الحديث


الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল





الجامع الكامل (3463)


3463 - عن عبد الله بن أبي مليكة قال: كنتُ إلى جنب ابن عمر، ونحن ننتظر جنازةَ أم أبان بنت عثمان، وعنده عمرو بن عثمان، فجاء ابن عباس يقودُه قائد، فأُراه أخبره بمكان ابن عمر، فجاء حتى جلس إلى جَنْبي، فكنت بينهما، فإذا صوت من الدار، فقال ابن عمر -كأنه يَعرِض على عمرو أن يقوم ينهاهم- سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الميت ليُعذب ببكاء أهله".

قال: فأرسلها عبد الله مرسلة.

فقال ابن عباس: كنا مع أمير المؤمنين عمر بن الخطاب، حتى إذا كنا بالبيداء، إذا هو برجل نازل في شجرة، فقال لي: اذهب فاعلم لي من ذاك الرجل، فذهبتُ فإذا هو صهيب فرجعت إليه، فقلت: إنك أمرتني أن أعلم لك من ذاك، وإنه صهيب، قال: مره فليلحق بنا، فقلت: إن معه أهله، قال: وإن كان معه أهله (وربما قال أيوب: مره فليلحق بنا)، فلما قدمنا لم يلبث أمير المؤمنين أن أصيب، فجاء صهيب يقول: وا أخاه! وا صاحباه! فقال عمر: ألم تعلم، أو لم تسمع (قال أيوب: أو قال: أو لم تعلم أو لم تسمع) أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت ليعذب ببعض بكاء أهله".

قال: فأما عبد الله فأرسلها مرسلة، وأما عمر فقال: ببعض.

فقمتُ فدخلت على عائشة، فحدثتُها بما قال ابن عمر، فقالت: لا، والله! ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم قط"إنَّ الميت يعذَّب ببكاء أحد"، ولكنه قال:"إن الكافر يزيده الله ببكاء أهله عذابًا، وإن الله لهو أضحك وأبكى، ولا تزرُ وازرَةٌ وزر أخرى".

قال أيوب: قال ابن أبي مليكة: حدثني القاسم بن محمد قال: لما بلغ عائشة قول عمر وابن عمر قالت: إنكم لتحدثوني عن غير كاذِبين ولا مُكذَّبين. ولكن السمع يُخطئُ.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (928) عن داود بن رُشيد، حدثنا إسماعيل ابن عُلية، حدثنا أيوب، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره.

قوله: فأرسله عبد الله مرسلة -معناه أن ابن عمر أطلق في روايته تعذيب الميت ببكاء الحي، ولم يُقيد بيهودي، كما قيدتُه عائشة، ولا بوصية كما قيده آخرون، ولا قال ببعض بكاء أهله كما رواه أبوه عمر بن الخطاب.

لقد ثبت بأَسانيد صحيحة عن عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله، والمغيرة بن شعبة، وعمران بن
حصين، وغيرهم أن الميت يعذب ببكاء أهله، وهل هذه الأحاديث الصّحيحة مخالفة لقوله تعالى: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} كما فهمت عائشة رضي الله عنها، وخصصت بأن ذلك كان لأجل عذاب اليهود، والأظهر أن تخطيئة هؤلاء الصحابة جميعًا لا يصح، لأنهم هكذا سمعوا من النبي صلى الله عليه وسلم ورواه عنهم الثقات الضابطون، لا مطعن في صدقهم وحفظهم. لذا يجب تفسير هذه الأحاديث وتأويلها حيث لا تخالف الآية الكريمة.

ومن هذه التأويلات: إن الناس في الجاهلية، كانوا يتفاخرون بالنياحة عليه عند موتهم، فكانوا يوصون بذلك نساءهم وزوجاتهم، فلما حرِّمت النياحةُ وجب عليهم أن يمنعوا من ذلك، فلما لم يمنعوا، وقد نيح عليهم حسب العادات الجاهلية فكان ذلك سببًا لعذابهم، فمن تفطن لذلك منع منها مثل عمر بن الخطاب - ومن لم يتفطن ولم يمنع، وقد نيح عليه عُذِّب.

قال الخطابي رحمه الله: قد يحتمل أن يكون الأمر في هذا على ما ذهبت إليه عائشة لأنها قد روت (أن ذلك إنما كان في شأن يهودي) والخبر المفسر أولى من المجمل ثم احتجت بالآية، وقد يحتمل أن يكون ما رواه ابن عمر صحيحًا من غير أن يكون فيه خلاف الآية، وذلك أنهم كانوا يوصون أهليهم بالبكاء والنوح عليهم، وكان ذلك مشهورًا من مذاهبهم وهو موجود في أشعارهم كقول القائل وهو طرفة:

إذا مت فانعيني بما أنا أهله … وشقي عليّ الجيب يا ابنة معبد

وكقول لبيد:

فقوما فقولا بالذي تعلمانه … ولا تخمشا وجهًا ولا تحلفا الشعر

وقولا هو المرء الذي لا صديقه … أضاع ولا خان الأمين ولا غدر

إلى الحول ثم اسم السلام عليكما … ومن يبك حولًا كاملًا فقد اعتذر

ومثل هذا كثير في أشعارهم، وإذا كان كذلك فالميت إنما تلزمه العقوبة في ذلك بما تقدم من أمره إياهم بذلك وقت حياته، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سَنَّ سنة حسنة فله أجرها وأجر من عمل بها، ومن سَنَّ سنة سيئة فعليه وزرها ووزر من عمل بها"، وقولها (وهل ابن عمر) معناه: ذهب وهله إلى ذلك، يقال: وهل الرجل ووهم بمعنى واحد، كل ذلك بفتح الهاء، فإذا قلت وهل بكسر الهاء كان معناه فزع، وفيه وجه آخر ذهب إليه بعض أهل العلم، قال: وتأويله أنه مخصوص في بعض الأموات الذين وجب عليهم بذنوب اقترفوها، وجرى من قضاء الله سبحانه فيهم أن يكون عذابهم وقت البكاء عليهم، ويكون كقولهم مطرنا بنوء كذا، أي عند نوء كذا، كذلك قوله:"إن الميت يعذب ببكاء أهله" أي عند بكائهم عليه لاستحقاقه ذلك بذنبه، ويكون ذلك حالًا لا سببًا،
لأنا لو جعلناه سببًا لكان مخالفًا للقرآن وهو قوله: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164]، والله أعلم. انتهي.

وعلى هذا فحمل عائشة على عذاب اليهود أمر نسبي، فعذابهم لعدم إيمانهم بالله ورسوله، وعذاب المسلمين لعدم منعهم من النياحة بعد الموت.

وقد أطال الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن في الدفاع عن الأحاديث التي رواها عمر وابنه وغيرهما، وقال: ومحال أن يكون هؤلاء كلهم وهموا في الحديث، ثم أجاب عن شبهة عائشة مثل إجابة الخطابي وزاد عليه.




অনুবাদঃ আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশে ছিলাম। আমরা উম্মে আবান বিনত উসমানের জানাযার জন্য অপেক্ষা করছিলাম। তাঁর (ইবনু উমারের) কাছে আমর ইবনু উসমান উপস্থিত ছিলেন। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, তাঁর হাত ধরে একজন পথপ্রদর্শক তাঁকে নিয়ে আসছিলেন। আমার মনে হয়, সে ব্যক্তি তাঁকে ইবনু উমারের স্থান সম্পর্কে জানিয়েছিল। অতঃপর তিনি এসে আমার পাশে বসলেন, ফলে আমি ছিলাম তাঁদের দুজনের মাঝে। হঠাৎ ঘর থেকে একটি কান্নার আওয়াজ এল। তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন—যেন তিনি আমর ইবনু উসমানকে ইঙ্গিত করছিলেন যেন তিনি উঠে গিয়ে তাদেরকে নিষেধ করেন—আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।”

(আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা বলেন) আব্দুল্লাহ (ইবনু উমার) এই হাদীসটি কোনো প্রকার শর্ত আরোপ ছাড়াই সাধারণভাবে বর্ণনা করেছেন।

তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা আমীরুল মু'মিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। যখন আমরা বাইদা নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তিনি একটি গাছের নিচে অবতরণকারী এক ব্যক্তিকে দেখতে পেলেন। তিনি আমাকে বললেন: যাও, ঐ লোকটি কে জেনে আসো। আমি গেলাম এবং দেখলাম তিনি হলেন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে এসে বললাম: আপনি আমাকে যাঁর পরিচয় জানতে বলেছিলেন, তিনি হলেন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাকে বলো, সে যেন আমাদের সাথে যোগ দেয়। আমি বললাম: তার সাথে তো তার পরিবারও রয়েছে। তিনি বললেন: যদি তার সাথে তার পরিবারও থাকে তবুও (আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) সম্ভবত বলেছেন: তাকে বলো, সে যেন আমাদের সাথে যোগ দেয়)। যখন আমরা (মদীনায়) পৌঁছলাম, এর কিছুদিন পরই আমীরুল মু'মিনীন (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) আঘাতপ্রাপ্ত হলেন। সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে কান্নাকাটি করে বলতে লাগলেন: ওহ! আমার ভাই! ওহ! আমার সাথী! তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি জানো না, কিংবা তুমি কি শোনোনি—(আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: অথবা তিনি বলেছেন: তুমি কি জানো না কিংবা তুমি কি শোনোনি) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কিছুটা কারণে আযাব দেওয়া হয়।”

(বর্ণনাকারী) বলেন: আব্দুল্লাহ (ইবনু উমার) (এই হাদীসটি) সাধারণভাবে বর্ণনা করেছেন, আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: ‘কিছুটা কারণে’ (ببعض)।

তারপর আমি (আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা) উঠলাম এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে তাঁকে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা জানালাম। তিনি বললেন: না, আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কখনো বলেননি যে, "নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে কারো কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।" বরং তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই কাফিরের উপর তার পরিবারের কান্নার কারণে আল্লাহ আযাব বাড়িয়ে দেন। আর নিশ্চয়ই আল্লাহই হাসিয়েছেন এবং কাঁদিয়েছেন। আর কোনো বহনকারী অপরের বোঝা বহন করবে না।"

আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু আবী মুলাইকা বলেছেন: আমাকে কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন যে, যখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য পৌঁছালো, তখন তিনি বললেন: তোমরা আমাকে এমন ব্যক্তিদের পক্ষ থেকে বর্ণনা করছো যারা মিথ্যাবাদী নন এবং যাদের মিথ্যা প্রতিপন্নও করা হয়নি। কিন্তু (অনেক সময়) শ্রবণে ভুল হয়ে যায়।