الحديث


الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল





الجامع الكامل (23)


23 - عن عمر بن الخطّاب قال: بينما نحن عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم إذ طلع علينا رجل شديدُ بياض الثّياب شديدُ سواد الشّعر، لا يُرى عليه أثرُ السَّفر، ولا يعرفه منا أحدٌ، حتى جلس إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأسند ركبتيه إلى ركبتيه، ووضع كفّيه على فخذيه وقال: يا محمد! أخبرني عن الإسلام، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الإسلام أن تشهد أن لا إله إلّا اللَّه وأن محمدًا رسولُ اللَّه، وتقيم الصلاة، وتؤتي الزكاة،
وتصوم رمضان، وتحجّ البيت إن استطعت إليه سبيلًا" قال: صدقت! قال: فعجبنا له يسأله ويصدّقه. قال: فأخبرني عن الإيمان، قال:"أن تؤمن باللَّه، وملائكته، وكتبه، ورسله، واليوم الآخر وتؤمن بالقدر خيره وشره" قال: صدقت، قال: فأخبرني عن الإحسان، قال:"أن تعبد اللَّه كأنك تراه فإن لم تكن تراه فإنه يراك" قال: فأخبرني عن السّاعة، قال:"ما المسئول عنها بأعلم من السائل" قال: فأخبرني عن إمارتها، قال:"أن تلد الأمة ربَّتَها، وأن ترى الحفاة العُراة العالة رِعاء الشاءِ يتطاولون في البنيان".

قال: ثم انطلق فلبثتُ مليًّا، ثم قال لي:"يا عمر، أتدري من السائل؟" قلت: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"فإنه جبريل أتاكم يعلمكم دينكم".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (8) من طرق عن يحيى بن يعمر، قال:"أوّل من قال في القدر بالبصرة معبد الجهنيّ، فانطلقت أنا وحُميد بن عبد الرحمن الحميري حاجَّيْن أو معتمرين. فقلنا: لو لقينا أحدًا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فسألناه عمّا يقول هؤلاء في القدر، فوُفِّق لنا عبد اللَّه بن عمر بن الخطاب داخلًا المسجد فاكتنفتُه أنا وصاحبي، أحدُنا عن يمينه والآخر عن شماله، فظننت أنّ صاحبي سيكل الكلامَ إليَّ فقلتُ: أبا عبد الرحمن! إنه قد ظهر قِبلنا ناسٌ يقرأون القرآن ويتقفَّرون العلم، وذكر من شأنهم، وأنَّهم يزعمون أن لا قدر، وأنّ الأمر أُنُفٌ؟ قال: فإذا لقيت أولئك فأخبرهم أنّي بريءٌ منهم، وأنّهم برآءٌ مني، والذي يحلف به عبد اللَّه بن عمر: لو أنّ لأحدهم مثلَ أُحُدٍ ذهبًا فأنفقه ما قبل اللَّه منه حتى يُؤْمنَ بالقدر، ثم قال: حدثني أبي عمر بن الخطاب قال، فذكر الحديث.

قوله:"فاكتنفته أنا وصاحبي" يعني صرنا في ناحيتيه، وكَنفَا الطائرِ: جناحاه.

وقوله:"يتفقّرون العلم" أي يتبعون أثره ويطلبونه، والتفقّر: تتبع أثر الشيء.

وقوله:"إنّ الأمر أُنُف" يريد مستأنف لم يتقدّم فيه قدر ولا مشيئة، يقال: روضةٌ أُنُفٌ: إذا لم تُرْعَ، وأنفُ الشيء أوله.

قال البغويُّ رحمه اللَّه تعالى:"جعل النبيُّ صلى الله عليه وسلم في هذا الحديث الإسلام اسمًا لما ظهر من الأعمال، وجعل الإيمان اسمًا لما بطن من الاعتقاد، وليس ذلك لأن الأعمال ليست من الإيمان، أو التصديق بالقلب ليس من الإسلام، بل ذلك تفصيل لجملة هي كلّها شيء واحد وجماعُها الدِّين، ولذلك قال:"ذاك جبريل أتاكم يعلّمكم أمر دينكم" والتصديق والعمل يتناولهما اسم الايمان والإسلام جميعًا، يدل عليه قوله سبحانه وتعالى: {إِنَّ الدِّينَ عِنْدَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ} [سورة آل عمران: 19]، {وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا} [سورة المائدة: 3]، وقوله: {وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَنْ
يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ} [سورة آل عمران: 58]. فأخبر أنّ الدّين الذي رضيه ويقبله من عباده هو الإسلام، ولن يكون الدّين في محل القبول والرضى إلا بانضمام التصديق إلى العمل". شرح السنة (1/ 10 - 11).




অনুবাদঃ উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম, এমন সময় আমাদের সামনে এক ব্যক্তি আবির্ভূত হলেন, যার কাপড় ছিল ধবধবে সাদা এবং চুল ছিল ভীষণ কালো। তাঁর মধ্যে সফরের কোনো চিহ্ন দেখা যাচ্ছিল না এবং আমাদের মধ্যে কেউই তাঁকে চিনত না। তিনি এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বসলেন। অতঃপর তিনি নিজের হাঁটু নবীর হাঁটুর সঙ্গে মিলিয়ে দিলেন এবং তাঁর (নিজের) হাতের তালু তাঁর (নবীর) উরুর ওপর রাখলেন।

এবং বললেন: "হে মুহাম্মাদ! আমাকে ইসলাম সম্পর্কে অবহিত করুন।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইসলাম হলো, তুমি সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল; সালাত (নামাজ) প্রতিষ্ঠা করবে; যাকাত প্রদান করবে; রমজানে সওম (রোজা) পালন করবে এবং যদি তুমি তার (আল্লাহর ঘরের) পথে সামর্থ্য রাখো, তাহলে বাইতুল্লাহর হজ্ব করবে।" লোকটি বললেন: "আপনি সত্য বলেছেন।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা বিস্মিত হলাম যে, তিনি প্রশ্নও করছেন আবার সত্যায়নও করছেন!

তিনি বললেন: "তাহলে আমাকে ঈমান সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আল্লাহর প্রতি, তাঁর ফেরেশতাদের প্রতি, তাঁর কিতাবসমূহের প্রতি, তাঁর রাসূলগণের প্রতি, আখেরাত (শেষ দিবস)-এর প্রতি ঈমান আনবে এবং তাকদীরের ভালো-মন্দের প্রতিও ঈমান আনবে।" লোকটি বললেন: "আপনি সত্য বলেছেন।"

তিনি বললেন: "তাহলে আমাকে ইহসান সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এমনভাবে আল্লাহর ইবাদত করবে যেন তুমি তাঁকে দেখছ। আর যদি তুমি তাঁকে দেখতে নাও পাও, তবে (মনে রাখবে) তিনি তোমাকে দেখছেন।"

তিনি বললেন: "আমাকে কিয়ামত সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করা হয়েছে, সে প্রশ্নকারীর চেয়ে বেশি জ্ঞানী নয়।" তিনি বললেন: "তাহলে এর নিদর্শনাবলি সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন দাসী তার প্রভুকে জন্ম দেবে এবং যখন তুমি দেখতে পাবে যে, নগ্নপদ, বস্ত্রহীন, দরিদ্র মেষপালকরা বড় বড় অট্টালিকা নির্মাণে প্রতিযোগিতা করছে।"

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর লোকটি চলে গেলেন। আমি দীর্ঘক্ষণ সেখানে থাকলাম। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে উমর, তুমি কি জানো প্রশ্নকারী কে ছিলেন?" আমি বললাম: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক অবগত।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তিনি ছিলেন জিবরীল, যিনি তোমাদেরকে তোমাদের দ্বীন শিক্ষা দিতে এসেছিলেন।"