আল-জামি` আল-কামিল
5608 - عن رافع بن خديج قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة.
حسن: رواه أبو داود (3400)، وابن ماجه (2267)، والنسائي (3890) كلهم من حديث أبي الأحوص، عن طارق بن عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب، عن رافع بن خديج فذكره.
وإسناده حسن من أجل طارق بن عبد الرحمن، وهو البجلي الأحمسي الكوفي، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال الصحيح.
রাফে' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাকালাহ ও মুযাবানাহ্ নিষিদ্ধ করেছেন।
5609 - عن زيد بن ثابت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أرخص لصاحب العرية أن يبيعها بخرصها.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (14) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، عن زيد بن ثابت فذكره.
ورواه البخاريّ في البيوع (2188) ومسلم في البيوع (1539: 60) كلاهما من طريق مالك به مثله، وزاد مسلم:"من التمر".
ورواه البخاري (2192) من وجه آخر عن موسى بن عقبة، عن نافع به بلفظ:"أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رخص في العرايا أن تباع بخرصها كيلا".
قال موسى بن عقبة:"والعرايا نخلات معلومات، تأتيها، فتشتريها".
যায়েদ ইবন ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আরিয়্যাহ’-এর মালিককে তা অনুমান করে (শুকনো খেজুরের বিনিময়ে) বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন।
5610 - عن زيد بن ثابت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رخص في بيع العرايا أن تباع بخرصها، ولم يرخص في غير ذلك.
صحيح: رواه الإمام أحمد (21581)، والدارمي (2600)، وابن حبان (5009) كلهم من حديث الأوزاعيّ، عن الزهريّ، عن سالم، عن أبيه، عن زيد بن ثابت فذكره.
وفي الصحيحين -البخاري (2184)، ومسلم (1539) -: وقال سالم: أخبرني عبد اللَّه، عن زيد بن ثابت، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه رخص بعد ذلك في بيع العرية بالرطب، أو بالتمر، ولم يرخص في غيره.
وذلك عطفا على رواية عقيل، عن ابن شهاب قال: أخبرني سالم بن عبد اللَّه، عن عبد اللَّه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا التمر حتى يبدو صلاحه، ولا تبيعوا الثمر بالتمر". هذا ما سمعه عبد اللَّه بن عمر من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وسمع من زيد بن ثابت جواز بيع العرية.
যায়িদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'আরায়া' (Araya) খেজুর আনুমানিক অনুমান (খরছ) অনুসারে বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন, তবে এছাড়া অন্য কিছুতে অনুমতি দেননি। (সহীহাইন-এর অন্য এক বর্ণনায় এসেছে যে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরপর আরায়া কাঁচা খেজুরের (রুতাব) বা শুকনো খেজুরের (তামর) বিনিময়ে বিক্রি করার অনুমতি দেন, তবে এছাড়া অন্য কিছুর অনুমতি দেননি।
5611 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزابنة، والمعاومة، والمخابرة، وعن الثنيا، ورخص في العرايا.
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1536: 85) من طرق عن حماد بن زيد، حدّثنا أيوب، عن أبي الزبير، وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وقال أحدهما:"بيع السنين هي المعاومة".
وأخرج مسلم، وأحمد (14358) عن إسماعيل ابن علية، عن أيوب بإسناده، فذكر مثله. وأحال مسلم على اللفظ السابق، وقال: ولم يذكر فيه:"بيع السنين هي المعاومة".
فعرفنا من قوله هذا أن تفسير المعاومة من سعيد بن ميناء.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাক্কালা, মুযাবানা, মু'আওয়ামা, মুখাবারা এবং সা-নিয়া (বিক্রিতে ব্যতিক্রম রাখা) থেকে নিষেধ করেছেন, তবে 'আরায়ার ক্ষেত্রে অনুমতি দিয়েছেন।
5612 - عن سهل بن أبي حثمة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمر بالتمر، وقال:"ذلك الربا، تلك المزابنة". إلا أنه رخص في بيع العرية، النخلة والنخلتين يأخذها أهل البيت بخرصها تمرا، يأكلونها رطبا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2191)، ومسلم في البيوع (1540: 67) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن بُشير بن يسار، عن بعض أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من أهل دارهم، منهم سهل بن أبي حثمة فذكره. واللّفظ لمسلم.
সাহল ইবনু আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের বিনিময়ে ফল (যা তখনও গাছে) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। এবং তিনি বললেন: "এটা হল সুদ, এটা হল মুযাবানা।" তবে তিনি আরিয়্যা (ʿAriyyah) ধরনের বিক্রয় লেনদেনে অনুমতি দিয়েছেন। (যেমন) কোনো পরিবার এক বা দুটি খেজুর গাছ আন্দাজ করে শুকনা খেজুরের বিনিময়ে গ্রহণ করে, যাতে তারা তা তাজা (কাঁচা) অবস্থায় খেতে পারে।
5613 - عن رافع بن خديج، وسهل بن أبي حثمة حدثا أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن المزابنة، بيع الثمر بالتمر إلا أصحاب العرايا، فإنه أذن لهم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المساقاة (2383، 2384)، ومسلم في البيوع (1540: 70) كلاهما من حديث أبي أسامة قال: أخبرني الوليد بن كثير قال: أخبرني بُشير بن يسار مولى بني حارئة أن رافع بن خديج وسهل بن أبي حثمة حدثاه فذكر الحديث.
وقال البخاري: وقال ابن إسحاق: حدثني بشير مثله.
قلت: ذكر البخاري متابعة محمد بن إسحاق للوليد بن كثير، وهو المخزومي، أبو محمد المدني، فإنه مختلف فيه، فضعفه ابن سعد، ووثّقه ابن معين، وأبو داود، غير أنه حسن الحديث.
وقوله:"العرية"، و"العرايا" هي بيع ثمر نخلات معلومات بعد بدو الصلاح فيها خرصا بالتمر الموضوع على وجه الأرض كيلا، استثناه الشارع من المزابنة لحاجة النّاس إلى ذلك.
وسميت عرية؛ لأنها عريت من جملة التحريم، أي خرجت. فعيلة بمعنى فاعلة. ثم إن صور العرية كثيرة، وإليكم بعض ما ذكره الحافظ ابن حجر في الفتح: منها أن يقول الرجل لصاحب حائط: بعني ثمر نخلات بأعيانها بخرصها من التمر. فيخرصها، ويبيعه، ويقبض منه التمر، ويسلم إليه النخلات بالتخلية.
ومنها أن يهب صاحب الحائط لرجل نخلات أو ثمر نخلات معلومة من حائطه، ثم يتضرر بدخوله عليه، فيخرصها، ويشتري منه رطبها بقدر خرصه بتمر يعجله له.
ومنها أن يبيع الرجل تمر حائطه بعد بدو صلاحه، ويستثني منه نخلات معلومة يبقيها لنفسه ولعياله، وهي التي عفي له عن خرصها في الصدقة، فرخص لأهل الحاجة الذين لا نقد لهم،
وعندهم فضول من تمر قوتهم أن يبتاعوا بذلك التمر من رطب تلك النخلات بخرصها.
وقد ذهب أكثر الفقهاء إلى جواز هذه الصور، منهم الأوزاعيّ، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، وأبو عبيد، وغيرهم.
وقد فصّلت القول فيه في"المنة الكبرى" (5/ 98 - 107)، فراجعه لمعرفة المزيد.
রাফে' ইবনে খাদীজ ও সাহল ইবনে আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা দু’জন বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযাবানা পদ্ধতি অর্থাৎ ফলকে শুকনো খেজুরের বিনিময়ে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। তবে 'আরায়া' (عرية)-এর মালিকেরা ছাড়া। কেননা তিনি তাদেরকে (তা করার) অনুমতি দিয়েছেন।
5614 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أرخص في بيع العرايا بخرصها فيما دون خمسة أوسق، أو في خمسة أوسق.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (14) عن داود بن الحصين، عن أبي سفيان مولى ابن أبي أحمد، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاريّ في البيوع (2190)، ومسلم في البيوع (1541) كلاهما من طريق مالك به مثله.
زاد مسلم: يشك داود قال: خمسة، أو دون خمسة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঁচ ওয়াসাক অথবা পাঁচ ওয়াসাকের কম পরিমাণে আনুমানিক (খারস) মূল্যে ‘আরায়া’ বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন।
5615 - عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين أذن لأصحاب العرايا أن يبيعوها بخرصها يقول:"الوسق، والوسقين، والثلاثة، والأربعة".
حسن: رواه الإمام أحمد (14868)، وأبو يعلى (1780)، وصحّحه ابن حبان (5008)، وابن خزيمة (2469) كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني محمد بن يحيى بن حبان، عن عمه واسع بن حَبان، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وهو مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث.
"والأوسق" جمع وسق، وهو ستون صاعا، والصاع خمسة أرطال وثلث، والمجموع ثلاث مائة صاع، وهي تساوي اليوم (700) كيلو جرام تقريبا.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, যখন তিনি 'আরায়্যা'র অধিকারীদেরকে তাদের ফল অনুমান (خرص) করে বিক্রি করার অনুমতি দিলেন, তখন তিনি বলেছিলেন: এক ওয়াসাক, দুই ওয়াসাক, তিন ওয়াসাক এবং চার ওয়াসাক।
5616 - عن زيد أبي عياش أنه سأل سعد بن أبي وقاص عن البيضاء بالسلت، فقال له سعد: أيتهما أفضل؟ قال: البيضاء. فنهاه عن ذلك. وقال سعد: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يسأل عن اشتراء التمر بالرطب، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أينقص الرطب إذا يبس؟" فقالوا: نعم، فنهى عن ذلك.
حسن: رواه مالك في البيوع (22) عن عبد اللَّه بن يزيد أن زيدا أبا عياش أخبره فذكره.
ومن طريق مالك رواه أبو داود (3359)، والترمذي (1225)، والنسائي (4549)، وابن ماجه (2264)، وأحمد (1515)، وابن حبان (4997)، والحاكم (2/ 38)، والبيهقي (5/ 294) كلهم
من هذا الطريق.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم".
وتابع مالكا إسماعيل بن أمية، والضحاك بن عثمان، وأسامة بن زيد.
وخالفهم جميعا يحيى بن أبي كثير، ومن طريقه رواه أبو داود (3360)، والدارقطني (3/ 49)، والحاكم (2/ 38 - 39)، والبيهقي (5/ 294)، فزاد في آخر الحديث:"نسيئة".
قال الدارقطني:"واجتماع هؤلاء الأربعة على خلاف ما رواه يحيى يدل على ضبطهم للحديث، وفيهم إمام حافظ، وهو مالك بن أنس".
وقال البيهقي بعد أن نقل كلام الدارقطني:"والعلة المنقولة في هذا الخبر تدل على خطأ هذه اللفظة، وقد رواه عمران بن أبي أنس، عن أبي عياش نحو رواية الجماعة".
والخلاصة أن ذكر"نسيئة" في هذا الحديث شاذ.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح إجماع أئمة النقل على إمامة مالك بن أنس، وأنه محكم في كل ما يرويه من الحديث إذ لم يوجد في رواياته إلا الصحيح، خصوصا في حديث أهل المدينة، ثم لمتابعة هؤلاء الأئمة إياه في روايته عن عبد اللَّه بن يزيد، والشيخان لم يخرجاه لما خشياه من جهالة زيد أبي عياش".
قلت: زيد أبو عياش هو زيد بن عياش المدني، وثّقه الدارقطني، وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 311).
وقوله هذا يدل على أنه لو لم تكن هذه العلة عندهما لأخرجاه، والأمر ليس كما قال؛ فإنهما لم يلتزما إخراج جميع ما صح.
قوله:"البيضاء" نوع من البر أبيض اللون.
و"السلت" نوع آخر غير البر، وهو أدق حبا منه.
وقال بعضهم: البيضاء هو الرطب من السُلت، وهذا أليق بمعنى الحديث بدليل أنه شبهه بالرطب مع التمر، ولو اختلف الجنس لم يصح التشبيه.
وقال الخطابي:"وهذا الحديث أصل في أبواب كثيرة من مسائل الربا، وذلك أن كل شيء من المطعوم مما له نداوة ولجفافه نهاية فإنه لا يجوز رطبه بيابسه، كالعنب والزبيب، واللحم النيء بالقديد ونحوهما".
وقال:"وقد ذهب أكثر الفقهاء إلى أن بيع الرطب بالتمر غير جائز، وهو قول مالك، والشافعي، وأحمد بن حنبل. وبه قال أبو يوسف، ومحمد بن الحسن. وعن أبي حنيفة جواز بيع الرطب بالتمر نقدا، ويشبه أن يكون تأويل الحديث عنده على النسيئة دون النقد". انتهى.
وذلك أن الرطب والتمر إما أن يكونا جنسين مختلفين، فيجوز بيعهما ولو متفاضلين إذا كان يدا
بيد، وإما أن يكونا جنسا واحدا فيجوز بيعهما بشرط التماثل وأن يكون يدا بيد، وعلى التقديرين فلا يمنع بيع أحدهما بالآخر. انظر البناية (7/ 369 - 370).
وعلى هذا حملوا النهي على النسيئة دون النقد.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ আবূ আইয়াশ তাঁকে ‘আল-বায়দা’ এর বিনিময়ে ‘আস-সালত’ ক্রয়-বিক্রয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। সা’দ তাকে জিজ্ঞেস করলেন: “এই দুটির মধ্যে কোনটি উত্তম?” তিনি (যায়দ) বললেন: ‘আল-বায়দা’। তখন সা’দ তাকে তা করতে নিষেধ করলেন।
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খেজুরের বিনিময়ে তাজা (আর্দ্র) খেজুর ক্রয় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাজা খেজুর শুকিয়ে গেলে কি কমে যায়?” তারা বললেন: “হ্যাঁ।” এরপর তিনি তা করতে নিষেধ করলেন।
5617 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمار حتى يبدو صلاحها، نهى البائع والمشتري.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (10) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاريّ في البيوع (2194)، ومسلم في البيوع (1534: 49) كلاهما من طريق مالك به مثله.
ورواه البخاري (1486) من طريق عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر نحوه، وزاد:"وكان إذا سئل عن صلاحها قال:"حتى تذهب عاهته".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পাকার (উপযোগিতা) স্পষ্ট না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বিক্রেতা ও ক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।
আর তাঁকে যখন এর উপযোগিতা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হত, তখন তিনি বলতেন: "যতক্ষণ না তার ত্রুটি দূর হয়।"
5618 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع النخل حتى يزهو، وعن السنبل حتى يبيض ويأمن العاهة، نهى البائع والمشتري.
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1535) من طرق عن إسماعيل، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ومن هذا الوجه رواه كل من أبي داود (3368)، والترمذي (1226)، والنسائي (4551).
قال البيهقي (5/ 303): وذكر السنبل في هذا الحديث مما تفرّد به أيوب السختياني، عن نافع من بين أصحاب نافع، وأيوب ثقة حجة، والزيادة من مثله مقبولة، وهذا الحديث مما اختلف البخاري ومسلم في إخراجه في الصحيح، فأخرجه مسلم، وتركه البخاري، فقد روى حديث النهي عن بيع الثمرة حتى يبدو صلاحها: يحيى بن سعيد الأنصاري، وموسى بن عقبة، ومالك بن أنس، وعبيد اللَّه بن عمر، والضحاك بن عثمان، وغيرهم، عن نافع، لم يذكر واحد منهم فيه النهي عن بيع السنبل حتى يبيض غير أيوب، ورواه سالم بن عبد اللَّه، وعبد اللَّه بن دينار، وغيرهما عن ابن عمر، لم يذكر واحد منهم فيه ما ذكر أيوب، ورواه جابر بن عبد اللَّه الأنصاري، وزيد بن ثابت، وعبد اللَّه بن عباس، وأبو هريرة، وغيرهم عن النبي صلى الله عليه وسلم، لم يذكر واحد منهم فيه ما ذكر أيوب إلا ما رواه حماد بن سلمة، عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك قال:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الحب حتى يشتد، وعن بيع العنب حتى يسود، وعن بيع الثمر حتى يزهو". انتهى.
والزهو في التمر أن يحمر، أو يصفر، وذلك إمارة الصلاح فيها، ودليل سلامتها من الآفة.
وقوله:"عن السنبل حتى يبيض" ظاهره بيع الحب في السبل إذا اشتد، وأبيض، وبه قال جمهور العلماء: أبو حنيفة، ومالك، وأهل المدينة والكوفة، ومنعه الشافعي بحجة الغرر
والجهالة. ولكن نقل ابن التركماني عن الشافعي أنه لما وصلته هذه الزيادة رجع عن قوله، وذلك أنه لا يجوز عنده قياس مع وجود الحديث.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুর (গাছের ফল) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা লাল বা হলুদ (পাকা শুরু) হয়, এবং শীষ (শস্য) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা সাদা হয় এবং বিপদ (ক্ষতি) থেকে নিরাপদ হয়। তিনি ক্রেতা ও বিক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।
5619 - عن عثمان بن عبد اللَّه بن سراقة قال: كنا في سفر، ومعنا ابن عمر، فسألته، فقال: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا يُسبح في السفر قبل الصلاة، ولا بعدها. قال: وسألت ابن عمر عن بيع الثمار، فقال نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمار حتى تذهب العاهة. قلت: يا أبا عبد الرحمن، وما تذهب العاهة؟ وما العاهة؟ قال: طلوع الثريا.
صحيح: رواه الإمام أحمد (5012، 5015)، والطبراني في الكبير (13287)، والبيهقي (5/ 300) كلهم من طريق ابن أبي ذئب، عن عثمان بن عبد اللَّه بن سراقة فذكره. وإسناده صحيح.
وقوله:"طلوع الثريا" هو علامة ذهاب عاهة الثمار، وسيأتي مثله عن زيد بن ثابت.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে সুরাকাহ বলেন: আমরা এক সফরে ছিলাম এবং ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের সাথে ছিলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে তিনি সফরে নামাজের পূর্বে বা পরে কোনো (নফল) সালাত আদায় করতেন না। উসমান বলেন: আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ফল বিক্রি করা সম্পর্কেও জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তার ক্ষতি (আ-আহা) দূর হয়। আমি বললাম: হে আবু আবদুর রহমান, ক্ষতি দূর হওয়া মানে কী? আর ক্ষতি (আ-আহা)-ই বা কী? তিনি বললেন: (আকাশে) সুরাইয়া তারকার উদয় হওয়া।
5620 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع ثمر النخل حتى تزهو. فقلنا لأنس: ما زهوها؟ قال: تحمر، وتصفر، أرأيت إن منع اللَّه الثمرة بم تستحل مال أخيك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2208)، ومسلم في المساقاة (1555) كلاهما عن قتيبة، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، عن حميد، عن أنس فذكره. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা 'যাহ্ওয়া' প্রাপ্ত হয়। আমরা আনাসকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলাম: ‘যাহ্ওয়া’ কী? তিনি বললেন: যখন তা লাল বা হলুদ হতে শুরু করে। (তারপর তিনি বললেন,) তুমি কি ভেবে দেখেছ, যদি আল্লাহ ফল পাকানো থেকে বিরত রাখেন (বা ফল নষ্ট করে দেন), তবে তুমি তোমার ভাইয়ের সম্পদ কিভাবে হালাল মনে করবে?
5621 - عن أنس بن مالك أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمار حتى تُزهِيَ. فقيل له: يا رسول اللَّه، وما تزهي؟ فقال:"حين تحمر". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أرأيت إذا منع اللَّه الثمرة فبم يأخذ أحدكم مال أخيه".
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (11) عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2198)، ومسلم في المساقاة (1555) كلاهما من طريق مالك به.
وأكد مسلم بروايته عن محمد بن عباد، عن عبد العزيز بن محمد، عن حميد، عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن لم يثمرها اللَّه فبم يستحل أحدكم مال أخيه" بأن قوله:"أرأيت إذا منع اللَّه. . ." مرفوع.
ولكن قال أبو حاتم، وأبو زرعة بعد أن سألهما عبد الرحمن عن حديث رواه محمد بن عباد، عن عبد العزيز الدراوردي، عن حميد، عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن لم يثمرها اللَّه فبم يستحل أحدكم مال أخيه" فقالا: هذا خطأ، إنما هو كلام أنس.
قال أبو زرعة:"كذا يرويه الدراوردي، ومالك بن أنس مرفوعا. والناس يروونه موقوفة من كلام أنس". انتهى."العلل" (1/ 378 - 379).
وكذلك قال الدارقطني في"التتبع" (ص 475 - 478):"وقد خالف مالكا جماعة منهم إسماعيل بن جعفر، وابن المبارك، وهشيم، ومروان، ويزيد بن هارون، وغيرهم، قالوا فيه: قال أنس:"أرأيت إن منع اللَّه الثمرة". وأخرج أيضًا حديث إسماعيل بن جعفر، عَن حميد. وقد فصل
كلام أنس من كلام النبي صلى الله عليه وسلم.
وأما عن رواية ابن عباد فقال: إنه أسقط كلام النبي صلى الله عليه وسلم، وأتى بكلام أنس ورفعه عَن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا خطأ قبيح". انتهى.
وذكر البيهقي (5/ 300) سفيان الثوري ممن وقفه على أنس، وقال:"ومالك بن أنس جعله من قول النبي صلى الله عليه وسلم، وتابعه على ذلك الدراوردي من رواية محمد بن عباد عنه". انتهى.
ورد على هؤلاء جميعًا الحافظ ابن عبد البر في التمهيد (2/ 190 - 191)، فقال:"يزعم قوم أنه من قول أنس بن مالك، وهذا باطل بما رواه مالك وغيره من الحفاظ في هذا الحديث إذ جعلوه مرفوعًا من قول النبي صلى الله عليه وسلم. وقد روى أبو الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله". انتهى.
وأما الحافظ ابن حجر فقال في التلخيص (3/ 28):"وقد بينت في المدرج أن هذه الجملة موقوفة من قول أنس، وأن رفعها وهم، وبيانها عند مسلم".
ولكن قال في"الفتح" (4/ 398 - 399) بعد أن نقل تعقب أبي حاتم، وأبي زرعة، والدارقطني:"وليس في جميع ما تقدم ما يمنع أن يكون التفسير مرفوعًا؛ لأن مع الذي رفعه زيادة على ما عند الذي وقفه، وليس في رواية الذي وقفه ما ينفي قول من رفعه. وقد روى مسلم من طريق أبي الزبير عن جابر ما يقوي رواية الرفع في حديث أنس، ولفظه: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو بعت من أخيك ثمرا، فأصابته جائحة، فلا يحل لك أن تأخذ منه شيئًا، بم تأخذ مال أخيك بغير حق؟". انتهى.
وأما حديث جابر بن عبد اللَّه فهو الآتي.
وللحديث طريق آخر: رواه أبو داود (3371)، والترمذي (1228)، وابن ماجه (2217)، وصحّحه ابن حبّان (4993)، والحاكم (2/ 19) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن حميد الطويل، ولفظه:"نهى عن بيع العنب حتى يسود، وبيع الحب حتى يشتد".
وزاد البعض:"وبيع الثمر حتى يزهو".
قال الترمذي:"حسن غريب".
وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
ولكن أعله البيهقي (5/ 303) بما ليس بعلة، فقال: هذا الحديث تفرد به حماد بن سلمة عن حميد من بين أصحاب حميد. . .".
قلت: حماد بن سلمة ثقة، فلا يضر تفرده، وقد قال الإمام أحمد: حماد بن سلمة أعلم الناس بحديث حميد، وأصح حديثًا. وقال أيضًا: هو أثبت الناس في حميد الطويل، سمع منه قديمًا، يخالف الناس في حديثه.
فمثل هذا لو تفرد فلا يضر تفرده، ويشهد له حديث ابن عمر على هذه الزيادة. انظر للمزيد
"المنة الكبرى" (4/ 87 - 88).
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পাকার আগে তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তাতে উজ্জ্বলতা আসে। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'উজ্জ্বলতা আসা' মানে কী? তিনি বললেন: যখন তা লাল বর্ণ ধারণ করে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা বলো তো, যদি আল্লাহ ফল না দেন (অর্থাৎ কোনো বিপর্যয় ঘটে), তবে তোমাদের কেউ কিভাবে তার ভাইয়ের সম্পদ গ্রহণ করবে?
5622 - عن جابر بن عبد اللَّه يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو بعت من أخيه تمرا، فأصابته جائحة، فلا يحل لك أن تأخذ منه شيئًا، بم تأخذ مال أخيك بغير حق؟".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1554) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، عن ابن جريج، أن أبا الزبير أخبره عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
ورواه أيضًا من وجه آخر عن ابن جريج، عن أبي الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكر الحديث.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি তুমি তোমার ভাইয়ের কাছে খেজুর বিক্রি করো, অতঃপর তাতে কোনো বিপদ (বা আপদ) আঘাত হানে, তবে তোমার জন্য তার থেকে কিছুই গ্রহণ করা হালাল হবে না। কী কারণে তুমি তোমার ভাইয়ের সম্পদ অন্যায়ভাবে গ্রহণ করবে?”
5623 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم أن تباع الثمرة حتى تُشقح. قال: فقلت لسعيد: وما تُشقح؟ قال: تحمار، وتصفار، ويؤكل منها.
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2196)، ومسلم في البيوع (4536: 84) من طريق سليم ابن حيان، حدّثنا سعيد بن ميناء قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه قال فذكره.
জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন যতক্ষণ না তা 'তুশাক্কাহ' হয়। তিনি বলেন, আমি (বর্ণনাকারী) সাঈদকে জিজ্ঞেস করলাম: 'তুশাক্কাহ' মানে কী? তিনি বললেন: (এর অর্থ হলো) তা লাল হয়, হলুদ হয় এবং তা থেকে খাওয়া যায়।
5624 - عن جابر قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمر حتى يطيب، ولا يباع شيء منه إِلَّا بالدينار والدرهم إِلَّا العرايا.
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2189) من طريق ابن جريج، عن عطاء، وأبي الزبير، عن جابر فذكره.
ورواه مسلم في البيوع (1536: 53) عن رجلين آخرين، عن أبي الزبير به الشطر الأول منه فقط، ولم يقل:"ولا يباع شيء منه. . . .".
ورواه من طريق عمرو بن دينار، عن جابر بلفظ:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمر حتى يبدو صلاحه".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পেকে সুস্বাদু না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। আর আরায়া (Araya) ব্যতীত তার কোনো কিছুই দিনার ও দিরহাম ছাড়া বিক্রি করা যাবে না।
5625 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تبتاعوا الثمار حتى يبدو صلاحها".
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1538) عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدّثنا محمد بن فضيل، عن أبيه، عن ابن أبي نُعم، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه من وجه آخر عن ابن شهاب، حدّثني سعيد بن المسيب، وأبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، وزاد فيه:"ولا تبتاعوا الثمر بالتمر".
وأما ما روي عنه بلفظ:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الغنائم حتى تقسم، وعن بيع النخل حتى تحرز من كل عارض، وأن يصلي الرجل بغير حزام". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3369) من حديث شعبة، عن يزيد بن خمير، عن مولى لقريش، عن أبي هريرة فذكره. ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البيهقي (2/ 240) مختصرًا. وفيه رجل لم يسم.
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা ফল ক্রয় করবে না, যতক্ষণ না সেগুলোর পরিপক্বতা প্রকাশ পায়।”
5626 - عن أبي البختري قال: سألت ابن عباس عن بيع النخل، فقال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع النخل حتى يأكل منه أو يؤكل، وحتى يوزن. قال: فقلت: ما يوزن؟ فقال رجل عنده: حتى يُحزَر.
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2246)، ومسلم في البيوع (1537) كلاهما من طريق شعبة، أخبرنا عمرو بن مرة قال: سمعت أبا البختري الطائي فذكره. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري نحوه إِلَّا أنه قال: سألت ابن عباس عن السلم في النخل. ووقع عنده:"حتى يُحرز" بدل"يحزر".
قال الحافظ في الفتح (4/ 432):"وقوله:"حتى يحرز" بتقديم الراء على الزاي، أي يحفظ، ويصان. وفي رواية الكشميهني: بتقديم الزاي على الراء، أي يوزن أو يخرص. قال: وصوب عياض الأول، ولكن الثاني أليق بذكر الوزن".
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আল-বাখতারি বলেন: আমি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুর (ফল) বিক্রয় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুর বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন যতক্ষণ না তা খাওয়া হয় বা খাওয়ার উপযুক্ত হয়, এবং যতক্ষণ না তা ওজন করা হয়। আবু আল-বাখতারি বলেন, আমি বললাম: ‘ওজন করা হয়’ (ইউযান) বলতে কী বোঝানো হয়েছে? তখন তাঁর কাছে বসা এক ব্যক্তি বললেন: যতক্ষণ না তা অনুমান করা হয় (ইউহযার)।
5627 - عن ابن عباس كان يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يباع الثمر حتى يُطعم".
صحيح: رواه أحمد (2247)، والطبراني في الكبير (1187، 1188)، وصحّحه ابن حبان (4988) كلهم من طريق عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
وأما الحاكم (2/ 37) فرواه من طريق سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس. وصحّحه.
وفيه سماك بن حرب، وهو مضطرب في حديث عكرمة، فكان من الأولى أن يخرج الطريق الأول.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ফল খাওয়ার উপযোগী না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করা যাবে না।
