হাদীস বিএন


শারহু মা’আনিল-আসার





শারহু মা’আনিল-আসার (3674)


بما حدثنا أحمد بن داود، قال: ثنا يعقوب بن حميد قال: ثنا محمد بن خازم، قال: ثنا الحجاج بن أرطاة، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، أن النبي صلى الله عليه وسلم قرن بين الحج والعمرة، فطاف لهما طوافا واحدا" . قيل لهم: ما أعجب هذا إنكم تحتجون بمثل هذا، وقد رويتم عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أفرد الحج، وعن ابن جريج والأوزاعي، وعمرو بن دينار، وقيس بن سعد، عن عطاء، عن جابر رضي الله عنهما أنهم قدموا صبيحة رابعة مهلّين بالحج، فأمرهم رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجعلوها عمرة، وهو على الصفا في آخر طواف، فكيف تقبلون مثل ذلك، وتدعون مثل هذا؟ فإن احتجوا في ذلك




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ ও উমরার মধ্যে ক্বিরান (মিলিত) করেছিলেন এবং তিনি উভয়ের জন্য একটিই তাওয়াফ করেছিলেন। তাদেরকে বলা হলো: এটা কতই না আশ্চর্যের! তোমরা এ ধরনের (হাদীস) দ্বারা দলিল পেশ করছ, অথচ তোমরা জা’ফর ইবনে মুহাম্মাদ, তিনি তাঁর পিতা, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছ যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল হজ্জের ইহরাম করেছিলেন (ইফ্রাদ)। এবং ইবনু জুরাইজ, আওযা’ঈ, আমর ইবনু দীনার এবং কাইস ইবনু সা’দ, তাঁরা আতা, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তাঁরা চতুর্থ দিনের ভোরে হজ্জের ইহরাম অবস্থায় আগমন করেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন তারা সেটিকে উমরাতে পরিণত করে নেয়। তখন তিনি সাফা পর্বতের উপর তাঁর শেষ তাওয়াফে ছিলেন। তাহলে তোমরা কিভাবে এমন (হাদীস) গ্রহণ করো এবং এমন (অন্যান্য বর্ণনা) ত্যাগ করো? যদি তারা এক্ষেত্রে যুক্তি প্রদর্শন করে...




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لعنعنة حجاج بن أرطاة فإنه مدلس.









শারহু মা’আনিল-আসার (3675)


بما حدثنا يزيد بن سنان، قال: ثنا أبو عامر، قال: ثنا رباح بن أبي معروف، عن عطاء، عن جابر: أن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم لم يزيدوا على طواف واحد . قيل لهم: إنما يعني جابر رضي الله عنه هذا الطواف بين الصفا والمروة، وقد بين ذلك عنه أبو الزبير.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এক তাওয়াফের উপর বাড়াননি (একবারের বেশি তাওয়াফ করেননি)। তাঁদেরকে বলা হলো: জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর দ্বারা কেবল সাফা ও মারওয়ার মধ্যবর্তী এই তাওয়াফকেই বুঝিয়েছেন। আর আবুয-যুবাইর তাঁর (জাবির) পক্ষ থেকে তা স্পষ্ট করে দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح على شرط مسلم.









শারহু মা’আনিল-আসার (3676)


حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، سمع جابرا يقول: لم يطف النبي صلى الله عليه وسلم ولا أصحابه بين الصفا والمروة إلا طوافا واحدا . وإنما أراد جابر بهذا أن يخبرهم أن السعي بين الصفا والمروة لا يُفعل في طواف يوم النحر، ولا في طواف الصدر كما يفعل في طواف القدوم. وليس في شيء من هذا دليل على أن ما على القارن من الطواف لعمرته وحجته طواف واحد، أو طوافان فإن قال قائل: فقد صح عن ابن عمر من قوله في القارن: أنه يطوف لعمرته وحجته طوافا واحدا، فإلى قول من تخالفون قوله في ذلك؟ قيل له: إلى قول علي، وعبد الله رضي الله عنهما.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (জাবির) বলতে শুনেছেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং তাঁর সাহাবীগণ সাফা ও মারওয়ার মধ্যে এক তাওয়াফ (সাঈ) ছাড়া আর কোনো তাওয়াফ করেননি। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাধ্যমে কেবল তাদের এই খবর দিতে চেয়েছেন যে, সাফা ও মারওয়ার সাঈ কুরবানীর দিনের তাওয়াফ (তাওয়াফ আল-ইফাদাহ) এর সময় করা হয় না, এবং বিদায়ী তাওয়াফ (তাওয়াফ আল-সদর) এর সময়ও করা হয় না, যেমনটা আগমনী তাওয়াফ (তাওয়াফ আল-কুদুম) এর সময় করা হয়। এইগুলোর কোনোটির মধ্যেই এমন কোনো প্রমাণ নেই যে, ক্বিরান হাজ্জকারী ব্যক্তির উপর উমরা ও হাজ্জের জন্য একটি তাওয়াফ না দুটি তাওয়াফ ফরয। যদি কেউ প্রশ্ন করে: ক্বিরানকারী সম্পর্কে ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই কথা সহীহ (প্রমাণিত) যে, তিনি উমরা ও হাজ্জের জন্য একটিই তাওয়াফ করবেন, তাহলে আপনারা এই ক্ষেত্রে কার মতের ভিত্তিতে তাঁর (ইবনে উমারের) মতের বিরোধিতা করেন? তাকে বলা হবে: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতের ভিত্তিতে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح على شرط مسلم.









শারহু মা’আনিল-আসার (3677)


حدثنا يونس، قال: ثنا سفيان عن منصور، عن إبراهيم، أو مالك بن الحارث، عن أبي نصر، قال: أهللت بالحج، فأدركت عليا فقلت له: إني أهللت بالحج أفأستطيع أن أضيف إليه عمرة؟ قال لا، لو كنت أهللت بالعمرة، ثم أردت أن تضم إليها الحج ضممته. قال: قلت كيف أصنع إذا أردت ذلك؟ قال: تصب عليك إداوة من ماء، ثم تحرم بهما جميعا، وتطوف لكل واحدة منهما طوافا .




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু নসর বলেন: আমি হজের ইহরাম বাঁধলাম। এরপর আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলাম এবং তাঁকে বললাম: আমি হজের ইহরাম বেঁধেছি, আমি কি এর সাথে উমরাহ যোগ করতে পারি? তিনি বললেন: না। যদি তুমি উমরাহর ইহরাম বাঁধতে, তারপর যদি এর সাথে হজ যোগ করতে চাইতে, তাহলে তুমি তা যোগ করতে পারতে। আবু নসর বলেন: আমি বললাম: যদি আমি এটি করতে চাই, তাহলে কী করব? তিনি বললেন: তুমি তোমার উপর এক পাত্র পানি ঢালবে (অর্থাৎ গোসল করবে), এরপর উভয়ের জন্য একসাথে ইহরাম বাঁধবে এবং উভয়ের প্রত্যেকের জন্য (আলাদা আলাদা) তাওয়াফ করবে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف، أبو نصر مجهول.









শারহু মা’আনিল-আসার (3678)


حدثنا أبو بكرة، قال: ثنا أبو داود، قال: ثنا شعبة، قال: أخبرني منصور، عن مالك بن الحارث، عن أبي نصر السلمي، عن علي رضي الله عنه .... . مثله . قال أبو داود، قال قيس: قال منصور: فذكرت ذلك لمجاهد، فقال: ما كنا نفتي الناس إلا بطواف واحد، فأما الآن فلا.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... অনুরূপ একটি বর্ণনা রয়েছে। আবু দাউদ বলেন, কায়স বলেন, মানসূর বলেন: আমি বিষয়টি মুজাহিদের নিকট উল্লেখ করলে তিনি বললেন: আমরা লোকজনকে কেবল এক তাওয়াফ করার ফাতওয়া দিতাম। কিন্তু এখন আর (তা দেই) না।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (3679)


حدثنا محمد بن الحجاج، قال: ثنا الخصيب، قال: ثنا يزيد بن عطاء، عن الأعمش، عن إبراهيم، ومالك بن الحارث، عن عبد الرحمن بن أذينة، قال: سألت عليا رضي الله عنه … فذكر مثله .




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুর রহমান ইবনে উযাইনা বলেন:) আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম... এরপর তিনি অনুরূপ (বিষয়) উল্লেখ করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن من أجل الخصيب بن ناصح، وعبد الرحمن بن أذينة وثقه ابن حجر في التقريب وقال الطحاوي: هو أبو نصر، ولم أو لغيره هذا الكلام.









শারহু মা’আনিল-আসার (3680)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال ثنا حجاج، قال: ثنا أبو عوانة، عن سليمان … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের নিকট মুহাম্মাদ ইবন খুযায়মা হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদের নিকট হাজ্জাজ হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদের নিকট আবূ ’আওয়ানাহ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি সুলাইমান থেকে বর্ণনা করেছেন... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3681)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال ثنا حجاج، قال: ثنا أبو عوانة، عن منصور، عن إبراهيم، عن مالك، عن أبي نصر … مثله. قال: منصور فذكرت ذلك لمجاهد فقال: ما كنت أفتي الناس إلا بطواف واحد، فأما الآن فلا .




মনসুর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মুজাহিদকে এই বিষয়ে বললাম। তখন তিনি বললেন: আমি লোকদেরকে এক তাওয়াফ (সাত চক্কর) ব্যতীত ফাতওয়া দিতাম না। কিন্তু এখন আর (সেই ফাতওয়া) দেই না।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لجهالة أبي نصر.









শারহু মা’আনিল-আসার (3682)


حدثنا ابن أبي عمران، قال: ثنا شجاع بن مخلد، (ح) وحدثنا صالح بن عبد الرحمن، قال: ثنا سعيد بن منصور، قالا: ثنا هشيم عن منصور بن زاذان، عن الحكم، عن زياد بن مالك، عن علي، وعبد الله رضي الله عنهما، قالا: القارن يطوف طوافين ويسعى سعيين . فهذا علي وعبد الله رضي الله عنهما، قد ذهبا في طواف القارن إلى خلاف ما ذهب إليه ابن عمر رضي الله عنهما. وأما وجه ذلك من طريق النظر، فإنا رأينا الرجل إذا أحرم بحجة وجبت عليه بما فيها من الطواف بالبيت والسعي بين الصفا والمروة، ووجب عليه في انتهاك ما قد حرم عليه بإحرامه بها من الكفارات ما يجب عليه في ذلك. وكذلك إذا أحرم بعمرة وجبت عليه أيضا بما فيها من الطواف بالبيت والسعي بين الصفا والمروة، ووجب عليه في انتهاك ما قد حرم عليه بإحرامه بها من الكفارات ما يجب عليه في ذلك. وكان إذا جمعهما فكل قد أجمع أنه في حرمتين: حرمة حج، وحرمة عمرة. فكان يجيء في النظر أن يجب عليه لكل واحدة: منهما من الطواف والسعي، وغير ذلك من الكفارات في انتهاك الحرمة التي قد حرمت عليه بها، ما كان يجب عليه لها لو أفردها. فأدخل على هذا القول فقيل: قد رأينا الحلال يصيب الصيد في الحرم، فيجب عليه الجزاء لحرمة الحرم، ورأينا المحرم يصيب صيدا في الحل فيجب عليه الجزاء لحرمة الحرام. ورأينا المحرم إذا أصاب صيدا في الحرم وجب عليه جزاء واحد لحرمة الإحرام، ودخل فيه حرمة الجزاء لحرمة الحرم. وهو في وقت ما أصاب ذلك الصيد في حرمتين: في حرمة إحرام، وحرمة حرم، فلم يجب عليه لكل واحدة من الحرمتين ما كان يجب عليه لها لو أفردها. قالوا: فكذلك القارن فيما كان يجب عليه لكل واحدة من عمرته وحجته لو أفردها، لا يجب عليه في ذلك لما جمعهما إلا مثل ما يجب عليه في إحداهما، ويدخل ما كان يجب للأخرى لو كانت مفردة في ذلك. قيل لهم: إنكم لم تقولون أن ما يجب على المحرم في قتله الصيد في الحرم جزاء واحد. وقد قال أبو حنيفة، وأبو يوسف، ومحمد رحمهم الله: إن القياس كان عندهم في ذلك أنه يجب عليه جزاءان: جزاء لحرمة الإحرام، وجزاء لحرمة الحرم، وأنهم إنما خالفوا ذلك استحسانا. ولكنا لا نقول في ذلك كما قالوا، بل القياس عندنا في ذلك ما ذكروا أنهم استحسنوه. وذلك أنا رأينا الأصل المجتمع عليه أنه يجوز للرجل أن يجمع بين حجة وعمرة، ولا يجمع بين حجتين، ولا بين عمرتين فكان له أن يجمع بإحرام واحد بين شكلين مختلفين، فيدخل بذلك فيهما، ولا يجمع بين شيئين من صنف واحد. فلما كان ما ذكرنا كذلك، كان له أن يجمع أيضا بأدائه جزاء واحدا ما يجب عليه بحرمتين مختلفتين وهما حرمة الحرم التي لا يجزئ فيها الصوم، وحرمة الإحرام التي يجزئ فيها الصوم، ويكون بذلك الجزاء الواحد مؤديا عما يجب عليه فيهما. فلم يكن له أن يجمع بأدائه جزاء واحدا عما يجب عليه في انتهاك حرمتين مؤتلفتين من شكل واحد، وهما: حرمة العمرة، وحرمة الحج. كما لم يكن له أن يدخل بإحرام واحد في حرمة شيئين مؤتلفين. ولما كان ما ذكرنا أيضا كذلك وكان الطواف للحجة، والطواف للعمرة من شكل واحد أيضا لم يكن بطواف واحد داخلًا فيهما، ولم يكن ذلك الطواف مجزئا عنهما، واحتاج أن يدخل في كل واحد منهما دخولا على حدة قياسا ونظرا على ما ذكرنا مما يجمعه بإحرام واحد من الحجة والعمرة المختلفتين، ومما ذكرنا مما لا يجمعه من الحجتين المؤتلفتين، ومن العمرتين المؤتلفتين. فإن قال قائل: فقد رأيناه يحل من حجته وعمرته بحلق واحد، ولا يكون عليه غير ذلك، فكذلك أيضا يطوف لهما طوافا واحدا ويسعى لهما سعيا واحدا، ليس عليه غير ذلك. قيل له: قد رأيناه يحل بحلق واحد من إحرامين مختلفين، لا يجزئه فيهما إلا طوافان مختلفان. وذلك أن رجلا لو أحرم بعمرة، فطاف لها وسعى وساق الهدي، ثم حج من عامه، فصار بذلك متمتعا أن كان حكمه في يوم النحر أن يحلق حلقا واحدا فيحل بذلك الحلق منهما جميعا. وكان يحل بحلق واحد من إحرامين مختلفين، قد كان دخل فيهما دخولا متفرقا. ولم يكن ما وجب من ذلك من حكم الحلق موجبا أن حكم الطواف لهما كان كذلك، وأنَّه طواف واحد، بل هو طوافان. فكذلك ما ذكرنا من حلق القارن لعمرته وحجته حلقا واحدا لا يجب به أن يكون كذلك حكم طوافه لهما طوافا واحدا. ولما كان قد يحل في الإحرامين اللذين قد دخل فيهما دخولا متفرقا بحلق واحد كان في الإحرامين اللذين قد دخل فيهما دخولا واحدا أحرى أن يحل منهما كذلك. فهذا هو النظر في هذا الباب على ما قد روي عن علي وعبد الله رضي الله عنهما، من وجوب الطواف لكل واحدة من العمرة والحجة، وعلى ما ذكرنا من النظر على ذلك من وجوب الجزاء لكل واحدة منهما في انتهاك حرمتهما. وهو قول أبي حنيفة، وأبي يوسف، ومحمد، رحمهم الله تعالى.




আলী ও আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেছেন: ক্বিরান হজকারী ব্যক্তি দুটি তাওয়াফ এবং দুটি সা’ঈ করবে।

এটি হলো আলী ও আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অভিমত, যা ক্বিরান হজকারীর তাওয়াফের ক্ষেত্রে ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অভিমতের বিপরীত।

আর এই মতের যৌক্তিকতা হলো: আমরা দেখি যে, যখন কোনো ব্যক্তি হজের ইহরাম করে, তখন তার উপর বায়তুল্লাহর তাওয়াফ এবং সাফা ও মারওয়ার সা’ঈ করা ওয়াজিব হয়। এবং এই ইহরামের কারণে যা কিছু তার জন্য হারাম হয়েছে, তা ভঙ্গ করার ক্ষেত্রে যে কাফফারা ওয়াজিব হয়, তাও তার উপর ওয়াজিব হয়। অনুরূপভাবে, যখন সে উমরার ইহরাম করে, তখন তার উপরও বায়তুল্লাহর তাওয়াফ এবং সাফা ও মারওয়ার সা’ঈ করা ওয়াজিব হয়। এবং এই ইহরামের কারণে যা কিছু তার জন্য হারাম হয়েছে, তা ভঙ্গ করার ক্ষেত্রে যে কাফফারা ওয়াজিব হয়, তাও তার উপর ওয়াজিব হয়। যখন সে এই দুটিকে (হজ ও উমরাকে) একত্রিত করে, তখন সর্বসম্মতভাবে সে দুটি ইহরামে আবদ্ধ: হজের ইহরাম ও উমরার ইহরাম। সুতরাং যুক্তিসঙ্গতভাবে প্রতীয়মান হয় যে, যদি সে প্রত্যেকটি (হজ বা উমরা) আলাদাভাবে করতো, তাহলে তা ভঙ্গ করার জন্য তার উপর যে তাওয়াফ, সা’ঈ এবং অন্যান্য কাফফারা ওয়াজিব হতো, এখানেও প্রত্যেকটির জন্য আলাদাভাবে সেই একই জিনিস ওয়াজিব হওয়া উচিত।

এই মতের বিপক্ষে আপত্তি তুলে বলা হলো: আমরা দেখেছি যে, হালাল (ইহরামবিহীন) ব্যক্তি হারামের (কাবা শরীফের সীমানার) মধ্যে শিকার করলে হারামের পবিত্রতা রক্ষার কারণে তার উপর জরিমানা (বদলা) ওয়াজিব হয়। আমরা আরও দেখেছি যে, মুহরিম (ইহরামকারী) ব্যক্তি হারামের বাইরে (হিল্লের মধ্যে) শিকার করলে ইহরামের পবিত্রতা রক্ষার কারণে তার উপর জরিমানা ওয়াজিব হয়। আর আমরা দেখেছি যে, মুহরিম ব্যক্তি যখন হারামের মধ্যে শিকার করে, তখন ইহরামের পবিত্রতা রক্ষার কারণে তার উপর একটি মাত্র জরিমানা ওয়াজিব হয়, এবং এর মধ্যেই হারামের পবিত্রতা রক্ষার জরিমানা অন্তর্ভুক্ত হয়ে যায়। অথচ ওই ব্যক্তি শিকার করার সময় দুটি পবিত্রতার মধ্যে ছিল: ইহরামের পবিত্রতা এবং হারামের পবিত্রতা। কিন্তু দুটি পবিত্রতার জন্য আলাদাভাবে সেই জিনিস ওয়াজিব হয়নি, যা প্রতিটি আলাদাভাবে করলে ওয়াজিব হতো। তারা (আপত্তিকারীরা) বললেন: তেমনিভাবে ক্বিরান হজকারীর ক্ষেত্রেও, যদি সে তার উমরা ও হজ আলাদাভাবে করতো, তাহলে প্রত্যেকের জন্য যা ওয়াজিব হতো, একত্র করার কারণে এর মধ্যে কোনো একটির জন্য যা ওয়াজিব, তার বেশি ওয়াজিব হবে না এবং অন্যটির (যা আলাদাভাবে করলে ওয়াজিব হতো) বিধান এতে অন্তর্ভুক্ত হয়ে যাবে।

তাদের (আপত্তিকারীদের) বলা হলো: তোমরা কেন বলছো যে, মুহরিম ব্যক্তি হারামের মধ্যে শিকার করলে একটি মাত্র জরিমানা ওয়াজিব হয়? অথচ আবু হানিফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর মতে, এর উপর কিয়াস (যৌক্তিক প্রমাণ) হলো তার উপর দুটি জরিমানা ওয়াজিব হওয়া উচিত: একটি ইহরামের পবিত্রতা রক্ষার জন্য, আরেকটি হারামের পবিত্রতা রক্ষার জন্য। কিন্তু তারা ’ইসতিহসান’ (উত্তম মনে করে) এর ব্যতিক্রম করেছেন। কিন্তু আমরা তাদের মতো বলছি না, বরং আমাদের কাছে এর কিয়াস (যৌক্তিক বিধান) হলো সেটাই, যা তারা ইসতিহসান হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

এর কারণ হলো: আমরা সর্বসম্মত মূলনীতি হিসেবে পেয়েছি যে, একজন ব্যক্তির জন্য হজ ও উমরাকে একত্রে করা বৈধ, কিন্তু দুটি হজ বা দুটি উমরা একত্রে করা বৈধ নয়। সুতরাং তার জন্য এক ইহরামের মাধ্যমে দুটি ভিন্ন প্রকৃতির বিষয়ের মধ্যে প্রবেশ করা সম্ভব, যার মাধ্যমে সে উভয়টিতে অন্তর্ভুক্ত হয়, কিন্তু একই প্রকারের দুটি বিষয়ের মধ্যে সে একত্রিত হতে পারে না। যেহেতু বিষয়টি এমন, তাই তার জন্য এক জরিমানা আদায়ের মাধ্যমে দুটি ভিন্ন পবিত্রতা (হুরমাত) ভঙ্গের দায়ভারকে একত্রিত করাও সম্ভব, আর তা হলো: হারামের সীমানার পবিত্রতা, যার ক্ষেত্রে রোজা যথেষ্ট নয়, এবং ইহরামের পবিত্রতা, যার ক্ষেত্রে রোজা যথেষ্ট। এই একটি জরিমানা আদায়ের মাধ্যমে সে উভয়ের দায়ভার পূরণ করে। কিন্তু তার জন্য একই প্রকারের, এক ধাঁচের, দুটি সম্মিলিত পবিত্রতা ভঙ্গের দায়ভারের জন্য একটি মাত্র জরিমানা আদায়ের মাধ্যমে একত্রিত করা সম্ভব নয়। আর তা হলো: উমরার পবিত্রতা ও হজের পবিত্রতা। যেমনভাবে তার জন্য এক ইহরামের মাধ্যমে একই ধরনের দুটি বিষয়ের পবিত্রতায় প্রবেশ করা সম্ভব নয়।

যেহেতু আমরা যা উল্লেখ করেছি তা-ই সত্য, আর হজের জন্য তাওয়াফ এবং উমরার জন্য তাওয়াফ—এগুলোও একই ধরনের আমল, তাই একটি তাওয়াফের মাধ্যমে সে দুটির মধ্যে প্রবেশ করতে পারে না। এবং সেই তাওয়াফটি উভয়ের জন্য যথেষ্ট হতে পারে না। বরং আমাদের উল্লেখিত যুক্তি ও কিয়াসের ভিত্তিতে—যেভাবে সে এক ইহরামের মাধ্যমে দুটি ভিন্ন প্রকৃতির হজ ও উমরাকে একত্রিত করে এবং যেভাবে সে দুটি একই প্রকৃতির হজ বা দুটি একই প্রকৃতির উমরাকে একত্রিত করতে পারে না—তেমনিভাবে তাকে প্রত্যেকটির মধ্যে আলাদাভাবে প্রবেশ করতে হবে।

যদি কেউ বলে: আমরা তো দেখি, ক্বিরান হজকারী ব্যক্তি একটি মাত্র চুল কাটার (হালকের) মাধ্যমে তার হজ ও উমরা উভয় থেকে হালাল হয়ে যায়, এর বাইরে তার উপর আর কিছু ওয়াজিব হয় না। সুতরাং অনুরূপভাবে, সে উভয়ের জন্য একটি তাওয়াফ ও একটি সা’ঈ করবে, এর বেশি কিছু নয়।

তাকে বলা হবে: আমরা দেখেছি যে, সে দুটি ভিন্ন ইহরাম থেকে একটি মাত্র চুল কাটার মাধ্যমে হালাল হয়, অথচ ওই দুটি ইহরামের জন্য দুটি ভিন্ন তাওয়াফ ছাড়া যথেষ্ট হয় না। উদাহরণস্বরূপ, কোনো ব্যক্তি যদি উমরার ইহরাম করে, তারপর তার তাওয়াফ ও সা’ঈ করে এবং কুরবানির পশু নিয়ে যায়, এরপর সেই বছরই হজ করে; এর মাধ্যমে সে মুতামাত্তি’ হজকারী হয়ে যায়। তার বিধান হলো, কুরবানির দিনে সে একটি মাত্র চুল কাটার মাধ্যমে উভয় (হজ ও উমরা) থেকে হালাল হয়ে যাবে। সে দুটি ভিন্ন ইহরাম থেকে একটি চুল কাটার মাধ্যমে হালাল হলো, যেগুলোতে সে আলাদাভাবে প্রবেশ করেছিল। কিন্তু চুল কাটার এই বিধানটি তাওয়াফের ক্ষেত্রেও প্রযোজ্য হবে না যে, একটি মাত্র তাওয়াফই যথেষ্ট হবে। বরং তা দুটি তাওয়াফ। অনুরূপভাবে, ক্বিরান হজকারী ব্যক্তির হজ ও উমরার জন্য একটি মাত্র চুল কাটা যথেষ্ট হওয়ার বিধানটি তার তাওয়াফের ক্ষেত্রেও প্রযোজ্য হবে না যে, একটি তাওয়াফই যথেষ্ট হবে। বরং যে দুটি ইহরামে সে ভিন্নভাবে প্রবেশ করেছিল, তার জন্য একটি চুল কাটার মাধ্যমে হালাল হওয়া যদি সম্ভব হয়, তাহলে যে দুটি ইহরামে সে একত্রে প্রবেশ করেছে, তার জন্য তো আরও সহজে হালাল হওয়া সম্ভব।

আলী ও আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে উমরা ও হজের প্রত্যেকটির জন্য আলাদা তাওয়াফ ওয়াজিব হওয়ার যে বর্ণনা এসেছে, এবং আমরা যা যুক্তিসঙ্গতভাবে উল্লেখ করেছি যে, তাদের (হজ ও উমরার) পবিত্রতা ভঙ্গের কারণে প্রত্যেকটির জন্য জরিমানা ওয়াজিব, এই অধ্যায়ে আমাদের দৃষ্টিভঙ্গি তাই। আর এটিই হলো ইমাম আবু হানিফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর অভিমত।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف، زياد بن مالك قال الذهبي: ليس بحجة، وقال البخاري في تاريخه 3/ 372: ولا يعرف له سماع من علي ولا من عبد الله، ولا للحكم منه.









শারহু মা’আনিল-আসার (3683)


حدثنا يزيد بن سنان، قال: ثنا يزيد بن هارون قال: أنا إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن عروة بن مضرس قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم بجمع، فقلت: يا رسول الله! هل لي من حج وقد أنضيت راحلتي؟ فقال: من صلى معنا هذه الصلاة، قد وقف معنا قبل ذلك وأفاض من عرفة ليلًا أو نهارًا فقد تم حجه وقضى تفثه" .




উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট জাম’আ (মুযদালিফা)-তে এসেছিলাম। অতঃপর আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার কি হজ্ব হবে? অথচ আমি আমার সওয়ারিকে ক্লান্ত করে ফেলেছি। তখন তিনি বললেন, যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাত (ফজর) আদায় করবে, এর পূর্বে আমাদের সাথে অবস্থান করেছে এবং রাতে বা দিনে আরাফাহ থেকে প্রত্যাবর্তন করেছে (ইফাদাহ করেছে), তার হজ্ব পূর্ণ হয়ে গেল এবং সে তার অপরিহার্য কাজ সম্পন্ন করলো।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3684)


حدثنا إبراهيم بن مرزوق، قال أنا وهب، قال: ثنا شعبة، عن ابن أبي السفر، وإسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، وزكريا، عن الشعبي، وداود بن أبي هند، عن الشعبي، عن عروة بن مضرس رضي الله عنه، عن النبي صلى الله عليه وسلم … مثله .




উরওয়াহ ইবনে মুদার্রিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3685)


حدثنا روح بن الفرج، قال: ثنا حامد بن يحيى، قال: ثنا سفيان، قال: ثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، داود بن أبي هند عن الشعبي، وزكريا [بن أبي زائدة]، عن الشعبي قال: سمعت عروة بن مضرس بن أوس بن حارثة بن لام الطائي رضي الله عنه، يقول: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بمزدلفة، فقلت: يا رسول الله جئت من جبلي طيئ، ووالله ما جئت حتى أتعبت نفسي، وأنضيت راحلتي، وما تركت حبلا رملًا من هذه الحبال إلا وقد وقفت عليه، فهل لي من حج؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من شهد معنا هذه الصلاة صلاة الفجر بالمزدلفة، وقد كان وقف بعرفة قبل ذلك ليلا أو نهارا، فقد تم حجه، وقضى تفثه ". قال سفيان، وزاد زكريا فيه، وكان أحفظ الثلاثة لهذا الحديث، قال: فقلت يا رسول الله! أتيت هذه الساعة من جبلي طيئ، قد أكللت راحلتي، وأتعبت نفسي فهل لي من حج؟ فقال: "من شهد معنا هذه الصلاة، ووقف معنا حتى نفيض، وقد كان وقف قبل ذلك بعرفة من ليل أو نهار، فقد تم حجه، وقضى تفثه" قال سفيان: وزاد داود بن أبي هند، قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم حين برق الفجر … ثم ذكر الحديث . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى أن الوقوف بالمزدلفة فرض لا يجوز الحج إلا بإصابته. واحتجوا في ذلك بقول الله عز وجل: {فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [البقرة: 198] وبهذا الحديث الذي رويناه. وقالوا: قد ذكر الله عز وجل في كتابه المشعر الحرام، كما ذكر عرفات، وذكر ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم في سنته، فحكمهما واحد، لا يجزئ الحج إلا بإصابتهما. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: أما الوقوف بعرفة فهو من صُلب الحج الذي لا يجزئ الحج إلا بإصابته، وأما الوقوف بمزدلفة فليس كذلك. وكان من الحجة لهم في ذلك أن قول الله عز وجل: {فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [البقرة: 198] ليس فيه دليل على أن ذلك على الوجوب لأن الله عز وجل إنما ذكر الذكر، ولم يذكر الوقوف، وكلٌّ قد أجمع أنه لو وقف بمزدلفة، ولم يذكر الله عز وجل أن حجه تام. فإذا كان الذكر المذكور في الكتاب ليس من صُلب الحج، فالموطن الذي يكون ذلك الذكر فيه الذي لم يذكر في الكتاب أحرى أن لا يكون فرضا. وقد ذكر الله عز وجل أشياء في كتابه من الحج، ولم يرد بذكرها إيجابها، حتى لا يجزئ الحج إلا بإصابتها في قول أحد من المسلمين من ذلك قوله تعالى {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَارِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا} [البقرة: 158] وكل قد أجمع أنه لو حج ولم يطف بين الصفا والمروة، أن حجه قد تم، وعليه دم مكان ما ترك من ذلك. فكذلك ذكر الله عز وجل المشعر الحرام في كتابه ليس في ذلك دليل على إيجابه حتى لا يجزئ الحج إلا بإصابته. وأما ما في حديث عروة بن مضرس رضي الله عنه، فليس فيه دليل أيضا على ما ذكروا؛ لأن رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما قال فيه: من صلى معنا صلاتنا هذه، وقد كان أتى عرفة قبل ذلك من ليل أو نهار فقد تم حجه وقضى تفثه" فذكر الصلاة، وكل قد أجمع على أنه لو بات بها، ووقف ونام عن الصلاة فلم يصلها مع الإمام حتى فاتته أن حجه تام. فلما كان حضور الصلاة مع الإمام المذكور في هذا الحديث ليس من صلب الحج الذي لا يجزئ الحج إلا بإصابته كان الموطن الذي تكون فيه تلك الصلاة الذي لم يذكر في هذا الحديث أحرى أن لا يكون كذلك. فلم يتحقق بهذا الحديث ذكر الفرض إلا بعرفة خاصة. على ذلك وقد روى عبد الرحمن بن يعمر الديلي، عن النبي صلى الله عليه وسلم ما يدل على ذلك.




উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস ইবনু আওস ইবনু হারিসাহ ইবনু লাম আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুযদালিফায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি ত্বাই (গোত্রের) পাহাড় থেকে এসেছি। আল্লাহর কসম! আমি আমার নিজেকে ক্লান্ত না করে এবং আমার আরোহী পশুকে দুর্বল না করে আসিনি। আর আমি এই (মুযদালিফার) কোনো বালুকাময় পাহাড়ের ঢিবিও বাকি রাখিনি, যেখানে আমি অবস্থান করিনি। আমার কি কোনো হজ হবে?"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে মুযদালিফায় এই সালাত, অর্থাৎ ফজরের সালাতে উপস্থিত হয়েছে এবং এর আগে রাতে বা দিনে আরাফাতে অবস্থান করেছে, তার হজ পূর্ণ হয়েছে এবং সে তার ময়লা-আবর্জনা (ইহরামের কারণে সৃষ্ট) দূর করেছে।"

সুফিয়ান বলেন, আর যাকারিয়্যা এতে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন—তিনি এই হাদীসটি এই তিনজনের মধ্যে অধিক মুখস্থকারী ছিলেন—তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি এই মুহূর্তে ত্বাই-এর পাহাড় থেকে এসেছি। আমি আমার আরোহীকে পরিশ্রান্ত করেছি এবং নিজেকে ক্লান্ত করেছি। আমার কি কোনো হজ হবে? তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাতে উপস্থিত হয়েছে এবং আমরা ফিরে আসা পর্যন্ত আমাদের সাথে অবস্থান করেছে, আর এর আগে আরাফাতে রাতে বা দিনে অবস্থান করেছে, তার হজ পূর্ণ হয়েছে এবং সে তার ময়লা-আবর্জনা দূর করেছে।"

সুফিয়ান বলেন, আর দাউদ ইবনু আবী হিন্দ অতিরিক্ত বলেছেন: তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলাম যখন ফজর উদিত হলো... অতঃপর হাদীসটি বর্ণনা করলেন।

আবু জা’ফর বলেন: একদল লোক মনে করেন যে মুযদালিফায় অবস্থান করা ফরয, এটি সম্পন্ন না হলে হজ জায়েয হবে না। তারা এ বিষয়ে আল্লাহ তা’আলার এই উক্তি দ্বারা দলিল পেশ করেন: {فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [বাকারা: ১৯৯] "যখন তোমরা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করবে, তখন মাশআরুল হারামের নিকট আল্লাহকে স্মরণ করবে।" [সূরা বাকারা: ১৯৮]। এবং আমরা যে হাদীসটি বর্ণনা করেছি, তা দ্বারাও (তারা দলিল পেশ করেন)। তারা বলেন: আল্লাহ তা’আলা তাঁর কিতাবে আরাফাতের উল্লেখ করার মতোই মাশআরুল হারামের উল্লেখ করেছেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও তাঁর সুন্নাহতে এটির উল্লেখ করেছেন। সুতরাং উভয়ের হুকুম এক, উভয়টি সম্পন্ন না হলে হজ যথেষ্ট হবে না।

অন্যেরা তাদের বিরোধিতা করেছেন এবং বলেছেন: আরাফাতে অবস্থান করা হলো হজের মূল অংশ (সুুলবুল হজ), যা সম্পন্ন না হলে হজ যথেষ্ট হয় না। কিন্তু মুযদালিফায় অবস্থান করা তেমন নয়। তাদের পক্ষে দলিল হলো, আল্লাহ তা’আলার বাণী: {فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [বাকারা: ১৯৯]—এর মধ্যে আবশ্যকতা (ফরযিয়্যাত)-এর কোনো প্রমাণ নেই। কারণ আল্লাহ তা’আলা এখানে কেবল যিকিরের কথা উল্লেখ করেছেন, অবস্থানের কথা উল্লেখ করেননি। আর সকলেই ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে, যদি কেউ মুযদালিফায় অবস্থান করে কিন্তু আল্লাহকে স্মরণ না করে, তবুও তার হজ পূর্ণ হবে। সুতরাং যদি কিতাবে উল্লিখিত যিকিরই হজের মূল অংশ না হয়, তবে যে স্থানে সেই যিকির করা হয় এবং যা কিতাবে উল্লেখ করা হয়নি, সে স্থানটি আরও বেশি ফরয না হওয়ার উপযুক্ত।

আর আল্লাহ তা’আলা তাঁর কিতাবে হজের কিছু বিষয় উল্লেখ করেছেন, কিন্তু সেগুলোর উল্লেখ দ্বারা সেগুলোকে এমন আবশ্যক করা উদ্দেশ্য নয় যে তা সম্পন্ন না হলে কোনো মুসলমানের মতে হজ যথেষ্ট হবে না। এর মধ্যে রয়েছে আল্লাহ তা’আলার বাণী: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَارِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا} [বাকারা: ১৫৮] "নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্যতম। সুতরাং যে ব্যক্তি কাবা গৃহের হজ অথবা উমরাহ করে, তাদের উভয়ের মাঝখানে প্রদক্ষিণ করাতে তার কোনো দোষ নেই।" [সূরা বাকারা: ১৫৮]। আর সকলেই ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে, যদি কেউ হজ করে এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা’ঈ না করে, তবুও তার হজ পূর্ণ হয়ে যায়, তবে এর জন্য তাকে দম (পশু কুরবানি) দিতে হবে। ঠিক একইভাবে, আল্লাহ তা’আলা তাঁর কিতাবে মাশআরুল হারামের উল্লেখ করেছেন—তা দ্বারা এটির আবশ্যকতার কোনো দলিল প্রমাণিত হয় না যে এটি সম্পন্ন না হলে হজ যথেষ্ট হবে না।

আর উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে যা রয়েছে, তাতেও তাদের দাবির পক্ষে কোনো দলিল নেই। কারণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাতে কেবল বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাত আদায় করেছে এবং এর আগে রাতে বা দিনে আরাফাতে এসেছে, তার হজ পূর্ণ হয়েছে এবং সে তার ময়লা-আবর্জনা দূর করেছে।" এখানে সালাতের কথা উল্লেখ করা হয়েছে। আর সকলে ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে, যদি কেউ মুযদালিফায় রাত কাটায়, অবস্থান করে এবং সালাতের সময় ঘুমিয়ে পড়ে ফলে ইমামের সাথে সালাত আদায় করতে না পারে, তবুও তার হজ পূর্ণ হয়। যখন এই হাদীসে উল্লিখিত ইমামের সাথে সালাতে উপস্থিত হওয়া হজের সেই মূল অংশ নয় যা সম্পন্ন না হলে হজ যথেষ্ট হবে না, তখন যে স্থানে সেই সালাত হয় এবং যা এই হাদীসে উল্লেখিত হয়নি, সেটি আরও বেশি ফরয না হওয়ার যোগ্য।

সুতরাং এই হাদীস দ্বারা আরাফা ছাড়া অন্য কোনো স্থানে ফরয হওয়ার বিষয়টি সুনির্দিষ্টভাবে প্রমাণিত হয় না। এছাড়া এ বিষয়ে আবদুর রহমান ইবনু ইয়া’মুর আদ-দায়লী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এমন হাদীস বর্ণিত হয়েছে যা এর প্রতি ইঙ্গিত করে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : بالحاء المهملة وسكون الباء الموحدة وهو المستطيل من الرمل وقيل: الضخم منه، وقيل: الحبال من الرمل كالجبال من غير الرمل. يعني نسكه. إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3686)


حدثنا علي بن معبد، قال: ثنا يعلى بن عبيد، قال: ثنا سفيان، عن بكير بن عطاء، عن عبد الرحمن بن يعمر الديلي، قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفات، فأقبل أناس من أهل نجد، فسألوه عن الحج. فقال: "الحج يوم عرفة، ومن أدرك جمعا قبل صلاة الصبح فقد أدرك الحج، أيام منى ثلاثة أيام التشريق {فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ} [البقرة: 203] " ثم أردف خلفه رجلا ينادي بذلك .




আব্দুল রহমান ইবনে ইয়া’মুর আদ-দাইলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আরাফাতের ময়দানে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখলাম। তখন নজদবাসী কিছু লোক তাঁর নিকট আগমন করে এবং তাঁকে হজ্ব সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে। তিনি বললেন: "হজ্ব হলো আরাফার দিনের (উপস্থিতি)। আর যে ব্যক্তি সুবহে সাদেকের (ফজরের) সালাতের পূর্বে মুযদালিফায় (জামা’আ) পৌঁছতে পারল, সে হজ্ব পেল। মিনার দিনগুলো হলো তাশরীকের তিন দিন। "অতঃপর যে ব্যক্তি দু’দিনের মধ্যে (ত্বরান্বিত হয়ে চলে আসে), তার কোনো পাপ নেই এবং যে বিলম্ব করে, তারও কোনো পাপ নেই।" (সূরা বাকারা: ২০৩) এরপর তিনি তার পিছনে একজন ব্যক্তিকে বসিয়ে দিলেন যেন সে এ কথাগুলো উচ্চস্বরে ঘোষণা করে দেয়।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (3687)


حدثنا علي بن معبد، قال: ثنا شبابة بن سوار، قال: ثنا شعبة، عن بكير بن عطاء، عن عبد الرحمن بن يعمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … ثم ذكر مثله، ولم يذكر سؤال أهل نجد، ولا إردافه الرجل . ففي هذا الحديث أن أهل نجد سألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحج، فكان جوابه لهم: "الحج يوم عرفة". وقد علمنا أن جواب رسول الله صلى الله عليه وسلم هو الجواب التام الذي لا نقص فيه، ولا فضل؛ لأن الله تعالى قد آتاه جوامع الكلم وخواتمه، فلو كان عندما سألوه عن الحج أرادوا بذلك ما لا بد منه في الحج، لكان يذكر عرفة، والطواف، ومزدلفة، وما يفعل من الحج سوى ذلك. فلما ترك ذكر ذلك في جوابه إياهم، علمنا أن ما أرادوا بسؤالهم إياه عن الحج هو ما إذا فات فات الحج، فأجابهم بأن قال: "الحج يوم عرفة" فلو كانت مزدلفة كعرفة لذكر لهم مزدلفة مع ذكره، عرفة، ولكنه ذكر عرفة خاصة؛ لأنها صلب الحج الذي إذا فات فات الحج. ثم قال كلاما مستأنفا، ليعلم الناس: من أدرك جمعا قبل طلوع الفجر فقد أدرك الحج، ليس على معنى أنه أدرك جميع الحج؛ لأنَّه قد ثبت في أول كلامه "الحج عرفة" فأوجب بذلك أن فوت عرفة فوت الحج. ثم قال: "ومن أدرك جمعا قبل صلاة الصبح، فقد أدرك الحج" ليس على معنى أنه لم يبق عليه من الحج شيء؛ لأن بعد ذلك طواف الزيارة، وهو واجب لا بد منه، ولكن فقد أدرك الحج، بما تقدم له من الوقوف بعرفة. فهذا أحسن ما خرج من معاني هذه الآثار، وصحت عليه ولم تتضاد. وأما وجه ذلك من طريق النظر، فإنا قد رأينا الأصل المجتمع عليه أن للضعفة أن يتعجلوا من جمع بليل. وكذلك أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أغيلمة بني عبد المطلب، وسنذكر ذلك في موضعه من كتابنا هذا، إن شاء الله تعالى. ورخص لسودة رضي الله عنها في ترك الوقوف بها.




আবদুর রহমান ইবনে ইয়া’মুর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... [এরপর তার মতোই বর্ণনা করলেন, তবে তিনি নজদবাসীদের প্রশ্ন এবং লোকটিকে বাহনে আরোহণ করানোর কথা উল্লেখ করেননি।] এই হাদীসে রয়েছে যে, নজদবাসী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে হজ্ব সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিল, আর তাঁর উত্তর ছিল: “হজ্ব হলো আরাফাতের দিন।” আমরা জানি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উত্তর ছিল ত্রুটিমুক্ত এবং অতিরিক্ততা বর্জিত পরিপূর্ণ উত্তর; কেননা আল্লাহ তা’আলা তাঁকে ’জাওয়ামি’উল কালিম’ (সংক্ষিপ্ত অথচ অর্থপূর্ণ বাক্য) প্রদান করেছেন। যদি তারা যখন তাঁকে হজ্ব সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিল, তখন হজ্বের অপরিহার্য সব বিষয় জানতে চাইত, তবে তিনি আরাফাহ, তাওয়াফ, মুযদালিফাহ এবং অন্যান্য করণীয় কাজগুলোও উল্লেখ করতেন। কিন্তু যখন তিনি তাদের উত্তরে সেসবের উল্লেখ বাদ দিলেন, তখন আমরা বুঝতে পারলাম যে হজ্ব সম্পর্কে তাদের প্রশ্ন ছিল এমন বিষয় নিয়ে, যা ছুটে গেলে হজ্বই ছুটে যায়। তাই তিনি তাদের উত্তরে বললেন: “হজ্ব হলো আরাফাতের দিন।” যদি মুযদালিফাহ আরাফাতের মতোই (অপরিহার্য) হতো, তবে তিনি আরাফাতের সাথে মুযদালিফাহরও উল্লেখ করতেন। কিন্তু তিনি বিশেষভাবে শুধু আরাফাতের কথা উল্লেখ করেছেন; কারণ এটিই হজের মূল স্তম্ভ, যা ছুটে গেলে হজ্ব ছুটে যায়।

এরপর তিনি নতুন করে কথা বললেন যাতে মানুষ জানতে পারে: "যে ব্যক্তি ফজরের আগে ’জাম’ (মুযদালিফাহ) লাভ করল, সে হজ্ব লাভ করল।" এর অর্থ এই নয় যে, সে সম্পূর্ণ হজ্ব সম্পন্ন করল; কারণ তাঁর প্রথম কথাতেই তো প্রমাণিত হয়েছে যে, "হজ্ব হলো আরাফাহ," যা দ্বারা আবশ্যক হয়ে যায় যে আরাফাহ ছুটে গেলে হজ্ব ছুটে যায়। এরপর তিনি বলেন: "আর যে ব্যক্তি ফজরের সালাতের আগে জাম’ (মুযদালিফাহ) লাভ করল, সে হজ্ব লাভ করল।" এর অর্থ এই নয় যে, তার ওপর হজ্বের আর কোনো কিছু অবশিষ্ট রইল না; কারণ এর পরে তাওয়াফে যিয়ারাহ রয়েছে, যা অপরিহার্য এবং অবশ্যকরণীয়। তবে আরাফাতে পূর্ববর্তী অবস্থানের কারণে সে হজ্ব লাভ করল।

এই হলো সেই ব্যাখ্যা, যা এই সমস্ত হাদীসের অর্থ থেকে সবচেয়ে উত্তম রূপে বেরিয়ে আসে, যা সঠিক এবং পরস্পরবিরোধী নয়। আর যুক্তির দৃষ্টিকোণ থেকে এর কারণ হলো, আমরা দেখেছি যে দুর্বল লোকদের জন্য রাতেই ’জাম’ (মুযদালিফাহ) থেকে দ্রুত প্রস্থান করার অনুমতি রয়েছে, এই বিষয়ে ঐক্যমত রয়েছে। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বনু আব্দুল মুত্তালিবের অল্পবয়স্ক ছেলেদেরকেও এমনই আদেশ দিয়েছিলেন। ইনশাআল্লাহ, আমরা এই কিতাবের নির্দিষ্ট স্থানে এর আলোচনা করব। এবং তিনি সাওদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেখানে (মুযদালিফায়) অবস্থান না করার অনুমতিও দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3688)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا حجاج، قال: ثنا حماد، قال: أنا عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة رضي الله عنها قالت: كانت سودة امرأة ثبطة ، ثقيلة، فاستأذنت النبي صلى الله عليه وسلم أن تفيض من جمع قبل أن تقف، فأذن لها، ولوددت أني كنت استأذنته فأذن لي . قال أبو جعفر: فسقط عنهم الوقوف بمزدلفة للعذر، ورأينا عرفة لا بد من الوقوف بها، لا يسقط ذلك لعذر. فما سقط بالعذر فهو الذي ليس من صُلب الحج، وما لا بد منه فلا يسقط بعذر ولا بغيره فهو الذي من صلب الحج. ألا ترى أن طواف الزيارة هو من صلب الحج، وأنَّه لا يسقط عن الحائض بالعذر، وأن طواف الصدر ليس من صلب الحج، وهو يسقط عن الحائض بالعذر، وهو الحيض. فلما كان الوقوف بمزدلفة مما يسقط بالعذر، كان من شكل ما ليس بفرض، فثبت بذلك ما وصفناه. وهو قول أبي حنيفة، وأبي يوسف، ومحمد، رحمهم الله تعالى.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন ধীর প্রকৃতির, ভারী (আকারে বা চলনে)। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইলেন যে, (নির্দিষ্ট সময়ে) অবস্থানের পূর্বে যেন তিনি মুযদালিফা থেকে (মিনায়) চলে যেতে পারেন। তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। আর আমার আকাঙ্ক্ষা হয়েছিল যে, আমিও যদি তাঁর কাছে অনুমতি চাইতাম এবং তিনি আমাকে অনুমতি দিতেন! আবু জাফর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: সুতরাং (এই হাদিসের কারণে) ওজরের কারণে তাদের উপর থেকে মুযদালিফায় অবস্থান করা রহিত হয়ে গেল। আর আমরা মনে করি যে, আরাফায় অবস্থান করা অপরিহার্য, যা কোনো ওজরের কারণেও রহিত হয় না। যা ওজরের কারণে রহিত হয়ে যায়, তা হজের মূল স্তম্ভের অন্তর্ভুক্ত নয়। আর যা অপরিহার্য এবং কোনো ওজর বা ওজর ব্যতিরেকে রহিত হয় না, তাই হজের মূল স্তম্ভ। আপনি কি দেখেন না যে, ‘তাওয়াফে যিয়ারা’ হজের মূল স্তম্ভের অন্তর্ভুক্ত এবং তা ওজরের কারণে ঋতুমতী নারীর থেকেও রহিত হয় না? অথচ ‘তাওয়াফে সদর’ (বিদায়ী তাওয়াফ) হজের মূল স্তম্ভের অন্তর্ভুক্ত নয়, আর ঋতুস্রাবের ওজরের কারণে তা ঋতুমতী নারীর থেকে রহিত হয়ে যায়। সুতরাং মুযদালিফায় অবস্থান করা যখন ওজরের কারণে রহিত হয়ে যায়, তখন তা ফরয নয় এমন বিষয়ের অনুরূপ। এভাবে আমরা যা বর্ণনা করলাম তা প্রমাণিত হলো। এটিই হলো আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের প্রতি রহম করুন)-এর অভিমত।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : بفتح الثاء وكسر الباء يعني: بطيئة. إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3689)


حدثنا علي بن شيبة، قال: ثنا عبيد الله بن موسى، قال: أنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن يزيد، قال: خرجت مع عبد الله بن مسعود رضي الله عنه إلى مكة، فلما أتى جمعا صلى الصلاتين كل واحدة منهما بأذان وإقامة، ولم يصل بينهما .




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযিদ বলেন, আমি তাঁর সঙ্গে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলাম। যখন তিনি জাম’আ (মুযদালিফা) নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন তিনি দুটি সালাত আদায় করলেন। তার প্রত্যেকটির জন্য আলাদা আযান ও আলাদা ইকামত দেওয়া হলো। আর তিনি সে দুটির মাঝখানে কোনো সালাত আদায় করেননি।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3690)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا أحمد بن يونس، قال: ثنا إسرائيل، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، أنه صلى مع عمر بن الخطاب رضي الله عنه صلاتين مرتين بجمع، كل صلاة بأذان وإقامة، والعشاء بينهما . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى هذين الحديثين فزعموا أن المغرب والعشاء يجمع بينهما بمزدلفة بأذانين وإقامتين. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: أما الأولى منهما فتصلى بأذان وإقامة، وأما الثانية فتصلى بلا أذان ولا إقامة. وقالوا: أما كان من فعل عمر رضي الله عنه ومن تأذينه للثانية فإنما فعل ذلك لأن الناس قد كانوا تفرقوا لعشائهم، فأذن ليجمعهم. وكذلك نقول نحن: إذا تفرق الناس عن الإمام لعشاء أو لغيره، أمر المؤذن فأذن ليجتمعوا لأذانه. فهذا معنى ما روي في هذا عن عمر رضي الله عنه، والذي روي عن عبد الله، فهو مثل هذا أيضا.




আসওয়াদ থেকে বর্ণিত, তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মুযদালিফায় (জামে) দু’বার দুটি সালাত আদায় করেন। প্রত্যেক সালাতের জন্য আযান ও ইকামত দেওয়া হয়েছিল, এবং মাগরিব ও ইশার সালাতকে একসাথে করা হয়েছিল। আবূ জা’ফর (তাহাবী) বলেন: একদল লোক এই দুটি হাদীসের ভিত্তিতে মত দিয়েছেন যে, মুযদালিফায় মাগরিব ও ইশার সালাত দুটি আযান ও দুটি ইকামত সহকারে একসাথে আদায় করা হবে। কিন্তু অন্যরা তাদের বিরোধিতা করে বলেন: এই দুটির মধ্যে প্রথম সালাতটি আযান ও ইকামত সহকারে আদায় করা হবে। আর দ্বিতীয় সালাতটি আযান ও ইকামত ছাড়াই আদায় করা হবে। তারা আরও বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক দ্বিতীয় সালাতের জন্য আযান দেওয়ার যে বিষয়টি আছে, তিনি কেবল এই কারণে তা করেছিলেন যে, লোকেরা তাদের রাতের খাবার বা অন্যান্য কাজে ছড়িয়ে পড়েছিল। তাই তিনি তাদেরকে একত্রিত করার জন্য আযান দিয়েছিলেন। আমরাও একই কথা বলি: যখন লোকেরা রাতের খাবার বা অন্য কোনো কারণে ইমাম থেকে দূরে সরে যায়, তখন তিনি মুয়ায্যিনকে আযান দিতে আদেশ করেন, যাতে তারা আযানের মাধ্যমে পুনরায় সমবেত হতে পারে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এ বিষয়ে যা বর্ণনা করা হয়েছে, তার অর্থ এটাই। আর আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে, তার অর্থও একই।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3691)


حدثنا يونس، قال: ثنا سفيان، عن أبي إسحاق الهمداني، عن عبد الرحمن بن يزيد، قال: كان ابن مسعود رضي الله عنه يجعل العشاء بالمزدلفة بين الصلاتين . فقد عاد معنى ما روي عن عبد الله في هذا إلى معنى ما روي عن عمر رضي عنه أيضا. ثم نظرنا فيما روي في ذلك إذا صُليتا معا، كيف نفعل فيهما.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযীদ) বলেন: ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফায় মাগরিব ও ইশা দুই সালাতের মধ্যবর্তী সময়ে ইশার সালাত আদায় করতেন। সুতরাং এ বিষয়ে আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে তার মর্ম, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে তার মর্মের অনুরূপ। এরপর আমরা এ বিষয়ে বর্ণিত বর্ণনাগুলো বিবেচনা করলাম যে, যখন দুই সালাত একত্রে আদায় করা হবে, তখন সেগুলোর ক্ষেত্রে আমাদের কীভাবে আমল করা উচিত।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3692)


فإذا ابن مرزوق قد حدثنا، قال: ثنا أبو عامر العقدي، قال: ثنا شعبة، عن الحكم أنه صلى مع سعيد بن جبير بجمع المغرب ثلاثا، والعشاء ركعتين بإقامة واحدة، ثم حدث أن ابن عمر رضي الله عنهما صنع مثل ذلك، وحدث ابن عمر رضي الله عنهما أن النبي صلى الله عليه وسلم صنع مثل ذلك في ذلك المكان .




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আল-হাকাম বর্ণনা করেন যে, তিনি সাঈদ ইবন জুবাইরের সাথে মুযদালিফায় (জম’এ) মাগরিবের সালাত তিন রাকাত এবং ইশার সালাত দুই রাকাত, এক ইকামাতে আদায় করলেন। এরপর তিনি বর্ণনা করলেন যে, ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ কাজ করেছিলেন। আর ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও সেই স্থানে অনুরূপ কাজ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (3693)


حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو الوليد، قال: ثنا شعبة، عن الحكم، أنه صلى مع سعيد بن جبير بجمع المغرب ثلاثا، والعشاء ركعتين، بإقامة واحدة، ثم حدث أن ابن عمر رضي الله عنهما صنع مثل ذلك، وحدث ابن عمر رضي الله عنهما أن النبي صلى الله عليه وسلم صنع مثل ذلك في ذلك المكان .




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাকাম সাঈদ ইবনে জুবাইরের সাথে মুযদালিফায় মাগরিব তিন রাকাত এবং ইশা দুই রাকাত এক ইকামাতে আদায় করেছিলেন। এরপর তিনি (হাকাম) বর্ণনা করেন যে, আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ কাজ করেছিলেন। আর আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণনা করেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই স্থানে অনুরূপভাবে এই কাজ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح، وهو مكرر سابقه.