হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2441)


2441 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يقطعُ الصلاةَ الكلب الأسودُ، والمرأة الحائض".

صحيح: رواه ابن ماجه (949) عن أبي بكر بن خلاد الباهلي، قال: حدّثنا يحيى بن سعيد، قال: حدّثنا شعبةُ، قال: حدّثنا قتادةُ، قال: حدّثنا جابر (ابن زيد)، عن ابن عباس فذكره.

ورواه الإمام أحمد (3241) عن يحيى بن سعيد.

ورواه أبو داود (703) عن مسدد، والنسائي (752) عن عمرو بن علي، كلاهما عن يحيى بن سعيد به وقرن النسائي هشامًا بشعبة. ثم قال: قال يحيى: رفعه شعبةُ.

وعلَّله أبو داود بقوله: وقَّفه سعيد وهشام وهمام، عن قتادة، عن جابر على ابن عباس. انتهى.

وقد رجح أهل العلم رواية شعبة لما فيه مِنْ زيادة علم، وشعيةُ حافظ حجة، فزيادته مقبولة كما هو معروف عند أهل العلم بالحديث.

ولذا أخرجه ابن خزيمة (832)، وابن حبان (2387) في صحيحيهما.

ونقل ابن أبي حاتم عن أبيه:"هو صحيح عندي" قاله ردًّا على ما ذكره يحيى بن سعيد قال: أخاف أن يكون وهم."العلل" (1/ 210).

ولحديث ابن عباس إسناد آخر وهو ما رواه أبو داود (704)، عن محمد بن إسماعيل البصري، حدّثنا معاذ، حدّثنا هشام، عن يحيى، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: أحسبه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا صلّى أحدكم إلى غير سترة فإنه يقطع صلاته: الكلب، والحمار، والخنزير، واليهودي، والمجوسي، والمرأة. وتجزئ عنه إذا مروا بين يديه على قذفة بحجر".

قال أبو داود:"في نفسي من هذا الحديث شيء، كنتُ أذاكر به إبراهيم وغيره فلم أر أحدًا جاء به عن هشام، ولا يعرفه. ولم أر أحدًا يحدث به عن هشام، وأحسب الوهم من ابن أبي سمينة - يعني محمد بن إسماعيل البصري مولى بني هاشم - والمنكر فيه ذكر المجوسي، وفيه"على قذفة بحجر" وذكر الخنزير، وفيه نكارة.

قال أبو داود: ولم أسمع هذا الحديث إلا من محمد بن إسماعيل بن أبي سمينة، وأحسبه وهم، لأنه كان يحدّثنا من حفظه" انتهى.

قلت: محمد بن إسماعيل بن أبي سمينة ثقة، من رجال الصحيح، وإنما علة هذا الحديث شك الراوي في رفعه مع النكارة في بعض ألفاظه، وعنعنة يحيى وهو ابن أبي كثير فإنه مدلس.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কালো কুকুর এবং ঋতুমতী নারী সালাতকে ভঙ্গ করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2442)


2442 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قطع الصلاةَ الكلبُ والحمارُ والمرأةُ".

حسن: رواه البزار الكشف الأستار" (582) عن يحيى بن محمد بن السكن، ثنا يحيى بن كثير، ثنا شعبة، عن عبيد الله بن أبي بكر، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 60):"رواه البزار، ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، والإسناد حسن لأجل يحيى بن محمد بن السكن القرشي البزار، وهو وإن كان من رجال البخاري إلا أنه حسن الحديث.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুকুর, গাধা এবং নারী সালাত (নামায) ভঙ্গ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2443)


2443 - عن عبد الله بن شداد قال: سمعتُ خالتي ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها كانت تكون حائضًا لا تُصلِّي، وهي مفترشةٌ بحذاءِ مسجد رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وهو يُصلِّي على خمرته، إذا سجد أصابني بعض ثوبه.

وفي رواية:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي وأنا حِذاءَه وأنا حائض، وربما أصابني ثوبُه إذا سجد".

وفي رواية: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي، وأنا إلى جنبه نائمة".

متفق عليه: رواه البخاري في الطهارة (333)، وفي الصلاة (379)، ومسلم في الصلاة (513) كلاهما من طرق عن سليمان الشيباني، عن عبد الله بن شداد به فذكر مثله.

اسُتدِل بهذا الحديث على أن المرأة لا تقطع الصلاة، إلا أن ألفاظ الحديث لا تدل على جواز المرور بين يدي المصلي، وإنما تدل على جواز القعود أمام المصلي أو جنبه.




মাইমুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঋতুমতী অবস্থায় সালাত আদায় করতেন না। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের পার্শ্বে বিছানা পেতে থাকতেন। তিনি তাঁর খুমরাহর (ছোট জায়নামাজ) উপর সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন তাঁর কাপড়ের অংশ আমার গায়ে লাগতো।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন এবং আমি তার কাছে ঋতুমতী অবস্থায় থাকতাম। তিনি সিজদা করলে মাঝে মাঝে তাঁর পোশাক আমার গায়ে লেগে যেত।

অন্য বর্ণনায় আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন, আর আমি তার পাশে ঘুমিয়ে থাকতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2444)


2444 - عن عائشة ذُكر عندها ما يقطعُ الصلاةَ: الكلبُ والحمارُ والمرأة. فقالت: شبهتمونا بالحُمر والكلاب. والله! لقد رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي وإني على السرير، بينه وبين القبلة مضطجعة، فتبدو لي الحاجةُ، فأكره أن أجلسَ فأوذيَ النبي صلى الله عليه وسلم فأنْسِلُّ من عند رجليه.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (514)، ومسلم في الصلاة (270) (الرقم الصغير) كلاهما عن عمر بن حفص بن غياث، قال: حدّثنا أبي، قال: حدّثنا الأعمش، قال: حدّثنا إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرت مثله.

قال الأعمش: وحدثني مسلم، عن مسروق، عن عائشة.

ورواه مسلم من طريق أبي بكر بن حفص، عن عروة بن الزبير، قال: قالت عائشةُ: ما يقطع الصلاة؟ قال: فقلنا: المرأة والحمارُ. فقالت: إن المرأة لدابةُ سوءٍ! لقد رأيتُني بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم معترضة، كاعتراضي الجنازةِ وهو يُصلِّي.

ورواه مالك في صلاة الليل (2) عن أبي النضْر مولى عمر بن عبيد الله، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة قالت: كنتُ أنام بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم ورجْلايَ في قبلته، فإذا سجد غمزني، فقبضتُ رِجْلَيَّ. فإذا قام بسطتُهما. قالت: والبيوت يومئذ ليس فيها مصابيح.
ورواه البخاري في الصلاة (382) عن إسماعيل (وهو ابن أبي أويس)، ومسلم في الصلاة (272) (الرقم الصغير) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

ولحديث عائشة هذا طرق أخرى في الصحيحين وغيرهما.

والذي رواه شعبةُ عن سعد بن إبراهيم، عن عروة، عن عائشة وقال فيه: أحسبها قالت: وأنا حائض.

رواه أبو داود (710) عن مسلم بن إبراهيم، عن شعبة به.

وقال: رواه جماعة عن جماعة - وسماهم - ولم يذكروا:"حائضًا".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কাছে এমন কিছু জিনিসের কথা উল্লেখ করা হলো যা সালাত ভঙ্গ করে: কুকুর, গাধা এবং নারী। তখন তিনি বললেন: তোমরা কি আমাদের গাধা ও কুকুরের সাথে তুলনা করলে! আল্লাহর কসম! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত আদায় করতে দেখেছি, আর আমি তাঁর ও কিবলার মাঝখানে বিছানায় শুয়ে থাকতাম। (সালাতরত অবস্থায়) যখন আমার কোনো প্রয়োজন হতো, তখন আমি অপছন্দ করতাম যে বসে পড়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট দিই, তাই আমি চুপিসারে তাঁর পায়ের দিক দিয়ে সরে যেতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2445)


2445 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى وهي معترضة بين يديه وقال:"أليس هُنَّ أمهاتكم وأخواتكم وعماتكم".

حسن: رواه أحمد (24359) عن يونس، حدّثنا داود، يعني ابن أبي فُرات، عن إبراهيم بن ميمون الصائغ، عن عطاء، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن لأجل إبراهيم بن ميمون الصائغ فإنه صدوق كما في التقريب. وقد وثَّقه ابن معين والنسائي. وقال أبو زرعة: ليس به بأس. وله متابع دون قوله:"أليس هن أمهاتكم …".

وبقية الرجال ثقات، يونس هو: ابن محمد المؤدب، وعطاء هو: ابن أبي رباح.

قال السندي: قوله: أليس هنَّ - أي النساء - أي فكيف يقطعن الصلاة عليكم بمرورهن.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করছিলেন, আর তিনি (আয়িশা) তাঁর সামনে আড়াআড়িভাবে শুয়ে ছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী) বললেন: "তারা কি তোমাদের মাতা, বোন ও ফুফুদের মতো নন?"









আল-জামি` আল-কামিল (2446)


2446 - عن أم سلمة قالت: كان فراشها حيال مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم. وفي رواية: كان يفرش لي حيال مصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فكان يُصلي وأنا حياله.

صحيح: روه أبو داود (4148)، وابن ماجه (957) كلاهما من طريق يزيد بن زُريع، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أمها فذكرته. وإسناده صحيح.

ورواه الإمام أحمد (4148)، وأبو يعلى (957) من طريق وهيب، والطبراني في"الكبير" (23/ 350) من طريق وهب بن بقية - كلاهما عن خالد الحذاء به مثله.

ووهيب هو: ابن خالد بن عجلان الباهلي مولاهم، ووهب بن بقية هو: ابن عثمان الواسطي وكلاهما ثقتان من رجال الصحيح. فزيادتهما مقبولة.

الجمع بين الأحاديث من البابين:

لقد نقل الترمذي عن الإمام أحمد بعد أن أخرج حديث أبي ذر:"قال أحمد: الذي لا أشك فيه أن الكلب الأسود يقطع الصلاة. وفي نفسي من الحمار والمرأة شيء. قال إسحاق: لا يقطعها شيء إلا الكلب الأسود" (2/ 163).

قلت: لأنه لم يجد في الكلب الأسود ما يعارضه، وقد وجد في الحمار حديث ابن عباس الآتي، وفي المرأة حديث عائشة.
وأما حديث أبي ذر فذهب بعض أهل العلم إلى نسخه بحديث أبي سعيد وهو ضعيف رواه أبو داود (719) وغيره عن أبي سعيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يقطع الصلاة شيء، وادرؤا ما استطعتم، فإنما هو شيطان" وفيه مجالد بن سعيد الهمداني وهو سيء الحفظ.

وفي الباب عن ابن عمر وأبي هريرة عند الدارقطني، وجابر عند الطبراني في"الأوسط"، وأبي أمامة عند الطبراني في"الكبير" وهي كلها ضعيفة لا تنتهض للاحتجاج بها.

ومع هذا ذهب إلى النسخ الطحاوي وابن عبد البر وغيرهما.

ومنهم من جعل أحاديث القطع ضعيفةً، وجعل ما يخالفها أقوى وأثبت. ذهب إليه الإمام الشافعي وقوَّى هذا الرأي في كتابه"اختلاف الحديث".

ومنهم من ذهب إلى التأويل مثل الخطابي فقال:"وقد يحتمل أن يتأول حديث أبي ذر على أن هذه الأشخاص إذا مرت بين يدي المصلي قطعتْه عن الذكر، وشغل قلبَه عن مراعاة الصلاة، فذلك معنى قطعها للصلاة، دون إبطالها من أملها حتى يكون فيها وجوب الإعادة""معالم السنن".




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁর বিছানা রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মসজিদের সামনে পাতা থাকতো। অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সালাতের জায়গার সামনে আমার জন্য বিছানা পাতা হতো। আর তিনি সালাত আদায় করতেন, অথচ আমি তার সামনেই ছিলাম।

সহীহ: এটি আবু দাউদ (নং ৪১৪৮) এবং ইবনু মাজাহ (নং ৯৫৭) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই ইয়াযীদ ইবনু যুরাই', খালিদ আল-হাযযা, আবূ কিলাবাহ, যায়নাব বিনতু আবূ সালামাহ তার মা থেকে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ। এটি ইমাম আহমাদ (নং ৪১৪৮), আবূ ইয়া'লা (নং ৯৫৭) ওয়াহীবের সূত্রে এবং তাবারানী ‘আল-কাবীর’ (২৩/৩৫০)-এ ওয়াহব ইবনু বাকিয়্যাহর সূত্রে খালিদ আল-হাযযা থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। ওয়াহীব হলেন: ইবনু খালিদ ইবনু আজলান আল-বাহিলী, তাদের মাওলা; এবং ওয়াহব ইবনু বাকিয়্যাহ হলেন: ইবনু উসমান আল-ওয়াসিতী। তারা উভয়েই নির্ভরযোগ্য এবং সহীহ হাদীসের বর্ণনাকারী। সুতরাং তাদের অতিরিক্ত বর্ণনা গ্রহণযোগ্য।

উভয় অনুচ্ছেদের হাদীসসমূহের মধ্যে সমন্বয়: ইমাম তিরমিযী আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস বর্ণনা করার পর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন: “আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: কালো কুকুর সালাত ভঙ্গ করে— এতে আমার কোনো সন্দেহ নেই। আর গাধা ও মহিলার ব্যাপারে আমার মনে কিছু দ্বিধা রয়েছে। ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: কালো কুকুর ছাড়া কোনো কিছুই সালাত ভঙ্গ করে না।” (২/১৬৩) আমি (গ্রন্থকার) বলি: কারণ, কালো কুকুর সম্পর্কে এমন কোনো বিষয় তিনি পাননি যা এর বিরোধী, তবে গাধার ব্যাপারে তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস পেয়েছেন এবং মহিলার ব্যাপারে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস পেয়েছেন।

আর আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সম্পর্কে কিছু আলিম এটিকে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারা মানসুখ (রহিত) বলে মত দিয়েছেন। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি দুর্বল, যা আবূ দাউদ (নং ৭১৯) এবং অন্যরা বর্ণনা করেছেন। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কোনো কিছুই সালাত ভঙ্গ করে না। তবে তোমরা সাধ্যমতো বাধা দাও, কারণ সে তো শয়তান।” এই হাদীসে মুজালিদ ইবনু সাঈদ আল-হামদানী রয়েছেন, যিনি দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী। এই অনুচ্ছেদে দারাকুতনীতে ইবনু উমার ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তাবারানী ‘আল-আওসাত’-এ জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এবং তাবারানী ‘আল-কাবীর’-এ আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীস রয়েছে। এগুলো সবই দুর্বল এবং দলীল হিসেবে গ্রহণ করার উপযুক্ত নয়। এতদসত্ত্বেও তাহাভী, ইবনু আব্দুল বার্র প্রমুখ ব্যক্তিগণ রহিত হওয়ার (নসখ) মত পোষণ করেছেন। আবার তাদের মধ্যে এমনও আছেন, যারা সালাত ভঙ্গ হওয়ার হাদীসগুলোকে দুর্বল হিসেবে গণ্য করেছেন এবং এর বিপরীত হাদীসগুলোকে অধিক শক্তিশালী ও প্রতিষ্ঠিত মনে করেছেন। এই মত পোষণ করেছেন ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) এবং তিনি তাঁর গ্রন্থ ‘ইখতিলাফুল হাদীস’-এ এই অভিমতকে জোরদার করেছেন। আর তাদের মধ্যে এমনও আছেন যারা তা’বীল (ব্যাখ্যা) করেছেন, যেমন খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: “আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের এমন ব্যাখ্যাও করা যেতে পারে যে, এই জিনিসগুলো সালাত আদায়কারীর সামনে দিয়ে অতিক্রম করলে তাকে যিক্র থেকে বিচ্ছিন্ন করে দেয় এবং তার অন্তরকে সালাতের প্রতি মনোযোগ থেকে বিচ্যুত করে। আর এটাই সালাত ভঙ্গ হওয়ার অর্থ, তার আমল বাতিল করা নয়, যাতে করে তা পুনরায় আদায় করা আবশ্যক হয়।” ‘মাআলিমুস সুনান’।









আল-জামি` আল-কামিল (2447)


2447 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي، وأنا راقدةٌ معترضةً على فراشه، فإذا أراد أن يوتر أيقظني فأوترتُ.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (512)، ومسلم في الصلاة (268/ 512) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرت مثله. ولحديث عائشة طرق أخرى بعضها سبق ذكرها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন, আর আমি তাঁর বিছানায় আড়াআড়িভাবে শুয়ে থাকতাম। অতঃপর যখন তিনি বিতর (সালাত) আদায় করার ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি আমাকে জাগিয়ে দিতেন, ফলে আমিও বিতর আদায় করতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2448)


2448 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نُهيتُ أن أُصَلِّي خلف المتحدِّثين والنِّيام".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط""مجمع البحرين" (747) عن محمد بن الفضل السقطي، ثنا سهل بن صالح الأنطاكي، ثنا شجاع بن الوليد، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال الطبراني:"لم يرو عن محمد بن عمرو إلَّا شُجاع، تفرد به سهل.

قلت: لا يضرُّ تفرُّدُ سهل بن صالح وهو: ابن حكيم الأنطاكي، أبو سعيد البزار، فقد وثَّقه أبو حاتم وغيره.

ولكن قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 62):"فيه محمد بن عمرو بن علقمة، اختلف في الاحتجاج به".

قلت: محمد بن عمرو بن علقمة الليثي روى له البخاري مقرونًا بغيره، ومسلم في المتابعات قال الذهبي:"شيخ مشهور حسن الحديث، مكثر عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وقد أخرج له
الشيخان متابعة".

وأما شيخ الطبراني فهو ثقة كما قال الخطيب في"تاريخ بغداد" (2/ 153).

ومثله يحسن حديثه وفي الباب أحاديث أخرى ولكن كلها ضعيفة، منها ما رُوِي عن ابن عباس ولا تصلوا خلف النائم والمتحدِّث".

رواه أبو داود (694)، وابن ماجه (959) كلاهما من حديث محمد بن كعب، عن ابن عباس فذكر الحديث. قال أبو داود: رُوي هذا الحديث من غير وجه عن محمد بن كعب كلها واهية. وهذا الطريق أمثلها وهو ضعيف أيضًا".

قلت: وهو كما قال، ففي إسناد أبي داود رجل لم يُسم، وفي إسناد ابن ماجه: أبو المِقْدام وهو: هشام بن زياد بن أبي يزيد المدني متروك.

قال الخطابي في معالمه: هذا حديث لا يصح عن النبي صلى الله عليه وسلم لضعف سنده، وعبد الله بن يعقوب لم يُسمِّ من حدَّثه عن محمد بن كعب. وإنَّما رواه عن محمد بن كعب رجلان كلاهما ضعيف، تمام بن بَزِيع وعيسى بن ميمون، وقد تكلم فيهما يحيى بن معين والبخاري.

ورواه أيضًا عبد الكريم أبو أمية، عن مجاهد، عن ابن عباس، وعبد الكريم متروك. وقد ثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه صلَّى، وعائشه نائمة معترضة بينه وبين القبلة".

قلت: قال الحافظ في الفتح (1/ 587):"كَرِه مجاهد وطاوس ومالك الصلاة إلى النائم خشية أن يبدو منه ما يُلْهي المصلي عن صلاته. وظاهر تصرف المصنف (يقصد به الإمام البخاري الذي بوَّبَ بقوله: الصلاة خلف النائم. وأورد فيه حديث عائشة المذكور) أن عدم الكراهية حيث يحصل الأمن من ذلك". انتهى. وبهذا يجمع بين الحديثين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে কথা বলা লোকদের এবং ঘুমন্তদের পেছনে সালাত (নামায) আদায় করতে নিষেধ করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2449)


2449 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا خرج يومَ العيد أمر بالحَرْبَةِ فتوضع بين يديه فيصلِّي إليها والناس وراءه، وكان يفعل ذلك في السفر، فمن ثَمَّ اتخذها الأمراءُ.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (494)، ومسلم في الصلاة (501) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حدّثنا عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

واختصره البعض بقوله:"أن النبي صلى الله عليه وسلم كان تُركزُ له الحربة فيصلي إليها" رواه البخاري (498) عن مسدد، قال: حدّثنا يحيى (ابن سعيد) عن عبيد الله به، وفي مسلم من طريق محمد بن بشر، عن عبيد الله:"يركز العنَزَةَ ويصلي إليها" وفي رواية: تركز له العنزةُ فيصلي إليها".

والحربة والعنزة واحدة، والحربة إذا كانت قصيرة يقال لها عنزة. والعنزة كالرمح، لكن سنانها
في أسفلها بخلاف الرمح فإنه في أعلاها.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ঈদের দিন বের হতেন, তখন তিনি একটি হারবাহ (ছোট বর্শা) আনার নির্দেশ দিতেন এবং তা তাঁর সামনে স্থাপন করা হতো। অতঃপর তিনি সেটির দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতেন এবং লোকেরা তাঁর পেছনে থাকত। তিনি সফরেও এটি করতেন। আর সেই কারণেই শাসকরা (আমীরগণ) এটি গ্রহণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2450)


2450 - عن عون بن أبي جُحيفة قال: سمعت أبي أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى بهم بالبطحاء - وبين يديه عنزة - الظهرَ ركعتين، والعصر ركعتين، تمر بين يديه المرأةُ والحمارُ.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (495) عن أبي الوليد، قال حدّثنا شعبة، عن عون بن أبي جُحيفة فذكر مثله.

ورواه هو (376)، ومسلم في الصلاة (503) من طريق عمر بن أبي زائدة، حدّثنا عون بن أبي جحيفة في حديث طويل سبق تخريجه في كتاب الطهارة، باب استعمال فضل الوضوء.

وقوله:"تمر بين يديه" أي: أمامه بعد العنزة.




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাত্বহা নামক স্থানে তাঁদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন—আর তাঁর সামনে ছিল একটি ‘আনযাহ’ (ছোট বর্শা/লাঠি)—যোহরের সালাত দুই রাকাত এবং আসরের সালাত দুই রাকাত। আর তাঁর সামনে দিয়ে নারী ও গাধা অতিক্রম করছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2451)


2451 - عن ابن عباس قال: أَقبلْتُ راكبًا على أتانٍ، وأنا يومئذ ناهزتُ الاحتلامَ، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي للناس بمنى. فمررتُ بين يدي بعض الصف. فنزلتُ فأرسلتُ الأتان ترتع، ودخلت في الصّف. فلم ينكر ذلك عليَّ أحدٌ.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (38) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس فذكر مثله.

ورواه البخاري في العلم (76) عن إسماعيل بن أبي أويس، وفي الصلاة (493) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الصلاة (504) عن يحيى بن يحيى، كل هؤلاء الثلاثة عن مالك بن أنس به مثله إلا أن البخاري زاد بعد قوله: يُصلِّي بالناس بمنى:"إلى غير جدار".

قال البيهقي رحمه الله:"هذه اللفظة ذكرها مالك بن أنس في هذا الحديث في كتاب المناسك، ورواه في كتاب الصلاة دون هذه اللفظة. ورواه الشافعي في القديم كما رواه في المناسك، وفي الجديد كما رواه في الصلاة"السنن الكبرى" (2/ 273). وبوَّب عليه البيهقي بقوله:"مَن صلَّى إلى غير سترة".

وذكر أبو داود (716) حديث ابن عباس في الرد على أن الحمار لا يقطع الصلاة عن أبي الصهباء قال: تذاكرنا ما يقطع الصلاة عند ابن عباس، فقال: جئت أنا وغلام من بني عبد المطلب على حمار ورسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي. فنزلتُ ونزل، وتركنا الحمار أمام الصف، فما بالاه. وجاءت جاريتان من بني عبد المطلب فدخلت بين الصف فما بالي ذلك.

أخرجه عن مسدد، حدّثنا أبو عوانة، عن منصور، عن الحكم، عن يحيى الجزار، عن أبي الصهباء فذكر مثله.

وإسناده لا بأس به. وأبو الصهباء مختلف فيه غير أنه جيد الحديث.

وفي رواية (717) عن عثمان بن أبي شيبة وداود بن مِخْراق الفريابي، قالا: حدّثنا جرير، عن منصور، بهذا الحديث بإسناده قال: جاريتان من بني عبد المطلب اقتتلتا فأخذهما. قال عثمان:
ففرع بينهما. وقال داود: فنزع إحداهما من الأخرى، فما بالى ذلك.

وأخرج أيضًا النسائي (755) من وجه آخر عن الحكم بعض هذه الألفاظ.

ورجاله ثقات غير داود بن مخراق فإنه صدوق وهو مقرون، وصحّحه ابن خزيمة (837) فأخرجه من وجه آخر عن يوسف بن موسى، ثنا جرير، عن منصور به مثل لفظ داود بن مخراق.

وتبويب البخاري رحمه الله لحديث عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس بقوله:"باب سترة الإمام سترةٌ لمن خلفه" يُشعر بأنّ الحمار ما كان يمر أمام النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما كان أمام بعض الصفوف، والنبي صلى الله عليه وسلم ما كان يصلي إلا إلى سترة، فسترته هي سترة لمن خلفه أيضًا، لأنه لم يأمر أبدًا للمأمومين باتخاذ السترة.

وهذا الذي فهمه أيضًا ابن خزيمة فقال بعد أن أخرج حديث أبي الصهباء: (835):"هذا الخبر ظاهره كخبر عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس، أن الحمار إنما مَرَّ بين يدي أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، لا بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم، وليس فيه أن النبي صلى الله عليه وسلم عَلِم بذلك، فإن كان في الخبر أن النبي صلى الله عليه وسلم علم بمرور الحمار بين يدي بعض من كان خلفه، فجائز أن تكون سترة النبي صلى الله عليه وسلم كانت سترة لمن خلفه، إذ النبي صلى الله عليه وسلم قد كان يستر بالحربة إذا صلى بالمصلَّى. ولو كانت سترتُه لا تكون سترة لمن خلفه لاحتاج كلُّ مأموم أن يستتر بحربةٍ كاستتار النبي صلى الله عليه وسلم بها. فحمل العنزة للنبي صلى الله عليه وسلم يستتر بها دون أن يأمر المأمومين بالاستتار خلفه، كالدليل على أن سترة الإمام تكون سترة لمن خلفه" (2/ 25).

وهو الذي فهمه النووي في شرح مسلم فذكر من فوائده: أن سترة الإمام سترة لمن خلفه. ونقل عن القاضي اتفاق أهل العلم بأنه سترة لمن خلفه.

وأما ما رُوِيَ عن أنس مرفوعًا:"سترة الإمام سترة لمن خلْفه" فهو ضعيف، رواه الطبراني في"الأوسط" (1/ 287) وفي إسناده سويد بن عبد العزيز ضعيف."مجمع الزوائد" (2/ 62).

قلت: سويد بن عبد العزيز بن النمير السلمي مولاهم، الدمشقي قال فيه أحمد: متروك الحديث. وتكلم فيه ابن معين وأبو حاتم والنسائي.

ورواه عبد الرزاق (1/ 18) عن عبد الله بن عمر نحوه موقوفًا عليه.

وفيه أيضًا عبد الله بن عمر، وهو العمري المكبر"ضعيف".




আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একটি গাধীর পিঠে সওয়ার হয়ে আসছিলাম, তখন আমার বয়স প্রায় সাবালক হওয়ার কাছাকাছি ছিল। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন মিনায় লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তখন আমি কিছু সারির সামনে দিয়ে অতিক্রম করলাম। অতঃপর আমি নেমে পড়লাম এবং গাধীটিকে চরে খাওয়ার জন্য ছেড়ে দিলাম আর আমি সালাতের কাতারে প্রবেশ করলাম। আমার এই কাজের জন্য কেউ কোনো আপত্তি করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2452)


2452 - عن أبي صالح السمَّان قال: رأيتُ أبا سعيدٍ الخدري في يوم جمعة، يصلِّي إلى شيء يستره من الناس، فأراد شابٌّ من بني أبي مُعَيْطٍ أن يجتاز بين يديه فدفع أبو سعيد في صدْره، فنظر الشابُّ فلم يجد مساغًا إلا بين يديه، فعاد ليجتاز، فَدَفعَهُ أبو سعيد أشد من الأولى، فنال من أبي سعيد، ثم دخل على مروان، فشكا إليه ما لِقيَ
من أبي سعيد، ودخل أبو سعيد خلفَهُ على مروان، فقال: ما لَكَ ولابنِ أخيكَ يا أبا سعيد؟ قال: سمعْتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا صَلَّى أحدكم إلى شيء يستُرُه من الناس، فأراد أحد أن يجتاز بين يديه، فليدفَعْه، فإنْ أَبى فَلْيُقَاتِلْهُ، فإنَّما هوَ شيطان".

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (509)، ومسلم في الصلاة (505) كلاهما من طريق سليمان بن المغيرة، قال: حدثنا حُميد بن هلال العَدَوِي، قال: حدثنا أبو صالح السمَّان فذكره.

واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه إلا أنه زاد بعد قوله: من الدفعة الأولى:"فَمَثَل قائمًا، فنال من أبي سعيد، ثم زاحمَ الناسَ".

وقوله:"مساغًا" أي: طريقًا يمكنه المرور منها.

وقوله:"فمثل" بفتح الميم، وبفتح الثاء وضمها، ومعناه انتصب، والمضارع: يمثُلُ ومنه الحديث:"من أحبَّ أن يمثُلَ له الناس قيامًا".

ورواه مالك في قصر الصلاة (33) عن زيد بن أسلم، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان أحدكم يُصلِّي، فلا يدع أحدًا يمرُّ بين يديه، وليدرأُه ما استطاعَ، فإن أبَى فليقاتله، فإنّما هو شيطانٌ" بدون قصة.

ورواه مسلم (505) عن يحيى بن يحيى، عن مالك به مثله.

وكذلك رواه محمد بن عجلان، عن زيد بن أسلم به مختصرًا بدون القصة، وزاد فيه:"وليَدْنُ منها"، ورواه أبو داود (658)، وابن ماجه (904) كلاهما عن محمد بن العلاء أبي كريب، حدثنا أبو خالد الأحمر، عن محمد بن عجلان به وإسناده حسن لأجل محمد بن عجلان إلا أنه توبع ومن طريقه رواه ابن حبان في صحيحه (2772).

ورواه أبو داود (699) أيضًا من وجه آخر عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من استطاع منكم أن لا يَحُول بينه وبين قبلته أحد فليفعل" وفيه مسرة بن معبد اللخمي تُكُلِّم فيه غير أنه حسن الحديث.

ورواه الإمام أحمد (11780) وفيه خَنْقُ النبي صلى الله عليه وسلم للشيطان انظر باب دفع الجن وخنقه في الصلاة.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালিহ আস-সাম্মান (রহ.) বলেন: আমি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এক জুমু'আর দিনে দেখেছি, তিনি এমন কিছুর দিকে মুখ করে সালাত আদায় করছিলেন যা তাঁকে মানুষ থেকে আড়াল করে রেখেছিল। অতঃপর বানু আবূ মু'আইত গোত্রের এক যুবক তাঁর সামনে দিয়ে অতিক্রম করতে চাইল। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তার বুকে ধাক্কা দিলেন। যুবকটি দেখল যে তাঁর সামনে দিয়ে যাওয়া ছাড়া আর কোনো পথ নেই। তাই সে পুনরায় অতিক্রম করার জন্য ফিরে এল। তখন আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে প্রথম বারের চেয়ে আরও জোরে ধাক্কা দিলেন। যুবকটি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মন্দ বলল (বা তিরস্কার করল)। এরপর সে মারওয়ানের কাছে গেল এবং আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দ্বারা সে যে আচরণের শিকার হয়েছে, তার অভিযোগ করল। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার পেছনে পেছনে মারওয়ানের কাছে প্রবেশ করলেন। মারওয়ান তখন জিজ্ঞেস করলেন: হে আবূ সাঈদ! আপনার ও আপনার ভাতিজার (বা ভাইয়ের ছেলের) মধ্যে কী ঘটল? তিনি (আবূ সাঈদ) বললেন: আমি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "যখন তোমাদের কেউ এমন কিছুর দিকে মুখ করে সালাত আদায় করে যা তাকে মানুষ থেকে আড়াল করে রাখে, আর কেউ তার সামনে দিয়ে অতিক্রম করতে চায়, তখন সে যেন তাকে বাধা দেয় (ধাক্কা দেয়)। যদি সে অস্বীকার করে, তবে সে যেন তার সাথে লড়ে (বা কঠোরভাবে বাধা দেয়), কারণ সে তো শয়তান।"









আল-জামি` আল-কামিল (2453)


2453 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان أحدكم يُصلِّي فلا يدعْ أحدًا يمرُّ بين يديه، فإن أبى فليقاتلْه، فإن معه القرينَ".

صحيح: أخرجه مسلم في الصلاة (506) عن هارون بن عبد الله ومحمد بن رافع كلاهما عن محمد بن إسماعيل بن أبي فديك.

ح وعن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا أبو بكر الحنفي - كلاهما يعني ابن أبي فديك وأبا بكر الحنفي، عن الضحاك بن عثمان، عن صدقة بن يسار، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث مثله.
ورواه ابن خزيمة (800) وعنه ابن حبان (2362) عن محمد بن بشار بُنْدار، عن أبي بكر الحنفي به وفيه:"لا تُصلّ إلا إلى سترة …"، والذي رواه الحسن بن داود المنكدري، عن ابن أبي فديك، عن الضحاك وزاد فيه:"فإن معه العُزَّى" فهو شاذ، فإن المنكدري وإن كان لا بأس به إلا أنه تفرد بهذه الزيادة. رواه ابن ماجه (955) عن هارون بن عبد الله الحمَّال والحسن بن داود المنكدري كلاهما عن ابن أبي فديك به.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যদি তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে, সে যেন তার সামনে দিয়ে কাউকে অতিক্রম করতে না দেয়। যদি সে (অতিক্রমকারী) অস্বীকার করে, তবে সে যেন তাকে প্রতিরোধ করে/শক্তভাবে বাধা দেয়, কারণ তার সাথে শয়তান রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (2454)


2454 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلي، فمَرَّت شاةٌ بين يديه، فساعاها إلى القبلة حتى ألزق بطْنَه بالقبلة.

صحيح: رواه ابن خزيمة (827)، وابن حبان (2371)، والحاكم (1/ 254) كلهم من طريق جرير بن حازم، عن يعلى بن حكيم والزبير بن خِرِّيت، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر مثله.

قال الحاكم: صحيح على شرط البخاري.

ورواه البيهقي (2/ 268) من طريق يحيى بن أبي بكير، ثَنا شعبة، عن عمرو بن مرة، عن يحيى بن الجزار، عن صهيب البصري عن ابن عباس أنه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُصلي فأراد جَدْي أن يمرَّ بين يديه فجعل يتقيه.

وإسناده جيد، فإن صهيب البصري أبو الصهباء مختلف فيه. فقال أبو زرعة: ثقة. وذكره ابن حبان في الثقات، وضعفه النسائي، وقد توبع متابعة قاصرة في رواية هذا الحديث.

والجَدْي - يفتح الجيم، وسكون الدال - ولد المَعْز.

وأما ما رواه أبو داود (709) من طريق شعبة فإنه لم يذكر الواسطة بين يحيى الجزار وابن عباس، ويحيى الجزار لم يسمع من ابن عباس ففيه انقطاع.

وكذلك ما رواه أحمد (1965) من طريق الحجاج، عن الحكم، عن يحيى بن الجزار، عن ابن عباس صلى النبي صلى الله عليه وسلم في فضاء ليس بين يديه شيءٌ.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 66):"رواه أحمد وأبو يعلى، وفيه الحجاج بن أرطأة، وفيه ضعف".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করছিলেন। তখন তাঁর সামনে দিয়ে একটি ছাগল অতিক্রম করছিল। তিনি ছাগলটিকে কিবলার দিকে সরাতে চেষ্টা করলেন, এমনকি তিনি তাঁর পেট কিবলার সাথে মিশিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2455)


2455 - عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جده قال: هبطنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من ثنية أذاخِر، فحضرت الصلاة - يعني فصلى إلى جدار - فاتخذه قبلةً، ونحن خلفه، فجاءتْ بَهْمةٌ تمر بين يديه. فما زال يُدارِيها حتى لصق بطْنَه بالجدار. ومرتْ من ورائه. أو كما قال مسدد.

حسن: رواه أبو داود (708) حدّثنا مسدد، حدّثنا عيسى بن يونس، حدّثنا هشام بن الغاز، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

والحديث رواه البيهقي (2/ 268) من طريق مسدد به مثله، إلا أنه لم يذكر، أو كما قال مسدد،
فعُرف منه أنه قول أبي داود قاله احتياطًا.

وإسناده حسن لأجل عمرو بن شعيب فإنه صدوق.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আযাখিরের গিরিপথ থেকে অবতরণ করছিলাম। অতঃপর সালাতের সময় হলো—অর্থাৎ তিনি একটি দেয়ালের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করলেন—তিনি সেটিকে কিবলা হিসেবে গ্রহণ করলেন এবং আমরা তাঁর পেছনে ছিলাম। তখন একটি বকরীর বাচ্চা তাঁর সামনে দিয়ে অতিক্রম করতে আসলো। তিনি সেটিকে (অতিক্রম করা থেকে) বিরত রাখার চেষ্টা করতে থাকলেন, এমনকি তাঁর পেট দেয়ালের সাথে মিশে গেল। আর সেটি তাঁর পেছনের দিক দিয়ে চলে গেল। অথবা মুসাদ্দাদ যেমন বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2456)


2456 - عن بُسْر بن سعيد، أن زيد بن خالد الجُهني أرسله إلى أبي جُهيم يسأله: ماذا سمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم في المارِّ بين يدي المُصَلِّي؟ فقال أبو جُهيم: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو يعلم المارُّ بين يدي المصلي ماذا عليه؟ لكان أن يقِفَ أربعين خيرًا له من أن يمرَّ بين يديه".

قال أبو النَّضْر: لا أدري: قال أربعين يومًا، أو شهرًا، أو سنةً؟ .

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (34) عن أبي النَّضْرِ مولى عمر بن عبد الله، عن بُسْر بن سعيد فذكر مثله.

ورواه البخاري في الصلاة (510) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الصلاة (507) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

وأبو جُهيم هو: ابن الحارث بن الصمة الأنصاري الصحابي.

والمرسل هو: زيد بن خالد الجهني.

والذي رواه سفيان بن عيينة، عن سالم أبي النضر، عن بسر بن سعيد قال: أرسلوني إلى زيد بن خالد فهو مقلوب. رواه ابن ماجه (944) عن هشام بن عمار، قال: حدّثنا سفيان بن عيينة، فذكر مثله.

وفيه قال سفيان:"فلا أدري أربعين سنة، أو شهرًا، أو صباحًا، أو ساعةً".

هكذا وقع الشك في تحديد المدة. ولكن رواه البزار في مسنده عن أحمد بن عبدة، ثنا سفيان، عن سالم أبي النضر، عن بُسْر بن سعيد قال: أرسلني أبو جُهَيم إلى زيد بن خالد أسأله عن المار بين يدي المُصَلِّي فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لو يعلم المار بين يدي المصلي ماذا عليه، لكان أن يقوم أربعين خريفًا خيرًا له من أن يمر بين يديه".

"نصب الراية" (2/ 79)، قال الشيخ: وفيه فائدتان:

إحداهما: قوله:"أربعين خريفًا".

والثانية: إن متنه عكس متن الصحيحين، فالمسؤول في لفظ الصحيحين هو: أبو الجُهيم، وهو الراوي عن النبي صلى الله عليه وسلم، والمسؤول الراوي عند البزار - زيد بن خالد. ونسب ابن القطان وابن عبد البر الوهم فيه إلى ابن عيينة، وأطال الكلام فيه.

قلت: وقد رواه ابن ماجه (945) أيضًا عن سفيان على الجادة، قال: حدّثنا علي بن محمد، قال: حدّثنا وكيع، عن سفيان، عن سالم أبي النضْر، عن بسر بن سعيد أن زيد بن خالد أرسل إلى
جُهيم الأنصاري يسأله: ما سمعت من النبي صلى الله عليه وسلم في الرجل الذي يمر بين يدي الرجل وهو يُصلي؟ فذكر مثله على الشك الذي سبق. وسفيان هذا: الغالب أنه ابن عيينة الذي في السند السابق.

إذًا الخطأ ليس من سفيان، وإنما من الذي قبله.

والذي رُوِي عن أبي هريرة مرفوعًا:"لو يعلم أحدكم ما له في أن يَمُرَّ بين يدي أخيه، معترضًا في الصلاة، كان لأنْ يُقِيم مائة عامٍ خير له من الخُطْوةِ التي خَطاها" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (946) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا وكيع، عن عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، عن عمه، عن أبي هريرة فذكر مثله.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (8837) ولكن وقع قلب في الإسناد، فرواه عن محمد بن عبد الله، يعني أبا أحمد الزبيري، قال: أخبرنا عبيد الله، يعني ابن عبد الله بن موْهَب، قال: أخبرني عمي عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، عن أبي هريرة فذكر مثله.

فالعم هو: عبيد الله بن عبد الله بن موهب، وابن أخيه هو: عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب.

وعبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب ليس بالقوي وعمه اسمه: عبيد الله بن عبد الله بن موهب مجهول وقال أحمد: أحاديثه مناكير، ومع هذا أخرجه ابن خزيمة (814)، وابن حبان (2365) في صحيحهما كلاهما من طريق عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب به مثله.

وصحّحه أيضًا المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 377) وحسنه السيوطي في"الجامع الصغير" (5/ 337) وهذا يدل على تساهلهم.

قال الترمذي بعد أن رواه من طريق مالك:"والعمل عليه عند أهل العلم. كَرِهوا المرور بين يدي المصلِّي، ولم يَرَوا أن ذلك يقطع صلاةَ الرجلِ" (2/ 160).




আবু জুহাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি সালাত আদায়কারীর সামনে দিয়ে অতিক্রমকারী ব্যক্তি জানতো যে তার কী (পাপ বা শাস্তি) রয়েছে, তবে তার সামনে দিয়ে অতিক্রম করার চেয়ে চল্লিশ [সময়] দাঁড়িয়ে থাকা তার জন্য উত্তম ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2457)


2457 - عن سهل بن سعد قال: كان بين مُصلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم وبين الجدار ممرُّ الشاة.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (496)، ومسلم في الصلاة (508) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد الساعدي فذكره.

وفي لفظ أبي داود (696):"وكان بين مقام النبي صلى الله عليه وسلم وبين القبلة ممرُّ عَنْزٍ".




সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের স্থান এবং দেয়ালের মাঝে একটি ছাগল যাওয়ার মতো পথ ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2458)


2458 - عن سهل بن أبي حَثْمة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"إذا صلى أحدكم إلى سترة فليدْنُ منها، لا يقطعُ الشيطانُ عليه صلاته".

صحيح: رواه أبو داود (695)، والنسائي (748) كلاهما من طريق سفيان، عن صفوان بن سُلَيم، عن نافع بن جبير، عن سهل بن أبي حثْمة فذكر مثله ولفظهما سواء، إلا أن أبا داود قال: يبلغ به النبي صلى الله عليه وسلم.
وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (803) وابن حبان (2373)، والحاكم (1/ 251)، وقال: صحيح على شرط الشيخين"، وأَعلَّه أبو داود فقال: رواه واقد بن محمد، عن صفوان، عن محمد بن سهل، عن أبيه، أو عن محمد بن سهل، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال بعضهم: عن نافع بن جبير، عن سهل بن سعد، واختلف في إسناده". انتهى.

وأسند البيهقي في روايات هؤلاء، ومنها ما تركها أبو داود وهي رواية داود بن قيس، عن نافع بن جبير مرسلًا ثم قال: قد أقام إسناده سفيان بن عيينة وهو حافظ حجة".

وبهذا نفى العلة التي أبداها أبو داود، وصحَّ الحديث.




সাহল ইবনু আবী হাসমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ সুতরার (আড়াল) দিকে মুখ করে সালাত আদায় করে, তখন সে যেন এর কাছাকাছি হয়ে যায়, যাতে শয়তান তার সালাতকে বিচ্ছিন্ন (নষ্ট) করতে না পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2459)


2459 - عن أبي جُحيفة قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم بالهاجِرة، فصلى بالبطحاء الظهرَ والعصرَ ركعتين، ونصب بين يديه عَنَزَةً. وتوضأ فجعل الناس يتمسَّحون بِوَضوئه.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (501) عن سليمان بن حرب، قال: حدّثنا شعبةُ، عن الحكم، عن أبي جحيفة فذكر مثله.

ورواه هو ومسلم (503) من أوجه أخرى وسبق تخريجه في الطهارة، باب استعمال فضل الوضوء.

وأما ما روي عن المطلب بن أبي وداعة قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا فَرَغَ من سبعة جاء حتى يحاذي بالركن، فصلَّى ركعتين في حاشية المطاف، وليس بينه وبين الطُّوَّاف أحد. فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2958) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا أبو أسامة، عن ابن جريج، عن كثير بن كثير بن المطلب بن أبي وداعة السَّهْمِي، عن أبيه، عن المطلب فذكر مثله.

قال ابن ماجه: هذا بمكة خاصة.

ورواه النسائي (2959)، وابن خزيمة (815) من طريق ابن جريج به مثله.

ورواه أبو داود (2016) عن أحمد بن حنبل، حدثنا سفيان بن عيينة، حدثني كثير بن كثير بن المطلب بن أبي وداعة، عن بعض أهله، عن جده أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي مما يلي باب بني سَهْم، والناس يمرون بين يديه، وليس بينهما سترةٌ.

قال سفيان: ليس بينه وبين الكعبة سترة.

قال سفيان: كان ابن جريج أخبرنا عنه قال: أخبرنا كثير عن أبيه، قال: فسألتُه فقال: ليس من أبي سمعتُه، ولكن من بعض أهلي، عن جدي. انتهى.

ففي الإسناد علل:

منها: أنه منقطع فإن كثير بن كثير لم يسمع من أبيه.

ومنها: أنه سمع من بعض أهله، وهم لا يعرفون.
ومنها: كثير بن المطلب بن أبي وداعه لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول"، أي: إذا توبع، ولكنه لم يتابع عليه.

وأشار إلى ضعف الحديث، في"الفتح" (1/ 576) بقوله:"رجاله موثقون إلا أنه معلول".

وعلى صحة الحديث فإنه لا يدل على عدم الحاجة إلى السترة في مكة لحمله على أن الطائفين كانوا يمرون وراء موضع السجود، أو وراء ما يقع فيه نظر الخاشع.

قال السندي في حاشية النسائي:"ومن لا يقول به يحمله على أن الطائفين كانوا يمرون وراء موضع السجود، أو وراء ما يقع فيه نظر الخاشع".

وبوَّب عليه ابن خزيمة بقول: باب ذكر الدليل على أن التغليظ في المرور بين يدي المصلى إذا كان المصلي يصلي إلى سترة، وإباحة المرور بين يدي المصلي إذا صلى إلى غير سترة. انتهى.

والبخاري رحمه الله تعالى استدل بحديث أبي جحيفة بأنه لا فرق بين مكة وغيرها في مشروعية السترة فإن لم يذكر في الباب غير حديث أبي جحيفة.

وكان ابن عمر يُصلي في مكة ولا يدع أحدًا يمر بين يديه ويقول يحيى بن أبي كثير: رأيتُ أنس بن مالك دخل المسجد الحرام، فركز شيئًا، أو هيأ شيئًا يصلي عليه. رواه ابن سعد (7/ 18) وغيره بإسناد صحيح.

قال الحافظ في الفتح:"المعروف عند الشافعية أن لا فرق في منع المرور بين يدي المصلي بين مكة وغيرها. واغْتَفَرَ بعض الفقهاء ذلك للطائفين للضرورة دون غيرهم، وعن الحنابلة جواز ذلك في جميع مكة".




আবু জ়ুহায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুপুর বেলায় (তীব্র গরমে) বের হলেন। অতঃপর তিনি বাতহা নামক স্থানে যোহর ও আসরের সালাত দুই দুই রাকাত করে আদায় করলেন এবং তাঁর সামনে একটি ছোট বর্শা (আনাহ) গেড়ে দিলেন। তিনি উযু করলেন, তখন লোকেরা তাঁর উযুর অবশিষ্ট পানি নিয়ে নিজেদের শরীরে মাখতে লাগল।









আল-জামি` আল-কামিল (2460)


2460 - عن * *




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