হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4908)


4908 - عن عروة، قال: قلتُ لِعَائِشَةَ أُمِّ الْمُؤْمِنينَ -وَأَنَا يَوْمَئِذٍ حَدِيثُ السِّنِّ-: أَرَأَيْتِ قَوْلَ اللهِ تبارك وتعالى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا} [البقرة: 158]، ، فَمَا عَلَى الرَّجُلِ شَيْءٌ أَنْ لا يَطَّوَّفَ بِهِمَا؟ فَقَالَتْ عَائِشَةُ: كَلا! لَوْ كَانَ كَمَا تَقُولُ، لَكَانَتْ فَلا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ لا يَطَّوَّفَ بِهِمَا؛ إِنَّمَا أُنْزِلَتْ هَذِهِ الآيَةُ فِي الأَنْصَارِ كَانُوا يُهِلُّونَ لِمَنَاةَ، وَكَانَتْ مَنَاةُ حَذْوَ قُدَيْدٍ وَكَانُوا يَتَحَرَّجُونَ أَنْ يَطُوفُوا بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ، فَلَمَّا جَاءَ الإِسْلامُ سَأَلُوا رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ فَأَنْزَلَ الله تبارك وتعالى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا}.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (129) عن هشام بن عروة، عن أبيه، قال (فذكره). ورواه البخاريّ في الحج (1790) من طريق مالك، به، مثله.

وقال: زاد سفيان وأبو معاوية عن هشام:"مَا أَتَمَّ الله حَجَّ امْرِئٍ وَلا عُمْرتَهُ لَمْ يَطُفْ بين الصّفا
والمرْوَة".

ولم يروه مسلم من طريق مالك، ولكن رواه من طريق أبي معاوية (1277: 259)، وأبي أسامة (260) كلاهما عن هشام، به، وزاد الزيادة المذكورة.

ورواه البخاريّ (4861) من حديث سفيان، حدّثنا الزهريّ، قال: سمعت عروة: قلت لعائشة رضي الله عنها، فقالت: إِنَّمَا كَانَ مَنْ أَهَلَّ بِمَنَاةَ الطَّاغِيَةِ الَّتِي بِالْمُشَلَّلِ لا يَطُوفُونَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ فأَنْزَلَ الله تَعَالَى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} فَطَافَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم وَالْمُسْلِمُونَ. هكذا مختصرًا.

ورواه مسلم (1277/ 262) من وجه آخر عن عقيل، عن ابن شهاب، أنه قال: أخبرني عروة ابن الزبير، فذكر الحديث وقال عائشة: قد سنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم الطواف بينهما، فليس لأحد أن يترك الطّواف بهما.

ورواه ابن خزيمة (2769) من حديث عبد الرحيم -يعني ابن سليمان-، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرت الحديث، وقالت: فلعمري! ما أتَمَّ الله حجَّ من لم يطف بين الصفا والمروة؛ لأنّ الله عز وجل يقول: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} فهما شعائر الله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'উরওয়াহ (রহ.) বলেন: আমি একদিন উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম—তখন আমি অল্পবয়স্ক ছিলাম— আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার কী অভিমত: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বার হজ বা উমরাহ করবে, তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ (তাওয়াফ) করলে কোনো গুনাহ নেই।” (সূরাহ বাক্বারা: ১৫৮) [এই আয়াতের ভিত্তিতে কি এমন মনে হয় যে] কেউ যদি এই দু'টির মাঝে সাঈ না করে, তবে তার কোনো ক্ষতি নেই?

তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কক্ষনো না! যদি তোমার কথা অনুযায়ী হতো, তবে আল্লাহ বলতেন: “তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ না করলে কোনো গুনাহ নেই।” বরং এই আয়াতটি আনসারদের (মদীনার সাহাবাগণ) সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। তারা (ইসলামের পূর্বে) 'মানাত'-এর নামে ইহরাম বাঁধতো, আর মানাত ছিল কুদাইদের বরাবর। তারা সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করতে সংকোচবোধ করতো।

এরপর যখন ইসলাম এলো, তখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। ফলে আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বার হজ বা উমরাহ করবে, তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ করলে কোনো গুনাহ নেই।”

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরো বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফা ও মারওয়ার মাঝে তাওয়াফ (সাঈ) করাকে সুন্নাত করেছেন, তাই কারো জন্য তা পরিত্যাগ করা বৈধ নয়। আমার জীবনের শপথ! যে ব্যক্তি সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করে না, আল্লাহ তার হজ সম্পূর্ণ করেন না; কারণ আল্লাহ তাআলা বলেন: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত।” সুতরাং তারা উভয়েই আল্লাহর নিদর্শন।

তিনি আরও বলেন: আল্লাহ কোনো ব্যক্তির হজ বা উমরাহ সম্পূর্ণ করেন না, যে সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (4909)


4909 - عن عاصم، قال: قلت لأنس بن مالك رضي الله عنه: أَكُنْتُمْ تَكْرَهُونَ السَّعْيَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ؟ قَال: نَعَمْ لِأَنَّهَا كَانَتْ مِنْ شَعَائِرِ الْجَاهِلِيَّةِ حَتَّى أَنْزَلَ الله: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1648)، ومسلم في الحجّ (1278) كلاهما من طريق عاصم (هو ابن سليمان الأحول)، به، واللفظ للبخاري.

قوله تعالى: يدلّ على أنّ السّعي بينهما أمر حتم لا بدّ منه؛ لأنّ شعائر الله عظيمة لا يجوز التهاون بها، وقد أشار البخاريّ في"صحيحه" إلى ذلك فقال:"باب وجوب الصفا والمروة وجعل من شعائر الله".

قال الحافظ نقلًا من ابن المنيّر:"وجوب السعي مستفاد من كونهما جعلا من شعائر الله".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'আসিম (রহ.) বলেন, আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনারা কি সাফা ও মারওয়ার সা'ঈ করা অপছন্দ করতেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ। কারণ তা ছিল জাহিলিয়াতের নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বা ঘরে হজ বা উমরাহ করবে, তাদের উভয়ের মাঝে সা'ঈ (তাওয়াফ) করলে তার কোনো দোষ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4910)


4910 - عن علي بن أبي طالب: أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعى بين الصّفا والمروة في المسعى كاشفًا عن ثوبه، قد بلغ إلى ركبتيه.

حسن: رواه عبد الله بن أحمد من زياداته على المسند (597) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن أبي زياد القطوانيّ، حدّثنا زيد بن الحباب، أخبرني حرب أبو سفيان المنقريّ، حدّثنا محمد بن علي أبو جعفر، حدّثني عمّي، عن أبي، أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.

ورواه أبو بكر البزار -"كشف الأستار" (1117) - من طريق زيد بن الحباب، ثنا حرب بن
سريج، عن محمد بن علي بن الحسين، عن ابن الحنفية، عن علي، قال (فذكره).

وفي هذا الإسناد التصريح بأن العم هو ابن الحنفية، والأب هو علي بن أبي طالب.

وإسناده حسن من أجل الكلام في حرب أبي سفيان، وهو ابن سريج بن المنذر المنقري غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه؛ لأنه كان يخطئ كثيرًا كما قال ابن حبان.

وقال البخاريّ:"فيه نظر". ولكن وثقه ابن معين. وقال الإمام أحمد:"لا بأس به". وقال أبو الوليد الطيالسيّ:"كان جارنا لم يكن به بأس ولم أسمع منه".

ومعنى حديثه قريب من حديث حبيبة بنت أبي تجراة.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাফা ও মারওয়ার মাঝখানে সা'ঈ করার স্থানে এমন অবস্থায় দেখেছেন যে, তিনি তাঁর কাপড় হাঁটু পর্যন্ত তুলে রেখেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4911)


4911 - عن حبيبة بنت أبي تَجراة، قالت: دَخَلْنَا دَارَ أَبِي حُسَيْنٍ فِي نِسْوَةٍ مِنْ قُرَيْشٍ وَالنَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَطُوفُ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ، قَالَتْ: وَهُوَ يَسْعَى يَدُورُ بِهِ إِزَارُهُ مِنْ شِدَّةِ السَّعْيِ، وَهُوَ يَقُولُ لأَصْحَابِهِ:"اسْعَوْا فَإِنَّ الله كَتَبَ عَلَيْكُم السَّعْيَ".

حسن: وله طرق منها:

ما رواه الإمام أحمد (27367) - واللفظ له، والطبراني 24/ (227)، والدارقطني (2584)، والحاكم (4/ 70)، والبيهقي (5/ 98) كلّهم من طريق عبد الله بن المؤمل، عن عمر بن عبد الرحمن، حدّثنا عطاء، عن صفية بنت شيبة، عن حبية بنت أبي تجراة، فذكرته.

وسكت عليه الحاكم، وقال الذهبي:"لم يصح".

قلت: عبد الله بن مؤمل هو ابن هبة المخزوميّ"ضعيف"، وبه أعلّه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1456)، وأسند تضعيفه عن أحمد والنسائي وابن معين. وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 247):"فيه عبد الله بن المؤمّل وثقه ابن حبان، وقال:"يخطئ" وضعّفه غيره".

ومنها ما رواه الدارقطنيّ (2582)، والبيهقي (5/ 97) كلاهما من حديث ابن المبارك، قال: أخبرني معروف بن مُشكان، أخبرني منصور بن عبد الرحمن، عن أمه صفية، قالت: أخبرتني نسوة من بني عبد الدّار اللائي أدركن رسول الله صلى الله عليه وسلم. قلن:"دخلنا دار ابن أبي حسين، فاطلعنا من باب مقطع فرأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يشتد في المسْعى حتى إذا بلغ بني فلان موضعًا قد سماها من المسعي- استقبل الناس فقال:"يا أيها الناس! ، اسعوا، فإنّ السّعي قد كُتب عليكم".

وهذا إسناد حسن، ومعروف بن مُشكان -بضم أوله وسكون المعجمة- المكيّ حسن الحديث.

وقال الحافظ ابن عبد الهادي في"التنقيح" (3/ 513):"إسناد هذا الحديث صحيح، وإن كان غير مخرّج في السّنن، ومعروف بن مشكان صدوق، لا نعلم أحدًا تكلّم فيه ومنصور بن عبد الرحمن هذا ثقة، مخرج له في الصّحيحين، ولم يتكلّم فيه أبو حاتم، بل قال فيه: صالح الحديث". انتهى.

ومنها ما رواه الإمام أحمد (27463) وصحّحه ابن خزيمة (2765) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن واصل مولى أبي عيينة، عن موسى بن عبيد، عن صفية بنت شيبة،
أنّ امرأة أخبرتها أنها سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم بين الصفا والمروة يقول:"اكتب عليكم السعيّ فاسعوا".

وإسناده لا بأس به؛ فإنّ موسي بن عبيد روى عنه اثنان، ووثقه ابن حبان، وهو من رجال"التعجيل" إلّا أنّ فيه موسى بن عبيدة - بزيادة هاء كما في بعض نسخ المسند، والدارقطني (587). وقد نبّه الحافظ في"التعجيل" بأنه"عبيد" بدون هاء.

ولم ينبه إليه الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 247) فظنّ أنه الرّبذيّ فضعّفه من أجله.

قال ابن خزيمة:"هذه المرأة التي لم تسم في هذا الخبر هي: حبيبة بنت أبي تجراة".

ومنها: ما رواه ابن خزيمة (2764) عن محمد بن عمر بن علي بن عطاء بن مقدم المقدمي، ثنا الخليل بن عثمان، قال: سمعت عبد الله بن بنيه، عن جدته صفية بنت شيبة، عن جدتها بنت أبي تجراة، قالت: كان لنا خلفة في الجاهلية، قالت: اطلعت من كوة بين الصفا والمروة، فأشرفت على النبيّ صلى الله عليه وسلم وإذا هو يسعى، وإذا هو يقول لأصحابه:"اسعوا فإنّ الله كتب عليكم السّعي" فلقد رأيته من شدّة السّعي يدور الإزار حول بطنه حتى رأيت بياض بطنه وفخذيه". وفي الإسناد من لم توجد له ترجمة.

وبجموع هذه الطرق يكون الحديث حسنًا إن شاء الله تعالي.

وأمّا قول الحافظ في"الفتح" (3/ 498):"وله طريق أخرى في صحيح ابن خزيمة مختصرًا، وعند الطبراني عن ابن عباس كالأولي وإذا انضمّت إلى الأولى قويتْ" ففيه نظر؛ فإنّ الحديث من طرقه الكثيرة يشدّ بعضه بعضًا، وحديث ابن عباس لا يفيد شيئًا فإن في إسناده المفضل بن صدقة متروك كما قال الهيثمي (3/ 148)، وهو لا يصح أن يكون شاهدًا، ولذا لم أخرجه. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (4/ 196 - 197).

وفي هذه الأحاديث دلالة واضحة على أنّ السّعي فرض، وهو قول الكافة، وأنه لا يتحلّل ما لم يأت به.

عن عمرو بن دينار، قال: سألنا ابن عمر عن رجل طاف باليت سبعًا في عمرة، ولم يطف بين الصفا والمروة، أيأتي امرأته؟ قال: قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم فطاف بالبيت سبعًا، وصلى خلف المقام ركعتين، وطاف بين الصّفا والمروة سبعًا {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} ..

وسألنا جابر بن عبد الله فقال: لا يقربنّها حتى يطوف بين الصفا والمروة. أخرجهما البخاري (1793، 1794).

وهذا مذهب عائشة، وابن عمر، وجابر بن عبد الله. وهو قول مالك، والشافعي وأحمد في إحدى الروايتين.

وذهب جماعة منهم: أبو حنيفة، وسفيان الثوري، وفي رواية عن أحمد بأنه واجب وليس بفرض، وعلى من تركهـ دم.
وذهب ابن عباس، وابن سيرين، وعطاء، ومجاهد إلى أنّ من طاف فقد حلَّ مستدلين بالآية، وقالوا: رفع الحرج يدل على الإباحة.




হাবীবা বিনতে আবি তাজরাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশের কয়েকজন মহিলার সাথে আমরা আবূ হুসাইনের বাড়িতে প্রবেশ করলাম, আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করছিলেন। তিনি বলেন: তিনি যখন সা'ঈ করছিলেন, তখন দ্রুত চলার কারণে তাঁর পরিহিত লুঙ্গি (ইযার) তাঁর চারপাশে ঘুরে যাচ্ছিল। আর তিনি তাঁর সাহাবীদের বলছিলেন: "তোমরা সা'ঈ করো, কারণ আল্লাহ তোমাদের উপর সা'ঈ করাকে আবশ্যক করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4912)


4912 - عن سعيد بن جبير، قال: رأيت ابن عمر يمشي بين الصّفا والمروة، ثم قال: إنْ مشيتُ فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي، وإن سعيتُ فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعي.

صحيح: رواه النّسائيّ (2977)، والإمام أحمد (6393) كلاهما من حديث عبد الرزاق -وصحّحه ابن خزيمة (2772) ورواه من طريق الضّحّاك- كلاهما عن سفيان الثوريّ، عن عبد الكريم الجزريّ، عن سعيد بن جبير، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أبو داود (1904) من طريق زهير، والترمذي (864) من حديث ابن فضيل، والنسائي (2976)، وابن خزيمة (2771)، والإمام أحمد (5143) كلّهم من حديث سفيان، وابن ماجه (2988) من حديث الجراح بن مليح والد وكيع -كلّهم أعني: زهيرا، وابن فضيل، وسفيان، والجراح- عن عطاء بن السائب، عن كثير بن جمهان، أنّ رجلًا قال لعبد الله بن عمر بين الصّفا والمروة: يا أبا عبد الرحمن! ، إنّي أراك تمشي والناس يسعون؟ . قال:"إن أمشي فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي، وإن أسعى فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعى، وأنا شيخ كبير".

وعطاء بن السائب مختلط، ولكن روي سفيان عنه قبل الاختلاط، ثم متابعة غيره يدل على أنه لم يختلط في هذا الحديث.

ولكن فيه كثير بن جمهان، قال فيه أبو حاتم:"شيخ يكتب حديثه". وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول".

قلت: وهو كذلك لأنه توبع كما أشار إليه الترمذي، فقال عقب الحديث:"هذا حديث حسن صحيح، وروي عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر، نحوه" وهو كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন: আমি ইবনু উমরকে সাফা ও মারওয়ার মাঝে হাঁটতে দেখেছি। অতঃপর তিনি বললেন: “যদি আমি হেঁটে চলি, তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হাঁটতে দেখেছি। আর যদি আমি দ্রুত চলি (সায়ী করি), তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দ্রুত চলতে দেখেছি।”









আল-জামি` আল-কামিল (4913)


4913 - عن ابن عمر: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا طَافَ بِالْبَيْتِ الطَّوَافَ الأَوَّلَ خَبَّ ثَلاثًا وَمَشَى أَرْبَعًا، وَكَانَ يَسْعَي بِبَطْنِ الْمَسِيلِ إِذَا طَافَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ.

وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يَفْعَلُ ذَلِكَ.

متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1617)، ومسلم في الحج (1261/ 230) كلاهما من حديث عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وقوله:"بطن المسيل" وهو المكان الذي يجتمع فيه ماء السيل، وهو الآن يعرف بين العَلَمين الأخضرين.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাইতুল্লাহর প্রথম তাওয়াফ করতেন, তখন তিনি তিন চক্কর দ্রুত চলতেন (রমল করতেন) এবং চার চক্কর হেঁটে চলতেন। আর তিনি যখন সাফা ও মারওয়ার মাঝে তাওয়াফ (সাঈ) করতেন, তখন উপত্যকার মধ্যভাগ দিয়ে দ্রুত চলতেন। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও এরূপ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4914)


4914 - عن ابن عباس، قال: إِنَّمَا سَعَى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بِالْبَيْتِ وَبَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ لِيُرِيَ الْمُشْرِكِينَ قُوَّتَهُ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1649)، ومسلم في الحج (1265: 241) كلاهما من حديث سفيان، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

قال الترمذيّ عقب حديث ابن عباس:"وهو الذي يستحبه أهل العلم أن يسعى بين الصّفا والمروة، فإن لم يسع، ومشي بين الصفا والمروة رأوه جائزًا".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর চারপাশে (তাওয়াফের মধ্যে) এবং সাফা ও মারওয়ার মধ্যখানে দ্রুত হেঁটেছিলেন (সা’ঈ করেছিলেন) কেবল এই জন্য, যাতে মুশরিকদেরকে তাঁর শক্তি ও সামর্থ্য প্রদর্শন করতে পারেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4915)


4915 - عن جابر بن عبد الله: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا نَزَلَ مِن الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ مَشَي حَتَّى إِذَا انْصَبَّتْ قَدَمَاهُ فِي بَطْنِ الْوَادِي سَعَى حَتَّى يَخْرُجَ مِنْهُ.

صحيح: رواه مالك في الحج (131) عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره. ورواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، قال:" … ثم نزل إلى المروة، حتى إذا انصبَّتْ قدماه في بطن الوادي سعي، حتّى إذا صعدتا مشي، حتى أتى المروة" الحديث في صفة حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাফা থেকে মারওয়ার দিকে (বা মারওয়া থেকে সাফার দিকে) নামতেন, তখন তিনি হেঁটে চলতেন। অবশেষে যখন তাঁর দু' পা উপত্যকার তলদেশে পৌঁছাতো, তখন তিনি দ্রুত চলতেন (দৌড়াতেন) যতক্ষণ না তিনি তা থেকে বের হয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4916)


4916 - عن صفية بنت شيبة، عن امرأة قالت: رَأَيْتُ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم يَسْعَى فِي بَطْنِ الْمَسِيلِ، وَيَقُولُ:"لا يُقْطَعُ الْوَادِي إِلا شَدًّا".

صحيح: رواه النسائيّ (2980)، والإمام أحمد (27281)، والبيهقيّ (5/ 98) كلّهم من حديث حماد بن زيد، عن بُديل بن ميسرة، عن المغيرة بن حكيم، عن صفية بنت شيبة، عن امرأة، فذكرته.

واللفظ للنسائيّ، وفي البيهقيّ:"الوادي أو الأبطح" هكذا بالشّك.

ولفظ أحمد: عن امرأة أنّها رأت النبيَّ صلى الله عليه وسلم من خوخةٍ وهو يسعى في بطن المسيل وهو يقول:"لا يقطع الوادي إلّا شدًّا" وأظنه قال: وقد انكشف الثوب عن ركبتيه. ثم قال حماد بعد:"لا يقطع -أو قال: الأبطح- إلّا شدًّا". وسمعته يقول:"لا يُقطع الأبطح إلّا شدًّا" انتهى.

وإسناده صحيح، وصوّبه الدّارقطني في"العلل" (15/ 423).

وأمّا ما رواه ابن ماجه (2987)، والإمام أحمد (27280) وغيرهما من حديث هشام الدّستوائيّ، عن بديل بن ميسرة، عن صفية بنت شيبة، عن أمّ ولد شيبة، أنّها أبصرت النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يسعى بين الصفا والمروة ويقول:"لا يقطع الأبطح إلّا شدًّا". وذلك بإسقاط المغيرة بن حكيم بين بديل بن ميسرة، وصفية بنت شيبة، فلا يضر ما صحَّ. ويجوز أن يكون بديل نفسه روي من وجهين فإنّ المزي لم ينفِ رواية بديل عن صفية بنت شيبة.

وللحديث أسانيد أخرى ذكر هنا ما صحَّ.
والصّحابيّة غير المسماة هي حبيبة بنت أبي تجراة، ويجوز أن تكون غيرها، وصفية بنت شيبة سمعتْ منهما جميعًا.




সাফিয়্যা বিনত শায়বাহ থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে উপত্যকার তলদেশে দ্রুত গতিতে দৌঁড়াতে দেখেছি। আর তিনি বলছিলেন: "উপত্যকা দ্রুত বেগে ব্যতীত অতিক্রম করা হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4917)


4917 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثُمَّ خَرَجَ مِن الْبَابِ إِلَى الصَّفَا فَلَمَّا دَنَا مِنَ الصَّفَا قَرَأَ: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} [البقرة: 158] أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ الله بِهِ فَبَدَأَ بِالصَّفَا فَرَقِيَ عَلَيْهِ … حَتَّى إِذَا كَانَ آخِرُ طَوَافِهِ عَلَى الْمَرْوَة … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في الحديث الطّويل.

وأخرجه مالك في الحج (126) عن جعفر بن محمد بن علي، به، مختصرًا.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তারপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দরজা দিয়ে সাফার দিকে বের হলেন। যখন তিনি সাফার নিকটবর্তী হলেন, তখন তিনি পাঠ করলেন: {নিশ্চয় সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্যতম} (সূরা বাকারা: ১৫৮)। (তিনি বললেন,) আমি তা দিয়েই শুরু করব যা দিয়ে আল্লাহ শুরু করেছেন। অতঃপর তিনি সাফা দিয়ে শুরু করলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন... অবশেষে যখন মারওয়ায় তাঁর শেষ চক্কর হলো...।









আল-জামি` আল-কামিল (4918)


4918 - عن عبد الله بن عباس، قال: قدم النبيُّ صلى الله عليه وسلم مكة، فطاف وسعي بين الصّفا والمروة، ولم يقرب الكعبة بعد طوافه بها حتى رجع من عرفة.

صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1625) عن محمد بن أبي بكر، حدّثنا فضيل، حدّثنا موسي ابن عقبة، أخبرني كريب، عن عبد الله بن عباس، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় আগমন করলেন। অতঃপর তিনি তাওয়াফ করলেন এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করলেন। তিনি তাওয়াফ করার পর কা‘বার কাছে যাননি, বরং আরাফা থেকে ফিরে আসা পর্যন্ত অপেক্ষা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4919)


4919 - عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّما جُعل رمي الجمار والسّعي بين الصّفا والمروة لإقامة ذكر الله".

حسن: رواه أبو داود (1888)، والترمذي (902) كلاهما من حديث عيسى بن يونس، عن عبيد الله بن أبي زياد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبيد الله بن أبي زياد اختلف فيه قول ابن معين، فمرة قال: ضعيف، وأخرى: ليس به بأس، وكذلك النسائي، فقال مرة: ليس بالقوي، وقال أخرى: ليس به بأس.

وقال أبو حاتم: ليس بالقوي، ولا المتين، هو صالح الحديث يكتب حديثه، ومحمد بن عمرو أحبّ إليَّ منه، يحوّل من كتاب الضعفاء (يعني كتاب الضعفاء للبخاريّ). والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"قد حدّث عنه الثقات، ولم أر في حديثه شيئًا منكرًا".
فمثله يحسّن حديثه إذا لم يخالف، ولم يرو ما ينكر عليه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কঙ্কর নিক্ষেপ করা এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করা বিধান করা হয়েছে কেবল আল্লাহর স্মরণ প্রতিষ্ঠার জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (4920)


4920 - عن عبد الله بن عباس، قال:" … وَجَعَلَتْ أُمُّ إِسْمَاعِيلَ تُرْضِعُ إِسْمَاعِيلَ وَتَشْرَبُ مِنْ ذَلِكَ الْمَاءِ، حَتَّى إِذَا نَفِدَ مَا فِي السِّقَاءِ عَطِشَتْ وَعَطِشَ ابْنُهَا وَجَعَلَتْ تَنْظُرُ إِلَيْهِ يَتَلَوَّى -أَوْ قَالَ يَتَلَبَّطُ-. فَانْطَلَقَتْ كَرَاهِيَةَ أَنْ تَنْظُرَ إِلَيْهِ فَوَجَدَت الصَّفَا أَقْرَبَ جَبَلٍ فِي الأَرْضِ يَلِيهَا فَقَامَتْ عَلَيْهِ ثُمَّ اسْتَقْبَلَت الْوَادِيَ تَنْظُرُ هَلْ تَرَى أَحَدًا فَلَمْ تَرَ أَحَدًا فَهَبَطَتْ مِن الصَّفَا حَتَّى إِذَا بَلَغَت الْوَادِيَ رَفَعَتْ طَرَفَ دِرْعِهَا، ثُمَّ سَعَتْ سَعْيَ الإِنْسَانِ الْمَجْهُودِ حَتَّى جَاوَزَت الْوَادِيَ ثُمَّ أَتَت الْمَرْوَةَ فَقَامَتْ عَلَيْهَا وَنَظَرَتْ هَلْ تَرَى أَحَدًا فَلَمْ تَرَ أَحَدًا فَفَعَلَتْ ذَلِكَ سَبْعَ مَرَّاتٍ".

قَالَ ابْنُ عَبَّاس: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"فَذَلِكَ سَعْيُ النَّاسِ بَيْنَهُمَا".

صحيح: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3364) عن عبد الله بن محمد (هو الجعفيّ المسنديّ)، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب السّختيانيّ، وكثير بن كثير بن المطّلب بن أبي وداعة -يزيد أحدهما على الآخر-، عن سعيد بن جبير، قال ابن عباس، فذكر الحديث بطوله.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইসমাঈলের মাতা (হাজেরা) ইসমাঈলকে দুধ পান করাচ্ছিলেন এবং সেই পানি পান করছিলেন। অবশেষে মশকটির পানি শেষ হয়ে গেলে তিনি এবং তাঁর পুত্র পিপাসার্ত হলেন। তিনি তার দিকে তাকাতে লাগলেন, আর সে (শিশুটি) যন্ত্রণায় ছটফট করছিল—অথবা তিনি বলেছিলেন, আছাড় খাচ্ছিল। তার দিকে না তাকানোর অপছন্দ নিয়ে তিনি চলে গেলেন। তিনি সাফা পাহাড়কে তাঁর নিকটতম পাহাড় হিসেবে পেলেন। তিনি তার উপর দাঁড়ালেন, অতঃপর উপত্যকার দিকে মুখ করে তাকালেন, কাউকে দেখতে পান কিনা। কিন্তু তিনি কাউকেই দেখতে পেলেন না। এরপর তিনি সাফা থেকে নেমে এলেন। যখন উপত্যকায় পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর কামিজের কোণা উঠালেন, অতঃপর তিনি খুব ক্লান্ত মানুষের মতো দ্রুত দৌড়ালেন, যতক্ষণ না উপত্যকা পার হলেন। অতঃপর তিনি মারওয়ার কাছে গেলেন এবং তার উপর দাঁড়ালেন এবং দেখলেন কাউকে দেখতে পান কিনা। তিনি কাউকেই দেখতে পেলেন না। তিনি এভাবে সাতবার করলেন।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই কারণেই মানুষ তাদের উভয়ের (সাফা ও মারওয়া) মধ্যে সাঈ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4921)


4921 - عن جَابِر بْن عبد الله قال: طَافَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ عَلَى رَاحِلَتِهِ بِالْبَيْتِ، وَبِالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ لِيَرَاهُ النَّاسُ وَلِيُشْرِفَ وَلِيَسْأَلُوهُ فَإِنَّ النَّاسَ غَشُوهُ.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1273: 255) من طرق عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله، فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বিদায় হজ্জে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটনীর উপর আরোহণ করে বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করেন এবং সাফা-মারওয়ায় সা‘ঈ করেন, যাতে লোকেরা তাঁকে দেখতে পায়, তিনি তদারকি করতে পারেন এবং তারা তাঁকে প্রশ্ন করতে পারে। কারণ লোকেরা তাঁকে ঘিরে ধরেছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4922)


4922 - عن جابر أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا نَزَلَ مِن الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ مَشَى حَتَّى إِذَا انْصَبَّتْ قَدَمَاهُ فِي بَطْنِ الْوَادِي سَعَى حَتَّى يَخْرُجَ مِنْهُ.

صحيح: رواه مالك في الحج (131) عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره. وأصله في صحيح مسلم في صفة حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

وفي رواية للنسائي (2974):"ثم نزل ماشيًا حتى تصوَّبتْ قدماه في بطن المسيل".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাফা ও মারওয়া থেকে নামতেন, তখন তিনি হেঁটে যেতেন। অতঃপর যখন তাঁর কদম বা পা উপত্যকার অভ্যন্তরে নেমে আসত, তখন তিনি সেখান থেকে বেরিয়ে না যাওয়া পর্যন্ত দ্রুত চলতেন (সা'ঈ করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (4923)


4923 - عن أبي الطفيل، قال: قلت لابن عباس: أَخْبِرْنِي عَن الطَّوَافِ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ رَاكِبًا أَسُنَّةٌ هُوَ فَإِنَّ قَوْمَكَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُ سُنَّةٌ؟ قَالَ: صَدَقُوا وَكَذَبُوا! . قَال: قُلْتُ: وَمَا قَوْلُكَ صَدَقُوا وَكَذَبُوا؟ قَال: إِنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَثُرَ عَلَيْهِ النَّاسُ يَقُولُونَ:
هَذَا مُحَمَّدٌ هَذَا مُحَمَّدٌ حَتَّى خَرَجَ الْعَوَاتِقُ مِن الْبُيُوتِ، قَال: وَكَانَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم لا يُضْرَبُ النَّاسُ بَيْنَ يَدَيْهِ فَلَمَّا كَثُرَ عَلَيْهِ رَكِبَ وَالْمَشْيُ وَالسَّعْيُ أَفْضَلُ.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1264) عن أبي كامل فضيل بن حسين الجحدريّ، حدّثنا عبد الواحد بن زياد، حدّثنا الجريريّ، عن أبي الطفيل فذكره.

قوله:"صدقوا وكذبوا" قال النوويّ: يعني صدقوا في أنه طاف راكبًا، وكذبوا في أنّ الركوب أفضل، بل المشي أفضل.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: আমাকে সাফা ও মারওয়ার মাঝে সওয়ার হয়ে ত্বওয়াফ (সা'ঈ) করা সম্পর্কে বলুন— এটা কি সুন্নাহ? কারণ আপনার গোত্রের লোকেরা ধারণা করে যে এটা সুন্নাহ। তিনি (ইবনু আব্বাস) বললেন: তারা সত্য বলেছে এবং মিথ্যাও বলেছে! আবূ তুফাইল বলেন, আমি বললাম: আপনার এই কথা— ‘তারা সত্য বলেছে এবং মিথ্যাও বলেছে’— এর অর্থ কী? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ওপর প্রচুর সংখ্যক মানুষ ভিড় করেছিল। তারা বলছিল: এই তো মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), এই তো মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এমনকি যুবতীরাও ঘর থেকে বেরিয়ে এসেছিল। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে লোকদেরকে সরানোর জন্য আঘাত করা হতো না। যখন তাঁর ওপর বেশি ভিড় হলো, তখন তিনি সওয়ার হলেন। তবে হেঁটে সা'ঈ করাই উত্তম।









আল-জামি` আল-কামিল (4924)


4924 - عن أبي الطفيل، قال: قُلْتُ لابنِ عَبَّاس: أُرَانِي قَدْ رَأَيْتُ رسول اللهِ صلى الله عليه وسلم. قَال: فَصِفْهُ. لِي. قَال: قُلْتُ: رَأَيْتُهُ عِنْدَ الْمَرْوَةِ عَلَى نَاقَةٍ وَقَدْ كَثُرَ النَّاسُ عَلَيْهِ. قَال: فَقَال ابْنُ عَبَّاسٍ: ذَاكَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم إِنَّهُمْ كَانُوا لا يُدَعُّونَ عَنْهُ وَلا يُكْهَرُونَ.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1265) عن محمد بن رافع، حدّثنا يحيى بن آدم، حدّثنا زهير ابن عبد الملك بن سعيد بن الأبجر، عن أبي الطفيل، فذكره.

ويستفاد من أحاديث الباب أن النبي صلى الله عليه وسلم جمع بين المشي والرّكوب في سعيه في حجّة الوداع؛ وذلك أنّه مشى أولًا فلما كثر عليه الناس ركب، كما في روايات مسلم.




আবু তুফাইল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আমার মনে হয় আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি। তিনি (ইবনু আব্বাস) বললেন: তাহলে তাঁর বর্ণনা দাও। তিনি (আবু তুফাইল) বললেন, আমি বললাম: আমি তাঁকে মারওয়ার নিকট একটি উষ্ট্রীর উপর দেখেছি, আর তাঁর চারপাশে বহু লোক সমবেত হয়েছিল। তিনি বললেন, তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনিই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। নিশ্চয়ই লোকেরা তাঁর নিকট থেকে বিতাড়িত হতো না এবং তাদেরকে ধমকানোও হতো না।









আল-জামি` আল-কামিল (4925)


4925 - عن أبي هريرة، قال: وَأَقْبَلَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم حَتَّى أَقْبَلَ إِلَى الْحَجَرِ فَاسْتَلَمَهُ، ثُمَّ طَافَ بِالْبَيْتِ، قَال: فَأَتَي عَلَى صَنَم إِلَى جَنْبِ الْبَيْتِ كَانُوا يَعْبُدُونَهُ. قَال: وَفِي يَدِ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم قَوْسٌ وَهُوَ آخِذٌ بِسِيَةِ الْقَوْسِ فَلَمَّا أَتَى عَلَى الصَّنَمِ جَعَلَ يَطْعُنُهُ فِي عَيْنِهِ وَيَقُولُ: {جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ}، فَلَمَّا فَرَغَ مِنْ طَوَافِهِ أَتَى الصَّفَا فَعَلا عَلَيْهِ حَتَّى نَظَرَ إِلَى الْبَيْتِ وَرَفَعَ يَدَيْهِ فَجَعَلَ يَحْمَدُ الله وَيَدْعوُ بِمَا شَاءَ أَنْ يَدْعُوَ … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في فتح مكة (1780) عن شيبان بن فروخ، حدّثنا سليمان بن المغيرة، حدّثنا ثابت البنانيّ، عن عبد الله بن رباح، عن أبي هريرة في حديث طويل في قصّة فتح مكة، وسيأتي بكامله في موضعه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে আসলেন, এমনকি তিনি হাজরে আসওয়াদের কাছে আসলেন এবং তা স্পর্শ করলেন। অতঃপর তিনি বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করলেন। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন, তিনি বাইতুল্লাহর পাশে থাকা একটি মূর্তির কাছে এলেন, যেটির তারা ইবাদত করত। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে ছিল একটি ধনুক এবং তিনি ধনুকটির অগ্রভাগ ধরে রেখেছিলেন। যখন তিনি মূর্তিটির কাছে এলেন, তখন তিনি সেটির চোখে আঘাত করতে লাগলেন এবং বলতে লাগলেন: "সত্য সমাগত এবং মিথ্যা বিলুপ্ত।" যখন তিনি তাওয়াফ শেষ করলেন, তখন তিনি সাফার কাছে আসলেন এবং সেটির উপর আরোহণ করলেন, যতক্ষণ না তিনি বাইতুল্লাহর দিকে দৃষ্টি দিলেন। অতঃপর তিনি দু’হাত তুলে আল্লাহর প্রশংসা করতে লাগলেন এবং তিনি যা ইচ্ছা তাই দু‘আ করলেন।... এই হলো হাদীসটি।









আল-জামি` আল-কামিল (4926)


4926 - عن جابر بن عبد الله، قال: فَلَمَّا دَنَا مِن الصَّفَا قَرَأَ: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} [البقرة: 158]، أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ الله بِهِ، فَبَدَأَ بِالصَّفَا فَرَقِيَ عَلَيْهِ حَتَّى رَأَي الْبَيْتَ، فَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ، فَوَحَّدَ الله وَكَبَّرَهُ، وَقَال:"لا إِلَهَ إِلا الله وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلَّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لا إِلَهَ إِلا الله وَحْدَهُ أَنْجَزَ وَعْدَهُ
وَنَصَرَ عَبْدَهُ وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ". ثُمَّ دَعَا بَيْنَ ذَلِكَ قَالَ مِثْلَ هَذَا ثَلاثَ مَرَّاتٍ، ثُمَّ نَزَلَ إِلَى الْمَرْوَةِ حَتَّى إِذَا انْصَبَّتْ قَدَمَاهُ فِي بَطْنِ الْوَادِي سَعَى حَتَّى إِذَا صَعِدَتَا مَشَي، حَتَّى أَتَى الْمَرْوَةَ فَفَعَلَ عَلَى الْمَرْوَةِ كَمَا فَعَلَ عَلَى الصَّفَا.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله في حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ورواه مالك في الحج (127) عن جعفر بن محمد بن علي، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله، مختصرًا:"أَنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا وَقَفَ عَلَى الصَّفَا يُكَبِّرُ ثَلاثًا، وَيَقُولُ:"لا إِلَهَ إِلا الله وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ" يَصْنْعُ ذَلِكَ ثَلاثَ مَرَّاتٍ وَيَدْعُو وَيَصْنَعُ عَلَى الْمَرْوَةِ مِثْلَ ذَلِك.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফার নিকটবর্তী হলেন, তখন পাঠ করলেন: {নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্যতম} (সূরা আল-বাকারা: ১৫৮)। [তারপর বললেন:] "আমি তা দিয়েই শুরু করব যা দিয়ে আল্লাহ শুরু করেছেন।" তাই তিনি সাফা দিয়েই শুরু করলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন। এমনকি তিনি বাইতুল্লাহ দেখতে পেলেন। তখন তিনি কিবলামুখী হলেন, আল্লাহর একত্ব ঘোষণা করলেন এবং তাকবীর দিলেন। আর বললেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু, আনজাযা ওয়া’দাহু, ওয়া নাসারা আবদাহু, ওয়া হাযামাল আহযাবা ওয়াহদাহু।" (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই, প্রশংসা তাঁরই এবং তিনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান। আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি এক, তিনি তাঁর প্রতিশ্রুতি পূর্ণ করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং একাই সকল দলকে (শত্রুকে) পরাজিত করেছেন।) অতঃপর তিনি এর মাঝে দু'আ করলেন। তিনি এভাবে (এই যিকির ও দু'আ) তিনবার বললেন। এরপর তিনি মারওয়ার দিকে নামলেন। যখন তাঁর দুই পা উপত্যকার মাঝে পৌঁছালো, তিনি দৌড়ালেন (সাঈ করলেন)। যখন তিনি উপরে উঠলেন, তখন হেঁটে চললেন। এভাবে তিনি মারওয়ায় পৌঁছালেন এবং সাফার উপর যা করেছিলেন, মারওয়ার উপরও ঠিক তাই করলেন।

অন্য একটি বর্ণনায় (জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে সংক্ষেপে) বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাফার উপর দাঁড়াতেন, তখন তিনবার তাকবীর দিতেন এবং বলতেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর।" তিনি তিনবার এরূপ করতেন এবং দু'আ করতেন। মারওয়ার উপরেও তিনি ঠিক তা-ই করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4927)


4927 - عن ابن عمر، قال: تَمَتَّعَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ بِالْعُمْرَةِ إِلَى الْحَجِّ وَأَهْدَى فَسَاقَ مَعَهُ الْهَدْيَ مِنْ ذِي الْحُلَيْفَةِ وَبَدَأَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم، فَأَهَلَّ بِالْعُمْرَةِ، ثُمَّ أَهَلَّ بِالْحَجَّ فَتَمَتَّعَ النّاسُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِالْعُمْرَةِ إِلَى الْحَجِّ فَكَانَ مِن النَّاسِ مَنْ أَهْدَى فَسَاقَ الْهَدْيَ وَمِنْهُمْ مَنْ لَمْ يُهْدِ، فَلَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مَكَّةَ قَالَ لِلنَّاسِ:"مَنْ كَانَ مِنْكُمْ أَهْدَى فَإِنَّهُ لا يَحِلُّ لِشَيْءٍ حَرُمَ مِنْهُ حَتَّى يَقْضِيَ حَجَّهُ، وَمَنْ لَمْ يَكُنْ مِنْكُمْ أَهْدَى فَلْيَطُفْ بِالْبَيْتِ وَبِالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ وَلْيُقَصِّرْ وَلْيَحْلِلْ، ثم ليُهلَّ بالحج، فمن لم يجدْ هديا فليصمْ ثلاثة أيام في الحج، وسبعة إذا رجع إلى أهله".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1691) -واللفظ له -، ومسلم في الحج (1227) كلاهما من طريق الليث بن سعد، حدثني عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، أنّ عبد الله ابن عمر، فذكره بتمامه.

قوله:"وليقصِّر" أي من شعره، وإنّما أُمروا بالتقصير لقربهم من الإهلال بالحجّ وليتمكّنوا من الحلق في الحجّ وهو الأفضل من التقصير.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু' করলেন এবং কুরবানীর পশু (হাদী) সাথে নিলেন। তিনি যুল-হুলাইফা থেকেই তার সাথে কুরবানীর পশুগুলো হাঁকিয়ে নিয়ে গিয়েছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রথমে উমরার ইহরাম বাঁধলেন, অতঃপর হজ্জের ইহরাম বাঁধলেন। সুতরাং লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু' করল। লোকদের মধ্যে কেউ কেউ হাদী (কুরবানীর পশু) সাথে নিয়ে গিয়েছিল এবং কেউ কেউ হাদী সাথে নেয়নি। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় পৌঁছলেন, তখন তিনি লোকদের বললেন: "তোমাদের মধ্যে যারা হাদী (কুরবানীর পশু) সাথে নিয়ে এসেছে, তারা হজ্জ শেষ না করা পর্যন্ত সেই জিনিসগুলো থেকে হালাল হবে না, যা তাদের উপর ইহরামের কারণে হারাম হয়েছে। আর তোমাদের মধ্যে যারা হাদী সাথে নিয়ে আসেনি, তারা যেন বায়তুল্লাহ ও সাফা-মারওয়ার তাওয়াফ করে, চুল ছোট করে (তাকসীর) এবং হালাল হয়ে যায়। অতঃপর তারা যেন হজ্জের ইহরাম বাঁধে। আর যারা হাদী (কুরবানীর পশু) পাবে না, তারা যেন হজ্জের সময় তিন দিন এবং বাড়িতে ফিরে গিয়ে সাত দিন রোযা রাখে।"