সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو خَالِدٍ الأَحْمَرُ، عَنْ حَجَّاجٍ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ، قَالَ حَجَجْنَا مَعَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ فَلَمَّا أَرَدْنَا أَنْ نُفِيضَ، مِنَ الْمُزْدَلِفَةِ قَالَ إِنَّ الْمُشْرِكِينَ كَانُوا يَقُولُونَ أَشْرِقْ ثَبِيرُ كَيْمَا نُغِيرُ . وَكَانُوا لاَ يُفِيضُونَ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ فَخَالَفَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَأَفَاضَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ
আমর বিন মায়মূন হতে বর্ণিত, আমরা উমার ইবনূল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর সাথে হজ্জ করেছি। আমরা যখন মুযদালিফা থেকে প্রত্যাবর্তন করলাম তখন তিনি বলেন, মুশরিকরা বলতো, হে সাবীর (মুযদালিফার একটি পাহাড়) ! উজ্জ্বল হও, আমরা প্রত্যাবর্তন করবো। তারা সূর্য না উঠা পর্যন্ত (মুযদালিফা থেকে) প্রত্যাবর্তন করতো না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বিপরীত আমল করেন এবং সূর্যোদয়ের পূর্বে (মিনার উদ্দেশ্যে) রওয়ানা করেন। [৩০২২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، حجاج بن أرطاة- وإن كان مدلسًا وقد عنعن- قد توبع. وأخرجه البخاري (١٦٨٤) و (٣٨٣٨)، وأبو داود (١٩٣٨)، والترمذي (٩١١)، والنسائي ٥/ ٢٦٥ من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٦٠). وثبير: هو أعلى جبال مكة وأعظمها، ويقع بينها وبين مِنى. قال البغوي في "شرح السنة" ٧/ ١٧١: هذا هو سنةُ الإسلام أن يدفع من المزدلفة حين أسفر قبلَ طلوع الشمس، قال طاووس: كان أهلُ الجاهلية يدفعون من عرفة قبل أن تغيب الشمس، ومن المزدلفة بعد أن تطلع الشمس، ويقولون: أشرق ثبير كيما نغير، فأخر الله هذه، وقذَم هذه. قال الشافعي: يعني قدَّم المزدلفة قبل أن تطلع الشمس، وأخر عرفة إلى أن تغيب الشمس
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ رَجَاءٍ الْمَكِّيُّ، عَنِ الثَّوْرِيِّ، قَالَ قَالَ أَبُو الزُّبَيْرِ قَالَ جَابِرٌ أَفَاضَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ وَعَلَيْهِ السَّكِينَةُ وَأَمَرَهُمْ بِالسَّكِينَةِ وَأَمَرَهُمْ أَنْ يَرْمُوا بِمِثْلِ حَصَى الْخَذْفِ وَأَوْضَعَ فِي وَادِي مُحَسِّرٍ . وَقَالَ " لِتَأْخُذْ أُمَّتِي نُسُكَهَا فَإِنِّي لاَ أَدْرِي لَعَلِّي لاَ أَلْقَاهُمْ بَعْدَ عَامِي هَذَا "
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে ধীরেসুস্থে (মুযদালিফা থেকে) রওয়ানা করেন এবং লোকেদেরও শান্তভাবে রওয়ানা হতে বলেন। (মিনায় পৌঁছার পর) তিনি তাদের নির্দেশ দেন যে, তারা যেন ক্ষুদ্র কাঁকর নিক্ষেপ করে। তিনি নিজে (মুযদালিফা ও মিনার মাঝখানে অবস্থিত) ওয়াদী মুহাসসির দ্রুত অতিক্রম করেন এবং বলেনঃ আমার উম্মাত যেন হজ্জের অনুষ্ঠানাদি শিখে নেয়। কারণ এ বছরের পর হয়তো আমি তাদের সাথে মিলিত হতে পারবো না। [৩০২৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، أبو الزبير -وهو محمَّد بن مسلم بن تدرس- صرح بأنه سمع حجة النبي من جابر عند أحمد في "المسند" (١٤٤١٨). وأخرجه تامًا ومقطعًا مسلم (١٢٩٩)، وأبو داود (١٩٤٤)، والترمذي (٩٠١) و (٩١٢)، والنسائي ٥/ ٢٨٥ و ٢٦٧ و ٢٧٤ من طريق أبي الزبير، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٤٢١٨) و (١٤٥٥٣). قوله: "بمثل حص الخذف"، قال السندي: أي: بالحصى الذي يُرمى به بين الأصبعين، والمقصود به بيان صغر الحصى
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي رَوَّادٍ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ الْحِمْصِيِّ، عَنْ بِلاَلِ بْنِ رَبَاحٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ لَهُ غَدَاةَ جَمْعٍ " يَا بِلاَلُ أَسْكِتِ النَّاسَ " . أَوْ " أَنْصِتِ النَّاسَ " . ثُمَّ قَالَ " إِنَّ اللَّهَ تَطَوَّلَ عَلَيْكُمْ فِي جَمْعِكُمْ هَذَا فَوَهَبَ مُسِيئَكُمْ لِمُحْسِنِكُمْ وَأَعْطَى مُحْسِنَكُمْ مَا سَأَلَ ادْفَعُوا بِاسْمِ اللَّهِ " .
বিলাল বিন রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, মুযদালিফার দিন ভোরে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলেনঃ হে বিলাল! লোকেদের চুপ করতে বল। আতঃপর তিনি বলেনঃ এই মুযদালিফায় আল্লাহ তাআ’লা তোমাদের প্রতি যথেষ্ট অনুগ্রহ করেছেন, তোমাদের উত্তম লোকেদের ওয়াসীলায় তোমাদের গুনাহগারদের ক্ষমা করেছেন এবং তোমাদের মধ্যে সৎকর্মশীল ব্যক্তি যা প্রার্থনা করেছে তিনি তাকে তা দিয়েছেন। অতএব তোমরা আল্লাহর নাম নিয়ে প্রত্যাবর্তন কর। [৩০২৪]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، قال البوصیري: ’’ ھذا إسناد ضعیف،أبو سلمۃ ھذا لا یعرف، اسمہ وھو مجہول ‘‘ وللحدیث شواہد کلہا ضعیفۃ، (انوار الصحیفہ ص 485)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة أبي سلمة الحمصي. وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (٢٦٩٤) مرسلًا من طريق ابن أبي عدي، سمعت عبد العزيز بن أبي رواد في مسجد مِنى يحدث عن أبي سلمة الحمصي يرفعه إلى النبي ﷺ أنه أمر بلالًا في موقف جمع قبل الدفعة أن أسمعِ الناس … فذكر نحوه. وله شاهد لا يفرح به من حديث عبادة بن الصامت عند عبد الرزاق (٨٨٣١)، ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" ٢/ ٢١٥ - ٢١٦ عن معمر عمن سمع قتادة، عن خلاس بن عمرو، عن عبادة بن الصامت، رفعه. قال ابن الجوزي هذا الحديث لا يصح، فراويه عن قتادة مجهول، وخلاس ليس بشئ كان مغيرة لا يعبأ به، وقال أيوب: لا تَرو عنه فإنه صحيفي. وآخر من حديث ابن عمر عند أبي نعيم في "الحلية" ٨/ ١٩٩، ومن طريقه ابن الجوزي ٢/ ٢١٣ - ٢١٤ من طريق عبد العزيز بن أبي رواد، وأخرجه ابن الجوزي ٢/ ٢١٤ - ٢١٥ من طريق مالك بن أنس، كلاهما عن نافع عن ابن عمر رفعه. قال ابن الجوزي: لا يصح، أما الطريق الأول، قال: فتفرد به عبد العزيز بن أبي رواد ولم يتابع عليه، قال ابن حبان: كان يحدث على التوهم والحسبان فبطل الاحتجاج به، وقد رواه عنه اثنان: عبد الرحيم بن هارون، قال الدارقطني: متروك الحديث يكذب، والثاني بشار بن بكير وهو مجهول. وأما الطريق الثاني، قال: ففيه يحيى ابن عنبسة، قال ابن حبان: هو دجال يضع الحديث
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا مِسْعَرٌ، وَسُفْيَانُ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ كُهَيْلٍ، عَنِ الْحَسَنِ الْعُرَنِيِّ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَدَّمَنَا رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أُغَيْلِمَةَ بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ عَلَى حُمُرَاتٍ لَنَا مِنْ جَمْعٍ فَجَعَلَ يَلْطَحُ أَفْخَاذَنَا وَيَقُولُ " أُبَيْنِيَّ لاَ تَرْمُوا الْجَمْرَةَ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ " . زَادَ سُفْيَانُ فِيهِ " وَلاَ إِخَالُ أَحَدًا يَرْمِيهَا حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ " .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে অর্থাৎ আবদুল মুত্তালিব গোত্রের অল্প বয়স্কদের আমাদের গাধাগুলোয় চড়িয়ে মুযদালিফা থেকে আগেভাগে পাঠিয়ে দেন। তিনি আমাদের উরুর উপর হালকা আঘাত করে বলতেনঃ আমার কচিকাঁচা! সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত জামরায় পাথর নিক্ষেপ করো না। সুফইয়ান এর বর্ণনায় আরও আছে, সূর্যোদয়ের পূর্বে কেউ কাঁকর নিক্ষেপ করতো কিনা জানি না। [৩০২৫]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (1940) نسائي (3066)، (انوار الصحیفہ ص 485)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا سند رجاله ثقات إلا أنه منقطع، الحسن بن عبد الله العرني لم يلق ابن عباس، بل لم يدركه وهو يرسل عنه، صرَّح بذلك أحمد ويحيى ابن معين وأبو حاتم، وقد وصله ابن أبي شيبة عن سعيد بن جُبير أو عن الحسن، عن ابن عباس. وأخرجه أبو داود (١٩٤٠)، والنسائي ٥/ ٢٧٠ - ٢٧٢ من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي شيبة ص ٣٥٦ (الجزء الذي حققه عمر العمروي) عن جرير بن عبد الحميد، عن منصور، عن سلمة بن كهيل، عن الحسن العرني، عن سعيد بن جُبير أو عن الحسن، عن ابن عباس. وتقديمه ﷺ ضَعَفَةَ أهله ليلة المزدلفة أخرجه البخاري (١٦٧٨) و (١٨٥٦)، ومسلم (١٢٩٣) (٣٠٠) و (٣٠١)، وأبو داود (١٩٣٩)، والنسائي ٥/ ٢٦١ من طريق عبيد الله بن أبي يزيد، والبخاري (١٦٧٧)، والترمذي (٩٠٧) من طريق عكرمة مولى ابن عباس، والترمذي (٩٠٨) من طريق مقسم، ثلاثتهم عن ابن عباس. وقال الترمذي: حسن صحيح. وسيأتي بعد هذا عند المصنف من طريق عطاء، عن ابن عباس. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٨٢)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٦٩). قوله: "حُمُرات": جمع حُمُر، وحُمُر: جمع حمار. "يلطح" من اللطح، وهو الضرب الخفيف ببطن الكف ونحوه. قال أبو عُبيد في "غريب الحديث" ١/ ١٢٨ - ١٢٩: اللطح: الضرب، يقال منه: لطحت الرجل بالأرض. "أُبيني" تصغير، يريد يا بني. "الأغيلمة" تصغير الغلمة، كلما قالوا: أُصيبية في تصغير الصبية. قلنا: وفي هذا الحديث دليل على أنه لا يرمي جمرة العقبة إلا بعد طلرع الشمس، سواء كان ممن دفع قبل طلوع الفجر وبعده، قال البغوي في "شرح السنة" ٧/ ١٧٦ بتحقيقنا: واختلفوا فيمن رمى قبل طلوع الشمس، فذهب كثير من أهل العلم إلى أنه لا يجوز (وهو قول مجاهد والثوري والنخعي كما في "المغني" ٥/ ٢٩٥)، وذهب قوم إلى أنه يجوز بعد طلوع الفجر قبل طلرع الشمس، وهو قول أحمد ومالك وأصحاب الرأي، وذهب قوم إلى جوازه قبل طلرع الفجر بعد انتصاف ليلة النحر، وهو قول الشافعي
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا عَمْرٌو، عَنْ عَطَاءٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كُنْتُ فِيمَنْ قَدَّمَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فِي ضَعَفَةِ أَهْلِهِ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারের যেসব দুর্বল লোকেদের (মুযদালিফা থেকে মিনায়) আগেভাগে পাঠিয়ে দিয়েছিলেন, আমিও তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম। [৩০২৬]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وعمرو: هو ابن دينار، وعطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه مسلم (١٢٩٣) (٣٠٢) و (١٢٩٤) (٣٠٣)، وأبو داود (١٩٤١)، والنسائي ٥/ ٢٦١ و ٢٦٦ و ٢٧٢ من طريق عطاء بن أبي رباح، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ الْقَاسِمِ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ سَوْدَةَ بِنْتَ زَمْعَةَ، كَانَتِ امْرَأَةً ثَبِطَةً فَاسْتَأْذَنَتْ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَنْ تَدْفَعَ مِنْ جَمْعٍ قَبْلَ دُفْعَةِ النَّاسِ فَأَذِنَ لَهَا .
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নিশ্চয় সাওদা বিনতু যামআহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্থূলকায় ছিলেন। তিনি মুযদালিফা থেকে লোকেদের রওনা হওয়ার আগেই চলে যাওয়ার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট অনুমতি চাইলেন। তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। [৩০২৭]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وعبد الرحمن بن القاسم: هو ابن محمَّد بن أبي بكر الصديق التيمي. وأخرجه البخاري (١٦٨٠) و (١٦٨١)، ومسلم (١٢٩٠)، والنسائي ٥/ ١٦٢ - ٢٦٦ من طريق القاسم بن محمَّد، بهذا الأسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠١٥)، و "صحيح ابن حبان" (٣٨٦١). جمِع: مزدلفة. ثَبِطة -بفح الثاء وكسر الباء- أي: بطيئة الحركة، كأنها تثبط بالأرض، أي: تشبث بها
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَمْرِو بْنِ الأَحْوَصِ، عَنْ أُمِّهِ، قَالَتْ رَأَيْتُ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَوْمَ النَّحْرِ عِنْدَ جَمْرَةِ الْعَقَبَةِ وَهُوَ رَاكِبٌ عَلَى بَغْلَةٍ فَقَالَ " يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِذَا رَمَيْتُمُ الْجَمْرَةَ فَارْمُوا بِمِثْلِ حَصَى الْخَذْفِ " .
উম্মু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, কোরবানির দিন জামরাতুল আকাবার নিকটে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে খচ্চরের পিঠে আরোহিত অবস্থায় দেখেছি। তখন তিনি বলেছেনঃ হে লোকসকল! যখন তোমরা জামরায় (কংকর ) নিক্ষেপ করতে যাবে তখন সেখানে ক্ষুদ্র আকারের কংকর নিক্ষেপ করবে। [৩০২৮]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (1966) انظر الحدیث الآتي (3031،3532)، (انوار الصحیفہ ص 485)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، لضعف يزيد بن أبي زياد، ولجهالة حال سليمان بن عمرو بن الأحوص، فقد روى عنه اثنان، ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقال ابن القطان: مجهول، وقال الحافظ في "التقريب": مقبول. وأخرجه أبو داود (١٩٦٦) و (١٩٦٧) و (١٩٦٨) من طريق يزيد بن أبي زياد، بهذا الإسناد. وسيأتي عند المصنف برقم (٣٠٣١) و (٣٠٣١ م) وسميت الصحا بية هناك بأم جندب. ويشهد له حديث عبد الله بن عباس الآتي بعده. وحديث الفضل بن عباس، عند مسلم (١٢٨٢)، وأحمد (١٧٩٤)، وابن حبان (٣٨٥٥) و (٣٨٧٢)، وفيهما تمام تخريجه. وحديث جابر عند مسلم (١٢٩٩)، وأحمد (١٤٢١٩) وفيه تمام تخريجه. وحديث حرملة بن عمرو عند أحمد (١٩٠١٦) وفيه تمام تخريجه. أما حديث أم سليمان بن عمر بن الأحوص هذا فهو في "مسند أحمد" (١٦٠٨٧) وانظر تتمة تخريجه هناك
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ عَوْفٍ، عَنْ زِيَادِ بْنِ الْحُصَيْنِ، عَنْ أَبِي الْعَالِيَةِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ غَدَاةَ الْعَقَبَةِ وَهُوَ عَلَى نَاقَتِهِ " الْقُطْ لِي حَصًى " . فَلَقَطْتُ لَهُ سَبْعَ حَصَيَاتٍ هُنَّ حَصَى الْخَذْفِ فَجَعَلَ يَنْفُضُهُنَّ فِي كَفِّهِ وَيَقُولُ " أَمْثَالَ هَؤُلاَءِ فَارْمُوا " . ثُمَّ قَالَ " يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِيَّاكُمْ وَالْغُلُوَّ فِي الدِّينِ فَإِنَّمَا أَهْلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمُ الْغُلُوُّ فِي الدِّينِ " .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাতুল আকাবার ভোরে তাঁর উষ্ট্রীর পিঠে আরোহিত অবস্থায় বলেনঃ আমার জন্য কংকর সংগ্রহ করে লও। আমি তাঁর জন্য সাতটি কংকর সংগ্রহ করলাম। তা ছিল আকারে ক্ষুদ্র। তিনি তা নিজের হাতের তালুতে নাড়াচাড়া করতে করতে বলেনঃ এই আকারের ক্ষুদ্র কংকর নিক্ষেপ করবে। তিনি পুনরায় বলেনঃ দ্বীনের বিষয়ে বাড়াবাড়ি করা থেকে তোমরা সাবধান থাকো। কেননা তোমাদের পূর্বেকার লোকদেরকে দ্বীনের ব্যাপারে তাদের বাড়াবাড়ি ধ্বংস করেছে। [৩০২৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، أبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وعوف: هو ابن أبي جميلة، وأبو العالية: هو رفيع بن مهران الرياحي. وأخرجه النسائي ٥/ ٢٦٨ و ٢٦٩ من طريقين عن عوف بن أبي جميلة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥١)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٧١) وفيهما تمام تخريجه. وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنِ الْمَسْعُودِيِّ، عَنْ جَامِعِ بْنِ شَدَّادٍ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ يَزِيدَ، قَالَ لَمَّا أَتَى عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْعُودٍ جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ اسْتَبْطَنَ الْوَادِيَ وَاسْتَقْبَلَ الْكَعْبَةَ وَجَعَلَ الْجَمْرَةَ عَلَى حَاجِبِهِ الأَيْمَنِ ثُمَّ رَمَى بِسَبْعِ حَصَيَاتٍ يُكَبِّرُ مَعَ كُلِّ حَصَاةٍ ثُمَّ قَالَ مِنْ هَاهُنَا وَالَّذِي لاَ إِلَهَ غَيْرُهُ رَمَى الَّذِي أُنْزِلَتْ عَلَيْهِ سُورَةُ الْبَقَرَةِ .
আবদুল্লাহ বিন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আবদুল্লাহ বিন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জামরাতুল আকাবায় পৌঁছে উপত্যকার নিম্নভূমিতে কাবাকে সামনে রেখে এবং জামরাতুল আকাবাকে ডান দিকে রেখে সাতটি কংকর নিক্ষেপ করেন। তিনি প্রতিটি কংকর নিক্ষেপের সাথে সাথে তাকবীর ধ্বনি উচ্চারণ করেন, অতঃপর বলেন, সেই মহান সত্তার শপথ যিনি ব্যতীত কোন ইলাহ নেই! যে মহান ব্যক্তির উপর সূরা বাকারা নাযিল হয়েছিল তিনি এখান থেকে কংকর নিক্ষেপ করেছিলেন। [৩০৩০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، المسعودي -واسمه عبد الرحمن بن عبد الله- قد سمع منه وكيع قبل الاختلاط، وتابعه يحيى بن سعيد القطان عند أحمد (٤٠٨٩) وهو أيضا ممن سمع منه قبل الاختلاط. وقد توبع. وأخرجه البخاري (١٧٤٧) و (١٧٥٠)، ومسلم (١٢٩٦)، وأبو داود (١٩٧٤)، والترمذي (٩١٦) و (٩١٧)، والنسائي ٥/ ٢٧٣ و ٢٧٤ من طريق عبد الرحمن بن يزيد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٣٥٤٨) و (٣٨٧٤) و (٣٩٤٢)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَمْرِو بْنِ الأَحْوَصِ، عَنْ أُمِّهِ، قَالَتْ رَأَيْتُ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَوْمَ النَّحْرِ عِنْدَ جَمْرَةِ الْعَقَبَةِ اسْتَبْطَنَ الْوَادِيَ فَرَمَى الْجَمْرَةَ بِسَبْعِ حَصَيَاتٍ يُكَبِّرُ مَعَ كُلِّ حَصَاةٍ ثُمَّ انْصَرَفَ .
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحِيمِ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَمْرِو بْنِ الأَحْوَصِ، عَنْ أُمِّ جُنْدُبٍ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِنَحْوِهِ .
উম্মু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি কোরবানির দিন জামরাতুল আকাবার নিকটে উপত্যকার কেন্দ্রস্থলে দাঁড়িয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে সাতটি কংকর নিক্ষেপ করতে দেখেছি। তিনি প্রতিটি কংকর নিক্ষেপের সাথে সাথে তাকবীর ধ্বনি উচ্চারণ করেন, অতঃপর প্রত্যাবর্তন করেন। [৩০৩১]
তাহকীক আলবানীঃ হাসান।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، انظر الحدیث السابق (3028) انظر الحدیث السابق (3532)، (انوار الصحیفہ ص 485)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وقد سلف برقم (٣٠٢٨). * حسن لغيره، وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا طَلْحَةُ بْنُ يَحْيَى، عَنْ يُونُسَ بْنِ يَزِيدَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنِ سَالِمٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ رَمَى جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ وَلَمْ يَقِفْ عِنْدَهَا وَذَكَرَ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَعَلَ مِثْلَ ذَلِكَ .
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি জামরাতুল আকাবায় কংকর নিক্ষেপের পর সেখানে আর অবস্থান করেন নি। তিনি আরও উল্লেখ করেন যে , নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও এরূপ করেন। [৩০৩২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري مطولًا ومختصرًا (١٧٥١) و (١٧٥٢) و (١٧٥٣) و (١٩٦٨)، والنسائي ٥/ ٢٧٦ - ٢٧٧ من طريق يونس بن يزيد -وهو الأيلي-، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣٨٨٧)، و"صحيح ابن حبان" (٦٤٠٤)
حَدَّثَنَا سُوَيْدُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنِ الْحَجَّاجِ، عَنِ الْحَكَمِ بْنِ عُتَيْبَةَ، عَنْ مِقْسَمٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ إِذَا رَمَى جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ مَضَى وَلَمْ يَقِفْ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাতুল আকাবায় কংকর নিক্ষেপ করে চলে যেতেন, অবস্থান করতেন না। [৩০৩৩]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، الحجاج -وهو ابن أرطاة- مدلس وقد عنعن، وسويد بن سعيد: قال الحافظ في "التقريب": صدوق في نفسه، إلا أنه عمي فصار يتلقن ما ليس من حديثه. ويشهد له حديثُ ابنِ عمر السالف قبله
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو خَالِدٍ الأَحْمَرُ، عَنْ حَجَّاجٍ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ مِقْسَمٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَمَى الْجَمْرَةَ عَلَى رَاحِلَتِهِ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সওয়ারীতে আরোহিত অবস্থায় জামরায় কংকর নিক্ষেপ করেন। [৩০৩৪]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، حجاج -وهو ابن أرطاة- مدلس، وقد عنعن. وأخرجه الترمذي (٩١٤) من طريق حجاج، بهذا الإسناد. وقال: حديث ابن عباس حديث حسن، والعمل عليه عند بعض أهل العلم، واختار بعضهم أن يمشي إلى الجمار، وقد روي عن ابن عمر، عن النبي ﷺ: أنه كان يمشي إلى الجمار. ووجه هذا الحديث عندنا أنه ركب في بعض الأيام ليُقتدى به في فعله، وكلا الحديثين مستعمل عند أهل العلم. اهـ. وفي الباب عن قدامة بن عبد الله، سيأتي بعد هذا. وعن أم سليمان بن عمرو بن الأحوص، سلف برقم (٣٥٢٨). وعن جابر، عند مسلم (١٢٩٧). وهو في "مسند أحمد" (٢٠٥٦)
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، عَنْ أَيْمَنَ بْنِ نَابِلٍ، عَنْ قُدَامَةَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْعَامِرِيِّ، قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَمَى الْجَمْرَةَ يَوْمَ النَّحْرِ عَلَى نَاقَةٍ لَهُ صَهْبَاءَ لاَ ضَرْبَ وَلاَ طَرْدَ وَلاَ إِلَيْكَ إِلَيْكَ .
কুদামাহ বিন আবদুল্লাহ আল-আমিরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে কোরবানির দিন লাল-সাদা মিশ্র বর্ণের একটি উষ্ট্রীতে সওয়ার অবস্থায় জামরায় কংকর নিক্ষেপ করতে দেখেছি। এতে না ছিল আঘাত, না ছিল হাঁকানো, না এদিক, না ওদিক। [৩০৩৫]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن، أيمن بن نابل، وثقه الثوري وابن معين وابن عمار الموصلي والنسائي والحاكم والعجلي، وقال ابن عدي: أرجو أن أحاديثه لا بأس بها، صالحة. وقال أبو حاتم: شيخ، وقال الدارقطني: ليس بالقوي، وقال يعقوب ابن شيبة: صدوق، وإلى الضعف ما هو. قلنا: وأخرج له البخاري متابعة، وباقي رجاله ثقات. وأخرجه الترمذي (٩١٩)، والنسائي ٥/ ٢٧٠ من طريق أيمن بن نابل، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث قدامة بن عبد الله حديث حسن صحيح، وإنما نعرف هذا الحديث من هذا الوجه، وهو حديث أيمن بن نابل، وهو ثقة عند أهل الحديث. وهو في "مسند أحمد" (١٥٤١٠) و (١٥٤١١). قال السندي في حاشيته على "المسند": قوله: "ولا إليك" اسم فعل بمعنى ابتعد وتنحَّ، ولا قول: إليك، أي: لم يكن ثَم شيء من هذه الأمور التي تفعل الآن بين أيدي الأمراء، فهي محدثة ومكروهة كسائر المحدثات، وفيه بيان تواضعه ﷺ، وأنه لم يكن على صفة الأمراء اليوم، والله تعالى أعلم،
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ أَبِي الْبَدَّاحِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَخَّصَ لِلرِّعَاءِ أَنْ يَرْمُوا يَوْمًا وَيَدَعُوا يَوْمًا .
আসিম বিন আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উট চারকদের একদিন কাঁকর নিক্ষেপ করার ও একদিন বিরতি দেয়ার অনুমতি দিয়েছেন। [৩০৩৬]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمَّد بن عمرو بن حزم الأنصاري، وعبد الملك بن أبي بكر: هو أخوه. وأخرجه أبو داود (١٩٧٦)، والترمذي (٩٧٥)، والنسائي ٥/ ٢٧٣ من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن أبي البداح. بهذا الإسناد. وقرن أبو داود بعبد الله بن أبي بكر أخاه محمدًا. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٧٧٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٨٨). وانظر ما بعده
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَنْبَأَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ، ح وَحَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ سِنَانٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، عَنْ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ، حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي بَكْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي الْبَدَّاحِ بْنِ عَاصِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ رَخَّصَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ لِرِعَاءِ الإِبِلِ فِي الْبَيْتُوتَةِ أَنْ يَرْمُوا يَوْمَ النَّحْرِ ثُمَّ يَجْمَعُوا رَمْىَ يَوْمَيْنِ بَعْدَ النَّحْرِ فَيَرْمُونَهُ فِي أَحَدِهِمَا - قَالَ مَالِكٌ ظَنَنْتُ أَنَّهُ قَالَ فِي الأَوَّلِ مِنْهُمَا - ثُمَّ يَرْمُونَ يَوْمَ النَّفْرِ .
আসিম বিন আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উট চারকদের মিনায় অথবা তার বাইরে রাত যাপনের অনুমতি দিয়েছেন, যেন তারা কোরবানীর দিন কংকর নিক্ষেপ করে। এরপর কোরবানীর পরে দু’দিনের কংকর একসাথে নিক্ষেপ করবে। তারা ঐ দু’দিনের যে কোন একদিন তা নিক্ষেপ করবে। ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমার মনে হয় আবদুল্লাহ দিন আবূ বকর বলেছেন, প্রথম দিন (কোরবানির দিন) কংকর নিক্ষেপ করবে, অতঃপর প্রস্থানের দিন কংকর নিক্ষেপ করবে। [৩০৩৭]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، وهو في "الموطأ" ١/ ٤٠٩. وأخرجه أبو داود (١٩٧٥)، والترمذي (٩٧٦)، والنسائي ٥/ ٢٧٣ من طريق مالك بن أنس، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: وهذا حديث حسن صحيح، وهو أصح من حديث ابن عيينة عن عبد الله بن أبي بكر. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٧٧٦). قال الإمام مالك: تفسير الحديث الذي أرخص فيه رسول الله ﷺ لرعاء الإبل في تأخير رمي الجمار فيما نرى-والله أعلم- أنهم يرمون يوم النحر، فإذا مضى اليوم الذي يلي يوم النحر رَمَوا من الغد، وذلك يوم النفر الأول، فيرمون لليوم الذي مضى، ثم يرمون ليومهم ذلك، لأنه لا يقضي أحد شيئًا حتى يجب عليه، فإذا وجب عليه ومضى، كان القضاء بعد ذلك
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ أَشْعَثَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ حَجَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَمَعَنَا النِّسَاءُ وَالصِّبْيَانُ فَلَبَّيْنَا عَنِ الصِّبْيَانِ وَرَمَيْنَا عَنْهُمْ .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে হজ্জ করলাম। আমাদের সাথে মহিলা ও শিশুরা ছিল। আমরা শিশুদের পক্ষ থেকে তালবিয়া পাঠ ও কংকর নিক্ষেপ করেছি। [৩০৩৮]
তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، ترمذي (927)، (انوار الصحیفہ ص 485)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لضعف أشعث -وهو ابن سوار-، وأبو الزبير -وهو محمَّد ابن مسلم بن تدرس- مدلس وقد عنعن. وقد تابع أشعثَ بن سوار أيمنُ بن نابل عند البيهقي ٥/ ١٥٦. وأخرجه الترمذي (٩٤٥) من طريق عبد الله بن نمير، بهذا الإسناد. ولفظه: عن جابر قال: كنا إذا حججنا مع النبي ﷺ، فكنا نلبي عن النساء، ونرمي عن الصبيان. قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وقد أجمع أهل العلم على أن المرأة لا يلبي عنها غيرُها، بل هي تلبي عن نفسها، ويكره لها رفع الصوت بالتلبية. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٧٠) كلفظ حديث ابن ماجه
حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ أَبُو بِشْرٍ، حَدَّثَنَا حَمْزَةُ بْنُ الْحَارِثِ بْنِ عُمَيْرٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ لَبَّى حَتَّى رَمَى جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তালবিয়া পাঠ অব্যাহত রেখেছেন যতক্ষন না জামরাতুল আকাবায় (কোরবানীর দিন) কংকর নিক্ষেপ করেছেন। [৩০৩৯]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث بن عمير البصري، لكنه متابع. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه النسائي ٥/ ٢٦٨ من طريق سفيان الثوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (١٨٦٠) و (٢٥٦٤)، والبخاري (١٥٤٣) و (١٦٨٦) من طرق عن ابن عباس، به. وهو في "مسند أحمد" (٣١٩٩). وانظر ما بعده
حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ خُصَيْفٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قَالَ الْفَضْلُ بْنُ عَبَّاسٍ كُنْتُ رِدْفَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ فَمَا زِلْتُ أَسْمَعُهُ يُلَبِّي حَتَّى رَمَى جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ فَلَمَّا رَمَاهَا قَطَعَ التَّلْبِيَةَ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, ফাদল বিন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাথে একই বাহনে তাঁর পিছনে সওয়ার ছিলাম। আমি তাকে অনবরত তালবিয়া পাঠ করতে শুনেছি, যতক্ষন না তিনি জামরাতুল ‘আকাবায় কংকর নিক্ষেপ করেছেন। তিনি যখন তা নিক্ষেপ করেন, তখন তালবিয়া পাঠ বন্ধ করেছেন। [৩০৪০]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صيحح، وهذا إسناد ضعيف، لضعف خُصيف -وهو ابن عبد الرحمن الجزري. أبو الأحوص: هو سلَّام بن سُليم الحنفي، ومجاهد: هو ابن جبر المكي. وأخرجه النسائي ٥/ ٢٧٦ من طريق خصف، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (١٥٤٣) و (١٥٤٤) و (١٦٧٠) و (١٦٨٥) و (١٦٨٦) و (٧٦٨٧)، ومسلم (١٢٨١) و (١٢٨٢)، وأبو داود (١٨١٥)، والترمذي (٩٣٥)، والنسائي ٥/ ٢٥٨ و ٢٦٨ و٢٧٥ و ٢٧٦ من طرق عن عبد الله بن عباس، عن الفضل بن عباس، به. وهو في "مسند أحمد" (١٨٣١). وانظر ما قبله
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، ح وَحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ خَلاَّدٍ الْبَاهِلِيُّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، وَوَكِيعٌ، وَعَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، قَالُوا حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ كُهَيْلٍ، عَنِ الْحَسَنِ الْعُرَنِيِّ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ إِذَا رَمَيْتُمُ الْجَمْرَةَ فَقَدْ حَلَّ لَكُمْ كُلُّ شَىْءٍ إِلاَّ النِّسَاءَ . فَقَالَ لَهُ رَجُلٌ يَا ابْنَ عَبَّاسٍ وَالطِّيبُ فَقَالَ أَمَّا أَنَا فَقَدْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُضَمِّخُ رَأْسَهُ بِالْمِسْكِ أَفَطِيبٌ ذَلِكَ أَمْ لاَ .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন তোমরা জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলে, তখন স্ত্রীসংগ ব্যাতীত সবকিছু হালাল হয়ে গেল। এক ব্যক্তি তাকে জিজ্ঞেস করেন, হে বিন আব্বাস! সুগন্ধিও? তিনি বলেন, এ বিষয়ে আমার বক্তব্য এই যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে নিজ মাথায় কস্তুরী মাখতে দেখেছি (কংকর নিক্ষেপের পরে)। তা সুগন্ধি কি নয়? [৩০৪১]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، نسائي (3086)، (انوار الصحیفہ ص 486)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه بين الحسن العرني وبين ابن عباس. سفيان: هو ابن سعيد الثوري. وأخرجه النسائي ٥/ ٢٧٧ من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث عائشة الآتي بعده. وهو في "مسند أحمد" (٢٠٩٠). قوله: "بُضَمَّخُ رأسَه"، قال السندي: بضاد وخاء معجمتين بينهما ميم، من ضَمَخَ كَنَصَرَ، بمعنى تضمخ، وهو التلطخ بالشيء والإكثار منه، وفي "القاموس": الضمخ: لطخ الجسد بالطيب حتى كأنه يقطر