হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4341)


4341 - عن جرير بن عبد الله، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"صيام ثلاثة أيام من كلّ شهر صيام الدّهر، وأيام البيض صبيحة ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".

صحيح: رواه النسائي (2420) عن مخلد بن الحسن، حدثنا عبيدالله، عن زيد بن أبي أنيسة، عن أبي إسحاق، عن جرير بن عبد الله، فذكره.

قال الحافظ في الفتح (4/ 226):"وإسناده صحيح".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1588):"إسناده جيد".

وهو كما قالا إلا أن أبا إسحاق وهو عمرو بن عبد الله الهمداني السبيعي وُصف بالتدليس إلا أن الأئمة تحمّلوا تدليسه.




জারীর ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রতি মাসে তিন দিন রোজা রাখা সারা বছর রোজা রাখার সমতুল্য। আর আইয়ামে বীয (শুভ্র দিনগুলো) হলো মাসের তেরো, চৌদ্দ ও পনেরো তারিখের সকাল বেলা।









আল-জামি` আল-কামিল (4342)


4342 - عن ابن عباس قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم لا يفطر أيام البيض في حضر، ولا سفر.

حسن: رواه النسائي (2345) عن القاسم بن زكريا، قال: حدثنا عبيدالله، قال: حدثنا يعقوب، عن جعفر، عن سعيد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل يعقوب وهو ابن عبد الله القمي، وشيخه جعفر وهو ابن أبي المغيرة القمي، وكلاهما مختلف فيهما غير أنهما حسنا الحديث.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুকিম অবস্থায় এবং সফর অবস্থায় আইয়ামে বীজের (শুক্লপক্ষের) রোযা কখনও ছাড়তেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (4343)


4343 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل:"وَصُمْ من كلّ شهر، ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (1887) والبيهقي في دلائل النبوة (6/ 294) كلاهما من حديث يحيي بن عبد الرحمن الأرحبي، حدثني عبيدة بن الأسود، عن القاسم بن الوليد، عن سنان ابن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكر حديثا طويلا.

وهذا جزء منه، والجزء الثاني في كتاب الصلاة، والجزء الثالث منه في كتاب الحج، فضل يوم عرفة.
وإسناده حسن، وكذلك حسّنه أيضًا البيهقي، انظر تخريجه المفصل فيما مضى.

وفي الباب عن قتادة بن ملحان القيسي أنه كان مع النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يأمرهم بصيام البيض" ويقول:"هي صيام الدّهر".

رواه أبو داود (2449)، والنسائي (2430)، وابن ماجه (1707)، وأحمد (20316)، وابن حبان (3651) كلّهم من حديث أنس بن سيرين، عن ابن ملحان القيسي، عن أبيه، فذكره.

وابن ملحان قيل هو قتادة بن ملحان القيسي، وقيل: ملحان بن شبل والد عبد الملك بن ملحان، وقيل: إنه منهال بن ملحان والد عبد الملك. قال ابن معين: هو خطأ. قاله المنذري.

قلت: ابن ملحان هذا لم يرو عنه غير أنس بن سيرين ولم يوثقه أحد، ولذا يعد من المجاهيل.

وأما ابن حبان فذكره في"الثقات" على قاعدته في توثيق المجاهيل، وأخرج حديثه في"صحيحه". وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد من تابعه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বললেন, "আর তুমি প্রতি মাসে তেরো, চৌদ্দ এবং পনেরো তারিখে সাওম (রোযা) পালন করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4344)


4344 - عن عبد الله بن مسعود، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم يعني من غرّة كلّ شهر ثلاثة أيام.

حسن: رواه أبو داود (2450) عن أبي كامل، حدّثنا أبو داود، حدّثنا شيبان، عن عاصم، عن زر، عن عبد الله، فذكره.

والحديث في"مسند أبي داود الطيالسي" (358) ومن طريقه رواه ابن خزيمة (2129)، وابن ماجه (1725)، وابن حبان (3641) إلّا أن ابن خزيمة جمع بين حديثين وهو:"ويكون من صومه يوم الجمعة". وأما ابن ماجه فلم يذكر إلا الحديث الثاني، وهو قول ابن مسعود:"ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم مفطرًا يوم الجمعة" بالإسناد نفسه.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عاصم وهو ابن أبي النجود فإنه حسن الحديث.

والحديث قد أخرجه من طريقه أيضًا الترمذي (742)، والنسائي (2368)، وأحمد (3860).

وقوله:"غرة كلّ شهر" أي أوله. والغر هو كلّ شيء له أوله.

وقوله:"ما رأيت مفطرًا يوم الجمعة" أي مع الخميس لما جاء النهي عن إفراد يوم الجمعة بالصّوم.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক মাসের প্রথম দিক থেকে তিনটি দিন রোযা পালন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4345)


4345 - عن بعض أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم تسع ذي الحجة، ويوم عاشوراء، وثلاثة أيام من كلّ شهر: أوّل اثنين من الشهر والخميسَين.
صحيح: رواه أبو داود (2437)، والنسائي (2417)، وأحمد (26468) كلّهم من طريق أبي عوانة، عن الحرّ بن الصبّاح، عن هُنيدة بن خالد، عن امرأته، عن بعض أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد صحيح. وامرأة هنيدة لم أقف على اسمها غير أنَّ الحافظ ذكر في التقريب في"المبهمات" أنها صحابية.

ورواه النسائي (2415) من وجه آخر عن زهير، عن الحر بن الصبّاح قال: سمعت هُنَيدة الخزاعيّ قال: دخلتُ على أمّ المؤمنين سمعتها تقول:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم من كلّ شهر ثلاثة أيام، أول اثنين من الشّهر، ثم الخميس، ثم الخميس الذي يليه". فأسقط امرأة هنيدة.

وإسناده صحيح أيضًا؛ فإنّ هنيدة أولًا سمع من امرأته عن أمّ المؤمنين، ثم دخل عليها وسمع منها مباشرة. وهذا شيء معروف في علم الحديث.

وهذا الحديث روي بألوان أخرى بعضها لا يصح، وأخطأ من حكم عليه بالاضطراب؛ لأنّ ما صحّ لا يضر ما لم يصح، والاضطراب لا يصار إليه إلّا إذا تعذّر التوفيق بين الروايات.

وأمّا ما روي عن حفصة قالت:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم ثلاثة أيام من الشّهر: الاثنين والخميس، والاثنين من الجمعة الأخرى". ففيه رجل مقبول.

رواه أبو داود (2451)، والنسائي (2366)، وأحمد (26460، 26463) كلّهم من حديث حماد، عن عاصم بن بهدلة، عن سواء الخزاعي، عن حفصة، فذكرته.

وسواء الخزاعي روى عنه اثنان آخران وهما المسيب بن رافع، ومعبد بن خالد. وذكره ابن حبان في"الثقات" كما قال المزي إلا أنه سقطت ترجمته في المطبوع؛ لأن محقق تهذيب الكمال عزاه إلى المخطوطة. ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة.

ولم أجد من تابعه، بل فيه مخالفة للحديث الصحيح بأنه صلى الله عليه وسلم كان يصوم أول اثنين من الشهر والخميسين، ولعلّ ذلك من عاصم بن بهدلة فقد تكلموا في حفظه، ولأنه اضطرب فيه، فمرة رواه عن سواء، عن حفصة. وأخرى عنه، عن أمّ سلمة كما عند النسائي (2365).

وأخرى عنه عن المسيب، عن حفصة، وفيه:"كان صلى الله عليه وسلم يصوم الاثنين والخميسين". ولم يذكر فيه سواء. كذلك رواه الإمام أحمد (26461)، والنسائي.

والمسيب هو ابن رافع لم يسمع من حفصة.

وللحديث أسانيد أخرى فالظاهر منه وقوع الاضطراب في الإسناد والمتن؛ لأنّها كلّها، تدور على عاصم بن بهدلة الذي قال فيه البزار:"لم يكن بالحافظ"، وقال الدارقطني:"في حفظه شيء" فمثله لا تحتمل مخالفته.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক স্ত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলহাজ্জ মাসের নয় দিন, আশুরার দিন এবং প্রতি মাসে তিন দিন—মাসের প্রথম সোমবার এবং দুটি বৃহস্পতিবার—রোযা রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4346)


4346 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال له النبي صلى الله عليه وسلم:"فصم وأفطر، وصل ونم، وصُمْ من كلّ عشرة أيام يومًا، ولك أجر تسعة".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1977)، ومسلم في الصيام (1159: 186) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: سمعت عطاء يزعم أن أبا العباس الشاعر أخبره، أنه سمع عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره. واللفظ لمسلم ولم يذكر هذا اللفظ البخاري في الموضع المشار إليه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি রোযা রাখো এবং (সময়মতো) রোযা ভাঙ্গো, সালাত আদায় করো এবং ঘুমাও, আর প্রতি দশ দিনে একদিন রোযা রাখো, এর ফলে তোমার জন্য নয় দিনের সাওয়াব থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4347)


4347 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صُمْ يومًا وأفطر يومًا، وذلك صيام داود. وهو أعدل الصيام لا أفضل من ذلك".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3418)، ومسلم في الصيام (1159: 181) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: أخبرني سعيد بن المسيب وأبو سلمة بن عبد الرحمن أن عبد الله بن عمرو قال (فذكره).




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "একদিন সাওম (রোযা) পালন করো এবং একদিন সাওম ভঙ্গ (না-রোযা) করো। আর এটাই হলো দাউদের সাওম। এবং এটাই হলো সবচেয়ে ন্যায়ানুগ সাওম। এর চেয়ে উত্তম সাওম আর নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4348)


4348 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عبد الله، ألم أُخبر أنك تصوم النهار وتقوم الليل؟" فقلت: بلى يا رسول الله، قال:"فلا تفعل، صم وأفطر، وقم ونم، فإن لجسدك عليك حقًّا، وإنّ لعينك عليك حقًّا، وإنّ لزوجك عليك حقًّا، وإن لزورك عليك حقًّا، وإن بحسبك أن تصوم كل شهر ثلاثة أيام، فإن لك بكل حسنة عشر أمثالها، فإنّ ذلك صيام الدّهر كلّه" فشددتُ فشُدِّد عليَّ. قلت: يا رسول الله، إني أجد قوّة، قال: فصُمْ صيام نبي الله داود عليه السلام ولا تزدْ عليه. قلت: وما كان صيام نبي الله داود عليه السلام؟ قال: نصفَ الدّهر. فكان عبد الله يقول بعدما كَبِر: يا ليتني قبلتُ رُخصةَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم.

وفي رواية:"لا صوم فوق صوم داود عليه السلام: شطر الدَّهر، صم يومًا وأفطر يومًا".

وفي رواية:"صُمْ أفضلَ الصِّيام عند الله، صومُ داود عليه السلام كان يصوم يومًا ويفطر يومًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الصيام (1975)، ومسلم في الصوم (1159: 182) كلاهما من حديث يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره. واللفظ للبخاريّ.
والرواية الثانية للبخاري (1980) من طريق أبي المليح عن عبد الله بن عمرو.

والرواية الثالثة لمسلم (1159: 192) من طريق أبي عياض عن عبد الله بن عمرو.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে আবদুল্লাহ! আমাকে কি জানানো হয়নি যে তুমি দিনের বেলা রোযা রাখো এবং রাতের বেলা নামাযে দাঁড়াও?" আমি বললাম, হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন, "তুমি এমন করো না। (বরং) রোযা রাখো এবং রোযা ভঙ্গ করো; রাতে নামায আদায় করো এবং ঘুমাও। কারণ তোমার শরীরের উপর তোমার হক রয়েছে, তোমার চোখের উপর তোমার হক রয়েছে, তোমার স্ত্রীর উপর তোমার হক রয়েছে এবং তোমার মেহমানের উপর তোমার হক রয়েছে। আর তোমার জন্য যথেষ্ট যে তুমি প্রতি মাসে তিনটি করে রোযা রাখো। কারণ প্রতিটি নেক কাজের জন্য দশ গুণ সাওয়াব রয়েছে। আর এটি সারা বছর রোযা রাখার (সওয়াবের) সমতুল্য।" আমি কঠোরতা চাইলাম, ফলে আমার উপর কঠোর করা হলো। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আরও বেশি শক্তি অনুভব করছি। তিনি বললেন, "তাহলে তুমি আল্লাহর নবী দাউদ আলাইহিস সালাম-এর রোযা রাখো এবং এর থেকে বেশি করো না।" আমি বললাম, আল্লাহর নবী দাউদ আলাইহিস সালাম-এর রোযা কেমন ছিল? তিনি বললেন, "অর্ধেক বছর (রোযা রাখা)।" আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বৃদ্ধ বয়সে উপনীত হয়ে বলতেন, "হায়! যদি আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দেওয়া সুযোগটি গ্রহণ করতাম!"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "দাউদ আলাইহিস সালাম-এর রোযার উপরে আর কোনো রোযা নেই। (তা হলো) অর্ধেক বছর, একদিন রোযা রাখো এবং একদিন ইফতার করো।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আল্লাহর নিকট শ্রেষ্ঠ রোযা হলো দাউদ আলাইহিস সালাম-এর রোযা; তিনি একদিন রোযা রাখতেন এবং একদিন ইফতার করতেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4349)


4349 - عن عبد الله بن عمرو قال: بلغ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أني أسردُ الصوم، وأصلي اللّيل، فإما أرسل إليَّ وإمّا لقيته، فقال:"ألم أُخبر أنّك تصوم ولا تفطر، وتصلي الليل؟ فلا تفعل؛ فإن لعينك حظًا، ولنفسك حظًا، ولأهلك حظًا، فصم وأفطر، وصلِّ ونمْ، وصُمْ من كلّ عشرة أيام يومًا، ولك أجر تسعة".

قال: إني أجدني أقوى من ذلك يا نبي الله، قال:"فصم صيام داود عليه السلام". قال: وكيف كان داود يصوم يا نبي الله؟ قال:"كان يصوم يومًا ويُفطر يومًا، ولا يفر إذا لاقي" ثم ذكر بقية الحديث وسيأتي في باب النهي عن صوم الدّهر.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1977)، ومسلم في الصيام (1159: 186) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: سمعت عطاء يزعم أن أبا العباس أخبره، أنه سمع عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره.

واللّفظ لمسلم، ولم يذكر البخاري:"وصُمْ من كلّ عشرة أيام يومًا" في الموضع المشار إليه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে খবর পৌঁছাল যে আমি লাগাতার রোযা রাখি এবং রাতে নামায পড়ি। হয় তিনি আমার কাছে লোক পাঠালেন, না হয় আমিই তাঁর সাথে দেখা করলাম। তিনি বললেন, "আমার কাছে কি এই খবর আসেনি যে তুমি রোযা রাখো এবং ইফতার করো না (বিরতি দাও না), আর রাতে সালাত আদায় করো? এমন করো না; কেননা তোমার চোখের উপর তোমার অধিকার আছে, তোমার নফসের (নিজের) উপর তোমার অধিকার আছে এবং তোমার পরিবারের উপরও তোমার অধিকার আছে। সুতরাং রোযা রাখো এবং ইফতার করো, সালাত আদায় করো এবং ঘুমিয়ে থাকো। আর প্রতি দশ দিনের মধ্যে একদিন রোযা রাখো, এর বিনিময়ে তুমি নয় দিনের সওয়াব পাবে।" তিনি বললেন, "হে আল্লাহর নবী! আমি এর চেয়েও বেশি সামর্থ্য রাখি।" তিনি (নবী) বললেন, "তবে তুমি দাঊদ (আলাইহিস সালাম)-এর রোযা রাখো।" তিনি বললেন, "হে আল্লাহর নবী! দাঊদ (আঃ) কীভাবে রোযা রাখতেন?" তিনি (নবী) বললেন, "তিনি একদিন রোযা রাখতেন এবং একদিন ইফতার করতেন (বিরতি নিতেন)। আর যখন শত্রুর সম্মুখীন হতেন, তখন পলায়ন করতেন না।" (এরপর হাদীছের অবশিষ্ট অংশ বর্ণনা করা হয়, যা সারা বছর রোযা রাখতে নিষেধ সংক্রান্ত অধ্যায়ে আসবে)।









আল-জামি` আল-কামিল (4350)


4350 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحبّ الصيام إلى الله صيام داود، كان يصوم يومًا ويفطر يومًا. وأحبّ الصلاة إلى الله صلاة داود، كان ينام نصف الليل ويقوم ثلثه وينام سدسه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3420)، ومسلم في الصيام (1159: 190) كلاهما من حديث عمرو بن دينار، أن عمرو بن أوس، قال: أخبرنا عبد الله بن عمرو بن العاص قال: فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় সিয়াম (রোযা) হলো দাউদ (আঃ)-এর সিয়াম; তিনি একদিন রোযা রাখতেন এবং একদিন রোযা ভাঙতেন। আর আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় সালাত (নামাজ) হলো দাউদ (আঃ)-এর সালাত; তিনি রাতের অর্ধেক অংশ ঘুমাতেন, রাতের এক-তৃতীয়াংশ (নামাযে) কাটাতেন এবং রাতের ষষ্ঠাংশ আবার ঘুমাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4351)


4351 - عن عبد الله بن عمرو قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له:"صم يومًا ولك أجر ما بقي" قال: أني أطيق أكثر من ذلك.

قال:"صم يومين، ولك أجر ما بقي". قال: إني أطيق أكثر من ذلك.

قال:"صم ثلاثة أيام، ولك أجر ما بقي" قال: إني أطيق أكثر من ذلك.

قال:"صم أربعة أيام، ولك أجر ما بقي" قال: إني أطيق أكثر من ذلك.

قال:"صم أفضل الصيام عند الله صوم داود عليه السلام، كان يصوم يومًا ويفطر يومًا".

صحيح: رواه مسلم في الصوم (1159: 192) من طرق، عن محمد بن جعفر، عن شعبة، عن زياد بن فياض، قال: سمعت أبا عياض، عن عبد الله بن عمرو، قال (فذكره).
وقوله:"صم يومًا ولك أجر ما بقي" يعني لك أجر ما بقي من العشر، وكذلك قوله:"صم يومين ولك أجر ما بقي" يعني من العشرين، وكذلك صم ثلاثا ولك أجر ما بقي: يعني من الثلاثين، وكذلك صم أربعًا ولك أجر ما بقي: يعني من الأربعين، وذلك جار على تضعيف الحسنات بعشر أمثالها، إلا أن البعض قال: صوم الرابع لا أجر فيه لأن الشهر ينتهي بصوم الثلاثة.

ولذا حذف ابن حبان صوم الرابع (3658) مع أنه رواه عن شيخه ابن خزيمة (2106) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، حدّثنا أبي، حدّثنا شعبة بإسناده وأثبت ابن خزيمة صوم الرابع.

اشتهر حديث عبد الله بن عمرو بن العاص في هذا الباب، وكثر رواته، فكثر اختلافه حتى ظنّ من لا بصيرة عنده أنه مضطرب.

قال القرطبي في"المفهم" (3/ 224):"وهو ليس كذلك، فإنه إذا تتبع اختلافه، وضمَّ بعضُه إلى بعض، انتظمتْ صورتُه، وتناسب مساقه، إذ ليس فيه اختلاف تناقض، ولا تهاتر، بل يرجع اختلافه إلى ذكر بعضهم ما سكت عنه غيره، وفضّل بعض ما أجمله غيره" انتهي.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "একদিন সাওম (রোযা) পালন করো, আর বাকি দিনগুলোর সওয়াব তোমার জন্য থাকবে।" তিনি বললেন: আমি এর চেয়েও বেশি সামর্থ্য রাখি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দুই দিন সাওম পালন করো, আর বাকি দিনগুলোর সওয়াব তোমার জন্য থাকবে।" তিনি বললেন: আমি এর চেয়েও বেশি সামর্থ্য রাখি। তিনি বললেন: "তিন দিন সাওম পালন করো, আর বাকি দিনগুলোর সওয়াব তোমার জন্য থাকবে।" তিনি বললেন: আমি এর চেয়েও বেশি সামর্থ্য রাখি। তিনি বললেন: "চার দিন সাওম পালন করো, আর বাকি দিনগুলোর সওয়াব তোমার জন্য থাকবে।" তিনি বললেন: আমি এর চেয়েও বেশি সামর্থ্য রাখি। তিনি বললেন: "আল্লাহর নিকট শ্রেষ্ঠ সাওম হলো দাউদ (আঃ)-এর সাওম। তিনি একদিন সাওম পালন করতেন এবং একদিন সাওম থেকে বিরত (ইফতার) থাকতেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4352)


4352 - عن أبي قتادة، قال: قال عمر بن الخطاب: يا رسول الله، كيف بمن يصوم يومين ويفطر يومًا؟ قال:"ويطيق ذلك أحد؟". قال: يا رسول الله، كيف بمن يصوم يومًا ويفطر يومًا؟ قال:"ذلك صوم داود". قال: كيف بمن يصوم يومًا ويفطر يومين؟ قال:"وددتُ أنّي طُوِّقْتُ ذلك".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1162) من طرق عن حماد بن زيد، عن غيلان، عن عبد الله بن معبد الزمّاني، عن أبي قتادة، فذكره في حديث طويل ذكر فيه النهي عن صوم الدّهر.



ذكره ابن رجب في كتابه"فتح الباري" (3/ 365) وقال: عبد الله بن واقد هو أبو قتادة الحراني تكلّموا فيه. وهذا غريب من حديث حيوة، وإنما هو مشهور من حديث ابن لهيعة" ثم ذكره من مسند أحمد. انتهى.

والحديث أورده ابن أبي حاتم في"العلل" (768) مرفوعًا وموقوفًا. فقال أبو زرعة:"الصحيح المرفوع".

والخلاصة فيه أن ابن لهيعة اضطرب فيه على وجوه وهو مشعر بضعفه، ولذا لم يقل أحد من العلماء بظاهر هذا الحديث.

واختلف أهل العلم فيمن عليه قضاء رمضان:

فذهب أكثر العلماء على جوازه كما قال ابن رجب.

وعند الإمام أحمد روايتان:

فنقل عنه حنبل أنه قال: لا يجوز له أن يتطوع بالصوم وعليه صوم من الفرض حتى يقضيه، يبدأ بالفرض وإن كان عليه نذر صامه يعني بعد الفرض.

والقول الثاني عن أحمد: أنه يجوز له التطوع؛ لأنّها عبادة تتعلّق بوقت موسّع فجاز التطوع في وقتها قبل فعلها. ذكره ابن قدامة في"المغني" (4/ 402).

وأما حديث أبي هريرة فضعّفه وقال: وفي سياقه ما هو متروك، فإنه قال في آخره:"ومن أدركه رمضان وعليه من رمضان شيء لم يتقبّل منه".



أحدٌ غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فلين الحديث.

ورواه ابن أبي الدنيا في"التهجد" (376) من طريق أبي إسحاق، عن شيخ من قريش يقال له: عامر بن مسعود، فذكر الحديث. وزاد فيه:"أما ليله فطويل، وأمّا نهاره فقصير" فأسقط فيه نمير بن غريب، وهذا خطأ، والصواب إثباته.

وعامر بن مسعود كما قال الترمذي لم يدرك النبي صلى الله عليه وسلم، وكذلك جزم به أبو حاتم وابن حبان وغيرهما، ثم هو مجهول الحال؛ لأنه لم يذكروا في الرواة عنه غير اثنين، ولم يوثقه غير ابن حبان.

وله شاهد عن أنس بن مالك، رواه الطبراني في الصغير، وابن عدي وغيرهما من طريق الوليد ابن مسلم عن سعيد بن بشير، عن أنس مرفوعًا.

وفيه الوليد بن مسلم مدلس يدلس تدليس التسوية، وشيخه سعيد بن بشير"ضعيف" ضعّفه أبو داود، والنسائي، وابن حبان، وغيرهم. وقال ابن عدي:"لا أرى بما يرويه بأسًا".

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا:"الشتاء ربيع المؤمن".

رواه أحمد (11716)، وأبو يعلى (1386)، والبيهقي (4/ 297) كلّهم من حديث ابن لهيعة، حدّثنا درّاج، من أبي الهيثم، عن أبي سعيد، فذكره.

وابن لهيعة فيه كلام مشهور بأنه سيء الحفظ.

ودرّاج هو ابن سمعان أبو السمح القرشي السهمي مولاهم المصريّ مختلف فيه، فضعّفه أحمد وأبو حاتم والنسائي والدارقطني وغيرهم.

وقال ابن عدي: عامة الأحاديث التي أمليتها عن دراج مما لا يتابع عليه، ومما ينكر من حديثه (فذكرها) منها حديثه هذا:"الشتاء ربيع المؤمن".

وحكي عن أحمد بن حنبل أنه قال: أحاديث درّاج عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد فيها ضعف. ولكن قال عثمان الدارمي والدوري عن ابن معين:"درّاج ثقة".

وقال أبو داود: أحاديثه مستقيمة إلا ما كان عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد.

قلت: وهذا منها.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس، عن أبي هريرة، قال:"ألا أدلكم على الغنيمة الباردة؟ قال: قلنا: وما ذاك يا أبا هريرة؟ قال:"الصوم في الشتاء".

رواه البيهقي (4/ 297) وقال:"هذا موقوف".

وفي الباب أحاديث أخرى كلّها ضعيفة.




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যে ব্যক্তি দুই দিন রোযা রাখে এবং এক দিন ইফতার করে (ভাঙে), তার সম্পর্কে আপনার অভিমত কী? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কেউ কি এটা সহ্য করতে পারে?" তিনি (উমার) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যে ব্যক্তি এক দিন রোযা রাখে এবং এক দিন ইফতার করে, তার সম্পর্কে কী বলেন? তিনি বললেন: "তা হলো দাঊদ (আঃ)-এর রোযা।" তিনি (উমার) বললেন: যে ব্যক্তি এক দিন রোযা রাখে এবং দুই দিন ইফতার করে, তার সম্পর্কে কী বলেন? তিনি বললেন: "আমি চাই, যদি আমাকে তা করার ক্ষমতা দেওয়া হতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4353)


4353 - عن أبي قتادة الأنصاري، قال: سُئل النبي صلى الله عليه وسلم عن صوم يوم عاشوراء؟ فقال:"يكفّر السّنة الماضية".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1162) من طريق غيلان بن جرير، سمع عبد الله بن معبد الزّمانيّ، عن أبي قتادة، فذكره.

وهو جزء من حديث طويل، سبق ذكره بتمامه.




আবূ কাতাদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আশুরার দিনের সাওম (রোযা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল? তিনি বললেন, "তা পূর্ববর্তী এক বছরের গুনাহ ক্ষমা করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4354)


4354 - عن ابن عباس، وسُئل عن صيام يوم عاشوراء؟ فقال:"ما علمتُ أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم صام يومًا يطلبُ فضله على الأيام إلّا هذا اليوم، ولا شهرًا إلّا هذا الشهر -يعني رمضان-".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (2006)، ومسلم في الصيام (1132) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عبيدالله بن أبي يزيد، عن ابن عباس، به، فذكره. واللفظ لمسلم.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আশুরার দিনের রোযা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই দিনটি (আশুরার দিন) ছাড়া আর কোনো দিন রোযা রাখতে দেখিনি, যার ফযীলত তিনি অন্যান্য দিনের তুলনায় বিশেষভাবে প্রত্যাশা করতেন। আর এই মাসটি (অর্থাৎ রমযান মাস) ছাড়া আর কোনো মাসে রোযা রাখতে দেখিনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (4355)


4355 - عن سلمة بن الأكوع أنه قال: بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رجلًا من أسلم يوم عاشوراء، فأمره أن يؤذِّن في الناس:"من كان لم يَصُم فلْيصُمْ، ومَنْ كان أكل فليُتمَّ صيامه إلى اللّيل".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1924)، ومسلم في الصيام (1135) من طريق يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع، فذكره. واللفظ لمسلم.

قوله:"رجلًا من أسلم" قال ابن حجر: اسم هذا الرجل هند بن أسماء بن حارثة الأسلميّ، له ولأبيه ولعمّه هند بن حارثة صحبة.

وأمّا ما رواه أبو داود (2447) عن محمد بن المنهال، ثنا يزيد بن زريع، عن سعيد، عن قتادة، عن عبد الرحمن بن مسلمة، عن عمّه، أنّ أسلم أتت النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"صمتم يومكم هذا؟". قالوا: لا. قال:"فأتموا بقية يومكم واقضوه".

ففي قوله:"واقضوه" نكارة. ولذا قال عبد الحق في"الأحكام الوسطي" (2/ 245):"لا يصح هذا الحديث في القضاء".

ثم اختلف في زيادة هذا اللفظ، فرواه أبو داود من حديث يزيد بن زريع، عن سعيد هكذا.

ورواه الإمام أحمد (23475) عن روح بن عبادة، والنسائي في"الكبرى" (2864) عن بشر، و (2865) عن محمد بن بكر - كلّهم عن سعيد بن أبي عروبة، ولم يذكروا القضاء.
وكذلك لم يذكره شعبة، عن قتادة.

ومن طريقه رواه الطحاوي في"مشكله" (2272)، وأحمد (20329).

ولكن يشكل هذا ما أخرجه البيهقي (4/ 221) من طريق يزيد بن زريع، عن شعبة، وذكر فيه القضاء وقال: رواه أبو داود في"السنن" عن محمد بن المنهال، وكذلك رواه أبو قلابة عن محمد ابن المنهال، عن يزيد، عن شعبة.

وقال:"ووقع ذلك في بعض النسخ: سعيد. وقد رواه أيضًا سعيد فخالف شعبة في الإسناد والمتن" انتهى.

قلت: وهو كما قال، فلعل نسخ أبي داود اختلفت، فإنّ جمهور أصحاب سعيد بن أبي عروبة لم يذكروا القضاء إن صحَّ هذا فيكون الخلاف على شعبة.

ومهما كان الأمر فالإسناد ضعيف من أجل عبد الرحمن بن مسلمة فإنه مجهول. وقد اختلف في اسم أبيه، فقيل كما قال أبو داود، وقيل: هو ابن المنهال بن مسلمة، وقيل: ابن سلمة، وقيل غير ذلك. يكنى أبا المنهال. تفرّد بالرواية عنه قتادة كما قال الذهبي في"الميزان"، وقال البيهقي في"المعرفة" (6/ 361):"مجهول، مختلف في اسم أبيه، ولا يدري من عمّه".

وقال ابن القطان: هو مجهول الحال.

وأما ابن حبان فذكره في"الثقات" ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة. ولم يتابع

على قوله:"فاقضوا" فهي زيادة منكرة، وأما بقية الحديث فله شواهد صحيحة.




সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশুরার দিনে আসলাম গোত্রের একজন ব্যক্তিকে পাঠালেন এবং তাকে নির্দেশ দিলেন যেন মানুষের মাঝে ঘোষণা করে: "যে ব্যক্তি (দিনের শুরু থেকে) রোযা রাখেনি, সে যেন (এখন থেকে) রোযা রাখে। আর যে ব্যক্তি পানাহার করেছে, সে যেন রাত পর্যন্ত তার রোযা পূর্ণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4356)


4356 - عن الرّبيع بنت مُعوِّذ بن عفراء، قالت: أرسلَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم غداة عاشوراء إلى قرى الأنصار:"من أصبح مفطرًا فليتمّ بقية يومه، ومن أصبح صائمًا فليصمْ".

قالت: فكنّا نصومُه بعد، ونصوِّم صبياننا، ونجعل لهم اللّعبة من العهن، فإذا بكى أحدهم على الطّعام أعطيناه ذلك حتى يكون عند الإفطار. قال العهن: الصُّوف.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1960)، ومسلم في الصيام (1136) كلاهما من طريق بشر بن المفضّل بن لاحق، حدّثنا خالد بن ذكوان، عن الربيع بنت معوّذ، به. واللفظ للبخاريّ.




রুবাইয়্যি' বিনত মুআওবিয ইবন আফরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আশুরার দিন সকালে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদের গ্রামগুলোতে (এই মর্মে) লোক পাঠালেন: "যে ব্যক্তি পানাহার করা অবস্থায় সকাল করেছে, সে যেন দিনের বাকি অংশ পূর্ণ করে নেয় (অর্থাৎ পানাহার থেকে বিরত থাকে), আর যে ব্যক্তি সাওম (রোযা) রাখা অবস্থায় সকাল করেছে, সে যেন সাওম রাখে।"

তিনি বলেন, এরপর থেকে আমরা সাওম পালন করতাম এবং আমাদের শিশুদেরকেও সাওম পালনে অভ্যস্ত করতাম। আর আমরা তাদের জন্য পশমের খেলনা বানিয়ে দিতাম। যখন তাদের কেউ খাবারের জন্য কান্নাকাটি করত, তখন আমরা ইফতারের সময় হওয়া পর্যন্ত তাকে সেই খেলনা দিয়ে ভুলিয়ে রাখতাম। (রাবী বলেন, 'আল-ইহ্ন' অর্থ: পশম)।









আল-জামি` আল-কামিল (4357)


4357 - عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر عاشوراء فعظّم منه، ثم قال لمن حوله:"من كان لم يطعم منكم فليصم يومه هذا، ومن كان قد طعم منكم فليصم بقية يومه".

صحيح: رواه الطبراني في"الأوسط" (3255)، والطحاوي في"مشكله" (2274) كلاهما من حديث عبد الله بن يوسف، قال: حدّثنا يحيى بن حمزة، عن يزيد بن أبي مريم، أنّ قزعة حدّثه عن أبي سعيد، فذكره.
وإسناده صحيح. وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 186) وقال:"رجاله ثقات".

وقول الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن قزعة إلا يزيد" لا يضر؛ فإن يزيد بن أبي مريم أبا عبد الله الدمشقي إمام الجامع، وثقه ابن معين وغيره. وأخرج له البخاريّ. وقزعة هو ابن يحيى البصري، ثقة من رجال الجماعة.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আশুরার আলোচনা করলেন এবং এর মর্যাদাকে মহিমান্বিত করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর পার্শ্বস্থ লোকদের বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে এখনও (খাবার) খায়নি, সে যেন আজকের দিনটি রোযা রাখে। আর তোমাদের মধ্যে যে ইতিমধ্যেই খেয়ে ফেলেছে, সে যেন দিনের অবশিষ্ট অংশটুকু রোযা রাখে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4358)


4358 - عن عبد الله بن بدر الجهني، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لهم يومًا:"هذا يوم عاشوراء، فصوموا".

فقال رجل من بني عمرو بن عوف: يا رسول الله، إني تركت قومي، منهم صائم، ومنهم مفطر. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"اذهب إليهم، فمن كان منهم مفطرًا فليتمّ صومه".

صحيح: رواه أحمد (27646)، والبزار -كشف الأستار (1049) والطبراني في"الأوسط" (5679) كلّهم من حديث معاوية بن سلام، قال: سمعت يحيى بن أبي كثير، أخبرني بعجة بن عبد الله، أن أباه أخبره، فذكره.

وإسناده صحيح. ويحيى بن أبي كثير ثقة ثبت إلا أنه يدلس ويرسل، وقد صرَّح بالتحديث وحسّنه الهيثمي في"المجمع" (3/ 185).




আব্দুল্লাহ ইবনে বদর আল-জুহানী থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উদ্দেশ্যে বললেন: "আজ আশুরার দিন, অতএব তোমরা রোযা রাখো।"

তখন বনি আমর ইবনে আউফের এক ব্যক্তি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আমার কওমকে রেখে এসেছি, তাদের মধ্যে কেউ রোযাদার, আবার কেউ রোযা না রাখা অবস্থায় আছে।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদের কাছে যাও। তাদের মধ্যে যে ব্যক্তি রোযা রাখেনি, সে যেন তার রোযা পূর্ণ করে (অর্থাৎ রোযা ধরে নেয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4359)


4359 - عن هند بن أسماء بن حارثة الأسلميّ، قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى قومي من أسلم. فقال:"مُرْ قومك فليصوموا هذا اليوم يوم عاشوراء، فمن وجدته منهم قد أكل في أوّل يومه، فليصم آخره".

حسن: رواه الإمام أحمد (15962)، والطبراني في الكبير (22/ 207)، والطحاوي في"مشكله" (2275) كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن حبيب بن هند ابن أسماء، عن أبيه، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرَّح، وقد صرَّح في رواية أحمد.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 185):"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد ثقات".

ولكن وقع الخلاف بين المؤرخين في اسم المبعوث هل هو هند بن أسماء بن حارثة الأسلميّ الذي كان له صحبة كما قال البخاري وابن السكن وغيرهم ومات في خلافة معاوية، أم هو هند بن حارثة الأسلمي عمّ هند بن أسماء.

قال الحافظ في"الإصابة" في ترجمة"هند بن أسماء بن حارثة الأسلمي":"زعم ابن الكلبي أن المأمور بذلك هند بن حارثة، وتبعه أبو عمر".

قلت: وكذلك رواه الحاكم (3/ 529 - 530) من وجه آخر عن يحيى بن هند بن حارثة، عن أبيه هند بن حارثة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعثه يوم عاشوراء. وقال:"صحيح".
ولكن قال الإمام أحمد في"مسند" (15963):"هند بن حارثة هذا كان من أصحاب الحديبية، وأخوه الذي بعثه رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر قومه بصيام عاشوراء وهو: أسماء بن حارثة فإنه قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه فقال:"مرْ قومَك بصيام هذا اليوم" قال: أرأيت إن وجدتهم قد طعموا؟ قال:"فليتموا آخر يومهم".

رواه عن عفان، قال: حدّثنا وُهيب، حدّثنا عبد الرحمن بن حرملة، عن يحيى بن هند بن حارثة -وكان هند من أصحاب الحديبية … فذكره. فحدثني يحيي بن هند، عن أسماء بن حارثة:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه" فذكر الحديث.

ومن طريق حرملة رواه أيضا البزّار -كشف الأستار (1048) -.

ويحيى بن هند بن حارثة لم يرو عنه غير عبد الرحمن بن حرملة، وذكره ابن حبان في"الثقات" فهو مقبول في اصطلاح الحافظ.

وهو كذلك لأنه رواه ابن حبان في"صحيحه" (3618) من طريق سهل بن بكار، قال: حدثنا وهيب، عن عبد الرحمن بن حرملة، عن سعيد بن المسيب، عن أسماء بن حارثة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه إلى قومه، فذكر الحديث.

وهذه متابعة قوية ليحيي بن هند بن حارثة.

فإما أن نقول: إنّ المبعوث هو هند بن أسماء بن حارثة أو عمّه هند بن حارثة أو أخوه أسماء بن حارثة وهو بعيد. والصّحيح أنه كان واحدًا منهم بالتعيين إلا أن المؤرخين لم يضبطوه، والحديث صحيح ولا يؤثر عدم معرفة المبعوث على صحة الحديث.

وقد أطال أهل العلم الكلام في تعين المبعوث، وما ذكرته هو خلاصته، ومنهم من ادّعى الاضطراب في الإسناد من أجل هذا الخلاف. والصحيح أنه لا اضطراب فيه؛ لأنّ المبعوث صحابي ولا يضر الجهل باسمه كما هو معروف.




হিন্দ ইবনে আসমা ইবনে হারিসাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আমার আসলাম গোত্রের কাছে প্রেরণ করেন এবং বললেন: "তুমি তোমার গোত্রের লোকদের নির্দেশ দাও যেন তারা এই দিন, অর্থাৎ আশুরার দিন রোযা পালন করে। তুমি তাদের মধ্যে যাকে দিনের প্রথম ভাগে আহাররত অবস্থায় পাবে, সে যেন দিনের শেষ ভাগ পূর্ণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4360)


4360 - عن محمد بن صيفي، قال: قال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عاشوراء:"منكم أحد طعم اليوم؟" قلنا: منا من طعم، ومنا من لم يطعم. قال:"فأتموا بقية يومكم، من كان طعم، ومن لم يطعم، فأرسلوا إلى أهل العروض فليتموا بقية يومهم".

قال يعني أهل العروض: حول المدينة.

صحيح: رواه النسائي (2320)، وابن ماجه (1735)، والطحاوي في"مشكله" (2277)، وصحّحه ابن خزيمة (2091)، وابن حبان (3617) كلّهم من حديث حصين، عن الشعبي، عن محمد ابن صيفي، فذكره. وإسناده صحيح.

وفي الباب ما رُوي عن أبي هريرة، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم صائمًا يوم عاشوراء فقال لأصحابه:"من كان أصبح منكم صائمًا فليتم صومه، ومن كان أصاب من غداء أهله فليتم بقية يومه".
رواه الإمام أحمد (8716) عن أبي جعفر، أخبرنا عبد الصمد بن حبيب الأزدي، عن أبيه حبيب بن عبد الله الأزدي، عن شُييل، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفيه عبد الصمد بن حبيب ضعّفه أحمد. وقال أبو حاتم مثله. وزاد:"يكتب حديثه، ليس بالمتروك". وقال البخاري:"لين الحديث". وقال ابن عدي:"كان قليل الحديث".

وأبوه حبيب بن عبد الله الأزدي، قال أبو حاتم:"مجهول"."الجرح والتعديل" (3/ 104).

وفي الباب ما رُوي عن معبد القرشي، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم بقديد فأتاه رجل فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أطعمتَ اليوم شيئًا -ليوم عاشوراء-؟". قال: لا. إلا أني شربت ماء. قال:"فلا تطعم بعد حتي مغرب الشمس. وأمر من وراءك أن يصوم هذا اليوم". رواه عبد الرزاق (7835) عن إسرائيل، عن سماك بن حرب، عن عبد القرشي، فذكره. وعنه أخرجه الطبراني في"الكبير".

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 187):"رجاله ثقات".

قلت: وهو كذلك إلا أن معبد القرشي إن كان هو ابن زهير بن أبي أمية القرشي المخزومي ابن أخي أم سلمة، فله رؤية فلا صحبة له كما قال ابن عبد البر.

ومثل رواية هؤلاء تُعدّ من قبيل المراسيل عند المحققين كما قال الحافظ ابن حجر في مقدمة"الإصابة".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي بن أبي طالب:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصوم عاشوراء، ويأمر به".

رواه أحمد (1069)، والبزار -كشف الأستار (1045) - كلاهما من حديث معاوية بن هشام، عن سفيان الثوري، عن جابر، عن سعد بن عبيدة، عن أبي عبد الرحمن، عن علي، فذكره.

وجابر هو ابن يزيد الجعفيّ ضعيف. قال البزار:"لا نعلمه عن علي مرفوعًا إلّا بهذا الإسناد".



فقه الحديث:

أحاديث الباب تدل على أمور ومن أهمها ما يلي:

1 - إنّ صوم عاشوراء كان في أول الأمر فرضًا، ولذا ورد التأكيد بصومه لمن لم يأكل ولم يشرب، وإمساك بقية اليوم لمن أكل وشرب.

ولا يتصور هذا التأكيد في التطوع، ثم نسخ الفرض بعد فرض رمضان كما سيأتي. وبقي استحباب التطوع لما فيه من الأجر العظيم.

2 - أن من وجب عليه الصوم ولم يعرف ذلك إلا في النهار فإنه يكفيه النية في النهار، وهو مستثني من قوله صلى الله عليه وسلم:"من لم يجمع الصيام قبل الفجر فلا صيام له".

3 - أن من أكل وشرب، وهو لا يدري أن عليه صوم هذا اليوم فيمسك بقية النهار، وليس عليه القضاء على الصحيح، لما بينا فيما سبق من نكارة لفظ القضاء.




মুহাম্মদ ইবনু সাইফী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আশুরার দিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কি আজ আহার করেছ?" আমরা বললাম: আমাদের মধ্যে কেউ কেউ আহার করেছে, আর কেউ কেউ আহার করেনি। তিনি বললেন: "তবে তোমরা দিনের বাকি অংশ পূর্ণ করো (রোযা রাখো), সে-ই ব্যক্তিও যে আহার করেছে এবং সে-ই ব্যক্তিও যে আহার করেনি। আর তোমরা আল-আরুয এলাকার অধিবাসীদের কাছে সংবাদ পাঠাও যেন তারাও তাদের দিনের বাকি অংশ পূর্ণ করে।"

বর্ণনাকারী বলেন, 'আহলুল আরুয' (আল-আরুয এলাকার অধিবাসী) বলতে মদীনার পার্শ্ববর্তী এলাকার লোকজনকে বুঝানো হয়েছে।