তিনি বললেনঃ আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করো এবং তাঁর নিকট তাওবাহ করো। সে বললো, আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাচ্ছি এবং তাওবাহ করছি। অতঃপর তিনি তিনবার বলেনঃ হে আল্লাহ! তুমি তাঁর তাওবাহ কবুল করো। [৪৩৭৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (4881) ابن ماجہ (2597) ، أبو المنذر لایعرف (میزان الإعتدال 4 / 577) ، (انوار الصحیفہ ص 155)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي المنذر مولى أبي ذر فلم يرو عنه غير إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة. حماد: هو ابن سلمة. وأخرجه ابنُ ماجه (٢٥٩٧)، والنسائي في "الكبرى" (٧٣٢٢) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٥٠٨). وله شاهد من حديث أبي هريرة عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ١٦٨، والدارقطني (٣١٦٣)، والحاكم ٤/ ٣٨١، والبيهقي ٨/ ٢٧١، وقد اختلف في وصله وإرساله كما بينه أبو الطيب العظيم آبادي في تعليقه على "سنن الدارقطني" ونقل عن ابن القطان أنه صحح الحديث، قلنا: لكن قال الدارقطني في "العلل" ١٠/ ٦٥ - ٦٧: والمرسل أصح. ويشهد للتلقين في الحد أيضاً حديث ابن عباس عند البخاري (٦٨٢٤) قال: لما أتى ماعز بن مالك النبي ﷺ قال له: "لعلك قبّلت أو غمزت أو نظرت، وسيأتي عند المصنف برقم (٤٤٢٧). وحديث جابر بن سمرة الآتي عند المصنف أيضاً برقم (٤٤٢٢) بنحو لفظ رواية ابن عباس. وحديث بريدة الأسلمي عند مسلم (١٦٩٥) في قصة ماعز، وفيه: فقال: "ويحك ارجع فاستغفر الله وتب" أعادها عليه ثلاثاً. قال الخطابي: وجه هذا الحديث عندي -والله أعلم- أنه ظن بالمعترف بالسرقة غفلة، أو يكون قد ظن أنه لا يعرف معنى السرقة، ولعله قد كان مالاً له أو اختلسه، أو نحو ذلك مما يخرج من هذا الباب عن معاني السرقة، والمعترف به قد يحسب أن حكم ذلك حكم السرقة، فوافقه رسولُ الله ﷺ، واسثبت الحكم فيه، إذ كان من سنته أن الحدود تُدرأ بالشبهات، وروي عنه أنه قال: "ادرؤوا الحدود ما استطعتم" وأمرنا بالستر على المسلمين، فكره أن يهتكه وهو يجد السبيل إلى ستره، فلما تين وجود السرقة منه يقيناً أقام الحد عليه وأمر بقطعه. وقال الخطابي أيضاً: وقد روي تلقين السارق عن جماعة من الصحابة، وأتي عمر بن الخطاب ﵁ برجل فسأله أسرقت؟ قل: لا، قال: فقال: لا، فتركه ولم يقطعه. وروي مثل ذلك عن أبي الدرداء وأبي هريرة ﵄. وكان أحمد وإسحاق لا يريان بأساً بتلقين السارق إذا أتي به، وكذلك قال أبو ثور: إذا كان السارق امرأة أو مصعوقاً.