হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2001)


2001 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا الأسود بن شَيْبان، أخبرنا أبو نَوفَل بن أبي عَقْرب، عن عائشة: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان يُعجِبُه الجوامعُ من الدُّعاء، ويتركُ ما بينَ ذلك [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) جامع দু'আ (ব্যাপক অর্থবোধক ও সংক্ষিপ্ত দু'আ) পছন্দ করতেন এবং এর বাইরের বিষয়গুলো ছেড়ে দিতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وأخرجه أحمد 42/ (25151) و (25555)، وأبو داود (1482)، وابن حبان (867) من طُرق عن الأسود بن شيبان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2002)


2002 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي وموسى بن إسماعيل قالا: حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن سعيدٍ الجُريري، عن أبي نَعَامة: أنَّ عبدَ الله بن مُغَفّل سمع ابنَه يقول: اللهمَّ إني أسألُك القصرَ الأبيضَ عن يَمينِ الجنة، قال: إني سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "يكونُ في هذه الأمّةِ قومٌ يَعتَدُون في الدُّعاء والطُّهور" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বলতে শুনলেন, যে সে বলছে: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে জান্নাতের ডান দিকে অবস্থিত সাদা প্রাসাদটি চাই।" [এ শুনে] তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি যে, তিনি বলেন: "এই উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক আসবে, যারা দু'আ এবং পবিত্রতার ক্ষেত্রে বাড়াবাড়ি করবে (সীমা লঙ্ঘন করবে)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن على خلاف في إسناده كما بيناه في غير كتاب من تحقيقاتنا.وقد سلف عند المصنف برقم (588) من طريق موسى بن إسماعيل وحده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2003)


2003 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا يوسف بن عَدِي، حدثنا عَثّام بن علي، عن هشام بن عُروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا تَضوَّر عن الليل قال: "لا إله إلَّا اللهُ الواحدُ القهار، ربُّ السماواتِ والأرضِ وما بينَهما العزيزُ الغَفّار" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে এপাশ-ওপাশ করতেন (বা হঠাৎ জেগে উঠতেন), তখন বলতেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহুল ওয়াহেদূল কাহ্হার, রাব্বুস সামাওয়াতি ওয়াল আরদি ওয়ামা বাইনাহুমাল আযীযুল গাফ্ফার।" (অর্থ: আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই; তিনি এক, মহা পরাক্রমশালী; তিনি আকাশমণ্ডলী, পৃথিবী এবং এ দু'য়ের মধ্যবর্তী সবকিছুর রব, তিনি মহা সম্মানিত, মহা ক্ষমাশীল।)




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، لكن خولف عثّام بن علي في إسناده، خالفه جرير بن عبد الحميد كما قال أبو حاتم وأبو زُرعة فيما نقله عنهما ابن أبي حاتم في "العلل" (197) و (1987) و (2054) فرواه عن هشام بن عروة عن أبيه أنه كان يقوله هو نفسُه. وأنكرا جميعًا رفعه، ومع ذلك حسَّنه الحافظُ في "نتائج الأفكار" 3/ 103 مع حكايته قول أبي حاتم وأبي زرعة فيه.وأخرجه مرفوعًا النسائي (7641) و (10634)، وابن حبان (5530) من طرق عن يوسف بن عديّ، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2004)


2004 - أخبرنا عبد الله بن جعفر بن دَرسْتَوَيهِ، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، عن عبد الله بن الوليد، عن سعيد ابن المسيّب، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا استيقظَ من الليل قال: "لا إله إلَّا أنتَ سبحانَك، اللهمَّ إني أستغفِرُك لِذنْبي، وأسألُك برحمتِك، اللهمَّ زِدْني علمًا، ولا تُزِغْ قلبي بعد إذ هدَيتَني، وهَبْ لي من لَدُنكَ رحمةً، إنك أنت الوهّابُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে ঘুম থেকে উঠতেন, তখন বলতেন: "তুমি ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই, তুমি কতই না পবিত্র। হে আল্লাহ! আমি আমার গুনাহের জন্য তোমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি এবং তোমার রহমতের মাধ্যমে (কল্যাণ) চাই। হে আল্লাহ! আমার জ্ঞান বৃদ্ধি করে দাও। আমাকে হেদায়েত দেওয়ার পর তুমি আমার অন্তরকে বিচ্যুত করো না। আর তোমার নিকট থেকে আমাকে রহমত দান করো। নিশ্চয়ই তুমিই মহাদাতা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الله بن الوليد - وهو ابن قيس التُّجِيبي - فقد قال الدارقطني: لا يعتبر به. وليَّنه الحافظُ ابن حجر في "التقريب"، ومع ذلك حسَّن حديثَه هذا في "نتائج الأفكار" 1/ 118!وأخرجه أبو داود (5061)، والنسائي (10635) من طريقين عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (10635)، وابن حبان (5531) من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، به. الحَضْرمي، فرواه عن ثور بن يزيد، وسمَّى الصحابيَّ أبا الأزهر، قال الحافظ في "نتائج الأفكار" 3/ 61: يحيى بن حمزة أثبت في ثور من أبي همام. قلنا: لكن وافق أبا همام على تسميته بأبي زهير الأنماري صدقةُ بنُ عبد الله السَّمين كما جزم به المزي في ترجمة أبي الأزهر من "تهذيب الكمال" 33/ 24، وروايتُه عند الطبراني في "الكبير" 22/ (758) معطوفة على رواية أبي همام محمد بن الزِّبرقان، لكن صدقة ليّنُ الحديث، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (5054) من طريق يحيى بن حمزة، عن ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، عن أبي الأزهر الأنماري. وقال أبو داود بإثره: رواه أبو همام الأهوازي عن ثور، قال: أبو زهير الأنماري.قوله: "فكّ رهاني"، أراد به تخليصه مما نفسُه مرتهنةٌ به من حقوق الله تعالى.وقوله: "النديّ الأعلى" النَّدِيّ: النادي، وهو المجلس الذي يجتمع فيه القوم، فإذا تفرقوا عنه فليس بنادٍ ولا نَديٍّ، والمراد بالنديِّ الأعلى: مجتمع الملائكة المقربين، ولهذا وصفه بالعلوّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2005)


2005 - أخبرنا عبد الله بن جعفر، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثني أبو زكريا يحيى بن يزيد الأهوازي، حدثنا أبو همَّام محمد بن الزِّبْرِقان، حدثنا ثَور بن يزيد، عن خالد بن مَعْدان، عن زهير الأَنْماري، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أَخذ مَضْجَعَه قال: "اللهمَّ اغفرْ لي واخسَ [1] شيطاني، وفُكّ رِهاني، وثَقِّل مِيزاني، واجعلني في النَّدِيِّ الأعلى" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




যুহায়র আল-আনমারী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর শয্যা গ্রহণ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করে দিন, আমার শয়তানকে ধিকৃত করুন, আমার বন্ধন মুক্ত করে দিন, আমার মীযান (নেকীর পাল্লা) ভারী করে দিন এবং আমাকে সর্বোচ্চ মজলিসে স্থান দিন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في المطبوع: اخسأ، وكلاهما جائز، لأنَّ اخْسَ تخفيف، اخسأ، والمعنى: اطرُدْ شيطاني. الحَضْرمي، فرواه عن ثور بن يزيد، وسمَّى الصحابيَّ أبا الأزهر، قال الحافظ في "نتائج الأفكار" 3/ 61: يحيى بن حمزة أثبت في ثور من أبي همام. قلنا: لكن وافق أبا همام على تسميته بأبي زهير الأنماري صدقةُ بنُ عبد الله السَّمين كما جزم به المزي في ترجمة أبي الأزهر من "تهذيب الكمال" 33/ 24، وروايتُه عند الطبراني في "الكبير" 22/ (758) معطوفة على رواية أبي همام محمد بن الزِّبرقان، لكن صدقة ليّنُ الحديث، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (5054) من طريق يحيى بن حمزة، عن ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، عن أبي الأزهر الأنماري. وقال أبو داود بإثره: رواه أبو همام الأهوازي عن ثور، قال: أبو زهير الأنماري.قوله: "فكّ رهاني"، أراد به تخليصه مما نفسُه مرتهنةٌ به من حقوق الله تعالى.وقوله: "النديّ الأعلى" النَّدِيّ: النادي، وهو المجلس الذي يجتمع فيه القوم، فإذا تفرقوا عنه فليس بنادٍ ولا نَديٍّ، والمراد بالنديِّ الأعلى: مجتمع الملائكة المقربين، ولهذا وصفه بالعلوّ.



[2] حديث صحيح، وهو إسناد حسن من أجل أبي زكريا يحيى بن يزيد الأهوازي، فقد روى عنه جمع من الحفاظ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الذهبي في "تلخيص الموضوعات" (677): لم أر أحدًا ضعَّفه. قلنا: وهو متابَع فيما سيأتي عند المصنف برقم (2035)، وأبو همَّام محمد بن الزِّبْرِقان ينحطُّ عن رتبة الثقة قليلًا، وهو متابع أيضًا.وقد وقع في رواية المصنِّف هنا وفيما سيأتي تسميةُ الصحابي بزهير الأنماري، وقد روى البيهقيُّ في "الدعوات الكبير" (396) هذا الحديث عن أبي عبد الله الحاكم بسنده الآتي، ثم قال: كذا قال: عن زهير الأنماري، وقيل: عن أبي زهير، وقيل: عن أبي الأزهر، وأبو زهير أشهر. قلنا: ما قاله البيهقي صحيحٌ في رواية أبي همام محمد بن الزِّبرقان، لكن خالفه يحيى بن حمزة الحَضْرمي، فرواه عن ثور بن يزيد، وسمَّى الصحابيَّ أبا الأزهر، قال الحافظ في "نتائج الأفكار" 3/ 61: يحيى بن حمزة أثبت في ثور من أبي همام. قلنا: لكن وافق أبا همام على تسميته بأبي زهير الأنماري صدقةُ بنُ عبد الله السَّمين كما جزم به المزي في ترجمة أبي الأزهر من "تهذيب الكمال" 33/ 24، وروايتُه عند الطبراني في "الكبير" 22/ (758) معطوفة على رواية أبي همام محمد بن الزِّبرقان، لكن صدقة ليّنُ الحديث، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (5054) من طريق يحيى بن حمزة، عن ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، عن أبي الأزهر الأنماري. وقال أبو داود بإثره: رواه أبو همام الأهوازي عن ثور، قال: أبو زهير الأنماري.قوله: "فكّ رهاني"، أراد به تخليصه مما نفسُه مرتهنةٌ به من حقوق الله تعالى.وقوله: "النديّ الأعلى" النَّدِيّ: النادي، وهو المجلس الذي يجتمع فيه القوم، فإذا تفرقوا عنه فليس بنادٍ ولا نَديٍّ، والمراد بالنديِّ الأعلى: مجتمع الملائكة المقربين، ولهذا وصفه بالعلوّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2006)


2006 - أخبرنا أبو النَّضْر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، أخبرنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن سعيد بن يَسَار، عن أبي هريرة، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول في دُعائه: "اللهمَّ إني أعوذُ بك من الفقر والقِلّة والذِّلّة، وأعوذُ بك من أن أَظلِمَ أو أُظلَم" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু'আয় বলতেন: “হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করি দারিদ্র্য, স্বল্পতা এবং হীনতা থেকে, আর আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই যে আমি যেন (কারো উপর) যুলুম না করি অথবা আমার উপর যেন যুলুম করা না হয়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه اختُلف فيه على إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة في تعيين راويه عن أبي هريرة كما سلف بيانه برقم (1968).وأخرجه أبو داود (1544) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (8053) و 14/ (8311) و (8643) من طرق عن حماد بن سلمة به.وقد تقدَّم برقم (1968) من طريق الأوزاعي، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن جعفر بن عياض، عن أبي هريرة. فسمّى راويه عن أبي هريرة جعفر بن عياض!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2007)


2007 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا إسماعيل بن الخليل الخَزّاز، حدثنا علي بن مُسهِر، عن هشام بن عُروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهمَّ إني أعوذُ بك من فِتنة النارِ وعذابِ النار، وأعوذُ بك من فِتنة القَبر وعذابِ القَبر، وأعوذُ بك من شرِّ فِتنةِ الغِنى، ومن شر فتنةِ الفَقْر، وأعوذُ بك من شرِّ فِتنةِ المَسيح الدَّجّال، اللهمَّ اغسِلْ خَطايايَ بماءِ الثلجِ والبَرَد، ونَقِّنى من خَطايايَ كما نَقَّيتَ الثوبَ الأبيضَ من الدَّنَس، وباعِدْ بيني وبين خَطايايَ كما باعَدتَ بين المَشرقِ والمَغربِ، اللهمَّ إني أعوذُ بك من الكَسَل والهَرَم، والمَأثَمِ والمَغْرَم" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন, "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে জাহান্নামের ফিতনা ও জাহান্নামের শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি আপনার কাছে কবরের ফিতনা ও কবরের শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি আপনার কাছে সম্পদের ফিতনার অনিষ্টতা এবং দারিদ্র্যের ফিতনার অনিষ্টতা থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি আপনার কাছে মাসীহ দাজ্জালের ফিতনার অনিষ্টতা থেকে আশ্রয় চাই। হে আল্লাহ! আপনি আমার ভুল-ত্রুটিগুলো বরফের পানি ও শিলাবৃষ্টির পানি দ্বারা ধুয়ে দিন। আর আমাকে আমার পাপরাশি থেকে এমনভাবে পবিত্র করুন, যেমন আপনি সাদা কাপড়কে ময়লা থেকে পবিত্র করেন। আর আমার ও আমার পাপরাশির মধ্যে এতটা দূরত্ব সৃষ্টি করে দিন, যতটা দূরত্ব আপনি পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যে সৃষ্টি করেছেন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে অলসতা, জরা (বার্ধক্যজনিত দুর্বলতা), পাপ এবং ঋণ থেকে আশ্রয় চাই।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن غالب: هو ابن حرب الملقّب بتَمتام.وأخرجه أحمد 40/ (24301) و 42/ (25727)، والبخاري (6368) و (6375) و (6376)، ومسلم (2705) (49)، وابن ماجه (3838)، والترمذي (3495)، والنسائي (59) و (7859) من طرق عن هشام بن عروة، به.وأخرجه أحمد 41/ (24578) و 43/ (26075) و (26327)، والبخاري (832) و (833) و (2397) و (7129)، ومسلم (587) و (589)، والنسائي (1233) و (7839) و (7854)، وابن حبان (1968) من طريق ابن شهاب الزهري، عن عُروة، به. ووقع في رواية الزهري هذه تقييد هذا الدعاء في الصلاة، وبعض من رواه عن الزهري اقتصر على ذكر الاستعاذة من فتنة المسيح الدجال، وزاد الزهري في روايته: فقال له قائل: ما أكثر ما تستعيذ من المغرم يا رسول الله! فقال: "إِنَّ الرجل إِذا غَرِمَ حَدَّث فكذَبَ، وَوَعَدَ فأخلَفَ".وقد تقدَّم ذكرُ الاستعاذة من عذاب جهنم وشر فتنة المسيح الدَّجال وعذاب القبر وفتنة المحيا والممات برقم (1418) من طريق طاووس اليماني عن عائشة. وقيَّده طاووسٌ في روايته أنَّ ذلك كان منه صلى الله عليه وسلم في الصلاة بعد التشهد الأخير.وقد تقدَّم تفسير المأثم والمغرم برقم (1943).



[2] بل قد خرَّجاه بهذه السياقة، فلا استدراك عليهما فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2008)


2008 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا أبو عمر حفص بن عمر، حدثنا عبد العزيز بن مُسلم، حدثنا محمد بن عَجْلان، عن سعيد بن أبي سعيد المَقبُري، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خُذُوا جُنَّتَكم" قلنا: يا رسول الله مِن عدوٍّ قد حَضَر؟ قال: "لا، بل جُنَّتَكم من النار؛ قَولُ: سُبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إلهَ إلَّا الله، واللهُ أكبر، فإنهنَّ يأتينَ يومَ القيامةِ مُنجِياتٍ ومُقدَّماتٍ، وهنَّ الباقياتُ الصالحاتُ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ঢাল গ্রহণ করো।" আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, কোনো উপস্থিত শত্রুর বিরুদ্ধে (এই ঢাল)? তিনি বললেন, "না, বরং তোমাদের ঢাল হলো জাহান্নামের আগুন থেকে; (তা হলো) 'সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আল্লাহু আকবার'—এই বাক্যগুলো বলা। কারণ কিয়ামতের দিন এই বাক্যগুলো পরিত্রাণকারী ও অগ্রগামী হয়ে আসবে। আর এগুলোই হলো স্থায়ী নেক আমল (আল-বাক্বিয়াতুস সালিহাত)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف فيه على محمد بن عجلان على أربعة وجوه: فقد رواه عنه عبد العزيز بن مسلم - وهو القَسْملي مولاهم - على الوجه الذي جاء عند المصنف.ورواه أبو خالد الأحمر وعمر بن علي المقدمي، عن ابن عجلان، عن عبد الجليل بن حميد، عن خالد بن أبي عمران مرسلًا.ورواه فضيل بن عياض، عن ابن عجلان، عن رجل من أهل الإسكندرية مرسلًا. وكذلك رواه سهيل بن أبي صالح عن محمد بن عجلان غير أنه قال: عن رجل بعسقلان، فذكره مرسلًا.وخالفهم سفيانُ بنُ عيينة فيما قاله الدارقطني في "العلل" (1474) فرواه عن ابن عجلان مرسلًا، لم يُجاوز به ابن عجلان. وقد أعلَّ أهلُ العلم الرواية الموصولة ببعض هذه الوجوه.فأما البخاري فقد أعلَّ الروايةَ الموصولةَ في كتابيه "التاريخ الكبير" 6/ 122 و"التاريخ الأوسط" 3/ 380 برواية عمر بن علي المقدَّمي الموافقة لرواية أبي خالد الأحمر، وزاد في "الأوسط" قوله: ولا يصحُّ فيه المقبريّ ولا أبو هريرة. ولم يذكر البخاري الوجهين الثالث والرابع السابقين.وأما أبو حاتم الرازي فنقل عنه ابنه في "العلل" (1793) إعلاله للموصول برواية فُضيل بن عياض الموافقة لرواية سهيل بن أبيه صالح، فقال: فعلمتُ أنَّ فضيلًا قد أفسَدَ على عبد العزيز بن مسلم وبيَّن عورته، وحديث فُضيل أشبه. ولم يذكر أبو حاتم الوجهين الثاني والرابع.وأما الدارقطني فرجَّح في "علله" (1474) برواية أبي خالد الأحمر الموافقة لرواية عمر بن علي المقدَّمي، ولم يذكر الوجه الثالث من الوجوه المتقدمة.وأما العقيلي فذكر في "ضعفائه" (948 - 950) الوجوه الثلاثة دون الوجه الرابع، ووهَّم عبد العزيز بن مسلم في روايته الموصولة.قلنا: حَمْل الوهم فيه على عبد العزيز بن مسلم مجانبٌ للصواب، والأولى حملُه على محمد بن عجلان نفسه لِدَوَران هذا الاختلاف عليه في هذا الحديث، ولأنه مذكور بالوهم أحيانًا في بعض رواياته. ومع ذلك جَوَّد المنذريُّ إسناد الرواية الموصولة في "الترغيب والترهيب" 2/ 281، وحسَّنَها العلائي في "جزء تفسير الباقيات الصالحات" ص 24، وابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 225. وقد روي هذا الحديثُ من وجهٍ آخرَ عن أبي هريرة، لكن بإسناد ضعيف لا يُعتمد عليه، غير أنَّ لهذا الحديث شواهدَ يصحُّ بها إن شاء الله تعالى.وأخرجه النسائي (10617)، والطبري في "تفسيره" 15/ 255، والعقيلي في "الضعفاء" (948)، وابن أبي حاتم في "العلل" (1793)، والطبراني في "الدعاء" (1682)، وفي "الأوسط" (4027)، وفي "الصغير" (407)، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (693)، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (131)، وفي "شعب الإيمان" (598)، وأبو طاهر السِّلفي في "المشيخة البغدادية" (42)، والعلائي في "جزء تفسير الباقيات الصالحات" ص 23، وابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 225، وفي الثاني من "معجم الشيخة مريم" (9) من طرق عن عبد العزيز بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 393، ومن طريقه العُقيلي في "الضعفاء الكبير" (949) عن أبي خالد الأحمر، والبخاري في "التاريخ الأوسط" 3/ 380، ومعلقًا في "التاريخ الكبير" 6/ 122 من طريق عمر بن علي المقدّمي، كلاهما عن محمد بن عجلان، عن عبد الجليل بن حميد المصري، عن خالد بن أبي عمران مرسلًا.وأخرجه ابن أبي حاتم في "العلل" (1793) من طريق فُضيل بن عياض، عن محمد بن عجلان، عن رجل من أهل الإسكندرية مرسلًا.وأخرجه العُقيلي في "الضعفاء" (950) من طريق سهيل بن أبي صالح، عن محمد بن عجلان، عن رجلٍ بعسقلان مرسلًا. ولعلَّ هذا الرجل الذي حدثه بعسقلان هو من أهل الاسكندرية، فلا مغايرة بين فضيل بن عياض وسهيل بن أبي صالح.وقد روي عن أبي هريرة من وجوه أخرى لا يعتدُّ بها:أمثلُها ما أخرجه النسائي كما في "تحفة الأشراف" للمزي 10/ (14599)، والطبراني في "الدعاء" (1684)، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 562، والخطيب البغدادي في "تلخيص المتشابه في الرسم" 1/ 150، والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة حُكيم بن محمد 7/ 216، وابن حجر في" الأمالي المطلقة" ص 224 من طريق منصور بن سلمة الليثي، عن حُكَيم بن محمد بن قيس بن مخرمة، عن أبيه، عن أبي هريرة. وحسَّنه ابن حجر مع أنَّ منصور بن سلمة الليثي هذا - وإن ذكره ابن حبان في "الثقات" - لا يكاد يُعرف كما قال الذهبي في "الميزان"، وأقره الحافظ ابن حجر نفسُه في "اللسان"، لكن لعلَّ الحافظ ابن حجر حسّنه بطريق المقبُري عن أبي هريرة، إذ ذكر الطريقين على التوالي في "الأمالي".وأخرجه الحسن بن علي الجوهري في ثلاثة مجالس من "أماليه" (2) من طريق عاصم بن سليمان التميمي الكُوزي البصري، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة. وعاصم الكُوزي هذا متروك اتهمه غير واحد من أهل العلم بوضع الحديث.وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 458 من طريق صلة بن سليمان العطار، عن أشعث بن عبد الملك الحُمراني، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة. وصلة هذا كذَّبه ابن معين في رواية العباس الدُّوري وكذَّبه أيضًا أبو داود، وتركه الباقون وقال أبو حاتم: أحاديثه عن أشعث منكرة، وخالفه الدارقطني فقال: يُعتبر بحديثه عن أشعث الحُمراني!!وأخرجه بنحوه الواحدي في "التفسير الوسيط" 3/ 151، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (740) من طريق يوسف بن العنبس اليمامي، عن عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. وقد روى يوسفُ هذا عن عكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير نسخةً، لكن رواية عكرمة بن عمار عن يحيى خاصةً ضعيفةٌ عند أهل العلم. وقد روي نحوه من طرق عن عمر بن راشد اليمامي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي الدرداء. وعمر ضعيف في يحيى أيضًا، وأبو سلمة لا يدرك أبا الدرداء.وأخرجه بنحوه أيضًا ابن عساكر 65/ 276 من طريق هشام بن عمار، عن أبي خالد يزيد بن عبد الله السَّرَّاج، عن مكحول، عن أبي هريرة. ورجاله لا بأس بهم، لكن مكحولًا لم يسمع من أبي هريرة، ثم إنَّ هشام بن عمار كبر فصار يتلقن، فلعلَّ هذا مما لُقِّنه، والله أعلم.ويشهد له حديث أبي سعيد الخدري الذي تقدَّم برقم (1910)، وانظر تمام شواهده هناك.قوله: "جُنَّتَكم"، أي: ما يَستُركم ويَقِيكم.وقوله: "منجيات"، كذلك جاء في رواية الحاكم كما جزم به المنذري في "الترغيب والترهيب"، وعلى ذلك اتفقت أصولنا الخطية، وكذلك جاء بهذا اللفظ عند بعض من خرَّج الحديث غير الحاكم، ولكن جاء في رواية الأكثرين: مجنَّبات، بميم ثم جيم ثم نون مشددة مفتوحة بعدها باء موحدة، أي: مقدَّمات أمامكم، وقيل: بكسر النون المشددة جمع مجنِّبة، وهي التي تكون في الميمنة والميسرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2009)


2009 - حدثني علي بن عيسى الحِيْري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو كُريب، حدثنا خَلّاد بن يزيد الجُعفي، حدثنا شَريك، عن الأعمش، عن مُجاهد، عن ابن عُمر، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يدعُو: "اللهمَّ إني أسألُك عِيشةً نَقِيَّةً، ومِيتةً سَوِيّةً، ومَرَدًّا غيرَ مُخْزِي [1] ولا فاضِحٍ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ করতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট পবিত্র জীবন, সহজ স্বাভাবিক মৃত্যু এবং এমন প্রত্যাবর্তন (আপনার দিকে ফেরা) প্রার্থনা করি যা লাঞ্ছনাকর হবে না এবং যা অপমানজনকও হবে না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذلك جاء في أصولنا الخطية، بإثبات الياء، مع أنَّ القياس حذفُ الياء لأنه اسم منقوص مجرد من الألف واللام مجرورٌ بالإضافة، ولكن جاء في لغةٍ إثبات الياء في المنقوص المجرّد من الألف واللام في حالتي الرفع والجر، ومنه قراءة ابن كثير في بعض المواضع: {وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ} بثبوت الياء في هادي. انظر "شرح ابن عقيل على ألفية ابن مالك" 4/ 172. اسمه خالد بن زريع بن الطيب في شيء من كتب التراجم ولا في شيء من مصادر التخريج، والله تعالى أعلم. والحديثُ عند البزار أيضًا من مسند عبد الله بن عمرو بن العاص.ويشهد له حديث عبد الله بن أبي أوفى عند أحمد 32/ (19402)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.ومرسلُ حبيب بن أبي ثابت عند ابن أبي شيبة 10/ 192، ورجاله ثقات.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسنٌ من أجل خلاد بن يزيد الجُعفي وشريك: وهو ابن عبد الله النَّخَعي. وقد جوَّد هذا الإسنادَ الهيثميُّ في "المجمع" 10/ 179، ولهذا الحديث شواهد يصحُّ بها إن شاء الله.أبو كُريب: هو محمد بن العلاء بن كُريب الهَمْداني، والأعمش: هو سليمان بن مهران، ومجاهد: هو ابن جَبْر المكي، وقد وقع في أكثر مصادر التخريج ذكر عبد الله بن عَمرو بدل عبد الله بن عُمر، وهو أصحُّ، ومجاهدٌ سمع أيضًا من عبد الله بن عمرو بن العاص كما جزم به الحافظُ في "فتح الباري" 9/ 499، على أنَّ مثل هذا الخلاف في تعيين الصحابي لا يضرّ في صحة الحديث.وأخرجه البيهقي في "الدعوات" (196) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (14288)، وفي "الدعاء" (1435) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، والقُضاعي في "مسند الشِّهاب" (1498) من طريق محمد بن الحُسين الخَثْعمي، و (1499) من طريق أبي جعفر الطبري، ثلاثتهم عن أبي كريب، به، فجعلوه من مسند عبد الله بن عمرو بن العاص، غير أنه وقع في مطبوع "الدعاء" للطبراني: عبد الله بن عُمر، ولا نظنها إلَّا تحريفًا، لأنه أورده بالإسناد نفسه وعن شيخه نفسه في "الكبير" في مسند ابن عمرو بن العاص. وذكر مُحقِّق كتاب القضاعي أنه جاء عنده في نسخه الثلاث بذكر عبد الله بن عمرو بن العاص، فثبت أنه عند الطبراني والقضاعي بذكر ابن عمرو بن العاص.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" للهيثمي (3186)، و"مختصر البزار" لابن حجر (2177) عن حميد بن الربيع، عن خالد بن زريع بن الطيب، عن شريك، به. كذلك جاء عند الهيثمي والبزار: خالد بن زريع بن الطيب، وأغلب الظن أنه تحرَّف في النسخة التي اعتمداها من البزار عن خلاد بن يزيد الجعفي، فإنَّ هذا الحديث لا يُعرف عن غير خلاد بن يزيد هذا، ثم إنه لا ذكر لرجل اسمه خالد بن زريع بن الطيب في شيء من كتب التراجم ولا في شيء من مصادر التخريج، والله تعالى أعلم. والحديثُ عند البزار أيضًا من مسند عبد الله بن عمرو بن العاص.ويشهد له حديث عبد الله بن أبي أوفى عند أحمد 32/ (19402)، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.ومرسلُ حبيب بن أبي ثابت عند ابن أبي شيبة 10/ 192، ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2010)


2010 - حدثنا أبو نصر أحمد بن سهل بن حَمْدَوَيهِ الفقيه إملاءً ببُخارَى، حدثنا أبو علي صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ البغدادي، حدثنا سعيد بن سُليمان الواسطي، حدثنا عيسى بن ميمون مولى القاسم بن محمد بن أبي بكر الصِّدِّيق، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان يدعُو: "اللهمَّ اجعل أوسعَ رزقِك عليَّ عند كِبَر سِنّي، وانقطاعِ عُمري" [1].هذا حديث حسنُ الإسناد والمتن، غريبٌ في الدعاء مستحَبٌّ للمشايخ، إلَّا أنَّ عيسى بن ميمون لم يَحتَجَّ به الشيخان رضي الله عنهما.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু'আ করতেন: "হে আল্লাহ! আমার বার্ধক্যে এবং আমার জীবনকাল সমাপ্তির সময় আমার প্রতি তোমার রিযিকের প্রশস্ততাকে সবচয়ে বেশি করে দিও।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عيسى بن ميمون مولى القاسم فهو متروك منكر الحديث، وبالغ الذهبي في "تلخيصه" في قوله بأنه متَّهم فلا نعرف له فيه سَلَفًا.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (1049)، وفي "الأوسط" (3611)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 166، وأبو الشيخ الأصبهاني في "طبقات المحدثين بأصبهان" (922)، والبيهقي في "الدعوات" (275)، وأبو طاهر السِّلَفي في "المشيخة البغدادية" (49)، وابن الجوزي في "الموضوعات" (380)، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 9/ 293، وابن كثير في "طبقات الشافعيين" ص 368 من طرق عن عيسى بن ميمون، به.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (152) من طريق محمد بن أبي بكر المقدّمي، عن أبي يحيى مولى آل الزبير، عن القاسم، عن عائشة. وأبو يحيى يغلب على الظن أنه عمرو بن دينار قهرمان آل الزبير، وهو متروك الحديث فلا اعتداد بمتابعته هذه، وإلّا فهو رجلٌ آخر مجهول.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2011)


2011 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا الأسود بن عامر شاذانُ، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أبي جعفر الخَطْمي، عن محمد بن كعب القُرَظي، عن أبي هريرة، قال: كان فيكُم أمانانِ، مضتْ إحداهُما وبقيتِ الأخرى: {وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنْتَ فِيهِمْ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ} [الأنفال: 33] [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وقد اتفقا على أنَّ تفسير الصحابي حديثٌ مُسنَدٌ [2].وله شاهدٌ عن أبي موسى الأشعَري:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমাদের মাঝে দুটি নিরাপত্তা ছিল। এর মধ্যে একটি চলে গেছে এবং অন্যটি অবশিষ্ট আছে: "আল্লাহ এমন নন যে, আপনি তাদের মাঝে থাকা অবস্থায় তাদেরকে শাস্তি দেবেন এবং আল্লাহ এমনও নন যে, তারা ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকলে তাদেরকে শাস্তি দেবেন।" (সূরা আনফাল: ৩৩)




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو جعفر الخَطْمي: هو عُمير بن يزيد الأنصاري.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (645) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. يتعاطى أمر كسرى وأمر الفُرس. فإسناده حسنٌ إن شاء الله، وقد روي هذا من طريق أخرى عن أبي بُردة:فقد أخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 99 - 100، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 17/ 4 من طريق خلف بن تميم، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد بن يوسف، عن أبي بردة، عن أبي موسى. وإسماعيل ضعيف يعتبر به، وشيخه مجهول.وخالف خَلَفًا فيه سفيانُ بنُ وكيع عند الترمذي (3082) وغيره، فرواه عن عبد الله بن نمير، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد، عن أبي بردة، عن أبي موسى مرفوعًا. كذا رفَعَه سفيانُ بن وكيع، وقد انفرد برفعه، وهو ضعيف، وخلف صدوق، وعلى أي حالٍ فالسند ضعيف لضعف إسماعيل وجهالة شيخه عبّاد. وإن كان الأقربُ فيه رواية خلف لموافقتها في الوقف لرواية محمد بن أبي أيوب عن أبي موسى، ولرواية عمر كسرى عن سعيد بن أبي بُردة عن أبيه عن جده أبي موسى.وقد صحَّ عن أبي موسى الأشعري مرفوعًا: "أنا أَمَنَةٌ لأصحابي، فإذا ذهبتُ أتى أصحابي ما يُوعدون … "، أخرجه أحمد 32/ (19566)، ومسلم (2531)، وابن حبان (7249).ويشهد للموقوف حديث أبي هريرة الذي قبله موقوفًا عليه أيضًا.وحديثُ ابن عباس موقوفًا عليه كذلك عند الطبراني في "تفسيره" 9/ 235، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1691، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 45، وفي "شعب الإيمان" (1411) بإسنادين عنه، وهو صحيح.



[2] انظر الكلام على هذه المسألة فيما تقدَّم برقم (73). يتعاطى أمر كسرى وأمر الفُرس. فإسناده حسنٌ إن شاء الله، وقد روي هذا من طريق أخرى عن أبي بُردة:فقد أخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 99 - 100، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 17/ 4 من طريق خلف بن تميم، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد بن يوسف، عن أبي بردة، عن أبي موسى. وإسماعيل ضعيف يعتبر به، وشيخه مجهول.وخالف خَلَفًا فيه سفيانُ بنُ وكيع عند الترمذي (3082) وغيره، فرواه عن عبد الله بن نمير، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد، عن أبي بردة، عن أبي موسى مرفوعًا. كذا رفَعَه سفيانُ بن وكيع، وقد انفرد برفعه، وهو ضعيف، وخلف صدوق، وعلى أي حالٍ فالسند ضعيف لضعف إسماعيل وجهالة شيخه عبّاد. وإن كان الأقربُ فيه رواية خلف لموافقتها في الوقف لرواية محمد بن أبي أيوب عن أبي موسى، ولرواية عمر كسرى عن سعيد بن أبي بُردة عن أبيه عن جده أبي موسى.وقد صحَّ عن أبي موسى الأشعري مرفوعًا: "أنا أَمَنَةٌ لأصحابي، فإذا ذهبتُ أتى أصحابي ما يُوعدون … "، أخرجه أحمد 32/ (19566)، ومسلم (2531)، وابن حبان (7249).ويشهد للموقوف حديث أبي هريرة الذي قبله موقوفًا عليه أيضًا.وحديثُ ابن عباس موقوفًا عليه كذلك عند الطبراني في "تفسيره" 9/ 235، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1691، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 45، وفي "شعب الإيمان" (1411) بإسنادين عنه، وهو صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2012)


2012 - أخبرَناه أبو العباس السَّيّاري، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا صَدَقة بن الفضل، حدثنا وكيع بن الجرّاح، حدثني حَرْمَلة بن قيس، عن محمد [1] بن أبي أيوب، عن أبي موسى الأشعَري، قال: أمانانِ كانا في الأرض، فرُفِعَ أحدُهما وبقيَ الآخَرُ: {وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنْتَ فِيهِمْ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ} [2].




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: পৃথিবীতে দুটি নিরাপত্তা ছিল। এর একটি তুলে নেওয়া হয়েছে এবং অপরটি বিদ্যমান রয়েছে: (তা হলো) "আর আল্লাহ্ এমন নন যে, আপনি তাদের মাঝে থাকা অবস্থায় তাদের শাস্তি দেবেন; এবং আল্লাহ্ এমনও নন যে, তারা ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকলে তাদের শাস্তি দেবেন।" [সূরা আল-আনফাল, ৮:৩৩]




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبيد. والمثبت على الصواب من "المسند" لأحمد ومن "تاريخ البخاري الكبير". يتعاطى أمر كسرى وأمر الفُرس. فإسناده حسنٌ إن شاء الله، وقد روي هذا من طريق أخرى عن أبي بُردة:فقد أخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 99 - 100، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 17/ 4 من طريق خلف بن تميم، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد بن يوسف، عن أبي بردة، عن أبي موسى. وإسماعيل ضعيف يعتبر به، وشيخه مجهول.وخالف خَلَفًا فيه سفيانُ بنُ وكيع عند الترمذي (3082) وغيره، فرواه عن عبد الله بن نمير، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد، عن أبي بردة، عن أبي موسى مرفوعًا. كذا رفَعَه سفيانُ بن وكيع، وقد انفرد برفعه، وهو ضعيف، وخلف صدوق، وعلى أي حالٍ فالسند ضعيف لضعف إسماعيل وجهالة شيخه عبّاد. وإن كان الأقربُ فيه رواية خلف لموافقتها في الوقف لرواية محمد بن أبي أيوب عن أبي موسى، ولرواية عمر كسرى عن سعيد بن أبي بُردة عن أبيه عن جده أبي موسى.وقد صحَّ عن أبي موسى الأشعري مرفوعًا: "أنا أَمَنَةٌ لأصحابي، فإذا ذهبتُ أتى أصحابي ما يُوعدون … "، أخرجه أحمد 32/ (19566)، ومسلم (2531)، وابن حبان (7249).ويشهد للموقوف حديث أبي هريرة الذي قبله موقوفًا عليه أيضًا.وحديثُ ابن عباس موقوفًا عليه كذلك عند الطبراني في "تفسيره" 9/ 235، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1691، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 45، وفي "شعب الإيمان" (1411) بإسنادين عنه، وهو صحيح.



[2] خبر حسن، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل محمد بن أبي أيوب، فهو - وإن لم يرو عنه غير حرملة بن قيس - تابعي ذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد روي هذا الخبر من وجه آخر عن أبي موسى.وأخرجه أحمد 32/ (19506) و (19607) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وله طريق أخرى عند الطبراني في "الدعاء" (1792)، وفي "الأوسط" (3346)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 11/ 573، وابن النجار في "الذيل على تاريخ بغداد" 5/ 135 من رواية عمر أبي حفص الملقّب كسرى، عن سعيد بن أبي بُردة، عن أبيه، عن أبي موسى الأشعري. وعمر كسرى هذا ترجم له ابنُ النجار، وهو أخباريٌّ معروفٌ روى عنه جماعةٌ، منهم إسماعيل ابن عُليَّة وأبو عُبيدة معمر بن المثنَّى الذي أخذ عنه كتاب "أخبار الفرس". ولُقِّب كسرى لأنه كان يتعاطى أمر كسرى وأمر الفُرس. فإسناده حسنٌ إن شاء الله، وقد روي هذا من طريق أخرى عن أبي بُردة:فقد أخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 99 - 100، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 17/ 4 من طريق خلف بن تميم، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد بن يوسف، عن أبي بردة، عن أبي موسى. وإسماعيل ضعيف يعتبر به، وشيخه مجهول.وخالف خَلَفًا فيه سفيانُ بنُ وكيع عند الترمذي (3082) وغيره، فرواه عن عبد الله بن نمير، عن إسماعيل بن إبراهيم بن مهاجر، عن عباد، عن أبي بردة، عن أبي موسى مرفوعًا. كذا رفَعَه سفيانُ بن وكيع، وقد انفرد برفعه، وهو ضعيف، وخلف صدوق، وعلى أي حالٍ فالسند ضعيف لضعف إسماعيل وجهالة شيخه عبّاد. وإن كان الأقربُ فيه رواية خلف لموافقتها في الوقف لرواية محمد بن أبي أيوب عن أبي موسى، ولرواية عمر كسرى عن سعيد بن أبي بُردة عن أبيه عن جده أبي موسى.وقد صحَّ عن أبي موسى الأشعري مرفوعًا: "أنا أَمَنَةٌ لأصحابي، فإذا ذهبتُ أتى أصحابي ما يُوعدون … "، أخرجه أحمد 32/ (19566)، ومسلم (2531)، وابن حبان (7249).ويشهد للموقوف حديث أبي هريرة الذي قبله موقوفًا عليه أيضًا.وحديثُ ابن عباس موقوفًا عليه كذلك عند الطبراني في "تفسيره" 9/ 235، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1691، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 45، وفي "شعب الإيمان" (1411) بإسنادين عنه، وهو صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2013)


2013 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو عمرو المُستَمْلي، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحَنْظَلي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا بشر بن رافع، عن محمد بن عَجْلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "مَن قال: لا حولَ ولا قوةَ إلَّا بالله، كان دواءً من تسعةٍ وتسعين داءً، أيسرُها الهَمُّ" [1]. هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، وبشر بن رافع الحارِثي ليس بالمتروك، وإن لم يُخرجاه.وكذلك هيثمٌ البَكّاء لم يُخرجاه، وله حديث يَنفردُ به، وهذا موضعُه، فإنه من عُبّاد المسلمين:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি 'লা হাওলা ওয়া লা কুয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' বলবে, তা নিরানব্বইটি রোগের আরোগ্য হবে, যার মধ্যে সবচেয়ে সহজটি হলো দুশ্চিন্তা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل بشر بن رافع - وهو الحارثي النجراني - فإنه ضعيف منكر الحديث، ووهَّاه الذهبي في "تلخيصه". أبو عمرو المستمْلي: هو أحمد بن المبارك النيسابوري.وهو عند إسحاق بن راهويه الحنظلي في "مسنده" (541)، ومن طريق ابن راهويه أخرجه ابن حبان في "المجروحين" 11/ 188، والطبراني في "الدعاء" (1674).وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الفرج بعد الشدة" (11)، والطبراني في "الدعاء" (1674)، وفي "الأوسط" (5028)، وأبو علي التَّنُوخي في "الفرج بعد الشدة" 1/ 123 - 124، وأبو نعيم الأصبهاني في "الطب النبوي" (231)، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (191) من طريق خالد ابن خِداش، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2014)


2014 - حدَّثَناه محمد بن صالح، حدثنا إبراهيم بن محمد الصَّيدلاني، حدثنا عُقبة بن مُكْرَم العَمَّي، حدثنا شَريك بن عبد المجيد [1]، أخو أبي بكر الحَنَفي، حدثنا الهيثم [2] بن جَمّاز البَكّاء، عن ثابت البُناني، عن أنس بن مالك: أنَّ أبا طالبٍ مَرِضَ فثَقُل فعادَه النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا ابنَ أخي، ادْعُ ربَّك الذي تعبُدُ [3] أن يُعافيَني، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ اشفِ عَمِّي"، فقامَ كأنَّما نُشِطَ من عِقَال، فقال أبو طالب: إِنَّ ربَّك الذي تعبُدُ لَيُطِيعُك، قال: "وأنتَ يا عَمِّ، لئِنْ أَطعتَ اللهَ ليُطِيعُك [4] " [5].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ তালিব অসুস্থ হয়ে পড়লে এবং তার রোগ যখন গুরুতর হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে গেলেন। অতঃপর তিনি বললেন, 'হে ভাতিজা, তুমি যে রবের ইবাদত করো, তাকে আমার জন্য আরোগ্য কামনা করে ডাকো।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আল্লাহ! আমার চাচাকে আরোগ্য দান করো।" এতে আবূ তালিব এমনভাবে দাঁড়িয়ে গেল যেন বাঁধন থেকে মুক্ত হলো। অতঃপর আবূ তালিব বললো, তুমি যে রবের ইবাদত করো, তিনি অবশ্যই তোমার ডাকে সাড়া দেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আর হে চাচা, আপনিও যদি আল্লাহর আনুগত্য করেন, তবে তিনিও আপনার ডাকে সাড়া দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الحميد، بحاء مهملة بعدها ميم. 9/ 353، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 324 و 325 من طرق عن عُقبة بن مُكرَم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن زيدان البجلي في "مسنده" (44)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1152)، وابن عساكر 66/ 325 من طريق محمد بن يونس القرشي الكُديمي، عن شريك بن عبد المجيد الحَنَفي، به. والكديمي ضعيف جدًّا.



[2] تحرَّف في النسخ إلى: القاسم وفي "التلخيص" على الصواب. 9/ 353، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 324 و 325 من طرق عن عُقبة بن مُكرَم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن زيدان البجلي في "مسنده" (44)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1152)، وابن عساكر 66/ 325 من طريق محمد بن يونس القرشي الكُديمي، عن شريك بن عبد المجيد الحَنَفي، به. والكديمي ضعيف جدًّا.



2014 [3] - في النسخ في الموضعين: بعثك، والمثبت من نسخة بهامش (ز) في كلا الموضعين، وهو الموافق لما في مصادر تخريج الحديث. 9/ 353، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 324 و 325 من طرق عن عُقبة بن مُكرَم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن زيدان البجلي في "مسنده" (44)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1152)، وابن عساكر 66/ 325 من طريق محمد بن يونس القرشي الكُديمي، عن شريك بن عبد المجيد الحَنَفي، به. والكديمي ضعيف جدًّا.



2014 [4] - كذلك وقعت مرفوعةً في نسخنا الخطية مع كونها جوابًا للشرط، لأنَّ الجواب إذا كان مضارعًا وكان الشرط ماضيًا ففي ذلك الجواب وجهان الرفع والجزم، والجزم أكثر. انظر "المُفصَّل" للزمخشري ص 321، و"شواهد التوضيح" لابن مالك ص 176، و"حاشية الشَّنَواني على شرح مقدمة الإعراب لابن هشام" ص 71 - 72. 9/ 353، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 324 و 325 من طرق عن عُقبة بن مُكرَم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن زيدان البجلي في "مسنده" (44)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1152)، وابن عساكر 66/ 325 من طريق محمد بن يونس القرشي الكُديمي، عن شريك بن عبد المجيد الحَنَفي، به. والكديمي ضعيف جدًّا.



2014 [5] - إسناده ضعيف جدًّا من أجل الهيثم بن جَمّاز البكاء، فقد تركوه كما قال الذهبي في "تلخيصه"، والراوي عنه شريك بن عبد المجيد الحنفي غير معتمد كما قال الدارقطني في "سؤالات البرقاني له" (319).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (3973)، وابن عدي في "الكامل" 7/ 102، وأبو طاهر الذهبي في "المخلِّصيات" (606)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 184، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 353، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 324 و 325 من طرق عن عُقبة بن مُكرَم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن زيدان البجلي في "مسنده" (44)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1152)، وابن عساكر 66/ 325 من طريق محمد بن يونس القرشي الكُديمي، عن شريك بن عبد المجيد الحَنَفي، به. والكديمي ضعيف جدًّا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2015)


2015 - أخبرنا الإمام أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا هشام بن علي.وحدثنا أحمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي؛ قالا: حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا المبارك بن حسّان، عن عطاء، عن عائشة قالت: سُئل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: أيُّ الدعاء أفضلُ؟ قال: "دُعاءُ المرءِ لِنفسِه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: কোন্ দু'আ সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "ব্যক্তির নিজের জন্য করা দু'আ।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده فيه لين من أجل المبارك بن حسان، فقد اختُلف فيه، وثّقه ابن معين ويعقوب بن سفيان، وذكره ابن حبان وابنُ شاهين في "الثقات"، غير أنَّ ابن حبان قال: يخطئ ويخالف، وقال عبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الكبرى" 3/ 496: ثقة مشهور، وخالفهم آخرون، فقال ابن أبي خيثمة وأبو داود: منكر الحديث، وقال النسائي: ليس بالقوي في حديثه شيءٌ، وقال ابن عدي: روى أشياء غير محفوظة، وضعَّفه البيهقي في "شعب الإيمان" (9001)، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك" عند هذا الحديث: واهٍ. قلنا: وبالغ أبو الفتح الأزدي فقال: متروك الحديث لا يحتج به، يُرمَى بالكذب. وأعدَل الأقوال فيه قولُ الحافظ ابن حجر في "التقريب": ليِّن الحديث. ومعذلك حسَّن الحافظُ إسنادَ حديثه هذا في "زوائد مسند البزار" (2147) و (2148).وأخرجه البزار في "مسنده" كما في "كشف الأستار" للهيثمي (3173)، وأبو جعفر بن البَختَري في ستة مجالس له ضمن مجموع مصنفاته (128)، وأبو بكر بن لال في "أحاديث أبي عمران موسى بن هارون البزاز وغيره" (82)، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 211، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (654) من طرق عن موسى بن إسماعيل أبي سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (715)، والبزار (3174)، وأبو بكر الدِّينَوري في "المجالسة" (1567 م) من طريق عُبيد الله بن موسى، عن مبارك بن حسان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2016)


2016 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا عبد العزيز بن حاتم، حدثنا أبو وهب محمد بن مُزاحِم، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن مِسعَر، عن علي بن بَذِيمة، عن أبي عُبيدة، عن عبد الله، قال: أتى رجلٌ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، وأُراه عوفَ بنَ مالك، فقال: يا رسول الله، إنَّ بني فلانٍ أَغارُوا عليَّ، فذهَبوا بابني وإبِلي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ آلَ محمدٍ كذا وكذا أهلَ بيتٍ - وأظنُّه قال: تسعةَ أبياتٍ - ما فيهم صاعٌ من طعامٍ ولا مُدٌّ من طعامٍ، فاسألِ اللهَ عز وجل"، قال: فرجعَ إلى امرأته، فقالت له: ما ردَّ عليك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ فأخبَرَها، قال: فلم يَلبَثِ الرجلُ أن رُدَّ عليه إبِلُه وابنُه أوفَرَ ما كانوا، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبرَه، فقام على المِنبر، فحَمِدَ اللهَ وأثنى عليه، وأمرَهم بمسألةِ الله عز وجل والرغبةِ إليه، وقرأ عليهم: {وَمَنْ يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًا (2) وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ} [الطلاق: 2، 3] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট আগমন করলেন— আমার মনে হয়, তিনি ছিলেন আওফ ইবনু মালিক— এবং বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! অমুক গোত্রের লোকেরা আমার উপর আক্রমণ করেছে এবং আমার পুত্র ও আমার উটগুলো নিয়ে গেছে।’ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবার এত এত সংখ্যক ঘর— আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: নয়টি ঘর— তাদের কাছে এক সা' পরিমাণ খাদ্যও নেই, এক মুদ্দ পরিমাণ খাদ্যও নেই। তুমি পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর কাছে চাও (দু'আ করো)।" তিনি বললেন, এরপর লোকটি তার স্ত্রীর নিকট ফিরে গেল। স্ত্রী তাকে বলল, ‘আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনাকে কী উত্তর দিলেন?’ তখন সে তাকে সবকিছু জানাল। তিনি বললেন, এরপর লোকটি বেশিক্ষণ অপেক্ষা করল না, তার উটগুলো ও তার পুত্রকে এমন অবস্থায় ফিরিয়ে দেওয়া হলো যা ছিল পূর্বেকার চেয়েও বেশি। এরপর সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে তাঁকে খবর দিল। তখন তিনি মিম্বরে দাঁড়িয়ে আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন এবং তাদেরকে পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর কাছে চাওয়া এবং তাঁর প্রতি আগ্রহ রাখার নির্দেশ দিলেন এবং তাদের উপর তেলাওয়াত করলেন: "আর যে আল্লাহকে ভয় করে, আল্লাহ তার জন্য (সংকট থেকে) বের হওয়ার পথ তৈরি করে দেন। এবং তাকে রিযিক দেন এমন উৎস থেকে যা সে কল্পনাও করে না।" (সূরা তালাক: ২-৩)




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف في وصله وإرساله كما سيأتي بيانه، والصحيح هو المرسل كما قال الدارقطني في "العلل" (896)، على أنه على فرض صحته موصولًا يكون الإسناد منقطعًا، لأنَّ أبا عبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه. مِسعَر: هو ابن كِدام.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 106، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 47/ 249 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وقد خالف فيه محمدَ بنَ مُزاحم إسحاقُ بنُ إسماعيل الطالقاني، فقد أخرجه ابن أبي الدنيا في "الفرج بعد الشدة" (10)، ومن طريقه أبو علي التنوخي في "الفرج بعد الشدة" 1/ 87، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 107 من طريق إسحاق بن إسماعيل، عن سفيان بن عيينة، عن مِسعَر، عن علي بن بَذِيمة، عن أبي عبيدة مرسلًا، ليس فيه ذكر أبيه عبد الله بن مسعود. وإسحاق هذا قوي الحديث، وهو أحسنُ حالًا من محمد بن مُزاحم.ووافقه على إرساله جعفرُ بنُ عون فيما أخرجه عبد بن حميد كما في "اللآلئ المصنوعة" 2/ 117 عنه، عن مِسعَر بن كِدام، عن علي بن بَذِيمة، عن أبي عبيدة مرسلًا. وجعفر بن عون هذا ثقة.لكن أخرجه ابنُ الأعرابي في "معجمه" (978)، وأبو الحسن علي بن عمر العسكري في "مشيخته" (8) من طريق مؤمل بن إهاب، عن مالك بن سُعير، عن علي بن بَذِيمة، عن أبي عبيدة، عن أبيه، مختصرًا إلى قوله: "فاسأل الله عز وجل"، هكذا وصله مالك بن سُعير بذكر عبد الله بن مسعود. ووافقه على وصله مختصرًا أيضًا المسعوديُّ، فقد أخرجه ابن ماجه (4148) من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج الخولاني، عن عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، عن علي بن بَذِيمة، عن أبي عُبيدة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أصبح في آل محمد إلّا مُدٌّ من طعامٍ - أو ما أصبح في آل محمد مُدٌّ من طعام -"، فوصله بذكر عبد الله بن مسعود، لكن لا يُعرف ما إذا كان سماعُ أبي المغيرة من المسعودي قبل اختلاطه أو بعده.ويشهد لهذا الحديث حديثُ سالم بن أبي الجعد عن جابر بن عبد الله الآتي عند المصنف برقم (3862)، لكن الصحيح فيه الإرسال كما سيأتي بيانه هناك، وفيه مغايرة في بعض ألفاظه لرواية أبي عُبيدة.كما يشهد له مرسلُ السُّدِّي عند الطبري في "تفسيره" 28/ 138، ورجاله لا بأس بهم، وهو قريب من لفظ سالم بن أبي الجعد.ويشهد له أيضًا مرسل محمد بن إسحاق عند آدم بن أبي إياس في "الثواب" كما في "الإصابة" للحافظ ابن حجر 3/ 11، ومن طريقه أخرجه ابن الأثير في "أسد الغابة" 4/ 265، بنحو لفظ سالم بن أبي الجعد، غير أنه سمى الصحابيَّ صاحبَ القصة مالكًا الأشجعي، وأنَّ الذي أَسره العدو ابنُه عوف، قال ابن حجر: كأنه سقط منه "ابن" فكان في الأصل: جاء ابن مالك، فتوافق الروايات الأُخرى. لكن انفرد به عن ابن إسحاق رجلٌ اسمه عبد الله بن الوليد، ولا يُعرف من هو.وروي أيضًا مثل هذه القصة من حديث ابن عباس عند الخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 118 - 119، ومن طريقه أخرجه ابن الجوزي في "الموضوعات" (1194)، لكن فيه رجل كذّاب وآخر متروك.وعلي أي حالٍ فيمكن تحسين الخبر بلفظ مرسلَي سالم بن أبي الجعد والسُّدِّي، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2017)


2017 - حدثنا إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حدثنا جدِّي، أخبرنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدثنا عُبيد الله بن محمد بن حُنين، حدثني عَبد الله [1] بن محمد بن جابر بن عبد الله، عن أبيه، عن جده، قال: جاء رجلٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: وا ذُنُوباه وا ذُنُوباه، فقال هذا القولَ مرتَين أو ثلاثًا، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قل: اللهمَّ مَغفرتُك أوسعُ من ذُنوبي، ورحمتُك أرجَى عندي من عَمَلي"، فقالها، ثم قال: "عُدْ" فعادَ، ثم قال: "عُدْ" فعادَ، فقال: "قُم، فقد غَفَر اللهُ لك" [2].حديث رُواتُه عن آخرهم مَدنيُّون ممَّن لا يُعرَف واحدٌ منهم بجَرْحٍ، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বললো: "হায় আমার গুনাহ! হায় আমার গুনাহ!" সে এই কথা দুইবার বা তিনবার বললো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি বলো: 'আল্লাহুম্মা মাগফিরাতুক আওসা‘উ মিন যুনূবী, ওয়া রাহমাতুক আরজা ‘ইনদী মিন ‘আমালী' (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আপনার ক্ষমা আমার গুনাহের চেয়েও প্রশস্ত, আর আপনার দয়া আমার আমলের চেয়েও আমার কাছে অধিক কাঙ্ক্ষিত)।" লোকটি তা বললো। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আবার বলো।" সে আবার বললো। তিনি আবার বললেন: "আবার বলো।" সে আবার বললো। তখন তিনি বললেন: "ওঠো, আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করে দিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز) و (ب): عُبيد الله مصغرًا، وسقط الاسم من (ص) و (ع)، والمثبت بالتكبير من "شعب الإيمان" للبيهقي، حيث روى هذا الخبر عن أبي عبد الله الحاكم، وجاء على الصواب مكبّرًا في "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر 3/ (3114)، وكذلك سُمِّي مكبَّرًا في خبرٍ ذكره ابن أبي حاتم في "العلل" (1878).



[2] إسناده ضعيف لجهالة عُبيد الله بن محمد بن حُنين، وسُمِّي في بعض الروايات عُبيد الله بن عبد الله بن محمد بن حُنين، وجهالة عبد الله بن محمد بن جابر بن عبد الله.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (6724) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. يُحسِن الذهبي رحمه الله في "تلخيصه" إذِ اقتصر على قوله: فَضّال ليس بشيء؛ فإنَّ موسى أشد ضعفًا من فَضَّال.وفي الباب عن أبي هريرة موقوفًا عليه عند أبي بكر الدِّينوري في "المجالسة" (3101)، وأبي الشيخ في "الثواب" كما في "الغرائب الملتقطة من مسند الفردوس" لابن حجر (655)، بلفظ: ألحَّ رجلٌ في الدعاء: يا أرحم الراحمين، نودي: أن قد سُمعت، فما حاجتُك؟ وإسناده ضعيف، فيه ضعيفٌ ومجهولان.وعن أبي عُمر الصنعاني حفص بن ميسرة مرسلًا عند ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (523) يذكر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ في السماء ملكًا يُقال له: اليسع، فإذا قال العبد: يا أرحم الراحمين، سبع مرات، قال له اليسع: قد سُمع قولك فاذكر حاجتك". ورجاله ثقات لكنه معضل، لأنَّ حفصًا هذا من أتباع التابعين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2018)


2018 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدنيا، حدثني محمد بن سَهْل بن عَسكَر، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا نافع بن يزيد، حدثني يحيى بن أبي أُسَيد، عن الفضل بن عيسى، عن عمِّه، عن أنس بن مالك، قال: مرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم برجل وهو يقولُ: يا أرحمَ الراحمين، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سَلْ، فقد نَظَر اللهُ إليك" [1].الفضل بن عيسى: هو الرَّقَاشي، وأخشى أن يكون عمُّه يزيدَ بنَ أبان [2]، إلَّا أني قد وجدتُ له شاهدًا من حديث أبي أُمامة الباهِلي.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে বলছিল: ‘ইয়া আরহামার-রাহিমীন’ (হে দয়ালুদের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “চাও, কেননা আল্লাহ অবশ্যই তোমার প্রতি দৃষ্টি দিয়েছেন (তোমার ডাকে সাড়া দিয়েছেন)।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف الفضل بن عيسى: وهو ابن أبان الرَّقَاشي، وضعف عمه: وهو يزيد بن أبان الرَّقَّاشي، ولهذا قال الذهبي في "تلخيصه": لم يصحّ هذا. قلنا: وله شواهد لا يعتدُّ بها بتاتًا، سنذكرها عند حديث أبي أمامة الذي يليه، فإنها أقرب إلى لفظه. يُحسِن الذهبي رحمه الله في "تلخيصه" إذِ اقتصر على قوله: فَضّال ليس بشيء؛ فإنَّ موسى أشد ضعفًا من فَضَّال.وفي الباب عن أبي هريرة موقوفًا عليه عند أبي بكر الدِّينوري في "المجالسة" (3101)، وأبي الشيخ في "الثواب" كما في "الغرائب الملتقطة من مسند الفردوس" لابن حجر (655)، بلفظ: ألحَّ رجلٌ في الدعاء: يا أرحم الراحمين، نودي: أن قد سُمعت، فما حاجتُك؟ وإسناده ضعيف، فيه ضعيفٌ ومجهولان.وعن أبي عُمر الصنعاني حفص بن ميسرة مرسلًا عند ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (523) يذكر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ في السماء ملكًا يُقال له: اليسع، فإذا قال العبد: يا أرحم الراحمين، سبع مرات، قال له اليسع: قد سُمع قولك فاذكر حاجتك". ورجاله ثقات لكنه معضل، لأنَّ حفصًا هذا من أتباع التابعين.



[2] هو عمُّه قطعًا. يُحسِن الذهبي رحمه الله في "تلخيصه" إذِ اقتصر على قوله: فَضّال ليس بشيء؛ فإنَّ موسى أشد ضعفًا من فَضَّال.وفي الباب عن أبي هريرة موقوفًا عليه عند أبي بكر الدِّينوري في "المجالسة" (3101)، وأبي الشيخ في "الثواب" كما في "الغرائب الملتقطة من مسند الفردوس" لابن حجر (655)، بلفظ: ألحَّ رجلٌ في الدعاء: يا أرحم الراحمين، نودي: أن قد سُمعت، فما حاجتُك؟ وإسناده ضعيف، فيه ضعيفٌ ومجهولان.وعن أبي عُمر الصنعاني حفص بن ميسرة مرسلًا عند ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (523) يذكر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ في السماء ملكًا يُقال له: اليسع، فإذا قال العبد: يا أرحم الراحمين، سبع مرات، قال له اليسع: قد سُمع قولك فاذكر حاجتك". ورجاله ثقات لكنه معضل، لأنَّ حفصًا هذا من أتباع التابعين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2019)


2019 - حدَّثَناهُ أبو بكر محمد بن عبد الله العُمَاني، حدثنا موسى بن زكريا التُّسْتَري، حدثنا كامل بن طلحة، حدثنا فَضّال بن جُبير، عن أبي أُمامة، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ لله مَلَكًا موكَّلًا بمن يقول: يا أرحمَ الراحمين، فمن قالها ثلاثًا قال له الملَك: إِنَّ أرحمَ الراحمينَ قد أقبلَ عليك فاسألْ" [1].




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহর একজন ফেরেশতা নিযুক্ত আছেন সেই ব্যক্তির জন্য, যে 'ইয়া আরহামার-রাহিমীন' (হে সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু) বলে। যে ব্যক্তি তা তিনবার বলে, ফেরেশতা তাকে বলেন: 'নিশ্চয়ই সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু তোমার প্রতি মনোযোগ দিয়েছেন, সুতরাং (এখন) তুমি চাও'।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده واهٍ بمرة من أجل موسى بن زكريا التُّستَري وفضّال بن جبير، فهما متروكان، ولم يُحسِن الذهبي رحمه الله في "تلخيصه" إذِ اقتصر على قوله: فَضّال ليس بشيء؛ فإنَّ موسى أشد ضعفًا من فَضَّال.وفي الباب عن أبي هريرة موقوفًا عليه عند أبي بكر الدِّينوري في "المجالسة" (3101)، وأبي الشيخ في "الثواب" كما في "الغرائب الملتقطة من مسند الفردوس" لابن حجر (655)، بلفظ: ألحَّ رجلٌ في الدعاء: يا أرحم الراحمين، نودي: أن قد سُمعت، فما حاجتُك؟ وإسناده ضعيف، فيه ضعيفٌ ومجهولان.وعن أبي عُمر الصنعاني حفص بن ميسرة مرسلًا عند ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (523) يذكر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ في السماء ملكًا يُقال له: اليسع، فإذا قال العبد: يا أرحم الراحمين، سبع مرات، قال له اليسع: قد سُمع قولك فاذكر حاجتك". ورجاله ثقات لكنه معضل، لأنَّ حفصًا هذا من أتباع التابعين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2020)


2020 - حدثنا عُبيد الله [1] بن محمد الخُراساني ببغداد في القَطِيعة، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثنا معاوية بن صالح، عن أبي عامر الأَلْهاني، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن سَرَّه أَن يُستجابَ له عند الكُرَب والشّدائد، فليُكثِرِ الدعاءَ في الرَّخاءِ" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . حديث صحيح الإسناد، احتجَّ البخاري بأبي صالح، وأبو عامر الألْهاني أظنُّه الهَوْزَني [3]، وهو صدوق [4].حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً غُرةَ صفرٍ سنة سبعٍ وتسعين وثلاث مئة:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি চায় যে তার দু'আ যেন তীব্র কষ্ট ও সংকটের সময় কবুল করা হয়, সে যেন স্বাচ্ছন্দ্যের সময় অধিক পরিমাণে দু'আ করে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في أصول "المستدرك" إلى: عبد الله، مكبّرًا، وقد روى المصنِّف لهذا الشيخ عدة روايات كل ذلك يسميه عُبيد الله، مصغرًا، ومن ثمّ صوبناه هنا، وقد جاء هنا على الصواب في أصل "إتحاف المهرة" للحافظ 16/ (20701)، وتصرّف محققه فأثبت خلاف ما في أصله الخطي اعتمادًا على التحريف الذي وقع في أصول "المستدرك"، فلم يُحسِن، وقد روى هذا الخبر ابن النجار في "الذيل على تاريخ بغداد" (365) من طريق المصنِّف، فسمّاه علي الصواب: عُبيد الله بن محمد بن عبد الرحمن الخُراساني. كذا زاد في نسبته عبد الرحمن. معاوية بن صالح وخُليد، ولكنه تابعيٌّ لا يُعرف بجرح، فحديثه محتمل للتحسين إن شاء الله، خصوصًا وإنه متابع، فقد روي هذا الحديث ومن وجه آخر عن أبي هريرة بإسنادٍ حسنٍ. وعبد الله بن صالح - وهو أبو صالح كاتب الليث بن سعد - يُقبل حديثُه في المتابعات والشواهد، وللحديث شاهد صحيح من حديث ابن عباس.وأخرجه ابن النجار في "الذيل على تاريخ بغداد" (365) من طريق أحمد بن علي بن عبد الله الشيرازي، عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (44)، وفي "مسند الشاميين" (2004) عن بكر بن سهل الدِّمياطي، وفي "الدعاء" أيضًا (44) عن مطَّلب بن شعيب، كلاهما عن عبد الله بن صالح، به. لكن تصرَّف محققُ كتاب "مسند الشاميين" بتغيير أبي عمران إلى أبي عامر، مع أنَّ الاسم جاء في الأصلين المخطوطين اللذين اعتمدهما بإفادته هو نفسُه: أبو عمران، بما يتفق مع رواية الطبراني في "الدعاء"، وقد أخرجه عبد الغني المقدسي في كتاب الدعاء من كتابه الكبير "نهاية المراد من كلام خير العباد" من طريق الطبراني فسُمِّي التابعيَّ أبا عمران، فهو الصواب في رواية الطبراني جزمًا.وأخرجه الترمذي (3382)، وأبو يعلى (6396)، والطبراني في "الدعاء" (45)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 352، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1331)، وعبد الغني المقدسي في كتاب الدعاء من كتابه الكبير "نهاية المراد" (31) من طريق عُبيد بن واقد، عن سعيد بن عطية الليثي، وأبو يعلى (6397) من طريق أبي بشر جعفر بن إياس، كلاهما عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: هذا حديث غريب. قلنا: إسناد أبي يعلى من طريق أبي بشر حسنٌ إن شاء الله.وأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخه" 2/ 313 و 9/ 382، ومن طريقه ابنُ الجوزي في "العلل المتناهية" (1410) من طريق روح بن مسافر، عن أبان بن أبي عياش، عن أبي صالح ذكوان السمان، عن أبي هريرة. وروح وأبان متروكان.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 414 من طريق حبيب بن أبي حبيب كاتب مالك، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة. ولكن حبيبًا هذا متروك متهم.وأخرجه بمعناه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1365) من طريق عبد الله بن داود الواسطي، عن أبي الزِّناد، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "تعرَّفْ إلى الله في الرخاء، يعرفك في الشدة"، وعبد الله بن داود الواسطي ضعيف الحديث. ويشهد له بمثل لفظ عبد الله بن داود الواسطي حديثُ عبد الله بن عباس عند أحمد 5/ (2803) وغيره بإسناد حسن، وسيأتي عند المصنف من طريق عن ابن عباس برقم (6436) و (6437)، والحديث صحيح بطرقه.



[2] حديث حسن، وهذا إسناد محتمل للتحسين. أبو عامر الألهاني كذا سُمِّي في رواية المصنِّف، وسُمِّي في رواية غيره أبا عمران الألهاني، وبه ترجم البخاري في الكنى من "تاريخه الكبير" 9/ 60، وهذا رجل آخر غير أبي عامر الألهاني، وأبو عامر اسمه عبد الله بن غابر، وهو رجل ثقة، وأما أبو عمران هذا فتابعي لا يُعرف روى عنه غير معاوية بن صالح الحضرمي وخليد بن دعلج وقيل: خليد بن جعفر، وما ذكره البخاري في ترجمته من أنَّ أرطاة بن المنذر قد روى عن أبي عمران أيضًا، فتعقّبه ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" بأنَّ البخاري روى عنه أرطاة هو أبو عامر الألهاني، وهو كما قال ابن أبي حاتم، فبقي أنَّ الرواة عن أبي عمران هما معاوية بن صالح وخُليد، ولكنه تابعيٌّ لا يُعرف بجرح، فحديثه محتمل للتحسين إن شاء الله، خصوصًا وإنه متابع، فقد روي هذا الحديث ومن وجه آخر عن أبي هريرة بإسنادٍ حسنٍ. وعبد الله بن صالح - وهو أبو صالح كاتب الليث بن سعد - يُقبل حديثُه في المتابعات والشواهد، وللحديث شاهد صحيح من حديث ابن عباس.وأخرجه ابن النجار في "الذيل على تاريخ بغداد" (365) من طريق أحمد بن علي بن عبد الله الشيرازي، عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (44)، وفي "مسند الشاميين" (2004) عن بكر بن سهل الدِّمياطي، وفي "الدعاء" أيضًا (44) عن مطَّلب بن شعيب، كلاهما عن عبد الله بن صالح، به. لكن تصرَّف محققُ كتاب "مسند الشاميين" بتغيير أبي عمران إلى أبي عامر، مع أنَّ الاسم جاء في الأصلين المخطوطين اللذين اعتمدهما بإفادته هو نفسُه: أبو عمران، بما يتفق مع رواية الطبراني في "الدعاء"، وقد أخرجه عبد الغني المقدسي في كتاب الدعاء من كتابه الكبير "نهاية المراد من كلام خير العباد" من طريق الطبراني فسُمِّي التابعيَّ أبا عمران، فهو الصواب في رواية الطبراني جزمًا.وأخرجه الترمذي (3382)، وأبو يعلى (6396)، والطبراني في "الدعاء" (45)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 352، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1331)، وعبد الغني المقدسي في كتاب الدعاء من كتابه الكبير "نهاية المراد" (31) من طريق عُبيد بن واقد، عن سعيد بن عطية الليثي، وأبو يعلى (6397) من طريق أبي بشر جعفر بن إياس، كلاهما عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: هذا حديث غريب. قلنا: إسناد أبي يعلى من طريق أبي بشر حسنٌ إن شاء الله.وأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخه" 2/ 313 و 9/ 382، ومن طريقه ابنُ الجوزي في "العلل المتناهية" (1410) من طريق روح بن مسافر، عن أبان بن أبي عياش، عن أبي صالح ذكوان السمان، عن أبي هريرة. وروح وأبان متروكان.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 414 من طريق حبيب بن أبي حبيب كاتب مالك، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة. ولكن حبيبًا هذا متروك متهم.وأخرجه بمعناه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1365) من طريق عبد الله بن داود الواسطي، عن أبي الزِّناد، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "تعرَّفْ إلى الله في الرخاء، يعرفك في الشدة"، وعبد الله بن داود الواسطي ضعيف الحديث. ويشهد له بمثل لفظ عبد الله بن داود الواسطي حديثُ عبد الله بن عباس عند أحمد 5/ (2803) وغيره بإسناد حسن، وسيأتي عند المصنف من طريق عن ابن عباس برقم (6436) و (6437)، والحديث صحيح بطرقه.



2020 [3] - قال المصنف ذلك بناءً على ما وقع له من كون التابعي أبا عامر، وقد قرَّرنا أنَّ الألهانيَّ في هذا الإسناد إنما هو أبو عمران لا أبو عامر، على أنه على فرض كونه هنا أبا عامر الألْهاني فهو عبد الله بن غابر، وأما الهَوزَني فهو رجلٌ آخر اسمُه عبد الله بن لُحيّ، ولا يُعرف لمعاوية بن صالح رواية عن الهَوزَني أصلًا.



2020 [4] - جاء في (ز) بعد هذا ما نصه: آخر المجلدة الأولى المنقول هذا منها، والحمد لله رب العالمين وصلواته على سيدنا محمد وآله وصحبه أجمعين بسم الله الرحمن الرحيم.