হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3268)


3268 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تعدُّون الرقوب فيكم؟". قالوا: الذي لا ولد له. قال:"بل، هو الذي لا فرط له".

حسن: رواه البزار (860 - كشف الأستار) عن إبراهيم بن المستمر العروفي، ثنا يعقوب بن إسحاق، ثنا همام، عن قتادة، عن أنس، فذكر مثله. وإسناده حسن من أجل يعقوب بن إسحاق، وهو ابن زيد بن عبد الله الحضرمي مولاهم، أبو محمد النحوي المقرئ من رجال مسلم، قال فيه أبو حاتم:"صدوق". وذكره ابن حبان في"الثقات". وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 11):"رواه أبو يعلى والبزَّار باختصار، ورجال البزار رجال الصحيح.
ورواه أبو يعلى (446 - المقصد العلي) من وجه آخر عن رُشيد أبي عبد الله، ثنا ثابت، عن أنسٍ، فذكر نحوه.

ورشيد الزُّرْبري، مجهول كما قال الذهبي في"الميزان" (2/ 51)، ولذا لم يُصحِّح الهيثمي هذا الإسناد؛ وإنَّما اكتفى بقوله كما ذكرتُ، وإن كان عزاه إلى أبي يعلى.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমাদের মধ্যে তোমরা 'আর-রাকূব' কাকে মনে করো?" তারা বললো, "যার কোনো সন্তান নেই।" তিনি বললেন, "বরং সে হলো সেই ব্যক্তি, যার কোনো 'ফারত' (অগ্রগামী মৃত শিশু) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3269)


3269 - عن أنس بن مالك، قال: مرَّ النبي صلى الله عليه وسلم بامرأة تبكي عند قبر، فقال:"اتقي الله واصبري". قالت: إليك عني، فإنَّك لم تُصب بمصيبتي. ولم تعرفه. فقيل لها: إنَّه رسول الله صلى الله عليه وسلم. فأتت النبيَّ صلى الله عليه وسلم فلم تجد عنده بوَّابين، فقالت: لم أعرفكَ. فقال:"إنَّما الصبر عند الصدمة الأولى".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1283) ومسلم في الجنائز (926) كلاهما من حديث شعبة، عن ثابت البُناني، عن أنس بن مالك، فذكر مثله.

وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"الصبر عند الصدمة الأولى". رواه البزار (791 - كشف الأستار)، عن أحمد بن منصور، ثنا فهد بن حيان، ثنا عمران، عن محمد، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

قال البزار:"لا نعلمه عن أبي هريرة إلَّا من هذا الوجه".

قلت: فيه فهد بن حيان أبو زيد، من أهل البصرة، اتفق أهل العلم على تضعيفه. قال ابن حبان:"كان ممن يخطئ حتى يجيء بأحاديث مقلوبة، خرج عن حد الاحتجاج به لما كثر ذلك"،"المجروحين" (868).

وأمَّا قول البزار:"لا نعلمه عن أبي هريرة إلَّا من هذا الوجه. فإنَّه قال ذلك حسب علمه، وإلَّا فقد رُوي هذا الحديث أيضًا من وجه آخر، رواه أبو يعلى (6141 - الأثري) من طريق أبي عبيدة الناجي، حدَّثنا ابن سيرين، عن أبي هريرة، في قصَّة طويلة، وفيه:"الصبر عند الصدمة الأولى، الصبر عند الصدمة الأولى".

وأبو عبيدة الناجي هو بكر بن الأسود، من أهل البصرة، وكان يحيى بن كثير يروي عنه ويقول:"هو كذَّاب". وضعَّفه ابن معين، وقال ابن حبان:"كان أبو عبيدة رجلًا صالحًا، وهو من الجنس الذي ذكرت ممن غلب عليه التقشف حتى غفل عن تعاهد الحديث، فصار الغالب على حديثه المعضلات".

انظر:"المجروحين" (149).

وفي معناه أيضا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"الصبر عند أول صدمة". رواه البزار (792 -
كشف) من طريق محمد بن عمر بن واقد، ثنا إبراهيم بن إسماعيل، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر مثله.

قال البزار:"تفرد به عكرمة، عن ابن عباس، وفيه الواقدي". وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 3):"فيه الواقدي، وفيه كلام كثير، وقد وُثِّق".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি কবরের পাশে ক্রন্দনরত এক মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন, "আল্লাহকে ভয় করো এবং ধৈর্য ধারণ করো।" মহিলাটি বলল, আমার কাছ থেকে সরে যান, কারণ আপনি আমার মতো বিপদে আক্রান্ত হননি। সে তাঁকে চিনতে পারেনি। অতঃপর তাকে বলা হলো, ইনি তো আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং তাঁর কাছে কোনো প্রহরী বা দ্বাররক্ষক দেখতে পেল না। সে বলল, আমি আপনাকে চিনতে পারিনি। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই ধৈর্য হলো প্রথম আঘাতের সময়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3270)


3270 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أصابته مصيبة فقال كما أمر الله: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللهم أجرني في مصيبتي، وأعقبني خيرًا منها، إلَّا فعل الله ذلك به".

قالت أم سلمة: فلمَّا توفي أبو سلمة، قلتُ ذلك. ثمَّ قلت: ومن خير من أبي سلمة؟ . فأعقبها الله رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فتزوَّجها.

وفي رواية:"ما من مسلم تُصيبه مصيبة فيقول ما أمره الله به: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منها، إلَّا خلف الله له خيرًا منها".

قالت: فلمَّا مات أبو سلمة قلت: أي المسلمين خير من أبي سلمة؟ أوّل بيتٍ هاجر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثمَّ إنِّي قلتها، فأخلف الله لي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم.

قالت: أرسل إليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حاطب بن أبي بلتعة يخطبني له. فقلتُ: إنَّ لي بنتًا وأنا غيور. فقال:"أمَّا ابنتها؛ فندعو الله أن يُغنيها عنها، وأدعو الله أن يذهب بالغيرة".

صحيح: رواه مالك في الجنائز (42) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرته.

والرواية الثانية رواها مسلم في الجنائز (918) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، قال: أخبرني سعد بن سعيد، عن عمر بن كثير بن أفلح، عن ابن سفينة، عن أم سلمة، فذكرت مثله.

وقد رُوي عن أبي سلمة أنَّه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلم يُصاب بمصيبةٍ فيفزع إلى ما أمر الله به من قوله: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللَّهم عندك احتسبتُ مصيبتي، فأجرني فيها، وعَوِّضني منها، إلَّا آجره الله عليها، وعاضه خيرًا منها".

رواه ابن ماجه (1598) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا يزيد بن هارون، قال: أنبأنا عبد الملك بن قدامة الجمحي، عن أبيه، عن عمر بن أبي سلمة، عن أمِّه أمّ سلمة، عن أبي سلمة، فذكر مثله.

وعبد الملك بن قدامة ضعيف، وأبوه قدامة"مقبول" لأنَّه توبع، ولكن وقع فيه اضطراب، وهو ما
رواه الترمذي (3511) وأحمد (16343) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت، عن عمر بن سلمة، عن أمه أم سلمة، عن أبي سلمة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أصاب أحدكم مصيبة فليقل: اللَّهم عندك احتسبتُ مصيبتي، فأجرني فيها، وأبدلني منها خيرًا". فلمَّا احتضر أبو سلمة قال: اللَّهم اخلف في أهلي خيرًا منِّي، فلمَّا قُبض قالت أم سلمة: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} عند الله أحتسبتُ مصيبتي؛ فأجرني فيها.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، ورُوي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن أم سلمة. وأبو سلمة اسمه: عبد الله بن عبد الأسد".

ورواه الإمام أحمد مختصرًا إلَّا أنَّه زاد فيه بين ثابت وعمر بن أبي سلمة - ابن عمر بن أبي سلمة، وكذلك رواه أيضًا النسائي في"عمل اليوم والليلة" (1072).

وابن عمر بن أبي سلمة اسمه: محمد. ذكره الحافظ في التقريب وقال فيه:"مقبول" أي حيث يتابع، وإلَّا فليِّن الحديث.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16344) من وجه آخر عن المطلب عن أم سلمة، قالت: أتاني أبو مسلمة يومًا من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: لقد سمعت من رسول الله قولًا فسُررتُ به، قال:"لا يُصيب أحدًا من المسلمين مصيبةٌ فيسترجع عند مصيبته، ثمَّ يقول: اللَّهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منها، إلَّا فُعل ذلك به". قالت أم سلمة: فحفظت ذلك منه، فلمَّا توفي أبو سلمة استرجعتُ، وقلت: اللهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منه. ثمَّ رجعتُ إلى نفسي، قلت: مِن أين لي خيرٌ من أبي سلمة؟ ! فلمَّا انقضت عدَّتي استأذن عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أدبُغُ إهابًا لي، فغسلت يدي من القَرَظ، وأذنتُ له، فوضعتُ له وِسادةَ أَدَم حشوها ليفٌ، فقعد عليها، فخطبني إلى نفسي، فلمَّا فرغ من مقالته، قلتُ: يا رسول الله! ما بي أن لا تكون بك الرغبة فيَّ، ولكنِّي امرأةٌ فيَّ غيرةٌ شديدةٌ، فأخاف أن ترى منِّي شيئًا يُعذِّبني الله به، وأنا امرأةٌ قد دخلتُ في السنِّ، وأنا ذاتُ عِيالٍ. فقال:"أمَّا ما ذكرتِ مِنَ الغيرة؛ فسوف يُذهبها الله -عَزَّوَجَلَّ- منكِ، وأمَّا ما ذكرتِ من السنِّ؛ فقد أصابني مثلُ الذي أصابكِ، وأمَّا ما ذكرت من العيالِ؛ فإنَّما عِيالُكِ عِيالي". قالت: فقد أسلمتُ لرسول الله صلى الله عليه وسلم. فتزوَّجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت أمُّ سلمة: فقد أبدلني الله بأبي سلمة خيرًا منه؛ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم.

والمطلب هو: ابن عبد الله بن حنطب، روايته عن الصحابة مرسلة إلَّا أنس بن مالك ومن في طبقته.

وأظنُّ لوجود هذا الاختلاف لم يصحح الترمذي حديثَ أبي سلمة، وإنَّما أشار إلى أنَّ الحديثَ رُوي من غير هذا الوجه عن أمِّ سلمة؛ لأنَّ الصحيح الثابت أنَّ هذا الحديثَ من مسند أمِّ سلمة كما مضي. والله أعلم.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো বিপদে আক্রান্ত হয় এবং সে আল্লাহর নির্দেশ অনুসারে বলে: '{إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} (নিশ্চয় আমরা আল্লাহর জন্য এবং নিশ্চয় আমরা তাঁর দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী)। হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং আমাকে এর চেয়ে উত্তম কিছু দান করো', আল্লাহ অবশ্যই তার জন্য তাই করে দেন।"

উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, আমি সেই দু'আটি পড়লাম। এরপর (মনে মনে) বললাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আর কে আছে? কিন্তু আল্লাহ তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দ্বারা উত্তম প্রতিদান দিলেন এবং তিনি তাঁকে বিবাহ করলেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে কোনো মুসলিম বিপদে আক্রান্ত হয় এবং আল্লাহর নির্দেশ অনুসারে বলে: '{إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ}। হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং আমাকে এর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করো', আল্লাহ অবশ্যই তাকে এর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করেন।"

তিনি (উম্মু সালামাহ) বলেন: আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা যাওয়ার পর আমি বললাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আর কোন মুসলিম হতে পারে? (তিনি তো ছিলেন) সেই প্রথম পরিবার যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে হিজরত করেছিল। এরপরও আমি সেই দু'আটি করলাম। ফলে আল্লাহ আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে উত্তম বিকল্প দান করলেন।

তিনি (উম্মু সালামাহ) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাতিব ইবনু আবী বালতাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠিয়ে আমার কাছে তাঁর জন্য বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। আমি বললাম: আমার একটি কন্যা আছে এবং আমি খুবই আত্মমর্যাদাসম্পন্ন (ঈর্ষাপরায়ণ নারী)। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার কন্যার ব্যাপারে, আমরা আল্লাহর কাছে দু'আ করব যেন আল্লাহ তাকে তার (অন্য স্বামী বা প্রয়োজন) থেকে মুক্ত করে দেন। আর আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করব যেন আল্লাহ তার সেই আত্মমর্যাদার ভাব (غيرة) দূর করে দেন।"

অন্য এক দীর্ঘ বর্ণনায় উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এসে আমাকে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এমন একটি কথা শুনেছি যা আমাকে আনন্দিত করেছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিম যখন কোনো বিপদে আক্রান্ত হয় এবং বিপদের সময় সে ইস্তিরজা (ইন্না লিল্লাহ...) পাঠ করে, তারপর বলে: 'হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং এর চেয়ে উত্তম বিকল্প আমাকে দান করো', আল্লাহ তার জন্য তাই করে দেন।" উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই কথাটি মুখস্থ করে রাখলাম। যখন আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, আমি ইস্তিরজা পাঠ করলাম এবং বললাম: হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং তাঁর চেয়ে উত্তম বিকল্প আমাকে দান করো। এরপর আমি মনে মনে ভাবলাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আমি কোথা থেকে পাবো?! আমার ইদ্দতকাল শেষ হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তখন আমি আমার একটি চামড়া দাবাগাত করছিলাম। আমি ক্বারায (গাছের ছাল) থেকে হাত ধুয়ে তাঁকে অনুমতি দিলাম। আমি তাঁর জন্য খেজুর পাতার আঁশ ভর্তি একটি চামড়ার বালিশ রেখে দিলাম। তিনি তার ওপর বসলেন এবং আমার কাছে নিজের জন্য বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তাঁর কথা শেষ হলে আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ব্যাপারে আপনার আগ্রহ না থাকার কারণ নেই, তবে আমি একজন নারী যার প্রবল আত্মমর্যাদা (ঈর্ষা) আছে। আমি ভয় করি যে আমি আপনার এমন কিছু দেখব যার জন্য আল্লাহ আমাকে শাস্তি দেবেন। আর আমি বয়সের ভারে উপনীত হয়েছি এবং আমার অনেক সন্তান-সন্ততি আছে। তিনি বললেন: "তুমি তোমার যে আত্মমর্যাদার (غيرة) কথা বললে, আল্লাহ তাআলা শীঘ্রই তোমার থেকে তা দূর করে দেবেন। আর তুমি বয়সের কথা যা বললে, আমি নিজেও সেই বয়সে উপনীত হয়েছি। আর সন্তান-সন্ততির কথা যা বললে, তোমার সন্তান-সন্ততিই আমার সন্তান-সন্ততি।" উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিজেকে সমর্পণ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বিবাহ করলেন। উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এভাবে আল্লাহ আমাকে আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করলেন—আর তিনি হলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (3271)


3271 - عن أبي موسى قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا مرِض العبد أو سافر،
كُتب له مثل ما كان يعمل مُقيمًا صحيحًا".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد (2996) عن مطر بن الفضل، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا العوام، حدثنا إبراهيم أبو إسماعيل السكسكي، قال: سمعت أبا بردة، واصطحب هو ويزيد بن أبي كبشة في سفرٍ، فكان يزيد يصوم في السفر، فقال له أبو بردة: سمعت أبا موسى مِرارًا يقول، فذكر الحديث.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: যখন কোনো বান্দা অসুস্থ হয় অথবা সফরে যায়, তখন সে সুস্থ ও অবস্থানকালে (মুকিম অবস্থায়) যে আমল করত, তার অনুরূপ সওয়াব তার জন্য লিপিবদ্ধ করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3272)


3272 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما أحدٌ من الناس يُصاب ببلاءٍ في جسده إلَّا أَمر الله عز وجل الملائكة الذين يحفظونه فقال: اكتبوا لعبدي في كلِّ يومٍ وليلةٍ ما كان يعمل من خيرٍ، ما كان في وِثاقي".

صحيح: رواه الإمام أحمد (6482)، عن إسحاق بن يوسف الأزرق، حدثنا سفيان الثوري، عن علقمة بن مرثد، عن القاسم، يعني - ابن مُخَيمِرة، عن عبد الله بن عمرو، فذكر مثله.

ورواه أيضًا (6825) عن إسحاق بن يوسف مقرونًا بوكيع، قالا: حدثنا سفيان بإسناده، وفيه:"اكتبوا لعبدي مثل ما كان يعمل وهو صحيح، ما دام محبوسًا في وثاقي". وإسناده صحيح. ورواه الحاكم (1/ 384) من طريق سفيان، وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال الهيثمي في المجمعه (2/ 303):"رواه أحمد والبزار، والطبراني في الكبير ورجال أحمد رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، وإن كان البخاري روي عن القاسم بن مخيمرة معلقًا، فإنَّ الحاكم والهيثمي لا يفرقان بين الأصل والتعليق.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মানুষের মধ্যে এমন কেউ নেই যে তার শরীরে কোনো বিপদে পতিত হয়, তবে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তাঁর সংরক্ষণকারী ফেরেশতাদেরকে নির্দেশ দেন এবং বলেন: আমার বান্দা আমার বন্ধনে (অসুস্থতায়) যতদিন থাকে, ততদিন তার জন্য প্রতি দিন ও রাতে সেই ভালো আমলগুলো লিখতে থাকো, যা সে করত।









আল-জামি` আল-কামিল (3273)


3273 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ العبد إذا كان على طريقة حسنة من العبادة ثمَّ مرض، قيل للملك الموكَّل به: اكتب له مثل عمله إذ كان طليقًا حتَّى أُطلِقَه أو أَكفِتَه إليَّ".

حسن: رواه عبد الرزاق (20308) وعنه الإمام أحمد (6895) وابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (26) عن معمر، عن عاصم بن أبي النجود، عن خيثمة، عن عبد الله بن عمرو، فذكر مثله. وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 303) وقال:"رواه أحمد وإسناده صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل عاصم بن أبي النجود؛ فإنَّه حسن الحديث.

قوله:"أَكْفِته" أي: أَضمُّه إلى القبر كما قال البغوي، وقال: ومنه قوله تعالى: {أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ كِفَاتًا} [المرسلات: 25].

أي: ذوات كفتٍ - أي ضمٍّ وجمعٍ. يضمُّهم أحياءً على ظهورِها، وأمواتًا في بُطونها"."شرح السنَّة" (5/ 241).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় কোনো বান্দা যখন ইবাদতের উত্তম পদ্ধতিতে থাকে এবং এরপর সে অসুস্থ হয়ে যায়, তখন তার জন্য দায়িত্বপ্রাপ্ত ফেরেশতাকে বলা হয়: সে মুক্ত (সুস্থ) অবস্থায় যেমন আমল করত, ঠিক সেই আমল তার জন্য লিখতে থাকো, যতক্ষণ না আমি তাকে মুক্তি দেই অথবা আমার দিকে টেনে নেই (মৃত্যু দান করি)।”









আল-জামি` আল-কামিল (3274)


3274 - عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ابتلي الله العبد المسلم ببلاء في جسده، قال الله: اكتب له صالح عمله الذي كان يعمله، فإن شفاه غسله وطهَّره، وإن قبضه غفر له ورحِمَه".

حسن: رواه الإمام أحمد (12503) وأبو يعلى (4233) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، عن سنان بن ربيعة، عن أنس، فذكر مثله.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 304):"رواه أبو يعلى وأحمد، ورجاله ثقات".

قلت: إسناده حسن من أجل سنان بن ربيعة الباهلي البصري، أبو ربيعة؛ فإنَّه حسن الحديث، أخرج له البخاري مقرونًا.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ কোনো মুসলিম বান্দাকে তার শরীরে কোনো রোগ বা বিপদ দিয়ে পরীক্ষা করেন, তখন আল্লাহ (ফেরেশতাদের) বলেন: সে (সুস্থ অবস্থায়) যে নেক আমল করত, তা তার জন্য লিখতে থাকো। অতঃপর যদি তিনি তাকে আরোগ্য দান করেন, তবে এই রোগ তাকে (গুনাহ থেকে) ধুয়ে-মুছে পবিত্র করে দেয়। আর যদি তিনি তাকে উঠিয়ে নেন (মৃত্যু দেন), তবে তিনি তাকে ক্ষমা করেন এবং তার প্রতি রহম করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3275)


3275 - عن عقبة بن عامر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"ليس من عمل يوم إلَّا وهو يُختم عليه، فإذا مرض المؤمن قالت الملائكة: يا ربَّنا! عبدك فُلان قد حبسته، فيقول الربُّ - عَزَّوَجَلَّ -: اختموا له على مثل عمله حتَّى يبرأ أو يموت".

حسنٌ: رواه الإمام أحمد (17316) عن علي بن إسحاق، قال: أخبرنا عبد الله، أخبرني ابن لهيعة، قال: حدَّثني يزيد، أنَّ أبا الخير حدَّثه، أنَّه سمع عقبة بن عامر يحدِّث، فذكر مثلَه.

وإسناده حسن، من أجل رواية عبد الله، وهو ابن المبارك، عن ابن لهيعة؛ لأنَّه سمع منه قبل احتراق كتبه.

ورواه الطبراني في الكبير" (17/ 284) وفي"الأوسط" (3257) من طرق أخرى، عن ابن الهيعة بهذا الإسناد.

ورواه الحاكم (4/ 260) و (4/ 308 - 309) من وجهين آخرين، عن عقبة بن عامر، وقال في الموضع الأول:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال في الموضع الثاني:"صحيح الإسناد". وتعقَّبه الذهبي فقال:"فيه رشدين، واهٍ". قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ رشدين، وهو ابن سعد بن مفلح المهري، تكلَّم فيه جمهور النقَّاد وضعَّفوه.




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দিনের কোনো আমল এমন নেই যার উপর মোহর লাগানো হয় না (বা যা সংরক্ষিত হয়)। অতঃপর যখন কোনো মুমিন অসুস্থ হয়ে পড়ে, তখন ফেরেশতারা বলে: 'হে আমাদের রব! আপনার অমুক বান্দাকে আপনি আটকে রেখেছেন।' তখন আল্লাহ তা'আলা বলেন: 'সে সুস্থ না হওয়া পর্যন্ত অথবা মৃত্যু বরণ না করা পর্যন্ত তার আমলনামায় তার পূর্বের কৃতকর্মের সমতুল্য আমল লিখে দাও (বা সংরক্ষণ করো)।'"









আল-জামি` আল-কামিল (3276)


3276 - عن أبي الأشعث الصنعاني، أنَّه راح إلى مسجد دمشق، وهجَّر بالرواح، فلقي شدَّاد بن أوس والصُّنابحي معه، فقلت: أين تريدان يرحمكما الله؟ قالا: نريد هاهنا إلى أخٍ لنا مريض نعوده. فانطلقت معهما حتَّى دخلا على ذلك الرجل، فقالا له: كيف أصبحتَ؟ قال: أصبحتُ بنعمة. فقال له شدَّاد: أَبشر بكفَّارات السيِّئات، وحطِّ الخطايا؛ فإنِّي سمِعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله عز وجل يقول: إنِّي إذا ابتلَيتُ عبدًا من عبادي مؤمِنًا فحمِدني على ما ابتليته؛ فإنَّه يقوم من مضجعه ذلك كيوم ولدته أُمُّه من الخطايا، ويقول الربُّ - عَزَّوَجَلَّ -: أنا قيَّدتُ عبدي، وابتليتُه، فأَجْروا له
كما كنتم تُجْرون له وهو صحيح".

حسن: رواه الإمام أحمد (17118) والطبراني في"الكبير" (7136) وفي"الأوسط" (4706) كلهم من طرف عن إسماعيل بن عياش، عن راشد بن داود الصنعاني، عن أبي الأشعث، فذكر مثلَه.

وإسناده حسن، من أجل راشد بن داود؛ فإنَّه مختلَف فيه؛ فوثَّقه ابن معين، والدارميّ، وذكره ابن حبَّان في الثقات، وتكلَّم فيه البخاري، والدارقطني، غير أنَّه حسن الحديث في الشواهد، ولا يُقبل إذا انفرد أو خالف.

وأمَّا إسماعيل بن عيَّاش؛ فهو الحمصي، وهو ضعيف في غير الشاميين، وبه أعلَّه الهيثمي في"المجمع" (2/ 303 - 304)، وروايته هنا عن الشاميين؛ فإنَّ راشد بن داود الصنعاني من أهل صنعاء دمشق، وليس من صنعاء اليمن. والله أعلم.




শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আল-আশআছ আস-সান‘আনী বলেন যে, তিনি (আবূ আল-আশআছ) দামেশকের মাসজিদে গেলেন এবং দ্রুত হাঁটা শুরু করলেন। সেখানে তিনি শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর সঙ্গে আস-সুনাবিহীকে পেলেন। আমি বললাম: আল্লাহ আপনাদের উপর রহম করুন! আপনারা কোথায় যাচ্ছেন? তারা বললেন: আমরা আমাদের এক অসুস্থ ভাইকে দেখতে এখানে যাচ্ছি। আমি তাদের সাথে গেলাম। তারা সেই ব্যক্তির কাছে প্রবেশ করে তাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনার কেমন লাগছে? সে বলল: আল্লাহর অনুগ্রহে আছি। তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আপনি গুনাহ মাফ এবং পাপ মোচনের সুসংবাদ গ্রহণ করুন! কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: আমি যখন আমার মুমিন বান্দাদের কাউকে কোনো বিপদে ফেলে পরীক্ষা করি, আর সে আমার দেওয়া সেই পরীক্ষার উপর আমার প্রশংসা করে, তবে সে তার বিছানা থেকে এমনভাবে উঠে দাঁড়ায়, যেমন তার মা তাকে সেদিনের মতো জন্ম দিয়েছিল যখন সে ছিল পাপমুক্ত। আর মহান প্রভু আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: আমি আমার বান্দাকে বেঁধে ফেলেছি (অসুস্থতার কারণে), আর তাকে আমি পরীক্ষা করেছি। অতএব, সে সুস্থ অবস্থায় থাকা কালে তার জন্য তোমরা যে নেকি জারি রাখতে, এখন সে অসুস্থ থাকা সত্ত্বেও তার জন্য সেই নেকি জারি রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3277)


3277 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله تعالى:"إذا ابتليتُ عبدي المؤمن، ولم يشكني إلى عُوَّاده أطلقته من إِساري، ثمَّ أبدلته لحمًا خيرًا من لحمه، ودمًا خيرًا من دمه، ثمَّ يستأنِف العمل".

صحيح: رواه الحاكم (1/ 348 - 349) من طريق أبي بكر الحنفي، ثنا عاصم بن محمد بن زيد، عن سعيد بن أبي سعيد المقري، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر مثلَه. وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وفي الباب: عن أبي هريرة مرفوعًا:"ما من عبد يمرض مرضًا إلَّا أمر الله حافظه أنَّ ما عمِل من سيئة فلا يكتبها، وما عمل من حسنةٍ أن يكتبها له عشر حسنات، وأن يكتب له من العمل الصالح كما كان يعمل وهو صحيح، وإن لم يعمل".

رواه أبو يعلى (6607 - الأثري) عن صالح بن مالك، حدَّثنا عبد الأعلى بن أبي المساور، حدَّثنا محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي هريرة، فذكر مثلَه.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 304):"فيه عبد الأعلى، وهو ضعيفٌ".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: যখন আমি আমার মুমিন বান্দাকে কোনো বিপদে ফেলি (পরীক্ষা করি) আর সে তার দেখতে আসা লোকদের কাছে আমার ব্যাপারে কোনো অভিযোগ না করে, তখন আমি তাকে আমার বন্ধন থেকে মুক্ত করে দেই। অতঃপর আমি তাকে তার মাংসের চেয়ে উত্তম মাংস এবং তার রক্তের চেয়ে উত্তম রক্ত দ্বারা পরিবর্তন করে দেই। এরপর সে নতুন করে (সৎ) কাজ শুরু করে।









আল-জামি` আল-কামিল (3278)


3278 - عن أنس بن مالك، قال: اشتكى ابن لأبي طلحة، قال: فمات وأبو طلحة خارجٌ. فلمَّا رأت امرأته أنَّه قد مات هيَّأت شيئًا، ونحَّته في جانب البيت. فلمَّا جاء أبو طلحة قال: كيفَ الغلام؟ قالت: قد هدأت نفسُه، وأرجو أن يكون قد استراح.
وظنَّ أبو طلحة أنَّها صادقة، قال: فبات، فلمَّا أصبح اغتسل. فلمَّا أراد أن يخرجَ أعلمته أنَّه قد ماتَ! فصلَّي مع النبي صلى الله عليه وسلم، ثمَّ أخبر النبيَّ صلى الله عليه وسلم بما كان منهما. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلَّ الله أن يُبارك لكما في ليلتكما". قال سفيان: فقال رجل من الأنصار: فرأيتُ لهما تسعة أولادٍ كلُّهم قد قرأ القرآن.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1301) عن بشر بن الحكم، حدَّثنا سفيان بن عيينة، أخبرنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، أنَّه سمع أنسًا فذكره.

ورواه مسلم في فضائل الصّحابة (2144) من طريق بهز، ثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، قال:"مات ابن لأبي طلحة من أمِّ سُلَيم، فقالت لأهلها: لا تُحدِّثوا أبا طلحة بابنه حتَّى أكون أنا أُحدِّثه. قال: فجاء، فقرَّبت إليه عَشاءً. فأكل وشرب. فقال: ثمَّ تصنَّعت له أحسن ما كان تصنَّعُ قبل ذلك، فوقع بها. فلمَّا رأت أنَّه قد شبع وأصاب منها، قالت: يا أبا طلحة! أرأيتَ لو أنَّ قومًا أعاروا عاريتهم أهل بيتٍ، فطلبوا عاريتهم، ألهم أن يمنعوهم؟ قال: لا. قالت: فاحتسب ابنك. قال: فغضب، وقال: تركتني تلطَّختُ ثمَّ أخبرتني بابني؟ ! فانطلق حتَّى أتي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبره بما كان. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بارك الله لكما في غابر ليلتكما". فذكر الحديثَ وفيه قصَّة تحنيك الأبن لأم سُليم.

ورواه أبو داود الطيالسيّ في مسنده (2168)، عن سليمان بن المغيرة، وحماد بن سلمة،

وجعفر بن سليمان، كلهم عن ثابت، عن أنس، وساق بهذا الإسناد قصة أم سليم بشيءٍ من

التفصيل، وها أنا أسوقها بكاملها لاشتمالها على فوائد كثيرةٍ، قال: قال مالكٌ أبو أنسٍ لامرأته أم

سليم -وهي أم أنس-: إنَّ هذا الرجل -يعني النبي صلى الله عليه وسلم يُحرِّم الخمرَ، فانطلَق حتَّى أتى الشامَ

فهلك هناك، فجاء أبو طلحة، فخطب أمَّ سُليم، فكلَّمها في ذلك، فقالت: يا أبا طلحة! ما مثلكَ

يُردُّ، ولكنَّكَ امروءٌ كافرٌ، وأنا امرأةٌ مسلِمة، لا يصلُح لي أن أتزوَّجَك. فقال: ما ذاكِ دهركِ.

قالت: وما دهري؟ قال: الصفراء والبيضاء. قالت: فإني لا أُريد صفراءَ ولا بيضاءَ، أُريدُ منكَ

الإسلامَ. قال: فمن لي بذلك؟ قالت: لك بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم. فانطلق أبو طلحة يُريدُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم،

ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ في أصحابه، فلمَّا رآه قال:"جاءكم أبو طلحة، غُرَّة الإسلامِ بينَ عينيه".

فجاء، فأخبر النبيَّ صلى الله عليه وسلم بما قالت أمُّ سُليم، فتزوَّجها على ذلك. قال ثابتٌ: فما بلغنا أنَّ مهرًا كان أعظم منه، إنَّها رضيت الإسلامَ مهرًا، فتزوَّجها، وكانت امرأةً مليحة العينين، فيها صغر، فكانت معه حتَّى وُلِد له بُنَيٌّ، وكان يُحبُّه أبو طلحة حبًّا شديدًا، ومرِض الصبيُّ، وتواضعَ أبو طلحة لمرضه، أو تضعضعَ له، فانطلق أبو طلحة إلى النبي صلى الله عليه وسلم، ومات الصبيُّ، فقالت أم سليم: لا ينعينَّ إلى أبي طلحة أحدٌ ابنه، حتَّى أكون أنا الذي أنعاء له. فهيَّأت الصبيَّ ووضعته، وجاء أبو طلحة من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّي دخل عليها، فقال: كيف ابني؟ فقالت: يا أبا طلحة! ما كان منذ اشتكي
أسكن منه الساعة. قال: فلله الحمد. فأتته بعَشائه فأصاب منه، ثمَّ قامت فتطيَّبت وتعرَّضت له، فأصاب منها، فلمَّا علِمت أنَّه طعم وأصابَ منها، قالت: يا أبا طلحة! أرأيتَ لو أنَّ قومًا أعاروا قومًا عاريةً لهم، فسألوهم إيَّاها، أكان لهم أن يمنعوهم؟ فقال: لا. قالت: فإنَّ الله عز وجل كان أعارك ابنك عاريهً ثمَّ قبضه إليه، فاحتسب ابنَك، واصبر. فغضب، ثمَّ قال: تركتيني حتَّى إذا وقعتُ بما وقعتُ به نعيتِ إليَّ ابني؟ ! ثمَّ غدا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبره فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بارك الله لكما في غابر ليلتكما. فتلقَّت من ذلك الحملَ، وكانت أم سليم تسافر مع النبي صلى الله عليه وسلم، تخرج معه إذا خرج، وتدخل معه إذا دخل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ولدت فأتوني بالصبي".

فأخذها الطلق ليلةَ قربهم من المدينة، فقالت: اللَّهم إني كنتُ أدخل إذا دخل نبيك، وأخرج إذا

خرج نبيُّك، وقد حضر هذا الأمر، فولَدت غلامًا، وقالت لابنها أنسٍ: انطلقْ بالصبي إلى رسول الله

صلى الله عليه وسلم، فأخذ أنسٌ الصبيَّ فانطلق به إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو يسم إبلًا أو غنمًا، فلمَّا نظر إليه قال لأنسٍ:

"أولدت بنت مِلحانَ؟". قال: نعم. فألقى ما في يده، فتناولَ الصبيَّ، فقال:"ائتوني بتمراتٍ عجوةٍ". فأخذ النبي صلى الله عليه وسلم التمرَ، فجعل يُحنِّكُ الصبيَّ، وجعلَ الصبيُّ يتلمَّظ، فقال:"انظروا إلى حُبِّ الأنصار التمرَ". فحنَّكه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وسمَّاه عبد الله.

قال ثابتٌ: وكانَ يُعدُّ من خيارِ المسلمينَ. ولعل الزيادات التي في هذه القصة ليست من سليمان بن المغيرة؛ لأن السياق الذي ساقه مسلم والإمام أحمد (13026) عنه، ليس فيه هذه الزيادات، وإليه أشار الطيالسي في قوله: وحدثنا شيخ سمعه من النضر بن أنس، وقد دخلت حديث بعضهم في بعض، قال مالك أبو أنس لامرأته، فذكر القصة. وهذا الشيخ المجهول لا يضر؛ لأنَّ أبا داود أسنده عن غيره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এক সন্তান অসুস্থ হয়ে পড়ল। তিনি (আনাস) বলেন, অতঃপর সে মারা গেল, যখন আবু তালহা বাইরে ছিলেন। যখন তাঁর স্ত্রী (উম্মে সুলাইম) দেখলেন যে সে মারা গেছে, তখন তিনি (সন্তানকে) কিছু কাপড় দিয়ে ঢেকে ঘরের এক কোণে সরিয়ে রাখলেন। যখন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "ছেলেটি কেমন আছে?" স্ত্রী বললেন, "তার আত্মা স্থির হয়েছে, আর আমি আশা করি সে আরাম পেয়েছে।"

আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে করলেন যে তিনি সত্য বলছেন। তিনি বলেন, অতঃপর তিনি রাত্রি যাপন করলেন। যখন সকাল হলো, তিনি গোসল করলেন। যখন তিনি বের হতে চাইলেন, তখন স্ত্রী তাকে জানালেন যে, সে মারা গেছে। অতঃপর তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলেন, তারপর নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের দুজনের মধ্যে যা ঘটেছিল তা জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হয়তো আল্লাহ তোমাদের এই রাতের মধ্যে বারাকাহ দান করবেন।" সুফিয়ান বলেন: আনসারদের এক ব্যক্তি বললেন, "আমি তাদের নয়জন সন্তানকে দেখেছি, যাদের প্রত্যেকেই কুরআন পাঠকারী ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3279)


3279 - عن سعد بن أبي وقاص، قال: قلت: يا رسول الله! أيُّ الناس أشد بلاءً؟ قال:"الأنبياء، ثمَّ الأمثل، فالأمثل، فيبتلى الرجل على حسب دينه، فإن كان دينه صُلبًا اشتدَّ بلاؤه، وإن كان في دينه رقَّة ابتُلي على حسب دينه، فما يبرح البلاء بالعبد حتَّى يتركه يمشي على الأرض ما عليه خطيئة".

حسن: رواه الترمذي (2398) وابن ماجه (4023) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عاصم، عن مصعب بن سعد، عن أبيه سعد بن أبي وقاص، فذكر مثله، ولفظهما سواء. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن فقط؛ لأنَّ عاصمًا وهو ابن بَهدلة، حسن الحديث، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (1481)، وصححه ابن حبان (2900).

ولكن قال الحاكم (1/ 40 - 41):"ولحديث عاصم بن بهدلة، عن مصعب بن سعد، عن أبيه،
طرق يُتَّبع ويُذاكر بها، وقد تابع العلاء بن المسيب عاصم بن بهدلة على روايته عن مصعب بن سعد، ثمَّ أسنده من طريقه، ولفظه: سئل النبي صلى الله عليه وسلم: أيُّ الناس أشد بلاءً؟ قال: والأنبياء، ثمَّ الأمثل، فالأمثل، فإن كان الرجل صلب الدين يبتلى الرجل على قدر دينه، فمن ثخن دينه ثخن بلاؤه". وقال:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين". ثمَّ أسند من طرق كثيرة حديث عاصم عن مصعب بن سعد، عن أبيه.

قلت: ولكن رواه ابن حبان في صحيحه (2920) من وجه آخر عن العلاء بن المسيب، عن أبيه، عن سعد نحوه. والمسيب هو ابن رافع، لم يسمع من سعد.

وقوله:"الأمثل فالأمثل" أي الأعلى فالأعلى في الرتبة والمنزلة. يقال: هذا أمثل من هذا، أي أفضل، وأماثل الناس: خيارهم.

والخلاصة في حديث الباب: أنَّ ابتلاء الأنبياء صلوات الله عليهم ليس لمحو خطاياهم إذ لا خطايا لهم؛ بل لرفع درجاتهم عند الله - عَزَّوَجَلَّ -. انظر معنى هذا عند الطحاوي في مشكله: (5/ 456).




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সব মানুষের মধ্যে কার বালা-মুসিবত সবচেয়ে কঠিন?' তিনি বললেন, "নবীগণ, অতঃপর যারা তাঁদের কাছাকাছি, অতঃপর যারা তাঁদের কাছাকাছি। মানুষকে তার দ্বীনের মান অনুযায়ী পরীক্ষা করা হয়। যদি তার দ্বীন মজবুত ও সুদৃঢ় হয়, তবে তার পরীক্ষা কঠোর হয়। আর যদি তার দ্বীনে দুর্বলতা থাকে, তবে তার দ্বীনের মান অনুযায়ীই তাকে পরীক্ষা করা হয়। বান্দার উপর এই বিপদাপদ লেগেই থাকে যতক্ষণ না মুসিবত তাকে এমন অবস্থায় ছেড়ে দেয় যে, সে জমিনের উপর চলাফেরা করে অথচ তার কোনো গুনাহ অবশিষ্ট থাকে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3280)


3280 - عن عبد الله بن مسعود، قال: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يوعَك، فقلت: يا رسول الله! إنَّك توعَك وَعْكًا شديدًا؟ ! قال:"أَجل! إنِّي أُوعَك كما يوعَك رجلان منكم". فقلتُ: ذلك أنَّ لك أجرين؟ قال:"أَجل! ذلك كذلك، ما من مسلم يُصيبُه أذىً، شوكةٌ فما فوقها إلَّا كفَّر الله بها سيِّئآته كما تحطُّ الشجر ورقها".

متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5647) ومسلم في البر والصلة (2571) كلاهما من حديث سفيان، عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن الحارث بن سُوَيد، عن عبد الله، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি তো কঠিন জ্বরে/কষ্টে ভুগছেন! তিনি বললেন, "হ্যাঁ! তোমাদের মধ্যে দু'জন লোক যেমন জ্বরে ভুগে, আমিও তেমন জ্বরে ভুগি।" আমি বললাম, এর কারণ কি এই যে আপনার জন্য দ্বিগুণ সওয়াব রয়েছে? তিনি বললেন, "হ্যাঁ! ব্যাপারটি সেরকমই। কোনো মুসলিম যখনই কোনো কষ্টের সম্মুখীন হয়—একটি কাঁটা বিধলেও বা তার চেয়েও বড় কিছু ঘটলেও—আল্লাহ এর মাধ্যমে তার পাপসমূহ এমনভাবে মোচন করে দেন, যেমন গাছ তার পাতা ঝরিয়ে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3281)


3281 - عن أبي سعيد الخدري، قال: دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك، فوضعت يدي عليه، فوجدت حره بين يديَّ فوق اللِّحاف، فقلت: يا رسول الله! ما أشدَّها عليك! قال:"إنَّا كذلك يُضعَّف لنا البلاء، ويُضعَّف لنا الأجر". قلت: يا رسول الله! أي الناس أشد بلاءً؟ قال:"الأنبياء". قلت: يا رسول الله! ثمَّ من؟ قال:"ثمَّ الصالحون، إن كان أحدهم ليبتلى بالفقر حتَّى ما يجد أحدهم إلَّا العباءة يحوبها، وإن كان أحدهم ليفرح بالبلاء كما يفرح أحدكم بالرخاء".

حسن: رواه ابن ماجه (4024) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، قال: حدثنا ابن أبي فُديك، قال: حدثني هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

إسناده حسن من أجل الكلام في هشام بن سعد المدني؛ فقد ضعَّفه ابن معين، والنسائي، ومشَّاه الآخرون، فقال أبو زرعة:"محله الصدق". وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يُحتجُّ به".
وقال العجلي:"جائز الحديث".

قلت: هو من رجال مسلم، من أثبت الناس في زيد بن أسلم، وقد صحَّح هذا الإسناد البوصيري في"زوائده"، إلَّا أنَّه زاد بين الأنبياء والصالحين"العلماء"، وزاد أيضًا: ويبتلى بالقمل حتَّى تقتله". وقال:"صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بهشام بن سعد".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট প্রবেশ করলাম যখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। তখন আমি তাঁর উপর আমার হাত রাখলাম এবং কাঁথার (লেপের) উপর দিয়েই তাঁর হাতের নিচে প্রচণ্ড তাপ অনুভব করলাম। আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনার উপর তা (কষ্ট) কতই না কঠিন!' তিনি বললেন, "আমরা এমনই। আমাদের জন্য বিপদ দ্বিগুণ করে দেওয়া হয় এবং আমাদের জন্য পুরস্কারও দ্বিগুণ করে দেওয়া হয়।" আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! মানুষের মধ্যে কার বিপদ সবচেয়ে কঠিন?' তিনি বললেন, "নবীগণ।" আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! এরপর কারা?' তিনি বললেন, "এরপর সৎকর্মশীলগণ। তাদের মধ্যে কেউ কেউ এমন দারিদ্র্যের শিকার হন যে, তাদের কেবল একটি মাত্র কম্বল বা পশমের পোশাক থাকে যা তারা পরিধান করে (বা জড়িয়ে থাকে)। আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ বিপদে এমন খুশি হন, যেমন তোমাদের কেউ কেউ প্রাচুর্য বা স্বাচ্ছন্দ্যে খুশি হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3282)


3282 - عن فاطمة، أخت حذيفة، قالت: أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم نعوده في نساء، فإذا سقاء معلق نحوه، يقطر ماؤه عليه من شدة ما يجد من حرِّ الحمَّى، قلنا: يا رسول الله! لو دعوت الله فشفاك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من أشد الناس بلاءً الأنبياء، ثمَّ الذين يلونهم، ثمَّ الذين يلونهم".

حسن: رواه الإمام أحمد (27079) والطبراني في"الكبير" (24/ 245) كلاهما من طريق شعبة، عن حصين بن عبد الرحمن، قال: سمعت أبا عبيدة بن حذيفة يحدث عن عمَّته فاطمة، فذكرت الحديث.

ورواه الحاكم (4/ 404) من هذا الوجه، ورجال إسناده ثقات، غير أبي عبيدة بن حذيفة، وهو معروف بكنيته، ولا يسمَّى كما قال أبو حاتم. وقد روي عنه جمع، ووثَّقه ابن حبان، والعجلي، وحسن حديثه الهيثمي في"المجمع" (2/ 292) ولم يُعرف فيه جرح، وأمَّا الحافظ؛ فقال فيه:"مقبول". أي إذا توبع، لكني لم أقف على متابع له غير أنَّه يُحسَّن حديثه لشهرته، وشواهده.




ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি) বলেন, আমরা কয়েকজন মহিলা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অসুস্থতার সময় তাঁকে দেখতে গেলাম। তখন তাঁর নিকট একটি মশক ঝুলানো ছিল, যার পানি তাঁর উপর ফোঁটা ফোঁটা পড়ছিল, কারণ তিনি জ্বরের প্রচন্ড উত্তাপ অনুভব করছিলেন। আমরা বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসুল! আপনি যদি আল্লাহর নিকট দু’আ করতেন, তাহলে তিনি আপনাকে আরোগ্য দান করতেন!’ তখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “নিশ্চয় মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি কষ্টের শিকার হন নবীগণ, তারপর যারা তাদের নিকটবর্তী, তারপর যারা তাদের নিকটবর্তী।”









আল-জামি` আল-কামিল (3283)


3283 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: دخلنا على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك. فقلنا: أخ أخ، بآبائنا وأمهاتنا يا رسول الله! ما أشدَّ وعكك! فقال:"إنَّا معشر الأنبياء يُضاعف علينا البلاءُ تضعيفًا". قال: قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إنَّ أشدَّ الناس بلاءً الأنبياء والصالحون، الأمثل فالأمثل". قلنا سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كان النبي من الأنبياء ليدرع العباءة من الحاجة، لا يجد غيرها". قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كان النبي من الأنبياء ليقتله القمل". قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كانوا ليفرحون بالبلاء كما تفرحون بالرّخاء".

حسن: رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (5) عن عبيدالله بن عمر الجُشمي، وغيره، حدَّثنا يحيى بن سليم الطائفي، حدثنا إسماعيل بن كثير، عن زياد بن أبي زياد -مولي ابن عياش-، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قال: فذكره.

وإسناده حسن، فإنَّ يحيى بن سليم الطائفي وإن كان من رجال الجماعة إلَّا أنَّه مختلف فيه؛ فتكلَّم فيه النسائي، والدارقطني، ووثَّقه ابن معين، وابن سعد، وابن حبان، والعجلي، وغيرهم. وهو حسن الحديث. وبقية رجاله ثقات، وزياد بن أبي زياد -مولي ميسرة المخزومي- المدني،
مولي عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة، من رجال مسلم، روي عن مولاه، وعن جماعة من الصحابة، وثَّقه النسائي وغيره، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال:"كان عابدًا زاهدًا". وقال مالك:"كان عمر بن عبد العزيز يُكرمه". وقال أيضًا:"كان رجلًا عابدًا معتزلًا لا يزال يكون وحده".




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। আমরা বললাম: আহা! ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোন! আপনার জ্বর (বা রোগ) কতই না কঠিন! তিনি বললেন: "নিশ্চয় আমরা নবীরা, আমাদের উপর বিপদ দ্বিগুণ করে দেওয়া হয়।" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সর্বাধিক কঠিন বিপদ আসে নবীদের উপর এবং অতঃপর নেককারদের উপর— যারা (নেককারীতে) তাদের নিকটবর্তী, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? কোনো কোনো নবী তো অভাবের কারণে একটিমাত্র পশমের পোশাক (বা চাদর) পরিধান করতেন, যা ছাড়া অন্য কিছুই তারা পেতেন না।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? কোনো কোনো নবীকে তো উকুন মেরে ফেলত।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? নিশ্চয়ই তারা (নবী ও নেককারগণ) বিপদে এমনভাবে আনন্দিত হন, যেমন তোমরা (সাধারণ মানুষ) প্রাচুর্যে (সুখে) আনন্দিত হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3284)


3284 - عن عمر، قال: وضعتُ يدي على النبي صلى الله عليه وسلم، فقلت: بأبي وأمي ما أجرك! وهو يومئذٍ محموم، فقال:"إن كنَّا يُضاعف لنا البلاء كما يضاعف لنا الأجر".

صحيح: رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (241) عن عبد الرحمن بن صالح، حدثنا علي بن ثابت، عن الأوزاعي، عن نافع، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، عن عمر، فذكر مثله.

ورجاله ثقات، غير علي بن ثابت، وهو الجزري، فقال فيه الحافظ:"صدوق ربما أخطأ، وقد ضعَّفه الأزدي بلا حجة". كذا قال، والصواب أنَّه ثقة؛ لأنَّه وثَّقه ابن معين، وأبو داود، وأبو زرعة، وابن سعد، وقال النسائي:"ليس به بأس". وذكره ابن حبان في الثقات.

وفي الباب عن أبي هريرة، قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم: من أشد الناس بلاءً؟ فقال:"النبيون، ثمَّ الصالحون".

رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (4)، وفيه ليث، وهو ابن أبي سُليم، ضعَّفه جمهور أهل العلم لضعف حفظه واختلاطه في آخر عمره، قال ابن حبان:"اختلط في آخر عمره، فكان يقلب الأسانيد، ويرفع المراسيل، ويأتي عن الثقات بما ليس من حديثهم".

وفي الباب أيضًا عن عائشة مرفوعًا:"إنَّا معشر الأنبياء يُشدُّ علينا الوجع ليكفِّر عنَّا".

رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (9)، عن إبراهيم، (وهو ابن زياد سبلان)، حدَّثني يحيى بن بُكير، حدثنا ابن لهيعة، حدثني محمد بن عبد الرحمن، عن عروة، عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُشدَّد عليه إذا مرض، حتَّى لربَّما مكث خمس عشرة لا ينام، وكان يأخذه عرق الكلية، وهو الخاصرة، فقلنا: يا رسول الله! لو دعوتَ الله فيكشف عنك. فقال، فذكرت الحديثَ.

وابن لهيعة فيه كلام مشهور، والحديث ليس من رواية أحد العبادلة عنه.

وفي الباب أيضًا عن عائشة مرفوعًا:"من أُصيب بمصية فليتعز بمصيبته بي؛ فإنَّه لن يُصاب أحد من أمتي بأشد منها".

رواه ابن ماجه (1599)، من حديث موسي بن عبيدة، حدثنا مصعب بن محمد، عن أبي سلمة ابن عبد الرحمن، عن عائشة، فذكرته.

وفيه موسى بن عبيدة الربذي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه ضعَّفه البوصيري في زوائد ابن ماجه.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর আমার হাত রাখলাম এবং বললাম, আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোক! আপনার (কষ্টের) কী প্রতিদান! আর তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমাদের জন্য যেমন পুরস্কার বহুগুণে বৃদ্ধি করা হয়, তেমনি আমাদের জন্য বিপদও বহুগুণে বৃদ্ধি করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3285)


3285 - عن أبي هريرة، وأبي سعيدٍ، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"ما يُصيب المسلمَ من نصبٍ، ولا وَصبٍ، ولا همٍّ، ولا حزنٍ، ولا أذىً، ولا غمٍّ، حتَّى الشوكة يُشاكها إلَّا كفَّر الله بها من خطاياه".

متفق عليه: رواه البخاري في المرض (5641، 5642) ومسلم في البر والصلة (2573) كلاهما من حديث محمد بن عمرو بن عطاء، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد وأبي هريرة، فذكر الحديثَ، واللفظ للبخاري.

وفي رواية مسلم:"حتَّى الهمّ يُهمُّه إلَّا كفَّر به من سيِّئاته".

قال الترمذي (966): وسمعت الجارود يقول: سمعت وكيعًا يقول:"لم يُسمع في الهمِّ أنَّه يكون كفَّارة إلَّا في هذا الحديث".

وقوله:"نَصَب ووَصَب" كلاهما بفتحتين، والنصب: التعب، والوصب: دوام الوجع ولُزومه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিমের ওপর যে ক্লান্তি, দীর্ঘস্থায়ী রোগ, দুশ্চিন্তা, দুঃখ, কষ্ট বা মানসিক যন্ত্রণা আপতিত হয়, এমনকি একটি কাঁটা পর্যন্ত যা তাকে বিদ্ধ করে, আল্লাহ তার বিনিময়ে তার গুনাহসমূহ মোচন করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3286)


3286 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله عز وجل يقول يوم القيامة: يا ابن آدم! مَرِضتُ فلم تعُدني؟ قال: يا ربِّ! كيف أعودك وأنتَ ربُّ العالمين؟ قال: أما علِمتَ أنَّ عبدي فلانًا مرِض فلم تعُده؟ أما علِمتَ أنَّك لو عُدتَه لوجدتَّني عنده؟ يا ابن آدم! استطعمتُكَ فلم تُطعِمني؟ قال: يا ربِّ! وكيف أُطعمك وأنت ربُّ العالمين؟ قال: أما علمتَ أنَّه استطعمك عبدي فلانٌ فلم تُطعمه؟ أما علمتَ أنَّك لو أطعمته لوجدت ذلك عندي؟ يا ابن آدم! استسقيتُك فلم تَسقني؟ قال: يا ربِّ! كيفَ أسقيك وأنت ربُّ العالمين؟ قال: استسقاك عبدي فلانٌ فلم تَسقه، أمَا إنَّك لو سقيتَه وجدتَّ ذلك عندي".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2569) عن محمد بن حاتم بن ميمون، حدَّثنا بهزٌ، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، عن ثابتٍ، عن أبي رافعٍ، عن أبي هريرة، فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা কিয়ামতের দিন বলবেন: হে আদম সন্তান! আমি অসুস্থ হয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমার শুশ্রূষা (দেখভাল) করোনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনার শুশ্রূষা করব?" তিনি বলবেন: "তুমি কি জানতে না যে আমার অমুক বান্দা অসুস্থ হয়েছিল, কিন্তু তুমি তার শুশ্রূষা করোনি? তুমি কি জানতে না যে তুমি যদি তার শুশ্রূষা করতে, তবে আমাকে তার কাছেই পেতে? হে আদম সন্তান! আমি তোমার কাছে খাবার চেয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমাকে খাবার দাওনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনাকে আহার করাব?" তিনি বলবেন: "তোমার কি জানা ছিল না যে আমার অমুক বান্দা তোমার কাছে খাবার চেয়েছিল, কিন্তু তুমি তাকে খাবার দাওনি? তুমি কি জানতে না যে তুমি যদি তাকে খাবার দিতে, তবে তা আমার কাছেই পেতে? হে আদম সন্তান! আমি তোমার কাছে পানীয় চেয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমাকে পান করাওনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনাকে পান করাব?" তিনি বলবেন: "আমার অমুক বান্দা তোমার কাছে পানীয় চেয়েছিল, কিন্তু তুমি তাকে পান করাওনি। মনে রেখো, তুমি যদি তাকে পান করাতে, তবে তা আমার কাছেই পেতে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3287)


3287 - عن أبي هريرة، لمَّا نزلت: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ} [سورة النساء: 123]. بلغت من المسلمين مبلغًا شديدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قاربوا وسدِّوا، ففي كلِّ ما يُصاب به المسلم كفَّارةٌ، حتَّى النكبة يُنكبها، والشوكة يُشاكها".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2574) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن ابن محيصن، شيخٍ من قريش، سمِع محمد بن قيس يُحدِّث عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যে মন্দ কাজ করবে, সে তার ফল ভোগ করবে।" (সূরা নিসা: ১২৩), তখন এটি মুসলমানদের মাঝে তীব্র উদ্বেগের সৃষ্টি করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা মধ্যপন্থা অবলম্বন করো এবং সঠিক কাজ করে যাও। কেননা মুসলমানের উপর যে কোনো বিপদই আপতিত হোক না কেন, তা তার জন্য কাফ্‌ফারা (গুনাহের মোচনকারী) হয়ে যায়; এমনকি সামান্য কোনো বিপদ বা কাঁটা যা তাকে বিদ্ধ করে, তাও।"