আল-জামি` আল-কামিল
3408 - عن أنس بن مالك قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بقوم من الأنصار يضحكون. فقال:"أكثروا ذكر هادِم اللذات".
حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (3623) عن جعفر بن محمد بن الفُضيل، والطبراني في"الأوسط" (695) عن أحمد بن محمد بن أبي بزَّة، كلاهما عن مؤمل بن إسماعيل، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن ثابت إلا حماد، تفرد به مؤمل" انتهى.
قلت: ليس كما قال، بل رواه أيضًا عبد الأعلى بن حماد النرسي، عن حماد بن سلمة بإسناده. رواه الخطيب في تاريخه (6428) بإسناده عنه، وهذه متابعة قوية لمؤمل بن إسماعيل فإنه ضعيف، ولكنه يعتبر به عند المتابعة، وعبد الأعلى بن حماد النرسي"ثبت" كما قال الذهبي في"الكاشف" وبه صار الإسناد حسنًا. وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (10/ 308) بعد أن عزاه للبزار والطبراني، وهو تساهل منه، فإن مؤمل بن إسماعيل لا يُحسن حديثه إلا بعد المتابعة.
ولكن نقل عبد الرحمن بن أبي حاتم في"العلل" (2/ 131) عن أبيه فقال: سألت أبي عن حديث رواه ابن أبي بزة، عن مؤمل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم بمجلس من مجالس الأنصار، وهم يمزحون ويضحكون فقال:"أكثروا ذكر هاذم اللذات -يعني الموت" قال أبي:"هذا حديث باطل لا أصل له" يجعلنا أن نتأمل في صحة هذا الحديث، فإن أبا حاتم لم يحكم عليه ببطلانه إلا بعد الاستقراء والاطلاع على جميع طرقه، فهل
هو باطل لا أصل له؟ .
وفي الباب عن أبي سعيد مرفوعًا في حديث طويل وفيه: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم مصلاه، فرأى ناسًا كأنهم يكتثِرون، فقال لهم:"أما إنكم لو أكثرتم ذكر هادِم اللذات لشغلكم عما أرى الموتُ، فأكثروا من ذكر هادِم اللذات الموت …".
رواه الترمذي (2460) عن محمد بن أحمد مدُّويَهْ، حدثنا القاسم بن الحكم العرني، حدثنا عبيد الله بن الوليد الوصافي، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".
قلت: بل هو ضعيف جدًّا وفيه سلسلة الضعفاء، القاسم بن محمد العرني، وشيخه عبيد الله بن الوليد الوصافي، وشيخه عطية كلهم من الضعفاء.
وفي الباب أيضًا عن ابن عمر مرفوعًا ولفظه:"أكثروا ذكر هادِم اللذات، فإنه لا يكون في كثير
إلا قلَّله، ولا في قليل إلا كثَّره".
رواه الطبراني في"الأوسط" (5780) من طريق أبي عامر الأسدي، عن عبيد الله بن عمر العمري، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. ومن هذا الطريق رواه القضاعي في"مسند الشهاب" (671).
وأبو عامر هو القاسم لا يُعرف، ذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" ولم يقل فيه شيئًا.
وكذلك لا يصح ما رُوي عنه قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فجاءه رجل من الأنصار، فسلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم ثم قال: يا رسول الله! أيّ المؤمنين أفضل؟ قال:"أحسنهم خلقًا" قال: أي المؤمنين أكيس؟ قال:"أكثرهم للموت ذكرًا، وأحسنهم لما بعده استعدادًا، أولئك الأكياس".
رواه ابن ماجه (4259) من طريق نافع بن عبد الله، عن فروة بن قيس، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر فذكره.
ونافع بن عبد الله"مجهول"، وكذلك شيخه فروة بن قيس حجازي"مجهول" أيضًا.
وقال الذهبي:"هذا خبر باطل" نقله البوصيري عنه في الزوائد.
وأما قول المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 129):"بإسناد جيد" فغير جيد، وللحديث طرق لا يخلو من ضعف ومجهول.
وفي الباب أيضًا عن عمر بن الخطاب، أخرجه أبو نعيم في"الحلية" (6/ 355) وفيه عبد الملك ابن يزيد قال الذهبي:"لا يُدرى من هو؟".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن شداد بن أوس مرفوعًا:"الكيِّس من دان نفسه، وعمل لما بعد الموت، والعاجز من أَتْبع نفسه هواها، ثم تمنى على الله".
رواه الترمذي (2459)، وابن ماجه (4260) كلاهما من طريق أبي بكر بن أبي مريم، عن ضمرة بن حبيب، عن أبي يعلى شداد بن أوس فذكره.
قال: الترمذي: حسن.
قلت: ليس بحسن، فإن فيه أبا بكر بن أبي مريم وهو: أبو بكر بن عبد الله بن أبي مريم الغساني الشامي، قد ينسب إلى جده، اتفق أهل هذا الفن على تضعيفه منهم الإمام أحمد وأبو حاتم وأبو داود وأبو زرعة والجوزجاني والنسائي والدارقطني وابن سعد وغيرهم، والراوي عنه عند ابن ماجه بقية بن الوليد إلا أنه توبع، ومعنى قوله:"دان نفسه" أي حاسب نفسه في الدنيا قبل أن يحاسب يوم القيامة.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদের একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তারা হাসছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা স্বাদ-বিনাশকারীর (মৃত্যুর) স্মরণ অধিক পরিমাণে করো।"
3409 - عن أبي سعيد الخدري أنه لما حضره الموت دعا بثياب جدد فلبسها ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الميت يُبعث في ثيابه الذي يموت فيها".
حسن: رواه أبو داود (3114) عن الحسن بن علي، حدثنا ابن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدري فذكر الحديث مثله.
إسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب وهو الغافقي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وأخرجه ابن حبان في صحيحه (7316)، والحاكم (1/ 340) كلاهما من حديث ابن أبي مريم به مثله.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
إلا أن ابن حبان لم يذكر قصة أبي سعيد في تجديد ثيابه عند موته.
وقال:"معنى قوله صلى الله عليه وسلم:"الميت يبعث …" أراد به في أعماله كقوله تعالى: {وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْ} [المدثر: 4] يريد به: وأعمالك أصلِحها، لا أن الميت يبعث في ثيابه التي قبض فيها، إذ الأخبار الجمة تُصرح عن المصطفى صلى الله عليه وسلم بأن الناس يحشرون يوم القيامة حفاة عراة غرْلًا"، انتهى.
وقال الخطابي: وأبو سعيد استعمل الحديث على ظاهره، وقد تأول بعض العلماء على خلاف ذلك فقال: الثياب معناه العمل، ثم قال:"وقال بعضهم: البعث غير الحشر، فقد يجوز أن يكون البعث مع الثياب، والحشر مع العري والحفا".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর যখন মৃত্যু নিকটবর্তী হলো, তখন তিনি নতুন পোশাক চাইলেন এবং তা পরিধান করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে তার সেই পোশাকেই পুনরুত্থিত করা হবে, যে পোশাকে সে মারা যায়।"
3410 - عن عبيد بن خالد السُلمي قال: آخى رسول الله صلى الله عليه وسلم بين رجلين، فقتل أحدهما، ومات الآخر بعده بجمعة أو نحوها، فصلينا عليه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما قلتم؟" فقلنا: دعونا له، وقلنا: اللهم اغفر له، وألحقه بصاحبه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فأين صلاته بعد صلاته، وصومه بعد صومه؟" شك شعبة في صومه."وعمله
بعد عمله، إن بينهما كما بين السماء والأرض".
صحيح: رواه أبو داود (2524)، والنسائي (1985) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، قال سمعت عمرو بن ميمون، عن عبد الله بن رُبَيِّعة، عن عبيد الله بن خالد السلمي فذكره واللفظ لأبي داود، ولفظ النسائي نحوه إلا أنه قال بعد ذكر عبد الله بن رُبَيِّعة: وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، ويقال: إن شعبة لم يتابع على قوله هذا، وقد نفى أبو حاتم الصحبة له، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين.
والحديث في مسند الإمام أحمد (16074) من طريق شعبة بإسناده ولكن قال هذا القول في شأن عبيد الله بن خالد السلمي بأنه كان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.
وفي الحديث دليل على فضيلة طول العمر إذا كان معه العمل، ويدل عليه أيضًا حديث سعد بن أبي وقاص كما سبق في كتاب الوضوء، باب ما جاء في فضل الوضوء والصلاة عقبه.
وأما ما رُوي عن طلحة بن عبيد الله في حديث طويل فهو منقطع وتم تخريجه في الباب المشار إليه.
উবাইদ ইবনু খালিদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু’জন লোকের মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করিয়ে দিলেন। অতঃপর তাদের একজন শহীদ হয়ে গেল। আর অন্যজন এর এক জুমু'আহ (সপ্তাহ) বা তার কাছাকাছি সময় পরে মারা গেল। অতঃপর আমরা তার জানাযার সালাত আদায় করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমরা কী বলেছ?” আমরা বললাম: আমরা তার জন্য দু’আ করেছি এবং বলেছি: "হে আল্লাহ! আপনি তাকে ক্ষমা করুন এবং তার সাথীর (শহীদ ব্যক্তির) সাথে তাকে মিলিত করুন।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তাহলে তার (মৃত ব্যক্তির) সালাতের পরের সালাত, তার সাওমের (রোযার) পরের সাওম কোথায়? [শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সাওম (রোযা) সম্পর্কে সন্দেহ পোষণ করেছেন।] আর তার আমলের পরের আমল কোথায়? নিশ্চয়ই তাদের দুজনের মাঝে আসমান ও যমীনের মতো ব্যবধান রয়েছে।”
3411 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يتمنَّينَّ أحد منكم الموت لضُرٍّ نزل به، فإن كان لا بدَّ متمنِّيا للموت فليقل: اللهم أحْيني ما كانت الحياة خيرًا لي وتوفني إذا كانت الوفاةُ خيرًا لي".
متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6351)، ومسلم في الذكر والدّعاء (2680) كلاهما من حديث إسماعيل ابن علية، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس بن مالك فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন তার ওপর আপতিত কষ্টের কারণে মৃত্যু কামনা না করে। আর যদি সে একান্তই মৃত্যু কামনা করতে বাধ্য হয়, তবে সে যেন বলে: হে আল্লাহ! আমাকে ততক্ষণ বাঁচিয়ে রাখুন, যতক্ষণ জীবন আমার জন্য কল্যাণকর হয় এবং আমাকে মৃত্যু দিন, যখন মৃত্যু আমার জন্য কল্যাণকর হয়।
3412 - عن قيس بن أبي حازم قال: دخلنا على خَبَّاب نعوده، وقد اكتوى سبع كيَّات، فقال: إن أصحابنا الذين سلفوا مضوا ولم تنقُصْهم الدنيا، وإنا أصبنا ما لا نجد موضِعا إلا التراب، ولولا أن النبي صلى الله عليه وسلم نهانا أن ندعو بالموت لدعوت به، ثم أتيناه مرة أخرى، وهو يبنى حائطًا له، فقال: إن المسلم ليُؤجر في كل شيء يُنفِقُه إلا في شيء يجعله في هذا التراب.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5672)، ومسلم في الذكر والدّعاء (2681) كلاهما عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم فذكره واللفظ للبخاريّ. وأما مسلم فلم يذكر قول خبَّاب:"إن المسلم يؤجر في كل شيء …".
وفي لفظ عند الترمذي (970) عن حارثة بن مُضَرِّب قال: دخلت على خَبَّاب، وقد اكتوى في بطْنِه فقال: ما أعلم أحدًا من أصحاب النبي لقي من البلاء ما لقيتُ، لقد كنتُ وما أجد درهمًا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، وفي ناحيةٍ من بيتي أربعون ألفًا. ولولا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا أو نهى أن نتمنَّى
الموتَ لتمنَّيتُ.
رواه من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب به مثله.
قوله:"إلا في شيء يجعله في هذا التراب". يعني يتكلف في البناء ما لا يحتاج إليه.
খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কায়স ইবনে আবি হাযিম বলেন: আমরা তাঁকে দেখতে গেলাম, তখন তিনি সাতবার গরম লোহা দ্বারা (পেটে) দাগ দিয়ে চিকিৎসা নিয়েছিলেন। তিনি বললেন: নিশ্চয় আমাদের সেই সাথীরা যারা আগে চলে গেছেন, তারা চলে গেছেন এবং দুনিয়া তাদের কিছুই কমাতে পারেনি। আর আমরা এমন জিনিস অর্জন করেছি যার জন্য মাটি (কবর) ছাড়া আর কোনো স্থান আমরা পাচ্ছি না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যদি আমাদের মৃত্যু কামনা করতে নিষেধ না করতেন, তবে আমি অবশ্যই তা কামনা করতাম। এরপর আমরা আরেকবার তাঁর কাছে আসলাম, তখন তিনি নিজের জন্য একটি দেয়াল বানাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: মুসলিম যে জিনিসই খরচ করে, তার সবকিছুর জন্য তাকে সাওয়াব দেওয়া হয়, তবে ওই জিনিস ছাড়া যা সে এই মাটির উপর (অর্থাৎ, নির্মাণ কাজে) ব্যয় করে।
3413 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لن يُدخل أحدًا عملُه الجنة" قالوا: ولا أنت يا رسول الله؟ قال:"لا، ولا أنا، إلا أن يتغمدني الله بفضلٍ ورحمةٍ، فسَدِّدوا وقَارِبُوا، ولا يتمنينَّ أحدكم الموت، إما محسنًا فلعله أن يزداد خيرًا، وإما مُسيئًا فلعله أن يستعتِب".
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5673) عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن الزهري، قال: أخبرني أبو عبيد مولى عبد الرحمن بن عوف، أن أبا هريرة قال: فذكره.
ورواه مسلم في صفات المنافقين (2816) من طريق ابن شهاب بإسناده، ومن أوجه كثيرة غير أنه لم يذكر فيه النهي عن تمني الموت.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কারো আমলই তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাতে পারবে না।" তাঁরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল, আপনিও কি নন?" তিনি বললেন: "না, আমিও নই। তবে আল্লাহ যদি আমাকে তাঁর দয়া ও করুণা দ্বারা আবৃত করেন (তাহলে ভিন্ন কথা)। সুতরাং তোমরা সঠিক কাজ করে যাও এবং (সদাচরণের) কাছাকাছি থাকো। আর তোমাদের কেউ যেন মৃত্যু কামনা না করে। কেননা, সে যদি নেককার হয়, তাহলে হয়তো সে আরো বেশি নেক কাজ করার সুযোগ পাবে। আর যদি সে পাপী হয়, তাহলে হয়তো সে (তাওবা করে) আল্লাহর সন্তুষ্টি অর্জন করতে পারবে।"
3414 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يتمنَّى أحدكم الموتَ، ولا يدْعُ به من قبل أن يأتيه، إنه إذا مات أحدكم انقطع عملُه. وإنه لا يزيد المؤمنَ عمرُه إلا خيرًا".
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2682) من حديث همام بن منبه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر أحاديث منها: هذا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা না করে এবং তা আসার আগে যেন এর জন্য দু'আ না করে। কেননা তোমাদের কেউ যখন মারা যায়, তখন তার আমল বন্ধ হয়ে যায়। আর মু'মিনের দীর্ঘ জীবন কেবল তার জন্য কল্যাণই বৃদ্ধি করে।
3415 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تمنوا الموت، فإن هول المطَّلع شديد، وإن من السعادة أن يطولَ عمرُ العبد، ويرزقه الله الإنابة".
حسن: رواه الإمام أحمد (14564)، والبزار"كشف الأستار" (3240، 3422) كلاهما من طريق أبي عامر العقدي (وهو عبد الملك بن عمرو العقَدي)، حدثنا كثير بن زيد، حدثني الحارث ابن يزيد، قال: سمعتُ جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل الحارث بن يزيد وهو من رجال التعجيل (166)، ذكره ابن حبان في الثقات وقال:"روى عنه محمد بن يحيى المدني، وكثير بن زيد".
وأورده المنذري في"الترغيب" (4/ 257)، وعزاه إلى أحمد، وحسّن إسناده ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم في"المستدرك" (4/ 240) وسكت عنه.
وأما ما رُوي عن أم الفضل أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على العباس وهو يشتكي، فتمنى الموتَ، فقال:"يا عباس، يا عم رسول الله، لا تتمنَّ الموتَ، إن كنت محسنًا تزداد إحسانًا إلى إحسانك خير لك، وإن كنت مسيئًا، فإن تؤخر تستعتبُ خير لك، فلا تتمنى الموت".
قال يونس:"وإن كنت مسيئًا فإن تُؤخَّر تستعتب من إساءتك خير لك".
رواه الإمام أحمد (26874)، وأبو يعلى (7076)، والطبراني (44) كلهم من طريق يزيد بن الهاد، عن هند بنت الحارث عن أم الفضل فذكرته.
وهند بنت الحارث هي الخثعمية امرأة عبد الله بن شَدَّاد بن الهاد، روت عن أم الفضل لُبابة بنت الحارث حديثين أحدهما هذا، ولم يُوثقها غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ"مقبولة" أي حيث تتابع، ولم تتابع، فهي مجهولة ولينة الحديث.
ورواه الحاكم (1/ 339) وقال:"صحيح على شرط الشيخين" وكذا أورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 256) وقال:"صحيح على شرط الشيخين". وذلك ظنًا منهما بأن هند بنت الحارث هي: الفِراسية -بكسر الفاء، ويقال لها: القرشية، فإنها ثقة من رجال البخاري، والصواب كما قلت إنها الخثعمية، والله تعالى أعلم.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মৃত্যুর কামনা করো না। কারণ (মৃত্যুর পর) সম্মুখীন হওয়ার ভয়াবহতা অত্যন্ত কঠিন। আর নিশ্চয়ই এটা সৌভাগ্যের বিষয় যে, বান্দার জীবন দীর্ঘ হয় এবং আল্লাহ তাকে (আল্লাহর দিকে) প্রত্যাবর্তন করার (বা তাওবা করার) ক্ষমতা দান করেন।"
3416 - عن عائشة قالت: إن رجلا قال للنبي صلى الله عليه وسلم إن أمي افْتُلِتَتْ نفسُهَا، وأظنها لو تكلمتْ تصدقتْ، فهل لها أجر إن تصدقتُ عنها؟ قال:"نعم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1388)، ومسلم في الزكاة (1004) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته، واللفظ للبخاري.
وفي الحديث إشارة بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يُبد كراهيته لموت الفُجاءة.
وقوله:"افتُلِتَتْ" بضم التاء وكسر اللام -أي سُلِبَتْ على ما لم يُسم فاعله، يقال: افتلَتَ فلان- أي مات فجأةٌ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল, "আমার মায়ের হঠাৎ মৃত্যু হয়েছে (তার রূহ ছিনিয়ে নেওয়া হয়েছে), আর আমি ধারণা করি যে, যদি তিনি কথা বলতে পারতেন, তবে অবশ্যই সাদকা করতেন। আমি যদি তার পক্ষ থেকে সাদকা করি, তবে কি তার জন্য সওয়াব হবে?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।"
3417 - عن تميم بن سلمة أو سعد بن عبيدة، عن عبيد بن خالد السلمي رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال مرة: عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال مرة: عن عبيد قال:"موت الفجأة أخْذةُ أسَفٍ.
صحيح: رواه أبو داود (3110) عن مسدد، حدثنا يحيى، عن شعبة، عن منصور، عن تميم بن سلمة، أو سعد بن عبيدة، عن عبيد بن خالد السلمي فذكره.
ومن طريق أبي داود رواه البيهقي (3/ 378) وقال:"ورواه روح بن عبادة، عن شعبة، عن منصور، عن تميم بن سلمة، عن عبيد من غير شك ورفعه، قال شعبة: هكذا حدثنيه، وحدثنيه مرة أخرى فلم يرفعه. وقال محمد بن بشار، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة بهذا موقوف".
قلت: هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد (15497) عن محمد بن جعفر وهو غندر، عن شعبة موقوفًا،
كما رواه قبله عن يحيى بن سعيد، عن شعبة موقوفًا أيضًا وقال: وحدَّث به مرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. والحكم في هذا المتن لمن رفعه، لأن معه زيادة علم، وقول الحافظ في"الفتح" (3/ 254):
"في إسناده مقال، لأن راويه رفعه مرة، ووقفه أخرى" فيه نظر؛ فإن فيه من رواه بدون شك، وقد أجاد المنذري في قوله في"مختصر أبي داود":"رجال إسناده ثقات، والوقف فيه لا يُؤَثِّر، فإن مثله لا يُؤخذ بالرأي، فكيف وقد أسنده الراوي مرة، والله أعلم".
وقوله:"أَسَف" بفتح السين -غَضب وزنا ومعني، ورُوي بوزن فاعل أي غضبان، والمراد أنه أثر غضبه تعالى حيث لم يتركه للتوبة، وإعداد زاد الآخرة.
وقد نُقل عن أحمد وبعض الشافعية كراهة موت الفجأة.
ونقل النووي عن بعض القدماء:"أن جماعة من الأنبياء والصالحين ماتوا كذلك". قال النووي:"وهو محبوب للمراقبين" انتهى كلامه.
قال الحافظ ابن حجر:"وبذلك يجتمع القولان" انظر:"الفتح" (3/ 255).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم"إني أكره موت الفوات" فهو ضعيف جدًّا، رواه الإمام أحمد (8666)، وأبو يعلى (6612) كلاهما من طريق إسرائيل بن يونس، عن إبراهيم بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بجدار، أو حائط مائل، فأسرع المشي، فقيل له فقال:"إني أكره موت الفوات"، إبراهيم بن إسحاق هو: يقال له: إبراهيم ابن الفضل المخزومي المدني، قال فيه البخاري:"منكر الحديث" وقال الدارقطني:"متروك" وضعَّفه غير واحد من الأئمة.
وكذلك لا يصح ما رُوي عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم إني أعوذ بك أن أموت غمًّا، أو هَمًّا، أو أن أموت غرقًا، وأن يتخبطني الشيطانُ عند الموت، وأن أموت لديغًا" رواه الإمام أحمد (8667) وفيه أيضًا إبراهيم بن إسحاق وهو: ابن الفضل المخزومي.
وقد رُوي استعاذته عن موت الفجاءة عن عمرو بن العاص وابنه عبد الله بن عمرو وأبي أمامة وغيرهم وفي كلها مقال.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة قالت: سألت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن موت الفَجْأة؟ فقال:"راحة للمؤمن وأخذةُ أَسَفٍ للفاجر" رواه الإمام أحمد (25042) عن وكيع، حدثنا عبيد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن عائشة فذكرته. وعبيد الله بن الوليد وهو الوصافي ضعيف جدًّا، وعبد الله بن عبيد بن عمير لم يسمع من عائشة، وله طرق أخرى أضعف منها.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن موسى بن طلحة قال: بلغ عائشة أن ابن عمر يقول: إن موت الفجأة سُخطةٌ على المؤمنين، فقالت: يغفر الله لابن عمر! إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"موت الفجأة تخفيف عن المؤمنين، وسُخطة على الكافرين" رواه الطبراني في"الأوسط" (3153) عن بكر، قال: حدثنا سعيد بن منصور، قال: نا صالح بن موسى الطلحي، عن عبد الملك بن عُمير، عن موسى بن طلحة فذكره.
قال الطبراني:"لم يروه عن عبد الملك إلا صالح".
قلت: صالح بن موسى هو ابن إسحاق بن طلحة التيمي قال فيه ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم: ضعيف. وقال ابن حبان:"كان يروي عن الثقات ما لا يُشبه حديث الأثبات".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود مرفوعًا:"إن نفس المؤمن تخرج رَشْحًا، ولا أحب موتًا كموت الحمار" قيل: وما موتُ الحمار؟ قال:"موت الفَجْأَةِ". رواه الترمذي (980) عن أحمد بن الحسن، قال: حدثنا مسلم بن إبراهيم، قال: حدثنا حُسام بن المِصكِّ قال: حدثنا أبو معشر، عن إبراهيم، عن علقمة، قال: سمعت عبد الله فذكره.
وحُسام بن المِصَكِّ -بكسر الميم، وفتح المهملة، وبعدها كاف مثقلة، الأزدي أبو سهل البصري ضعَّفه أكثر أهل العلم حتى قال الدارقطني: متروك الحديث. وفي التقريب:"ضعيف، يكاد أن يترك".
উবাইদ ইবনু খালিদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবিদের মধ্যে একজন ছিলেন। তিনি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, আবার একবার উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: "আকস্মিক মৃত্যু (মওতূল ফাজআহ) হলো আক্ষেপের সাথে পাকড়াও করা।"
3418 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قال الله تبارك وتعالى للنفس: اخرجي. قالت: لا أخرج إلا كارهة. قال: اخرجي وإن كرهت".
صحيح: رواه البخاري في"الأدب المفرد" (219) والبزار (9590) والبيهقي في"الزهد" (460) من حديث موسى بن إسماعيل قال: حدثنا الربيع بن مسلم، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكره.
وقال البزار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه إلا أبو هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا رواه عن أبي هريرة إلا محمد بن زياد، ولا عن محمد إلا الربيع بن مسلم، والربيع بن مسلم ثقة مأمون". أهـ.
قلت: وكذلك محمد بن زياد (وهو القرشي الجمحي)، وموسى بن إسماعيل ثقتان ثبتان.
قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2/ 325):"رواه البزار ورجاله ثقات".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা নফস (আত্মা)-কে বললেন: তুমি বের হয়ে এসো। নফস বললো: আমি অনিচ্ছায় বের হবো না। আল্লাহ বললেন: তুমি বের হয়ে এসো, যদিও তুমি অনিচ্ছুক হও।"
3419 - عن أمِّ سلمة قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم على أبي سلمة، وقد شق بصره فأغمضه، ثم قال:"إن الرُوح إذا قُبض تبعه البصر" فضجَّ ناس من أهله فقال:"لا تدعوا على أنفسكم إلا بخير، فإن الملائكة يؤمنون على ما تقولون".
ثم قال:"اللهم اغفر لأبي سلمة، وارفع درجته في المهديين، واخلفْه في عقِبه في الغابرين، واغفر لنا وله يا رب العالمين، وافسح له في قبره، ونور له فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (920) عن زهير بن حرب، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق الفزاري، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن قبيصة بن ذُؤيب، عن أم سلمة فذكرته.
ورواه من وجه آخر عن عبيد الله بن الحسن، عن خالد الحذاء بهذا الإسناد نحوه غير أنه قال فيه:"واخْلُفه في تركته" وقال:"اللهم أوسع له في قبره" ولم يقل:"افسح له" وزاد: قال خالد الحذاء: ودعوة أخرى سابعة نسيتُها.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আবূ সালামাহর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন তার দৃষ্টি স্থির হয়ে গিয়েছিল (দৃষ্টি উপরের দিকে ছিল)। তিনি তার চোখ দুটি বন্ধ করে দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই যখন রূহ কব্জ করা হয়, তখন দৃষ্টি তা অনুসরণ করে।"
তখন তাঁর (আবূ সালামাহর) পরিবারের কিছু লোক উচ্চস্বরে কান্নাকাটি শুরু করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের নিজেদের জন্য কল্যাণ ছাড়া অন্য কিছুর দ্বারা বদদোয়া করো না। কারণ তোমরা যা বলো, ফেরেশতারা তার উপর 'আমীন' বলেন।"
এরপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আবূ সালামাহকে ক্ষমা করে দাও, হেদায়েত প্রাপ্তদের মধ্যে তার মর্যাদা বাড়িয়ে দাও, তার পরবর্তী বংশধরদের মধ্যে তুমি তার প্রতিনিধি হও, হে সৃষ্টিকুলের রব! আমাদের এবং তাকে ক্ষমা করো, আর তার কবর প্রশস্ত করে দাও এবং সেখানে তার জন্য নূর দ্বারা আলোকিত করে দাও।"
3420 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم تروا الإنسان إذا مات شَخَصَ بصرُه؟" قالوا: بلى. قال:"فذلك حين يتبع بصرُه نفْسَه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (921) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، عن العلاء بن يعقوب، قال: أخبرني أبي أنه سمع أبا هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কি দেখো না, যখন কোনো মানুষ মারা যায়, তখন তার চক্ষু স্থির হয়ে যায়?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "এটা তখনই ঘটে যখন তার দৃষ্টি তার আত্মাকে অনুসরণ করে।"
3421 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نعى النجاشيَّ في اليوم الذي مات فيه، خرج إلى المصلى فصف بهم، وكبَّر أربعًا.
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الجنائز (1245) عن إسماعيل، ومسلم في الجنائز (951) عن يحيى بن يحيى -كلاهما عن مالك به مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজ্জাশী (হাবশার বাদশাহ)-এর মৃত্যুর দিনেই তাঁর মৃত্যুর সংবাদ ঘোষণা করেছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মাঠে বের হলেন এবং সাহাবীগণকে কাতারবদ্ধ করলেন, আর চার তাকবীর দিলেন।
3422 - عن أبي هريرة قال: نعى رسول الله صلى الله عليه وسلم النجاشيَّ صاحب الحبشة يوم الذي مات فيه فقال:"استغفروا لأخيكم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1327)، ومسلم في الجنائز (951/ 63) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة، أنهما حدثاه عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাবশার (আবিসিনিয়া) বাদশাহ নাজাশীর মৃত্যুর দিন তাঁর মৃত্যুর সংবাদ ঘোষণা করেন, অতঃপর বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।"
3423 - عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أخًا لكم قد مات، فقوموا فصلوا عليه" يعني النجاشي.
وفي رواية:"إن أخاكم".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (953) من طرق، عن ابن علية، عن أبوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلَّب، عن عمران بن حصين فذكره.
وفي السنن: فقمنا فصففنا عليه كما يُصف على الميت، وصلينا عليه كما يُصَلَّى على الميت. رواه النسائي (1975) من طريق محمد بن سيرين، عن أبي المهلب بإسناده.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের এক ভাই মারা গেছেন, তাই তোমরা দাঁড়াও এবং তার উপর সালাত আদায় করো।" (অর্থাৎ তিনি নাজ্জাশীর কথা বোঝাচ্ছিলেন।)
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "নিশ্চয় তোমাদের ভাই।"
এবং সুনান গ্রন্থসমূহে এসেছে: অতঃপর আমরা দাঁড়ালাম এবং মৃতের জন্য যেভাবে কাতার তৈরি করা হয়, আমরা তার জন্য সেভাবে কাতার তৈরি করলাম এবং মৃতের জন্য যেভাবে সালাত আদায় করা হয়, আমরা সেভাবে তার উপর সালাত আদায় করলাম।
3424 - عن أنس بن مالك قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أخذ الراية زيد فأُصيبَ، ثم أخذها
جعفر فأُصيب، ثم أخذها عبد الله بن رواحة فأُصيبَ، -وإن عيني رسول الله صلى الله عليه وسلم لتذرفان- ثم أخذ الراية خالد بن الوليد من غير إمرةٍ ففُتح له".
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1246) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا أيوب، عن محمد بن هلال، عن أنس فذكره.
وبوَّب البخاري بقوله: الرجل ينعي إلى أهل البيت بنفسه.
قال الحافظ:"وفائدة هذه الترجمة الإشارة إلى أن النعي ليس ممنوعًا كله. وإنما نُهي عما كان أهل الجاهلية يصنعونه فكانوا يرسلون من يُعلن بخبر موت الميت على أبواب الدور والأسواق".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যায়িদ (ইবনে হারিসা) পতাকা ধারণ করলেন এবং শহীদ হলেন। এরপর জা'ফর (ইবনে আবী তালিব) তা ধরলেন এবং তিনিও শহীদ হলেন। এরপর আবদুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা তা ধরলেন এবং তিনিও শহীদ হলেন। - আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উভয় চোখ থেকে তখন অশ্রু ঝরছিল - এরপর খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (কোনো পূর্ববর্তী) নেতৃত্ব ছাড়াই পতাকাটি ধারণ করলেন এবং আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।"
3425 - عن خالد بن شُمير قال: قَدِمَ علينا عبد الله بن رباح فوجدته قد اجتمعَ إليه ناسٌ من الناس، قال: حدَّثنا أبو قتادة فارسُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: بعثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جيشَ الأُمراء وقال:"عليكم زيدُ بن حارثةَ، فإنْ أُصيبَ زيدٌ، فجَعْفَرٌ، فإنْ أُصِيبَ جعفرٌ، فعبد الله بن رواحةَ الأنصاريُّ" فوثبَ جعفرٌ، فقال: بأبي أنت يا نبيَّ الله وأُمِّي، ما كنتُ أَرهبُ أن تستعمل عليَّ زيدًا، قال:"امْضُوا فإِنَّكَ لا تَدْري أيُّ ذلك خَيْرٌ" قال: فانطلق الجيشُ فَلَبثُوا ما شاء الله، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم صَعِدَ المِنبر وأَمَرَ أن يُنادَى: الصَّلاةُ جَامِعَة، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"نابَ خبرٌ -أوْ ثابَ خبرٌ، شكَّ عبد الرحمن- ألا أُخْبِرُكم عن جَيْشِكُم هذا الغازي، إنَّهم انطلقُوا حتى لَقُوا العَدُوَّ، فأصيبَ زيدٌ شهيدًا، فاستغفِرُوا له" فاستغفر له الناسُ"ثم أخَذَ اللِّواءَ جعفرُ بنُ أبي طالب فَشَدَّ على القَوم حتَّى قُتِلَ شهيدًا، أَشْهَدُ له بالشَّهادَةِ، فاستغفِرُوا له، ثم أَخَذَ اللِّواءَ عبد الله بنُ رواحَةَ، فأَثبتَ قَدَمَيْهِ حتَّى أُصِيبَ شَهِيدًا، فاستغفروا له، ثم أَخَذَ اللِّواءَ خالدُ بنُ الوليدِ ولم يكُنْ مِن الأُمَرَاءِ، هو أَمَّرَ نَفْسَه" فرفع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أُصبَعَيْه، وقال:"اللهمَّ هو سَيْفٌ مِن سُيوفِك فانصره"، وقال عبد الرحمن مرة:"فانتصر به" فيومئذ سُمي خالد سيف الله. ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"انفِرُوا فأمدُّوا إخوانكم ولا يتخَلَّفَنَّ أحد" فنفر الناس في حرٍّ شديدٍ مشاةً وركبانًا.
حسن: رواه الإمام أحمد (22551) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا الأسود بن شيبان، عن خالد بن شُمير فذكره.
وإسناده حسن لأجل خالد بن شُمير، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يَهِمْ.
وصحّحه ابن حبان (7048) من وجه آخر عن سليمان بن حرب، عن الأسود بن شيبان به مثله.
وأما ما رُوي عن حذيفة أنه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن النعي فهو ضعيف. رواه الترمذي (986)،
وابن ماجه (1476) كلاهما من طريق حبيب بن سُليم العبسي، عن بلال بن يحيى العبسي، عن حذيفة بن اليمان قال: إذا متُّ فلا تُؤذنوا لي، إني أخاف أن يكون نعْيًا، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن النعي.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (23270).
وفي رواية ابن ماجه: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم بأذُنيَّ هاتين ينهى عن النعي". قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: في تحسينه وتصحيحه نظر، فإن بلال بن يحيى العبسي لم يسمع من حذيفة كما قال ابن معين، وروايته عن حذيفة بلاغات. قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (2/ 396):"والذي روي عن حذيفة -وجدته يقول- بلغني عن حذيفة".
وقال أبو الحسن القطان:"روي عن حذيفة أحاديث معنعنة، ليس في شيء منها ذكر سماع.
وحبيب بن سُليم العَبسي لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، وحيث لم يتابع فهو"ليّنُ الحديث".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود برفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والنعيَ فإن النعي، من عمل الجاهلية".
قال عبد الله:"النعي أذان للميت".
رواه الترمذي (984، 985) من وجهين من طريق عنبسة وسفيان الثوري كلاهما عن أبي حمزة، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله رفعه في رواية عنبسة، ولم يرفعه في رواية الثوري.
قال الترمذي:"وهذا أصح من حديث عنبسة عن أبي حمزة. وأبو حمزة هو ميمون الأعور. وليس هو بالقوي عند أهل الحديث، وقال: حديث عبد الله حسن غريب". انتهى.
وفي قوله:"حسن" نظر، لأنه لم يرو إلَّا من طريق أبي حمزة. وقد اتفق جمهور أهل العلم على تضعيفه.
والمنع من نعي الجاهلية هو أن يُنادَي على المنائر والأسواق بأن فلانًا قد مات، فاحضروا جنازته، ويدفع الأجرة على هذا، وقد يمدح السائحُ الميتَ بما قد يعلم أنه ليس كذلك لأجل الأُجرة. فهذا محرم قطعًا، أما إعلام الأقارب والأصدقاء فلا بأس به، بل هو مشروع لحضور جنازته والدّعاء له بالمغفرة.
আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমীরদের (সেনাপতিদের) একটি সৈন্যদল প্রেরণ করলেন এবং বললেন: "তোমাদের দায়িত্বে থাকবে যায়দ ইবন হারিসাহ। যদি যায়দ আক্রান্ত হয় (শহীদ হয়), তবে জাফর (সেনাপতি হবে)। যদি জাফর আক্রান্ত হয় (শহীদ হয়), তবে আবদুল্লাহ ইবন রাওয়াহাহ আনসারী (সেনাপতি হবে)।"
তখন জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন: আমার পিতা ও মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোন, হে আল্লাহর নবী! আমি এই ভয় করিনি যে আপনি আমার উপর যায়দকে সেনাপতি নিযুক্ত করবেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা যাও, কারণ তুমি জানো না যে এর মধ্যে কোনটি কল্যাণকর।"
তিনি বললেন: এরপর সেনাবাহিনী চলে গেল এবং আল্লাহ যা চাইলেন, তত দিন তারা সেখানে থাকল। তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং ঘোষণা দেওয়ার নির্দেশ দিলেন: "আস-সালাতু জামিআহ" (নামাযের জন্য সকলে সমবেত হও)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "(নতুন) সংবাদ এসেছে – অথবা (অন্য বর্ণনায়) সংবাদ ফিরে এসেছে – (বর্ণনাকারী আবদুর রহমানের সন্দেহ)। আমি কি তোমাদেরকে তোমাদের এই গাজীর (যোদ্ধা) সেনাবাহিনী সম্পর্কে খবর দেব না? তারা যাত্রা করেছে এবং শত্রুদের সম্মুখীন হয়েছে। অতঃপর যায়দ শহীদ হয়েছে। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।" তখন লোকেরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করল। "এরপর জাফর ইবন আবী তালিব পতাকা গ্রহণ করল এবং সে শত্রুদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল, শেষ পর্যন্ত সেও শহীদ হলো। আমি তার জন্য শাহাদাতের সাক্ষ্য দিচ্ছি। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।" এরপর আবদুল্লাহ ইবন রাওয়াহাহ পতাকা গ্রহণ করল এবং সে দৃঢ়তার সাথে দাঁড়িয়ে থাকল, অবশেষে সেও শহীদ হলো। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো। "এরপর খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ পতাকা গ্রহণ করল, অথচ সে আমীরদের (মনোনীত সেনাপতিদের) অন্তর্ভুক্ত ছিল না। সে নিজেই নিজেকে সেনাপতি নিযুক্ত করল।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু'টি আঙুল উপরে তুললেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! সে তোমার তরবারিগুলোর মধ্যে একটি তরবারি। সুতরাং তুমি তাকে সাহায্য করো।" আর (বর্ণনাকারী) আবদুর রহমান একবার বললেন: "তুমি তাকে দিয়ে বিজয় দান করো।" সেই দিন থেকেই খালিদকে 'সাইফুল্লাহ' (আল্লাহর তরবারি) নামে ডাকা হয়।
এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা (যুদ্ধের জন্য) বেরিয়ে পড়ো এবং তোমাদের ভাইদেরকে সাহায্য করো। কেউ যেন পিছনে না থাকে।" অতঃপর প্রচণ্ড গরমের মধ্যে লোকেরা পদব্রজে এবং আরোহী হয়ে (যুদ্ধের উদ্দেশ্যে) বেরিয়ে পড়ল।
3426 - عن سعد بن أبي وقاص قال: جاءني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يعودني عام حجة الوداع، من وجع اشتد بي، فقلتُ: يا رسولَ الله، قد بلغ بي من الوجع ما تَرَى، وأنا ذُو
مالٍ، ولا يرثني إلَّا ابنة لي، أفأَتَصدَّقُ بثُلُثَي مَالِي؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا" فقلت: فالشَّطْرُ؟ قال:"لا" ثم قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"الثُّلُثُ، والثلث كثير، إنك أنْ تَذر ورثتك أغنياء خير من أن تذرَهم عالة يتكفَّفُون الناس، وإنك لن تُنفِقَ نفقَة تبتغي بها وجه الله، إلَّا أُجرتَ، حتى ما تجعل في فِي امرأتِكَ" قال: فقلتُ: يا رسول الله! أُخَلَّفُ بعد أصحابي؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّكَ لَنْ تُخَلَّفَ، فَتَعملَ عملًا صالِحًا، إلَّا ازْدَدْتَ به درجةً ورِفْعَةً. ثُم لعلك أن تُخَلَّفَ حتى ينتفِعَ بك أقوامٌ ويُضَرَّ بك آخرُون. اللَّهمَّ! أَمْضِ لأصحابي هِجْرَتَهُم، ولا تردهم على أعقابهم، لكن البائسُ سعد بن خولة"، يَرْثِي له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنْ ماتَ بمَكَّة.
متفق عليه: رواه مالك في الوصية (4) عن ابن شهاب، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه أنَّه قال: فذكر الحديث.
ورواه البخاري في الجنائز (1295) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله.
ورواه مسلم في الوصية (1628) من طرق عن ابن شهاب بإسناده مثله.
وقوله:"لكن البائسُ سعد بن خولة" البائس: اسم فاعل من بئس يبأس إذا أصابه بؤس، وهو الضرر، وسعد بن خولة هو: زوج سبعة الأسلمية، وهو رجل من بني عامر بن لؤي، أنَّه هاجر إلى المدينة وشهد بدرًا وغيرها ثم رجع إلى مكة مختارًا، وتوفي بها في حجة الوداع، فرثى له النبي صلى الله عليه وسلم. فتحرَّج سعد بن أبي وقاص والمهاجرون من أن يموتوا بمكة.
وأما قوله:"يرثي له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن مات بمكة" فقيل: إنه من كلام سعد بن أبي وقاص، وقيل: إنه من كلام الزهري وعليه أكثر الناس.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিদায় হজ্জের বছর আমার কঠিন অসুস্থতার সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এসেছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি দেখতেই পাচ্ছেন, আমার অসুস্থতা কত গুরুতর হয়েছে। আর আমি একজন সম্পদশালী ব্যক্তি, আমার একজন মাত্র কন্যা ছাড়া অন্য কেউ আমার ওয়ারিশ নেই। আমি কি আমার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ সাদাকা করে দেব? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "না।" আমি বললাম, তবে কি অর্ধেক? তিনি বললেন, "না।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এক-তৃতীয়াংশ। আর এক-তৃতীয়াংশই অনেক। তুমি যদি তোমার উত্তরাধিকারীদেরকে সচ্ছল অবস্থায় রেখে যাও, সেটাই মানুষের কাছে হাত পেতে বেড়ানো নিঃস্ব অবস্থায় রেখে যাওয়ার চেয়ে উত্তম। আর আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে তুমি যা কিছুই ব্যয় করবে, তার প্রতিদান তুমি অবশ্যই পাবে—এমনকি তোমার স্ত্রীর মুখে তুমি যে লোকমা তুলে দাও, তার জন্যও।"
তিনি (সা'দ) বললেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আমার সাথীদের পরে (মক্কায়) থেকে যাব? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তুমি যদি পেছনে থেকে যাও এবং কোনো ভালো কাজ করো, তাহলে এর মাধ্যমে তোমার মর্যাদা ও উচ্চতা বৃদ্ধি পাবে। হয়তো তুমি পেছনে থেকে যাবে, ফলে একদল লোক তোমার দ্বারা উপকৃত হবে এবং অন্যরা তোমার দ্বারা ক্ষতিগ্রস্ত হবে। হে আল্লাহ! আমার সাহাবীদের হিজরতকে স্থায়ী করে দাও, আর তাদের উল্টো দিকে ফিরিয়ে দিও না। কিন্তু সা'দ ইবনু খাওলা বড়ই দুর্ভাগা।" (সা'দ ইবনু খাওলা মক্কায় মৃত্যুবরণ করায়) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য আক্ষেপ করছিলেন।
3427 - عن عبد الله بن جعفر أن النبي صلى الله عليه وسلم أمهل آل جعفر ثلاثًا أن يأتيهم، ثم أتاهم فقال:"لا تبكوا على أخي بعد اليوم" ثم قال:"ادعوا لي بني أخي" فجئ بنا كأنَّا أفْرخ، فقال:"ادعو لي الحلاق" فأمره فحلق رؤوسنا.
وزاد أحمد في روايته: ثم قال:"أما محمد فشبيه عمنا أبي طالب، وأما عبد الله فشبيه خَلقي وخُلقي" ثم أخذ بيدي فأشالها فقال:"اللَّهم! اخلُف جعفرًا في أهله، وبارك لعبد الله في صفْقَة يمينه" قالها ثلاث مرات. قال: فجاءت أمنا، فذكرت له يُتْمنا، وجعلتْ تُفْرِح له، فقال:"العيلة تخافين عليهم، وأنا وَلِيُّهم في الدّنيا والآخرة".
صحيح: رواه أبو داود (4192)، والنسائي (5227) كلاهما من حديث وهب بن جرير، قال:
حدثنا أبي، قال: سمعتُ محمد بن أبي يعقوب، يحدث عن الحسن بن سعد، عن عبد الله بن جعفر فذكر الحديث مختصرًا.
ورواه الإمام أحمد (1750) عن وهب بن جرير بإسناده بأتم منه كما ذكرت بعضه، والبعض الآخر في المواضع المناسبة، وإسناده صحيح. وأخرجه الحاكم (3/ 298) قطعةً منه وقال:"صحيح الإسناد".
تنبيه: سقط من النسائي"الحسن بن سعد" وهو ثابت في السنن الكبرى له (9295) فتنبه.
وقوله:"فحلق رؤوسنا" لأن أمهم شغلت بالمصيبة عن ترجيل شعورهم وغسل رؤوسهم، فخاف عليهم الوسخ والقمل، كما أفاده السيوطي.
আব্দুল্লাহ ইবনে জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের কাছে আসার জন্য তাদের তিন দিন সময় দিলেন। অতঃপর তিনি তাদের কাছে এসে বললেন: "আজকের পর আমার ভাইয়ের জন্য আর কান্নাকাটি করো না।" এরপর তিনি বললেন: "আমার ভাইয়ের সন্তানদেরকে আমার কাছে ডেকে আনো।" তখন আমাদেরকে আনা হলো, আমরা যেন ছিলাম ছোট পাখির ছানা। তিনি বললেন: "আমার জন্য নাপিতকে ডাকো।" অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন এবং সে আমাদের মাথা মুণ্ডন করে দিল।
ইমাম আহমাদ তাঁর বর্ণনায় যোগ করেছেন: এরপর তিনি বললেন: "মুহাম্মাদ আমাদের চাচা আবূ ত্বালিবের মতো দেখতে, আর আব্দুল্লাহ তার শারীরিক গঠন ও চরিত্রে আমার অনুরূপ।" এরপর তিনি আমার হাত ধরে তুলে ধরলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! জা'ফরের অনুপস্থিতিতে তার পরিবারে তুমিই তার স্থলাভিষিক্ত হও, এবং আব্দুল্লাহর ডান হাতের লেনদেনে বরকত দাও।" তিনি এই কথা তিনবার বললেন।
তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে জা'ফর) বললেন: তখন আমাদের মা এলেন এবং তাঁর কাছে আমাদের ইয়াতিম হওয়ার কথা উল্লেখ করলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চিন্তিত করতে লাগলেন। তিনি (নবী) বললেন: "তুমি কি তাদের দারিদ্র্যের ভয় করছো? আমিই তো দুনিয়া ও আখিরাতে তাদের অভিভাবক।"
