হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (2081)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ بُكَيْرٍ حَدَّثَنَا ابْنُ لَهِيعَةَ عَنْ مُوسَى بْنِ أَيُّوبَ الْغَافِقِيِّ عَنْ عِكْرِمَةَ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ أَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَجُلٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللهِ إِنَّ سَيِّدِي زَوَّجَنِي أَمَتَهُ وَهُوَ يُرِيدُ أَنْ يُفَرِّقَ بَيْنِي وَبَيْنَهَا قَالَ فَصَعِدَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم الْمِنْبَرَ فَقَالَ يَا أَيُّهَا النَّاسُ مَا بَالُ أَحَدِكُمْ يُزَوِّجُ عَبْدَهُ أَمَتَهُ ثُمَّ يُرِيدُ أَنْ يُفَرِّقَ بَيْنَهُمَا إِنَّمَا الطَّلَاقُ لِمَنْ أَخَذَ بِالسَّاقِ




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকটে এসে বললো, হে আল্লাহ্‌র রসূল! আমার মনিব তাঁর বাদীকে আমার সাথে বিবাহ দিয়েছে। এখন সে আমার আর আমার স্ত্রীর মধ্যে বিবাহ বিচ্ছেদ ঘটাতে চায়। রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে আরোহণ করলেন, অতঃপর বললেন, হে লোকসকল! তোমাদের কারো এরূপ আচরণ কেন করো যে, সে তার গোলামের সাথে তার বাদীর বিবাহ দেয়, অতঃপর তাদের বিবাহ বিচ্ছেদ ঘটাতে চায়? নারীর ঊরু স্পর্শ করা যার জন্য বৈধ, তালাকের অধিকার তার। [২০৮১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، قال البوصیري: ’’ ھذا إسناد ضعیف لضعف ابن لھیعۃ ‘‘، ، وللحدیث شواھد ضعیفۃ، (انوار الصحیفہ ص 453)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف ابن لهيعة -وهو عبد الله- ولكنه متابع. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (١١٨٠٠) عن محمَّد بن عبد الله الحضرمي ومحمد بن عثمان بن أبي شيبة -وكلاهما حافظ- عن يحيى الحِمّاني، عن يحيى بن يعلى الأسلمي والدارقطني (٣٩٩١) من طريق أبي عتبة أحمد بن الفرج، عن بقية بن الوليد، عن أبي الحجاج المهري، كلاهما عن موسى بن أيوب، به وهذه المتابعات -وإن كانت ضعيفة- إذا انضمت إلى رواية ابن لهيعة ارتقى الحديثُ إلى رُتبة الحسن. وأخرجه الدارقطني (٣٩٩٢)، ومن طريقه البيهقي ٧/ ٣٦٠ من طريق موسى بن داود، عن ابن لهيعة، عن موسى بن أيوب، عن عكرمة، مرسلًا. قوله: "الطلاق لمن أخذ بالساق"، قال السندي: أي: الطلاق حق الزوج الذي له أن يأخذ بساق المرأة، لا حق المولى.









সুনান ইবনু মাজাহ (2082)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ زَنْجَوَيْهِ أَبُو بَكْرٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ عَنْ عُمَرَ بْنِ مُعَتِّبٍ عَنْ أَبِي الْحَسَنِ مَوْلَى بَنِي نَوْفَلٍ قَالَ سُئِلَ ابْنُ عَبَّاسٍ عَنْ عَبْدٍ «طَلَّقَ امْرَأَتَهُ تَطْلِيقَتَيْنِ ثُمَّ أُعْتِقَا يَتَزَوَّجُهَا قَالَ نَعَمْ فَقِيلَ لَهُ عَمَّنْ قَالَ قَضَى بِذَلِكَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم».
قَالَ عَبْدُ الرَّزَّاقِ قَالَ عَبْدُ اللهِ بْنُ الْمُبَارَكِ لَقَدْ تَحَمَّلَ أَبُو الْحَسَنِ هَذَا صَخْرَةً عَظِيمَةً عَلَى عُنُقِهِ.




বানূ নাওফালের মুক্ত দাস আবূল হাসান (মাকবুল) হতে বর্ণিত, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে একটি গোলাম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হল যে, সে তার স্ত্রীকে দু’তালাক দিয়েছে, পরে তাদের উভয়কে দাসত্বমুক্ত করা হয়েছে, সে কি তাকে বিবাহ করতে পারে? তিনি বলেন, হাঁ। অতঃপর তাকে জিজ্ঞেস করা হল আপনি কার বরাতে বলছেন? তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুরূপ ফয়সালা দিয়েছেন। আব্দুর রাযযাক বলেন, আবদুল্লাহ বিন মুবারাক বলেছেন, আবুল হাসান যে মস্তবড় পাথর তার গর্দানে চাপিয়ে নিয়েছে। [২০৮২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (2187) نسائي (3457،3458(، (انوار الصحیفہ ص 453)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف عمر بن مُعتِّب. وأخرجه أبو داود (٢١٨٧) و (٢١٨٨)، والنسائي ٦/ ١٥٤ و١٥٥ من طريق يحيى بن أبي كثير، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣١). وقال أبو داود: ليس العمل على هذا الحديث. وقول ابن المبارك: لقد تحمل أبو الحسن … يريد به إنكار ما جاء في هذا الحديث. وقال البيهقي في "سننه" ٧/ ٣٧٠ - ٣٧١: وعامة الفقهاء على خلاف ما رواه عمر بن معتب.









সুনান ইবনু মাজাহ (2083)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي عَرُوبَةَ عَنْ مَطَرٍ الْوَرَّاقِ عَنْ رَجَاءِ بْنِ حَيْوَةَ عَنْ قَبِيصَةَ بْنِ ذُؤَيْبٍ عَنْ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ قَالَ لَا تُفْسِدُوا عَلَيْنَا سُنَّةَ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم عِدَّةُ أُمِّ الْوَلَدِ أَرْبَعَةُ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, তোমরা আমাদের সামনে আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাম্মাদ রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সুন্নাতকে বিপর্যস্ত করো না। উম্মুল ওয়ালাদের ইদ্দত চারমাস দশ দিন। [২০৮৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن. مطر الوراق حديثه حسن في المتابعات والشواهد وهذا منها، وباقي رجاله ثقات، وقول الدارقطني في "سننه": قبيصة لم يسمع من عمرو ابن العاص فيه نظر، فإن سماعه منه محتمل، فإن قبيصة ولد عام الفتح، وتوفي عمرو بن العاص سنة اثنتين وستين، فكان سن قبيصة سنة وفاة عمرو إحدى وخمسين سنة، ثم إن قبيصة قد سكن الشام، وكذلك عمرو قد أقام بالشام بعد الفتوحات كثيرًا، وعليه فسماعه منه محتمل إقامة ومعاصرة. وأخرجه أبو داود (٢٣٠٨) من طريق مطر الوراق، بهذا الإسناد. وأخرجه الدارقطي (٣٨٣٧)، والبيهقي ٧/ ٤٤٧ - ٤٤٨ من طريق يزيد بن زريع، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة ومطر، به. وأخرجه موقوفًا الدارقطني (٣٨٤١)، والبيهقي ٧/ ٤٤٨ من طريق سليمان بن موسى، عن رجاء بن حيوة، أن قبيصة بن ذؤيب حدثه، أن عمرو بن العاص قال: عدة أم الولد إذا توفي عنها سيدها أربعة أشهر وعشرًا، وإذا أعتقت، فعدتها ثلاث حيض. قال الدارقطي: موقوف وهو الصواب. وهو في "مسند أحمد" (١٧٨٠٣)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٠٠). وفي الباب عن علي عند ابن أبي شيبة ٥/ ١٦٣ - ١٦٤. والقول بأن أم الولد تعتد عدة الوفاة أربعة أشهر وعشرًا هو مذهب سعيد بن المسيب وأبي عياض وابن سيرين وسعيد بن جبير ومجاهد، وخلاس بن عمرو، وعمر بن عبد العزيز والزهري ويزيد بن عبد الملك والأوزاعي وإسحاق، وهو رواية عن أحمد. انظر "المغني" ١١/ ٢٦٢ - ٢٦٣ لابن قدامة.









সুনান ইবনু মাজাহ (2084)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ أَنْبَأَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ عَنْ حُمَيْدِ بْنِ نَافِعٍ أَنَّهُ سَمِعَ زَيْنَبَ ابْنَةَ أُمِّ سَلَمَةَ تُحَدِّثُ أَنَّهَا سَمِعَتْ أُمَّ سَلَمَةَ وَأُمَّ حَبِيبَةَ تَذْكُرَانِ أَنَّ امْرَأَةً أَتَتْ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ إِنَّ ابْنَةً لَهَا تُوُفِّيَ عَنْهَا زَوْجُهَا فَاشْتَكَتْ عَيْنُهَا فَهِيَ تُرِيدُ أَنْ تَكْحَلَهَا فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ كَانَتْ إِحْدَاكُنَّ تَرْمِي بِالْبَعْرَةِ عِنْدَ رَأْسِ الْحَوْلِ وَإِنَّمَا هِيَ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا




যায়নাব বিনতু উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি উম্মু সালামাহ ও উম্মু হাবিবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে বলতে শুনেছেন, এক স্ত্রীলোক রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে বলল, আমার মেয়ের স্বামী মারা গেছে। এখন তার চোখে অসুখ দেখা দিয়েছে, তাই সে তার চোখে সুরমা লাগাতে চায়। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমাদের অবস্থা এরূপ ছিল যে, কোন নারী এক বছর পূর্ণ হলে পর গোবর ছিটিয়ে ইদ্দত সমাপ্ত করতো। এখন তা কেবল চার মাস দশ দিন। [২০৮৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري الفقيه المشهور. وأخرجه البخاري (٥٣٣٦) و (٥٣٣٨)، ومسلم (١٤٨٨)، وأبو داود (٢٢٩٩)، والترمذي (١٢٣٦)، والنسائي ٦/ ١٨٨ و٢٠١ - ٢٥٢ و٢٠٥ - ٢٠٦ و ٢٠٦ من طريق حميد بن نافع، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٥٠١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٠٤). وانظر أقوال أهل العلم في حكم اكتحالِ المعتدة للوفاة إذا كان للزينة أو للتداوي في "الاستذكار" ١٨/ ٢٣٠ - ٢٣٥.









সুনান ইবনু মাজাহ (2085)


- حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ عَنْ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لَا يَحِلُّ لِامْرَأَةٍ أَنْ تُحِدَّ عَلَى مَيِّتٍ فَوْقَ ثَلَاثٍ إِلَّا عَلَى زَوْجٍ




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, কোন নারীর জন্য স্বামী ব্যতীত অপর কারো মৃত্যুতে তিন দিনের অধিক রূপচর্চা বর্জন (বা শোক পালন) করা বৈধ নয়। [২০৮৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٤٩١)، والنسائي ٦/ ١٩٨ من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠٩٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٠٣). وأخرجه مسلم (١٤٩٠) من طريق الليث بن سعد وعبد الله بن دينار، عن نافع، عن صفية بنت أبي عبيد، عن حفصة أو عن عائشة -على الشك- أو عن كليهما وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٥٥) و (٢٦٤٥٦) من طريق الليث وعبد الله بن دينار، و (٢٦٤٥٤) عن ابن مهدي، عن مالك، ثلاثتهم عن نافع، به. وانظر ما بعده.









সুনান ইবনু মাজাহ (2086)


حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ حَدَّثَنَا أَبُو الْأَحْوَصِ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ نَافِعٍ عَنْ صَفِيَّةَ بِنْتِ أَبِي عُبَيْدٍ عَنْ حَفْصَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَا يَحِلُّ لِامْرَأَةٍ تُؤْمِنُ بِاللهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ أَنْ تُحِدَّ عَلَى مَيِّتٍ فَوْقَ ثَلَاثٍ إِلَّا عَلَى زَوْجٍ




নাবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর স্ত্রী হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে নারী আল্লাহ ও আখিরাতের দিনের উপর ঈমান রাখে, তার জন্য স্বামী ব্যতীত অন্য কারো মৃত্যুতে তিন দিনের অধিক রূপচর্চা বর্জন করা (বা শোক পালন করা) বৈধ নয়। [২০৮৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو الأحوص: هو سَلام بن سُليم الحنفي، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري. وأخرجه مسلم (١٤٩٠)، والنسائي ٦/ ١٨٩ من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد. وزادا: "فإنها تُحِد عليه أربعة أشهر وعشرًا". وهو في "مسند أحمد" (٢٦٤٥٢). وانظر ما قبله.









সুনান ইবনু মাজাহ (2087)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ نُمَيْرٍ عَنْ هِشَامِ بْنِ حَسَّانَ عَنْ حَفْصَةَ عَنْ أُمِّ عَطِيَّةَ قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم «لَا تُحِدُّ عَلَى مَيِّتٍ فَوْقَ ثَلَاثٍ إِلَّا امْرَأَةٌ تُحِدُّ عَلَى زَوْجِهَا أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا وَلَا تَلْبَسُ ثَوْبًا مَصْبُوغًا إِلَّا ثَوْبَ عَصْبٍ وَلَا تَكْتَحِلُ وَلَا تَطَيَّبُ إِلَّا عِنْدَ أَدْنَى طُهْرِهَا بِنُبْذَةٍ مِنْ قُسْطٍ أَوْ أَظْفَارٍ




উম্মু আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন নারী মৃত ব্যক্তির জন্য তিন দিনের অধিক শোক পালন করবে না। তবে স্বামীর মৃত্যুতে স্ত্রী চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে। সে রঙ্গিন বস্ত্র পরিধান করবে না, তবে ইয়ামানের বিশেষ ধরনের রঙ্গীন চাদর পরতে পারবে। সুরমা ও সুগন্ধি ব্যবহার করবে না, তবে হায়িদ থেকে পবিত্র হওয়ার সময় গোসলের বেলায় সামান্য কস্তূরী ও চন্দন ব্যবহার করতে পারবে। [২০৮৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. حفصة: هي بنت سيرين أخت محمَّد. وأخرجه البخاري (٣١٣) و (٥٣٤٣)، ومسلم بإثر (١٤٩١): (٦٦) و (٦٧)، وأبو داود (٢٣٠٢) و (٢٣٠٣)، والنسائي ٦/ ٢٠٢ - ٢٠٣ و ٢٠٦ من طريق حفصة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٧٩٤)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٠٥). قوله: "ثوب عَصْبِ" قال السندي: بفتح فسكون: هو برود يمنية يُعصَبُ بها غزلها، أي: يُربط ثم يصبغ وينسج، فيبقى ما عُصِب أبيض لم يأخذه صبغ. وقيل: برود مخططة، قيل: على الأول يكون النهي للمعتدة عما صبغ بعد النسج. قلت (القائل السندي): والأقرب أن النهي عما صبغ كله، فإن الإضافة إلى العصب تقتضي ذلك، فإن عمله منع الكل عن الصبغ، فتأمل. أدنى طهرها: أول طهرها. نَبْذة: هو القليل من الشيء. قُسْط: قال النووي: القُسط والأظفار معروفان من البخور، رخص فيهما لإزالة الرائحة الكريهة لا للتطيب، والله أعلم.









সুনান ইবনু মাজাহ (2088)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ وَعُثْمَانُ بْنُ عُمَرَ قَالَا حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ عَنْ خَالِهِ الْحَارِثِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ حَمْزَةَ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ قَالَ كَانَتْ تَحْتِي امْرَأَةٌ وَكُنْتُ أُحِبُّهَا وَكَانَ أَبِي يُبْغِضُهَا فَذَكَرَ ذَلِكَ عُمَرُ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَأَمَرَنِي أَنْ أُطَلِّقَهَا فَطَلَّقْتُهَا




আবদুল্লাহ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার এক স্ত্রী ছিল। তাকে আমি খুব ভালবাসতাম। কিন্তু আমার পিতা তার প্রতি অসন্তুষ্ট ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছে উল্লেখ করেন। তিনি তাকে তাকে তালাক দেওয়ার জন্য আমাকে নির্দেশ দেন। অতএব আমি তাকে তালাক দিলাম। [২০৮৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده قوي. الحارث بن عبد الرحمن خال ابن أبي ذئب صدوق لا بأس به. عثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي. وأخرجه أبو داود (٥١٣٨)، والترمذي (١٢٢٦)، والنسائي في "الكبرى" (٥٦٣١) من طريق ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٥٠١١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٢٦) و (٤٢٧).









সুনান ইবনু মাজাহ (2089)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ عَطَاءِ بْنِ السَّائِبِ عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ أَنَّ رَجُلًا أَمَرَهُ أَبُوهُ أَوْ أُمُّهُ شَكَّ شُعْبَةُ أَنْ يُطَلِّقَ امْرَأَتَهُ فَجَعَلَ عَلَيْهِ مِائَةَ مُحَرَّرٍ فَأَتَى أَبَا الدَّرْدَاءِ فَإِذَا هُوَ يُصَلِّي الضُّحَى وَيُطِيلُهَا وَصَلَّى مَا بَيْنَ الظُّهْرِ وَالْعَصْرِ فَسَأَلَهُ فَقَالَ أَبُو الدَّرْدَاءِ أَوْفِ بِنَذْرِكَ وَبِرَّ وَالِدَيْكَ وَقَالَ أَبُو الدَّرْدَاءِ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ الْوَالِدُ أَوْسَطُ أَبْوَابِ الْجَنَّةِ فَحَافِظْ عَلَى وَالِدَيْكَ أَوْ اتْرُكْ




আবুদ দারদা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যক্তিকে তার পিতা অথবা তার মা তার স্ত্রীকে তালাক দেয়ার নির্দেশ দেয়। এদিকে সে শপথ করে বললো যে, সে তার স্ত্রীকে তালাক দিলে তাকে এক শত গোলাম দাসত্বমুক্ত করতে হবে। এমতাবস্থায় সে আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট হাযির হল। তখন তিনি চাশতের সালাত পড়ছিলেন এবং তিনি তা দীর্ঘায়িত করেন। আর যোহর ও আসরের মাঝে ও তিনি সালাত পড়তেন। লোকটি তাকে তার ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলে আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তোমার মানত পূর্ণ করো এবং তোমার পিতা-মাতার হুকুমও পালন করো। আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছিঃ পিতা হচ্ছে জান্নাতের উত্তম দরজা। অতএব তুমি তোমার পিতা-মাতার অধিকার সংক্ষণ করো কিংবা ত্যাগ করো। [২০৮৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح.شعبة سمع من عطاء بن السائب قبل الاختلاط. وأخرجه الترمذي (٢٥٠٨) من طريق سفيان بن عيينة، عن عطاء بن السائب، بهذا الإسناد. وسفيان أيضًا سمع من عطاء قبل الاختلاط. وسيأتي من هذا الطريق برقم (٣٦٦٣). وهو في "مسند أحمد" (٢١٧١٧) و (٢٧٥٥٢)، و"صحيح ابن حبان" (٤٢٥).









সুনান ইবনু মাজাহ (2090)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُصْعَبٍ عَنْ الْأَوْزَاعِيِّ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ عَنْ هِلَالِ بْنِ أَبِي مَيْمُونَةَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ عَنْ رِفَاعَةَ الْجُهَنِيِّ قَالَ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم إِذَا حَلَفَ قَالَ وَالَّذِي نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِيَدِهِ




রিফাআহ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শপথ করলে বলতেনঃ সেই সত্তার শপথ যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ। [২০৯০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. محمَّد بن مُصعب -وهو القَرقَساني، وإن كان ضعيفًا- قد توبع، وقد ذكر الإمام أحمد أن حديثه عن الأوزاعي مقارب. وأخرجه ابن أبي شيبة (٣٠) الجزء الذي نشره العمروي، وعنه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٥٦١). وأخرجه الطبراني في "الكبير" (٤٥٥٦)، ومن طريقه المزي في ترجمة رفاعة ابن عرابة من "تهذيب الكمال" ٩/ ٢٠٧ - ٢٠٨ عن محمَّد بن سهل بن المهاجر، كلاهما (ابن أبي شيبة ومحمد بن سهل) عن محمَّد بن مصعب، بهذا الإسناد. ورواياتهم غير ابن أبي شيبة مطولة. وأخرجه مطولًا أحمد (١٦٢١٦)، وابن حبان (٢١٢)، والطبراني (٤٥٥٦)، والبيهقي في "الشعب" (٤٠٤) من طرق عن الأوزاعي، به. وأخرجه مطولًا الطبراني (٤٥٥٧) من طريق أبان بن يزيد، عن يحيى بن أبي كثير، به. وانظر تتمة تخريجه في "المسند". وانظر ما بعده.









সুনান ইবনু মাজাহ (2091)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ مُحَمَّدٍ الصَّنْعَانِيُّ حَدَّثَنَا الْأَوْزَاعِيُّ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ عَنْ هِلَالِ بْنِ أَبِي مَيْمُونَةَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ عَنْ رِفَاعَةَ بْنِ عَرَابَةَ الْجُهَنِيِّ قَالَ كَانَتْ يَمِينُ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم الَّتِي يَحْلِفُ بِهَا أَشْهَدُ عِنْدَ اللهِ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ




রিফাআহ বিন আরাবাহ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে শব্দ দ্বারা শপথ করতেন তা ছিলঃ আমি আল্লাহর নিকট সাক্ষ্য দিচ্ছি; সেই সত্তার শপথ, যাঁর হাতে আমার প্রাণ। [২০৯১]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد ضعيف لضعف هشام بن عمار وشيخه عبد الملك ابن محمَّد، ولكنهما متابعان. انظر ما قبله. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٥٦٠) من طريق هشام بن عمار، بهذا الإسناد.









সুনান ইবনু মাজাহ (2092)


حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَقَ الشَّافِعِيُّ إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ الْعَبَّاسِ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ رَجَاءٍ الْمَكِّيُّ عَنْ عَبَّادِ بْنِ إِسْحَقَ عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَالِمٍ عَنْ أَبِيهِ قَالَ كَانَتْ أَكْثَرُ أَيْمَانِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَا وَمُصَرِّفِ الْقُلُوبِ




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর অধিকাংশ শপথ ছিলঃ না, অন্তরসমূহের পরিবর্তনকারীর শপথ! [২০৯২]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، نسائي (3793)، (انوار الصحیفہ ص 454)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. عبّاد بن إسحاق -وهو عبد الرحمن بن إسحاق المدني- صدوق حسن الحديث، وقد توبع. وأخرجه النسائي ٧/ ٢ - ٣ من طريق محمَّد بن الصلت، عن عبد الله بن رجاء، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (٦٦١٧)، والترمذي (١٦٢١)، والنسائي ٧/ ٢ من طريق موسى بن عقبة، عن سالم، به. وأخرجه أبو داود (٣٢٦٣) عن عبد الله بن محمَّد النفيلي، عن ابن المبارك، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر - كذا جاء في "تحفة الأشراف" ٥/ ٤١٣ وهو من رواية ابن داسة، قال الحافظ في "الفتح" ١١/ ٥١٤: قوله في "السند": عن سالم، هو المحفوظ، وكذا قال سفيان الثوري عن موسى بن عقبة، وشذ النُّفيلي فقال: عن ابن المبارك، عن موسى، عن نافع، بدل سالم. أخرجه أبو داود من رواية ابن داسة. وهو في "مسند أحمد" (٤٧٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٣٢).









সুনান ইবনু মাজাহ (2093)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ خَالِدٍ ح و حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ حُمَيْدِ بْنِ كَاسِبٍ حَدَّثَنَا مَعْنُ بْنُ عِيسَى جَمِيعًا عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ هِلَالٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ كَانَتْ يَمِينُ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَا وَأَسْتَغْفِرُ اللهَ




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর শপথ ছিলঃ না, আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা প্রার্থনা করছি। [২০৯৩]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (3265)، (انوار الصحیفہ ص 454)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، هلال والد محمَّد -وهو هلال بن أبي هلال المدني- لا يُعرف، تفرد ابنه محمَّد بالرواية عنه. وأخرجه أبو داود (٣٢٦٥) و (٤٧٧٥)، والنسائي ٨/ ٣٣ - ٣٤ من طريق محمَّد ابن هلال، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٨٦٩). قال القاري في "مرقاة المفاتيح" ٣/ ٥٦١: قال القاضي: أي: أستغفر الله إن كان الأمر على خلاف ذلك، وهو وإن لم يكن يمينًا، لكن شابهه من حيث إنه أكد الكلام، وقدره وأعرب عن مخرجه بالكذب فيه، وتحرزه عنه فلذلك سماه يمينًا. قال الطيبي: والوجه أن يقال: إن الواو في قوله: وأستغفر الله للعطف، وهو يقتضي معطوفًا عليه محذوفا، والقرينة لفظة "لا"، لأنها لا تخلو إما أن تكون توطئة للقسم، كما في قوله تعالى جل شأنه: ﴿لَا أُقْسِمُ﴾ رداَ للكلام السابق، وإنشاء قسم، وعلى كلا التقديرين المعنى: لا أقسم باللهِ وأستغفر الله …









সুনান ইবনু মাজাহ (2094)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عُمَرَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم سَمِعَهُ يَحْلِفُ بِأَبِيهِ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِنَّ اللهَ يَنْهَاكُمْ أَنْ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ قَالَ عُمَرُ فَمَا حَلَفْتُ بِهَا ذَاكِرًا وَلَا آثِرًا.




উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -কে তার পিতার নামে শপথ করতে শুনলেন। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের বাপ-দাদার নামে শপথ করতে নিষেধ করেছেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর থেকে আমি আর কখনো এভাবে শপথ করিনি বা অন্যের বরাতেও তা উল্লেখ করিনি। [২০৯৪]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٦٤٧)، ومسلم (١٦٤٦)، وأبو داود (٣٢٥٠)، والنسائي ٧/ ٤ و٥ من طرق عن الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١١٢). وأخرجه مسلم (١٦٤٦)، والترمذي (١٦١٣)، والنسائي في "المجتبى" ٧/ ٤ من طرق عن سفيان بن عينة، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله بن عمر عن أبيه: أن النبي ﷺ سمع عمر ؓ وهو يقول: وأبي وأبي، ثم ساقه. هكذا جعله من مسند عبد الله بن عمر. وهو بهذا الإسناد في "مسند أحمد" (٤٥٤٨). وقد تابع ابن عيية على ذلك معمرٌ عند أحمد في "مسنده" (٤٥٢٣). قال الحافظ في "الفتح" ١١/ ٥٣٣: قال يعقوب بن شيبة: رواه إسحاق بن يحيى، عن سالم، عن أبيه. ولم يقل: عن عمر، قلت: فكان الاختلاف فيه على الزهري، رواه إسحاق بن يحيى، وهو متقن صاحب حديث، ويثبه أن يكون ابن عمر سمع المتن من النبي ﷺ والقصة التي وقعت لعمر منه فحدّث به على الوجهين. وأخرجه البخاري (٦١٠٨) و (٦٦٤٦)، ومسلم (١٦٤٦)، والترمذي (١٦١٤)، والنسائي في "الكبرى" (٧٦١٦) من طريق نافع، عن ابن عمر: أن رسول الله ﷺ أدرك عمر وهو في ركب وهو يحلف بأبيه … وذكر الحديث وجعله من مسند ابن عمر، وهو في "مسند أحمد" (٤٥٩٣) و (٤٦٦٧)، و "صحيح ابن حبان" (٤٣٥٩) و (٤٣٦٠). وأخرجه البخاري (٣٨٣٦) و (٦٦٤٨) و (٧٤٠١)، ومسلم (١٦٤٦)، والنسائي ٧/ ٤ من طريق عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: كانت قريش تحلف بآبائها، فقال رسول الله ﷺ: "من كان حالفًا، فليحلف بالله، ولا تحلفوا بآبائكم". وهو في "مسند أحمد" (٤٧٥٣)، و "صحيح ابن حبان" (٤٣٦٢). وفي الحديث أنه من حلف بغير الله وذاته وصفاته لم تنعقد يمينه، سواء كان المحلوف به يستحق التعظيم لمعنى غير العبادة، كالأنبياء والملائكة والعلماء والصلحاء والملوك والآباء والكعبة، أو كان لا يستحق التعظيم كالآحاد، أو يستحق التحقير والإذلال كالشياطين والأصنام وسائر من عُبِدَ من دون الله … قال الإمام الطبري: إن اليمين لا تنعقد إلا بالله، وأن من حلف بالكعبة أو آدم أو جبريل ونحو ذلك، لم تنعقد يمينه، ولزمه الاستغفار لإقدامه على ما ينهى عنه، ولا كفارة في ذلك. قاله الحافظ في "الفتح" ١١/ ٥٣٤ - ٥٣٥. قوله: فما حلفت بها ذاكرًا، أي: ما تكلمت بها حالفًا، من قولك: ذكرت لفلان حديث كذا وكذا، أي: قلته له، وليس من الذكر بعد النسيان. وقوله: ولا آثرًا، أي: ولا رويت عن أحد أنه حلف بها. "النهاية" (ذكر) و (أثر).









সুনান ইবনু মাজাহ (2095)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الأَعْلَى، عَنْ هِشَامٍ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ سَمُرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ لاَ تَحْلِفُوا بِالطَّوَاغِي وَلاَ بِآبَائِكُمْ ‏"‏ ‏.‏




আবদুর রহমান বিন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, তোমরা দেব-দেবী ও তোমাদের বাপ-দাদার নামে শপথ করো না। [২০৯৫]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عبد الأعلى: هو ابن عبد الأعلى البصري، وهشام: هو ابن حسان القردوسي، والحسن: هو ابن يسار البصري. وأخرجه مسلم (١٦٤٨)، والنسائي ٧/ ٧ من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٦٢٤). قوله: "بالطواغي"، قال السندي: جمع طاغية، وهي فاعلة له، وقيل: الطاغية مصدر كالعافية، عني بها الصنم ثم للمبالغة، ثم جمع على طواغي.









সুনান ইবনু মাজাহ (2096)


حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ إِبْرَاهِيمَ الدِّمَشْقِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْوَاحِدِ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ حُمَيْدٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ مَنْ حَلَفَ فَقَالَ فِي يَمِينِهِ بِاللاَّتِ وَالْعُزَّى فَلْيَقُلْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে ব্যক্তি শপথ করতে গিয়ে বললো, লাত ও উযযার শপথ, সে যেন ''লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'' বলে। [২০৯৬]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. حمد: هو ابن عبد الرحمن بن عوف الزهري. وأخرجه البخاري (٤٨٦٠)، ومسلم (١٦٤٧)، وأبو داود (٣٢٤٧)، والترمذي (١٦٢٦)، والنسائي ٧/ ٧ من طريق ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وزادوا جميعًا في روايتهم: "ومن قال لصاحبه: تعالَ أُقامرْك، فليتصدق" قال الإمام مسلم: هذا الحرف لا يرويه أحدٌ غير الزهري. قال: وللزهري نحوٌ من تسعين حديثًا يرويه عن النبي ﷺ لا يشاركه فيه أحدٌ بأسانيد جِيادٍ. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٨٧). قال السندي: قوله: "باللات" أي: بلا قصد، بل على طريق جري العادة بينهم، لأنهم كانوا قريبي عهد بالجاهلية. "لا إله إلا الله" استدراكًا لما فاته من تعظيم الله تعالى في محله، ونفيًا لما تعاطى من تعظيم الأصنام صورةً، وأما من قصد الحلف بالأصنام تعظيما لها فهو كافر نعوذ باللهِ.









সুনান ইবনু মাজাহ (2097)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَالْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ الْخَلاَّلُ، قَالاَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ مُصْعَبِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ سَعْدٍ، قَالَ حَلَفْتُ بِاللاَّتِ وَالْعُزَّى فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ قُلْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ ثُمَّ انْفُثْ عَنْ يَسَارِكَ ثَلاَثًا وَتَعَوَّذْ وَلاَ تَعُدْ ‏"‏ ‏.‏




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি লাত ও উযযার নামে শপথ করলে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ বলো, "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারিকা লাহু" (আল্লাহ ব্যতীত কোন ইলাহ নেই, তিনি এক, তাঁর কোন শরীক নেই)। অতঃপর তুমি তিনবার বামদিকে থুথু নিক্ষেপ করো এবং শয়তান থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো, আর কখনো এর পুনরাবৃত্তি করো না। [২০৯৭]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي. وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله بن عُبيد السبيعي جد إسرائيل. ولم يُصب الشيخ الألباني رحمه الله تعالى في نضعيف هذا الحديث في "الإرواء" (٢٥٦٣) مُعتلًا باختلاط أبي إسحاق السبيعي وأنه مدلس وقد عنعن، مع أن العلماء قد أطبقوا على أن رواية إسرائيل عنه من أوثق الروايات للزومه إياه، وأنه سمع منه قبل تغيُّره! وقد صرح بالسماع عند النسائي فانتفت شبهة تدليسه. وأخرجه النسائي ٧/ ٧ - ٨ من طريقين عن أبي إسحاق السبيعي، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٥٩٠)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٦٤).









সুনান ইবনু মাজাহ (2098)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عَدِيٍّ عَنْ خَالِدٍ الْحَذَّاءِ عَنْ أَبِي قِلَابَةَ عَنْ ثَابِتِ بْنِ الضَّحَّاكِ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَنْ حَلَفَ بِمِلَّةٍ سِوَى الْإِسْلَامِ كَاذِبًا مُتَعَمِّدًا فَهُوَ كَمَا قَالَ




সাবিত ইবনুদ দাহহাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি স্বেচ্ছায় দ্বীন ইসলাম ব্যতীত অন্য ধর্মের মিথ্যা শপথ করলো, সে যেরুপ বলেছে সে তদ্রপ। [২০৯৮]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن أبي عدي: هو محمَّد بن إبراهيم بن أبي عدي، أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرمي. وأخرجه البخاري (١٣٦٣)، ومسلم (١١٠)، وأبو داود (٣٢٥٧)، والترمذي (١٦٢٤)، والنسائي ٧/ ٥ - ٦ و ٦ و ١٩ من طريق أبي قلابة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٣٨٥)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٦٦) و (٤٣٦٧). وقال الحافظ المزي في "تحفة الأشراف" ٢/ ٥٧٢: وحديث أبي داود في رواية أبي الحسن بن العبد، ولم يذكره أبو القاسم -يعني ابن عساكر. وحديثنا قطعة من حديث مطوَّل، وبعضُهم رواه بطوله.









সুনান ইবনু মাজাহ (2099)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ حَدَّثَنَا بَقِيَّةُ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ مُحَرَّرٍ عَنْ قَتَادَةَ عَنْ أَنَسٍ قَالَ سَمِعَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رَجُلًا يَقُولُ أَنَا إِذًا لَيَهُودِيٌّ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَجَبَتْ




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন, আমি যদি এরূপ করি তবে আমি ইহুদী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, অবধারিত হতে গেল। [২০৯৯]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف جدا




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف جدًا ، عبد اللّٰہ بن محرر: متروک (تقریب: 3573) ، والسند ضعفہ البوصیري لتدلیس بقیۃ بن الولید ، (انوار الصحیفہ ص 454)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده تألف، عبد الله بن محرَّر متروك الحديث، وهشام بن عمار وبقية ابن الوليد ضعيفان. وفي الباب عن أبي هريرة عند أبي يعلى الموصلي في "مسنده الكبير" كما في "إتحاف الخيرِة المهرة" للبوصيري (٦٦٠١)، والحاكم ٤/ ٢٩٨ من طريق عبيس بن ميمون، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة ؓ، قال: قال رسول الله ﷺ: "من حلف على يمين، فهو كما قال، إن قال: إني يهودي فهو يهودي، وإن قال: إني نصراني فهو نصراني، … الحديث. وقال البوصيري: هذا إسناد ضعيف لضعف عبيس بن ميمون. قلنا: بل هو متروك الحديث فلا يُفرح به.









সুনান ইবনু মাজাহ (2100)


حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ رَافِعٍ الْبَجَلِيُّ، حَدَّثَنَا الْفَضْلُ بْنُ مُوسَى، عَنِ الْحُسَيْنِ بْنِ وَاقِدٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ مَنْ قَالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنَ الإِسْلاَمِ فَإِنْ كَانَ كَاذِبًا فَهُوَ كَمَا قَالَ وَإِنْ كَانَ صَادِقًا لَمْ يَعُدْ إِلَيْهِ الإِسْلاَمُ سَالِمًا ‏"‏ ‏.‏




বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি বললো, আমি ইসলাম থেকে মুক্ত, সে যদি মিথ্যা বলে থাকে তবুও সে যা বলেছে তাই, আর যদি সে সত্য বলে থাকে তবুও ইসলাম তার কাছে নিরাপদে ফিরে আসবে না। [২১০০]




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده قوي، الحسين بن واقد صدوق لا بأس به، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه أبو داود (٣٢٥٨)، والنسائي ٧/ ٦ من طريق حسين بن واقد، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٠٠٦).