সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ بْنِ سَمُرَةَ، حَدَّثَنَا أَسْبَاطُ بْنُ مُحَمَّدٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَجْلاَنَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ سَمِعَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَجُلاً يَحْلِفُ بِأَبِيهِ فَقَالَ " لاَ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ مَنْ حَلَفَ بِاللَّهِ فَلْيَصْدُقْ وَمَنْ حُلِفَ لَهُ بِاللَّهِ فَلْيَرْضَ وَمَنْ لَمْ يَرْضَ بِاللَّهِ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ " .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে তার পিতার নামে শপথ করতে শুনে বলেনঃ তোমরা তোমাদের বাপ-দাদার নামে শপথ করো না। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর নামে শপথ করে সে যেন তা সত্যে পরিণত করে। আর যার জন্য আল্লাহর নামে শপথ করা হয়, সে যেন তাতে সন্তুষ্ট হয়। যে ব্যক্তি আল্লাহর নামে সন্তুষ্ট হয় না, আল্লাহর সাথে তার কোন সম্পর্ক থাকে না। [২১০১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، ابن عجلان عنعن ، وحدیث ((لا تحلفوا بآبا ئکم)) صحیح متفق علیہ (البخاري: 6648،مسلم، 1646) ، (انوار الصحیفہ ص 454)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده قوي، محمَّد بن عجلان صدوق لا بأس به، وباقي رجاله ثقات، وقد صحح البوصيري حديثه هذا في "مصباح الزجاجة" ورقة ١٣٤، وحسنه الحافظ في "الفتح" ١١/ ٥٣٥ - ٥٣٦. وفي الباب عند أحمد (٤٥٩٣)، والبخاري (٣٨٣٦) و (٦١٠٨)، ومسلم (١٦٤٦) وأبو داود (٣٢٥١)، والترمذي (١٦١٣) و (١٦١٤)، وابن حبان (٤٣٥٨ - ٤٣٦١) من طرق عن ابن عمر، أنه أدرك عمر بن الخطاب في ركب وهو يحلف بأبيه، فناداهم رسول الله ﷺ:"ألا إن الله ينهاكم أن تحلفوا بآبائكم، فمن كان حالفًا، فليحلف بالله وإلا فليصمت"، وفي رواية: عن الشي ﷺ قال: " ألا من كان حالفا فلا يحلف إلا بالله"، فكانت قريش تحلف بآبائها، فقال: "لا تحلفوا باَبائكم". وكلا اللفظين للبخاري.
حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ حُمَيْدِ بْنِ كَاسِبٍ، حَدَّثَنَا حَاتِمُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ يَحْيَى بْنِ النَّضْرِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " رَأَى عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ رَجُلاً يَسْرِقُ فَقَالَ أَسَرَقْتَ قَالَ لاَ وَالَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ . فَقَالَ عِيسَى آمَنْتُ بِاللَّهِ وَكَذَّبْتُ بَصَرِي " .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ ঈসা বিন মারয়াম (আঃ) এক ব্যক্তিকে চুরি করতে দেখে বললেন, তুমি চুরি করলে? সে বললো, না, সেই সত্তার শপথ যিনি ব্যতীত আর কোন ইলাহ নেই। তখন ঈসা (আঃ) বললেন, আমি আল্লাহর উপর ঈমান আনলাম এবং আমার চোখকে অবিশ্বাস করলাম। [২১০২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد ضعيف، لضعف شيخ ابن ماجه يعقوب بن حميد وجهالة أبي بكر بن يحيى بن النضر، وقد روي الحديثُ من وجه آخر صحيح. فأخرجه البخاري (٣٤٤٤)، ومسلم (٢٣٦٨) من طريق همام بن مُنبه، عن أبي هريرة بلفظ: رأى عيسى ابن مريم رجلًا يسرق، فقال له عيسى: سَرَقْت، فقال: كلا والذي لا إله إلا هو … وأخرجه النسائي ٨/ ٢٤٩ من طريق عطاء بن يسار، عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٨١٥٤)، و "صحيح ابن حبان" (٤٣٣٦). قال القرطبي المحدث، ونقله عنه ابن حجر في "الفتح" ٦/ ٤٨٩: ظاهر قول عيسى للرجل: سرقت أنه خبر جازم عما فعل الرجل من السرقة، لكونه رآه أخذ مالًا من حرز في خفية، وقول الرجل "كلا" نفي لذلك، ثم أكده باليمين، وقول عيسى ﵇: آمنتُ بالله وكذبت عَينَى، أي: صدقتُ من حلف باللهِ وكذبت ما ظهر لي من كون الأخذ المذكور سرقه، فإنه يحتمل أن يكون الرجل أخذ ما له فيه حق، أو ما أذن له صاحبه في أخذه، أو أخذه ليقلبه وينظر فيه، ولم يقصد الغصب والاستيلاء.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، عَنْ بَشَّارِ بْنِ كِدَامٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ زَيْدٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّمَا الْحَلِفُ حِنْثٌ أَوْ نَدَمٌ " .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ বস্তুত শপথ হলো গুনাহ বা অনুতাপ। [২১০৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، بشار بن کدام: ضعیف (تقریب: 673) ، وللحدیث شاہد ضعیف موقوف عند الحاکم(303/4،304) ، (انوار الصحیفہ ص 454)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف بشّار بن كِدام أخي مِسعْر بن كِدام. والصحيح أنه موقوف من قول عبد الله بن عمر بن الخطاب كما سيأتي. وأخرجه ابن أبي شيبة -جزء العمروي- ص ٦٨، والبخاري في "التاريخ الكبير" ٢/ ١٢٩، وأبو يعلى (٥٥٨٧) و (٥٦٩٧)، والطبراني في "المعجم الصغير" (١٠٨٣)، والحاكم ٤/ ٣٠٣، والبيهقي ١٠/ ٣٠ من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد. وأخرجه القضاعي في "مسند الشهاب" (٢٦٠) و (٢٦١) من طريقين عن أبي معاوية عن مسعر بن كدام، عن محمَّد بن زيد، به، كذا وقع عنده: مسعر بن كِدام، وهو خطأ، إنما هو بشار بن كدام. وأخرجه ابن أبي شيبة ص ٦٨، والبخاري في "تاريخه" ٢/ ١٢٩، والبيهقي ١٥/ ٣١ من طريقين عن عاصم بن محمَّد بن زيد، قال: سمعتُ أبي يقول: قال عمر بن الخطاب: اليمين آثمة أو مَندَمة. قال البخاري: وحديث عمر أولى بإرساله. قلنا: وهذا إسناد رجاله ثقات غير أن محمَّد بن زيد لم يدرك عمر. وأخرجه الحاكم ٤/ ٣٠٣ - ٣٠٤ من طريق أبي ضمرة، عن عاصم بن محمَّد، عن أبيه، عن ابن عمر، ﵄، قال: إنما اليمين مأثمة أو مندمة. وهذا إسناد صحيح.
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ الْعَنْبَرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ ابْنِ طَاوُسٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ حَلَفَ فَقَالَ إِنْ شَاءَ اللَّهُ فَلَهُ ثُنْيَاهُ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তি শপথ করলো এবং ইনশাআল্লাহ (যদি আল্লাহ চান) বললো, তার প্রতি শপথ ভংগের দায় বর্তায়। [২১০৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن طاووس: هو عبد الله. وأخرجه الترمذي (١٦١٢)، والنسائي ٧/ ٣٠ من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٠٨٨)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٤١). وانظر الكلامَ على هذا الحديث في "المسند". قوله: "فله ثنياه"، قال السندي: الثنيا كالدنيا، اسم بمعنى الاستثناء، أي أن الثنيا تنفعه حيث لا يحنث، أتى بالمحلوف عليه أم لا. والله أعلم.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ زِيَادٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ حَلَفَ وَاسْتَثْنَى إِنْ شَاءَ رَجَعَ وَإِنْ شَاءَ تَرَكَ غَيْرُ حَانِثٍ " .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, যে ব্যক্তি তার শপথের সাথে ইনশাআল্লাহ যুক্ত করলো, সে চাইলে শপথ থেকে ফিরে যেতে পারে অথবা তা পরিত্যাগও করতে পারে। তাতে সে শপথ ভঙ্গকারী নয়। [২১০৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. محمَّد بن زياد: هو الزَّيادي، وأيوب: هو ابن أبي تميمة الَسختاني. وأخرجه أبو داود (٣٢٦٢)، والترمذي (١٦١١)، والنسائي ٧/ ١٢ و٢٥ من طريق أيوب بن أبي تميمة، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي ٧/ ٢٥ من طريق كثير بن فرقد، عن نافع، عن ابن عمر، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٥١٠). وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ مُحَمَّدٍ الزُّهْرِيُّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ أَيُّوبَ عَنْ نَافِعٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ رِوَايَةً قَالَ مَنْ حَلَفَ وَاسْتَثْنَى فَلَنْ يَحْنَثْ
নাফি' ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যে ব্যক্তি শপথের সাথে ইনশাআল্লাহ যুক্ত করে, সে শপথ ভঙ্গকারী নয়। [২১০৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه أبو داود (٣٢٦١)، والنسائي ٧/ ٢٥ من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله. وهو في "مسند أحمد" (٤٥٨١)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٣٩). وانظر "نصب الراية" ٣/ ٣٠١ - ٣٠٢.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدَةَ، أَنْبَأَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، حَدَّثَنَا غَيْلاَنُ بْنُ جَرِيرٍ، عَنْ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ أَبِي مُوسَى، قَالَ أَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي رَهْطٍ مِنَ الأَشْعَرِيِّينَ نَسْتَحْمِلُهُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " وَاللَّهِ مَا أَحْمِلُكُمْ وَمَا عِنْدِي مَا أَحْمِلُكُمْ عَلَيْهِ " . قَالَ فَلَبِثْنَا مَا شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ أُتِيَ بِإِبِلٍ فَأَمَرَ لَنَا بِثَلاَثَةِ إِبِلٍ ذَوْدٍ غُرِّ الذُّرَى فَلَمَّا انْطَلَقْنَا قَالَ بَعْضُنَا لِبَعْضٍ أَتَيْنَا رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ نَسْتَحْمِلُهُ فَحَلَفَ أَلاَّ يَحْمِلَنَا ثُمَّ حَمَلَنَا ارْجِعُوا بِنَا . فَأَتَيْنَاهُ فَقُلْنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّا أَتَيْنَاكَ نَسْتَحْمِلُكَ فَحَلَفْتَ أَنْ لاَ تَحْمِلَنَا . ثُمَّ حَمَلْتَنَا فَقَالَ " وَاللَّهِ مَا أَنَا حَمَلْتُكُمْ فَإِنَّ اللَّهَ حَمَلَكُمْ وَاللَّهِ مَا أَنَا حَمَلْتُكُمْ بَلِ اللَّهُ حَمَلَكُمْ إِنِّي وَاللَّهِ إِنْ شَاءَ اللَّهُ لاَ أَحْلِفُ عَلَى يَمِينٍ فَأَرَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا إِلاَّ كَفَّرْتُ عَنْ يَمِينِي وَأَتَيْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ " . أَوْ قَالَ " أَتَيْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ وَكَفَّرْتُ عَنْ يَمِينِي " .
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আশআরীদের একটি দলের সাথে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট জন্তুযান চাইতে এসেছিলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আল্লাহর শপথ ! আমি তোমাদের জন্য জন্তুযানের ব্যবস্থা করতে অক্ষম। রাবী বলেন, আমরা আল্লাহর ইচ্ছায় সেখানে কিছুক্ষণ অবস্থান করলাম। অতঃপর কিছু সংখ্যক উট এসে গেল। তখন তিনি আমাদের উজ্জ্বল কুঁজবিশিষ্ট তিনটি উট দেয়ার জন্য নির্দেশ দিলেন। আমাদের প্রত্যাবর্তনের সময় আমাদের একজন অপরজনকে বললো, আমরা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট জন্তুযান চাইতে এসেছিলাম। তিনি শপথ করে বলেছিলেন যে, তিনি আমাদের জন্তুযান দিতে অপারগ। পরে আবার তিনি আমাদের তা দিলেন। কাজেই চলো, আমরা তাঁর নিকট ফিরে যাই। অতএব আমরা তাঁর নিকট ফিরে এসে বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমরা আপনার নিকট জন্তুযান চাইতে এসেছিলাম। আপনি শপথ করে বলেছিলেন যে, আপনি আমাদের জন্তুযান দিতে অক্ষম। এরপর আপনি আমাদের জন্তুযান দিলেন। তিনি বলেনঃ আল্লাহর শপথ! আমি তোমাদের বাহনের ব্যবস্থা করিনি, আল্লাহই তোমাদের বাহনের ব্যবস্থা করেছেন। আল্লাহর শপথ! আল্লাহর তা'আলার মর্জি আমি শপথ করার পর তার বিপরিতে কল্যাণ দেখতে পেলে আমি শপথ ভঙ্গের কাফফারা আদায় করি, অতঃপর কল্যাণকর কাজটি করি। অথবা তিনি বলেনঃ আমি সেই ভাল কাজটি করি এবং আমার শপথ ভঙ্গের কাফফারা শোধ করি। [২১০৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٦٢٣)، ومسلم (١٦٤٩) (٧) و (٨)، وأبو داود (٣٢٧٦)، والنسائي ٧/ ٩ - ١٠ من طريق أبي بردة، به. وأخرجه البخاري (٣١٣٣)، ومسلم (١٦٤٩) (٩) و (١٠) من طريق زهدم بن مضرب، عن أبي موسى. وهو في "مسند أحمد" (١٩٥٥٨) وفيه التردد في تقديم الكفارة وتأخيرها. قال السندي: قوله: "نستحمله"، أي: نطلب منه ما نركب عليه في غزوة تبوك. "ذود"، بفتح الذال المعجمة جمع ناقة، أي: بثلاث نوق. "غرَّ الذرى"، أي: بيض الأسنمة، كناية عن كونها سمينة.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَامِرِ بْنِ زُرَارَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ عَيَّاشٍ، عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ رُفَيْعٍ، عَنْ تَمِيمِ بْنِ طَرَفَةَ، عَنْ عَدِيِّ بْنِ حَاتِمٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ حَلَفَ عَلَى يَمِينٍ فَرَأَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا فَلْيَأْتِ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ وَلْيُكَفِّرْ عَنْ يَمِينِهِ " .
আদী বিন হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তি শপথ করার পর তার বিপরীতে কল্যাণ দেখতে পেলে সে যেন ঐ কল্যাণকর কাজটি করে এবং তার শপথের কাফফারা আদায় করে। [২১০৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (١٦٥١)، والنسائي ٧/ ١١ من طريق عبد العزيز بن رفيع، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٢٥٧)، و"صحيح ابن حبان" (٤٣٤٥) و (٤٣٤٦). وفي إحدى روايات مسلم قدّم التكفير على الحنث.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ أَبِي عُمَرَ الْعَدَنِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو الزَّعْرَاءِ، عَمْرُو بْنُ عَمْرٍو عَنْ عَمِّهِ أَبِي الأَحْوَصِ، عَوْفِ بْنِ مَالِكٍ الْجُشَمِيِّ عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ يَأْتِينِي ابْنُ عَمِّي فَأَحْلِفُ أَنْ لاَ، أُعْطِيَهُ وَلاَ أَصِلَهُ . قَالَ " كَفِّرْ عَنْ يَمِينِكَ " .
মালিক আল-জুশামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললামঃ হে আল্লাহর রসূল! আমার নিকট আমার চাচাতো ভাই এলে আমি শপথ করে বলি যে, আমি তাকে কিছু দানও করবো না এবং তার সাথে আত্মীয়তার সম্পর্কও বজায় রাখবো না। তিনি বলেনঃ তোমার শপথের কাফফারা শোধ করো। [২১০৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. والصحابي: هو مالك بن نضْلة الجُشَمي. وأخرجه النسائي ٧/ ١١ عن محمَّد بن منصور، عن سفيان، بهذا الإسناد. بلفظ: قلت: يا رسول الله أرأيت ابن عم لي أتيته أسأله، فلا يعطيني ولا يصلني، ثم يحتاج إليً، فيأتيني، فيسألني وقد حلفت أن لا أُعطيه، ولا أصلَه، فأمرني أن آتيَ الذي هو خير، وأُكفرَ عن يميني. وهو في "مسند أحمد" (١٧٢٢٨) ضمن حديث طويل عن سفيان بن عيينة، به.
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ حَارِثَةَ بْنِ أَبِي الرِّجَالِ، عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " مَنْ حَلَفَ فِي قَطِيعَةِ رَحِمٍ أَوْ فِيمَا لاَ يَصْلُحُ فَبِرُّهُ أَنْ لاَ يَتِمَّ عَلَى ذَلِكَ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তি আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার শপথ করলে অথবা অসঙ্গত বিষয়ের শপথ করলে, ঐ কাজটি তার না করার ভিতরেই কল্যাণ নিহিত আছে। [২১১০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، حارثۃ بن أبی الرجال ضعیف ، وروی الطحاوي في مشکل الآثار (1/ 287) بإسناد حسن عن ابن عباس عن، رسول اللّٰہ ﷺ قال: ((من حلف بیمین علی قطیعۃ الرحم أو معصیۃ فحنث فذلک کفارۃ، لہ))، (انوار الصحیفہ ص 454)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف حارثة بن أبي الرجال- واسم أبي الرجال محمَّد-. وأخرجه ابن جرير الطبري في "تفسير" (٤٤٥٣) من طريق علي بن مُسهر، عن حارثة بن محمَّد، بهذا الإسناد. وفي الباب عن عبد الله بن عباس عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٦٦٤)، وابن حبان في "صحيحه" (٤٣٤٤)، ولفظه عند الطحاوي: "من حلف على يمين قطيعة أو معصية، فحنِث، فذلك كفارة" ولفظ ابن حبان: "من حلف على ملك يمينه أن يَضْرِبَه، فكفارته تركه، ومع الكفارة حسنة". وإسناده صحيح. قلنا: احتج بهذه الأحاديث من ذهب إلى أن اليمين في المعصية لا كفارة عيها، وقد رواه الطبري في "تفسيره" (٤٤٤٧ - ٤٤٥١) عن ابن عباس ومسروق بن الأجدع والشعبي، ورواه ابن حزم في "المحلى" ٨/ ٤١ عن ابن مسعود وإبراهيم النخعي وطاووس، ورواه ابن حزم عن سعيد بن جبير، والصحيح أن سعيد بن جبير فسر قوله تعالى: ﴿لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ﴾ [المائدة: ٨٩] بأنها اليمين على المعصية لا يُؤاخذ الله بإلغائها، كما رواه عنه الطبري في "تفسيره" (٤٤٣٦ - ٤٤٤١) وكما هي رواية "المحلى" أيضًا. وقد ذهب بعض أهل العلم إلى أن المراد بقوله: "فكفارته تركه": كفارة من الإثم الذي اقترفه بذلك اليمين.
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ الْمُؤْمِنِ الْوَاسِطِيُّ، حَدَّثَنَا عَوْنُ بْنُ عُمَارَةَ، حَدَّثَنَا رَوْحُ بْنُ الْقَاسِمِ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، . أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ " مَنْ حَلَفَ عَلَى يَمِينٍ فَرَأَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا فَلْيَتْرُكْهَا فَإِنَّ تَرْكَهَا كَفَّارَتُهَا " .
আবদুল্লাহ বিন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ কোন ব্যক্তি কোন বিষয়ে শপথ করার পর তার বিপরীতে কল্যাণ লক্ষ্য করলে সে যেন তার শপথ ত্যাগ করে। তার শপথ ত্যাগ করাই তার শপথ ভঙ্গের কাফফারা। [২১১১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * منكر
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن دون قوله: "فإن تركها كفارتها" فهي زيادة شاذّة في حديث عبد الله بن عمرو هذا، وهذا إسناد ضعيف لضعف عون بن عمارة -وهو إن كان متابعًا على هذا الحرف- فقد رواه من هو أوثق وأجلّ منهم وذكر الأمر بالكفارة. وأخرجه الطيالسي (٣٢٧٤)، وأحمد في "مسنده" (٦٧٣٦) من طريق خليفة بن خياط -جد خليفة بن خياط صاحب "التاريخ"- وأبو داود (٣٢٧٤) من طريق عبد الله بن بكر السهمي، عن عبيد الله بن الأخنس، كلاهما (خليفة وعبيد الله) عن عمرو بن شعيب، بهذا الإسناد- زاد عبيد الله في روايته أولَ الحديث: "لا نذر ولا يمين فيما لا يملك ابنُ آدم، ولا في معصية الله، ولا في قطيعة رحم، ومن حلف … ". وخليفة بن خياط وعبد الله بن بكر السهمي وإن كانا ثقتين خالفهما يحيى القطان وهو أوثق منهما. فأخرجه النسائي في "المجتبى" ٧/ ١٠ عن عمرو بن علي الفلاس، عن يحيى ابن سعيد القطان، عن عبيد الله بن الأخنس، عن عمرو بن شعيب، به بلفظ: "من حلف على يمين فرأى غيرها خيرًا منها، فليكفر عن يمينه، وليأت الذي هو خير" فذكر الأمر بالكفارة، وعمرو الفلاس وشيخه يحيى القطان ثقتان حافظان متقنان، وقد ضبطا الرواية. وفي الباب عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده بلفظ: "لا نذر ولا يمين فيما لا يملك ابن ادم، ولا في معصية الله، ولا في قطيعة رحم" أخرجه أبو داود (٣٢٧٤) من طريق عبد الله بن بكر السهمي، والنسائي ٧/ ١٢ من طريق يحيى القطان، كلاهما عن عبيد الله بن الأخنس. وأخرجه أحمد (٦٧٣٢)، وأبو داود (٢١٩١) و (٢١٩٢) و (٣٢٧٣) من طريق عبد الرحمن بن الحارث، كلاهما (عبيد الله بن الأخنس وعبد الرحمن بن الحارث) عن عمرو بن شعيب، به، وإسناده حسن.
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ يَزِيدَ، حَدَّثَنَا زِيَادُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ الْبَكَّائِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَعْلَى الثَّقَفِيُّ، عَنِ الْمِنْهَالِ بْنِ عَمْرٍو، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَفَّرَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِصَاعٍ مِنْ تَمْرٍ وَأَمَرَ النَّاسَ بِذَلِكَ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَنِصْفُ صَاعٍ مِنْ بُرٍّ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সা' খেজুর কাফফারাস্বরূপ দান করেন এবং লোকদের এরুপ নির্দেশ দেন। কেউ যদি তা না পায়, তবে অর্ধ সা' গম আদায় করবে। [২১১২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، عمر بن عبد اللّٰہ بن یعلی: ضعیف ، والحدیث ضعفہ ابن کثیر في تفسیرہ (93/2) ، (انوار الصحیفہ ص 454)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف عمر بن عبد الله بن يعلى الثقفي. وأخرجه ابن مردويه في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" ٣/ ١٦٥ من طريق محمَّد بن معاوية، عن زياد بن عبد الله، بهذا الإسناد. وقد صح عن عمر بن الخطاب أنه كان يقول بذلك، فقد أخرجه عنه عبد الرزاق (١٦٠٧٥) و (١٦٠٧٦)، وسعيد بن منصور-قسم التفسير- (٧٨٥) و (٧٨٦)، وابن أبي شيبة -جزء العمروي- ص ٧ من طريقين عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن يسار بن نمير، قال: قال لي عمر: إني أحلف لا أعطي أقواما، ثم يبدو لي فأعطيهم، فإذا فعلتُ ذلك، فأطعم عني عشرة مساكين، بين كل مسكينين صاعٌ من بُر، أو صاعٌ من تمر لكل مسكين.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ أَبِي الْمُغِيرَةِ عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ كَانَ الرَّجُلُ يَقُوتُ أَهْلَهُ قُوتًا فِيهِ سَعَةٌ وَكَانَ الرَّجُلُ يَقُوتُ أَهْلَهُ قُوتًا فِيهِ شِدَّةٌ فَنَزَلَتْ {مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ}.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, কোন কোন লোক তার পরিবার পরিজনের আহারের জন্য সহজেই পর্যাপ্ত ব্যয় করতে পারতো এবং কোন কোন লোক একান্ত কষ্টেই তার পরিজনদের জন্য অপর্যাপ্ত ব্যয় করতো। তখন এ আয়াত নাযিল হয়। (অনুবাদ) "মধ্যম ধরনের, যা তোমরা তোমাদের পরিজনদের আহার করিয়ে থাকো।" (সূরা মাইদাঃ ৮৯) [২১১৩]
তাহকিক আলবানীঃ সনদটি সহীহ ও মাওকূফ।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سفیان بن عینۃ مدلس وعنعن ، ولا ینفعہ کونہ لا یدلس إلا عن ثقۃ مدلس وغیر مدلسٍ، کما حققتہ في تخریج النہایۃ فی الفتن والملاحم (ح1030) یسر اللّٰہ لنا طبعہ ، (انوار الصحیفہ ص 454، 455)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه الطبري في "تفسيره" ٧/ ٢٢، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" ٣/ ١٦٤ من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد - زاد في آخره: أي: من الخبز والزيت. وأخرجه سعيد بن منصور- قسم التفسير- (٧٩٨) عن أبي عوانة الوضاح اليشكري، وابن أبي حاتم في "تفسيره" ٣/ ٢٧/ أمن طريق حفص بن غياث، كلاهما عن سليمان بن أبي المغيرة، والطبري (١٢٤٣٦) من طريق عنبسة بن سعيد الرازي، و (١٢٤٣٧) من طريق سالم الأفطس، ثلاثتهم (سليمان وعنبسة وسالم الأفطس) عن سعيد بن جبير في قوله ﷿: ﴿مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ﴾ [المائدة: ٨٩] قال: كان يكون للكبير أفضل من الصغير، وللحر أفضل من المملوك، فأُمروا بوسطٍ من ذلك، ليس بأرفعه ولا بأوضعه. هكذا رووه مرسلًا، ولا تضادّ بينه وبين الموصول، فربما يروي التابعي الحديث عن الصحابي، ثم يرويه مرة أخرى دون ذكره، وقد كان هذا شائعًا في عصرهم.
حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ وَكِيعٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حُمَيْدٍ الْمَعْمَرِيُّ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنْ هَمَّامٍ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ قَالَ أَبُو الْقَاسِمِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِذَا اسْتَلَجَّ أَحَدُكُمْ فِي الْيَمِينِ فَإِنَّهُ آثَمُ لَهُ عِنْدَ اللَّهِ مِنَ الْكَفَّارَةِ الَّتِي أُمِرَ بِهَا " .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ صَالِحٍ الْوُحَاظِيُّ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ سَلاَّمٍ، عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ نَحْوَهُ .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূল কাসিম রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ আল্লাহর বিধানমত কাফফারা আদায় না করে কোন অসঙ্গত শপথের উপর অটল থাকলে সে আল্লাহর নিকট অপরাধী সাব্যস্ত হয়।
[উপরোক্ত হাদীসে মোট ২টি সানাদের ১টি বর্ণিত হয়েছে, অপর সানাদটি হলোঃ]
১/২১১৪ (১) [ মুহাম্মাদ বিন ইয়াহইয়া ] [ ইয়াহইয়া বিন সালিহ আল-ওয়াহাযী ] [ মুআবিয়াহ বিন সাল্লাম ] [ ইয়াহইয়া বিন আবু কাসীর ] [ ইকরিমাহ ] [ আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ] [২১১৪]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد ضعيف لضعف سفيان بن وكيع -ولكنه متابع. وأخرجه البخاري (٦٦٢٥)، ومسلم (١٦٥٥) من طريق عبد الرزاق الصنعاني، عن معمر، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٧٧٤٣) وانظر تمام تخريجه فيه. وانظر ما بعده. قوله: "إذا استلجَّ"، قال ابن الأثير: من اللجاج، ومعناه: أن يحلف على شيء، ويرى أن غيره خيرٌ منه، فيقيم على يمينه، ولا يحنث، فيكفِّر، فذلك آثمُ له. وقيل: هو أن يرى أنه صادق فيها مصيب، فيلجُّ فيها ولا يكفرها. وقال السندي: إذا حلف يمينًا يتعلق بأهله، وهم يتضررون بالإصرار عليه، فاللائق به أن يحنث ويكفر عن يمينه، وأما الثبات على اليمين، والإصرارُ عليه، وتركُ الحِنث، فهو لجاج. "فإنه آثمُ له"، أي: أكثر إثمًا من الكفارة، وآثم بالمد اسمُ تفضيل، وصيغة التفضيل باعتبار ظن الحالف بلجاجه في حنثه وتكفيره إثمًا، وإلا فلا إثم فيهما، أي: في الحنث والتكفير. * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٦٦٢٦) عن إسحاق بن إبراهيم ابن راهويه، عن يحيى بن صالح الوُحَاظي، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ أَشْعَثَ بْنِ أَبِي الشَّعْثَاءِ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ سُوَيْدِ بْنِ مُقَرِّنٍ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ أَمَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِإِبْرَارِ الْمُقْسِمِ .
বারা' বিন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শপথকারীর দায়মুক্তিতে সাহায্য করতে আমাদের নির্দেশ দিয়েছেন। [২১১৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري مطولًا (١٢٣٩)، ومسلم (٢٠٦٦)، والترمذي (٣٠١٧)، والنسائي ٤/ ٥٤ و ٧/ ٨ من طريق أشعث بن أبي الشعثاء، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥٠٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٠٤٠).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ صَفْوَانَ، أَوْ عَنْ صَفْوَانَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْقُرَشِيِّ، قَالَ لَمَّا كَانَ يَوْمُ فَتْحِ مَكَّةَ جَاءَ بِأَبِيهِ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ اجْعَلْ لأَبِي نَصِيبًا فِي الْهِجْرَةِ . فَقَالَ " إِنَّهُ لاَ هِجْرَةَ " . فَانْطَلَقَ فَدَخَلَ عَلَى الْعَبَّاسِ فَقَالَ قَدْ عَرَفْتَنِي فَقَالَ أَجَلْ . فَخَرَجَ الْعَبَّاسُ فِي قَمِيصٍ لَيْسَ عَلَيْهِ رِدَاءٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَدْ عَرَفْتَ فُلاَنًا وَالَّذِي بَيْنَنَا وَبَيْنَهُ جَاءَ بِأَبِيهِ لِيُبَايِعَكَ عَلَى الْهِجْرَةِ . فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّهُ لاَ هِجْرَةَ " . فَقَالَ الْعَبَّاسُ أَقْسَمْتُ عَلَيْكَ . فَمَدَّ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَدَهُ فَمَسَّ يَدَهُ فَقَالَ " أَبْرَرْتُ عَمِّي وَلاَ هِجْرَةَ " .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ الرَّبِيعِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ إِدْرِيسَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، بِإِسْنَادِهِ نَحْوَهُ . قَالَ يَزِيدُ بْنُ أَبِي زِيَادٍ يَعْنِي لاَ هِجْرَةَ مِنْ دَارٍ قَدْ أَسْلَمَ أَهْلُهَا .
আবদুর রহমান বিন সফওয়ান অথবা সফওয়ান বিন আবদুর রহমান আল-কুরাশী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মাক্কাহ বিজয়ের দিন আবদুর রহমান তার পিতাকে নিয়ে এসে বললেন, হে আল্লাহর রসূল! আমার পিতাকে হিজরতে শরীক করুন। তিনি বলেনঃ তার তো হিজরত নেই। তিনি সেখান থেকে চলে গিয়ে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর নিকট উপস্থিত হয়ে বললেন, আপনি আমাকে চিনেন? তিনি বলেন, হ্যাঁ। এরপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি জামা গায়ে দিয়ে চাদরবিহীন অবস্থায় বেরিয়ে পড়লেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রসুল! আপনি তো এই লোক এবং তার ও আমাদের মধ্যেকার ঘনিষ্ঠতা সম্পর্কে অবহিত। সে তার পিতাকে নিয়ে এসেছে, যেন আপনি তাকে হিজরতের জন্য বাইআত করেন। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ এখন তো আর হিজরত নেই। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আপনাকে শপথ দিয়ে বলছি। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত বাড়িয়ে দিয়ে লোকটির হাত স্পর্শ করলেন এবং বললেনঃ আমি আমার চাচার শপথ পূর্ণ করলাম এবং এখন আর হিজরত নেই।
[ উপরোক্ত হাদীসে মোট ২টি সানাদের ১টি বর্ণিত হয়েছে, অপর সানাদটি হলোঃ ]
২/২১১৬ (১) . আবদুর রহমান বিন সফওয়ান অথবা সফওয়ান বিন আবদুর রহমান আল-কুরাশী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার নিজেস্ব সূত্রে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেন। ইয়াযীদ বিন আবূ যিয়াদ বলেন, অর্থাৎ যে দেশের লোকেরা ইসলাম গ্রহন করে সেখান হতে কোন হিজরত নেই।
তাহকীক আলবানীঃ দঈফ।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، یزید بن أبي زیاد ضعفہ الجمہور کما قال البوصیري ، (انوار الصحیفہ ص 455)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد -وهو القرشي الهاشمي. وأخرجه أحمد (١٥٥٥١)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٧٨٠)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٢٦٢٠)، والبيهقي في "السُّنن" ١٠/ ٤٠ من طريق يزيد بن أبي زياد، بهذا الإسناد. * إسناده ضعيف كسابقه
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا الأَجْلَحُ الْكِنْدِيُّ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ الأَصَمِّ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِذَا حَلَفَ أَحَدُكُمْ فَلاَ يَقُلْ مَا شَاءَ اللَّهُ وَشِئْتَ . وَلَكِنْ لِيَقُلْ مَا شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ شِئْتَ " .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমাদের কেউ যেন শপথ করা কালে এভাবে না বলে, “আল্লাহ যা চান এবং তুমি যা ইচ্ছা করো”। বরং সে যেন বলে, “আল্লাহ্ যা ইচ্ছা করেন, এরপর তুমি যা ইচ্ছা করছো”। [২১১৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف هشام بن عمار والأجلح الكندي -ويقال: اسمه يحيى بن عبد الله الكندي-. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (١٠٧٥٩) من طريق عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٣٩). ويشهد له ما بعده. وكذا حديث قتلة بنت صيفي عند أحمد (٢٧٠٩٣)، والنسائي ٧/ ٦، وإسناده صحيح.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ، عَنْ رِبْعِيِّ بْنِ حِرَاشٍ، عَنْ حُذَيْفَةَ بْنِ الْيَمَانِ، أَنَّ رَجُلاً، مِنَ الْمُسْلِمِينَ رَأَى فِي النَّوْمِ أَنَّهُ لَقِيَ رَجُلاً مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ فَقَالَ نِعْمَ الْقَوْمُ أَنْتُمْ لَوْلاَ أَنَّكُمْ تُشْرِكُونَ تَقُولُونَ مَا شَاءَ اللَّهُ وَشَاءَ مُحَمَّدٌ . وَذَكَرَ ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَقَالَ " أَمَا وَاللَّهِ إِنْ كُنْتُ لأَعْرِفُهَا لَكُمْ قُولُوا مَا شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ شَاءَ مُحَمَّدٌ " .
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ أَبِي الشَّوَارِبِ، حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ، عَنْ رِبْعِيِّ بْنِ حِرَاشٍ، عَنِ الطُّفَيْلِ بْنِ سَخْبَرَةَ، أَخِي عَائِشَةَ لأُمِّهَا عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِنَحْوِهِ .
হুযায়ফাহ ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মুসলিম ব্যক্তি স্বপ্ন দেখে যে, আহলে কিতাবের এক ব্যক্তির সাথে তার সাক্ষাত হলে সে বললো, তোমরা কতই না উত্তম জাতি, যদি তোমরা শেরেক না করতে। তোমরা বলে থাকো, “আল্লাহ্ যা ইচ্ছা করেন এবং মুহাম্মাদ যা ইচ্ছা করেন”। অতঃপর সে স্বপ্নের কথাটি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট বর্ণনা করলো। তিনি বলেনঃ আল্লাহ্র শপথ! শোনো, আমি তো তোমাদের এরূপ কিছু বলতে শিখাইনি। তোমরা বলবে, “আল্লাহ্ যা ইচ্ছা করেন, এরপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা চান”।
[উপরোক্ত হাদীসে মোট ২টি সানাদের ১টি বর্ণিত হয়েছে, অপর সানাদটি হলোঃ] .
২/২১১৮ (১) . আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) , এর মায়ের সম্পর্কের ভাই তুফায়ল বিন সাখবারাহ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে অনুরুপ হাদীস বর্ণনা করেন। [২১১৮]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: ضعیف ، عبدالملک بن عمیر عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 455)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. وهذا إسناد اختلف فيه على عبد الملك بن عمير، فرواه سفيان بن عيينة عنه هكذا، ورواه معمر عنه عن جابر بن سمرة، ورواه جمع غفير عنه عن ربعي، عن الطفيل بن سخبرة أخي عائشة، وهو المحفوظ الذي رجحه البخاري في "التاريخ الكبير" ٤/ ٣٦٣ - ٣٦٤، والبزار في "مسنده" ٧/ ٢٥٣. وأخرجه أحمد (٢٣٣٣٩)، والنسائي في "الكبرى" (١٠٧٥٤) من طريق سفيان ابن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (٢٣٢٦٥)، وأبو داود (٤٩٨٠)، والنسائي في "الكبرى" (١٠٧٥٥) من طريق عبد الله بن يسار، عن حذيفة. وأخرجه أحمد (٢٣٣٨٢)، والدارمي (٢٦٩٩) وابن قانع في "معجم الصحابة" ٢/ ٥٠، والطبراني في "الكبير" (٨٢١٤)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ١/ ٣٠٣، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٣/ ٣٩١ من طريق شعبة بن الحجاج، وأحمد (٢٠٦٩٤)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٢٧٤٣)، وابن قانع ٢/ ٥٠، والحاكم ٣/ ٤٦٣، والبيهقي في "دلائل النبوة" ٢٢/ ٧، والخطيب في "الموضح" ١/ ٣٠٣، والحازمي في "الاعتبار" ص ٢٤٢ - ٢٤٣، والمزي في "تهذيب الكمال" ١٣/ ٣٩١ من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن عبد الملك بن عمير، عن ربعي بن حراش، عن الطفيل بن سخبرة. وإسناده صحيح. وهو عند المصنف بعده من طريق أبي عوانة، عن عبد الملك كرواية شعبة وحماد. * إسناده صحيح.وانظر ما قبله. ابن أبي الشوارب: هو محمَّد بن عبد الملك ابن أبي الشوارب
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، عَنْ إِسْرَائِيلَ، ح وَحَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَكِيمٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ مَهْدِيٍّ، عَنْ إِسْرَائِيلَ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ عَبْدِ الأَعْلَى، عَنْ جَدَّتِهِ، عَنْ أَبِيهَا، سُوَيْدِ بْنِ حَنْظَلَةَ قَالَ خَرَجْنَا نُرِيدُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَمَعَنَا وَائِلُ بْنُ حُجْرٍ فَأَخَذَهُ عَدُوٌّ لَهُ فَتَحَرَّجَ النَّاسُ أَنْ يَحْلِفُوا فَحَلَفْتُ أَنَا أَنَّهُ أَخِي فَخَلَّى سَبِيلَهُ فَأَتَيْنَا رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَأَخْبَرْتُهُ أَنَّ الْقَوْمَ تَحَرَّجُوا أَنْ يَحْلِفُوا وَحَلَفْتُ أَنَا أَنَّهُ أَخِي فَقَالَ " صَدَقْتَ الْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ " .
সুওয়ায়দ বিন হানযালাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর উদ্দেশে বের হলাম এবং আমাদের সাথে ছিলেন ওয়াইল বিন হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তার এক শত্রু তাকে ধরে ফেলে। সাথের লোকজন শপথ করতে রাযী হলো না। তাই আমি শপথ করে বললাম যে, সে আমার ভাই। অতএব সে তাকে ছেড়ে দেয়। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে তাঁকে জানালাম যে, দলের লোকজন শপথ করতে সম্মত না হওয়ায় আমি শপথ করে বলি যে, সে আমার ভাই। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তুমি সত্য বলেছো। এক মুসল্মান অপর মুসলমানের ভাই। [২১১৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، قال المنذري في "تهذيب سنن أبي داود" ٤/ ٣٥٩: الحديث أخرجه ابن ماجه. وسويد بن حنظلة لم ينسب، ولم يعرف له غير هذا الحديث، وقال ابن حجر في "الإصابة" ٣/ ٢٢٥: قال الأزدي: ما روى عنه إلا ابنته، وابنته هذه مجهولة لا تعرف. وباقي رجاله رجال الصحيح. ويشده ويقويه حديث البخاري (٣٣٥٨) وفيه: أن إبراهيم ﵇ لما سأله الجبار عن زوجته سارة، قال: هي أختي، وأورد البخاري هذه القطعة في كتاب الطلاق، باب إذا قال لامرأته وهو مكره: هذه أختي فلا شيءَ عليه، قال النبي ﷺ: "قال إبراهيم لسارة: هذه أختي، وذلك في ذات الله ﷿". وأخرج حديث سويد أبو داود (٣٢٥٦) من طريق إسرائيل، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٧٢٦)، وانظر تمام تخريجه فيه.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ، أَنْبَأَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ عَبَّادِ بْنِ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ " إِنَّمَا الْيَمِينُ عَلَى نِيَّةِ الْمُسْتَحْلِفِ " .
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ শপথের ফলাফল শপথকারীর অভিপ্রায়ের উপর নির্ভরশীল। [২১২০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن. عباد بن أبي صالح -ويقال له: عبد الله- روى له مسلم هذا الحديث، ووثقه ابن معين، وقال الساجي -وتبعه الأزدي-: ثقة إلا أنه روى عن أبيه ما لا يتابع عليه، قال الذهبي في "الكاشف": مختلف في توثيقه، وحديثه حسن، وقال في "الميزان": صالح الحديث. قلنا: لكن قال البخاري: منكر الحديث، وذكره ابن حبان والعقيلي في "الضعفاء" وقال الحافظ في "التقريب": لين الحديث. وقد صرح هشيم بالسماع عند مسلم وأحمد وغيرهما. وأخرجه مسلم (١٦٥٣) عن أبي بكر بن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٦٥٣)، وأبو داود (٣٢٥٥)، والترمذي (١٣٥٤) من طريق هشيم بن بشير، به. لكن بلفظ: "يمينُك على ما يصدقك به صاحبك" وهو في "مسند أحمد" (٧١١٩) عن هشيم، بهذا اللفظ. قال النووي: وهذا الحديث محمول على الحلف باستحلاف القاضي، فإذا ادعى رجل على رجل حقًا، فحلفه القاضي، فحلف ووزَى، فنوى غير ما نوى القاضي، انعقدت يمينه على ما نواه القاضي، ولا تنفعه التورية، وهذا مجمع عليه.