আল-জামি` আল-কামিল
7168 - عن أبي موسى الأشعري قال:"رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يأكل دجاجا".
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5517) عن يحيى (هو ابن موسى البلخي)، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن زهدم الجرمي، عن أبي موسى فذكره.
وساق مسلم القصة السابقة من حديث حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي قلابة والقاسم كلاهما عن زهدم فذكره. والحديث المذكور مختصر من تلك القصة.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে মুরগি খেতে দেখেছি।"
7169 - عن أنس قال: أنفجنا أرنبا ونحن بمر الظهران، فسعى القوم فلغبوا فأخذتها فجئت بها إلى أبي طلحة، فذبحها فبعث بوركيها أو قال: بفخذيها إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقبلها.
وزاد في رواية: قلت: وأكل منه؟ قال: وأكل منه.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح (5535)، ومسلم في الصيد والذبائح (1953) كلاهما من طريق شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس بن مالك، فذكره.
والرواية الأخرى عن البخاري في الهبة (7572) من طريق شعبة به.
قوله:"أنفجنا" أي أثرنا يقال: نفج الأرنب إذا ثار وعدا، وانتفج كذلك، ويقال: إن الانتفاج الاقشعرار فكان المعني جعلناها بطلبنا لها تنتفج. كذا في الفتح (9/ 661).
وقوله:"بمر الظهران" اسم موضع على مرحلة من مكة.
وقوله:"فلغبوا" أي تعبوا وزنا ومعنا.
قال الترمذي عقب الحديث (1789):"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم لا يرون بأكل الأرنب بأسا، وقد كره بعض أهل العلم أكل الأرنب وقالوا: إنها تُدمي. أي تحيض.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মাররুয যাহরান নামক স্থানে একটি খরগোশকে তাড়িয়ে তুললাম। এরপর লোকেরা সেটিকে ধরার জন্য দৌঁড়াল, কিন্তু ক্লান্ত হয়ে গেল। তখন আমি সেটিকে ধরলাম এবং আবূ তালহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে নিয়ে আসলাম। তিনি সেটি যবেহ করলেন। অতঃপর তিনি তার দুটি কোমর—অথবা বললেন: তার দুটি উরু—নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠিয়ে দিলেন। তিনি তা গ্রহণ করলেন।
অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: (আমি জিজ্ঞাসা করলাম,) ‘আর তিনি কি তা খেলেন?’ তিনি বললেন, ‘তিনি তা খেলেন।’
7170 - عن محمد بن صفوان قال: اصّدتُّ أرنبين، فذبحتهما بمروةٍ، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عنهما، فأمرني بأكلهما.
صحيح: رواه أبو داود (2822)، والنسائي (4313)، وابن ماجه (3157)، وأحمد (15870)، وصحّحه ابن حبان (5887)، والحاكم (4/ 235) كلهم من طرق عن الشعبي، عن محمد بن صفوان، فذكره. وإسناده صحيح، قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم مع الاختلاف فيه على الشعبي ولم يخرجاه.
وفي الباب عن خالد بن الحويرث قال:"إن عبد الله بن عمرو كان بالصفاح - مكان بمكة - وإن رجلا جاء بأرنب قد صادها فقال: يا عبد الله بن عمرو ما تقول؟ قال: قد جيء بها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا جالس فلم يأكلها، ولم ينه عن أكلها، وزعم أنها تحيض".
رواه أبو داود (3792) ومن طريقه البيهقي (9/ 321) عن يحيى بن خلف، حدّثنا روح بن عبادة، حدّثنا محمد بن خالد، قال: سمعت أبي خالد بن الحويرث يقول فذكره.
وفي إسناده محمد بن خالد بن الحويرث المخزومي، لم يوثقه غير ابن حبان فذكره في الثقات (7/ 407) على عادته في توثيق المجاهيل، وقال الحافظ في التقريب:"مستور". وكذا والده خالد بن الحويرث، تفرد بتوثيقه ابن حبان، وقال عثمان بن سعيد الدارمي: سألت ابن معين عنه فقال:"لا أعرفه".
وقال ابن عدي: وخالد هذا كما قال ابن معين: لا يعرف وأنا لا أعرفه أيضًا، وعثمان بن سعيد كثيرًا ما سأل يحيى بن معين عن قوم فكان جوابه أن قال:"لا أعرفهم" وإذا كان يحيى لا يعرفه فلا تكون له شهرة، ولا يعرف". الكامل (3/ 40).
وفي الباب أيضًا عن ابن الحوتكية قال: قال عمر:"من حاضرنا يوم القاحة قال أبو ذر: أنا شهدت النبي صلى الله عليه وسلم أتي بأرنب، وقال مرة: جاء أعرابي بأرنب، فقال الذي جاء بها: إني رأيتها كأنها تدمي، فكان النبي صلى الله عليه وسلم يأكل منها فقال لهم: كلوا، فقال رجل: إني صائم قال: وما صومك؟ فأخبره قال: فأين أنت عن البيض الغر؟ قال: وما هن؟ قال: صيام ثلاثة أيام من كل شهر ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".
رواه ابن خزيمة (2127)، وأبو يعلى (185)، والبيهقي (9/ 321) كلهم من حديث موسى بن طلحة، عن ابن الحوتكية، فذكره. واللفظ لابن خزيمة.
وابن الحوتكية اختلف في اسمه فقيل: هو يزيد وهو الذي اعتمده الحافظ وقال: وأكثر ما يأتي غير المسمى ثم قال:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أقف على من تابعه فهو لين الحديث.
মুহাম্মদ বিন সাফওয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি দুটি খরগোশ শিকার করলাম এবং একটি পাথর (মারওয়াহ) দিয়ে সে দুটিকে যবেহ করলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সে দুটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, তখন তিনি আমাকে তা খেতে বললেন।
7171 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم يوم خيبر عن لحوم الحمر، ورخّص في لحوم الخيل.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5520)، ومسلم في الصيد والذبائح (1941: 36) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن علي، عن جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন গাধার গোশত খেতে নিষেধ করেছেন এবং ঘোড়ার গোশত খাওয়ার অনুমতি দিয়েছেন।
7172 - عن جابر بن عبد الله قال: أكلنا زمن خيبر الخيل وحمر الوحش، ونهانا النبي صلى الله عليه وسلم عن الحمار الأهلي.
صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1941: 37) عن محمد بن حاتم، حدثنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা খায়বারের যুদ্ধের সময় ঘোড়া ও বন্য গাধা ভক্ষণ করেছিলাম। আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের জন্য গৃহপালিত গাধা (খাওয়া) নিষেধ করেছিলেন।
7173 - عن جابر بن عبد الله قال: ذبحنا يوم خيبر الخيل والبغال والحمير، فنهانا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن البغال والحمير، ولم ينهنا عن الخيل.
صحيح: رواه أبو داود (3789)، وأحمد (14840) وصحّحه ابن حبان (5272)، والحاكم (4/ 235) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وزاد الحاكم في إسناده:"عن أبي الزبير وعمرو بن دينار".
وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه".
وفيما قاله بعض النظر، نعم لم يخرجاه بهذا السياق، ولكن أخرجاه - كما سبق - من طريق
عمرو بن دينار، عن محمد بن علي، عن جابر.
وأخرجه مسلم من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر - وفي كلا الطريقين النهي عن لحوم الحمر، والترخيص في لحوم الخيل، وليس عندهما ذكر"لحوم البغال".
وقد تبين من رواية الصحيحين أن عمرو بن دينار - كما في طريق الحاكم - لم يسمعه من جابر، وإنما بينهما واسطة.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা খায়বারের দিন ঘোড়া, খচ্চর এবং গাধা যবেহ করেছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে খচ্চর ও গাধা (খাওয়া) থেকে নিষেধ করলেন, কিন্তু তিনি আমাদেরকে ঘোড়া (খাওয়া) থেকে নিষেধ করেননি।
7174 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا نأكل لحوم الخيل.
قال عطاء: والبغال؟ قال: لا.
صحيح: رواه النسائي (4333)، وابن ماجه (3197) كلاهما من طريق عبد الكريم الجزري، عن عطاء، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح، وعطاء هو ابن أبي رباح.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ঘোড়ার গোশত খেতাম। আতা জিজ্ঞেস করলেন, আর খচ্চরের? তিনি (জাবির) বললেন, না।
7175 - عن أسماء قالت: نحرنا فرسا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فأكلناه.
وفي رواية قالت:"ذبحنا" وزاد"ونحن بالمدينة".
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5519)، ومسلم في الصيد والذبائح (1942) كلاهما من طريق هشام (هو ابن عروة)، عن فاطمة (هي بنت المنذر بن الزبير) عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته. والرواية الأخرى عند البخاري (5511) من طريق عبدة، عن هشام به.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে একটি ঘোড়া নহর করেছিলাম এবং আমরা তা খেয়েছিলাম।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন, "আমরা জবেহ করেছিলাম" এবং আরও বলেন, "আমরা তখন মদীনায় ছিলাম।"
7176 - عن ابن عباس قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن لحوم الحمر، وأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بلحوم الخيل أن يؤكل.
حسن: رواه الطبراني في المعجم الكبير (12/ 180)، والأوسط (5760)، والدارقطني (4782) من طريق محمد بن عبد الله بن سليمان الحضرمي، ثنا محمد بن عُبسد المحاربي، ثنا عمر بن عبيد، عن سماك بن حرب، عن جابر بن زيد، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سماك وكذا محمد بن عبد فهما حسنا الحديث، وبقية رجاله ثقات، وجابر بن زيد هو أبو الشعثاء، وعمر بن عيد هو الطنافسي.
وقال الحافظ:"سنده قوي". الفتح (9/ 650).
وأما ما روي عن جابر بن عبد الله قال: لما كان يوم خيبر، أصاب الناس مجاعة فأخذوا الحمر الأهلية، فذبحوها وأغلوا منها القدور فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم قال جابر: فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فكفأنا القدور، وقال: إن الله سيأتيكم برزق هو أحل لكم من هذا وأطيب من ذاك، قال: فكفأنا يومئذ القدور وهي تغلي قال: فحرم رسول الله صلى الله عليه وسلم لحوم الحمر الإنسية، ولحوم الخيل، والبغال، وكل ذي ناب من السباع، وكل ذي مخلب من الطير، وحرم المجثمة، والخلسة والنهبة". فهو معلول.
رواه الطبراني في الأوسط (3692) من طريق عصام بن علي - والبزار (الكشف 2857) من
طريق أبي النضر (هو هاشم بن القاسم) كلاهما عن عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر فذكره. والسباق للطبراني، وهو عند البزار مختصر.
وقال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير إلا عكرمة".
قلت: وعكرمة هو ابن عمار العجلي وإن كان صدوقا، ولكن روايته عن يحيى بن أبي كثير فيها اضطراب، قاله الإمام أحمد وعلي بن المديني والبخاري وأبو داود والنسائي وأبو حاتم وغيرهم وقد رواه الترمذي (1478)، وأحمد (14463)، وابن أبي شية (7/ 296) من طريق الهاشم بن القاسم مطولا ومختصرًا، وليس عندهم ذكر الخيل.
ثم قد خولف عكرمة في إسناده، خالفه محمد بن عمرو بن علقمة، فرواه عن أبي سلمة عن أبي هريرة بلفظ:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّمَ كل ذي ناب من السباع".
رواه الترمذي (1479) عن قتيبة، ثنا عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن عمرو به. وقال:"حديث حسن".
وقال في العلل الكبير (2/ 631):"سألت محمدا عن هذا الحديث؟ فقال: حديث أبي سلمة، عن أبي هريرة أشبه، وعكرمة بن عمار يغلط الكثير في أحاديث يحيى بن أبي كثير". اهـ.
وكذلك لا يصح ما روي عن خالد بن الوليد، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل لحوم الخيل والبغال والحمير. وزاد في رواية:"وكل ذي ناب من السباع".
رواه أبو داود (3790)، والنسائي (4331)، وابن ماجه (3198) وأحمد (16817) من طرق عن بقية بن الوليد حدثني ثور بن يزيد، عن صالح بن يحيى بن المقدام بن معديكرب، عن أبيه، عن جده، عن خالد بن الوليد، فذكره. والزيادة المذكورة عند أبي داود والنسائي.
وإسناده ضعيف من أجل صالح بن يحيى بن المقدام بن معديكرب، وأبيه يحيي فهما لا يعرفان.
قال البخاري عن صالح بن يحيى: فيه نظر. وذكر الذهبي في ديوان الضعفاء فقال: صالح بن يحيى بن مقدام، عن أبيه، عن جده:"مجهولون". ولكن لو قال: مجهولان لكان صحيحا، لأن جده معديكرب صحابي مشهور.
وهكذا نُقل أيضًا عن موسى بن هارون الحافظ بقوله: لا يعرف صالح، ولا أبوه، ولا جده.
ونقل النووي في شرح مسلم عنه على الصواب وهو قوله: ولا يُعرف صالح بن يحيى ولا أبوه.
وقال الخطابي: في إسناده نظر، قال: وصالح بن يحيى، عن أبيه، عن جده لا يعرف سماع بعضهم من بعض.
ورواه الإمام أحمد (16818) مطولا من طريق أبي سلمة الحمصي، عن صالح بن يحيى بن المقدام، عن ابن المقدام، عن جده المقدام بن معديكرب قال: غزوت مع خالد بن الوليد الصائفة …" فذكره بطوله وفيه:"أيها الناس ما بالكم أسرعتم في حظائر لليهود؟ ألا لا تحل
أموال المعاهدين إلا بحقها، وحرام عليكم حُمُر الأهلية والإنسية وخيلها وبغالها، وكل ذي ناب من السبع، وكل ذي مخلب من الطير". وفي إسناده ما سبق، وابن المقدام لعله يحيى بن المقدام، وفي متنه نكارة وهي قول خالد بن الوليد: غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة خيبر".
لأن خالدا إنما أسلم بعد خيبر وقبل الفتح على الصحيح. وأعله البيهقي بالاضطراب وبمخالفته الحديث الثقات، السنن الكبري (9/ 328).
قال أبو داود عقب الحديث:"وهو قول مالك" يعني في النهي عن لحوم الخيل.
ثم قال أبو داود:"وهذا منسوخ، قد أكل لحوم الخيل جماعة من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم: ابن الزبير، وفضالة بن عبيد، وأنس بن مالك، وأسماء بنت أبي بكر، وسويد بن غفلة، وعلقمة، وكانت قريش في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم تذبحها".
وقال ابن عبد البر:"أما أهل العلم بالحديث، فحديث الإباحة في لحوم الخيل أصح عندهم وأثبت، من النهي عن أكلها".
وممن كره أكل لحوم الخيل أيضًا ابن عباس، وهو مذهب أبي حنيفة، واحتجوا بقوله تعالى: {وَالْخَيْلَ وَالْبِغَالَ وَالْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةً وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ} [سورة النحل: 8].
ولم يذكر فيه الأكل، وذكر الأكل من الأنعام في الآية التي قبلها، وأجاب الجمهور بأن عدم ذكر الأكل لا يستلزم تحريم الأكل، فإن الآية خصت بالذكر الركوب والزينة لأنها معظم المقصود من الخيل، ثم إن السنة جاءت بيان إباحة أكله أيضا.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গাধার মাংস খেতে নিষেধ করেছেন এবং ঘোড়ার মাংস খাওয়ার আদেশ দিয়েছেন।
7177 - عن جابر بن عبد الله قال: أكلنا زمن خيبر الخيلَ وحمرَ الوحش، ونهانا النبي صلى الله عليه وسلم عن الحمار الأهلي.
صحيح: رواه مسلم (1941: 37) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা খায়বারের সময় ঘোড়া ও বন্য গাধা খেয়েছিলাম, কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে গৃহপালিত গাধা খেতে নিষেধ করেছিলেন।
7178 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: غزونا مع النبي صلى الله عليه وسلم سبع غزوات أو ستا، كنا نأكل معه الجراد. وفي رواية:"سبع غزوات" بالجزم.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5495)، ومسلم في الصيد والذبائح (1952) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي يعفور، قال: سمعت ابن أبي أوفى فذكره. واللفظ للبخاري.
وفي صحيح مسلم:"وسبع غزوات" يعني من غير شك.
وأما ما روي عن سلمان الفارسي قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن الجراد فقال: أكثر جنود الله، لا
أكله ولا أحرمه" فهو معلول.
رواه أبو داود (3813) عن محمد بن الفرج البغدادي، ثنا ابن الزبرقان، ثنا سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان فذكره.
ورجاله ثقات غير ابن الزبرقان وهو محمد بن الزبرقان أبو همام الأهوازي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد خالف هنا الثقات، فقد رواه الثقات عن سليمان التيمي مرسلا. أي: لم يذكروا سلمان.
وقد أشار أبو داود إلى هذه العلة حيث قال عقب الحديث:"رواه المعتمر، عن أبيه، عن أبي عثمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم، لم يذكر سلمان". اهـ
قلت: ورواية المعتمر بن سليمان التيمي أخرجها عبد الرزاق (8757) عنه، عن أبيه، عن أبي عثمان النهدي، قال:"سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن الجراد فقال: جند من جنود الله، ليس جند أعظم منه لا أكله ولا أحرمه، وكان يقول: ما لم يحرّم فهو حلال".
وتابعه أيضا يزيد بن هارون عند ابن أبي شيبة (5/ 145 - طبعة الحوت) ومحمد بن عبد الله الأنصاري عند البيهقي (9/ 257) كلاهما عن التيمي به مرسلًا.
ورواه أبو داود أيضًا (3814)، وابن ماجه (3219) من طريق زكريا بن يحيى بن عمارة، عن أبي العوام الجزّاز، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل فقال: مثله. قال أبو داود عقبه:"رواه حماد بن سلمة، عن أبي العوام، عن أبي عثمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم. لم يذكر سلمان". اهـ
ورواية حماد بن سلمة أولى بالصواب لأنه أوثق.
سئل أبو حاتم عن رواية أبي العوّام هذه الموصولة فقال:"هذا خطأ، الصحيح مرسل ليس فيه سلمان". اهـ. العلل (1495).
والخلاصة أن الحديث ضعيف لإرساله، وإن صحّ فليس فيه دليل على التحريم بل فيه دليل على الحل، ولذا قال البيهقي عقب الحديث:"إن صمم هذا ففيه دلالة على الاباحة، فإنه لم يحرمه فقد أحله، وإنما لم يأكله تقذرًا". اهـ
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাত বা ছয়টি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি। আমরা তাঁর সাথে টিড্ডি (পঙ্গপাল) খেতাম। অন্য এক বর্ণনায় নিশ্চিতভাবে 'সাতটি যুদ্ধ' বলা হয়েছে।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘আয-যাবাইহ ওয়াছ-ছাইদ’ (জীবজন্তুর যবেহ ও শিকার) অধ্যায়ে (নং ৫৪৯৫) এবং ইমাম মুসলিম এটি ‘আছ-ছাইদ ওয়ায-যাবাইহ’ অধ্যায়ে (নং ১৯৫২) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই শু’বাহ-এর সূত্রে, তিনি আবু ইয়া’ফুর থেকে, যিনি বলেন: আমি ইবনে আবী আওফাকে এটি বলতে শুনেছি। শব্দগুলো ইমাম বুখারীর। আর সহীহ মুসলিমে আছে: "এবং সাতটি যুদ্ধ," অর্থাৎ কোনো সন্দেহ ছাড়া।
কিন্তু সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে টিড্ডি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: "এগুলো আল্লাহর সৈন্যদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি। আমি তা খাইও না, আবার হারামও করি না"—এই হাদীসটি ত্রুটিযুক্ত (মা'লুল)।
ইমাম আবু দাউদ (৩৮১৩) এটি বর্ণনা করেছেন মুহাম্মদ ইবনুল ফারাজ আল-বাগদাদী থেকে, তিনি ইবনুয-যুবরকান থেকে, তিনি সুলাইমান আত-তাইমী থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে, তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যিনি তা উল্লেখ করেছেন। এর বর্ণনাকারীগণ সকলে বিশ্বস্ত, ইবনুয-যুবরকান ব্যতীত, আর তিনি হলেন মুহাম্মদ ইবনুয-যুবরকান আবু হাম্মাম আল-আহওয়াযী, যার ব্যাপারে মতভেদ আছে। তবে যখন তিনি বিশ্বস্তদের বিরোধিতা না করেন, তখন তার হাদীস হাসান (উত্তম) হয়। কিন্তু এখানে তিনি বিশ্বস্তদের বিরোধিতা করেছেন। কারণ বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীগণ সুলাইমান আত-তাইমী থেকে এটি মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। অর্থাৎ তারা সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি। ইমাম আবু দাউদ হাদীসের শেষে এই ত্রুটির প্রতি ইঙ্গিত করেছেন। তিনি বলেন: "মু'তামির এটি তার পিতা থেকে, তিনি আবু উসমান থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি।"
আমি (গ্রন্থকার) বলছি: মু'তামার ইবনু সুলাইমান আত-তাইমীর বর্ণনাটি আব্দুর রাজ্জাক (৮৭৫৭) তার থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে টিড্ডি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: এগুলো আল্লাহর সৈন্যদের মধ্যে একটি সৈন্য, এর চেয়ে বড় কোনো সৈন্য নেই। আমি তা খাইও না, আবার হারামও করি না।" তিনি (নবী) বলতেন: "যা হারাম করা হয়নি, তা হালাল।" ইয়াজিদ ইবনু হারুনও তার অনুসরণ করেছেন ইবনু আবী শাইবাতে (৫/১৪৫ - হাউত সংস্করণ) এবং মুহাম্মদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী বায়হাকীর কাছে (৯/২৫৭)। উভয়ই তাইমী থেকে মুরসাল হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন।
ইমাম আবু দাউদ (৩৮১৪) এবং ইবনু মাজাহ (৩২১৯) এটি যাকারিয়া ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু আম্মারা-এর সূত্রে, তিনি আবুল আওয়াম আল-জায্যাজ থেকে, তিনি আবু উসমান আন-নাহদী থেকে, তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি অনুরূপ উত্তর দেন। আবু দাউদ হাদীসের শেষে বলেন: "হাম্মাদ ইবনু সালামা এটি আবুল আওয়াম থেকে, তিনি আবু উসমান থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি।" হাম্মাদ ইবনু সালামা-এর বর্ণনাটি অধিকতর সঠিক, কারণ তিনি অধিক বিশ্বস্ত। আবুল আওয়ামের এই মাওসূল বর্ণনা সম্পর্কে আবু হাতেমকে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেন: "এটি ভুল। সহীহ হল মুরসাল, এতে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নেই।" (আল-ইলাল, ১৪৯৫)।
উপসংহার হলো, হাদীসটি মুরসাল হওয়ার কারণে যঈফ (দুর্বল)। আর যদি এটি সহীহ প্রমাণিত হয়ও, তবুও এতে হারাম হওয়ার কোনো প্রমাণ নেই, বরং হালাল হওয়ার প্রমাণ রয়েছে। আর একারণেই ইমাম বায়হাকী হাদীসের শেষে বলেন: "যদি এটি দৃঢ় হয়, তবে এতে হালাল হওয়ার প্রমাণ রয়েছে। কারণ তিনি এটিকে হারাম করেননি, ফলে এটি হালাল। আর তিনি এটি কেবল ঘৃণা করে খাননি।"
7179 - عن أبي عمار قال: قلت لجابر: الضبع صيد هي؟ قال: نعم، قال: قلت: أكلها؟ قال: نعم، قال: قلت له: أقاله رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم.
صحيح: رواه الترمذي (1791)، والنسائي (2836، 4323)، وصحّحه ابن خزيمة (2645)، وابن حبان (3695)، والحاكم (1/ 452) كلهم من طرق عن ابن جريج قال: أخبرني عبد الله بن
عيد بن عمير، عن ابن أبي عمار قال فذكره.
وإسناده صحيح، وابن أبي عمار اسمه عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمار المكي ثقة.
وقال الترمذي:"حديث حسن صحيح".
وقال في العلل الكبير (2/ 757):"سألت محمدا يعني البخاري عن هذا الحديث فقال: هو حديث صحيح". وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين. كذا قالا وابن أبي عمار من رجال مسلم وحده.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আম্মার তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হায়েনা কি শিকারের অন্তর্ভুক্ত? তিনি বললেন: হ্যাঁ। (আবূ আম্মার) বললেন: আমি আবার জিজ্ঞেস করলাম, তা কি খাওয়া যাবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আবূ আম্মার বলেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: এই কথা কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
7180 - عن جابر بن عبد الله قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع؟ فقال:"هو صيد، ويُجعل فيه كبش إذا صاده المحرم.
صحيح: رواه أبو داود (3801)، وابن ماجه (3085)، وصححه ابن خزيمة (2646)، وابن حبان (3964)، والحاكم (1/ 452 - 453) كلهم من طرق عن جرير بن حازم، عن عبد الله بن عبيد، عن عبد الرحمن بن أبي عمار، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
وفي حديث الباب دليل على جواز أكل الضبع وإليه ذهب الشافعي وأحمد. قال الشافعي: ما زال الناس يأكلونها ويبيعونها بين الصفا والمروة من غير نكير، ولأن العرب تستطيبه وتمدحه.
ولا يعارض هذا الحديث:"كل ذي ناب من السباع" لأنه عام، وهذا خاص وقد قيل: إن الضبع ليس لها ناب.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে হায়েনা (الضبع) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "তা শিকার, এবং যদি ইহরামকারী (ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তি) তা শিকার করে, তবে তাকে তাতে একটি মেষ ফিদইয়া দিতে হবে।"
সহীহ: এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ (৩৮০১), ইবনু মাজাহ (৩০৮৫), এবং সহীহ বলেছেন ইবনু খুযাইমাহ (২৬৪৬), ইবনু হিব্বান (৩৯৬৪), ও হাকিম (১/৪৫২-৪৫৩)। তারা সকলেই জারীর ইবনু হাযিম হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদ হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবি আম্মার হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ।
এই হাদীসটি হায়েনা খাওয়া বৈধ হওয়ার প্রমাণ বহন করে। ইমাম শাফিঈ ও ইমাম আহমাদ এই মত দিয়েছেন। ইমাম শাফিঈ (রহ.) বলেছেন: 'মানুষ সর্বদা সাফ্ফা ও মারওয়ার মাঝে কোনো আপত্তি ছাড়াই এটি খেত ও বিক্রি করত, কারণ আরবরা এটিকে উত্তম মনে করে এবং এর প্রশংসা করে।'
"হিংস্র প্রাণীর মধ্যে দাঁতবিশিষ্ট যা কিছু আছে" (তা হারাম) শীর্ষক হাদীসটি এর বিরোধী নয়, কারণ সেটি সাধারণ (আম), আর এটি বিশেষ (খাস)। এছাড়াও বলা হয়েছে যে, হায়েনার তীক্ষ্ণ দাঁত (ناب) নেই।
7181 - عن جابر بن عبد الله قال: أُتيَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بضبٍّ، فأبى أن يأكل منه وقال:"لا أدري، لعله من القرون التي مُسختْ".
صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1949) من طريق عبد الرزاق، عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে একটি গুঁইসাপ (দাব্ব) আনা হলো, তখন তিনি তা খেতে অস্বীকার করলেন এবং বললেন: "আমি জানি না, সম্ভবত এটি সেই জাতিগুলোর অন্তর্ভুক্ত যাদের চেহারা বিকৃত করা হয়েছিল (বানর বা শূকরে রূপান্তরিত হয়েছিল)।"
7182 - عن عبد الرحمن بن شبل: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل لحم الضب.
حسن: رواه أبو داود (3796)، والبيهقي (9/ 326)، وابن جرير الطبري في تهذيب الآثار (311 - مسند عمر بن الخطاب) كلهم من طريق أبي اليمان الحكم بن نافع، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن أبي راشد الحبراني، عن عبد الرحمن بن شبل فذكره، وإسناده حسن من أجل الكلام في ضمضم بن زرعة الحمصي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وإسماعيل بن عياش وإن تكلم فيه غير أن حديثه عن أهل بلده قوي، وهذا منها، وكذا حسّنه أيضًا الحافظ في الفتح (9/ 665).
আব্দুল রহমান বিন শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাব (গুইসাপ জাতীয় প্রাণী) এর গোশত খেতে নিষেধ করেছেন।
7183 - عن ثابت بن وديعة قال: كنا مع رسول الله في جيش، فأصبنا ضِبابًا، قال: فشويتُ منها ضبًا، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فوضعته بين يديه، قال: فأخذ عودًا فعدَّ به
أصابعه ثم قال:"إن أمة من بني إسرائيل مُسختْ دوات في الأرض، وإني لا أدري أي الدواب هي؟" قال: فلم يأكل ولم ينهَ.
صحيح: رواه أبو داود (3795)، والنسائي (4320)، وابن ماجه (3238)، وأحمد (17931) من طرق عن حصين، عن زيد بن وهب الجهني، عن ثابت بن يزيد بن وديعة الأنصاري فذكره.
وإسناده صحيح، وحصين هو ابن عبد الرحمن السلمي، وزيد بن وهب الجهني مخضرم ثقة جليل.
সাবেত ইবনু ওয়াদিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি সেনাদলে ছিলাম। আমরা কয়েকটি ‘দাব’ (Monitor Lizard) শিকার করলাম। তিনি বলেন: আমি তার থেকে একটি ‘দাব’ ভেজে নিলাম এবং তা নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম ও তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি বলেন: তখন তিনি একটি কাঠি নিলেন এবং তাঁর আঙ্গুলগুলো দ্বারা গুনে নিলেন। অতঃপর বললেন: ‘বনু ইসরাঈলের একটি জাতিকে জমিনের বুকে বিভিন্ন প্রাণীর রূপে রূপান্তরিত (মাস্খ) করা হয়েছিল, আর আমি জানি না যে এই প্রাণীটি তাদের মধ্যে অন্তর্ভুক্ত কিনা।’ তিনি বলেন: অতঃপর তিনি খেলেনও না এবং (অন্যকে খেতে) নিষেধও করলেন না।
7184 - عن عبد الرحمن بن حسنة قال: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأصابتنا مجاعة، فنزلنا بأرض كثيرة الضباب، فاتخذنا منها، فطبخنا في قدورنا، فسألنا النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أمة فقدت أو مسخت" - شك يحيى - والله أعلم فأمرنا فأكفأنا القدور، قال وكيع: مسخت فأخشى أن تكون هذه فأكفأناها، وإنا لجياع.
صحيح: رواه أحمد (17759، 17757)، والبزار (كشف الأستار 1217) وأبو يعلى (931) وعنه ابن حبان (5266) كلهم من طرق عن الأعمش، عن زيد بن وهب، عن عبد الرحمن بن حسنة، فذكره. وإسناده صحيح.
وعزاه الهيثمي في المجمع (4/ 37) لأحمد والطبراني في الكبير وأبي يعلى والبزار قال:"ورجال الجميع رجال الصحيح".
আব্দুল রহমান ইবনে হাসানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলাম। অতঃপর আমরা দুর্ভিক্ষের শিকার হলাম। আমরা এমন এক স্থানে অবতরণ করলাম যেখানে প্রচুর সাণ্ডা (ধাব) ছিল। আমরা তা ধরলাম এবং আমাদের পাত্রে রান্না করলাম। এরপর আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (এর বিধান সম্পর্কে) জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "এরা একটি উম্মত যা বিলুপ্ত হয়ে গেছে অথবা বিকৃত (মাসখ) করা হয়েছে।" (ইয়াহইয়া সন্দেহ পোষণ করেছেন। আল্লাহই ভালো জানেন।) এরপর তিনি আমাদের নির্দেশ দিলেন এবং আমরা পাত্রগুলো উপুড় করে ফেলে দিলাম। ওয়াকী’ বলেন: (এরা) বিকৃত (মাসখ) হয়েছিল, তাই আমি আশঙ্কা করি যে এগুলি সেই প্রাণী হতে পারে। তাই আমরা ক্ষুধার্ত থাকা সত্ত্বেও সেগুলো উপুড় করে ফেলে দিলাম।
7185 - عن حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الضب أمة مسخت دوابًّا في الأرض، أو أن الضباب دواب مسخت في الأرض".
صحيح: رواه البزار (2813) من طريق عبيد الله بن موسى، أنا شعبة، عن حصين، عن زيد بن وهب، عن حذيفة، فذكره. ورواه الإمام أحمد (23315) عن عفان، عن شعبة به.
وقال:"وذكر شيئًا نحوًا من هذا"، يعني حديث ثابت بن وديعة. وزاد فيه:"فلم يأمر به ولم ينهَ أحدًا".
وإسناده صحيح، وحصين هو ابن عبد الرحمن السلمي الكوفي.
قال الهيثمي في المجمع (4/ 37):"رواه البزار وأحمد، ورجاله رجال الصحيح".
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই 'দাব্ব' (গুইসাপ জাতীয় প্রাণী) এমন একটি জাতি যাদেরকে পৃথিবীতে বিচরণশীল প্রাণীতে রূপান্তরিত (মাসখ) করা হয়েছিল, অথবা নিশ্চয়ই 'দাব্ব' হলো এমন বিচরণশীল প্রাণী যাদেরকে পৃথিবীতে রূপান্তরিত করা হয়েছিল।"
7186 - عن سمرة بن جندب، قال: أتى نبي الله صلى الله عليه وسلم أعرابي وهو يخطب، فقطع عليه خطبته، فقال: يا رسول الله، كيف تقول في الضب؟ قال:"أمة مُسخت من بني إسرائيل فلا أدري أي الدواب مُسخت".
حسن: رواه الإمام أحمد (20209، 20240)، والبزار (كشف الأستار 1216)، والطبراني في الكبير (6788، 6790) كلهم من طريق أبي عوانة، ثنا عبد الملك بن عمير، عن حصين، عن سمرة بن جندب، فذكره.
وقد وقع اختلاف في نسبة حصين هذا، فنسب عند أحمد في الموضع الأول إلى قبيلته ولم يسم أبوه، فقال:"رجل من بني فزارة"، ونسب إلى أبيه دون قبيلته في الموضع الثاني، وكذا عند الطبراني في الموضع الأول فقال:"حصين بن قبيصة".
وجاء عند البزار، والموضع الثاني عند الطبراني:"حصين بن أبي الحر" وهذا الأخير بروي عنه عبد الملك بن عمير، وهو ثقة، وثقه أبو حاتم وغيره، ولكن جاء منسوبا في مصادر ترجمته:"التميمي العنبري" واسم أبيه مالك بن الخشخاش.
فالأقرب أنه حصين بن قبيصة، وجاء في ترجمته أنه فزاري من أهل الكوفة، وهذا دون الذي قبله في الشهرة والثقة، بل لم يوثقه إلا العجلي وذكره ابن حبان في الثقات، وقد روى عنه ثلاثة فهو حسن الحديث ما لم يأت بمنكر، وقد وثقه الحافظ في التقريب وجعله في الطبقة الثانية وهم كبار التابعين. والحاصل أن الخلاف المذكور لا يؤثر لأنه متردد بين ثقة وصدوق، فالإسناد على أقل الأحوال حسن.
وقوله:"مسخت" قال ذلك النبي صلى الله عليه وسلم في أول الأمر فتوقف عن أكله وكذلك أصحابه.
ثم أُعلم النبي صلى الله عليه وسلم بأن الممسوخ لا نسل له كما رواه مسلم في القدر (2663: 33) من حديث ابن مسعود، وفيه: قال: قال رجل يا رسول الله، القرَدة والخنازيرُ هي مما مُسخَ؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الله عز وجل لم يُهلك قوما أو يعذّب قومًا فجعل لهم نسلا، وإن القردة والخنازير كانوا قبل ذلك".
فأجاز أكله، ولكنه صلى الله عليه وسلم لم يأكله لأنه ليس من طعام قومه، ومن لم يتعود على أكل شيء لا يستطيبه، وإليكم أحاديث جواز أكل الضب وعدم تحريمه.
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন এক বেদুঈন এসে তাঁর খুতবা থামিয়ে দিলো এবং বললো: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি স্যান্ড লিজার্ড (ধব) সম্পর্কে কী বলেন?" তিনি বললেন: "এটি বনী ইসরাঈলের এক উম্মত (দল), যাদেরকে বিকৃত (রূপান্তরিত) করা হয়েছিল। তবে আমি জানি না কোন জন্তুটিকে বিকৃত করা হয়েছিল।"
7187 - عن ابن عمر قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن الضب؟ فقال:"لستُ بأكله ولا بمحرمه".
متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (11) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر فذكره.
ورواه البخاريّ في الذبائح والصيد (5536)، ومسلم في الصيد والذبائح (1943: 39) كلاهما من أوجه أخرى عن عبد الله بن دينار فذكره.
وأما ما رُوي عن ابن عمر أنه سئل عن الضب؟ فقال:"أنا منذ قال فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قال. فإنا قد انتهينا عن أكله". فلم أقف عليه.
ورواه الطبراني في الكبير، ولم أقف على إسناده، لكن أورده الهيثمي في المجمع (4/ 37) وقال:"رواه الطبراني في الكبير وإسناده حسن". وقد طُبع أخيرًا جزءٌ من مسند ابن عمر، وليس فيه هذا الحديث.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে 'দব' (গুইসাপ জাতীয় প্রাণী) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "আমি এটি খাইও না, আর হারামও করি না।"