শারহু মা’আনিল-আসার
حدثنا محمد بن عبد الله بن ميمون، قال: ثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي إبراهيم الأنصاري، قال: ثنا أبو سعيد الخدري، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يستغفر يوم الحديبية للمحلقين ثلاثا، وللمقصرين مرة .
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি হুদাইবিয়ার দিনে যারা মাথা মুণ্ডন করেছিল তাদের জন্য তিনবার ক্ষমা প্রার্থনা করলেন এবং যারা চুল ছোট করেছিল তাদের জন্য একবার ক্ষমা চাইলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لجهالة أبي إبراهيم الأنصاري المدني.
حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا هارون بن إسماعيل الخزاز قال: ثنا علي بن المبارك، قال: ثنا يحيى بن أبي كثير، أن أبا إبراهيم الأنصاري حدثه، عن أبي سعيد الخدري، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الحديبية استغفر للمحلقين مرة، وللمقصرين مرة. وحلق رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه رءوسهم غير رجلين: رجل من الأنصار، ورجل من قريش . قال أبو جعفر: فلما حلقوا جميعا إلا من قصر منهم، وفضل رسول الله صلى الله عليه وسلم من حلق منهم على من قصر، ثبت بذلك أنهم قد كان لهم الحلق أو التقصير، كما كان عليهم لو وصلوا إلى البيت، ولولا ذلك لما كانوا فيه إلا سواء، ولا كان لبعضهم في ذلك فضيلة على بعض. ففي تفضيل النبي صلى الله عليه وسلم في ذلك المحلقين على المقصرين دليل على أنهم كانوا في ذلك كغير المحصرين. فقد ثبت بما ذكرنا أن حكم الحلق أو التقصير لا يزيله الإحصار.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে একবার যারা মাথা মুণ্ডন করেছিলেন তাদের জন্য এবং একবার যারা চুল ছোট করেছিলেন তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ তাদের মাথা মুণ্ডন করেছিলেন, তবে দুইজন লোক ব্যতীত: একজন আনসার এবং একজন কুরাইশ। আবু জাফর বলেন: যখন তাদের মধ্যে কিছু লোক ব্যতীত সকলেই মুণ্ডন করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুণ্ডনকারীদেরকে চুল ছোটকারীদের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দিলেন, তখন এটা প্রমাণিত হলো যে, তারা যদি বাইতুল্লাহ পর্যন্ত পৌঁছতে পারতেন তবে যেমন তাদের জন্য মুণ্ডন বা চুল ছোট করার বিধান প্রযোজ্য হতো, তেমনই এক্ষেত্রেও প্রযোজ্য হয়েছে। যদি তা না হতো, তবে তারা সকলেই সমান হতেন এবং তাদের মধ্যে কারো উপর কারো কোনো শ্রেষ্ঠত্ব থাকত না। অতএব, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুণ্ডনকারীদেরকে চুল ছোটকারীদের উপর যে শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন, তাতে এই প্রমাণ পাওয়া যায় যে, তারা (ইহসার অবস্থায়ও) এমন ব্যক্তির মতোই ছিলেন যিনি ইহসারপ্রাপ্ত (বাধাপ্রাপ্ত) নন। আমরা যা উল্লেখ করলাম, তার দ্বারা প্রমাণিত হলো যে, ইহসার (বাধা) মুণ্ডন বা চুল ছোট করার বিধানকে রহিত করে না।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف كسابقه.
حدثنا يونس بن عبد الأعلى، قال: ثنا سفيان بن عيينة، قال: حدثني إبراهيم بن عقبة، عن كريب، عن ابن عباس: أن امرأة سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن صبي هل لهذا من حج؟ قال: "نعم، ولك أجر" .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি শিশু সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন: এর কি হজ্জ হবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, এবং তোমার জন্য প্রতিদান (সওয়াব) রয়েছে।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا يونس، قال: أنا ابن وهب، أن مالكا حدثه، عن إبراهيم بن عقبة … فذكر بإسناده مثله .
ইউনুস আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইবনু ওয়াহব আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, যে মালিক তাঁর কাছে বর্ণনা করেছেন ইব্রাহীম ইব্ন উক্বা থেকে... অতঃপর তিনি তাঁর ইসনাদের মাধ্যমে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا حجاج، قال ثنا عبد العزيز بن عبد الله الماجشون، عن إبراهيم بن عقبة … فذكر بإسناده مثله . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى أن الصبي إذا حج قبل بلوغه أجزأه ذلك من حجة الإسلام، ولم يكن عليه أن يحج بعد ذلك بعد بلوغه، واحتجوا في ذلك بهذا الحديث. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: لا يجزئه من حجة الإسلام، وعليه بعد بلوغه حجة أخرى. وكان من الحجة لهم عندنا على أهل المقالة الأولى أن هذا الحديث إنما فيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبر أن للصبي حجا، وهذا مما قد أجمع الناس جميعا عليه، ولم يختلفوا أن للصبي حجا كما أن له صلاة وليست تلك الصلاة بفريضة عليه. فكذلك أيضا قد يجوز أن يكون له حج، وليس ذلك الحج بفريضة عليه، وإنما هذا الحديث حجة على من زعم أنه لا حج للصبي. فأما من يقول: إن له حجا وإنه غير فريضة فلم يخالف شيئا من هذا الحديث، وإنما خالف تأويل مخالفيه خاصة. وهذا ابن عباس رضي الله عنهما هو الذي روى هذا الحديث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قد صرف هو حج الصبي إلى غير الفريضة، وأنَّه لا يجزئه بعد بلوغه من حجة الإسلام.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু জা’ফর (রহ.) বলেছেন: একদল লোক এই মত পোষণ করেন যে, অপ্রাপ্তবয়স্ক বালক যদি বালেগ হওয়ার আগে হজ করে, তবে তা তার জন্য হজ্জুল ইসলামের পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে। বালেগ হওয়ার পর তার ওপর আর হজ করা আবশ্যক হবে না। তারা এই হাদিস দিয়ে প্রমাণ পেশ করেন।
অন্যান্যরা এই বিষয়ে তাদের বিরোধিতা করে বলেছেন: তা তার জন্য হজ্জুল ইসলামের পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে না, বরং বালেগ হওয়ার পর তার ওপর অন্য হজ (আবার) আবশ্যক হবে।
প্রথমোক্ত মতের অনুসারীদের বিপরীতে আমাদের নিকট তাদের (বিরোধিতাকারীদের) যুক্তি হলো এই যে, এই হাদিসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুধু এই সংবাদ দিয়েছেন যে, বালকের জন্য হজ রয়েছে। এই বিষয়ে সকলের ঐকমত্য রয়েছে এবং এতে কোনো মতভেদ নেই যে, বালকের জন্য সালাত (নামাজ) থাকার মতোই হজ রয়েছে। তবে সেই সালাত যেমন তার ওপর ফরয নয়। তেমনিভাবে এটাও জায়েয যে, তার জন্য হজ থাকতে পারে, কিন্তু সেই হজ তার ওপর ফরয নয়। বস্তুত এই হাদিস কেবল তাদের বিরুদ্ধে প্রমাণ যারা মনে করে যে, বালকের জন্য কোনো হজই নেই।
কিন্তু যারা বলেন যে, বালকের জন্য হজ আছে তবে তা ফরয নয়, তারা এই হাদিসের কোনো কিছুর বিরোধিতা করেননি। বরং তারা কেবল তাদের বিরোধিতাকারীদের ব্যাখ্যারই বিরোধিতা করেছেন। আর এই ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি এই হাদিসটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনিই বালকের হজকে ফরয নয় এমন দিকে ফিরিয়ে দিয়েছেন এবং বলেছেন যে, বালেগ হওয়ার পর হজ্জুল ইসলামের পক্ষ থেকে এটি তার জন্য যথেষ্ট হবে না।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا عبد الله بن رجاء، قال: ثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي السفر، قال: سمعت ابن عباس يقول: يا أيها الناس أسمعوني ما تقولون، ولا تخرجوا تقولون: قال ابن عباس أيما غلام حج به أهله فمات، فقد قضى حجة الإسلام، فإن أدرك فعليه الحج، وأيما عبد حج به أهله فمات، فقد قضى حجة الإسلام، فإن أعتق فعليه الحج .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে লোকসকল! তোমরা কী বলছো তা আমাকে শুনতে দাও, এবং তোমরা বাইরে গিয়ে এমন কথা প্রচার করো না যে ইবনু আব্বাস বলেছেন: যে কোনো বালককে যদি তার পরিবার হজ করিয়ে দেয় এবং সে এরপর মারা যায়, তবে তার ইসলামের ফরজ হজ সম্পন্ন হয়ে গেল। আর যদি সে (বালক) সাবালক হয়, তবে তার ওপর (আবার) হজ করা ফরয। আর যে কোনো দাসকে যদি তার পরিবার হজ করিয়ে দেয় এবং সে এরপর মারা যায়, তবে তার ইসলামের ফরজ হজ সম্পন্ন হয়ে গেল। আর যদি সে মুক্ত হয়, তবে তার ওপর (আবার) হজ করা ফরয।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد، قال: ثنا حجاج، قال: ثنا حماد عن يونس بن عبيد، عن عبيد صاحب الحلي، قال: سألت ابن عباس عن المملوك إذا حج ثم عتق بعد ذلك؟ قال: عليه الحج أيضا، وعن الصبي يحج ثم يحتلم، قال: يحج أيضا . وقد زعمتم أن من روى حديثا فهو أعلم بتأويله، فهذا ابن عباس رضي الله عنهما قد روى عن النبي صلى الله عليه وسلم ما قد ذكرنا في أول هذا الباب ثم قال هو، ما قد ذكرنا. فيجب على أصلكم أن يكون ذلك دليلا على معنى ما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم من ذلك. فإن قال قائل: فما الذي دلّك على أن ذلك الحج لا يجزئه من حجة الإسلام؟ قلت قول رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رفع القلم عن ثلاثة: عن الصغير حتى يكبر"، وقد ذكرت ذلك بأسانيده في غير هذا الموضع من هذا الكتاب. فلما ثبت أن القلم عن الصبي مرفوع، ثبت أن الحج عليه غير مكتوب. وقد أجمعوا أن صبيا لو دخل في وقت صلاة فصلاها، ثم بلغ بعد ذلك في وقتها أن عليه أن يعيدها، وهو في حكم من لم يصلها. فلما ثبت ذلك من اتفاقهم ثبت أن الحج كذلك، وأنَّه إذا بلغ وقد حج قبل ذلك أنه في حكم من لم يحج، وعليه أن يحج بعد ذلك. فإن قال قائل: فقد رأينا في الحج حكما يخالف حكم الصلاة، وذلك أن الله عز وجل إنما أوجب الحج على من وجد إليه سبيلا، ولم يوجبه على غيره. فكان من لم يجد سبيلا إلى الحج، فلا حج عليه كالصبي الذي لم يبلغ. ثم قد أجمعوا أن من لم يجد سبيلا إلى الحج، فحمل على نفسه ومشى حتى حج أن ذلك يجزئه، وإن وجد سبيلا بعد ذلك لم يجب عليه أن يحج ثانية للحجة التي قد كان حجها قبل وجوده السبيل. فكان النظر على ذلك أن يكون كذلك الصبي إذا حج قبل البلوغ، ففعل ما لم يجب عليه أجزاه ذلك، ولم يجب عليه أن يحج ثانية بعد البلوغ. قيل له: إن الذي لا يجد السبيل إنما سقط الفرض عنه لعدم الوصول إلى البيت، فإذا مشى فصار إلى البيت، فقد بلغ البيت، وصار من الواجدين للسبيل، فوجب الحج عليه لذلك، فلذلك قلنا: إنه أجزأه حجة؛ لأنَّه صار بعد بلوغه البيت كمن كان منزله هنالك فعليه الحج. وأما الصبي ففرض الحج غير واجب عليه قبل وصوله إلى البيت، وبعد وصوله إليه لرفع القلم عنه فإذا بلغ بعد ذلك فحينئذ وجب عليه فرض الحج. فلذلك قلنا: إن ما قد كان حجة قبل بلوغه، لا يجزئه، وأن عليه أن يستأنف الحج بعد بلوغه كمن لم يكن حج قبل ذلك. فهذا هو النظر في هذا، وهذا قول أبي حنيفة، وأبي يوسف، ومحمد، رحمهم الله تعالى.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উবাইদ সাহিব আল-হুল্লি জিজ্ঞাসা করলেন সেই গোলাম সম্পর্কে, যে হজ্ব করেছে এবং এরপর স্বাধীন হয়েছে? তিনি বললেন: তার উপর পুনরায় হজ্ব ফরয। এবং সেই ছোট শিশু সম্পর্কে, যে হজ্ব করেছে এবং পরে প্রাপ্তবয়স্ক হয়েছে? তিনি বললেন: তার উপরও পুনরায় হজ্ব ফরয।
আপনারা তো দাবি করেন যে, যিনি হাদীস বর্ণনা করেন, তিনিই এর ব্যাখ্যা (তা’বীল) সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত। দেখুন, এই ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই অধ্যায়ের শুরুতে যা উল্লেখ করেছি, তা বর্ণনা করেছেন এবং এরপর তিনি নিজেই এই অভিমত দিয়েছেন, যা আমরা উল্লেখ করলাম। সুতরাং, আপনাদের মূলনীতি অনুযায়ী, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত ঐ বর্ণনার অর্থের উপর এটি একটি প্রমাণ হওয়া উচিত।
যদি কেউ বলে: কোন্ বিষয়টি আপনাকে প্রমাণ দেয় যে, সেই হজ্ব হজ্বুল ইসলামের জন্য যথেষ্ট নয়? আমি বলব, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: "তিন ব্যক্তি থেকে কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে: অপ্রাপ্তবয়স্ক থেকে যতক্ষণ না সে বড় হয়।" আমি এই কিতাবের অন্য জায়গায় এর সনদসহ (বর্ণনাসূত্রসহ) তা উল্লেখ করেছি। যখন এটা প্রমাণিত হলো যে, শিশুর উপর থেকে কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে, তখন প্রমাণিত হলো যে, তার উপর হজ্ব ফরয (অবশ্যপালনীয়) নয়।
তারা এ বিষয়ে একমত যে, যদি কোনো শিশু সালাতের সময় শুরু হলে সালাত আদায় করে, আর এরপর ঐ সময়ের মধ্যেই সে প্রাপ্তবয়স্ক হয়, তবে তাকে তা পুনরায় আদায় করতে হবে এবং সে এমন ব্যক্তির হুকুমে (বিধানে) থাকে যে যেন সালাত আদায় করেনি। যখন তাদের এই ঐকমত্য প্রমাণিত হলো, তখন প্রমাণিত হলো যে, হজ্বের ক্ষেত্রেও বিষয়টি একই। আর যদি সে প্রাপ্তবয়স্ক হয়, অথচ সে তার আগে হজ্ব করেছিল, তবে সে এমন ব্যক্তির বিধানে থাকে যে যেন হজ্ব করেনি, এবং তাকে এরপর পুনরায় হজ্ব করতে হবে।
যদি কেউ বলে: আমরা হজ্বের ক্ষেত্রে এমন একটি বিধান দেখি যা সালাতের বিধান থেকে ভিন্ন। আর তা হলো এই যে, আল্লাহ তা‘আলা হজ্বকে শুধু তাদের উপরই ফরয করেছেন যারা এর জন্য পথ (সামর্থ্য) খুঁজে পেয়েছে এবং অন্যদের উপর ফরয করেননি। তাই যে ব্যক্তি হজ্বের পথ খুঁজে পেল না, তার উপর হজ্ব নেই, ঠিক যেমন অপ্রাপ্তবয়স্ক শিশুর উপর নেই। অথচ তারা এ বিষয়ে একমত যে, যে ব্যক্তি হজ্বের পথ খুঁজে পায়নি, কিন্তু সে কষ্ট স্বীকার করে হেঁটে হজ্ব আদায় করল, তবে তা তার জন্য যথেষ্ট হবে। এরপর যদি সে সামর্থ্য লাভও করে, তবে তাকে দ্বিতীয়বার হজ্ব করতে হবে না, কারণ সামর্থ্য লাভের আগেই সে হজ্ব আদায় করে ফেলেছিল। এই যুক্তির ভিত্তিতে, প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার আগে কোনো শিশু যদি হজ্ব করে, তবে সে এমন কাজ করল যা তার উপর ফরয ছিল না, আর এটাই তার জন্য যথেষ্ট হওয়া উচিত এবং প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার পর তার উপর দ্বিতীয়বার হজ্ব করা ফরয হওয়া উচিত নয়।
তাকে বলা হবে: যার সামর্থ্য নেই, তার উপর থেকে ফরয উঠে যায় কেবল বাইতুল্লাহ পর্যন্ত পৌঁছাতে না পারার কারণে। কিন্তু যখন সে হেঁটে বাইতুল্লাহতে পৌঁছে যায়, তখন সে বাইতুল্লাহতে পৌঁছে গেল এবং সে সামর্থ্যবানদের অন্তর্ভুক্ত হলো। তাই সেই কারণে তার উপর হজ্ব ফরয হলো। এজন্য আমরা বলি যে, সেই একটি হজ্বই তার জন্য যথেষ্ট; কারণ বাইতুল্লাহতে পৌঁছার পর সে এমন ব্যক্তির মতো হয়ে গেল যার বাসস্থান সেখানেই, আর তার উপর হজ্ব ফরয। কিন্তু শিশুর ক্ষেত্রে, কলম উঠিয়ে নেওয়ার কারণে বাইতুল্লাহতে পৌঁছার আগে বা পৌঁছার পরেও তার উপর হজ্বের ফরয ওয়াজিব হয় না। এরপর যখন সে প্রাপ্তবয়স্ক হয়, তখন তার উপর হজ্বের ফরয ওয়াজিব হয়। এজন্য আমরা বলি যে, প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার আগে সে যে হজ্ব করেছে, তা তার জন্য যথেষ্ট নয় এবং এরপর প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার পর তাকে নতুন করে হজ্ব শুরু করতে হবে, যেমনটি সে করেনি। এই হলো এই বিষয়ে আমাদের বিশ্লেষণ। আর এটাই ইমাম আবু হানিফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মদ (রহিমাহুমুল্লাহ) এর অভিমত।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده فيه عبيد صاحب الحلي لم أقف عليه بهذه النسبة، وبقية رجاله ثقات.
حدثنا علي بن معبد قال: ثنا معلى بن منصور (ح) وحدثنا علي بن عبد الرحمن، قال: ثنا علي بن حكيم الأودي (ح) وحدثنا فهد، قال: ثنا محمد بن سعيد، قالوا: ثنا شريك، عن عمار الدهني، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله رضي الله عنهما، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل مكة يوم الفتح وعلى رأسه عمامة سوداء .
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন মক্কায় প্রবেশ করলেন, যখন তাঁর মাথার উপর ছিল কালো পাগড়ি।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : حديث صحيح وإسناده ضعيف، شريك بن عبد الله النخعي سيء الحفظ.
حدثنا فهد، قال: ثنا أبو نعيم، (ح) وحدثنا أبو بكرة، قال: ثنا أبو داود، قالا: ثنا حماد بن سلمة، عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم … مثله .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : رجاله ثقات إلا أن أبا الزبير لم يصرح بسماعه عن جابر.
حدثنا يونس، قال: ثنا ابن وهب، أن مالكا حدثه (ح). وحدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو الوليد، قال ثنا مالك بن أنس، عن الزهري، عن أنس رضي الله عنه، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل مكة وعلى رأسه مِغْفَر، فلما كشف المِغْفر عن رأسه، قيل له: إن ابن خطل متعلق بأستار الكعبة، فقال: "اقتلوه" . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى أنه لا بأس بدخول الحرم بغير إحرام، واحتجوا في ذلك بهذه الآثار. وخالفهم في ذلك آخرون ، فقالوا: لا يصلح لأحد كان منزله من وراء الميقات إلى الأمصار أن يدخل مكة إلا بإحرام. واختلف هؤلاء، فقال بعضهم : وكذلك الناس جميعا، من كان بعد الميقات وقبل الميقات غير أهل مكة خاصة. وقال آخرون : من كان منزله في بعض المواقيت أو فيما بعدها إلى مكة، فله أن يدخل مكة بغير إحرام. ومن كان منزله قبل المواقيت لم يدخل مكة إلا بإحرام، وممن قال هذا القول أبو حنيفة، وأبو يوسف، ومحمد رحمهم الله. وقال آخرون : أهل المواقيت حكمهم حكم مَنْ كان قبل المواقيت، وجعل أبو حنيفة، وأبو يوسف، ومحمد رحمهم الله حكم أهل المواقيت كحكم مَنْ كان من ورائهم إلى مكة. وليس النظر في هذا عندنا ما قالوا، لأنا رأينا من يريد الإحرام إذا جاوز المواقيت حلالا حين فرغ من حجته، ولم يرجع إلى المواقيت كان عليه دم. ومن أحرم من المواقيت كان محسنا، وكذلك من أحرم قبلها كان كذلك أيضا. فلما كان الإحرام من المواقيت في حكم الإحرام مما قبلها، لا في حكم الإحرام مما بعدها ثبت أن حكم المواقيت كحكم ما قبلها، لا كحكم ما بعدها. فلا يجوز لأهلها من دخول الحرم إلا ما يجوز لأهل الأمصار التي قبل المواقيت. فانتفى بهذا ما قال أبو حنيفة وأبو يوسف ومحمد رحمهم الله في حكم أهل المواقيت. واحتجنا إلى النظر في الأخبار هل فيها ما يدفع دخول الحرم بغير إحرام؟ وهل فيها ما ينبئ عن معنى في هذين الحديثين المتقدمين يجب بذلك المعنى أن ذلك الدخول الذي كان من النبي صلى الله عليه وسلم بغير إحرام خاصة له؟ فاعتبرنا في ذلك
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন তাঁর মাথায় একটি শিরস্ত্রাণ (যুদ্ধটোপ) ছিল। যখন তিনি তাঁর মাথা থেকে শিরস্ত্রাণটি খুললেন, তখন তাঁকে বলা হলো: "ইবনু খাতাল (Ibn Khatal) কা’বার গিলাফ ধরে আছে।" তিনি বললেন: "তোমরা তাকে হত্যা কর।"
আবু জাফর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: একদল লোক এই মত পোষণ করেন যে, ইহরাম ছাড়া হারামে (মক্কার পবিত্র সীমানায়) প্রবেশ করায় কোনো অসুবিধা নেই। তারা এর সমর্থনে এই বর্ণনাগুলি দ্বারা প্রমাণ দেন। অন্য আরেকদল লোক তাদের বিরোধিতা করে বলেন: যারা মীকাতের বাহিরের জনপদসমূহের বাসিন্দা, তাদের কারো জন্য ইহরাম ছাড়া মক্কায় প্রবেশ করা বৈধ নয়। এই মত পোষণকারীরাও মতভেদ করেন। তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলেন: মক্কাবাসী ব্যতীত মীকাতের পরে এবং মীকাতের আগে অবস্থানকারী সকল মানুষের জন্য একই হুকুম। অন্য আরেকদল বলেন: যার বাসস্থান কিছু মীকাতের মধ্যে বা মীকাত থেকে মক্কার দিকে অবস্থিত, তার জন্য ইহরাম ছাড়া মক্কায় প্রবেশ করা বৈধ। আর যার বাসস্থান মীকাতের আগে অবস্থিত, সে ইহরাম ছাড়া মক্কায় প্রবেশ করতে পারবে না। এই মত পোষণকারীদের মধ্যে রয়েছেন আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের প্রতি রহম করুন)। অন্য আরেকদল বলেন: মীকাতবাসীদের হুকুম মীকাতের আগের বাসিন্দাদের হুকুমের অনুরূপ। অথচ আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের প্রতি রহম করুন) মীকাতবাসীদের হুকুমকে মীকাতের পিছনের (মক্কার দিকে থাকা) বাসিন্দাদের হুকুমের অনুরূপ মনে করেছেন। কিন্তু আমাদের মতে, এই বিষয়ে তাদের বক্তব্য সঠিক নয়। কারণ আমরা দেখেছি যে, যে ব্যক্তি ইহরাম করতে চায় সে যদি তার হজ শেষ করার পর হালাল অবস্থায় মীকাত অতিক্রম করে, এবং সে মীকাতের দিকে ফিরে না আসে, তবে তার উপর দম (পশু কোরবানী) ওয়াজিব হয়। আর যে ব্যক্তি মীকাত থেকে ইহরাম করে, সে উত্তম কাজ করে। একইভাবে, যে ব্যক্তি মীকাতের আগে ইহরাম করে, সেও অনুরূপ উত্তম কাজ করে।
যেহেতু মীকাত থেকে ইহরাম করা মীকাতের আগের স্থান থেকে ইহরাম করার হুকুমের অন্তর্ভুক্ত, মীকাতের পরের স্থান (মক্কার ভেতরের দিকে) থেকে ইহরাম করার হুকুমের অন্তর্ভুক্ত নয়—অতএব এটা প্রমাণিত হয় যে, মীকাতসমূহের হুকুম তার আগের স্থানসমূহের হুকুমের অনুরূপ, পরের স্থানসমূহের হুকুমের অনুরূপ নয়। অতএব, মীকাতবাসীদের জন্য হারামে প্রবেশের অনুমতি ততটুকুই, যতটুকু মীকাতের আগের জনপদবাসীদের জন্য অনুমোদিত। ফলে মীকাতবাসীদের হুকুম সম্পর্কে আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের প্রতি রহম করুন)-এর মত খন্ডিত হলো। আমরা এখন এই বিষয়ে দৃষ্টি দিতে বাধ্য যে, এমন কোনো বর্ণনা আছে কি না যা ইহরাম ছাড়া হারামে প্রবেশকে নিষেধ করে? এবং এমন কোনো বর্ণনা আছে কি না যা এই দুটি পূর্বোক্ত হাদীসের এমন কোনো অর্থ নির্দেশ করে, যার দ্বারা আবশ্যক হয় যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ইহরাম ছাড়া প্রবেশ কেবল তাঁর জন্য খাস ছিল? তাই আমরা সেই বিষয়ে বিবেচনা শুরু করলাম।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
فإذا ابن أبي داود قد حدثنا، قال: ثنا عمرو بن عون، قال: ثنا أبو يوسف يعقوب بن إبراهيم، عن يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن ابن عباس أنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن الله عز وجل حرم مكة يوم خلق السموات والأرض، والشمس والقمر، ووضعها بين هذين الأخشبين، لم تحل لأحد قبلي، ولم تحل لي إلا ساعة من نهار، لا يُختلى خلاها، ولا يُعضد شجرها، ولا يُرفع لقطتها إلا منشد"، فقال العباس رضي الله عنه: إلا الإذخر فإنه لا غنى لأهل مكة عنه لبيوتهم وقبورهم؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إلا الإذخر" .
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্ তা’আলা মক্কাকে হারাম (পবিত্র ও সুরক্ষিত) করেছেন যেদিন তিনি আসমানসমূহ ও জমিন, সূর্য ও চন্দ্র সৃষ্টি করেছেন। এবং তিনি (মক্কাকে) এই দুটি আখশাবাইনের (পাহাড়ের) মাঝে স্থাপন করেছেন। আমার পূর্বে কারো জন্য তা বৈধ করা হয়নি, আর আমার জন্যও দিনের মাত্র এক মুহূর্তের জন্য বৈধ করা হয়েছিল। এর তাজা ঘাস কাটা হবে না, এর গাছ কাটা হবে না, আর এর পড়ে থাকা জিনিস (লুকতা) তুলে নেওয়া হবে না, কেবল ঘোষক ব্যতীত।" তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইযখির (এক প্রকার ঘাস) ব্যতীত, কারণ মক্কার অধিবাসীরা তাদের ঘর ও কবরের জন্য এর থেকে অমুখাপেক্ষী হতে পারে না? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইযখির ব্যতীত।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد الهاشمي.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال ثنا مسدد، قال: ثنا يحيى، عن ابن أبي ذئب، قال: حدثني سعيد المقبري، قال: سمعت أبا شريح الكعبي، يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن الله عز وجل حرّم مكة ولم يحرمها الناس، فمن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يسفكن فيها دما، ولا يعضدن فيها شجرا، فإن ترخص مترخص فقال: قد أحلت لرسول الله صلى الله عليه وسلم فإن الله عز وجل أحلها لي ولم يحلها للناس، وإنما أحلها لي ساعة" .
আবূ শুরাইহ আল-কা’বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা’আলাই মক্কাকে হারাম (পবিত্র) করেছেন, মানুষ তা হারাম করেনি। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহ ও আখিরাতের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন সেখানে রক্তপাত না করে এবং সেখানকার কোনো গাছ না কাটে। যদি কেউ অনুমতি গ্রহণ করতে চায় এবং বলে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য তা হালাল করা হয়েছিল, তবে (সে যেন জানে) আল্লাহ তা’আলা এটিকে কেবল আমার জন্য হালাল করেছিলেন, মানুষের জন্য হালাল করেননি। আর এটি আমার জন্য কেবল এক মুহূর্তের জন্যই হালাল করা হয়েছিল।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا فهد، قال: ثنا يوسف بن بهلول، قال ثنا عبد الله بن إدريس، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي شريح الخزاعي، قال: لما بعث عمرو بن سعيد البعث إلى مكة لغزو ابن الزبير أتاه أبو شريح فكلمه بما سمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم خرج إلى نادي قومه، فجلس، فقمت إليه، فجلست معه، قال: فحدث عما حدث عمرو عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وعما جاوبه به عمرو. قال: قلت له: إنا كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين افتتح مكة، فلما كان الغد من يوم الفتح، خَطَبنا فقال: يا أيها الناس إن الله عز وجل حرّم مكة يوم خلق السموات والأرض، فهي حرام من حرام الله إلى يوم القيامة، لا تحل لرجل يؤمن بالله، واليوم الآخر أن يسفك فيها دما، ولا يعضد بها شجرا، لم تحل لأحد كان قبلي، ولا تحل لأحد بعدي، ولم تحل لي إلا هذه الساعة غضبا على أهلها، ألا ثم قد عادت كحرمتها بالأمس، فمن قال لكم: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أحلها فقولوا له: إن الله عز وجل قد أحلها لرسوله، ولم يحلها لك. فقال لي: انصرف أيها الشيخ، فنحن أعرف بحرمتها منك، إنها لا تمنع سافك دم ولا مانع خربة، ولا خالع طاعة. قلت: قد كنت شاهدا وكنت غائبا وقد أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يبلغ شاهدنا غائبنا، وقد أبلغتك . 3886 م - حدثنا بحر هو ابن نصر، عن شعيب بن الليث، عن أبيه، عن سعيد المقبري، عن أبي شريح الخزاعي، عن النبي صلى الله عليه وسلم … نحوه .
আবু শুরাইহ খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আমর ইবনে সাঈদ ইবনে যুবাইরকে আক্রমণ করার জন্য মক্কায় একদল সৈন্য প্রেরণ করলেন, তখন আবু শুরাইহ তাঁর কাছে এলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শোনা কথা বলে তাকে সতর্ক করলেন। তারপর তিনি তাঁর গোত্রের মজলিশের দিকে গেলেন এবং বসলেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং তাঁর সাথে বসলাম। তিনি (আবু শুরাইহ) আমর ইবনে সাঈদকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে যা বর্ণনা করেছেন এবং আমর তাঁকে কী জবাব দিয়েছেন, সে সম্পর্কে বললেন।
আমি (আবু শুরাইহ) তাকে বললাম: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয় করলেন, তখন আমরা তাঁর সাথে ছিলাম। বিজয়ের পরের দিন তিনি আমাদের উদ্দেশে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! আল্লাহ তা’আলা যেদিন আসমান ও যমীন সৃষ্টি করেছেন, সেদিন থেকেই মক্কাকে হারাম (পবিত্র) করেছেন। সুতরাং কিয়ামত পর্যন্ত তা আল্লাহর হারামের মর্যাদা পাবে। কোনো লোকের জন্য—যে আল্লাহ ও আখেরাতে বিশ্বাস করে—এতে রক্তপাত করা অথবা এর কোনো বৃক্ষ কাটা বৈধ নয়। এটি আমার পূর্বে কারও জন্য বৈধ করা হয়নি, আমার পরেও কারও জন্য বৈধ করা হবে না। এর অধিবাসীদের প্রতি ক্রুদ্ধ হয়ে শুধুমাত্র এই এক ঘণ্টা সময়ের জন্য এটি আমার জন্য হালাল করা হয়েছিল। শোনো! এরপর এটি পূর্বের মতোই হারামের মর্যাদায় ফিরে এসেছে। সুতরাং যদি কেউ তোমাদের বলে যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কাকে হালাল করে দিয়েছেন, তাহলে তোমরা তাকে বলো: আল্লাহ তা’আলা এটিকে তাঁর রাসূলের জন্য হালাল করেছিলেন, তোমাদের জন্য হালাল করেননি।"
তখন সে (আমর ইবনে সাঈদ) আমাকে বলল: হে বৃদ্ধ! ফিরে যান। আমরা আপনার চেয়ে এর পবিত্রতা সম্পর্কে বেশি জানি। এটি রক্তপাতকারীকে অথবা বিপর্যয় সৃষ্টিকারী বা আনুগত্য ত্যাগকারীকে বাধা দেয় না।
আমি (আবু শুরাইহ) বললাম: আপনি সাক্ষী ছিলেন না (ঘটনার সময় উপস্থিত ছিলেন না), আর আমি সাক্ষী ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের আদেশ দিয়েছেন যে উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তিকে (এই বাণী) পৌঁছে দেয়। আর আমি আপনাকে তা পৌঁছে দিয়েছি।
(৩)- হাদীসের অন্য একটি সূত্রে বাহর ইবন নাসর শুআইব ইবনুল লাইস থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি সাঈদ আল-মাকবুরি থেকে, তিনি আবূ শুরাইহ খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে—এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا علي بن عبد الرحمن، قال: ثنا ابن أبي مريم، قال: أنا ابن الدراوردي، قال: ثنا محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على الحجون، ثم قال: "والله إنك لخير أرض الله، وأحب أرض الله إلى الله، لم تحل لأحد كان قبلي، ولا تحل لأحد بعدي، وما أحلت لي إلا ساعة من النهار، وهي بعد ساعتها هذه حرام إلى يوم القيامة" .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজূন নামক স্থানে দাঁড়ালেন, অতঃপর বললেন: "আল্লাহর শপথ! নিশ্চয় তুমি আল্লাহর শ্রেষ্ঠতম ভূমি এবং আল্লাহর কাছে আল্লাহর প্রিয়তম ভূমি। আমার পূর্বে কারো জন্য তোমাকে হালাল করা হয়নি এবং আমার পরেও কারো জন্য তোমাকে হালাল করা হবে না। আমাকে শুধু দিনের সামান্য একটি মুহূর্তের জন্য তোমার [মধ্যে যুদ্ধ করা] হালাল করা হয়েছিল। আর এই মুহূর্তের পর থেকে কিয়ামত দিবস পর্যন্ত তুমি হারাম (নিষিদ্ধ) থাকবে।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا الحجاج بن المنهال، وأبو سلمة موسى بن إسماعيل التبوذكي، قالا: ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو … فذكر بإسناده مثله .
আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু খুযাইমাহ, তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আল-হাজ্জাজ ইবনুল মিনহাল এবং আবূ সালামাহ মূসা ইবনু ইসমাঈল আত-তাবূযাকী, তারা দু’জন বলেছেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ’আমর থেকে, ...অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة.
حدثنا محمد بن عبد الله بن ميمون، قال: ثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى، قال: ثنا أبو سلمة، قال: حدثني أبو هريرة رضي الله عنه قال: لما فتح الله عز وجل على رسوله عليه السلام مكة، قتلت هذيل رجلا من بني ليث بقتيل كان لهم في الجاهلية. فقام النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "إن الله عز وجل حبس عن أهل مكة الفيل، وسلط عليهم رسوله والمؤمنين، وإنها لم تحل لأحد كان قبلي، ولا تحل لأحد بعدي، وإنما أحلت لي ساعتين من نهار، وإنها ساعتي هذه حرام، لا يعضد شجرها، ولا يختلى شوكها، ولا تلتقط ساقطتها إلا لمنشد" .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আল্লাহ তাআলা তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য মক্কা বিজয় দান করলেন, তখন হুযাইল গোত্র বানী লায়স গোত্রের একজন লোককে হত্যা করলো, যা ছিল জাহিলিয়্যাতের (অন্ধকার যুগের) প্রতিশোধ। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা মক্কাবাসীদের থেকে হস্তীকে (আব্রাহার বাহিনীকে) নিবৃত্ত রেখেছিলেন এবং তাদের উপর তাঁর রাসূল ও মু’মিনগণকে ক্ষমতা দান করেছেন। নিশ্চয় এটি আমার পূর্বে কারো জন্য হালাল ছিল না, আর আমার পরেও কারো জন্য হালাল হবে না। আর এটি আমার জন্য দিনের কিছু সময়ের জন্য হালাল করা হয়েছিল। আর এই মুহূর্তে এটি হারাম। এর কোনো গাছ কাটা যাবে না, এর কোনো কাঁটা তোলা যাবে না এবং এর পড়ে থাকা জিনিসও কেউ উঠাবে না, ঘোষণা দানকারী (যিনি মালিককে খুঁজে দেবেন) ছাড়া।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.=
حدثنا أبو بكرة، قال: ثنا أبو داود، قال: ثنا حرب بن شداد، عن يحيى بن أبي كثير … فذكر بإسناده مثله غير أنه قال: "إن الله عز وجل حبس عن أهل مكة الفيل، قال: ولا يلتقط ضالتها إلا لمنشد" . فأخبر رسول الله صلى الله عليه وسلم في هذه الآثار أن مكة لم تحل لأحد كان قبله، ولا تحل لأحد بعده، وأنها إنما أحلّت له ساعة من نهار، ثم عادت حراما كما كانت إلى يوم القيامة، فدل ذلك أن النبي صلى الله عليه وسلم كان دخلها يوم دخلها. وهي له حلال، فكان له بذلك دخولها بغير إحرام، وهي بعد حرام، فلا يدخلها أحد إلا بإحرام. فإن قال قائل: إن معنى ما أحل للنبي صلى الله عليه وسلم منها هو شهر السلاح فيها للقتال، وسفك الدماء لا غير ذلك. قيل له: هذا محال إن كان الذي أبيح للنبي صلى الله عليه وسلم منها هو ما ذكرت خاصة إذا لم يقل "ولا تحل لأحد بعدي". وقد رأيناهم أجمعوا أن المشركين لو غلبوا على مكة فمنعوا المسلمين منها أنه حلال للمسلمين قتالهم، وشهر السلاح بها وسفك الدماء، وأن حكم من بعد النبي صلى الله عليه وسلم في ذلك في إباحتها في حكم النبي صلى الله عليه وسلم. فدل ذلك على أن المعنى الذي كان النبي صلى الله عليه وسلم خص به فيها، وأحلّت له من أجله ليس هو القتال. وإذا انتفى أن يكون هو القتال ثبت أنه الإحرام. ألا ترى إلى قول عمرو بن سعيد، لأبي شريح: إن الحرم لا يمنع سافك دم، ولا مانع خربة، ولا خالع طاعة جوابا لما حدثه به أبو شريح عن النبي صلى الله عليه وسلم، فلم ينكر ذلك عليه أبو شريح، ولم يقل له: إن النبي صلى الله عليه وسلم إنما أراد بما حدثتك عنه، أن الحرم قد يجير كل الناس ولكنه عرف ذلك، فلم ينكره. وهذا عبد الله بن عباس رضي الله عنهما، فقد روى ذلك عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال: من رأيه لا يدخل أحد الحرم إلا بإحرام، وسنذكر ذلك في موضعه إن شاء الله تعالى. فدل قوله هذا أن ما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم فيما أحلت له ليس هو على إظهار السلاح بها، وإنما هو على المعنى الآخر. لأنَّه لما انتفى هذا القول، ولم يكن غيره وغير القول الآخر، ثبت القول الآخر. ثم احتجنا بعد هذا إلى النظر في حكم من هم بعد المواقيت إلى مكة، هل لهم دخول الحرم بغير إحرام أم لا؟. فرأينا الرجل إذا أراد دخول الحرم لم يدخله إلا بإحرام، وسواء أراد دخول الحرم لإحرام، أو لحاجة غير الإحرام. ورأينا من أراد دخول المواضع التي بين المواقيت، وبين الحرم لحاجة أن له دخولها بغير إحرام. فثبت بذلك أن حكم هذه المواضع إذا كانت تُدخل للحوائج بغير إحرام كحكم ما قبل المواقيت، وأن أهلها لا يدخلون الحرم إلا كما يدخله من كان أهله وراء المواقيت إلى الآفاق. فهذا هو النظر عندي في هذا الباب، وهو خلاف قول أبي حنيفة، وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله تعالى. وذلك أنهم إنما قلدوا فيما ذهبوا إليه من هذا
আবু বকরাহ থেকে বর্ণিত... তিনি তাঁর সনদ দ্বারা এর অনুরূপ উল্লেখ করেছেন। তবে তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা মক্কাবাসীদের থেকে হাতিকে [হামলা করা থেকে] নিবৃত্ত করেছিলেন।" তিনি [নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম] আরও বলেছেন: "এর হারানো বস্তুকে কেবল ঘোষণা দানকারী ব্যতীত কেউ উঠাবে না।"
সুতরাং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই হাদীসসমূহের মাধ্যমে জানিয়ে দিয়েছেন যে, মক্কা তাঁর পূর্বেকার কারো জন্য বৈধ করা হয়নি, এবং তাঁর পরেও কারো জন্য বৈধ হবে না। আর এটি শুধুমাত্র দিনের এক মুহূর্তে তাঁর জন্য বৈধ করা হয়েছিল, তারপর তা কিয়ামত দিবস পর্যন্ত পূর্বের মতো হারামে (নিষিদ্ধে) ফিরে এসেছে। এই বিষয়টি প্রমাণ করে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেদিন মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন, সেদিন তা তাঁর জন্য হালাল ছিল। অতএব, ইহরাম ছাড়া তাঁর জন্য তাতে প্রবেশ করা বৈধ ছিল, কিন্তু এর পরে তা হারাম হয়ে যায়, তাই ইহরাম ছাড়া কেউ তাতে প্রবেশ করতে পারবে না।
যদি কেউ বলে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য মক্কার যে জিনিস হালাল করা হয়েছিল, তা হলো শুধুমাত্র লড়াইয়ের জন্য অস্ত্র ধারণ করা এবং রক্তপাত করা, অন্য কিছু নয়। তাকে বলা হবে: এটা অসম্ভব; যদি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য শুধু সেটাই বৈধ হতো যা আপনি উল্লেখ করেছেন, তবে তিনি "আর আমার পরে কারো জন্য হালাল হবে না"—এই কথাটি বলতেন না। আমরা তো দেখেছি যে, যদি মুশরিকরা মক্কার ওপর বিজয়ী হয় এবং মুসলমানদেরকে তা থেকে বাধা দেয়, তবে মুসলমানদের জন্য তাদের সাথে যুদ্ধ করা, অস্ত্র ধারণ করা এবং রক্তপাত করা হালাল—এ ব্যাপারে সকলে ঐকমত্য পোষণ করেছেন। আর এ বিষয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পরের লোকদের জন্য এর বৈধতা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের [ঐ সময়কার] হুকুমের মতোই। অতএব, এই বিষয়টি প্রমাণ করে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে সেখানে যে বিশেষ সুবিধা দেওয়া হয়েছিল এবং যার কারণে এটি তাঁর জন্য হালাল করা হয়েছিল, তা যুদ্ধ নয়। আর যখন প্রমাণিত হলো যে তা যুদ্ধ নয়, তখন প্রতিষ্ঠিত হলো যে তা হলো ইহরাম।
আপনি কি আমর ইবনু সাঈদের বক্তব্য দেখেননি, যখন তিনি আবূ শুরাইহকে বলেন: "হারাম (পবিত্র স্থান) রক্তপাতকারী, কোনো অপরাধে বাধা প্রদানকারী বা আনুগত্য ভঙ্গকারীকে বাধা দেয় না"—এটা ছিল আবূ শুরাইহ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পক্ষ থেকে যা বর্ণনা করেছিলেন তার জবাবে। আবূ শুরাইহ তার এই বক্তব্যকে প্রত্যাখ্যান করেননি এবং তাকে বলেননি যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাদীসের মাধ্যমে এই উদ্দেশ্য করেননি যে, হারাম সকল মানুষকে আশ্রয় দেবে; বরং তিনি তা জেনেছিলেন এবং অস্বীকার করেননি। আর এই যে আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে তা বর্ণনা করেছেন, অতঃপর তিনি তাঁর নিজস্ব অভিমত প্রকাশ করে বলেছেন: "কেউ যেন ইহরাম ছাড়া হারামে প্রবেশ না করে।" আমরা ইনশাআল্লাহ যথাযথ স্থানে তা উল্লেখ করব।
তাঁর এই বক্তব্য প্রমাণ করে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য যা হালাল করা হয়েছিল বলে বর্ণিত হয়েছে, তা সেখানে অস্ত্র প্রদর্শন করা নয়, বরং তা অন্য অর্থ বহন করে। কারণ, যখন এই বক্তব্যটি বাতিল হয়ে গেল, এবং এটি ও অন্য বক্তব্যটি ছাড়া আর কিছুই রইল না, তখন অন্য বক্তব্যটিই প্রতিষ্ঠিত হলো।
এরপর আমাদের এই বিষয়ে দৃষ্টি দিতে হবে যে, যারা মীকাতসমূহ থেকে মক্কার দিকে আছে, তারা কি ইহরাম ছাড়া হারামে প্রবেশ করতে পারবে, নাকি পারবে না? আমরা দেখলাম, কোনো ব্যক্তি যখন হারামে প্রবেশ করতে চায়, তখন সে ইহরাম ছাড়া প্রবেশ করতে পারে না, চাই সে ইহরামের উদ্দেশ্যে হারামে প্রবেশ করতে চাক বা অন্য কোনো প্রয়োজনে। আর আমরা দেখলাম, যে ব্যক্তি মীকাতসমূহ এবং হারামের মধ্যবর্তী স্থানগুলোতে কোনো প্রয়োজনে প্রবেশ করতে চায়, তার জন্য ইহরাম ছাড়া সেখানে প্রবেশ করা বৈধ। এর দ্বারা প্রমাণিত হলো যে, এই স্থানগুলোর বিধান হলো, যখন তা প্রয়োজন পূরণের জন্য ইহরাম ছাড়া প্রবেশ করা যায়, তখন এর বিধান মীকাতসমূহের পূর্বের স্থানগুলোর মতোই। আর সেখানকার অধিবাসীরা হারামে প্রবেশ করবে, যেভাবে মীকাতসমূহের ও তার বাইরের দিক থেকে আসা লোকেরা প্রবেশ করে। আমার দৃষ্টিতে এই অধ্যায়ের এটাই হলো পর্যবেক্ষণ, যা ইমাম আবূ হানিফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (তাঁদের সকলের প্রতি আল্লাহ রহম করুন) এর মতের বিরোধী। কারণ, তাঁরা এই বিষয়ে যে মত গ্রহণ করেছেন, তাতে তারা কেবল অনুসরণ করেছেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
ما حدثنا صالح بن عبد الرحمن، قال: ثنا سعيد بن منصور، قال: ثنا هشيم قال: أنا عبيد الله بن عمر، عن نافع عن ابن عمر: أنه خرج من مكة يريد المدينة، فلما بلغ قديدا بلغه عن جيش قدم المدينة، فرجع فدخل مكة بغير إحرام .
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মক্কা থেকে মদীনার উদ্দেশ্যে বের হলেন। যখন তিনি কুদাইদ পৌঁছলেন, তখন তার কাছে খবর পৌঁছল যে একটি সৈন্যদল মদীনায় প্রবেশ করেছে। অতঃপর তিনি ফিরে আসলেন এবং ইহরাম ছাড়া মক্কায় প্রবেশ করলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا حجاج، قال: ثنا حماد، قال: ثنا أيوب، عن نافع، أن ابن عمر رضي الله عنهما خرج من مكة وهو يريد المدينة، فلما كان قريبا لقيه جيش ابن دلجة، فرجع فدخل مكة حلالا .
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মক্কা থেকে মদীনার উদ্দেশ্যে বের হলেন। যখন তিনি (মক্কা থেকে) কাছাকাছি পৌঁছালেন, তখন ইবনু দুলজাহ-এর সেনাদলের সাথে তাঁর সাক্ষাৎ হলো। ফলে তিনি ফিরে এলেন এবং হালাল অবস্থায় মক্কায় প্রবেশ করলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا يونس، قال: أنا ابن وهب، أن مالكا حدثه، عن نافع، أن عبد الله بن عمر أقبل من مكة حتى إذا كان بقديد بلغه خبر من المدينة فرجع فدخل مكة حلالا . فقلدوا ذلك واتبعوه، وكان النظر في ذلك عندنا خلاف ما ذهبوا إليه. وقد روي عن غير ابن عمر رضي الله عنهما في ذلك ما يخالف هذا.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মক্কা থেকে আসছিলেন। যখন তিনি কুদাইদ নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন মদীনা থেকে তাঁর কাছে (কোনো) খবর পৌঁছাল। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন এবং হালাল অবস্থায় মক্কায় প্রবেশ করলেন। (পরবর্তী লোকেরা) তাঁর এই কাজটিকে গ্রহণ করল এবং অনুসরণ করল। কিন্তু আমাদের কাছে এই বিষয়ে যে বিবেচনা (বা শরীয়তের দৃষ্টিতে) ছিল, তা ছিল তাঁদের গৃহীত মতের বিপরীত। আর আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য সূত্রেও এ বিষয়ে এমন বর্ণনা এসেছে, যা এর বিরোধী।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.