الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল
3483 - عن عائشة قالت: أقبل أبو بكر على فرسه من مسكنه بالسُّنْح حتى نزل، فدخل المسجد فلم يكلِّم الناس، حتى دخل على عائشة، فتيمم النبيَّ صلى الله عليه وسلم وهو مُسَجَّى ببُرْد حبرة، فكشف عن وجهه، ثم أكَبَّ عليه فقبَّله، ثم بكى فقال: بأبي أنت يا نبي الله، لا يَجْمَعُ اللهُ عَليكَ مَوْتَتَين، أما الموتة التي كُتِبَتْ عليك فقد مُتَّها.
قال أبو سلمة: فأخبرني ابن عباس رضي الله عنهما: أن أبا بكر رضي الله عنه خرج وعمر رضي الله عنه يكَلِّمُ الناس، فقال: اجْلِسْ، فأبى، فقال: اجلس، فأبى، فتشهَّد أبو بكر، فمال إليه الناس وتركوا عمر، فقال: أما بعد: فمن كان منكم يعبدُ محمدًا صلى الله عليه وسلم فإن محمدًا صلى الله عليه وسلم قد مات، ومن كان يعبد الله فإن الله حيٌّ لا يموتُ، قال الله تعالى: {وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ} إلى قوله: {الشَّاكِرِينَ}. [آل عمران: 144]. والله! لكأنَّ الناس لم يكونوا يعلمون أن الله أنزلها حتى تلاها أبو بكر، فتلقَّاها منه الناس، فما يَسمع بشر إلا يتلوها.
وفي رواية قالت: ثم جاء أبو بكر، فرفعت الحجاب، فنظر إليه، فقال: إنا لله وإنا إليه راجعون، مات رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم أتاه من قِبَلِ رأسه فَحَدَرَ فاه، وقبَّل جبهتَه، ثم قال: وا نبياه، ثم رفع رأسه، ثم حَدَرَ فاه، وقبَّل جبهتَه، ثم قال: وا صفياه، ثم رفع رأسه، وحَدَرَ فاه، وقبَّل، وقال: وا خليلاه، مات رسول الله
- صلى الله عليه وسلم …" فذكرت الحديث بطوله وسيأتي موضعه.
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1241، 1242) عن بشر بن محمد، قال: أخبرنا عبد الله، قال: أخبرني معمر ويونس، عن الزهري، قال: أخبرني أبو سلمة أن عائشة قالت فذكرته.
ورواه أيضًا البخاري في المغازي (4455) من وجه آخر عن عائشة وابن عباس، أن أبا بكر قبَّل النبي صلى الله عليه وسلم، مختصرًا، فجعل الحديث من مسند عائشة وابن عباس جميعًا.
والرواية الثانية رواها الإمام أحمد (25841) عن بهز، قال: حدثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرني أبو عمران الجوني، عن يزيد بن بابنوس قال: ذهبتُ أنا وصاحب لي إلى عائشة فاستأذنا عليها، فألقت لنا وسادةً، وجذبتْ إليها الحجاب، فذكرت الحديث في سياق طويل وسيأتي في موضعه.
وإسناده حسن لأجل يزيد بن بابنوس فقد قال فيه الدارقطني: لا بأس به، وقال ابن عدي: أحاديثه مشاهير، وذكره ابن حبان في الثقات، ومثله بحسن حديثه، ولم يثبت ما نُقل عن أبي حاتم، أنه قال فيه:"مجهول".
وقول أبي بكر:"لا يجمع الله عليك مَوْتتين، أما الموتة التي كتبتْ عليك فقد مُتَّها" لعله قصد بذلك الرد على من ظن أنه صلى الله عليه وسلم لم يمت، وإنما استتر عن أعين الناس، فأكَّدهم أنه مات الموتة الحقيقية كما يموت. أي إنسان لقوله تعالى: {كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ} [آل عمران: 185] وقد ذكر الحافظ ابن حجر أوجها أخرى غير هذا.
وأما ما روي عن عائشة قالت: قبَّل النبي صلى الله عليه وسلم عثمان بن مَظْعُون وهو ميت، فكأني أنظر إلى دموعه على خديه، فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3163)، والترمذي (989)، وابن ماجه (1456) كلهم من طريق سفيان، عن عاصم بن عبيد الله، عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته. والحديث في مسند الإمام أحمد (24165) من هذا الوجه.
قال الترمذي: حسن صحيح. وأخرجه الحاكم (1/ 361) من هذا الوجه إلا أنه لم يحكم عليه وإنما قال: هذا حديث متداول بين الأئمة إلا أن الشيخين لم يحتجا بعاصم بن عبيدالله، وشاهده الصحيح المعروف حديث عبد الله بن عباس وجابر بن عبد الله وعائشة أن أبا بكر الصديق قَبَّل النبي صلى الله عليه وسلم وهو ميت" انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإن عاصم بن عبيدالله بن عاصم بن عمر بن الخطاب المدني أجمعوا على تضعيفه فقال ابن معين: ضعيف، وقال أبو حاتم والبخاري:"منكر الحديث".
وأظن أن هذا الحديث من مناكيره، فإن الصحيح الثابت هو أن أبا بكر الصديق قبل النبي صلى الله عليه وسلم وهو ميت.
ومن مناكيره وأخطائه أيضًا ما رواه العُمري عن عاصم بن عبيدالله عن عبد الله بن عامر بن ربيعة،
عن أبيه قال: رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم قبَّل عثمان بن مظعون. رواه البزار"كشف الأستار" (809)، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 20):"إسناد حسن". قلت: بل ضعيف لأجل عاصم بن عبيدالله هذا.
অনুবাদঃ আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুন্হ-এ তাঁর আবাসস্থল থেকে ঘোড়ায় আরোহণ করে এলেন। তিনি নেমে মসজিদে প্রবেশ করলেন এবং কারো সাথে কথা বললেন না। তারপর তিনি আয়িশার (ঘরে) প্রবেশ করলেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে গেলেন। তখন তাঁকে ইয়ামানী নকশা করা চাদর দ্বারা আবৃত করা ছিল। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর চেহারা থেকে চাদর সরিয়ে দিলেন, তারপর তাঁর উপর ঝুঁকে পড়লেন এবং তাঁকে চুম্বন করলেন, এরপর কাঁদলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমার পিতা আপনার জন্য কুরবান হোক! আল্লাহ আপনার উপর দু’টি মৃত্যু একত্রিত করবেন না। আপনার জন্য যে মৃত্যু নির্ধারিত ছিল, তা আপনি বরণ করেছেন।
আবূ সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমাকে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খবর দিয়েছেন যে, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (বের হয়ে এলেন), তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের সাথে কথা বলছিলেন। তিনি বললেন: "বসুন।" কিন্তু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসতে অস্বীকার করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবারো বললেন: "বসুন।" কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত (আল্লাহর প্রশংসা) পাঠ করলেন। ফলে লোকেরা উমারকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছেড়ে আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিকে ঝুঁকে পড়ল। তিনি বললেন: "যা হোক, তোমাদের মধ্যে যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইবাদত করত, তারা জেনে রাখুক, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করেছেন। আর যারা আল্লাহর ইবাদত করত, তারা জেনে রাখুক, আল্লাহ চিরঞ্জীব, তিনি কখনো মরেন না।" এরপর তিনি আল্লাহর বাণী তিলাওয়াত করলেন: "মুহাম্মাদ একজন রসূল ছাড়া আর কিছুই নন। তার পূর্বে বহু রসূল ইন্তিকাল করেছেন। কাজেই যদি তিনি মারা যান অথবা নিহত হন, তবে কি তোমরা পেছন দিকে ফিরে যাবে? আর যে কেউ পেছন দিকে ফিরে যায়, সে আল্লাহর কোনো ক্ষতি করতে পারে না। তবে যারা কৃতজ্ঞ তাদেরকে আল্লাহ পুরস্কৃত করবেন।" [সূরাহ আল ইমরান: ১৪৪]। আল্লাহর কসম! আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়াতটি তিলাওয়াত না করা পর্যন্ত যেন লোকেরা জানত না যে আল্লাহ তা অবতীর্ণ করেছেন। লোকেরা তাঁর কাছ থেকে (আয়াতটি) গ্রহণ করে নিল। এরপর যে কেউ তা শুনল, সে-ই তা তিলাওয়াত করতে লাগল।
অন্য এক বর্ণনায় আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। আমি পর্দা তুলে দিলাম। তিনি তাঁর দিকে তাকালেন এবং বললেন: "ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন। আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করেছেন।" এরপর তিনি তাঁর মাথার দিক থেকে এলেন, তারপর নিজের মুখ নিচু করে তাঁর কপালে চুম্বন করলেন এবং বললেন: "ওয়া নাবিইয়াহ (হায় আমার নবী!)।" এরপর তিনি মাথা তুলে নিলেন, আবার মুখ নিচু করলেন এবং কপালে চুম্বন করলেন, তারপর বললেন: "ওয়া সফিইয়াহ (হায় আল্লাহর মনোনীত বন্ধু!)।" এরপর তিনি আবার মাথা তুলে নিলেন এবং মুখ নিচু করে চুম্বন করলেন এবং বললেন: "ওয়া খলিল্লাহ (হায় আল্লাহর অন্তরঙ্গ বন্ধু!)।" আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করেছেন...। এভাবে তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং এর স্থান ভবিষ্যতে আসবে।