আল-জামি` আল-কামিল
2708 - عن أبي الدرداء قال:"أوصاني حبيبي بثلاث، لن أدعهن ما عشتُ: بصيام ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاة الضُّحى، وأن لا أنام حتى أوتر".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (722) عن هارون بن عبد الله ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا ابن أبي فُدَيك، عن الضحاك بن عثمان، عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنين، عن أبي مُرَّة مولى أمِّ هانئ، عن أبي الدرداء فذكره.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার বন্ধু (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি কাজের অসিয়ত (উপদেশ) করেছেন, আমি জীবিত থাকা পর্যন্ত সেগুলো কখনো ছাড়ব না: প্রতি মাসে তিন দিন সাওম পালন করা, চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় না করা পর্যন্ত না ঘুমানো।
2709 - عن أبي ذر قال:"أوصاني حبيبي صلى الله عليه وسلم بثلاثة لا أدعُهن إن شاء الله تعالى أبدًا. أوصاني بصلاة الضُّحى، وبالوتر قبل النوم، وبصيام ثلاثة أيام من كل شهر".
صحيح: رواه النسائي (2404) عن علي بن حجر، قال: حدثنا إسماعيل، حدثنا محمد بن أبي حرملة، عن عطاء بن يسار، عن أبي ذرٍّ فذكره.
إسناده صحيح، وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (1083)، فرواه عن علي بن حجر السعدي، والإمام أحمد (21518) عن سليمان بن داود الهاشمي، كلاهما عن إسماعيل به مثله.
وإسماعيل هو: ابن جعفر بن أبي كثير الأنصاري الزُّرَقي من رجال الجماعة.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ের জন্য উপদেশ দিয়েছেন, আল্লাহর ইচ্ছায় আমি সেগুলো কখনো ছাড়ব না। তিনি আমাকে সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামাজ) আদায় করতে, ঘুমের পূর্বে বিতর সালাত আদায় করতে এবং প্রতি মাসে তিন দিন রোজা রাখতে উপদেশ দিয়েছেন।
2710 - عن أبي سعيد الخدري أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"مَن أدرك الصبحَ فلم يوتر فَلا وِتْر له".
صحيح: أخرجه ابن خزيمة (1092)، وابن حبان (2408)، والحاكم (1/ 301، 302) كلهم من طريق هشام، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد .. فذكره.
وصحّحه الحاكم على شرط مسلم.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সকাল করেছে, অথচ বিতর সালাত আদায় করেনি, তার বিতর সালাত নেই।”
2711 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بادروا الصُبح بالوتر".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (750) من طريق ابن أبي زائدة، أخبرني عاصم الأحول، عن عبد الله بن شقيق، عن ابن عمر فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ভোর হওয়ার আগেই বিতর সালাত আদায় করে নাও।"
2712 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا طلع الفجر، فقد ذهب كلُّ صلاة الليل والوتر، فأوتروا قبل طلوع الفجر".
حسن: رواه الترمذي (469) عن محمود بن غيلان، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
قال النووي في الخلاصة (1906):"رواه الترمذي بإسناد صحيح".
وقال الترمذي:"سليمان بن موسى قد تفرد به على هذا اللفظ، ورُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم:"لا وتر بعد صلاة الصبح".
قلت: سليمان بن موسى هو: الأموي مولاهم، الدمشقي الأشدق، وثَّقه الدارمي وابن سعد، وتكلم فيه البخاري والنسائي، والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق فقيه، في حديثه بعض لين، وخلط قبل موته بقليل" فتصحيح النووي له فيه نظر، وأكثر أحواله أنه حسن لأجل سليمان بن موسى ولعل من تخليطه رواه مرَّةً مرفوعا، وأخرى موقوفًا.
فقد رواه الحاكم (1/ 302)، والبيهقي (2/ 478) كلاهما من طريق حجاج بن محمد قال: قال ابن جريج، أخبرني سليمان بن موسى، ثنا نافع أن ابن عمر كان يقول: من صلَّى من اللَّيل فليجعل آخر صلاته وِترًا، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بذلك، فإذا كان الفجرُ فقد ذهب صلاةُ اللَّيلِ والوِترُ، لأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أوتروا قبل الفجر".
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: وليس كما قال، فإنَّ ابن جريج وإن صرَّح بالإخبار، فانتفت عنه تُهمة التدليس. ولكن آفته سليمان بن موسى، فإمَّا أنه اختلط عليه، أو أنَّه سمع ابن عمر هكذا مرَّة يرويه مرفوعًا، وأخرى موقوفًا مستنبطًا من قول النبي صلى الله عليه وسلم فهو موافق لما رواه مسلم"وبادروا الصبح بالوتر".
وأما قول الترمذي وروي عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم:"لا وِتر بعد صلاة الصبح" فهو ضعيفٌ جدًّا، رواه ابن نصر في كتاب الوتر (69) وعبد الرزاق (4591) كلاهما من طريق أبي هارون العبدي، عن أبي سعيد الخدري قال: نادى منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا وتر بعد الفجر"، وأبو هارون العبدي هو: عُمارة بن جُوَين، أصحاب الحديث لا يحتجون بروايته، وهو ضعيف جدًّا، وقد رَموه بالكذب.
قال ابن نصر:"هذا حديثٌ لو ثبت لكان حجَّةً لا يجوز مخالفته غير أن أصحاب الحديث لا يحتجون برواية أبي هارون العبدي".
وهو كذلك فإن أبا هارون العبدي ضعيف جدًّا. ولكن ثبت من حديث أبي سعيد الخدري أنه"من أدركه الصبح ولم يوتر فلا وتر له" وهو حديث صحيح، فيحمل هذا على من تعمد ترك الوتر حتى أدركه الصبح.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন ফজর উদিত হয়, তখন রাতের সকল সালাত ও বিতর আদায়ের সময় শেষ হয়ে যায়। অতএব, তোমরা ফজর উদিত হওয়ার আগেই বিতর আদায় করে নাও।"
2713 - عن وعن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من نام عن وتره، أو نسيه فليصله إذا أصبح أو ذكره".
صحيح: رواه أبو داود (1431) عن محمد بن عوف، حدثنا عثمان بن سعيد، عن أبي غسان محمد بن مطرف المدني، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد فذكره. وإسناده صحيح.
وأخرجه الحاكم (1/ 302)، وعنه البيهقي (2/ 480) من وجه آخر عن عثمان بن سعيد (بن كثير بن دينار) عن أبي غسان به مثله.
قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين".
قلت: هذا الإسناد أصح ما روي به هذا الحديث.
وله أسانيد أخرى ضعيفة منها ما رواه الترمذي (465)، وابن ماجه (1188) كلاهما من حديث
عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، به مثله.
وعبد الرحمن بن زيد ضعيف، أهل الحديث لا يحتجون به.
إلى هذا أشار محمد بن يحيى، ولكن لا تعارض بين الحديثين فحديث أبي سعيد الأول"أوتروا قبل أن تصبحوا" يدل على أن وقت صلاة الوتر ينتهي بطلوع الفجر، فمن تعمد، ولم يوتر قبل طلوع الفجر فلا وتر له، والحديث الثاني يدل على أنَّ من نام عن وتره، أو نسيه فليصلها إذا ذكرها، أي: قضاءً؛ لأنَّ وقته قد خرج وعليه يحمل حديث ابن عمر السابق وإذا كان عبد الرحمن بن زيد بن أسلم واه، فله إسناد آخر صحيح كما سبق.
قال محمد بن نصر بعد أن روى حديث أبي سعيد:"والذي ذهب إليه جماعة من أصحابنا أن من طلع عليه الفجر، ولم يوتر، فإنه يوتر ما لم يُصلِّ الغداةَ اتِّباعًا للأخبار التي رُوِيت عن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أنَّهم أوتروا بعد الصبح، وقد رُويَ عن النبي صلى الله عليه وسلم أيضًا أنه أوتَرَ بعد ما أصبح، فإذا صلَّى الغداةَ. فإن جماعة من أصحابنا قالوا: لا يقضي الوتر بعد ذلك، وقد رُويَ ذلك عن جماعة من المتقدِّمين أيضًا إلى هذا ذهب الشافعي وأحمد وإسحاق وغيرهم من أصحابنا"."كتاب الوتر" (ص 156).
وقال أيضًا:"والذي أقول به أنه يُصلي الوتر ما لم يُصل الغداة. فإذا صلَّى الغداة فليس عليه أن يقضيه بعد ذلك، وإن قضاه على ما يقضي التطوع فحسن. قد صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الركعتين قبل الفجر بعد طلوع الشمس في الليلة التي نام فيها عن صلاة الغداة حتى طلعت الشمس، وقضى الركعتين اللتين كان يُصليهما بعد الظهر بعد العصر في اليوم الذي شُغل فيه عنهما. وقد كانوا يقضون صلاة الليل - إذا فاتتهم بالليل - نهارًا فذلك حسن، وليس بواجب"،"كتاب الوتر" (164).
وأما ما رُوي عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصبح فيوتر، ففيه أبو نَهيك مختلف في توثيقه فجهله ابن عبد البر ووثقه غيره، كما أن فيه انقطاعا فإنه لم يثبت سماعه عن عائشة.
رواه الإمام أحمد (26058)، والطبراني في"الأوسط" (2153)، والبيهقي (2/ 479) كلهم من طريق ابن جريج قال: أخبرني زياد (وهو ابن سعد الخراساني) أن أبا نَهيك أخبره أن أبا الدرداء كان يخطب الناسَ أن لا وتر لمنْ أدرك الصبحَ فانطلق رجال من المؤمنين إلى عائشة، فأخبروها، فقالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصبح فيوتر. انتهى.
ورواه البيهقي أيضًا من حديث حاتم بن سالم البصري، ثنا عبد الوارث بن سعيد، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء قال: ربما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يُوتر، وقد قام الناس لصلاة الصبح.
قال البيهقي: تفرد به حاتم بن سالم البصري، ويقال له الأعرجي، وحديث ابن جريج أصح من ذلك.
ورواه أيضًا بإسناده عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم أصبح فأوتر. قال: كذا وجدتُه في الفوائد الكبير.
ثم رواه عن أبي مجلز قال: أصبح ابن عمر، ولم يوتر، أو كان يُصبح ثم أوتر. وهذا أشبه. انتهى. يعني الموقوف أصح.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার বিতর সালাত আদায় না করে ঘুমিয়ে গেল অথবা ভুলে গেল, সে যেন সকালে উঠে অথবা যখন তার মনে পড়ে তখন তা আদায় করে নেয়।"
2714 - عن أبي سلمة قال: سألت عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت:"كان يُصلي ثلاث عشرة ركعة. يُصلي ثمان ركعات، ثم يُوتر، ثم يصلي ركعتين وهو جالس، فإذا أراد أن يركع قام فركع".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738/ 126) عن محمد بن المثنى، حدثنا ابن أبي عدي، حدثنا هشام، عن يحيى، عن أبي سلمة فذكره.
وأما ما روي عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي بعد الوتر ركعتين وهو جالس. فالصّواب فيه أنه من فعل أم سلمة نفسها، كما قال العقيلي في الضعفاء.
والحديث رواه الترمذي (471)، وابن ماجه (1195) كلاهما عن محمد بن بشار، حدثنا حماد بن مسعدة، قال: حدثنا ميمون بن موسى المرئي، عن الحسن، عن أمه، عن أم سلمة فذكرته.
وميمون بن موسى تكلم فيه النسائي وأبو أحمد الحاكم، وقال الساجي: كان يدلس وقال ابن حبان: منكر الحديث يروي عن الثقات ما لا يشبه حديث الإثبات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد.
ومشّاه أبو حاتم وأبو داود.
كما أن فيه الحسن وهو مدلس وقد عنعن، وأمه اسمها:"خيرة" وهي مولاة أم سلمة. ذكرها ابن حبان في الثقات ووثَّقها ابن حزم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি বললেন: তিনি তেরো রাকআত সালাত আদায় করতেন। তিনি আট রাকআত সালাত আদায় করতেন, তারপর বিতর পড়তেন। এরপর তিনি বসে দু’রাকআত সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি রুকু করতে চাইতেন, তখন তিনি উঠে দাঁড়াতেন এবং রুকু করতেন।
2715 - عن أبي أمامة كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُوتر بِتِسع حتَّى إذا بَدُن وكَثُر لحمُه أوتر بسبعٍ، وصلَّى ركعتين وهو جالس، يقرأ فيهما: {إِذَا زُلْزِلَتِ} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ}.
حسن: رواه أحمد (22313)، والطبراني في الكبير (8/ 332)، والبيهقي (3/ 33)، ومحمد بن نصر في كتاب الوتر (55) كلهم من طريق عُمارة بن زاذان، ثنا أبو غالب، عن أبي أمامة فذكره.
ورواه الإمام أحمد (22246)، والطبراني، والبيهقي (8/ 332) كلهم من طريق عبد الصمد، يعني ابن عبد الوارث، ثنا أبي، عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أبي غالب، عن أبي أُمامة فذكرهُ مختصرًا وهو قوله:"كان يُصلِّي ركعتين بعد الوتر، وهو جالس يقرأ فيهما ....".
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 241):"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد ثقات".
قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي غالب غير أنه حسن الحديث.
وعمارة بن زاذان فيه كلام يسير إلا أنه توبع؛ ولذا قد يكون وهم في رواية هذا الحديث عن ثابت،
عن أنس، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يوتر بتسع ركعات، فلما أسنَّ وثقل أوتر بسبع، وصلى ركعتين وهو جالس يقرأ فيهنّ بالرحمن والواقعة. قال أنس: ونحن نقرأ بالسور القصار {إِذَا زُلْزِلَتِ} [الزلزلة: 1]، و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} [الكافرون: 1] ونحوهما.
رواه ابن خزيمة (1079) من طريقين عن عمارة بن زاذان، عن ثابت، به. فإنه لم يتابع على هذه الرواية.
ولذا قال البيهقي (3/ 33):"وخالف عمارة بن زاذان في قراءة النبي صلى الله عليه وسلم فيهما سائر الرواة" ونقل عن البخاري أنه قال: عمارة بن زاذان ربما يضطرب في حديثه.
وقد رُوي أيضًا عن أنس بن مالك، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي ركعتين بعد الوتر وهو جالس ويقرأ في الركعة الأولى بأمّ القرآن، و {إِذَا زُلْزِلَتِ}، وفي الثانية: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ}. رواه البيهقي (3/ 33) وغيره عن بقية بن الوليد، عن عتبة بن أبي حكيم، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
وبقية بن الوليد مدلّس وقد عنعن، وعتبة بن أبي حكيم ضعيف. وأعلّه البيهقيّ بعتبة بن أبي حكيم، وأبي غالب الذي في حديث أبي أمامة.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় রাকাত দ্বারা বিতর পড়তেন। অবশেষে যখন তিনি স্থূল হয়ে গেলেন এবং তাঁর গোশত বৃদ্ধি পেল, তখন তিনি সাত রাকাত দ্বারা বিতর পড়লেন। আর তিনি বসে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন এবং তাতে তিনি {ইযা যুলযিলাত} ও {কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} সূরাদ্বয় পাঠ করতেন।
2716 - عن ثوبان قال: كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر فقال:"إن هذا السفر جهد وثقل، فإذا أوتر أحدكم فليركع ركعتين، فإن استيقظ وإلّا كانتا له".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (2/ 87)، والبزار"كشف الأستار" (692) كلاهما من حديث عبد الله بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير، عن أبيه، عن ثوبان فذكره.
وعزاه الهيثمي في"المجمع" (2/ 163) إلى البزار وحده، وهو تقصير منه، ثم عزاه مرَّةً أخرى (2/ 246) إلى الكبر والأوسط ولم يعز إلى البزار وفيه تقصير أيضًا، وقال في الموضعين:"فيه عبد الله بن صالح كاتب الليث، واختلف في الاحتجاج به"، وقال في الموضع الثاني:"وفيه كلام".
قلت: وهو كما قال، ولكنه توبع، فقد رواه الدارمي (1601)، وابن خزيمة (1106)، وابن حبان (2577) كلهم من طريق عبد الله بن وهب، عن معاوية بن صالح، عن شريح بن عيد، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، به مثله.
ولكن سقط في صحيح ابن حبان"عن أبيه" بين عبد الرحمن بن جبر وين ثوبان، وهو لابد منه كما في المصادر الأخرى.
وكذلك اختلف لفظ الدارمي من قوله:"هذا السفر" إلى"هذا السهر" وأَعتقد أنه أيضًا خطأ.
وبهذه المتابعة ارتفع الحديث إلى درجةِ الصحيح لغيره.
وفي الحديث دليل على أن أداء الركعتين بعد الوتر لا كراهية فيه.
قال ابن خُزيمة:"إن الصلاة بعد الوتر مباحة لجميع من يريد الصلاة بعده، وأن الركعتين اللتين كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصليهما بعد الوتر لم يكونا خاصة للنبي صلى الله عليه وسلم دون أمته؛ إذ النبي صلى الله عليه وسلم قد أمرنا
بالركعتين بعد الوتر، أمر ندب وفضيلة، لا أمر إيجاب وفريضة". انتهى.
وقيَّده ابن حبان للمسافر الذي يخاف أن لا يستيقظ للتهجد، ولكن هل هذا كان من دأب رسول الله صلى الله عليه وسلم فيرى النووي رحمه الله تعالى أنه لم يكن من دأبه صلى الله عليه وسلم أداء الركعتين بعد الوتر، وإنما فعل مرة أو مرتين لبيان الجواز للأحاديث المشهورة:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا".
ويرى محمد بن نصر أن قوله:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" اختيارًا لا إيجابًا، لأن ابن عمر هو الراوي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" وهو الذي كان يشفع وتره. وروي عنه أنه سئل عمن قام من الليل وقد أوتر قبل أن ينام فصلَّى مثنى مثنى، ولم يشفع وتره. فقال: ذلك حسن جميل، فدل فتياه أنه رأى قوله:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" اختيارًا لا إيجابًا.
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে এক সফরে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় এই সফর কষ্ট ও শ্রমসাধ্য। সুতরাং যখন তোমাদের কেউ বিতর সালাত আদায় করে, তখন সে যেন দুই রাকাত সালাত আদায় করে নেয়। যদি সে (রাতে তাহাজ্জুদের জন্য) জেগে ওঠে (তবে সে আরও সালাত আদায় করতে পারে), অন্যথায় এই দুই রাকাতই তার জন্য (আমলে যুক্ত হবে)।"
2717 - عن أنس بن سيرين قال: سألت ابن عمر؛ قلت: أرأيت الركعتين قبل صلاة الغداة أطيل فيهما القراءة؟ فقال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل مثنى مثنى، ويوتر بركعةٍ، ويُصلي الركعتين قبل صلاة الغداة. وكأن الأذانَ بأُذُنَيه".
متفق عليه: رواه البخاري في صلاة الوتر (995)، ومسلم في صلاة المسافرين (749/ 157) كلاهما من حديث حماد بن زيد، قال: حدثنا أنس بن سيرين فذكره، واللفظ للبخاري، وسبق لفظ مسلم وهو قريب منه مع بعض الزيادات.
وقوله:"كأن الأذان بأُذُنَيه" قال حماد: أي بسرعة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি বললাম: ফাজরের (ভোরের) সালাতের আগের দু’রাকাআত সম্পর্কে আপনার কী ধারণা? আমি কি তাতে কিরাআত দীর্ঘায়িত করব? তখন তিনি বললেন: "নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) রাতে দু’ দু’ রাকাআত করে সালাত আদায় করতেন, আর এক রাকাআত দ্বারা বিতর পড়তেন, আর তিনি ফাজরের সালাতের আগের দু’রাকাআত সালাত আদায় করতেন। আর যেন আযান তাঁর কানে ছিল।"
2718 - عن ابن عمر أن رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صلاة الليل فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الليل مثنى مثنى. فإذا خشي أحدكم الصبح فصلى ركعة واحدة توتر له ما قد صلَّى".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (13) عن نافع وعبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه البخاري في الوتر (990) ومسلم في صلاة المسافرين (749) كلاهما من طريق مالك به.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাতের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “রাতের সালাত হলো দু’দু’রাকাত করে (আদায় করা)। এরপর তোমাদের কেউ যদি সকাল (ফজরের ওয়াক্ত) হয়ে যাওয়ার ভয় করে, তবে সে যেন এক রাকাত সালাত আদায় করে নেয়, যা তার ইতোপূর্বে আদায়কৃত সালাতকে বেজোড় (বিতর) করে দেবে।”
2719 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الوتر ركعة من آخر الليل".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (752) عن شيبان بن فَرُّوخ، حدثنا عبد الوارث، عن أبي التيَّاح، قال: حدثني أبو مِجْلَز، عن ابن عمر فذكره.
ورواه أيضًا شعبة، عن قتادة، عن أبي مِجْلَز به مثله.
وأوتر معاوية بعد العشاء بركعة، وعنده مولى لابنِ عباسٍ. فأتى ابن عباس فقال: دعه فإنه صحب رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وفي رواية: قيل لابن عباس: هل لك في أمير المؤمنين معاوية، فإنه ما أوتر إلا بواحدة. قال:
إنه فقيه.
رواه البخاري في فضائل أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم (3764، 3765) من طريقين عن ابن أبي مليكة، قال: أوتر معاوية فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিতর হলো রাতের শেষভাগে এক রাকাত।"
আর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইশার পর এক রাকাত বিতর আদায় করলেন, যখন তাঁর নিকট ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত গোলাম উপস্থিত ছিল। সে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে (এ বিষয়ে) বলল। তিনি বললেন: তাকে (তার মতো) থাকতে দাও, কেননা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছেন।
অন্য এক বর্ণনায় (ইবনু আব্বাসকে) জিজ্ঞেস করা হলো: আমীরুল মু'মিনীন মু'আবিয়া সম্পর্কে আপনার কী অভিমত? তিনি তো কেবল এক রাকাতই বিতর আদায় করেন। তিনি বললেন: তিনি একজন ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ)।
2720 - عن أبي مِجْلَز قال: سألت ابن عباس عن الوتر، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ركعةٌ من آخر اللَّيل" وسألت ابن عمر فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ركعة من آخر الليل".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (753) عن زهير بن حرب، حدثنا عبد الصمد، حدثنا همام، حدثنا قتادة، عن أبي مِجْلَز فذكره.
আবূ মিজলায থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিতর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "রাতের শেষাংশে এক রাকাত।" আর আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনিও বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "রাতের শেষাংশে এক রাকাত।"
2721 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي من الليل إحدى عشرة ركعة، يوتر منها بواحدة، فإذا فرغ اضطجع على شقه الأيمن.
صحيح: رواه مالك في صلاة الليل (8) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (736) عن يحيى بن يحيى، عن مالك به مثله وزاد في آخر الحديث:"حتى يأتيه المؤذِّن فيصلي ركعتين خفيفتين".
ورواه أيضًا من طريق عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب به وفيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي فيما بين أن يفرغ من صلاة العشاء إلى الفجر؛ إحدى عشر ركعة. يُسلم بين كل ركعتين، ويوتر بواحدةٍ …
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী ছিলেন, থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে এক রাকাতে তিনি বিতর পড়তেন। যখন তিনি (সালাত) শেষ করতেন, তখন তিনি তাঁর ডান কাত হয়ে শুয়ে পড়তেন।
(সহীহ মুসলিমের একটি বর্ণনায় এর সাথে অতিরিক্ত রয়েছে যে) অবশেষে মুয়াজ্জিন তাঁর নিকট আসা পর্যন্ত (তিনি বিশ্রাম নিতেন), অতঃপর তিনি হালকা দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।
(অপর একটি বর্ণনায় এসেছে): রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত শেষ করার পর থেকে ফজর পর্যন্ত এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি প্রতি দুই রাকাতের পর সালাম ফেরাতেন এবং এক রাকাতে বিতর পড়তেন...
2722 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سأل عائشة: كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضانَ؟ قالت: ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزيد في رمضانَ، ولا في غيره على إحدى عشرة ركعةً، يُصلِّي أربعًا فلا تسأل عن حُسنِهن وطُولِهِن، ثم يُصلِّي أربعًا فلا تسأل عن حُسنِهنَّ وطُولِهِنَّ، ثمَّ يُصَلِّي ثلاثًا.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف فذكره.
ورواه البخاري في التهجد (1147)، ومسلم في صلاة المسافرين (738) كلاهما من طريق مالك به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আবূ সালামাহ ইবনু আবদির রহমান জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমযান মাসে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে কিংবা অন্য মাসে এগারো রাকআতের বেশি সালাত আদায় করতেন না। তিনি চার রাকআত সালাত আদায় করতেন— তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো না। এরপর তিনি আরও চার রাকআত সালাত আদায় করতেন— তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকআত সালাত আদায় করতেন।
2723 - عن أبي بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الوتر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} وفي الركعة الثانية بـ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} وفي الثالثة بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} ولا يسلم إلا في آخرهن، ويقول: يعني بعد التسليم:"سبحان الملك القدوس ثلاثًا".
صحيح: رواه النسائي (1701) عن يحيى بن موسى قال: أنبأنا عبد العزيز بن خالد، قال: حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن عزْرة، عن سعيد بن عبد الرحمن بن أَبْزَى، عن أبيه، عن أبَيِّ بن كعب فذكره. وإسناده صحيح.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিতরের সালাতে (প্রথম রাকাআতে) {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা}, দ্বিতীয় রাকাআতে {কুল ইয়া-আইয়ুহাল কা-ফিরূন} এবং তৃতীয় রাকাআতে {কুল হুওয়াল্লা-হু আহাদ} পাঠ করতেন। আর তিনি শেষেই কেবল সালাম ফিরাতেন। তিনি বলতেন—অর্থাৎ সালাম ফিরানোর পর: "সুবহা-নাল মালিকিল কুদ্দূস" (পবিত্র সত্তা, যিনি বাদশাহ এবং অতি পবিত্র)—তিনবার।
2724 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلِّي من اللَّيل ثلاث عشرة ركعة، يُوتر من ذلك بخمس، ولا يجلس في شيء إلا في آخرها.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (737) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وزاد الترمذي (459): فإذا أذن المؤذن قام فصلى ركعتين خفيفتين.
ورواه النسائي (1717) من وجه آخر عن هشام واختصر على قولها:"كان يوتر بخمس ولا يجلس إلا في آخرهن".
قال الترمذي: رأى بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم الوتر بخمس، وقالوا: لا يجلس في شيء مِنهنَّ إلَّا في آخرهِنَّ. وقال: وسألت أبا مصعب المديني عن هذا الحديث فقلت: كيف كان النبي صلى الله عليه وسلم يوتر بالتسع والسبع؟ قال: يُصلي مثنى مثنى، ويُسلم، ويوتر بواحدة" انتهى.
قلت: هذا التفسير مُخالفٌ لما قالته عائشة: ولا يجلس في شيء إلا في آخرها.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি পাঁচ রাকাতের মাধ্যমে বিতর আদায় করতেন, এবং এর মধ্যে তিনি শেষ রাকাতটি ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না।
সহীহ (সহিহ): মুসলিম (কিতাবুস সালাত আল-মুসাফিরীন, ৭৩৭) হিশাম ইবন উরওয়া, তাঁর পিতা, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে একাধিক সনদে এটি বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী (৪৫৯) অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: যখন মুয়াযযিন আযান দিতেন, তখন তিনি দাঁড়িয়ে দু’রাকাত সংক্ষিপ্ত সালাত আদায় করতেন।
নাসাঈও (১৭১৭) হিশামের সূত্রে ভিন্ন সনদে বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর এই কথাটি উল্লেখ করে সংক্ষেপ করেছেন: “তিনি পাঁচ রাকাতের মাধ্যমে বিতর করতেন এবং শেষটি ছাড়া বসতেন না।”
ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবীসহ অন্যান্য আহলুল ইলম (আলেমগণ) পাঁচ রাকাত বিতরের পক্ষে মত দিয়েছেন এবং বলেছেন যে, এই রাকাতগুলোর মধ্যে শেষটি ছাড়া অন্য কোথাও বসা যাবে না। তিনি আরো বলেন: আমি আবূ মুস’আব আল-মাদীনীকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিভাবে সাত ও নয় রাকাতের মাধ্যমে বিতর করতেন? তিনি বললেন: তিনি দুই-দুই রাকাত করে সালাত আদায় করতেন এবং সালাম ফিরাতেন, এরপর এক রাকাত দিয়ে বিতর করতেন। সমাপ্ত।
আমি (সংকলক) বলি: এই ব্যাখ্যাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য: 'শেষটি ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না'—এর বিরোধী।
2725 - عن عائشة كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي ثمان ركعات لا يجلس فيهن إلا عند الثامنة، فيجلس ويذكر ربه عز وجل، ويدعو ويستغفر، ثم ينهض ولا يُسَلِّم، ثم يصلِّي التاسعة، فيقعد فيحمد ربَّه ويذكره ويدعوه، ثمَّ يُسلّم تسليمًا يُسمعنا.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من حديث قتادة، عن زُرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام بن عامر، عن عائشة في حديث طويل سبق ذكره كاملًا في جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আট রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি এর মধ্যে কেবল অষ্টম রাকাআতের সময় বসতেন। তখন তিনি বসে তাঁর রব আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লা-এর যিকির করতেন, দু'আ করতেন এবং ক্ষমা প্রার্থনা করতেন। এরপর তিনি দাঁড়িয়ে যেতেন এবং সালাম ফেরাতেন না। অতঃপর তিনি নবম রাকাআত আদায় করতেন। তখন তিনি বসে তাঁর রবের প্রশংসা করতেন, তাঁকে স্মরণ করতেন এবং তাঁর কাছে দু'আ করতেন। এরপর এমনভাবে সালাম ফেরাতেন যা আমরা শুনতে পেতাম।
2726 - عن أم سلمة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر بثلاث عشرة ركعة، فلما كبر وضعف أوتر بسبع.
حسن: رواه الترمذي (457)، والنسائي (1709) كلاهما من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرَّة، عن يحيى بن الجزار، عن أمِّ سلمة فذكرته.
قال الترمذي:"حديث حسن".
قلت: وهو كذلك فإن يحيى بن الجزار العرني كما سبق"صدوق"، ورواه الحاكم (1/ 306) من هذا الوجه وقال: صحيح على شرط الشيخين.
وهذا وهم منه فإن يحيى بن الجزار روي له مسلم وحده وقد سبق قول الدارقطني بأن حديث عائشة أشبه بالصّواب من حديث أمِّ سلمة.
قلت: ولكن لا يمنع هذا من صحة الحديثين، وإن كان حديث عائشة أصح لأن أبا معاوية وهو: محمد بن خازم ثقة، حافظ، وأحفظ الناس لحديث الأعمش فلا يُضعف لمخالفة غيره.
ثم قال الترمذي:"وقد رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم الوتر بثلاث عشرة، وإحدى عشرة، وتسع، وسبع، وخمس، وثلاث، وواحدة". ثم قال: قال إسحاق بن إبراهيم:"معني ما رُوي أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُوتر بثلاث عشرة قال: معناه أنه كان يصلي من الليل ثلاث عشرة ركعة مع الوتر، فنُسبت صلاة الليل إلى الوتر. واحتج بما رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"أوتروا يا أهل القرآن" قال: إنما عني به قيام اللَّيل، يقول: إنما قِيام اللَّيل على أصحاب القرآن". انتهى
قلت: وليس قوله هذا يُحمل على الإطلاق فقد ثبت أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلى الوتر من واحدة إلى سبع بتسليم واحد، وقال محمد بن نصر في"كتاب الوتر": الأمر عندنا أنَّ الوتر بواحدة وبثلاث وخمس وسبع وتسع، كل ذلك جائز حسن على ما روينا من الأخبار عن النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه من بعده. وقال سفيان: إن شئت أوترت بخمس، وإن شئت أوترت بثلاث، وإن شئت أوترت بركعة، وقال محمد بن سيرين:"كانوا يوترون بخمس، وبثلاث، وبركعة، ويرون كل ذلك حسنًا". انتهى
উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তেরো রাকাত বিতর সালাত আদায় করতেন, কিন্তু যখন তিনি বৃদ্ধ হলেন এবং দুর্বল হয়ে পড়লেন, তখন তিনি সাত রাকাত বিতর আদায় করতেন।
2727 - عن عبد الله بن أبي قيس قال: قلتُ لعائشة: بكم كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر؟ قالت: كان يُوتر بأربع وثلاث، وست وثلاث، وثمان وثلاث، وعشر وثلاث، ولم يكن يُوتر بأنقص من سبع، ولا بأكثر من ثلاث عشرة.
صحيح: رواه أبو داود (1362) عن أحمد بن صالح ومحمد بن سلمة المرادي، قالا: حدثنا ابن وهب، عن معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قيس فذكره.
قال أبو داود:"زاد أحمد بن صالح: ولم يكن يُوتر بركعتين قبل الفجر. قلت: ما يُوتر؟ قالت: لم يكن يدع ذلك. ولم يذكر أحمد (هو ابن صالح): و"ست وثلاث". انتهى
قلت: إسناده صحيح.
ورواه الإمام أحمد (25159) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية به، وفيه: وكان لا يدعُ ركعتين.
قال البيهقي:"وهذا يحتمل أن يريد به ثلاث لا يفصل بينهن بجلوس ولا تسليم، فيكون في معني رواية هشام بن عروة""السنن الكبرى" (3/ 28).
وهو يقصد به ما رواه مسلم من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسول الله
- صلى الله عليه وسلم يصلي ثلاث عشرة ركعة، يوتر منها بخمس، ولا يجلس في شيء منها حتى يجلس في آخرهن فيسلم. وسبق ذكره.
وقلت: ويحتمل أن تكون أرادت بثلاث مع أربع، وثلاث مع ست، وثلاث مع ثمان … الثلاث بتسليمتين الاثنتان خفيفتان، ثم ركعة، وما قبلها أربع، أو ست، أو ثمان طويلة لقولها: فلا تسأل عن حسنهن وطولهن.
وقد يكون المراد بالثلاث بالجلسة والتسليم في آخرهن، كما جاء في بعض طرق حديث سعد بن هشام بن عامر الطويل المذكور في باب جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل بأنه صلى الله عليه وسلم ما كان يُسلم في ركعتي الوتر. إلا أني تتبعتُ طرق حديث سعد بن هشام بن عامر فلم أجد في حديثه أنه أوتر بثلاث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আবী কায়স বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কত রাকাত বেজোড় (বিতর) সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি চার রাকাত ও তিন রাকাত, ছয় রাকাত ও তিন রাকাত, আট রাকাত ও তিন রাকাত এবং দশ রাকাত ও তিন রাকাতের মাধ্যমে বিতর পড়তেন। আর তিনি সাত রাকাতের কম এবং তেরো রাকাতের বেশি বিতর পড়তেন না।
