আল-জামি` আল-কামিল
6421 - عن الزبير بن عبد الرحمن بن الزبير، عن أبيه، أن رفاعة بن سموأل طلق امرأته تميمة بنت وهب على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فنكحها عبد الرحمن بن الزبير، فاعترض عنها، فلم يستطع أن يُصيبها، فطلقها ولم يمسها. فأراد رفاعة أن ينكحها، وهو زوجها الذي كان طلقها قبل عبد الرحمن، فذكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فنهاه عن تزويجها فقال:"لا تحل لك حتى تذوق العسيلة".
حسن: رواه ابن الجارود في المنقي (682) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أن ابن وهب أخبرهم قال: أخبرني مالك بن أنس، عن المسور بن رفاعة القرظي، عن الزبير بن عبد الرحمن بن الزبير، عن أبيه فذكره. وهذا إسناده حسن.
ورواه مالك في النكاح (18) ولم يذكر فيه"عن أبيه" وذلك من رواية يحيى عنه. فصار مرسلًا. والذين وصلوه بذكر"أبيه" ابن وهب كما رأيت وكذلك إبراهيم بن طهمان، وأبو علي الحنفي - ثلاثتهم عن مالك، فقالوا فيه: الزبير بن عبد الرحمن بن الزبير، عن أبيه.
وإسناده حسن من أجل الزبير بن عبد الرحمن بن الزبير فإنه حسن الحديث. وهو من شيوخ مالك من أهل المدينة.
والزبير بن عبد الرحمن بن الزَبير - بفتح الزاي على الصحيح - وهو من بني قريظة من أهل المدينة وهم زَبيريون وقد قيل: بضم الزُّبير الأول، وفتح الزبير الآخر وهو الجد والأول أصح.
ورفاعة بن سموأل. وقيل: رفاعة بن رفاعة القرظي من بني قريظة، وهو خال صفية بنت حيي بن أخطب أم المؤمنين، فإن أمه برة بنت سموأل.
وبعد جمع هذه الروايات يخلص منها ما يأتي:
1 - إن المرأة لم تُمَكِّنه من الجماع أو عُرض له عارض من المرض وغيره.
2 - إن الرجل لم يكن بعنين، إذ لو ثبت عنّتُه عند النبي صلى الله عليه وسلم لما أمرها بتذويق العسيلة كل منهما للآخر.
3 - وقول المرأة كما في الصحيحين - البخاري (5265) ومسلم (114: 1433) ولم يقربني إلا هنة واحدة" كما في لفظ البخاري، ولم يذكره مسلم. وفي رواية عند أحمد (25920)"إلا هبة
واحدة" والهبة هي هبات الفحل، وسفاده ومعناه أنه أتاها وقعة واحدة كما فسّره الخطابي في غريب الحديث (1/ 546).
وظاهر المرفوع يعارض هذا، لأن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"حتى تذوقي عسيلته، وتذوق عسيلتك" فإن الرجل لو تمكّنَ من الوطء ولو مرة واحدة لما أمرها النبي صلى الله عليه وسلم بهذا الأمر. بل أجاز طلاقها.
فالمعنى الصحيح والله تعالى أعلم أن هذه الهبة الواحدة لم يحصل منها العسيلة المعروفة التي تكفي الطلاق، والرجوع إلى الزوج الأول، فكأن الرجل حاول الجماع، ولكن حصل له فتور مؤقت، فأمرها النبي صلى الله عليه وسلم بالصبر حتى يذوق عسيلتها، وتذوق عسيلته.
ونُفيَ عنه العنّةُ. لوجود بيّنة بقوله:"هذا الذي تزعمين ما تزعمين، فوالله لهم أشبه به من الغراب بالغراب".
4 - والعسيِلة: تصغير العسل والمراد منه حلاوة الجماع، فلعل الرجل كان أُنزل قبل تمام الإيلاج، فلم يذقْ عسيلة صاحبته، كما لم تذق عسيلة صاحبها.
5 - والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، بأن وطء الزوج الثاني لا يكون محللًا لارتجاع الزوج الأول للمرأة إلا إذا كان حال وطئه منتشرًا، فلو لم يكن كذلك، أو كان عنِّينا، أو طفلا لم يكن في أصح قولي أهل العلم.
6 - وقوله:"حتى تذوقي عسيلته …" كناية عن الجماع، وهو تغييب حشفة الرجل في فرج المرأة. سواء أنزل أو لم ينزل. فإن التذوق يحصل بمجرد الإدخال، وإن كان كماله لا يكون إلا بالإنزال.
7 - وقوله: هدبة الثوب: هو طرف الثوب وهو كناية عن أن ذكر الرجل يشبه الهدبة في الاسترخاء، وعدم الانتشار.
আব্দুর রহমান ইবনে যুবাইর থেকে বর্ণিত, রিফাআ ইবনে সামওয়াল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে তাঁর স্ত্রী তামীমাহ বিনতে ওয়াহবকে তালাক দেন। অতঃপর আব্দুর রহমান ইবনে যুবাইর তাকে বিবাহ করেন। কিন্তু তিনি তার প্রতি বিরূপ হন এবং তাকে ভোগ করতে সক্ষম হননি। তাই তিনি তাকে স্পর্শ না করেই (সহবাস না করে) তালাক দেন। এরপর রিফাআ তাকে পুনরায় বিবাহ করতে চাইলেন, আর তিনি ছিলেন সেই স্বামী যিনি আব্দুর রহমানের আগে তাকে তালাক দিয়েছিলেন। এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট উল্লেখ করা হলো। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বিবাহ করতে নিষেধ করলেন এবং বললেন: "সে তোমার জন্য হালাল হবে না, যতক্ষণ না তুমি 'আসিলাহ' (সহবাসের মধুরতা) আস্বাদন করো।"
6422 - عن عبيد الله بن عباس قال: جاءت الغُميصاء - أو الرميصاء - إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم تشكو زوجها، وتزعم أنه لا يصل إليها. فما كان إلا يسيرًا حتى جاء زوجها. فزعم أنها كاذبة. ولكنها تريد أن ترجع إلى زوجها الأول. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس لك ذلك، حتى يذوق عسيلتك رجل غيره".
صحيح: روبه النسائي (3411) وأحمد (1837) كلاهما من حديث هُشيم، قال: أنبأنا يحيى بن أبي إسحاق، عن سليمان بن يسار، عن عبيد الله بن العباس فذكره. واللفظ لأحمد.
وفي لفظ النسائي:"لا، حتى يذوق عسيلتها كما ذاق الأول" وإسناده صحيح. وعبيد الله بن عباس هو أخو عبد الله بن عباس، أصغر منه بسنة. قال ابن حجر في الإصابة في ترجمته:"ورجاله ثقات إلا أنه ليس بصريح بأن عبيد الله بن عباس شهد القصة". يعني أنه من مراسيل الصحابي. وقد ثبت أنه كان رديف النبي صلى الله عليه وسلم، وأنه سمع منه مثل أخيه عبد الله. وكان عند وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم -
ابن أكثر من عشر سنوات.
والغميصاء أو الرميصاء هي زوج عمرو بن حزم، فطلّقها فنكحها رجل آخر، فطلقها قبل أن يمسّها، فأتت النبي صلى الله عليه وسلم تسأله أن ترجع إلى زوجها الأول فقال: فذكر الحديث.
উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গুমাইসা—অথবা রুমাইসা—নামক একজন মহিলা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে তার স্বামীর বিরুদ্ধে অভিযোগ করল এবং দাবি করল যে, সে (স্বামী) তার কাছে পৌঁছাতে পারে না (সহবাস করতে অক্ষম)। অল্প কিছুক্ষণের মধ্যেই তার স্বামী আসল এবং দাবি করল যে, সে (স্ত্রী) মিথ্যা বলছে। বরং সে তার প্রথম স্বামীর কাছে ফিরে যেতে চায়। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমার জন্য তা বৈধ হবে না, যতক্ষণ না অন্য কোনো পুরুষ তোমার মিষ্টি (মধু) আস্বাদন করে।"
6423 - عن ابن عمر سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن رجل طلّق امرأته البتة، - يعني ثلاثا، فتزوجتْ رجلًا، فطلقها قبل أن يدخل بها، أترجع إلى الأول؟ فقال:"لا حتى يذوق من عُسيلتها ما ذاق صاحبه".
صحيح: رواه أبو يعلى (4066) عن عبد الله بن عمر، حدثنا يحيى بن زكريا، عن يحيى بن سعيد، عن نافع، عن ابن عمر مثله.
أي مثل حديث عائشة لأنه ذكر حديث عائشة قبله.
وإسناده صحيح. وعبد الله بن عمر، وهو ابن أبان المعروف بِمُشكدانة، المحدث من شيوخ عبد الله بن أحمد. أثنى عليه أبو بكر بن أبي شيبة ووثّقه أحمد، توفي عام 239 هـ انظر"العقيلي" (845) وأورده الهيثمي في المجمع (4/ 340) وقال:"رواه الطبراني، وأبو يعلى إلا أنه قال: بمثل حديث عائشة، وهو نحو هذا. ورجال أبي يعلى رجال الصحيح".
ولحديث عبد الله بن عمر أسانيد أخرى منها:
رواه النسائي (3414) وابن ماجه (1933) وأحمد (5571) والبيهقي (7/ 375) كلهم من حديث محمد بن جعفر، قال: حدثنا شعبة، عن علقمة بن مرثد، قال: سمعت سالم بن رزين، يحدث عن سالم بن عبد الله، عن سعيد بن المسيب، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل سالم بن رزين، قال البخاري:"لا تقوم الحجة بسالم بن رزين ولا برزين، لأنه لا يدري سماعه من سالم، ولا من عبد الله بن عمر". التاريخ الكبير (4/ 13).
وهو يشير إلى ما رواه النسائي (3415) وغيره عن وكيع، حدثنا سفيان، عن علقمة بن مرثد، عن رزين بن سليمان الأحمري، عن ابن عمر فذكره.
قال النسائي:"هذا أولى بالصواب". ورزين بن سليمان هو سالم بن رزين وقد وقع الخلاف في اسمه فقيل كذا، وقيل: سليمان بن رزين.
وقد رُوي من أوجه أخرى عن ابن عمر مرفوعًا إلا أن البخاري رجّح الموقوف على ابن عمر. انظر التاريخ الكبير (4/ 13).
قال البيهقي (7/ 375):"بلغني عن محمد بن إسماعيل البخاري أنه وهَّنَ حديث شعبة وسفيان جميعا".
وفي الباب ما رُوي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن رجل كانت تحته امرأة، فطلقها ثلاثا، فتزوجت بعده رجلًا، فطلّقها قبل أن يدخل بها، أتحل لزوجها الأول؟ قال: فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، حتى يكون الأخر قد ذاق من عسيلتها وذاقت من عسيلته".
رواه أحمد (14024) والبزار - كشف الأستار - (1505) وأبو يعلى (4199) والبيهقي (7/ 375 - 376) كلهم من طرق عن محمد بن دينار العبدي، حدثني يحيى بن يزيد، عن أنس بن مالك فذكره.
ومحمد بن دينار العبدي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف. وهنا خالف شعبة الذي رواه عن يحيى بن يزيد موقوفا عن أنس بن مالك، رواه ابن أبي شيبة في مصنفه (4/ 275) عن غندر، عن شعبة به وهذا أصح.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এমন একজন পুরুষ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে তার স্ত্রীকে ‘আল-বাত্তাহ’ (অর্থাৎ তিন তালাক) দিয়েছে। অতঃপর সেই স্ত্রী অন্য একজন পুরুষকে বিবাহ করলো এবং (সেই দ্বিতীয় স্বামী) তার সাথে সহবাস করার আগেই তাকে তালাক দিলো। এখন কি সে প্রথম স্বামীর কাছে ফিরে যেতে পারবে? তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “না, যতক্ষণ না সে (দ্বিতীয় স্বামী) তার (স্ত্রীর) মধুটি আস্বাদন করে, যেমন তার প্রথম স্বামী আস্বাদন করেছিল।”
6424 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ردَّ ابنته على أبي العاص بن الربيع بعد سنتين بنكاحها الأول.
وفي رواية: بعد ست سنين.
حسن: رواه أبو داود (2240) والترمذي (1143، 1144) وابن ماجه (2009) وأحمد (1876) والحاكم (3/ 237) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلس، وقد جاء التصريح منه في بعض المصادر، ولكن عله داود بن الحصين وهو إن كان ثقة ولكن ضعّفه بعض الأئمة في روايته عن عكرمة. منهم: علي بن المديني، وأبو داود وغيرهما.
ولذا قال ابن حجر في"التقريب":"ثقة إلا في عكرمة".
ولكن مشّاه الآخرون، والحديث يوافق الواقع الصحيح فإن النبي صلى الله عليه وسلم لم يحدث لها نكاحًا جديدًا. ولذا قال الحافظ ابن القيم:"أما تضعيف حديث داود بن الحصين عن عكرمة فمما لا يلتفت إليه" ذكره في"تهذيب السنن".
وأما قول الترمذي: هذا حديث ليس بإسناده بأس، ولكن لا نعرف وجه هذا الحديث، ولعله قد جاء هذا من قبل داود بن حصين من قبل حفظه".
قلت: ليس في الحديث ما ينكر عليه، فإن الواقع الصحيح كما قلت يؤيده، ولم يُخطِئْ فيه داود بن حصين كما فهم الترمذي، وقد سبقه الإمام أحمد فصحح هذا الحديث كما ذكره ابنه عبد الله عقب حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ردَّ ابنته إلى أبي العاص بمهر جديد، ونكاح جديد.
رواه الإمام أحمد (6938) والترمذي (1142) والدارقطني (3/ 253) والبيهقي (7/ 188) كلهم
من حديث حجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب بإسناده.
قال:"هذا حديث ضعيف، أو قال: واه، ولم يسمعه الحجاج من عمرو بن شعيب، إنما سمعه من محمد بن عبيد الله العرزمي، والعرزمي حديثه لا يساوي حديثه شيئا، والحديث الصحيح الذي روى أن النبي صلى الله عليه وسلم أقرهما على النكاح الأول". انتهى.
وقد قيل له: أليس يُروى أنه ردها بنكاح مستأنف؟ فقال: ليس لذلك أصل.
وقال البيهقي:"وبلغني عن أبي عيسى الترمذي أنه قال: سألت عنه البخاري رحمه الله فقال: حديث ابن عباس أصح في هذا الباب من حديث عمرو بن شعيب. وحكى أبو عبيد عن يحيى بن سعيد القطان أن حجاجا لم يسمعه من عمرو، وأنه من حديث محمد بن عبد الله العرزمي عن عمرو.
فهذا وجه لا يعبأ به أحد يدري ما الحديث. انتهى.
وقال الدارقطني:"هذا الحديث لا يثبت. والحجاج لا يحتج به والصواب حديث ابن عباس".
وقال الترمذي عقب حديث عمرو بن شعيب:"هذا حديث في إسناده مقال"، ونقل عن يزيد بن هارون:"حديث ابن عباس أجود إسنادًا وقال: والعمل على حديث عمرو بن شعيب".
وكذلك صحّح حديث ابن عباس الحكم.
وقد قوّاه مراسيل قتادة والشعبي.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কন্যাকে আবূল আস ইবনুর রাবী'র কাছে দুই বছর পর প্রথম বিবাহের ভিত্তিতেই ফিরিয়ে দিয়েছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায়: ছয় বছর পর।
6425 - عن عبد الله بن عباس، أن امرأة جاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأسلمت، فتزوجها رجل، قال: فجاء زوجها الأول فقال: يا رسول الله! إني كنت أسلمت معها، وعلمتْ بإسلامي، قال: فانتزعها رسول الله صلى الله عليه وسلم من زوجها الآخر، وردّها إلى زوجها الأول.
حسن: رواه أبو داود (2238، 2239) والترمذي (1144) وابن ماجه (2008) وابن حبان (4159) وابن الجارود (757) والحاكم (2/ 200) كلهم من حديث سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وهو النوع الذي أقول: إن البخاري احتج بعكرمة، ومسلم بسماك".
قلت: وهو ليس كما قال. فإن أحدا من الشيخين لم يحتج بسماك، عن عكرمة، فإن سماكاوهو ابن حرب بن أوس، وإن كان صدوقا في نفسه، ولكنه اضطرب في حديث عكرمة كما قال الإمام أحمد وغيره.
ولعله لم يضطرب في هذا الحديث كما سبق من حديث ابن عباس إن النبي صلى الله عليه وسلم رد ابنته على زوجها بالنكاح الأول، فلا منافاة بين الحديثين.
فقه الباب:
قال الترمذي عقب حديث عمرو بن شعيب:"والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم أن المرأة إذا أسلمت قبل زوجها، ثم أسلم زوجها، وهي في العدة أن زوجها أحق بها ما كانت في العدة.
وهو قول مالك بن أنس والأوزاعي والشافعي وأحمد إسحاق".
قلت: والمحققون من علماء الحديث ذهبوا إلى أن المرأة إن أسلمت، ولم يسلم زوجُها فهي إن أرادت بعد انقضاء العدة أن تتزوج فلها ذلك. وإن انتظرت وأقامت على النكاح الأول فمتى ما أسلم زوجها فهي زوجته.
إن أبا سفيان بن حرب أسلم بمر الظهران، وامرأته هند بنت عتبة كافرة بمكة ثم قدم عليها يدعوها إلى الإسلام. فأخذت بلحيته وقالت: اقتلوا الشيخ الضال، وأقامت أياما قبل أن تسلم، ثم أسلمت، وبايعت النبي صلى الله عليه وسلم، فثبتنا على النكاح الأول.
وكذلك أسلمت امرأة عكرمة بن أبي جهل وامرأة صفوان بن أمية، وهرب زوجاهما ناحية اليمن ثم جاءا فأسلما بعد مدة، فاستقرا على النكاح الأول.
وقال الخطابي بعد أن نقل تصحيح حديث ابن عباس، وتضعيف حديث عمرو بن شعيب:"وفي الحديث دليل على أن افتراق الدارين لا تأثير له في إيقاء الفرقة. وذلك أن أبا العاص كان بمكة بعد أن أطلق عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وفكهـ من أسره، وقد كان أخذ عليه أن يجهز زينب إليه، ففعل ذلك، وقدمت زينب على رسول الله صلى الله عليه وسلم وأقامت بها.
وقال: وقد روي أن جماعة من النساء ردهن النبي صلى الله عليه وسلم على أزواجهن بالنكاح الأول. ثم ذكر من ذكرتهم قبل هذا.
وقال الحافظ ابن القيم في زاده (5/ 137):"ولا نعلم أحدا جدد للإسلام نكاحه البتة، بل كان الواقع أحد أمرين: إما افترافهما، ونكاحهما غيره، وإما بقاؤهما عليه، وإن تأخر إسلامها عن إسلامه" انظر للمزيد"المنة الكبرى" (6/
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট আসলেন এবং ইসলাম গ্রহণ করলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি তাকে বিবাহ করল। (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন তার প্রথম স্বামী এসে বলল, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি তার সাথেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলাম এবং সে আমার ইসলাম গ্রহণের বিষয়টি জানত। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঐ মহিলাকে তার দ্বিতীয় স্বামীর নিকট থেকে নিয়ে নিলেন এবং তার প্রথম স্বামীর নিকট ফিরিয়ে দিলেন।
6426 - عن رافع بن سنان أنه أسلم، وأبت امرأته أن تسلم، فأتت النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: ابنتي وهي فطيم، أو شبهه، وقال رافع: ابنتي. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اقعد ناحية" وقال لها:"اقعدي ناحية" وأقعد الصبية بينهما، ثم قال:"ادعواها" فمالت الصبية إلى أمها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اللهم اهدها" فمالت إلى أبيها فأخذها.
صحيح: رواه أبو داود (2244) وأحمد (2375) والحاكم (2/ 206) وعنه البيهقي (8/ 3) كلهم من طرق عن عيسى بن يونس، أخبرنا عبد الحميد بن جعفر، أخبرني عن جدي رافع بن سنان فذكره.
وقوله:"عن جدي": هو جد جده إذ هو عبد الحميد بن جعفر بن عبد الله بن الحكم بن رافع بن سنان.
وقد جاء التصريح بذلك في رواية الدارقطني (4/ 43) بقوله: عن عبد الحميد بن جعفر الأنصاري، حدثني أبي، عن جد أبيه رافع بن سنان، وفي رواية أن جده رافع بن سنان أسلم وأبت امرأته. وصحّحه الحاكم.
وأما ما رواه عثمان البتي، عن عبد الحميد بن سلمة، عن أبيه، عن جده أن أبويه اختصما فيه إلى النبي صلى الله عليه وسلم وأحدهما مسلم، والآخر كافر فذكر الحديث ففيه وهم من عثمان البتي كما قال الدارقطني وغيره.
ومن هذا الطريق رواه النسائي (3495) وأحمد (23755) وغيرهم.
وللحديث أسانيد أخرى معلولة إلا أنها لا تُعل ما صحّ.
والعمل منسوخ بهذا الحديث فإن أحد الزوجين إذا أسلم ولم يسلم الآخر، فالولد دائما لمن أسلم حتى لا يفتتن الطفل بالكفر. وإلى هذا ذهب الشافعي.
وذهب أهل الرأي إلى أن الأم أحق بالطفل ما لم تتزوج، سواء كانت ذمية أو مسلمة.
রাফে’ ইবনে সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন, কিন্তু তাঁর স্ত্রী ইসলাম গ্রহণ করতে অস্বীকৃতি জানালেন। অতঃপর তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: "এ আমার মেয়ে এবং সে স্তন্যপান ছেড়ে দিয়েছে বা তার কাছাকাছি অবস্থায় আছে।" রাফে’ও বললেন: "এ আমারই মেয়ে।" তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (রাফে’কে) বললেন: "তুমি এক পাশে বসো।" আর তাকে (স্ত্রীকে) বললেন: "তুমি আরেক পাশে বসো।" অতঃপর তিনি শিশুটিকে তাদের দুজনের মাঝে বসিয়ে দিলেন। এরপর বললেন: "তোমরা দুজনই তাকে ডাকো।" তখন শিশুটি তার মায়ের দিকে ঝুঁকে গেল। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! তাকে হেদায়াত দান করুন।" ফলে সে তার বাবার দিকে ঝুঁকে গেল এবং তার বাবা তাকে নিয়ে নিলেন।
6427 - عن أبي ميمونة سُلمي - مولى من أهل المدينة، رجل صدق - قال: بينما أنا جالس مع أبي هريرة، جاءت امرأة فارسية معها ابن لها فادعياه. وقد طلقها زوجها فقالت: يا أبا هريرة - ورطنتْ بالفارسية - زوجي يريد أن يذهب بابني؟ فقال أبو هريرة: استهما عليه. ورطن لها بذلك. فجاء زوجها فقال: من يُحَاقُّني في ولدي؟ فقال أبو هريرة: اللهم إني لا أقول هذا إلا أني سمعت امرأة جاءت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا قاعد عنده. فقالت: يا رسول الله! إن زوجي يريد أن يذهب بابني، وقد سقاني من بئر أبي عِنبة، وقد نفعني. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استهما عليه" فقال زوجها: من يُحَاقُّني في ولدي؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هذا أبوك، وهذه أمك، فخذ بيد أيهما شئت" فأخذ بيد أمه فانطلقت به.
صحيح: رواه أبو داود (2277) والنسائي (3496) وصحّحه الحاكم (4/ 97) والبيهقي (38) كلهم من حديث ابن جريج، قال: أخبرني زياد، عن هلال بن أسامة، أن أبا ميمونة سُلمي قال: فذكره. قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ورواه الترمذي (1357) وابن ماجه (2351) وأحمد (7352) والبيهقي كلهم من وجه آخر عن سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد، عن هلال بن أبي ميمونة، عن أبي ميمونة فذكره مختصرًا.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: هلال بن أبي ميمونة ليس هو ابن أبي ميمونة الذي في الإسناد، فإن هلال بن أبي ميمونة هو هلال بن علي بن أسامة العامر القرشي المدني، ينسب إلى جده، كما ذكر في الرواية السابقة.
وأبو ميمونة هو الفارسي المدني الآبار، قيل: اسمه سُليم، أو سلمان، أو سلمى، أو أسامة يروي عن أبي هريرة وغيره، وليس هو والد هلال بن أبي ميمونة كما وقع في رواية عند البيهقي في حديث سفيان بن عيينة فالظاهر أنه خطأ، أو شاذ.
وهذا الحديث يُحمل على الغلام الذي عقل، واستغنى عن الحضانة، فإذا كان كذلك خُيّر بين أبويه.
أخذ به الشافعي وأحمد. قال الشافعي:"إذا صار ابن سبع أو ثمان خُيّر، وقال أحمد: إذا كبر يُخير.
ومن لم يأخذ به جعل الأب أحق به؛ لأن الولد أحوج إلى الأب من الأم للتعليم والمعاش وغيرها.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ মাইমুনা সুলামী—যিনি মদীনার অধিবাসী একজন সত্যবাদী মুক্ত গোলাম—বলেন: আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসেছিলাম। এমন সময় একজন পারস্য নারী তার পুত্রকে নিয়ে আসলেন এবং তারা উভয়েই শিশুটির দাবি করলো। তার স্বামী তাকে তালাক দিয়েছিলেন। নারীটি বললেন: হে আবূ হুরায়রা! (তিনি ফারসি ভাষায় কথা বলছিলেন) আমার স্বামী কি আমার পুত্রকে নিয়ে যেতে চায়? আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা উভয়ে তার জন্য লটারি করো। তিনি তাকে সেই ইঙ্গিতই করলেন। অতঃপর তার স্বামী এসে বললো: আমার সন্তানের অধিকার নিয়ে কে আমার সাথে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করবে? আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহ! আমি এ কথা বলছি না (যে লটারি করো), তবে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উপস্থিত ছিলাম, যখন একজন নারী তাঁর কাছে এসেছিলো। সেই নারী বললো: হে আল্লাহর রাসূল! নিশ্চয়ই আমার স্বামী আমার পুত্রকে নিয়ে যেতে চায়, অথচ সে আবূ ইনাবার কূপ থেকে পানি পান করেছে এবং সে আমাকে (আমার দেখাশোনা করে) উপকৃত করেছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমরা উভয়ে তার জন্য লটারি করো।” তখন তার স্বামী বললো: আমার সন্তানের অধিকার নিয়ে কে আমার সাথে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করবে? তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “এ হলো তোমার পিতা আর এ হলো তোমার মাতা। তুমি তাদের উভয়ের মধ্যে যার হাত ধরতে চাও, ধরো।” অতঃপর সে তার মাতার হাত ধরলো এবং সে তাকে নিয়ে চলে গেলো।
6428 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو أن امرأة قالت: يا رسول الله! إن ابني هذا كان بطني له وعاءً، وثديي له سقاءً، وحجري له حواءً. وإن أباه طلّقني، وأراد أن ينتزعه مني! فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنت أحق به ما لم تنكحي".
حسن: رواه أبو داود (2276) وأحمد (6707) والدارقطني (3/ 305) والحاكم (2/ 207)
وعنه البيقهي (8/ 4 - 5) كلهم من طرق عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
لا خلاف بين أهل العلم أن الأم لها حضانة الطفل ما لم تتزوج، فإذا تزوجت فلا حق لها في حضانته، فإن كانت لها أم فأمها تقوم مقامها، ثم الجدات من قبل الأم أحق به ما بقيت منهن واحدة.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন নারী বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! নিশ্চয় আমার এই সন্তানের জন্য আমার পেট ছিল পাত্রস্বরূপ, আমার স্তন ছিল তার জন্য পানীয় স্বরূপ, আর আমার কোল ছিল তার জন্য আশ্রয়স্থল। আর তার পিতা আমাকে তালাক দিয়েছে, এখন সে তাকে আমার কাছ থেকে ছিনিয়ে নিতে চায়! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি তার অধিক হকদার, যতক্ষণ না তুমি বিবাহ করো।"
6429 - عن البراء قال: اعتمر النبي صلى الله عليه وسلم في ذي القعدة … الحديث وفيه قصة ابنة حمزة وأنها تبعتهم حين الخروج من مكة، فتناولها عليّ فأخذ بيدها وقال لفاطمة: دونك ابنة عمك احمليها، فاختصم فيها علي، وزيد، وجعفر، فقال علي: أنا أحق بها، وهي ابنة عمي، وقال جعفر: ابنة عمي وخالتها تحتي، وقال زيد: ابنة أخي، فقضى بها النبي صلى الله عليه وسلم لخالتها وقال:"الخالة بمنزلة الأم" وقال لعلي:"أنت مني وأنا منك" وقال لجعفر:"أشبهتَ خَلْقي وخُلُقي"، وقال لزيد:"أنت أخونا ومولانا".
صحيح: رواه البخاري في الصلح (2699) عن عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي
إسحاق، عن البراء قال: فذكره.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুল-ক্বাদাহ মাসে উমরাহ আদায় করেন... এবং হাদীসটিতে হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা সম্পর্কিত ঘটনা রয়েছে। তিনি মক্কা থেকে বের হওয়ার সময় তাঁদের অনুসরণ করেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে গ্রহণ করলেন এবং তার হাত ধরলেন। তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: এ তোমার চাচাতো বোন, একে তোমার সাথে নিয়ে নাও। অতঃপর আলী, যায়দ এবং জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার (অভিভাবকত্ব) নিয়ে বিবাদ করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিই তার ব্যাপারে অধিক হকদার, কারণ সে আমার চাচাতো বোন। আর জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার চাচাতো বোন এবং তার খালা আমার অধীনে (আমার স্ত্রী)। আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার ভাইয়ের মেয়ে (ভ্রাতুষ্পুত্রী)। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার খালার পক্ষে রায় দিলেন এবং বললেন: "খালা মায়ের সমতুল্য।" তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার এবং আমি তোমার।" আর জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চরিত্রের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ।" আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা।"
6430 - عن علي قال: لما خرجنا من مكة اتبعتْنا ابنة حمزة تنادي: يا عمّ يا عمّ. قال: فتناولتها بيدها، فدفعتها إلى فاطمة، فقلت: دونك ابنة عمك. قال: فلما قدمنا المدينة اختصمنا فيها أنا وجعفر وزيد بن حارثة. فقال جعفر: ابنة عمي، وخالتها عندي، يعني أسماء بنت عميس، وقال زيد: ابنة أخي، وقلت: أنا أخذتها وهي ابنة عمي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما أنت يا جعفر فأشْبهت خلقي وخلقي، وأما أنت يا على فمني وأنا منك، وأما أنت يا زيد فأخونا ومولانا. والجارية عند خالتها، فإن الخالة والدة" قلت: يا رسول الله! ألا تتزوجها؟ قال:"إنها ابنة أخي من الرضاعة".
حسن: رواه أبو داود (2280) وأحمد (770) واللفظ له، وصحّحه الحاكم (3/ 120) كلهم من طريق أبي إسحاق، عن هانئ بن هانئ وهبيرة بن يريم، عن علي فذكره.
وإسناده حسن من أجل هانئ بن هانئ وهبيرة فإنهما مقبولان لأنه يقوي أحدهما الآخر.
وقد رويت هذه القصة عن علي من وجه آخر أيضا في سنن أبي داود وغيرها، والحديثان محفوظان عن البراء، وعلي بن أبي طالب، وقد رُوي أيضا عن الصحابة الآخرين.
والصحيح منها ما جاء عن البراء وعلي فقط.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা মক্কা থেকে বের হলাম, হামযার মেয়ে আমাদের পিছু নিল এবং ‘হে চাচা! হে চাচা!’ বলে ডাকতে লাগল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে হাত দিয়ে ধরলাম এবং ফাতিমার কাছে অর্পণ করে বললাম: এই নাও তোমার চাচাতো বোনকে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমরা মদীনায় পৌঁছলাম, তখন আমি, জাফর এবং যায়িদ ইবনু হারিসা তার (হামযার মেয়ের) অভিভাবকত্ব নিয়ে বিবাদ করলাম। জাফর বললেন: সে আমার চাচাতো বোন, আর তার খালা (আসমা বিনত উমাইস) আমার কাছে আছে। যায়িদ বললেন: সে আমার ভাইঝি। আর আমি বললাম: আমিই তাকে নিয়েছি এবং সে আমার চাচাতো বোন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে জাফর! তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চারিত্রিক বৈশিষ্ট্যের সাথে সবচেয়ে বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ। আর হে আলী! তুমি আমার এবং আমি তোমার। আর হে যায়িদ! তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা (সহযোগী)। আর এই বালিকা তার খালার কাছে থাকবে। কারণ খালা মায়ের সমতুল্য।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি তাকে বিয়ে করবেন না? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সে আমার দুধ-ভাইয়ের মেয়ে।"
6431 - عن ابن عباس قال في هذه الآية: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا} [النساء: 19] كانوا إذا مات الرجل كان أولياؤه أحقّ بامرأته. إن شاء بعضهم تزوّجها، وإن شاؤوا زوّجوها، وإن شاؤوا لم يُزوّجوها، فهم أحق بها من أهلها. فنزلت هذه الآية بذلك.
صحيح: رواه البخاري في الإكراه (6948)، عن حسين بن منصور، حدثنا أسباط بن محمد، حدثنا الشيباني سليمان بن فيروز، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
قال الشيباني:"وحدثني عطاء أبو الحسن السوائي، ولا أظنه إلا ذكره عن ابن عباس فذكره".
ورواه أبو داود (2089) من حديث أسباط مثله، ورواه أيضا عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: {لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} [النساء: 19] وذلك أن الرجل كان يرث امرأة ذي قرابته، فيعضلها حتى تموت، أو ترد إليه صداقها، فأحكم الله عن ذلك ونهي عن ذلك.
وإسناده حسن من أجل علي بن حسين بن واقد، وأبيه حسين بن واقد فهما"صدوقان". ويزيد
النحوي هو: ابن أبي سعيد المروزي.
وقوله:"فأحكم الله عن ذلك" معناه: منع.
قال جرير بن الخطفي: أبني حنيفة أُحكِموا سُفهاءَهم إني أخاف عليكم أن أَغْضبا.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াত সম্পর্কে বলেন: "হে মুমিনগণ! তোমাদের জন্য নারীদেরকে জবরদস্তিভাবে উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করা বৈধ নয়।" [সূরা নিসা: ১৯] (জাহিলিয়াতের যুগে) যখন কোনো লোক মারা যেত, তখন তার উত্তরাধিকারীরা তার স্ত্রীর উপর সবচেয়ে বেশি হকদার হতো। যদি তাদের কেউ চাইত, তবে তাকে বিবাহ করত; আর যদি চাইত, তবে তাকে (অন্য কারও সাথে) বিবাহ দিত; আর যদি চাইত, তবে তাকে বিবাহ দিত না। অর্থাৎ, তার পরিবারের (অন্যান্য) লোকদের চেয়ে তারা (উত্তরাধিকারীরাই) তার উপর বেশি হকদার ছিল। এই প্রেক্ষিতেই আয়াতটি নাযিল হয়।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: "(আয়াতে বলা হয়েছে) 'তোমাদের জন্য নারীদেরকে জবরদস্তিভাবে উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করা বৈধ নয়, আর তোমরা তাদেরকে আটকে রেখো না, যাতে তাদের যা কিছু তোমরা দিয়েছ, তার কিছু অংশ তোমরা নিয়ে নিতে পারো, যদি না তারা কোনো প্রকাশ্য অশ্লীল কাজ করে।' [সূরা নিসা: ১৯]" এর কারণ হলো, কোনো লোক তার আত্মীয়ের স্ত্রীকে উত্তরাধিকার সূত্রে পেত এবং তাকে আটক করে রাখত (বিবাহ না দিয়ে) যতক্ষণ না সে মারা যায় বা তার মোহরানা তাকে ফিরিয়ে দেয়। অতঃপর আল্লাহ এ বিষয়ে (এমন কাজ) কঠোরভাবে নিষিদ্ধ করলেন এবং তা থেকে নিষেধ করলেন।
6432 - عن معقل بن يسار قال: كانت أخته تحت رجل فطلقها ثم خلّى عنها حتى انقضت عدتها، ثم خطبها، فحمي معقل من ذلك أنفًا. فقال: خلّى عنها، وهو يقدر عليها. ثم يخطبها. فحال بينه وبينها فأنزل الله: {وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ} [البقرة: 232] إلى آخر الآية. فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقرأ عليه. فترك الحمية، واستقاد لأمر الله.
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5331) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا سعيد، عن قتادة، حدثنا الحسن، أن معقل بن يسار قال: فذكره.
মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তার (মা'কিলের) এক বোন এক ব্যক্তির অধীনে ছিল। সে তাকে তালাক দিল এবং তাকে ছেড়ে দিল যতক্ষণ না তার ইদ্দত শেষ হলো। অতঃপর লোকটি তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিল। এতে মা'কিল আত্মমর্যাদাবশত অত্যন্ত রাগান্বিত হলেন। তিনি বললেন: সে তাকে তালাক দিয়ে ছেড়ে দিয়েছে, যখন সে তাকে ফিরিয়ে নিতে পারত। আর এখন আবার তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিচ্ছে! সুতরাং তিনি ঐ ব্যক্তি ও তার বোনের মাঝে প্রতিবন্ধকতা সৃষ্টি করলেন (তাদের বিবাহে বাধা দিলেন)। তখন আল্লাহ তা‘আলা এ আয়াত নাযিল করলেন: "আর যখন তোমরা স্ত্রীদেরকে তালাক দাও, আর তারা তাদের ইদ্দত পূর্ণ করে ফেলে, তখন তাদের (পূর্বের স্বামীদের সাথে) বিবাহে বাধা দিও না..." [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৩২] শেষ পর্যন্ত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মা'কিলকে ডাকলেন এবং তাকে (আয়াতটি) পাঠ করে শোনালেন। ফলে তিনি (মা'কিল) তার আত্মমর্যাদা পরিহার করলেন এবং আল্লাহর নির্দেশের কাছে আত্মসমর্পণ করলেন।
6433 - عن ابن عباس في قوله: {مَا نَنْسَخْ مِنْ آيَةٍ أَوْ نُنْسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَا أَوْ مِثْلِهَا} [البقرة: 106] وقال: {وَإِذَا بَدَّلْنَا آيَةً مَكَانَ آيَةٍ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ} [النحل: 101] الآية وقال: {يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ} [الرعد: 39] فأول ما نسخ من القرآن القبلة، وقال: {وَالْمُطَلَّقَاتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ ثَلَاثَةَ قُرُوءٍ} [البقرة: 228] وقال: {وَاللَّائِي يَئِسْنَ مِنَ الْمَحِيضِ مِنْ نِسَائِكُمْ إِنِ ارْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلَاثَةُ أَشْهُرٍ} [الطلاق: 4] فنسخ من ذلك فقال تعالي: {ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍ تَعْتَدُّونَهَا} [الأحزاب: 49].
حسن: رواه النسائي (3499) واللفظ له، وأبو داود (2282) كلاهما من حديث علي بن الحسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وأعله المنذري بقوله:"في إسناده علي بن الحسين بن واقد وهو ضعيف".
قلت: علي بن الحسين ليس بضعيف، ولكنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.
وروي مثل هذا عن قتادة أيضا كما ذكره ابن الجوزي في نواسخ القرآن (ص 206) ولكنه قال:"إن القول الصحيح المعتمد عليه أن هذه الآية محكمة، لأن أولها عام في المطلقات. وما ورد في الحامل، والآيسة، والصغيرة، فهو مخصوص من جملة العموم، وليس على سبيل النسخ" انتهى قوله.
قلت: تخصيص العموم هو نوع من النسخ عند بعض الفقهاء فلا مشاحة في الاصطلاح وفي الباب ما روي عن أسماء بنت يزيد بن السكن الأنصارية أنها طُلِّقتْ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يكن للمطلقة عدة، فأنزل الله عز وجل حين طُلِّقتْ أسماء بالعدة للطلاق، فكانت أول من أنزلت فيها العدة للمطلقات.
رواه أبو داود (2281) ومن طريقه البيهقي (7/ 414) عن سليمان بن عبد الحميد البهراني، حدثنا يحيى بن صالح، حدثنا إسماعيل بن عياش، حدثني عمرو بن مهاجر، عن أبيه، عن أسماء بنت يزيد فذكرته.
وأعله المنذري بقوله:"في إسناده إسماعيل بن عياش، وقد تكلم فيه غير واحد".
قلت: وهو كما قال، ولكن التحرير فيه أن روايته عن الشاميين مستقيمة وهذا منها.
ولكن فيه مهاجر وهو ابن أبي مسلم الشافعي الأنصاري مولى أسماء بنت يزيد روي عنه جمعٌ، ولم يوثّقه أحدٌ غير ابن حبان ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فليّن الحديث.
وقال ابن كثير في تفسيره بعد أن ساقه من تفسير ابن أبي حاتم:"حديث غريب من هذا الوجه".
أي ضعيف من هذا الوجه، وأنه لم يجد له وجها آخر.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা‘আলার বাণী: “আমি কোনো আয়াত (বিধান) রহিত করলে অথবা ভুলিয়ে দিলে তার চেয়ে উত্তম অথবা তার সমপর্যায়ের কোনো বিধান আনয়ন করি।” [সূরাহ আল-বাকারাহ: ১০৬] এবং তাঁর বাণী: “আর যখন আমি এক আয়াতের স্থলে অন্য আয়াত বদলে দেই, আল্লাহই ভালো জানেন তিনি কী নাযিল করেন।” [সূরাহ আন্-নাহল: ১০১] এবং তাঁর বাণী: “আল্লাহ যা ইচ্ছা করেন মুছে দেন এবং যা ইচ্ছা করেন বহাল রাখেন; আর তাঁর কাছেই রয়েছে উম্মুল কিতাব (মূল কিতাব)।” [সূরাহ আর-রা‘দ: ৩৯]। কুরআনে সর্বপ্রথম যে বিধানটি রহিত করা হয়েছিল, তা হলো ক্বিবলাহ (পরিবর্তন)। এবং (তাঁর বাণী): “আর তালাকপ্রাপ্তা নারীগণ তাদের নিজেদেরকে নিয়ে তিন কুরু’ (মাসিক/পবিত্রতার সময়) অপেক্ষা করবে।” [সূরাহ আল-বাকারাহ: ২২৮] এবং (তাঁর বাণী): “তোমাদের স্ত্রীদের মধ্যে যারা মাসিকের ব্যাপারে নিরাশ হয়ে গেছে, তাদের ব্যাপারে সন্দেহ হলে, তাদের ইদ্দতকাল (অপেক্ষা করার সময়) হবে তিন মাস।” [সূরাহ আত্ব-ত্বালাক্ব: ৪] অতঃপর এর থেকে কিছু রহিত করা হয়েছে। আল্লাহ তা‘আলা বলেন: “অতঃপর তোমরা তাদেরকে স্পর্শ করার আগে যদি তালাক দাও, তবে তোমাদের জন্য তাদের উপর কোনো ইদ্দতকাল নেই যা তোমরা গণনা করবে।” [সূরাহ আল-আহযাব: ৪৯]।
6434 - عن ابن عباس قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم رجل فقال: يا رسول الله، إن سيدي زوّجني أمته، وهو يريد أن يفرق بيني وبينها. قال: فصعد رسول الله صلى الله عليه وسلم المنبر فقال:"يا أيها الناس، ما بالُ أحدكم يُزوج عبده أمته ثم يريد أن يفرق بينهما، إنما الطلاق لمن أخذ بالساق".
حسن: رواه ابن ماجه (2081) عن محمد بن يحيى، قال: حدثنا يحيى بن عبد الله بن بكير، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن موسى بن أيوب الغافقي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل ابن لهيعة، ولكن له متابعات تقوّيه.
منها: ما رواه الدارقطني (4/ 37) والبيهقي (7/ 360) كلاهما من وجه آخر عن بقية بن الوليد، نا أبو الحجاج المهري، عن موسى بن أيوب الغافقي. فذكره.
وأبو الحجاج المهري هو رشدين بن سعد المصري وهو ضعيف أيضا.
قال البيهقي:"وخالفه ابن لهيعة فرواه عن موسى بن أيوب مرسلًا"، وهو ما رواه الدارقطني
والبيهقي كلاهما من طريق موسى بن داود، نا ابن لهيعة، عن موسى بن أيوب، عن عكرمة أن مملوكا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. ولم يذكر فيه ابن عباس.
ومنها: ما رواه الطبراني في المعجم الكبير من حديث يحيى الحماني، نا يحيى بن يعلى، عن موسى بن أيوب مرفوعا.
ويحيى الحماني وشيخه يحيى بن يعلى وهو الأسلمي الكوفي ضعيفان.
وفي معناه ما رُوي عن عصمة بن مالك قال: جاء مملوك إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن مولاي زوّجني، وهو يريد أن يفرّق بيني وبين امرأتي. قال: فصعد النبي صلى الله عليه وسلم المنبر فقال:"يا أيها الناس، إنما الطلاق لمن أخذ بالساق".
رواه الدارقطني (4/ 37) وفيه الفضل بن المختار، عن عبيد الله بن موهب، عن عصمة بن مالك فذكره.
والفضل بن المختار هو أبو سهل البصري ضعيف جدًّا، ذكره الذهبي في الميزان (3/ 358) وقال: قال أبو حاتم: أحاديثه منكرة، يحدث بالأباطيل. وقال ابن عدي: أحاديثه منكرة، عامتها لا يتابع عليها.
وأما ما رُوي عن أبي الحسن مولى بني نوفل أنه استفتى ابن عباس في مملوكٍ كانت تحته مملوكة، فطلّقها تطليقتين، ثم عُتقا بعد ذلك: هل يصلح له أن يخطبها؟ قال: نعم، قضى بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2187) والنسائي (3427) وابن ماجه (2082) وأحمد (2031) والبيهقي (7/ 370 - 371) كلهم من حديث يحيى بن أبي كثير، عن عمر بن معتّب، عن أبي الحسن فذكره.
وعمر بن معتِّب ضعيف جدا.
قال فيه ابن المديني: منكر الحديث. وقال النسائي:"ليس بالقوي".
قال أبو داود:"سمعت أحمد بن حنبل قال: قال عبد الرزاق: قال ابن المبارك لعمر: من أبو الحسن هذا؟ لقد تحمل صخرة عظيمة. قال أبو داود: أبو الحسن هذا، روى عنه الزهري، قال الزهري: وكان من الفقهاء، روي الزهري عن أبي الحسن أحاديث. قال أبو داود: أبو الحسن معروف، وليس العمل على هذا الحديث". انتهى.
وقال البيهقي بعد أن نقل كلام ابن المديني في عمر بن معتب:"مجهول، لم يرو عنه غير يحيى".
قوله:"الطلاق لمن أخذ بالساق" معناه أن الطلاق حقّ الزوج الذي له أن يأخذ بساق المرأة، وليس ذلك بحقّ المولي.
رواه أبو داود (2189) والترمذي (1182) وابن ماجه (2080) والدارقطني (2/ 39) والحاكم (2/ 205). كلهم من حديث أبي عاصم قال: حدثنا ابن جريج، عن مظاهر بن أسلم، عن القاسم، عن عائشة فذكرته.
وإسناده ضعيف من أجل مظاهر بن أسلم، فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم.
ولذا قال الترمذي:"حديث عائشة حديث غريب لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث مظاهر بن أسلم. ومظاهر لا يعرف له في العلم غير هذا الحديث".
وقال أبو داود:"هو حديث مجهول". وذكر البخاري في"التاريخ الأوسط" (2038) أن أبا عاصم يُضعف مظاهرًا.
وأما الحاكم فقال:"مظاهر بن أسلم شيخ من أهل البصرة، لم يذكره أحد من متقدمي مشايخنا بجرح، فإذا الحديث صحيح".
وقول الحاكم عجيب، فقد سبق القول فيه عن يحيى بن معين فقال: ليس بشيء. وقال أبو حاتم:"منكر الحديث". وقال أبو داود:"مجهول، وحديث في طلاق الأمة منكر". وقال النسائي:"ضعيف".
وأعجب منه صنيع ابن حبان فإنه ذكره في الثقات (7/ 528) ولم يلتفت إلى كلام هؤلاء في مظاهر بن أسلم.
وجاء في التاريخ الأوسط (874): حدثنا محمد: قال: نا يحيى بن سليمان، قال: حدثنا ابن وهب، قال: حدثني أسامة بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن القاسم وسالم: عدّةُ الأمة حيضتان، وطلاقُ الحرِّ الأمةَ ثلاثٌ، وطلاقُ العبدِ الحرةّ تطليقتان.
وقال: ليس هذا في كتاب الله ولا سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن عمل بها المسلمون وهذا يرد حديث مظاهر. انتهى.
ففي هذا نفي عن القاسم أن يكون ما رواه من عائشة مرفوعا إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما الصحيح أنه موقوف على أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومنهم أخذ المسلمون.
وذكر الدارقطني عن أبي عاصم قال:"ليس بالبصرة حديث أنكر من حديث مظاهر بن أسلم هذا، وعن أبي بكر النيسابوري قال:"الصحيح عن القاسم خلاف هذا".
ثم روى بإسناده عن زيد بن أسلم قال: سئل القاسم عن عدة الأمة. فقال: الناس يقولون: حيضتان، وإنا لا نعلم ذلك، أو قال: لا نجد ذلك في كتاب الله، ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن عمل به المسلمون" باختصار.
وهذا دليل على أن الحديث ليس للقاسم، وإنما أخطأ فيه مظاهر بن أسلم، وقد يكون قول أحد من التابعين فجعله مرفوعًا.
وقد أشار الترمذي إلى عمل المسلمين بهذا الأثر بقوله:
"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر موقوفًا:"طلاق الأمة اثنتان وعدتها حيضتان".
رواه ابن ماجه (2079) والدارقطني (4/ 38) كلاهما من حديث عمر بن شيب المُسْلي، عن عبد الله بن عيسى، عن عطية، عن ابن عمر فذكره.
وأُعِلَّ بعطية: وهو ابن سعد العوفي، وهو يُضعَّف إذا انفرد، مع التدليس.
وعمر بن شبيب هو المُسْلي الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.
قال الدارقطني:"تفرد به عمر بن شبيب مرفوعًا، وكان ضعيفًا، والصحيح عن ابن عمر ما رواه سالم ونافع عنه من قوله".
وقال:"وحديث عبد الله بن عيسى، عن عطية، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم منكر غير ثابت من وجهين: أحدهما أن عطية ضعيف، وسالم ونافع أثبت منه وأصح رواية.
والوجه الآخر: أن عمر بن شبيب ضعيف الحديث، لا يحتج بروايته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মনিব আমাকে তার দাসীর সাথে বিবাহ দিয়েছেন, আর এখন তিনি আমার ও তার মাঝে বিচ্ছেদ ঘটাতে চাচ্ছেন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: হে লোক সকল! তোমাদের কারো কী হয়েছে যে, সে তার গোলামকে তার দাসীর সাথে বিবাহ দেয়, তারপর তাদের মাঝে বিচ্ছেদ ঘটাতে চায়? নিশ্চয়ই তালাকের অধিকার কেবল তার, যে ساق (পায়ের গোছা/স্বামীত্ব) ধরেছে।
6435 - عن ابن مسعود قال: لعن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المُحِلّ والمُحَلَّل له.
صحيح: رواه الترمذي (120) والنسائي (3411) وأحمد (4248) والبيهقي (7/ 208) كلهم من حديث سفيان الثوري، عن أبي قيس، عن هُزيل، عن عبد الله فذكره.
والهزيل هو ابن شرحبيل الأودي من رجال البخاري ثقة مخضرم.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، وأبو قيس الأودي اسمه عبد الرحمن بن ثروان، وقد رُوي هذا الحديث، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير وجه، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم: عمر بن الخطاب، وعثمان بن عفان، وعبد الله بن عمرو، وغيرهم. وهو قول الفقهاء من التابعين، وبه يقول سفيان الثوري، وابن المبارك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق. وسمعت الجارود بن معاذ يذكر عن وكيع أنه قال بهذا وقال: ينبغي أن يُرمي بهذا الباب من قول أصحاب الرأي. قال وكيع: وقال سفيان:"إذا تزوج المرأةَ ليحللها، ثم بدا له أن يمسكها فلا يحل له أن يُمسكها إلا بنكاح جديد". انتهى.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিল্লাকারী এবং যার জন্য হিল্লা করা হয় (প্রথম স্বামী) উভয়কে অভিশাপ দিয়েছেন।
6436 - عن أبي هريرة قال: لعن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المُحِلّ والمُحَلَّل له.
حسن: رواه أحمد (8287) وابن الجارود (684) والبزار - كشف الأستار - (1442) والبيهقي (7/ 208) والترمذي في العمل الكبير (1/ 437) من حديث عبد الله بن جعفر المخزومي، عن
عثمان بن محمد الأخنسي، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن جعفر المخزومي، وشيخه عثمان بن محمد الأخنسي فإنهما حسنا الحديث.
قال الترمذي:"سألت محمدا عن هذا الحديث فقال: هو حديث حسن، وعبد الله بن جعفر المخزومي صدوق ثقة، وعثمان بن محمد الأخنسي ثقة، وكنت أظن أن عثمان لم يسمع من سعيد المقبري".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ব্যক্তিকে লা’নত (অভিশাপ) করেছেন, যে (তালাকপ্রাপ্ত স্ত্রীকে হালাল করার জন্য সাময়িকভাবে) বিয়ে করে (মুহাল্লিল) এবং যার জন্য হালাল করা হয় (মুহাল্লাল লাহু)।
6437 - عن عقبة بن عامر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أخبركم بالتَّيْس المستعار؟". قالوا: بلى يا رسول الله. قال:"هو المحلِّل. لعن الله المحلِّل والمحلَّل له"
حسن: رواه ابن ماجه (1936) عن يحيى بن عثمان بن صالح المصري قال: حدثنا أبي، قال: سمعت الليث بن سعد يقول: قال لي أبو مصعب مشرح بن هاعان، قال عقبة بن عامر فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضا الحاكم (2/ 198 - 199) وقال:"صحيح الإسناد" وقال:"وقد ذكر أبو صالح كاتب الليث، عن الليث سماعه من مشرح بن هاعان" ثم قال بعد سياق الإسناد الذي فيه سماع الليث من مشرح:"صحيح الإسناد".
كأنه يريد الرد على قول أبي زرعة إذ قال كما في"العلل" (1/ 411) لابن أبي حاتم: ذكرت هذا الحديث ليحيى بن عبد الله بن بكير، وأخبرته برواية عبد الله بن صالح وعثمان بن صالح فأنكر ذلك إنكارًا شديدًا وقال: لم يسمع الليث من مشرح شيئًا، ولا روى عنه شيئا، وإنما حدثني الليث ابن سعد بهذا الحديث عن سليمان بن عبد الرحمن أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال.
قال أبو زرعة:"الصواب عندي: حديث يحيي يعني ابن عبد الله بن بكير". انتهى.
قلت: والمثبت مقدم على النافي، والإسناد حسن من أجل أبي مصعب مشرح بن هاعان، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وثّقه ابن معين، والعجلي، وابن حبان، وروى عنه عدد كبير، ثم أعاد ابن حبان ذكره في المجروحين فقال:"يروي عن عقبة بن عامر أحاديث مناكير لا يتابع عليها، والصواب في أمره ترك ما انفرد من الروايات، والاعتبار بما يوافق الثقات".
ولكن كلام ابن عدي أكثر صوابًا إذ قال بعد أن سبر رواياته:"أرجو أنه لا بأس به".
উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: আমি কি তোমাদেরকে 'ভাড়া করা ষাঁড়' সম্পর্কে অবহিত করব না? তাঁরা বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: সে হলো 'মুহাল্লিল' (হালালকারী)। আল্লাহ তা‘আলা লা‘নত (অভিসম্পাত) করেছেন 'মুহাল্লিল' (হালালকারীর) উপর এবং যার জন্য হালাল করানো হলো (মুহাল্লাল লাহুর) উপর।
6438 - عن نافع أنه قال: جاء رجل إلى ابن عمر فسأله عن رجل طلّق امرأته ثلاثا، فتزوجها أخ له من غير موامرة منه ليُحلّها لأخيه، هل تحل للأول؟ قال: لا إلا نكاح رغبة. كنا نعد هذا سفاحًا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين - (2367) والحاكم (2/ 199) وعنه البيهقي (7/ 208) من طريق أبي غسان محمد بن مطرف، عن عمر بن نافع، عن أبيه فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين" ـ
وفي معناه ما روي عن ابن عباس قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم المحلّل والمحلَّل له" رواه ابن ماجه (1934) عن محمد بن بشار قال: حدثنا أبو عامر، عن زمعة بن صالح، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وزمعة بن صالح ضعيف باتفاق أهل العلم، ضعّفه الإمام أحمد وابن معين وأبو داود وأبو حاتم والنسائي وغيرهم. وقال ابن حبان: كان رجلًا صالحًا يهم ولا يعلم، ويُخطئ ولا يفهم، حتى غلب في حديثه المناكير التي يرويها عن المشاهير. وبه أعله أيضا البوصيري.
وأما شيخه سلمة بن وهرام فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وأما ما روي عن علي قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم عشرة: آكلَ الربا، وموكله، وكاتبه، وشاهديه، والمحل والمحلل له، ومانع الصدقة، والواشمة والمستوشمة" فهو ضعيف.
انظر تخريجه في كتاب البيوع، وكذلك لا يصح حديث جابر.
قال الترمذي:"حديث علي وجابر حديث معلول هكذا رواه أشعث بن عبد الرحمن، عن مجالد، عن عامر الشعبي، عن الحارث، عن علي، وعامر عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا حديث ليس إسناده بالقائم. لأن مجالد بن سعيد قد ضعَّفه بعضُ أهل العلم، منهم أحمد بن حنبل. وروى عبد الله بن نُمير هذا الحديث عن مجالد، عن عامر، عن جابر بن عبد الله، عن علي. وهذا قد وهم فيه ابنُ نمير، والحديث الأول أصح، وقد رواه مغيرة، وابن أبي خالد وغير واحد عن الشعبي، عن الحارث، عن علي". انتهى.
قلت: وأما حديث علي بن أبي طالب فرواه أبو داود (2076) والترمذي (1119) والنسائي (8/ 147) وابن ماجة (1935) وأحمد (635) كلهم عن الشعبي، عن الحارث، عن علي فذكر الحديث. ذكر بعضهم مطولًا، وبعضهم مختصرًا. والحارث هو الأعور وهو ضعبف باتفاق أهل العلم.
قوله: والمحلّ: من الإحلال، والمحلَّل له: من التحليل، وهما بمعني، ولذا روي المُحِلّ والمُحَلّ له بلام واحد مشددة، والمحلل والمحلل له، بلامين أولهما مشددة، ثم المحلل من تزوج مطلقة الغير ثلاثا لتُحِل له، والمحلل له: هو المُطَلِّق، وإنما لعن، لأنه هتكُ مروءةٍ وقلةُ حميةٍ، وخِسَّة نفسٍ، وهو بالنسبة إلى المحلل له ظاهر، وأما المحلِّل فإنه كالتيس يُعير نفسه بالوطء لغرض الغير، وتسميته محلِّلا عند من يقول بصحة نكاحه ظاهرة، ومن لا يقول بها، لأنه قصد التحليل وإن كانت لا تحل، والله تعالى أعلم. قاله السندي.
حسن: رواه أبو داود (2195) ومن طريقه البيهقي (7/ 337) والنسائي (3554) من حديث علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام الخفيف في علي بن حسين وأبيه.
وفي الباب ما رويَ عن عائشة قالت: كان الناس، والرجل يطلق امرأته ما شاء أن يطلقها، وهي امرأته إذا ارتجعها وهي في العدة، وإن طلقها مئة مرة، أو أكثر، حتى قال الرجل لامرأته: والله لا أطلِّقك فتَبِيني مني، ولا آويكِ أبدًا. قالت: وكيف ذاك؟ قال: أُطَلِّقُكِ، فكلما همَّت عدتُك أن تنقضي، راجعتُك، فذهبتِ المرأة حتى دخلتْ على عائشة فأخبرتها. فسكتت عائشة حتى جاء النبي صلى الله عليه وسلم فأخبرته، فسكتَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، حتى نزل القرآن: {الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ} [البقرة: 229].
قالت عائشة: فاستأنف الناس الطلاقَ مستقبِلا، من كان طلّق ومن لم يكن طلق.
رواه الترمذي (1192) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا يعلى بن شبيب، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وفيه يعلى بن شبيب المكي لم يوثقه أحد غير ابن حبان فهو مجهول، أو"مقبول" عند ابن حجر، إلا أنه قال في التقريب:"لين الحديث".
وخالفه عبد الله بن إدريس فرواه عن هشام بن عروة عن أبيه نحو هذا الحديث بمعناه ولم يذكر فيه: عن عائشة أخرجه الترمذي عقبه وقال: وهذا أصح من حديث يعلى بن شبيب".
وأما الحاكم فأخرجه في المستدرك (2/ 279) من وجه آخر عن يعلى بن شبيب وقال: هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يتكلم أحد في يعقوب بن حميد بن كاسب بحجة.
تعقَّبه الذهبي فقال:"قد ضعَّفه غير واحد".
قلت: وفيه علة أخرى وهي يعلى بن شبيب مجهول كما مضى.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট এক ব্যক্তি এসে সেই লোক সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো, যে তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিয়েছে। এরপর তার এক ভাই কোনো প্রকার পরামর্শ ছাড়াই তাকে এই উদ্দেশ্যে বিয়ে করলো যাতে সে তার ভাইয়ের জন্য হালাল হয়ে যায়। সে কি প্রথম স্বামীর জন্য হালাল হবে? তিনি বললেন: না, যতক্ষণ না তা (স্বাভাবিক) প্রকৃত বিবাহের উদ্দেশ্যে হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা এই কাজকে ব্যভিচার (সফাহান/অবৈধ কাজ) হিসেবে গণ্য করতাম।
6439 - عن أبي أسيد قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم حتى انطلقنا إلى حائط يقال له: الشوط، حتى انتهينا إلى حائطين فجلس بينهما، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اجلسوا هاهنا" ودخل، وقد أتى بالجونية، فأُنزلتْ في بيت في نخل في بيت أميمة بنت النعمان بن شراحيل، ومعها دايتها حاضنة لها. فلما دخل عليها النبي صلى الله عليه وسلم قال:"هبي نفسك لي" فقالت: وهل تَهَبُ الملكة نفسها للسوقة؟ قال: فأهوى بيده يضع يده عليها لتسكن. فقالت: أعوذ بالله منك، فقال:"قد عُذتِ بمعاذ" ثم خرج علينا فقال:"يا أبا أسيد،
اكسُها رازقيتين، وألْحِقها بأهلها".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5255) أبي نعيم، حدثنا عبد الرحمن بن غَسيل، عن حمزة بن أبي أسيد، عن أبي أسيد فذكره.
وقال البخاري (5256) وقال الحسين بن الوليد النيسابوري، عن عبد الرحمن، عن عباس بن سهل، عن أبيه، وأبي أسيد قالا: تزوج النبي صلى الله عليه وسلم أميمة بنت شراحيل، فلما أُدخلتْ عليه بسط يده إليها. فكأنها كرهت ذلك. فأمر أبا أسيد أن يُجهزها، ويكسوها ثوبين رازقيين.
وقوله:"داية": معرب يقال للممرضة والقابلة. والمراد هنا من كانت معها لاصلاح شأنها.
وقولها:"للسوقة": أي لواحد من الرعية. وهي جَهِلَتْ كونَه نبي الله صلى الله عليه وسلم ولما علمت ذلك تأسفت وقالت: خَدِعتُ وأنا شَقية.
আবূ উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে বের হলাম এবং ‘আশ-শাওত’ নামক একটি বাগানের দিকে গেলাম। আমরা দুটি বাগানের কাছে পৌঁছালাম। তিনি সেগুলোর মাঝে বসলেন এবং বললেন: "তোমরা এখানেই বসো।" এরপর তিনি ভিতরে প্রবেশ করলেন। ইতিপূর্বে জাওনিয়্যাহকে (বিয়ের জন্য) আনা হয়েছিল এবং তাঁকে উমাইমাহ বিনত নু‘মান বিন শুরাহীলের ঘরে খেজুর গাছের কাছে অবস্থিত একটি ঘরে নামানো হলো। তাঁর সাথে তাঁর সেবিকা (দায়াহ) ছিল, যে তাঁকে লালন-পালন করত। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন, তিনি বললেন: "তুমি নিজেকে আমার কাছে সমর্পণ করো।" তিনি বললেন: রাণী কি নিজেকে বাজারের সাধারণ প্রজার কাছে সমর্পণ করে? বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে শান্ত করার জন্য তাঁর দিকে হাত বাড়ালেন। তিনি বললেন: আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। তিনি বললেন: "তুমি তো আশ্রয় পাওয়ার যোগ্য (আল্লাহর) নিকট আশ্রয় চেয়েছো।" এরপর তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে এলেন এবং বললেন: "হে আবূ উসাইদ, তাকে দুটি রাযিকীয়াহ পোশাক পরিয়ে দাও এবং তাকে তার পরিবারের কাছে পৌঁছে দাও।"
6440 - عن جابر بن عبد الله قال: لما طلَّق حفص بن المغيرة امرأته فاطمة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقال لزوجها:"مَتِّعها" قال: لا أجد ما أمتعها. قال:"فإنه لا بد من المتاع" قال:"مَتِّعْهَا ولو نصف صاع من تمر".
حسن: رواه البيهقي (7/ 257) عن أبي عبد الله الحافظ، أنبأ أبو بكر أحمد بن إسحاق، أنبأ علي بن عبد الصمد، ثنا أبو همام الوليد بن شجاع السكوني، ثنا مصعب بن سلَّام، ثنا شعبة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن عبد الصمد، وهو أبو الحسن الطيالسي يعرف بعلان ماغمه، كان ثقة كما قال الخطيب في ترجمته (12/ 28)، وقال أيضا: وكان كثير الحديث قليل المروءة.
وفيه أيضا عبد الله بن محمد بن عقيل مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
ونقل البيهقي قصة ظريفة عن القاضي شريح أن رجلا طَلَّق امرأته عنده فقال: مَتِّعْها. فقالت المرأة: إنه ليس لي عليه متعة، إنما قال الله: {وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ} [البقرة: 241] وللمطلقات متاع بالمعروف حقا على المحسنين، وليس من أولئك.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হাফস ইবনুল মুগীরাহ তার স্ত্রী ফাতিমাহকে তালাক দিলেন, তখন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার স্বামীকে বললেন, "তাকে কিছু উপহার (মুতাআ) দাও।" সে বলল, তাকে উপহার দেওয়ার মতো আমার কাছে কিছু নেই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "অবশ্যই তাকে মুতাআ দিতে হবে।" তিনি বললেন, "তাকে উপহার দাও, অন্ততপক্ষে অর্ধ 'সা' পরিমাণ খেজুর হলেও।"