হাদীস বিএন


সুনান ইবনু মাজাহ





সুনান ইবনু মাজাহ (3042)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا خَالِي، مُحَمَّدٌ وَأَبُو مُعَاوِيَةَ وَأَبُو أُسَامَةَ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدٍ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ طَيَّبْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ لإِحْرَامِهِ حِينَ أَحْرَمَ وَلإِحْلاَلِهِ حِينَ أَحَلَّ ‏.‏




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে ইহরাম বাঁধার আগে সুগন্ধি লাগিয়ে দিয়েছি এবং যখন তিনি ইহরাম খুলেছেন তখনও। [৩০৪২]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. محمَّد: هو ابن عبيد الطنافسي، وأبو معاوية: هو محمَّد ابن خازم، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وعبيد الله: هو ابن عمر العمري. وقد سلف عند المصنف برقم (٢٩٢٦)، وسلف تخريجه هناك. وهو من هذا الطريق في "مسند أحمد" (٢٤٦٧٢)









সুনান ইবনু মাজাহ (3043)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَعَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، حَدَّثَنَا عُمَارَةُ بْنُ الْقَعْقَاعِ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏"‏ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِلْمُحَلِّقِينَ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ وَالْمُقَصِّرِينَ قَالَ ‏"‏ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِلْمُحَلِّقِينَ ‏"‏ ‏.‏ ثَلاَثًا قَالُوا يَا رَسُولَ اللَّهِ وَالْمُقَصِّرِينَ قَالَ ‏"‏ وَالْمُقَصِّرِينَ ‏"‏ ‏.‏




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করিয়েছে তাদের ক্ষমা করুন। সাহাবীগন বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! যারা নিজেদের মাথার চুল ছাঁটিয়েছে? তিনি বলেনঃ হে আল্লাহ! যারা নিজেদের মাথা মুণ্ডন করিয়েছে তাদের ক্ষমা করুন। এ কথা তিনি তিনাবার বলেন। সাহাবীগন বলেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! যারা নিজেদের মাথার চুল ছাঁটিয়েছে তাদের জন্যও। তিনি বলেনঃ যারা চুল ছাঁটিয়েছে তাদের জন্যও। [৩০৪৩]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٧٢٨)، ومسلم (١٣٠٢) من طريق محمَّد بن فضيل، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٣٠٢) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب، عن أبي هريرة. وهو في "مسند أحمد" (٧١٥٨)









সুনান ইবনু মাজাহ (3044)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَأَحْمَدُ بْنُ أَبِي الْحَوَارِيِّ الدِّمَشْقِيُّ، قَالاَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ نُمَيْرٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏"‏ رَحِمَ اللَّهُ الْمُحَلِّقِينَ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا وَالْمُقَصِّرِينَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏"‏ رَحِمَ اللَّهُ الْمُحَلِّقِينَ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا وَالْمُقَصِّرِينَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏"‏ رَحِمَ اللَّهُ الْمُحَلِّقِينَ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا وَالْمُقَصِّرِينَ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏"‏ وَالْمُقَصِّرِينَ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, যারা মাথা মুণ্ডন করিয়েছে আল্লাহ তাআলা তাদের প্রতি দয়া করুন। সাহাবীগণ বলেন, হে আল্লাহর রাসূল! যারা চুল ছাঁটিয়েছে তাদের প্রতিও। তিনি বলেনঃ যারা মাথা মুণ্ডন করিয়েছে আল্লাহ তাআলা তাদের প্রতি দয়া করুন। তারা বলেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! যারা চুল ছাঁটিয়েছে তাদের প্রতিও। তিনি বলেনঃ যারা চুল ছাঁটিয়েছে তাদের প্রতিও। [৩০৪৪]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. عبيد الله: هو ابن عمر العمري. وأخرجه البخاري (١٧٢٧)، ومسلم (١٣٠١)، وأبو داود (١٩٧٩)، والنسائي في "الكبرى" (٤٥٩٩) و (٤١٠١) من طريق نافع، بهذا الإسناد. وعلقه البخاري بصيغة الجزم بإثر الحديث (١٧٢٧) من طريق عبيد الله عن نافع، به. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٥٧)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٨٠)









সুনান ইবনু মাজাহ (3045)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا يُونُسُ بْنُ بُكَيْرٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي نَجِيحٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ قِيلَ يَا رَسُولَ اللَّهِ لِمَ ظَاهَرْتَ لِلْمُحَلِّقِينَ ثَلاَثًا وَلِلْمُقَصِّرِينَ وَاحِدَةً قَالَ ‏ "‏ إِنَّهُمْ لَمْ يَشُكُّوا ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, জিজ্ঞেস করা হলো, ইয়া রাসূলুল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করিয়েছে আপনি তাদের জন্য তিনবার, আর যারা চুল ছাঁটিয়েছে তাদের জন্য একবার মাত্র দুআ’ করেছেন, এর কারন কী? তিনি বলেনঃ যারা মাথা মুণ্ডন করিয়েছে তারা সন্দেহ করেনি (অর্থাৎ উত্তম কাজ সন্দেহমুক্তভাবে সমাধা করেছে)। [৩০৪৫]

তাহকীক আলবানীঃ হাসান।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، عبد اللّٰہ ابن أبي نجیح عنعن وھو مدلس ، (انوار الصحیفہ ص 486)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن من أجل محمَّد بن إسحاق. وأخرجه ابن أبي شيبة ١٤/ ٤٥٣، وأبو يعلى (٢٧١٨)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٢٥٥ - ٢٥٦ و ٢٥٦، وفي "شرح مشكل الآثار" (١٣٦٤) و (١٣٦٥) و (١٣٦٦)، وأبو يعلى (٢٧١٨) من طريق محمَّد بن إسحاق، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٣٣١١)، وانظر تتمة تخريجه هناك. قوله: "لم يشكُوا"، قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: لم يعاملوا معاملة من يشك في جواز التحلل، أي: من قصر، فكأنه شك في جواز التحلل حتى اقتصر في التحلل على بعضه، ومن حلق فلا يشك فيه، أي: لم يعاملوا معاملة من يشك في أن الاتباع أحسن، وأما من قصر، فقد عامل معاملة الشاك في ذلك، حيث ترك فِعلَه ﷺ، والله تعالى أعلم









সুনান ইবনু মাজাহ (3046)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ حَفْصَةَ، زَوْجَ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَتْ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا شَأْنُ النَّاسِ حَلُّوا وَلَمْ تَحِلَّ أَنْتَ مِنْ عُمْرَتِكَ قَالَ ‏ "‏ إِنِّي لَبَّدْتُ رَأْسِي وَقَلَّدْتُ هَدْيِي فَلاَ أَحِلُّ حَتَّى أَنْحَرَ ‏"‏ ‏.‏




হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! লোকেরা ইহরামমুক্ত হয়েছে, আর আপনি এখনও উমরার ইহরাম থেকে মুক্ত হননি, এর কারণ কী? তিনি বলেনঃ আমি আমার মাথার চুল জমাটবদ্ধ করে নিয়েছি এবং সাথে কোরবানির পশু এনেছি। তাই কোরবানী না করা পর্যন্ত আমি ইহরামমুক্ত হতে পারি না। [৩০৪৬]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه البخاري (١٥٦٦)، ومسلم (١٢٢٩)، وأبو داود (١٨٠٦)، والنسائي ١٣٦/ ٥ من طريق نافع، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٠٦٨) من مسند ابن عمر، و (٢٦٤٢٤) من مسند حفصة، وفي "صحيح ابن حبان" (٣٩٢٥)، وفيهما تمام تخريجه. وقد استدل بهذا الحديث على أن من اعتمر، فساق هديًا لا يتحللُ من عمرته حتى ينحر هديَه يوم النحر، وفي حديث عائشة عند البخاري (٣١٩) عن عروة عنها قالت: خرجنا مع النبي ﷺ في حجة الوداع، فمنا من أهل بعمرة ومنا من أهل بحج، فقدمنا مكة، فقال رسول الله ﷺ: "من أحرم بعمرة ولم يهد، فَليُحلِل، ومن أحرم بعمرة وأهدى، فلا يَحِل حتى يَحِل بنحرِ هديه، ومَنْ أهل بحج فليُتِمَّ حجَّه"









সুনান ইবনু মাজাহ (3047)


حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ الْمِصْرِيُّ، أَنْبَأَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَنْبَأَنَا يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُهِلُّ مُلَبِّدًا ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার মাথার চুল একত্রে জমাটবদ্ধ অবস্থায় লাব্বাইক ধ্বনি করেছেন। [৩০৪৭]
তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي. وأخرجه البخاري (١٥٤٠) و (٥٩١٤) و (٥٩١٥)، ومسلم (١١٨٤) (٢١) من طريق ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٦٠٢١) و (٦١٤٦). قوله: مُلَبِّدًا: قال الحافظ في "الفتح" ٣/ ٤٠٠: أي: أحرم وقد لبَّد شعر رأسه، أي: جعل فيه شيئًا نحو الصمغ ليجتمع شعره لئلا يتشعث في الإحرام، أو يقع فيه القمل









সুনান ইবনু মাজাহ (3048)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، وَعَمْرُو بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالاَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏ "‏ مِنًى كُلُّهَا مَنْحَرٌ وَكُلُّ فِجَاجِ مَكَّةَ طَرِيقٌ وَمَنْحَرٌ وَكُلُّ عَرَفَةَ مَوْقِفٌ وَكُلُّ الْمُزْدَلِفَةِ مَوْقِفٌ ‏"‏ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন মিনার সমস্ত এলাকাই কোরবানীর স্থান, মক্কার প্রতিটি প্রশস্ত সড়কই রাস্তা এবং কোরবানীর স্থান, আরাফাতের গোটা এলাকাই অবস্থানস্থল এবং মুযদালিফার সমস্ত এলাকাও অবস্থানস্থল। [৩০৪৮]

তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة بن زيد، وهو الليثي. عطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه أبو داود (١٩٣٧) من طريق أسامة بن زيد، بهذا الإسناد. وأخرجه مسلم (١٢١٨) (١٤٩)، وأبو داود (١٩٠٧) و (١٩٣٦)، والنسائي ٥/ ٢٥٥ - ٢٥٦ من طريق محمَّد بن علي بن أبي طالب عن جابر، به. ورواية النسائي مختصرة بعرفة. وسلف بنحوه بإسناد ضعيف من طريق محمَّد بن المنكدر عن جابر برقم (٣٠١٢). وهو في "مسند أحمد" (١٤٤٤٠) و (١٤٤٩٨)









সুনান ইবনু মাজাহ (3049)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ مَا سُئِلَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عَمَّنْ قَدَّمَ شَيْئًا قَبْلَ شَىْءٍ إِلاَّ يُلْقِي بِيَدَيْهِ كِلْتَيْهِمَا ‏ "‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, হজ্জের অনুষ্ঠানাদিতে অগ্র-পশ্চাৎ হয়ে যাওয়ার ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি দু’হাতের ইশারায় বলেনঃ কোন ক্ষতি নেই। [৩০৪৯]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تميمة السخياني. وأخرجه البخاري (٨٤) من طريق أيوب السخياني، بهذا الإسناد. وسيأتي بعد هذا من طريق خالد الحذاء عن عكرمة، ويأتي تخريجه هناك. وأخرجه البخاري (١٧٢١) و (١٧٢٢) و (١٧٣٤) و (٦٦٦٦)، وبإثر الحديث (١٧٢٢) - تعليقًا-، ومسلم (١٣٠٧)، والنسائي في "الكبرى" (٤٠٨٨) و (٤٠٨٩) من طرق، عن ابن عباس بنحوه. وبعضهم يزيد فيه على بعض. وهو في "مسند أحمد" (١٨٥٧) و (١٨٥٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٧٦). قوله: "لا حرج" أي: لا ضيق عليك في ذلك، والأعمال التي يقوم بها الحاج يوم النحر أربعة أشياء: رمي جمرة العقبة ثم نحر الهدي، ثم الحلق أو التقصير، ثم طواف الإفاضة، وقد اختلف العلماء في جواز تقديم بعضها على بعض، فأجمعوا على الإجزاء في ذلك كما قاله ابن قدامة في "المغني" ٥/ ٣٢٠، إلا أنهم اختلفوا في وجوب الدم في بعض ذلك. وقال القرطبي: روي عن ابن عباس ولم يثبت عنه: أن من قدم شيئًا على شيء فعليه دم (قلنا: رواه ابن أبي شيبة في "مصنفه" (الجزء المفقود- ص ٤١٦) وفي إسناده إبراهيم بن مهاجر، وهو لين، لكن رواه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٢/ ٢٣٨ بإسناد حسن عنه) وبه قال سعيد بن جبير وقتادة والحسن والنخعي وأصحاب الرأي. قال الحافظ في "الفتح" ١٣/ ٥٧١: وفي نسبة ذلك إلى النخعي وأصحاب الرأي نظر، فإنهم لا يقولون بذلك إلا في بعض المواضع. وذهب الشافعي وجمهور السلف والعلماء وفقهاء أصحاب الحديث إلى الجواز وعدم وجوب الدم لقوله للسائل: "لا حرج" فهو ظاهر في رفع الإثم والفدية معًا، لأن اسم الضيق يشملهما. قال الطحاوي في "شرح معاني الآثار"٢/ ٢٣٦: ظاهر الحديث يدل على التوسعة في تقديم بعض هذه الأشياء على بعض، إلا أنه يحتمل أن يكون قوله: "لا حرج" أي: لا إثم في ذلك الفعل، وهو كذلك لمن كان ناسيًا أو جاهلًا، وأما من تعمد المخالفة فتجب عليه الفدية. وتُعقب بأن وجوب الفدية يحتاج إلى دليل، ولو كان واجبا لبينه ﷺ حينئذ، لأنه وقت الحاجة، ولا يجوز تأخيره. وقال الطبري: "لم يُسقط النبي ﷺ الحرج إلا وقد أجزأ الفعل، إذ لو لم يجزئ الفعل لأمره بالإعادة، لأن الجهل والنسيان لا يضعان عن المرء الحكم الذي يلزمه في الحج كما لو ترك الرمي ونحوه، فإنه لا يأثم بتركه جاهلًا أو ناسيًا، لكن يجب عليه الإعادة









সুনান ইবনু মাজাহ (3050)


حَدَّثَنَا أَبُو بِشْرٍ، بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ زُرَيْعٍ، عَنْ خَالِدٍ الْحَذَّاءِ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُسْأَلُ يَوْمَ مِنًى فَيَقُولُ ‏"‏ لاَ حَرَجَ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏ فَأَتَاهُ رَجُلٌ فَقَالَ حَلَقْتُ قَبْلَ أَنْ أَذْبَحَ قَالَ ‏"‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ رَمَيْتُ بَعْدَ مَا أَمْسَيْتُ قَالَ ‏"‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, , মিনার দিবসে লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এসে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেতেন, কোন দোষ নেই, কোন ক্ষতি নেই। অতএব এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বললো, কোরবানীর পূর্বে আমি মাথা মুণ্ডন করিয়েছি। তিনি বলেনঃ কোন দোষ নেই। আরেকজন বললো, আমি সন্ধ্যায় কাঁকর নিক্ষেপ করেছি। তিনি বললেন, কোন ক্ষতি নেই। [৩০৫০]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (١٧٢٣) و (١٧٣٥)، وأبو داود (١٩٨٣)، والنسائي في "المجتبى" ٥/ ٢٧٢ من طريق خالد الحذاء، بهذا الإسناد. وانظر ما قبه









সুনান ইবনু মাজাহ (3051)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عِيسَى بْنِ طَلْحَةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ سُئِلَ عَمَّنْ ذَبَحَ قَبْلَ أَنْ يَحْلِقَ أَوْ حَلَقَ قَبْلَ أَنْ يَذْبَحَ قَالَ ‏ "‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন ‘আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট মাসাআলা জানতে চাওয়া হলো যে, কোন ব্যক্তি মাথা মুণ্ডনের পূর্বে কোরবানী করেছে অথবা কোন ব্যক্তি কোরবানীর পূর্বে কামিয়েছে। তিনি বলেনঃ তাতে কোন দোষ নেই। [৩০৫১]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: متفق علیہ




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٨٣)، ومسلم (١٣٠٦)، وأبو داود (٢٠١٤)، والترمذي (٩٣٣)، والنسائي في "الكبرى" (٤٠٩١) - (٤٠٩٤) من طريق ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (٦٤٨٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٧٧)، وانظر تتمة تخريجه فيهما









সুনান ইবনু মাজাহ (3052)


حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ سَعِيدٍ الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ، حَدَّثَنِي عَطَاءُ بْنُ أَبِي رَبَاحٍ، أَنَّهُ سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ قَعَدَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِمِنًى يَوْمَ النَّحْرِ لِلنَّاسِ فَجَاءَهُ رَجُلٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي حَلَقْتُ قَبْلَ أَنْ أَذْبَحَ قَالَ ‏"‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ جَاءَهُ آخَرُ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي نَحَرْتُ قَبْلَ أَنْ أَرْمِيَ قَالَ ‏"‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏ فَمَا سُئِلَ يَوْمَئِذٍ عَنْ شَىْءٍ قُدِّمَ قَبْلَ شَىْءٍ إِلاَّ قَالَ ‏"‏ لاَ حَرَجَ ‏"‏ ‏.‏




জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানীর দিন লোকেদের উদ্দেশে মিনায় বসলেন। এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কোরবানী করার পূর্বে মাথা মুণ্ডন করেয়েছি। তিনি বলেনঃ কোন দোষ নেই। অপর এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বললো, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি কংকর নিক্ষেপের পূর্বে কোরবানী করেছি। তিনি বলেনঃ কোন দোষ নেই। সেদিন কোন অনুষ্ঠান কোন অনুষ্ঠানের আগে বা পরে সম্পন্ন করার ব্যাপারে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেনঃ কোন দোষ নেই। [৩০৫২]

তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة بن زيد، وهو الليثي مولاهم. وعلقه البخاري بإثر الحديث (١٧٢٢) فقال: قال حماد، عن قيس بن سعد وعباد بن منصور، عن عطاء، عن جابر، عن النبي ﷺ. ووصله النسائي في "الكبرى" (٤٠٩٠) من طريق عفان، عن حماد بن سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، به. ووصله أيضًا النسائي، والطحاوي، والإسماعيلي، وابن حبان، والبيهقي، وابن حجر في "تغليق التعليق" من طرق عن حماد، به. انظر تعليقنا على "مسند أحمد" (١٤٤٩٨)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٧٨). ويشهد له الأحاديث السالفة قبله في الباب









সুনান ইবনু মাজাহ (3053)


حَدَّثَنَا حَرْمَلَةُ بْنُ يَحْيَى الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ رَمَى جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ ضُحًى وَأَمَّا بَعْدَ ذَلِكَ فَبَعْدَ زَوَالِ الشَّمْسِ ‏.‏




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে জামরাতুল আকাবায় পূর্বাহ্ণে পাথর নিক্ষেপ করতে দেখেছি। তিনি এরপরের (দিনগুলোতে) পাথর নিক্ষেপ করেন অপরাহ্ণে। [৩০৫৩]

তাহকীক আলবানীঃ হাসান সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح، وقد صرح ابن جريج وأبو الزبير -واسمه: محمَّد بن مسلم بن تدرس- بالتحديث عند مسلم وغيره. وأخرجه مسلم (١٢٩٩) (٣١٤)، وأبو داود (١٩٧١)، والترمذي (٩٠٩)، والنسائي ٥/ ٢٧٠ من طريق ابن جريج، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٥٤)، و"صحيح ابن حبان" (٣٨٨٦)









সুনান ইবনু মাজাহ (3054)


حَدَّثَنَا جُبَارَةُ بْنُ الْمُغَلِّسِ، حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي شَيْبَةَ أَبُو شَيْبَةَ، عَنِ الْحَكَمِ، عَنْ مِقْسَمٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يَرْمِي الْجِمَارَ إِذَا زَالَتِ الشَّمْسُ قَدْرَ مَا إِذَا فَرَغَ مِنْ رَمْيِهِ صَلَّى الظُّهْرَ ‏.‏




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (অপরাহ্ণে) সূর্য ঢলে যাওয়ার পর জামরায় কাঁকর নিক্ষেপ করতেন, কাঁকর নিক্ষেপের পর তাঁর নামায পরার সময় হয়ে যেতো। [৩০৫৪]

তাহকীক আলবানীঃ সানাদটি দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف الإسناد




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، جبارۃضعیف جدًا ، وأبو شیبۃ إبراہیم بن عثمان: متروک الحدیث ، وللحدیث شواہد دون قولہ ’’ قدر ما إذا فرغ من رمیہ صلی الظہر ‘‘، راجع سنن الترمذي (898)، (انوار الصحیفہ ص 486)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف، لضعف جُبارة بن المغلِّس، وشيخُهُ إبراهيم بن عثمان بن أبي شيبة متروك. الحكم: هو ابن عُتيبة. وأخرجه الترمذي (٩١٣) من طريق حجاج بن أرطاة، عن الحكم، بهذا الإسناد. وقد صرح الحجاج بالتحديث عند أحمد في "المسند" (٢٦٣٥). وانظر تمام تخريجه في "المسند" (٢٢٣١). ويشهد له ما قبله









সুনান ইবনু মাজাহ (3055)


حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَهَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ، قَالاَ حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنْ شَبِيبِ بْنِ غَرْقَدَةَ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ عَمْرِو بْنِ الأَحْوَصِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ ‏"‏ يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَلاَ أَىُّ يَوْمٍ أَحْرَمُ ‏"‏ ‏.‏ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ قَالُوا يَوْمُ الْحَجِّ الأَكْبَرِ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَإِنَّ دِمَاءَكُمْ وَأَمْوَالَكُمْ وَأَعْرَاضَكُمْ بَيْنَكُمْ حَرَامٌ كَحُرْمَةِ يَوْمِكُمْ هَذَا فِي شَهْرِكُمْ هَذَا فِي بَلَدِكُمْ هَذَا أَلاَ لاَ يَجْنِي جَانٍ إِلاَّ عَلَى نَفْسِهِ وَلاَ يَجْنِي وَالِدٌ عَلَى وَلَدِهِ وَلاَ مَوْلُودٌ عَلَى وَالِدِهِ ‏.‏ أَلاَ إِنَّ الشَّيْطَانَ قَدْ أَيِسَ أَنْ يُعْبَدَ فِي بَلَدِكُمْ هَذَا أَبَدًا وَلَكِنْ سَيَكُونُ لَهُ طَاعَةٌ فِي بَعْضِ مَا تَحْتَقِرُونَ مِنْ أَعْمَالِكُمْ فَيَرْضَى بِهَا أَلاَ وَكُلُّ دَمٍ مِنْ دِمَاءِ الْجَاهِلِيَّةِ مَوْضُوعٌ وَأَوَّلُ مَا أَضَعُ مِنْهَا دَمُ الْحَارِثِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ - كَانَ مُسْتَرْضِعًا فِي بَنِي لَيْثٍ فَقَتَلَتْهُ هُذَيْلٌ - أَلاَ وَإِنَّ كُلَّ رِبًا مِنْ رِبَا الْجَاهِلِيَّةِ مَوْضُوعٌ لَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَالِكُمْ لاَ تَظْلِمُونَ وَلاَ تُظْلَمُونَ أَلاَ يَا أُمَّتَاهُ هَلْ بَلَّغْتُ ‏"‏ ‏.‏ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ قَالُوا نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ اللَّهُمَّ اشْهَدْ ‏"‏ ‏.‏ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ ‏.‏




আমর ইবনুল আহ্ওয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কে বিদায় হজ্জে বলতে শুনেছিঃ হে লোকসকল! কোন্ দিনটি সর্বাধিক সম্মানিত? তিনি তিনবার এ কথা বলেন। তারা বলেন, হজ্জের বড় দিন। তিনি বলেনঃ তোমাদের রক্ত (জীবন) , তোমাদের সম্পদ, তোমাদের মান-সম্ভ্রম তোমাদের পরস্পরের জন্য (তাতে হস্তক্ষেপ করা) হারাম, যেভাবে তোমাদের এ দিনে, এই মাসে এবং এই শহরে হারাম। সাবধান! কেউ অপরাধ করলে সেজন্য তাকেই গ্রেপ্তার করা হবে। পিতার অপরাধের জন্য পুত্রকে দায়ী করা যাবে না এবং পুত্রের অপরাধের জন্য পিতাকে দায়ী করা যাবে না। জেনে রাখো ! তোমাদের এই শহরে শয়তান নিজের জন্য ইবাদাত পাওয়া থেকে চিরকালের জন্য নিরাশ হয়ে গেছে। কিন্তু কতগুলো কাজ যা তোমরা তুচ্ছজ্ঞানে করতে গিয়ে শয়তানের আনুগত্য করো এবং তাতে সে খুশি হয়ে যায়। সাবধান! জাহিলী যুগের সকল রক্তের (হত্যার) দাবি রহিত হলো। এসব দাবির মধ্যে আমি সর্ব প্রথম আল-হারিস বিন আবদুল মুত্তালিবের রক্তের দাবি রহিত করছি, সে লাইস গোত্রে প্রতিপালিত হওয়াকালে হুযাইল গোত্রের লোকেরা তাকে হত্যা করে। সাবধান! জাহিলী যুগের সমস্ত সূদের দাবি রহিত হলো। তবে তোমরা মূলধন ফেরত পাবে, তোমরাও জুলুম করবে না এবং জুলুমের শিকারও হবে না। শোনো হে আমার উম্মাত! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? একথা তিনি তিনবার জিজ্ঞেস করেন। তারা বলেন, হাঁ। তিনি বলেন, হে আল্লাহ! আপনি সাক্ষী থাকুন। একথাও তিনি তিনবার বলেন। [৩০৫৫]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في الشواهد، سليمان بن عمرو بن الأحوص روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات". وباقي رجاله ثقات. وأخرجه أبو داود (٣٣٣٤)، والترمذي (٢٢٩٨) و (٣٣٤١)، والنسائي في "الكبرى" (٤٠٨٥) و (١١١٤٩) من طريق شبيب بن غرقدة، بهذا الإسناد. ورواية أبي داود مختصرة بقصة ربا الجاهلية ودم الجاهلية. وقال الترمذي: حسن صحيح. وهو في "مسند أحمد" (١٥٥٠٧). وقوله: " لا يجني جان … ولا مولود على والده" سلف برقم (٢٦٦٩)، وهو هكذا مختصر في "مسند أحمد" (١٦٠٦٤). ويشهد لقوله: "إن الشيطان قد أيس أن يعبد في بلدكم هذا" حديث جابر عند مسلم (٢٨١٢)، والترمذي (٢٠٥٠)، وأحمد (١٤٣٦٦)، وابن حبان (٥٩٤١). ويشهد له حديث جابر الطويل في الحج، عند مسلم (١٢١٨) وسيرد عند المصنف (٣٠٧٤) وحديث عبد الله بن مسعود، وحديث ابن عمر الآتيان بعده. قوله: "دم الحارث بن عبد المطلب"، قال الخطابي في "معالم السُّنن" ٣/ ٥٩ - ٦٠: فإن أبا داود هكذا روى، وإنما هو في سائر الروايات: "دم ربيعة بن الحارث بن عبد المطلب" وحدثني عبد الله بن محمَّد المكي، حدثنا علي بن عبد العزيز، عن أبي عُبيدة، أخبرني ابن الكلبي أن ربيعة بن الحارث لم يقتل، وقد عاش بعد النبي ﷺ إلى زمن عمر، وإنما قتل له ابن صغير في الجاهلية، فأهدر النبي ﷺ فيما أهدر، ونسب الدم إليه لأنه ولي الدم









সুনান ইবনু মাজাহ (3056)


حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ نُمَيْرٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، عَنْ عَبْدِ السَّلاَمِ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ جُبَيْرِ بْنِ مُطْعِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ قَامَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ بِالْخَيْفِ مِنْ مِنًى فَقَالَ ‏ "‏ نَضَّرَ اللَّهُ امْرَأً سَمِعَ مَقَالَتِي فَبَلَّغَهَا فَرُبَّ حَامِلِ فِقْهٍ غَيْرُ فَقِيهٍ وَرُبَّ حَامِلِ فِقْهٍ إِلَى مَنْ هُوَ أَفْقَهُ مِنْهُ ثَلاَثٌ لاَ يُغِلُّ عَلَيْهِنَّ قَلْبُ مُؤْمِنٍ إِخْلاَصُ الْعَمَلِ لِلَّهِ وَالنَّصِيحَةُ لِوُلاَةِ الْمُسْلِمِينَ وَلُزُومُ جَمَاعَتِهِمْ فَإِنَّ دَعْوَتَهُمْ تُحِيطُ مِنْ وَرَائِهِمْ ‏"‏ ‏.‏




জুবায়র বিন মুতইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনার মসজিদুল খায়ফ-এ দাঁড়িয়ে বলেনঃ আল্লাহ তাআলা সেই ব্যক্তিকে সজীব ও আলোকোজ্জ্বল করে রাখুন যে আমার কথা শোনে, অতঃপর তা (অন্যদের নিকট) পৌঁছে দেয়। জ্ঞানের অনেক বাহক মূলত জ্ঞানী নয়। কোন কোন জ্ঞানের বাহক যার নিকট জ্ঞান বয়ে নিয়ে যায়, সে তার চেয়ে অধিক জ্ঞানী। তিনটি বিষয়ে মুমিন ব্যক্তির অন্তর প্রতারণা করতে পারে না। (১) একনিষ্ঠভাবে আল্লাহর (সন্তোষ লাভের) জন্য ‘আমাল (কাজ) করা, (২) মুসলিম শাসকবর্গকে সদুপদেশ প্রদানে এবং (৩) মুসলিম জামা’আতের (সমাজের) সাথে সংঘবদ্ধ থাকার ব্যপারে। কারণ মুসলমানদের দুআ’ তাদেরকে পেছন থেকে পরিবেষ্টন করে রাখে। [৩০৫৬]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، عبد السلام -وهو ابن أبي الجنوب- متروك الحديث، ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن. وسلف الحديث مختصرًا بالشطر الأول منه برقم (٢٣١) و (٢٣١ م)، وسلف تخريجه هناك. قال السندي في حاشيته على "المسند": قوله: "لا يغل"، بكسر الغين المعجمة وتشديد اللام على المشهور، والياء تحتمل الضم والفتح، فعلى الأول: مِن أَغل: إذا خان، وعلى الثاني من غل: إذا صار ذا حقد وعداوة. و"عليهن" في موضع الحال، أي: ثلاث خصال، لا يخون قلب المؤمن، أو لا يدخل فيه الحقد كائنا عليهن، أي: ما دام المؤمن على هذه الخصال لا يدخل في قلبه خيانة أو حقد يمنعه من تبليغ العلم، فينبغي له الثبات على هذه الخصال حتى لا يمنعه شيء من التبليغ









সুনান ইবনু মাজাহ (3057)


حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ تَوْبَةَ، حَدَّثَنَا زَافِرُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِي سِنَانٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مُرَّةَ، عَنْ مُرَّةَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَهُوَ عَلَى نَاقَتِهِ الْمُخَضْرَمَةِ بِعَرَفَاتٍ فَقَالَ ‏"‏ أَتَدْرُونَ أَىُّ يَوْمٍ هَذَا وَأَىُّ شَهْرٍ هَذَا وَأَىُّ بَلَدٍ هَذَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا هَذَا بَلَدٌ حَرَامٌ وَشَهْرٌ حَرَامٌ وَيَوْمٌ حَرَامٌ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ أَلاَ وَإِنَّ أَمْوَالَكُمْ وَدِمَاءَكُمْ عَلَيْكُمْ حَرَامٌ كَحُرْمَةِ شَهْرِكُمْ هَذَا فِي بَلَدِكُمْ هَذَا فِي يَوْمِكُمْ هَذَا أَلاَ وَإِنِّي فَرَطُكُمْ عَلَى الْحَوْضِ وَأُكَاثِرُ بِكُمُ الأُمَمَ فَلاَ تُسَوِّدُوا وَجْهِي أَلاَ وَإِنِّي مُسْتَنْقِذٌ أُنَاسًا وَمُسْتَنْقَذٌ مِنِّي أُنَاسٌ فَأَقُولُ يَا رَبِّ أُصَيْحَابِي ‏.‏ فَيَقُولُ إِنَّكَ لاَ تَدْرِي مَا أَحْدَثُوا بَعْدَكَ ‏"‏ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের ময়দানে তাঁর স্বীয় উষ্ট্রীতে আরোহিত অবস্হায় বলেনঃ তোমরা কি জানো আজ কোন দিন, এটা কোন মাস এবং এটা কোন শহর? তারা বলেন, এটা (মক্কা) সন্মানিত শহর , সন্মানিত মাস ও সন্মানিত দিন। তিনি আরো বলেনঃ সাবধান ! তোমাদের সম্পদ ও তোমাদের রক্ত তোমাদের পরস্পরের প্রতি তেমনি হারাম যেমনি তোমাদের এই মাসের সন্মান রয়েছে তোমাদের এই শহরে তোমাদের এই দিনে। শুনে রাখো ! আমি তোমাদের আগেই হাওযে কাওসারে উপস্থিত থাকবো। অন্যান্য উম্মাতের তুলনায় তোমাদের সংখ্যাধিক্য নিয়ে আমি গৌরব করবো। তোমরা যেন আমার চেহারা কালিমালিপ্ত না করো। সাবধান! কিছু লোককে আমি মুক্ত করতে পারবো। আর কিছু লোককে আমার নিকট থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হবে। তখন আমি বলবো , হে আল্লাহ ! এরা তো আমার সাহাবী ! তিনি বলবেনঃ তোমার পরে এরা কী বিদআতী কাজ করেছে, তা তুমি জানো না। [৩০৫৭]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، زافر بن سليمان -وإن كان ضعيفًا- قد توبع، إلا أنه انفرد بتعيين الصحابي، وقد رواه غيره مبهما كما سيأتي. أبو سنان: هو سعيد بن سنان الشيباني. وأخرجه النسائي في "الكبرى" (٤٠٨٤) من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن مرة، عن رجل من أصحاب النبي ﷺ. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٤٩٧)، و"شرح مشكل الآثار" (٤٢). وللحديث شواهد انظرها في "المسند". المخضرمة: هي التي قُطع طرف أُذنها. وقوله: "فَرَطكم" بفتحتين، أي: المهيِّئ لكم ما تحتاجون إليه. قاله السندي









সুনান ইবনু মাজাহ (3058)


حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا صَدَقَةُ بْنُ خَالِدٍ، حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ الْغَازِ، قَالَ سَمِعْتُ نَافِعًا، يُحَدِّثُ عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ وَقَفَ يَوْمَ النَّحْرِ بَيْنَ الْجَمَرَاتِ فِي الْحَجَّةِ الَّتِي حَجَّ فِيهَا فَقَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏"‏ أَىُّ يَوْمٍ هَذَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا يَوْمُ النَّحْرِ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَأَىُّ بَلَدٍ هَذَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا هَذَا بَلَدُ اللَّهِ الْحَرَامُ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَأَىُّ شَهْرٍ هَذَا ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا شَهْرُ اللَّهِ الْحَرَامُ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ هَذَا يَوْمُ الْحَجِّ الأَكْبَرِ وَدِمَاؤُكُمْ وَأَمْوَالُكُمْ وَأَعْرَاضُكُمْ عَلَيْكُمْ حَرَامٌ كَحُرْمَةِ هَذَا الْبَلَدِ فِي هَذَا الشَّهْرِ فِي هَذَا الْيَوْمِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ قَالَ ‏"‏ هَلْ بَلَّغْتُ ‏"‏ ‏.‏ قَالُوا نَعَمْ ‏.‏ فَطَفِقَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يَقُولُ ‏"‏ اللَّهُمَّ اشْهَدْ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ وَدَّعَ النَّاسَ فَقَالُوا هَذِهِ حَجَّةُ الْوَدَاعِ ‏.‏




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রাসুলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে বছর হজ্জ করেন, সেই বছর কোরবানির দিন জামরাসমূহের মধ্যস্থলে দাঁড়ালেন এবং জিজ্ঞাসা করলেনঃ আজ কোন দিন? সাহাবীগণ বললেন, কোরবানীর দিন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেনঃ এটা কোন শহর? তারা বললেন, এটা আল্লাহর সন্মানিত শহর। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, এটি কোন মাস? তারা বললেন, আল্লাহর সন্মানিত মাস। তিনি বললেনঃ এটি হজ্জের বড় দিন। তোমাদের রক্ত , তোমাদের সম্পদ ও তোমাদের মান-সম্ভ্রম ( প্রভৃতির উপর হস্তক্ষেপ ) তোমাদের জন্য হারাম , যেমন এই শহরের হুরমাত ( সন্মান) এই মাসে এবং এই দিনে। তিনি পুনরায় বলেনঃ আমি কি পৌছে দিয়েছি? তারা বলেন, হ্যাঁ। তখন তিনি বলতে শুরু করলেনঃ হে আল্লাহ! সাক্ষী থাকুন। অতঃপর তিনি লোকেদের বিদায় দেন। তখন তারা বলেন, এটা বিদায় হজ্জ। [৩০৫৮]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح، هشام بن عمار متابع. وأخرجه أبو داود (١٩٤٥)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (١٤٥٩) و (١٤٦٠)، والحاكم ٢/ ٣٣١، والبيهقي ٥/ ١٣٩ من طرق عن هشام بن الغاز، بهذا الإسناد. ورواية أبي داود والطحاوي مختصرتان. وعلقه البخاري في "صحيحه" بإثر الحديث (١٧٤٢) بصيغة الجزم عن هشام ابن الغاز. وأخرجه البخاري (١٧٤٢) من طريق محمَّد بن زيد، عن عبد الله بن عمر، بنحوه









সুনান ইবনু মাজাহ (3059)


حَدَّثَنَا بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ أَبُو بِشْرٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ طَارِقٍ، عَنْ طَاوُسٍ، وَأَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ عَائِشَةَ، وَابْنِ، عَبَّاسٍ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَخَّرَ طَوَافَ الزِّيَارَةِ إِلَى اللَّيْلِ ‏.




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাত পর্যন্ত তাওয়াফে যিয়ারত বিলম্ব করেন। [৩০৫৯]

তাহকীক আলবানীঃ শায।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * شاذ




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف، سنن أبي داود (2000) ترمذي (920)، محمد بن طارق عن طاوس مرسل (تحفۃ الأشراف 13 / 239) وحدیث أبی، الزبیر مسند لکنہ عنعن (انظر الحدیث السابق: 92) وعلقہ البخاري في صحیحہ، (قبل: 1732)، (انوار الصحیفہ ص 486)




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، أبو الزبير -وهو محمَّد بن مسلم بن تدرس المكي- موصوف بالتدليس، وقد رواه بالعنعنة، وفي سماعه من ابن عباس وعائشة نظر، ثم إن هذا الحديث مخالف لحديث ابن عمر عند مسلم (١٣٠٨)، وحديث جابر الآتي برقم (٣٠٧٤)، وحديث عائشة عند أبي داود (١٩٧٣)، ففيها: أن النبي ﷺ أفاض إلى مكة نهارًا وصلى الظهر بها. وقد جُمع بينها بحمل حديث ابن عمر وجابر وعائشة على اليوم الأول، وحملِ حديث ابن عباس وعائشة على باقي الأيام. وانظر "فتح الباري" ٣/ ٥٦٧. وأخرجه أبو داود (٢٠٠٠)، والترمذي (٩٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٤١٥٥) من طريق سفيان الثوري، عن أبي الزبير، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن. وعلقه البخاري في "صحيحه" قبل الحديث (١٧٣٢) بصيغة الجزم عن أبي الزبير. وهو في "مسند أحمد" (١٦١٢). أما مرسل طاووس فأشار إليه البخاري في "تاريخه" ١/ ١٩٩. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٣٥٢٥)، والمزي في ترجمة محمَّد بن طارق من "تهذيب الكمال" ٢٥/ ٤٠٦ من طريق يحيى بن سعيد، بإسناد ابن ماجه. ٢٤٧









সুনান ইবনু মাজাহ (3060)


حَدَّثَنَا حَرْمَلَةُ بْنُ يَحْيَى، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَنْبَأَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ لَمْ يَرْمُلْ فِي السَّبْعِ الَّذِي أَفَاضَ فِيهِ ‏.‏ قَالَ عَطَاءٌ وَلاَ رَمَلَ فِيهِ ‏.‏




আবদুল্লাহ বিন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাওয়াফে যিয়ারতের সাত চক্করে রমল ( বাহু দুলিয়ে বীরত্বপূর্ণ পদক্ষেপ) করেননি। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তাওয়াফে যিয়ারতে রমল করতে হয় না। [৩০৬০]

তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه أبو داود (٢٠٠١)، والنسائي في "الكبرى" (٤١٥٦) من طريق ابن جريج، بهذا الإسناد









সুনান ইবনু মাজাহ (3061)


حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، عَنْ عُثْمَانَ بْنِ الأَسْوَدِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ، قَالَ كُنْتُ عِنْدَ ابْنِ عَبَّاسٍ جَالِسًا فَجَاءَهُ رَجُلٌ فَقَالَ مِنْ أَيْنَ جِئْتَ قَالَ مِنْ زَمْزَمَ ‏.‏ قَالَ فَشَرِبْتَ مِنْهَا كَمَا يَنْبَغِي قَالَ وَكَيْفَ قَالَ إِذَا شَرِبْتَ مِنْهَا فَاسْتَقْبِلِ الْكَعْبَةَ وَاذْكُرِ اسْمَ اللَّهِ وَتَنَفَّسْ ثَلاَثًا وَتَضَلَّعْ مِنْهَا فَإِذَا فَرَغْتَ فَاحْمَدِ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏ "‏ إِنَّ آيَةَ مَا بَيْنَنَا وَبَيْنَ الْمُنَافِقِينَ أَنَّهُمْ لاَ يَتَضَلَّعُونَ مِنْ زَمْزَمَ ‏"‏ ‏.‏




মুহাম্মাদ বিন আবদুর রহমান বিন আবূ বাকর (মাকবুল) হতে বর্ণিত, আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। এক ব্যাক্তি তাঁর নিকট এলে তিনি জিজ্ঞেস করনে, তুমি কোথা থেকে এসেছো? সে বললো যমযমের নিকট থেকে। তিনি জিজ্ঞেস করলেন , তুমি কি তা থেকে প্রয়োজনমত পান করেছ? সে বললো ,তা কিরুপে? তিনি বললেন , তুমি তা থেকে পান করার সময় কিবলামুখী হবে , আল্লাহর নাম স্মরন করবে , তিনবার নিঃশ্বাস নিবে এবং তৃপ্তি সহকারে পান করবে। পানি পান শেষে তুমি মহামহিম আল্লাহর প্রশংসা করবে। কারন , রাসুলাল্লাহ ( (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ) বলেছেনঃ আমাদের ও মুনাফিকদের মধ্যে নিদর্শন এই যে, তারা তৃপ্তি সহকারে যমযমের পানি পান করে না। [৩০৬১]

তাহকীক আলবানীঃ দুর্বল।




تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف




تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن




تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، محمَّد بن عبد الرحمن بن أبي بكر -وهو الجمحي- روى عنه اثنان ولم يوثقه أحد، وباقي رجاله ثقات. وقد اختلف على عثمان في تسمية شيخه كما سيأتي. وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" ١/ ١٥٧ - ١٥٨، وفي "التاريخ الأوسط" ٢/ ١٧٦ من طريق عبد الله بن المبارك، والبخاري في "التاريخ الكبير" ١/ ١٥٨ من طريق عبيد الله بن موسى، والبيهقي ٥/ ١٤٧ من طريق مكي بن إبراهيم، ثلاثتهم عن عثمان بن الأسود، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الرزاق (٩١١١) - وعنه البخاري في "التاريخ" ١/ ١٥٨، والطبراني (١١٢٤٦) - عن عبد الرحمن بن عمر بن بوذيه - وتحرف في مطبوع "المصنف" إلى: عبد الله بن عمر-، وعبد الرزاق (٩١١١) - ومن طريقه الطبراني (١١٢٤٦) - عن سفيان الثوري، والبخاري في "التاريخ" ١/ ١٥٨، والدارقطني (٢٧٣٦) و (٢٧٣٧)، والبيهقي ٥/ ١٤٧ من طريق أبي زياد إسماعيل بن زكريا، والبخاري ١/ ١٥٨ من طريق الفضل بن موسى، أربعتهم عن عثمان بن الأسود، عن ابن أبي مليهة، عن ابن عباس. وأخرجه البيهقي ٥/ ١٤٧ من طريق عبد الوهَّاب الثقفي، عن عثمان بن الأسود، عن جليس لابن عباس، عن ابن عباس. وأخرجه الحاكم ١/ ٤٧٢ من طريق إسماعيل بن زكريا، عن عثمان بن الأسود قال: جاء رجل إلى ابن عباس … فسقط من إسناده ابن أبي مليكة، وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين إن كان عثمان بن الأسود سمع من ابن عباس. قلنا: وقد رواه البيهقي ٥/ ١٤٧ عن الحاكم بإثبات ابن أبي مليكة، وهو الصواب. وأخرجه الطبراني (١٠٧٦٣) من طريق عطاء، عن ابن عباس. وإسناده ضعيف