সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا شَبَابَةُ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ، عَنْ مَعْقِلِ بْنِ يَسَارٍ الْمُزَنِيِّ، قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أُتِيَ بِفَرِيضَةٍ فِيهَا جَدٌّ فَأَعْطَاهُ ثُلُثًا أَوْ سُدُسًا .
মা‘কিল বিন ইয়াসার আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট শুনেছি যে, একটি ফারায়েযের বিষয় উথাপিত হলো, যাতে দাদাও অন্তভুক্ত ছিল। তিনি দাদাকে এক-তৃতীয়াংশ বা এক-ষষ্ঠাংশ দিয়েছেন। [২৭২২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، أبو إسحاق عنعن ، وحدیث أبي داود (2894،2895) یغني عنہ، (انوار الصحیفہ ص 477)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق. شبابة: هو ابن سوّار، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٢٩٩) من طريق النضر بن شميل، عن يونس ابن أبي إسحاق، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٣٠٩). وأخرجه أبو داود (٢٨٩٧) من طريق يونس بن عبيد، عن الحسن البصري: أن عمر قال: أيكم يعلم ما ورّث رسول الله ﷺ الجد؟ قال معقل بن يسار: أنا، ورثه رسول الله ﷺ السدس، قال: مع مَن؟ قال: لا أدري، قال: لا دريتَ فما تغني إذًا. وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٣٠٠) من طريق يونس بن عبيد، عن الحسن البصري: عن معقل بن يسار … وهذا إسناد رجاله ثقات لكن الحسن لم يصرح فيه بالسماع. قوله: فأعطاه ثلثًا أو سدسًا، قال تقي الدين عبد الغني الدهلوي في "إنجاح الحاجة": وفي رواية أحمد والترمذي وأبي داود عن عمران بن حصين قال: جاء رجل إلى رسول الله ﷺ قال: إن ابني مات فما لي من ميراثه؟ قال: "لك السدس" فلما ولى دعاه، قال: "لك سدسٌ آخر"، فلما ولّى دعاهُ، قال: "إن السدس الآخر طعمة. قالوا في صورة المسألة بأن مات رجل وخلّف بنتين وهذا السائل الذي هو الجد، فللبنتين الثلثان، فبقي الثلث فدفع السدس إليه بالفرض، ثم دفع سدسًا آخر لتعصيب، ولم يدفع الثلث مرة واحدة، لئلا يُتوهم أن فرضه الثلث، وإنما سماه طعمة لكونه زائدًا على أصل الفرض الذي لا يتغير. كذا في "اللمعات" فما ذكره المؤلف بالتردد ثلثًا أو سدسًا من شك الراوي، فإنه أُعطي أولًا سدسًا، ثم صار ثلثًا بالتعصيب. وانظر ما بعده
قَالَ أَبُو الْحَسَنِ الْقَطَّانُ حَدَّثَنَا أَبُو حَاتِمٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ الطَّبَّاعِ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ مَعْقِلِ بْنِ يَسَارٍ، قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي جَدٍّ كَانَ فِينَا بِالسُّدُسِ .
মা‘কিল বিন ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মধ্যেকার দাদাকে এক-ষষ্ঠাংশ ওয়ারিসী স্বত্ব প্রদানের নির্দেশ দিলেন। [২৭২৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (2897)، (انوار الصحیفہ ص 477)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * رجاله ثقات، لكن الحسن -وهو البصري- لم يصرح بسماعه من معقل ابن يسار. أبو حاتم: هو محمَّد بن إدريس الرازي، وابن الطباع: هو محمَّد بن عيسى، ويونس: هو ابن عبيد البصري. تنبيه: هذا الحديث من زيادات القطان على "السُّنن"، وهو ليس في أصولنا العتيقة الثلاثة، وأثبتناه من بعض النسخ الخطية الموجودة عندنا ومن المطبوع
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ الْمِصْرِيُّ، أَنْبَأَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَنْبَأَنَا يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، حَدَّثَهُ عَنْ قَبِيصَةَ بْنِ ذُؤَيْبٍ، ح وَحَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ إِسْحَاقَ بْنِ خَرَشَةَ، عَنِ ابْنِ ذُؤَيْبٍ، قَالَ جَاءَتِ الْجَدَّةُ إِلَى أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ تَسْأَلُهُ مِيرَاثَهَا فَقَالَ لَهَا أَبُو بَكْرٍ مَا لَكِ فِي كِتَابِ اللَّهِ شَىْءٌ وَمَا عَلِمْتُ لَكِ فِي سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم شَيْئًا فَارْجِعِي حَتَّى أَسْأَلَ النَّاسَ . فَسَأَلَ النَّاسَ فَقَالَ الْمُغِيرَةُ بْنُ شُعْبَةَ حَضَرْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَعْطَاهَا السُّدُسَ فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ هَلْ مَعَكَ غَيْرُكَ فَقَامَ مُحَمَّدُ بْنُ مَسْلَمَةَ الأَنْصَارِيُّ فَقَالَ مِثْلَ مَا قَالَ الْمُغِيرَةُ بْنُ شُعْبَةَ فَأَنْفَذَهُ لَهَا أَبُو بَكْرٍ . ثُمَّ جَاءَتِ الْجَدَّةُ الأُخْرَى مِنْ قِبَلِ الأَبِ إِلَى عُمَرَ تَسْأَلُهُ مِيرَاثَهَا فَقَالَ مَا لَكِ فِي كِتَابِ اللَّهِ شَىْءٌ وَمَا كَانَ الْقَضَاءُ الَّذِي قُضِيَ بِهِ إِلاَّ لِغَيْرِكِ وَمَا أَنَا بِزَائِدٍ فِي الْفَرَائِضِ شَيْئًا وَلَكِنْ هُوَ ذَاكِ السُّدُسُ فَإِنِ اجْتَمَعْتُمَا فِيهِ فَهُوَ بَيْنَكُمَا وَأَيَّتُكُمَا خَلَتْ بِهِ فَهُوَ لَهَا .
মুগীরাহ ও মুহাম্মাদ বিন মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক দাদী বা নানী আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট এসে তার ওয়ারিসীর স্বত্ব সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বলেন, তোমার জন্য আল্লাহর কিতাবে কিছু নির্ধারিত নেই। আর রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর হাদীসেও তোমার জন্য কিছু নির্ধারিত আছে বলে আমি জানি না। তুমি ফিরে যাও, আমি লোকজনকে জিজ্ঞেস করে জেনে নেই। অতঃপর তিনি লোকজনের নিকট জিজ্ঞেস করলে মুগীরাহ বিন শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট উপস্থিত থাকা অবস্থায় তিনি তাকে এক-ষষ্ঠাংশ দিয়েছেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করেন, তুমি ছাড়া তোমার সাথে আরো কেউ উপস্থিত ছিল কি? তখন মুহাম্মাদ বিন মাসলামা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন এবং মুগীরা বিন শো‘বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-র অনুরূপ একই কথা বললেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য এ হুকুম জারী করে দিলেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট এক দাদী বা নানী এসে তার ওয়ারিসীর স্বত্ব সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো। তিনি বলেন, তোমার জন্য আল্লাহর কিতাবে কোন স্বত্ব নির্ধারিত নেই এবং ইতিপূর্বেকার যে ফয়সালা, তা ছিল তুমি ছাড়া ভিন্নজনের ব্যাপারে। আমি ফারায়েযে অতিরিক্ত কিছু যোগ করতে প্রস্তুত নই, বরং সেই এক-ষষ্ঠাংশই নির্ধারিত থাকবে। যদি দাদী-নানী দু’জনই একত্র হয় তবে ঐ এক-ষষ্ঠাংশ স্বত্ব তোমাদের দু’জনের মধ্যে সমানভাবে বন্টিত হবে। আর তোমাদের দু’জনের মধ্যে যদি একজন জীবিত থাকে সে একাই এই স্বত্ব পাবে। [২৭২৪]
তাহকীক আলবানীঃ দঈফ
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن قبيصة بن ذؤيب لم يشهد القصة فلم يثبت سماعه من أبي بكر، لكنه تابعي كبير، ولد على عهد النبي ﷺ، وجل روايته عن الصحابة، فلعله سمعه من محمَّد بن مسلمة أو المغيرة بن شعبة أو صحابي غيرها، وقد صححه ابن حبان، وقال الحافظ في "التلخيص" ٣/ ٨٢: إسناده صحيح لثقة رجاله، إلا أن صورته مرسلٌ. ورواية مالك أصح من رواية يونس بن يزيد لأن الزهري لم يسمعه من قبيصة كما قال النسائي بإثر الحديث (٦٣٠٨). وأخرجه أبو داود (٢٨٩٤)، والترمذي (٢٢٣٣)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣١٢) من طريق مالك بن أنس، بهذا الإسناد. وأخرجه الترمذي (٢٢٣٢) والنسائي في "الكبرى" (٦٣١١) من طريق سفيان ابن عيينة، عن الزهري، عن رجل، عن قبيصة، وقال مرة: عن الزهري، عن قبيصة. كذا عند الترمذي. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٦٣٠٥ - ٦٣١٠) من طرق عن الزهري، عن قبيصة وصرح الزهري في الرواية (٦٣٠٥) -وهي من طريق صالح بن كيسان عنه- بسماعه من قبيصة. ونقل المزي في "التحفة" (١١٢٣٢) عن النسائي قوله: حديث صالح خطأ، والزهري لم يسمعه من قبيصة. وهو في "مسند أحمد" (١٧٩٧٨) و (١٧٩٨٠)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٣١). وله شواهد عن عدة من الصحابة ذكرناها في "المسند" فراجعها هناك، وهي وإن كان في أسانيدها مقال، باجتماعها يحصُل للحديث قوة
حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَبْدِ الْوَهَّابِ، حَدَّثَنَا سَلْمُ بْنُ قُتَيْبَةَ، عَنْ شَرِيكٍ، عَنْ لَيْثٍ، عَنْ طَاوُسٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَرَّثَ جَدَّةً سُدُسًا .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক দাদীকে এক-ষষ্ঠাংশ ওয়ারিসী স্বত্ব দিয়েছেন। [২৭২৫]
তাহকীক আলবানীঃ সানাদ দঈফ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف. شريك - وهو ابن عبد الله القاضي وليث -وهو ابن أبي سليم- ضعيفان. وأخرجه ابن أبي شيبة ١١/ ٣٢١، والدارمي (٢٩٣٣)، والبيهقي ٦/ ٢٣٤ من طريق شريك بن عبد الله، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ ابْنُ عُلَيَّةَ، عَنْ سَعِيدٍ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ سَالِمِ بْنِ أَبِي الْجَعْدِ، عَنْ مَعْدَانَ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ الْيَعْمُرِيِّ، أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ، قَامَ خَطِيبًا يَوْمَ الْجُمُعَةِ أَوْ خَطَبَهُمْ يَوْمَ الْجُمُعَةِ فَحَمِدَ اللَّهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ وَقَالَ إِنِّي وَاللَّهِ مَا أَدَعُ بَعْدِي شَيْئًا هُوَ أَهَمُّ إِلَىَّ مِنْ أَمْرِ الْكَلاَلَةِ وَقَدْ سَأَلْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَمَا أَغْلَظَ لِي فِي شَىْءٍ مَا أَغْلَظَ لِي فِيهَا حَتَّى طَعَنَ بِإِصْبَعِهِ فِي جَنْبِي أَوْ فِي صَدْرِي ثُمَّ قَالَ " يَا عُمَرُ تَكْفِيكَ آيَةُ الصَّيْفِ الَّتِي نَزَلَتْ فِي آخِرِ سُورَةِ النِّسَاءِ " .
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জুমুআর দিন তাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতে দাঁড়ালেন এবং খুতবা দিলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করার পর বলেন, আল্লাহর শপথ! আমি আমার পরে কালালার চেয়ে গুরুতর কোন বিষয় রেখে যাচ্ছিনা। বিষয়টি সম্পর্কে আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে জিজ্ঞেস করলে তিনি আমাকে এতো কঠোর জবাব দেন যে, অন্য কোন বিষয়ে ততো কঠোর জবাব আমাকে দেননি। এমনকি তিনি তাঁর আঙ্গুল দিয়ে আমার উভয় পার্শ্বদেশে অথবা আমার বুকে খোঁচা মারেন, অতঃপর বললেনঃ হে উমর! তোমার জন্য গ্রীষ্মকালে নাযিলকৃত সুরা নিসার শেষ ভাগের আয়াতটিই (৪:১৭৬) যথেষ্ট। [২৭২৬]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (٥٦٧) و (١٦١٧)، والنسائي في "الكبرى" من طريق هشام الدستوائي، عن قتادة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (٢٠٩١). قوله: "آية الصيف" هي قوله تعالى: ﴿يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ﴾ [النساء: ١٧٦] وهي نزلت في الصيف، وهي أوضح من آية الشتاء التي هي في أول سورة النساء. قاله السندي. قال ابن الجوزي في "زاد المسير" ٢/ ٣١ - ٣٢: واختلفوا على ما يقع اسم الكلالة على ثلاثة أقوال: أحدها: أنه اسم للحي الوارث، وهذا مذهب أبي بكر الصديق وعامة العلماء الذين قالوا: إن الكلالة من دون الوالد والولد، فإنهم قالوا: الكلالة: اسم للورثة إذا لم يكن فيهم ولد ولا والد. والثاني: اسم للميت، قاله ابن عباس والسدي وأبو عبيدة في جماعهْ. والثالث: اسم للميت والحي، قاله ابن زيد. واسم الكلالة مأخوذ من الإحاطة، ومنه الإكليل لإحاطته بالرأس، أو من الكلال وهو التعب كأنه يصل إلى الميراث من بُعدٍ وإعياءٍ
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مُرَّةَ، عَنْ مُرَّةَ بْنِ شَرَاحِيلَ، قَالَ قَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ ثَلاَثٌ لأَنْ يَكُونَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَيَّنَهُنَّ أَحَبُّ إِلَىَّ مِنَ الدُّنْيَا وَمَا فِيهَا الْكَلاَلَةُ وَالرِّبَا وَالْخِلاَفَةُ .
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), হতে বর্ণিত, তিনটি বিষয় সম্পর্কে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্পষ্টভাবে বর্ণনা করে দিলে তা আমার জন্য দুনিয়া ও তার মধ্যেকার সব কিছুর চেয়ে প্রিয়তর হতো। তা হলঃ কালালা, সুদ এবং খিলাফত। [২৭২৭]
তাহকীক আলবানীঃ দঈফ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، مرۃ بن شراحیل عن عمر مرسل کما قال أبو حاتم الرازي (المراسیل ص، 208) ، وأصل الحدیث متفق علیہ (البخاري: 5588،مسلم: 3032) ولم یذکرا، الخلافۃ، (انوار الصحیفہ ص 477، 478)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح دون قوله: "والخلافة"، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن مرة بن شراحيل روايته عن عمر مرسلة، وقد روي الحديث من وجه آخر متصل، إلا أنه قال فيه: الجد، بدل: الخلافة. وأخرجه الطيالسي (٦٠)، وابن أبي شيبة ٦/ ٥٦٠، والطبري في "تفسيره" ٦/ ٤٢، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" ١٣/ ٢٢٤ و ٢٢٤ - ٢٢٥، والبيهقي ٦/ ٢٢٥ من طريق عمرو بن مرة، به. وأخرجه البخاري (٥٥٨٨)، ومسلم (٣٠٣٢)، وأبو داود (٣٦٦٩) من طريق أبي حيان يحيى بن سعيد بن حبان، عن الشعبي، عن ابن عمر، عن أبيه. وجاء عندهم: الجد، بدل: الخلافة. والذي استشكله سيدُنا عمر بن الخطاب في سنان الكلالة هو معناها والمقصود منها، هل هو ما عدا الولد والوالد، أم ما عدا الولد وحسب، وهل المسمى كلالة الموروث أم الوارث. انظر بيان ذلك في "جامع البيان" للطبري ٤/ ٢٨٣ - ٢٨٩، و"شرح مشكل الآثار" ١٣/ ٢٢٣ - ٢٣٦
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ الْمُنْكَدِرِ، سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ مَرِضْتُ فَأَتَانِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَعُودُنِي هُوَ وَأَبُو بَكْرٍ مَعَهُ وَهُمَا مَاشِيَانِ وَقَدْ أُغْمِيَ عَلَىَّ فَتَوَضَّأَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَصَبَّ عَلَىَّ مِنْ وَضُوئِهِ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَيْفَ أَصْنَعُ كَيْفَ أَقْضِي فِي مَالِي حَتَّى نَزَلَتْ آيَةُ الْمِيرَاثِ فِي آخِرِ النِّسَاءِ {وَإِنْ كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ كَلاَلَةً} الآيَةَ وَ {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلاَلَةِ} الآيَةَ .
জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি অসুস্থ হয়ে পড়লে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সাথে নিয়ে পদব্রজে আমাকে দেখতে এলেন। আমি বেহুঁশ হয়ে পড়লাম। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উযু করলেন, অতঃপর তাঁর উযুর পানি আমার গায়ে ছিটিয়ে দিলেন। (হুঁশ ফিরে এলে) আমি বললাম, ইয়া রাসুলুল্লাহ! আমি আমার সম্পদের ব্যাপারে কী করবো, আমি এ ব্যাপারে কী সিদ্ধান্ত নিবো? শেষভাগে মীরাছের আয়াত নাযিল হলো (অনুবাদ): “লোকে তোমার নিকট ব্যবস্থা জানতে চায়। বলো, পিতৃ-মাতৃহীন নিঃসন্তান অবস্থায় মারা গেলে এবং তার এক বোন থাকলে তার জন্য পরিত্যক্ত সম্পত্তির অর্ধাংশ এবং সে (বোন) নিঃসন্তান হলে তার ভাই তার ওয়ারিস হবে। আর দু’বোন থাকলে তার পরিত্যক্ত সম্পত্তির দুই-তৃতীয়াংশ তাদের প্রাপ্য। আর ভাই-বোন থাকলে এক পুরুষের অংশ দু’নারীর অংশের সমান। তোমরা যাতে পথভ্রষ্ট না হও সেজন্য আল্লাহ তোমাদের পরিষ্কারভাবে জানিয়ে দিচ্ছেন। আল্লাহ সর্ববিষয়ে সবিশেষ অবহিত” (সুরা নিসাঃ ১৭৬) [২৭২৮]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. هشام بن عمار متابع. لكن قول هشام: في آخر النساء، وهم، لأن الآية الأولى التي أشار إليها ليست في آخر النساء، وإنما في أولها، والثانية في آخرها. وأخرجه البخاري (١٩٤)، ومسلم (١٦١٦)، وأبو داود (٢٨٨٦)، والترمذي (٢٢٢٨) و (٣٢٦٣)، والنساني في "الكبرى" (٦٢٨٨) و (٦٢٨٧) و (٧٤٧٠) و (١١٠٦٩) من طرق عن محمَّد بن المنكدر، به. وجاء عندهم جميعًا غير البخاري: فنزلت آية الميراث ﴿يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ﴾ [النساء: ١٧٦]، وأما البخاري ومسلم في بعض مواضعه والنسائي في الموضين الثاني والثالث فجاءت رواياتهم بإطلاق قوله: فنزلت آية الفرائض، وبعضهم قال: آية الميراث، وهذا الإطلاق يقيد بما جاء في رواية الباقين. وأخرجه البخاري (٤٥٧٧)، ومسلم (١٦١٦)، والترمذي (٢٢٢٧) و (٣٢٦٢)، والنسائي (٦٢٨٩)، و (١١٠٢٥) من طريق ابن جريج، عن محمَّد بن المنكدر، به إلا أنه قال: فنزلت: ﴿يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ﴾ [النساء: ١١]. وأخرجه أبو داود (٢٨٨٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٢٩٠) و (٦٢٩١) و (٧٤٧١) من طريق أبي الزبير، عن جابر. وقال: فنزلت: ﴿يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ﴾ [النساء: ١٧٦]. وهو في "مسند أحمد" (٤١٨٦)، و "صحيح ابن حبان" (١٣٦٦) من طريق محمَّد بن المنكدر، وأحمد (١٤٩٩٨) من طريق أبي الزبير
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، عَنْ عَمْرِو بْنِ عُثْمَانَ، عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، رَفَعَهُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ يَرِثُ الْمُسْلِمُ الْكَافِرَ وَلاَ الْكَافِرُ الْمُسْلِمَ " .
উসামাহ বিন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ মুসলমান ব্যক্তি কাফের ব্যক্তির ওয়ারিস হবে না এবং কাফেরও মুসলমানের ওয়ারিস হবে না। [২৭২৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٤٢٨٣) و (٦٧٦٤)، ومسلم (١٦١٤)، وأبو داود (٢٩٠٩)، والترمذي (٢٢٣٩) و (٢٢٤٥)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٣٩) - (٦٣٤٧) و (٦٣٤٩) من طرق عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢١٧٤٧)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٣٣) وانظر تمام تخريجه عندهما. قال ابن المنذر: ذهب الجمهور إلى الأخذ بما دل عليه عموم حديث أسامة، إلا ما جاء عن معاذ قال: يرث المسلم من الكافر من غير عكسٍ، واحتج بأنه سمع رسول الله ﷺ يقول: "الإسلام يزيد ولا يَنقُص" نقله عنه الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٥٠ وقال: هو حديث أخرجه أبو داود [(٢٩١٢)]، وصححه الحاكم [٤/ ٣٤٥]. وقال الحافظ: وأخرج أحمد بن منيع بسند قوي عن معاذ أنه كان يورث المسلم من الكافر بغير عكس. وقال: وأخرج ابن أبي شيبة [١١/ ٣٧٤] من طريق عبد الله بن معقل قال: ما رأيت قضاء أحسن من قضاءِ قضى به معاوية: نرث أهل الكتاب ولا يرثونا، كما يحل لنا النكاح فيهم، ولا يحل لهم النكاح فينا، ثم قال: وبه قال مسروق وسعيد بن المسيب وإبراهيم النخعي وإسحاق. كذا عزاه الحافظ لأحمد بن منيع وقوى إسناده وإنما رواه أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (٤٠٨٣) عن يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، عن خالد الحذاء، عن عمرو بن كردي، عن يحيى بن يعمر: أن معاذ بن جبل كان يورث المسلم من الكافر … وهذا معضل، لأن بين عمرو وابن يعمر رجل، وبين ابن يعمر ومعاذ فيه رجلين فقد أخرجه أبو داود (٢٩١٢) عن مسدد، عن عبد الوارث، عن عمرو بن أبي حكيم [وهو ابن كردي نفسه]، عن عبد الله بن بريدة، عن أبي الأسود الدؤلي، عن رجل عن معاذ
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَنْبَأَنَا يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ الْحُسَيْنِ، أَنَّهُ حَدَّثَهُ أَنَّ عَمْرَو بْنَ عُثْمَانَ أَخْبَرَهُ عَنْ أُسَامَةَ بْنِ زَيْدٍ، أَنَّهُ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَتَنْزِلُ فِي دَارِكَ بِمَكَّةَ قَالَ " وَهَلْ تَرَكَ لَنَا عَقِيلٌ مِنْ رِبَاعٍ أَوْ دُورٍ " . وَكَانَ عَقِيلٌ وَرِثَ أَبَا طَالِبٍ هُوَ وَطَالِبٌ وَلَمْ يَرِثْ جَعْفَرٌ وَلاَ عَلِيٌّ شَيْئًا لأَنَّهُمَا كَانَا مُسْلِمَيْنِ وَكَانَ عَقِيلٌ وَطَالِبٌ كَافِرَيْنِ . فَكَانَ عُمَرُ مِنْ أَجْلِ ذَلِكَ يَقُولُ لاَ يَرِثُ الْمُؤْمِنُ الْكَافِرَ .
وَقَالَ أُسَامَةُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لاَ يَرِثُ الْمُسْلِمُ الْكَافِرَ وَلاَ الْكَافِرُ الْمُسْلِمَ " .
উসামাহ বিন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ইয়া রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি মক্কায় আপনার বাড়িতে অবস্থান করবেন? তিনি বলেনঃ আকীল কি আমাদের জন্য কোন ঘর-বাড়ি বা ঠিকানা অবশিষ্ট রেখেছে? (রাবী বলেন,) আকীল ও তালিবই আবু তালিবের ওয়ারিস হয়েছিল এবং জাফর ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার ওয়ারিস হননি। কেননা তারা দু’জন তখন (আবু তালিবের মৃত্যুর সময়) মুসলমান ছিলো। আর আকীল ও তালিব ছিল কাফের (আকীল পরে মুসলমান হন)। এ কারনেই উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেতেন, কোন মুমিন কোন কাফেরের ওয়ারিস হবে না। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ মুসলমান কাফেরের ওয়ারিস হবেনা এবং কাফেরও মুসলমানের ওয়ারিস হবেনা। [২৭৩০]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي. وأخرجه البخاري (٤٢٨٢) و (٤٢٨٣) من طريق محمَّد بن أبي حفصة، عن الزهري، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١٥٨٨)، والنسائي في "الكبرى" (٤٢٤١) من طريق يونس ابن يزيد، به. غير أنهما جعلا قوله: "لا يرث المؤمن الكافر" من قول عمر، ولم يذكراه من قول رسول الله ﷺ كما في هذه الرواية التي بينت أن عمر قاله وكذلك رسول الله ﷺ. وأخرج شطره الأول مسلم (١٣٥١) (٤٣٩) من طرق عن الزهري، به. وانظر ما قبله. وانظر ما سيأتي برقم (٢٩٤٢)
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا ابْنُ لَهِيعَةَ، عَنْ خَالِدِ بْنِ يَزِيدَ، أَنَّ الْمُثَنَّى بْنَ الصَّبَّاحِ، أَخْبَرَهُ عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ يَتَوَارَثُ أَهْلُ مِلَّتَيْنِ " .
আবদুল্লাহ বিন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ দু’ ভিন্ন ধর্মের লোক পরস্পরের ওয়ারিস হবে না। [২৭৩১]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف ابن لهيعة -وهو عبد الله- والمثنى بن الصباح كذلك، لكنها متابعان. وأخرجه أبو داود (٢٩١١) من طريق حبيب المعلم، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٥٠) من طريق عامر الأحول، و (٦٣٥١) من طريق يعقوب بن عطاء، ثلاثتهم عن عمرو بن شعيب، به. قال الحافظ في "الفتح" ١٢/ ٥١: سند أبي داود فيه إلى عمرو صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٦٦٦٤). قال الحافظ: وحملها الجمهور على أن المراد بإحدى الملتين الإسلام، وبالأخرى الكفر، فيكون مساويًا لرواية حديث أسامة، قال: وهو أولى من حملها على ظاهر عمومها
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، حَدَّثَنَا حُسَيْنٌ الْمُعَلِّمُ، عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ تَزَوَّجَ رِئَابُ بْنُ حُذَيْفَةَ بْنِ سُعَيْدِ بْنِ سَهْمٍ أُمَّ وَائِلٍ بِنْتَ مَعْمَرٍ الْجُمَحِيَّةَ فَوَلَدَتْ لَهُ ثَلاَثَةً فَتُوُفِّيَتْ أُمُّهُمْ فَوَرِثَهَا بَنُوهَا رِبَاعًا وَوَلاَءَ مَوَالِيهَا فَخَرَجَ بِهِمْ عَمْرُو بْنُ الْعَاصِ مَعَهُ إِلَى الشَّامِ فَمَاتُوا فِي طَاعُونِ عَمْوَاسَ فَوَرِثَهُمْ عَمْرٌو وَكَانَ عَصَبَتَهُمْ فَلَمَّا رَجَعَ عَمْرُو بْنُ الْعَاصِ جَاءَ بَنُو مَعْمَرٍ يُخَاصِمُونَهُ فِي وَلاَءِ أُخْتِهِمْ إِلَى عُمَرَ فَقَالَ عُمَرُ أَقْضِي بَيْنَكُمْ بِمَا سَمِعْتُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سَمِعْتُهُ يَقُولُ " مَا أَحْرَزَ الْوَلَدُ أَوِ الْوَالِدُ فَهُوَ لِعَصَبَتِهِ مَنْ كَانَ " . قَالَ فَقَضَى لَنَا بِهِ وَكَتَبَ لَنَا بِهِ كِتَابًا فِيهِ شَهَادَةُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ وَزَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ وَآخَرَ حَتَّى إِذَا اسْتُخْلِفَ عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ مَرْوَانَ تُوُفِّيَ مَوْلًى لَهَا وَتَرَكَ أَلْفَىْ دِينَارٍ فَبَلَغَنِي أَنَّ ذَلِكَ الْقَضَاءَ قَدْ غُيِّرَ فَخَاصَمُوهُ إِلَى هِشَامِ بْنِ إِسْمَاعِيلَ فَرَفَعَنَا إِلَى عَبْدِ الْمَلِكِ فَأَتَيْنَاهُ بِكِتَابِ عُمَرَ فَقَالَ إِنْ كُنْتُ لأَرَى أَنَّ هَذَا مِنَ الْقَضَاءِ الَّذِي لاَ يُشَكُّ فِيهِ وَمَا كُنْتُ أَرَى أَنَّ أَمْرَ أَهْلِ الْمَدِينَةِ بَلَغَ هَذَا أَنْ يَشُكُّوا فِي هَذَا الْقَضَاءِ . فَقَضَى لَنَا بِهِ فَلَمْ نَزَلْ فِيهِ بَعْدُ .
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাবাব বিন হুযায়ফাহ বিন সাঈদ বিন সাহম (রাহিমাহুল্লাহ) উম্মু ওয়াইল বিনতু মা‘মার আল-জুমাহিয়্যাকে বিবাহ করেন। তার গর্ভে তিনটি সন্তান জন্মগ্রহণ করে। অতঃপর তাদের মা মারা গেলে তার ওয়ারিসী সূত্রে তার পরিত্যক্ত সম্পত্তি ও তার মুক্ত দাসদের ওয়ালাআর মালিক হয়। অতঃপর ‘আমর ইবনুল আ‘স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে সিরিয়ায় নিয়ে যান। সেখানে তারা আমওয়াস নামক মহামারীতে আক্রান্ত হয়ে মারা যায়। অতঃপর ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ওয়ারিস হন। তিনি ছিলেন তাদের আসাবা। ‘আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে এলে মা‘মারের পুত্ররা এসে তাদের বোনের ওয়ালাআর দাবিদার হয়ে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট মামলা দায়ের করে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট যা শুনেছি তদনুযায়ী তোমাদের মধ্যে ফয়সালা করবো। আমি তাঁকে বলতে শুনেছিঃ পুত্র ও পিতা (ওয়ালাআ সূত্রে) যা পেয়েছে তা তার আসাবাগনের প্রাপ্য। রাবী বলেন, অতএব তিনি এ সম্পর্কে আমাদের অনুকূলে ফয়সালা দিলেন এবং আমাদেরকে একখানা পত্র লিখে দিলেন যাতে আব্দুর রহমান বিন আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যায়দ বিন সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আরো একজন সাক্ষী হয়েছিলেন। এরপর আব্দুল মালিক বিন মারওয়ানের খেলাফতকালে উম্মু ওয়াইলের এক মুক্ত দাস দু’ হাজার দীনার রেখে মারা গেলো। আমি অবহিত হলাম যে, পূর্বের সেই ফয়সালা পরিবর্তন করা হয়েছে। অতএব তারা হিশাম বিন ইসমাঈলের নিকট অভিযোগ দায়ের করলে তিনি আমাদেরকে আব্দুল মালেকের নিকট পাঠান। আমরা তার কাছে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর পত্রসহ উপস্থিত হলাম। তিনি বলেন, আমি জানতাম না যে, এই সুস্পষ্ট ফয়সালা নিয়েও লোকজন বিবাদ করবে। আমার ধারনা ছিল না যে, মদীনাবাসীদের অবস্থা এমন পর্যায়ে পৌঁছবে যে, তারা এই ফয়সালা নিয়ে সন্দেহ করবে। অতএব তিনি এ ব্যাপারে আমাদের পক্ষে রায় দিলেন এবং এরপর থেকে আমরা এ সম্পত্তি ওয়ারিসী সূত্রে ভোগদখল করে আসছি। [২৭৩২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن. حُسين المعلم: هو ابن ذكلوان، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه أبو داود (٢٩١٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣١٤) من طريق حسن المعلم، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة بالمرفوع فقط. وهو في "مسند أحمد" (١٨٣) مختصر بقصة الولاء. وهشام بن إسماعيل المذكور مخزومي قرشي ولاه عبد الملك بن مروان المدينةَ سنة اثنتين وثمانين للهجرة
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الأَصْبَهَانِيِّ، عَنْ مُجَاهِدِ بْنِ وَرْدَانَ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ مَوْلًى، لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَقَعَ مِنْ نَخْلَةٍ فَمَاتَ وَتَرَكَ مَالاً وَلَمْ يَتْرُكْ وَلَدًا وَلاَ حَمِيمًا فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم " أَعْطُوا مِيرَاثَهُ رَجُلاً مِنْ أَهْلِ قَرْيَتِهِ " .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর একটি মুক্ত দাস খেজুর গাছ থেকে পড়ে মারা যায়। তার কিছু সম্পদও ছিল, কিন্ত কোন সন্তান বা আত্মীয়-স্বজন ছিলো না। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তোমরা তার পরিত্যক্ত সম্পত্তি তার গ্রামের কোন লোককে দান করো। [২৭৩৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. مجاهد بن وردان -وإن قال ابن معين: لا أعرفه- وثقه أبو حاتم وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الترمذي عن حديثه: حسن. وأخرجه أبو داود (٢٩٠٢)، والترمذي (٢٢٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٥٨ - ٦٣٦٠) من طريق عبد الرحمن ابن الأصبهاني، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٠٥٤). قال ملا علي القاري في "مرقاة المفاتيح" ٣/ ٣٩٢: قال القاضي ﵀: إنما أمر أن يُعطي رجلًا من قريته تصدقًا منه أو ترفعًا، أو لأنه كان لبيت المال ومصرفه مصالح المسلمين وسد حاجاتهم، فوضعه فيهم لما رأى من المصلحة، فإن الأنبياء كما لا يُورَث عنهم، لا يرثون عن غيرهم
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا حُسَيْنُ بْنُ عَلِيٍّ، عَنْ زَائِدَةَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ شَدَّادٍ، عَنْ بِنْتِ حَمْزَةَ، - قَالَ مُحَمَّدٌ يَعْنِي ابْنَ أَبِي لَيْلَى وَهِيَ أُخْتُ ابْنِ شَدَّادٍ لأُمِّهِ - قَالَتْ مَاتَ مَوْلاَىَ وَتَرَكَ ابْنَةً فَقَسَمَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَالَهُ بَيْنِي وَبَيْنَ ابْنَتِهِ فَجَعَلَ لِيَ النِّصْفَ وَلَهَا النِّصْفَ .
হামযাহ (রা:)-র কন্যা উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমার এক মুক্ত দাস একটি কন্যা সন্তান রেখে মারা যায়। রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পরিত্যক্ত সম্পদ আমার ও তার সেই কন্যার মধ্যে বণ্টন করেন। তিনি আমাকে দিলেন অর্ধেক এবং তাঁকে দিলেন অর্ধেক। [২৭৩৪]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، محمد ابن أبي لیلی ضعیف ، وخالفہ شعبۃ عن الحکم عن عبد اللّٰہ بن شداد بہ مرسلاً،وأخرجہ أبو، داود فی المراسیل (ح364) ، وتابعہ غیر واحد عن الحکم بہ فالحدیث منقطع کما قال البیھقي (6/، 241)، (انوار الصحیفہ ص 478)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى القاضي، فقد كان سيئ الحفظ، وخالفه الثقات فرووهُ عن عبد الله بن شداد مرسلًا. وصحح المرسلَ النسائي في "الكبرى" بإثر (٦٣٦٦)، وكذلك الدارقطني كما في "التلخيص الحبير" ٣/ ٨٠، وهو كما قالا. وأخرجه ابن أبي شيبة ١/ ٢٦٧١، وابن أبي عاصم في "الآحاد" (٣١٦٣)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٦٥)، والطبراني في "الكبير" ٢٤/ (٨٧٤)، والحاكم ٤/ ٦٦، وابن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة فاطمة بنت حمزة من طريقين عن محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" كما في "نصب الراية" ٤/ ١٥٠ - وسقط من المطبوع كما توقعه محققه ﵀ بإثر الحديث (١٦٢١٠) - ومن طريقه الطبراني ٢٤/ (٨٧٩) عن سفيان الثوري، عن ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن عبد الله بن شداد: أن ابنة حمزة … هكذا مرسلًا. وأخرجه موصولًا الطبراني ٢٤/ (٨٧٥) من طريق جابر الجعفي، عن الحكم، به. وجابر ضعيف، فلا يعتدُّ بمتابعته. وأخرجه مرسلًا سعيد بن منصور (١٧٤)، وابن أبي شيبة ١١/ ٢٦٧، وأبو داود في "المراسيل" (٣٦٤)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٤٠١، والطبراني ٢٤/ (٨٨٠)، والبيهقي ٦/ ٢٤١ من طريق شعبة بن الحجاج، والنسائي (٦٣٦٦)، والطبراني ٢٤/ (٨٧٨) من طريق عبد الله بن عون، وأبو يوسف في "الآثار" (٧٧٤) وعنه محمَّد بن الحسن في "المبسوط" ٤/ ١٥٤ عن الإمام أبي حنيفة، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ٤٠١ من طريق أبان بن تغلب، أربعتهم عن الحكم بن عتيبة، عن عبد الله بن شداد: أن ابنة حمزة … وأخرجه مرسلًا كذلك عبد الرزاق (١٦٢١٠) من طريق سلمة بن كهيل، ومحمد بن الحسن في "المبسوط " ٤/ ١٥٧، وسعيد بن منصور (١٧٣)، وابن أبي شيبة ١١/ ٢٦٦، والطبراني في "الكبير" ٢٤/ (٨٨١) و (٨٨٢) و (٨٨٣) من طريق عُبيد -وقيل: عبد الله- بن أبي الجعد، وابن أبي شيبة ١١/ ٢٦٩، والطحاوي في "شرح المعاني" ٤/ ٤٠١، والطبراني ٢٤/ (٨٨٥)، والبيهقي ٦/ ٢٤١ من طريق منصور بن حيان الأسدي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٤٨٦٧)، وفي "شرح معاني الآثار" ٤/ ٤٠١ من طريق محمَّد بن عبد الله بن أبي يعقوب وأبي فزارة، والطبراني ٢٤/ (٨٨٤) من طريق عياش العامري، ستتهم عن عبد الله بن شداد: أن ابنة حمزة. وسقط من مطبوع "المبسوط": عبد الله بن شداد. وفي الباب عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري مرسلًا قال: توفي رجل وترك ابنتَه ومواليه، فقسم النبي ﷺ المال بينهما نصفين بين ابنته ومواليه. أخرجه ابن أبي شيبة ١١/ ٢٦٧ - ٢٦٨، وأبو داود في "المراسيل" (٣٦٣)، والبيهقي ٦/ ٢٤١. ورجاله ثقات. وعن ابن عباس عند الدارقطي (٤١٠٩) وفي إسناده سليمان بن داود الشاذكوني المنقري ضعيف جدًا، واتهمه بعضهم. قلنا: وصلةُ القربى التي تصل عبدَ الله بن شداد بابنة حمزة، حيث إنها أخته لأمه، وهي صاحبة القصة، تُقوي احتمالَ سماعِه للقصة منها، كيف وقد اعتَضَد ذلك بمرسل أبي بردة بن أبي موسى الأشعري
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنْ إِسْحَاقَ بْنِ أَبِي فَرْوَةَ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ حُمَيْدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ " الْقَاتِلُ لاَ يَرِثُ " .
আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, হত্যাকারী ওয়ারিস হবেনা (উত্তরাধিকার স্বত্ব পাবে না)। [২৭৩৫]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف جدًا، إسحاق بن أبي فروة -وهو ابن عبد الله- متروك الحديث. وقد سلف تخريجه برقم (٢٦٤٥). ويغني عنه حديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (٤٥٦٤)، والدارقطني (٤١٤٨) و (٤١٤٩)، والبيهقي ٦/ ٢٢٠ وإسناده حسن. وعن سعيد بن المسيب مرسلًا عند ابن أبي شيبة ١١/ ٣٥٩، وأبي داود في "المراسيل" (٣٦٠). ومراسيل ابن المسيب عند أهل العلم حجة. وانظر تمام شواهده في "مسند أحمد" (٣٤٧) عند حديث عمر بن الخطاب. وبعموم هذا الحديث أخذ أبو حنيفة وأصحابه والشافعي وأكثر العلماء، وذهب مالك وآخرون إلى أن قاتل العمد لا يرث شيئًا، ويرث قاتل الخطأ من المال ولا يرث من الدية. انظر "التمهيد" ٢٣/ ٤٤٤ - ٤٤٦، و "شرح السنة" للبغوي ٨/ ٣٦٧ قلنا: مستند الفريق الثاني وهو مالك ومن ذهب مذهبه في هذه المسألة هو حديث عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده الآتي بعده
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَمُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، قَالاَ حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، عَنِ الْحَسَنِ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سَعِيدٍ، - وَقَالَ مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى عَنْ عُمَرَ بْنِ سَعِيدٍ، - عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ جَدِّي عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَامَ يَوْمَ فَتْحِ مَكَّةَ فَقَالَ " الْمَرْأَةُ تَرِثُ مِنْ دِيَةِ زَوْجِهَا وَمَالِهِ وَهُوَ يَرِثُ مِنْ دِيَتِهَا وَمَالِهَا مَا لَمْ يَقْتُلْ أَحَدُهُمَا صَاحِبَهُ فَإِذَا قَتَلَ أَحَدُهُمَا صَاحِبَهُ عَمْدًا لَمْ يَرِثْ مِنْ دِيَتِهِ وَمَالِهِ شَيْئًا وَإِنْ قَتَلَ أَحَدُهُمَا صَاحِبَهُ خَطَأً وَرِثَ مِنْ مَالِهِ وَلَمْ يَرِثْ مِنْ دِيَتِهِ " .
আবদুল্লাহ বিন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন দাঁড়িয়ে বলেনঃ স্ত্রী তার স্বামীর দিয়াত ও পরিত্যক্ত সম্পদের ওয়ারিস হবে এবং স্বামী স্ত্রীর দিয়াত ও পরিত্যক্ত সম্পদের ওয়ারিস হবে, যদি না একজন অপরজনকে হত্যা করে। তাদের একজন অপরজনকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করলে সে তার দিয়াত ও সম্পদ কিছুরই ওয়ারিস হবে না। অবশ্য একজন অপরজনকে ভুলবশত হত্যা করলে তার সম্পদের ওয়ারিস হবে কিন্ত দিয়াতের ওয়ারিস হবে না। [২৭৩৬]
তাহকীক আলবানীঃ বানোয়াট।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * موضوع
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن إن شاء الله تعالى. الحسن بن صالح: هو ابن صالح بن حَي الفقيه الثقة، وشيخُه في هذا الحديث القولُ فيه ما قال علي بن محمَّد -وهو الطنافسي- بأنه محمَّد بن سعيد -وهو الطائفي- كما بينه الدارقطني في "سننه" (٤٠٧٥). وكذلك جاء اسمه في رواية الدارقطني من طريق محمَّد بن يحيى الذهلي، ولهذا رجح الذهبي فيما نقله ابن حجر في "تهذيب التهذيب" في ترجمة عمر بن سعيد أنه محمَّد ابن سعيد لجلالة الراوي محمَّد بن يحيى الذهلي، فكان الذهبي وقف على رواية الدارقطني هذه وبناة على ذلك رجح ما رجح. وقد أبعدَ البُوصيريُّ النُّجعة في "مصباح الزجاجة" فزعم أن محمَّد بن سعيد هذا هو ابن حسان المصلوب المتهم بالكذب، مما دفعه إلى تضعيف إسناد الحديث، وظن ذلك عبدُ الحق في "أحكامه الوسطى" ٣/ ٣٣٤، فردَّ عليه ابنُ القطان في "الوهم والإيهام" ٥/ ٤٠٤ وذكر كلام الدارقطني فيه. وفرَّق المزي في "تهذيبه" بين راوي هذا الحديث عن عَمرو بن شعيب، وبين محمَّد بن سعيد الطائفي ومحمد بن سعيد المصلوب، فعدَه راويا آخَرَ، ولذلك ترجم له ترجمة منفصلة، وتبعه الحافظ ابن حجر في "التقريب" فوصفه بالجهالة. وقد أعلَّ ابن الجوزي هذا الحديث في "التحقيق" (١٦٦١) بالحسن بن صالح استنادًا إلى قول ابن حبان: ينفرد عن الثقات بما لا يُشبه حديثَ الأثبات، وإنما قال ابن حبان ذلك في رجل آخر مجهول يروي عن ثابت عن النضر. فلم يُصِبِ ابنُ الجوزي فيما قاله، ووهم أيضًا ابنُ عبد الهادي في "التنقيح" (١٧٢٥) إذ تابع ابنَ الجوزي، لأن الحسن بن صالح هذا هو ابن صالح بن حي الفقيه الثقة، وهو الذي يروي عنه عُبيد الله بن موسى. وأخرجه ابنُ الجارُود (٩٦٧)، والدارقطني (٤٠٧٥)، والبيهقي ٦/ ٢٢١ من طريق محمَّد بن يحيى الذهلي، بهذا الإسناد. وجاء عند ابن الجارود كما جاء عند المصنف من تسمية الذهلي لهذا الرجل: عمر بن سعيد. وأخرجه الدارقطني (٤٠٧٤)، ومن طريقه البيهقي ٦/ ٢٢١ وابن الجوزي في "التحقيق" (١٦٦١) من طريق إسماعيل بن عبد الله بن ميمون، عن عُبيد الله بن موسى، عن حسن بن صالح، عن محمَّد بن سعيد، به. فسماه على الصواب، وفي هذا تقوية لما قاله علي بن محمَّد الطنافسي. وإلى هذا الحديث ذهب سعيد بن المسيب وعطاء والحسن والزهري ومكحول ومالك وابن أبي ذئب والأوزاعي وسعيد بن عبد العزيز وأبو ثور وداود، فيما نقله ابن عبد البر في "التمهيد" ٢٣/ ٤٤٤ - ٤٤٦
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ عَيَّاشِ بْنِ أَبِي رَبِيعَةَ الزُّرَقِيِّ، عَنْ حَكِيمِ بْنِ حَكِيمِ بْنِ عَبَّادِ بْنِ حُنَيْفٍ الأَنْصَارِيِّ، عَنْ أَبِي أُمَامَةَ بْنِ سَهْلِ بْنِ حُنَيْفٍ، أَنَّ رَجُلاً، رَمَى رَجُلاً بِسَهْمٍ فَقَتَلَهُ وَلَيْسَ لَهُ وَارِثٌ إِلاَّ خَالٌ فَكَتَبَ فِي ذَلِكَ أَبُو عُبَيْدَةَ بْنُ الْجَرَّاحِ إِلَى عُمَرَ فَكَتَبَ إِلَيْهِ عُمَرُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " اللَّهُ وَرَسُولُهُ مَوْلَى مَنْ لاَ مَوْلَى لَهُ وَالْخَالُ وَارِثُ مَنْ لاَ وَارِثَ لَهُ " .
আবূ উমামাহ বিন সাহল বিন হুনায়ফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, এক ব্যাক্তি অপর ব্যাক্তিকে তীর নিক্ষেপ করে হত্যা করলো। নিহতের এক মামা ছাড়া আর কোনো ওয়ারিস ছিলো না। আবূ উবায়দা ইবনুল জাররাহ(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নিয়ে উমর(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে পত্র লিখেন। উমর(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে লিখে জানান যে, নবী(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যার কোনো অভিভাবক নেই আল্লাহ ও তাঁর রাসুলই তার অভিভাবক এবং যার কোনো ওয়ারিস নেই মামাই তার ওয়ারিস। [২৭৩৭]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، ترمذي (2103)، (انوار الصحیفہ ص 478)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في الشواهد. عبد الرحمن بن الحارث ابن عياش يحسن حديثه في الشواهد. سفيان: هو الثوري. قال البزار (٢٥٣): أحسن إسناد فيه حديث أبي أمامة بن سهل. وأخرجه الترمذي (٢٢٣٥)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣١٧) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد، وقال الترمذي: حديث حسن. وهو في "مسند أحمد" (١٨٩)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٣٧). وفي الباب عن المقدام بن معدي كرب سيأتي بعده. وعن عائشة عند الترمذي (٢٢٣٦)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣١٨)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا شَبَابَةُ، ح وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْوَلِيدِ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، حَدَّثَنِي بُدَيْلُ بْنُ مَيْسَرَةَ الْعُقَيْلِيُّ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، عَنْ رَاشِدِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ أَبِي عَامِرٍ الْهَوْزَنِيِّ، عَنِ الْمِقْدَامِ أَبِي كَرِيمَةَ، - رَجُلٌ مِنْ أَهْلِ الشَّامِ مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ - قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ تَرَكَ مَالاً فَلِوَرَثَتِهِ وَمَنْ تَرَكَ كَلاًّ فَإِلَيْنَا - وَرُبَّمَا قَالَ فَإِلَى اللَّهِ وَإِلَى رَسُولِهِ - وَأَنَا وَارِثُ مَنْ لاَ وَارِثَ لَهُ أَعْقِلُ عَنْهُ وَأَرِثُهُ وَالْخَالُ وَارِثُ مَنْ لاَ وَارِثَ لَهُ يَعْقِلُ عَنْهُ وَيَرِثُهُ " .
মিকদাম আবু কারীমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোনো ব্যাক্তি সম্পদ রেখে গেলে তা তার ওয়ারিসদের প্রাপ্য। আর কোনো ব্যাক্তি ঋণের বোঝা বা অসহায় সন্তান রেখে গেলে সেগুলোর দায়িত্ব আমাদের উপর। তিনি কখনো বলতেনঃ তার দায়িত্ব আল্লাহ ও তাঁর রাসুলের উপর। যার কোনো ওয়ারিস নেই আমিই তার ওয়ারিস। আমিই তার পক্ষ থেকে দিয়াত পরিশোধ করবো এবং আমিই তার পরিত্যক্ত মাল গ্রহণ করবো। আর যার অন্য কোনো ওয়ারিস নেই মামাই তার ওয়ারিস। সে তার পক্ষ থেকে দিয়াত পরিশোধ করবে এবং তার পরিত্যাক্ত মাল গ্রহণ করবে। [২৭৩৮]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد جيد، علي بن أبي طلحة صدوق حسن الحديث، ولكنه متابع. أبو عامر الهَوزني: هو عبد الله بن لُحي. والمقدام أبو كريمة: هو المقدام ابن مَعدي كرِب الصحابي نفسه. وقد سلف برقم (٢٦٣٤). قال البغوي في "شرح السنة" ٨/ ٣٥٨: هذا الحديث حجة لمن ذهب إلى توريث ذوي الأرحام، وهم أولاد البنات، والجد أب الأم، وأولاد الأخت، وبنات الأخ، وبنات العم، والعم للأم، والعمة، والخال والخالة، فاختلف الناسُ في توريثهم، فذهب جماعة منهم إلى أنه لا ميراث لهم، بل يُصرف مالُ الميت الذي لم يخلف وارثًا إلى بيت مال المسلمين إرثًا لهم بأخوة الإسلام. وهو قول أبي بكر وزيد بن ثابت وابن عمر، وبه قال الزهري والأوزاعي ومالك والشافعي، وتأولوا حديث المقدام على أنه طعمة أطعمها الخال عند عدم الوارث، وسماه وارثًا مجازًا. وذهب كثير من أهل العلم إلى توريثهم عند عدم الورثة، وهو قول عمر وعلي وعبد الله بن مسعود وإليه ذهب الشعبي، وبه قال الثوري وأحمد وأصحاب الرأي
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَكِيمٍ، حَدَّثَنَا أَبُو بَحْرٍ الْبَكْرَاوِيُّ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنِ الْحَارِثِ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، قَالَ قَضَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّ أَعْيَانَ بَنِي الأُمِّ يَتَوَارَثُونَ دُونَ بَنِي الْعَلاَّتِ يَرِثُ الرَّجُلُ أَخَاهُ لأَبِيهِ وَأُمِّهِ دُونَ إِخْوَتِهِ لأَبِيهِ .
আলী বিন আবু তালিব(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফয়সালা দিয়েছেনঃ একই মায়ের সন্তানেরা পরস্পরের ওয়ারিস হবে, বৈমাত্রেয় ভাইগণ নয়। মানুষ তার সহোদর ভাই-বোনের ওয়ারিস হবে, বৈমাত্রেয় ভাই-বোনের নয়। [২৭৩৯]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: ضعیف ، انظر الحدیث السابق (2715)، (انوار الصحیفہ ص 478)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف الحارث -وهو ابن عبد الله الأعور- وأبو بحر البكراوي: واسمه عبد الرحمن بن عثمان -وهو وإن كان ضعيفًا- متابع، فتبقى علة الحديث في الحارث الأعور. وقد سلف برقم (٢٧١٥)
حَدَّثَنَا الْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ الْعَنْبَرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ ابْنِ طَاوُسٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " اقْسِمُوا الْمَالَ بَيْنَ أَهْلِ الْفَرَائِضِ عَلَى كِتَابِ اللَّهِ فَمَا تَرَكَتِ الْفَرَائِضُ فَلأَوْلَى رَجُلٍ ذَكَرٍ " .
ইবনু আব্বাস(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা যাবিল ফরুদের মধ্যে মৃতের সম্পদ বন্টন করো আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী। তাদের জন্য নির্ধারিত অংশ তাদেরকে দেয়ার পর যা অবশিষ্ট থাকবে তা (মৃতের) সবচেয়ে নিকটতম পুরুষ আত্মীয় পাবে। [২৭৪০]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. معمر: هو ابن راشد، وابن طاووس: هو عبد الله. وأخرجه البخاري (٦٧٣٢) و (٦٧٤٦)، ومسلم (١٦١٥)، وأبو داود (٢٨٩٨)، والترمذي (٢٢٢٩) و (٢٢٣٠)، والنسائي في "الكبرى" (٦٢٩٧) من طرق عن عبد الله ابن طاووس، به. وأخرجه النسائي (٦٢٩٨) من طريق سفيان الثوري، عن ابن طاووس، عن أبيه مرسلًا. وقال بإثره: كان حديث الثوري أشبهُ بالصواب. وهو في "مسند أحمد" (٢٦٥٧)، و"صحيح ابن حبان" (٦٠٢٨). تنبيه: هذا الحديث لم يرد في (ذ) و (م)، وأثبتناه من (س) والمطبوع، ولم يذكره المزي في "التحفة" (٥٧٠٥)، فاستدركه الحافظ ابن حجر في "النكت الظراف" وقال: أهمله المزي وهو ثابت في الأصل المعتمد
حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ مُوسَى، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عَوْسَجَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ مَاتَ رَجُلٌ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَلَمْ يَدَعْ لَهُ وَارِثًا إِلاَّ عَبْدًا هُوَ أَعْتَقَهُ فَدَفَعَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِيرَاثَهُ إِلَيْهِ .
ইবনু আব্বাস(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর যুগে এক ব্যাক্তি মারা গেলো এবং তার একটি মুক্ত দাস ছাড়া আর কোনো ওয়ারিস রেখে যায়নি। নবী(সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পরিতাক্ত সম্পত্তি সেই মুক্ত দাসকে দেন। [২৭৪১]
তাহকীক আলবানীঃ দঈফ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف. عوسجة -وهو مولى ابن عباس- قال البخاري: لم يصح حديثه، وقال غير واحدٍ من الأئمة: ليس بمشهور، ولم يرو عنه غير عمرو بن دينار، وذكره العقيلي في "الضعفاء" ٣/ ٤١٤، وقال: لا يتابع على حديثه هذا، وقال الذهبي: لا يُعرف. وأخرجه أبو داود (٢٩٠٥)، والترمذي (٢٢٣٨)، والنسائي في "الكبرى" (٦٣٧٦) و (٦٣٧٧) من طرق عن عمرو بن دينار، به. وهو في "مسند أحمد" (١٩٣٠)