হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2021)


2021 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرْو، حدثنا محمد بن عيسى الطَّرَسُوسى.وحدثنا أحمد بن سلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي.وحدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني؛ قالوا: حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثنا أحمد بن محمد بن داود الصَّنْعاني، أخبرني أفلَحُ بن كثير، حدثنا ابنُ جُريج، عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جدِّه، قال: نزل جبريلُ عليه السلام إلى النبي صلى الله عليه وسلم بهذا الدعاء من السماء، وإنَّ جبريل جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في أحسنِ صُورة لم يَنزلْ في مثلِها قطُّ ضاحكًا مُستبشرًا، فقال: السلام عليك يا محمدُ، قال: "وعليك السلامُ يا جبريلُ"، قال: إِنَّ الله بعثني إليك بهديةٍ، قال: "وما تلك الهديةُ يا جبريلُ؟ " قال: كلماتٌ من كُنوز العرشِ، أكرمَك اللهُ بهنّ، قال: وما هنّ يا جبريلُ؟ قال: فقال جبريلُ: قُل: يا مَن أظهرَ الجَميلَ، وسَتَر القَبيحَ، يا مَن لا يُؤاخِذُ بالجَرِيرةِ، ولا يَهتِكُ السِّتْر، يا عظيمَ العَفْو، يا حَسَنَ التَّجاوُزِ، يا واسعَ المغفرةِ، يا باسِطَ اليَدين بالرحمةِ، يا صاحبَ كُلِّ نَجْوى، ويا مُنتهى كلِّ شَكْوى، يا كريمَ الصَّفْح، يا عظيمَ المَنِّ، يا مُبتدئَ النِّعَم قبل استحقاقِها، يا ربَّنا ويا سيدَنا ويا مَولانا، ويا غايةَ رَغبتِنا، أسألُك يا اللهُ أن لا تَشوِيَ خَلْقي بالنار"، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فما ثَواب هذه الكلماتِ؟ " ثم ذكر باقيَ الحديث بعد الدعاء بطُوله [1].هذا حديث صحيح الإسناد، فإنَّ رواته كلهم مدنيون ثِقات، وقد ذكرتُ فيما تقدَّم الخلافَ بين أئمة الحديث في سماع شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو من جَدِّه.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর দাদার সূত্রে বলেন, জিবরীল (আঃ) এই দু'আ নিয়ে আকাশ থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অবতরণ করলেন। জিবরীল (আঃ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন সুন্দর রূপে এসেছিলেন, এমন হাসি-খুশি ও আনন্দিত অবস্থায় তিনি এর আগে কখনো অবতরণ করেননি। তিনি (জিবরীল) বললেন: "আসসালামু আলাইকা ইয়া মুহাম্মাদ।" তিনি (নবী) বললেন: "ওয়া আলাইকাস সালামু ইয়া জিবরীল।" তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলা আপনার নিকট একটি উপহার পাঠিয়েছেন।" তিনি (নবী) বললেন: "হে জিবরীল, সেই উপহারটি কী?" তিনি বললেন: "আরশের ভান্ডারসমূহের অন্তর্ভুক্ত কিছু বাক্য, যার মাধ্যমে আল্লাহ আপনাকে সম্মানিত করেছেন।" তিনি বললেন: "হে জিবরীল, সেই বাক্যগুলো কী?"

জিবরীল (আঃ) বললেন: আপনি বলুন: "ইয়া মান আযহারাল জামিলা, ওয়া সাতারাল কাবীহা, ইয়া মান লা ইউয়াখিযু বিল জারীরাহ, ওয়া লা ইয়াহতিকুস সিতর। ইয়া আযীমাল আফউ, ইয়া হাসনাত তাজাওউয, ইয়া ওয়াসিআল মাগফিরাহ, ইয়া বাসিতাল ইয়াদাইনি বির-রাহমাহ, ইয়া সাহিবা কুল্লি নাজওয়া, ওয়া ইয়া মুনতাহা কুল্লি শাকওয়া, ইয়া কারীমাস সাফহ, ইয়া আযীমাল মান, ইয়া মুবতিদিয়ান নিআম কাবলা ইসতিহকাকিহা। ইয়া রব্বানা ওয়া ইয়া সাইয়্যিদানা ওয়া ইয়া মাওলানাও ওয়া ইয়া গায়াতা রগবাতিনা, আসআলুকা ইয়া আল্লাহু আন লা তাশউইয়া খালকী বিন নার।" (অর্থাৎ: হে তিনি, যিনি সুন্দরকে প্রকাশ করেন এবং মন্দকে গোপন করেন! হে তিনি, যিনি অপরাধের জন্য পাকড়াও করেন না এবং পর্দা উন্মোচন করেন না! হে মহান ক্ষমাকারী! হে সুন্দরভাবে মার্জনাদানকারী! হে প্রশস্ত ক্ষমাশীল! হে রহমত বিতরণের জন্য দু’হাত প্রসারিতকারী! হে প্রতিটি গোপন কথার মালিক! হে প্রতিটি অভিযোগের চরম আশ্রয়স্থল! হে সম্মানজনকভাবে ক্ষমাকারী! হে মহা অনুগ্রহশীল! হে তিনি, যিনি যোগ্য হওয়ার পূর্বেই নেয়ামত দান শুরু করেন! হে আমাদের রব! হে আমাদের সাইয়্যিদ! হে আমাদের মাওলা! হে আমাদের চরম আকাঙ্খার লক্ষ্য! হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট প্রার্থনা করি যে, আপনি যেন আমার সৃষ্টিকে জাহান্নামের আগুনে দগ্ধ না করেন।)

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে এই বাক্যগুলোর প্রতিদান কী?" অতঃপর তিনি দু'আর পর অবশিষ্ট হাদিসটি বিস্তারিতভাবে উল্লেখ করেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل أحمد بن محمد بن داود الصَّنعاني، فقد اتهمه الذهبي في "الميزان" بهذا الحديث مُتعقِّبًا الحاكمَ في تصحيحه وتوثيق رجاله. وقال الحافظ في "اللسان": قد جوّزتُ في ترجمة أحمد بن عبد الله ابن أخت عبد الرزاق أنه هذا، فإنَّ أحد ما قيل فيه: إنه أحمد بن داود، فكأنه نُسب إلى جده، وقد تقدَّم النقلُ عمَّن نسبه إلى الكذب. وقال الذهبي في "الميزان": وأما أفلحُ فذكره ابن أبي حاتم ولم يضعفه. قلنا: سماه ابن أبي حاتم أفلح بن كثير بن عبد الله بن فيروز الصنعاني، وذكر في الرواة عنه أبا زياد حماد بن زاذان.وأخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (238) عن أبي عبد الله الحاكم، بأسانيده الثلاثة.وفي الباب عن ابن عباس عن أبي بن كعب عند العقيلي في "الضعفاء الكبير" (526)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (90)، والخطيب في "المتفق والمفترق" (609)، وإسناده ضعيف. ويشهد للفظه هنا حديث أبي هريرة عند البيهقي في "الأسماء والصفات" (274)، وفي "الدعوات الكبير" (375)، ورجاله لا بأس بهم، لكن فيه انقطاعٌ لأنَّ راويه عن أبي هريرة لا يُدركُه، وقد أرسلَه مرةً فلم يذكر أبا هريرة كما أخرجه علي بن حُجر السَّعْدي في "أحاديث إسماعيل بن جعفر" (370)، ومن طريقه أخرجه البغوي في "شرح السنة" (1379)، فالإسناد ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2022)


2022 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا عيسى بن ميمون، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما يَمنعُ أحدَكم إذا عرَفَ الإجابةَ من نفسِه، فشُفِيَ من مرض أو قَدِمَ من سفر يقول: الحمدُ لله الذي بعِزّتِه وجلالِه تَتِمُّ الصالحاتُ" [1]. تفرَّد عيسى بن ميمون عن القاسم بن محمد، وعيسى غيرُ مُتَّهم بالوضع.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: “তোমাদের মধ্যে কেউ যখন নিশ্চিত হয় যে তার প্রার্থনা কবুল হয়েছে, অথবা সে রোগমুক্ত হয়েছে, কিংবা সে সফর থেকে ফিরেছে—তখন তাকে কীসে বিরত রাখে যে সে বলবে: ‘সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যাঁর মর্যাদা ও মহত্ত্বের মাধ্যমে সৎকর্মসমূহ পূর্ণতা লাভ করে’।” (আরবি দুআটি হলো: আলহামদু লিল্লাহিল্লাযী বি-ইজ্জাতিহি ওয়া জালালিহি তাতিম্মুস সালিহাত)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده واهٍ بمرةٍ من أجل عيسى بن ميمون - وهو مولى القاسم بن محمد بن أبي بكر الصدِّيق - فهو متروك منكر الحديث. ولم يتكلم عليه الذهبي في "تلخيصه" هنا، لكنه تكلَّم عليه عند الحديث المتقدِّم قريبًا برقم (2010)، فوصفه بأنه متَّهم. وقد تقدَّم معناه من وجه آخر عن عائشة برقم (1861) بإسناد أصلح من هذا، وله شواهد بمثل لفظه يحسُن بها إن شاء الله كما نبهنا عليه هناك. ويشهد للفظه هنا حديث أبي هريرة عند البيهقي في "الأسماء والصفات" (274)، وفي "الدعوات الكبير" (375)، ورجاله لا بأس بهم، لكن فيه انقطاعٌ لأنَّ راويه عن أبي هريرة لا يُدركُه، وقد أرسلَه مرةً فلم يذكر أبا هريرة كما أخرجه علي بن حُجر السَّعْدي في "أحاديث إسماعيل بن جعفر" (370)، ومن طريقه أخرجه البغوي في "شرح السنة" (1379)، فالإسناد ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2023)


2023 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدُّنيا، حدثنا الحسن بن الصبّاح وغيرُه، قالوا: حدثنا زيد بن الحُباب، حدثني عثمان بن عبد الله بن مَوهَب، قال: سمعت أنسَ بن مالك يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لفاطمةَ: "ما يمنعُكِ أن تَسمَعي ما أُوصيكِ به، أن تقولي إذا أصبَحتِ وإذا أمسَيتِ: يا حيُّ يا قيّومُ برحمتِك أستغيثُ، أصلِحْ لي شأني كلَّه، ولا تَكِلْني إلى نفسي طَرْفَةَ عَينٍ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমাকে বললেন: "কী তোমাকে বারণ করছে যে তুমি শুনবে না যা আমি তোমাকে উপদেশ দিচ্ছি? তুমি যখন সকালে উপনীত হবে এবং যখন সন্ধ্যায় উপনীত হবে, তখন তুমি বলবে: ‘ইয়া হাইয়্যু ইয়া কাইয়্যুমু বিরাহমাতিকা আস্তাগীছু, আসলিহ লী শা’নী কুল্লাহু, ওয়ালা তাকিলনী ইলা নাফসী তারফাতা আইনিন’ (অর্থাৎ: হে চিরঞ্জীব, হে সর্বসত্তার ধারক, আমি আপনার রহমতের মাধ্যমে সাহায্য প্রার্থনা করি, আমার সমস্ত বিষয়াদি আপনি ঠিক করে দিন এবং আমাকে এক মুহূর্তের জন্যও আমার নিজের ওপর ছেড়ে দেবেন না)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كما قال الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (2121). وعثمان الراوي عن أنس إنما هو عثمان بن مَوهَب، وهو رجل كوفي قال عنه أبو حاتم الرازي: صالح الحديث، وليس هو بعثمان بن عبد الله بن موهب البصري كما قال المزيُّ في "تهذيب الكمال" 19/ 499، والحافظُ في "فتح الباري" 11/ 114، وسبقهما إلى التفريق بينهما ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" حيث ذكر الترجمتين 6/ 155 و 169، وعليه فتقييده في هذا الحديث عند المصنف بابن عبد الله بن مَوهَب خطأٌ، ومما يؤيد صحته أنَّ عثمان بن موهب قُيِّد في بعض روايات هذا الحديث بالهاشمي وبمولى بني هاشم، في حين أنَّ عثمان بن عبد الله بن مَوهَب مولًى لبني تَيْم.وأخرجه النسائي (10330) عن عبد الرحمن بن محمد بن سلَّام، عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي بكرة الثقفي عند أحمد 34/ (20430)، وأبي داود (5090)، والنسائي (10412) بلفظ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "دعاء المكروب: اللهم رحمتك أرجو، فلا تكلني إلى نفسي طَرفة عين، وأصلح لي شأني كله، لا إله إلّا أنت". وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2024)


2024 - أخبرنا أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا أحمد بن زُهير بن حرب، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا خَلَف بن المُنذر، حدثنا بكر بن عبد الله المُزَنِي، عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن قال إذا أوى إلى فِراشِه: الحمدُ لله الذي كَفاني وآواني، الحمدُ لله الذي أطعَمَني وسَقَاني، الحمدُ لله الذي مَنَّ عَلَيَّ فأفضَلَ، اللهمَّ إني أسألُك بعِزّتِك أن تُنجِّيَني من النارِ، فقد حَمِدَ اللهَ بجميعِ مَحامِدِ الخَلْقِ كُلِّهم" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার বিছানায় যাওয়ার সময় বলে: 'সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাকে যথেষ্ট করেছেন এবং আশ্রয় দিয়েছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাকে খাবার ও পানীয় দান করেছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমার প্রতি অনুগ্রহ করেছেন এবং বড়ত্ব দান করেছেন। হে আল্লাহ! আমি আপনার ইজ্জতের (ক্ষমতার) মাধ্যমে আপনার কাছে প্রার্থনা করি যে, আপনি যেন আমাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন।' – সে যেন আল্লাহ তাআলার প্রশংসা করল সকল সৃষ্টির সকল প্রশংসার মাধ্যমে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح من فعله صلى الله عليه وسلم، وهذا إسناد حسنٌ من أجل خلف بن المنذر، فقد روى عنه موسى بن إسماعيل - وهو التَّبُوذكي - ومسلم بن إبراهيم الفراهيدي، وهما حافظان كبيران، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال: روى عنه موسى بن إسماعيل وأهلُ بلده، فمثله يكون حَسَنَ الحديث، على أنه روي مثلُ حديثه هذا مختصرًا من وجه آخر عنه أنس، وبنحوه تامًّا من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب.وأخرجه ضياء الدين المقدسي في "الأحاديث المختارة" 4/ (1574) من طريق أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4072)، وضياء الدين المقدسي في "المنتقى من مسموعات مرو" (8) من طريقين عن موسى بن إسماعيل، به.وأخرج أحمد 20/ (12552) و (12712) و 21/ (13653)، ومسلم (2715)، وأبو داود (505)، والترمذي (3396)، والنسائي (10567)، وابن حبان (5540) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا أوى إلى فراشه قال: "الحمد لله الذي أطعمنا وسقانا، وكفانا وآوانا، فكم ممن لا كافي له ولا مؤوي"، كذا جعله حكايةً لدعائه صلى الله عليه وسلم بذلك.ويشهد له بمثل لفظ بكر المزني عن أنسٍ، غير أنه بحكاية دعائه صلى الله عليه وسلم بذلك أيضًا: حديثُ عبد الله بن عمر بن الخطاب عند أحمد 10/ (5983)، وأبي داود (5058)، والنسائي (7647) و (10566)، وابن حبان (5538): أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول إذا أخذ مضجعه: "الحمد لله الذي كفاني، وآواني وأطعمني وسقاني، والذي مَنَّ عَليَّ وأفضَلَ، والذي أعطاني فأجزل، الحمد لله على كل حالٍ، اللهمَّ ربَّ كل شيء وملكَ كل شيء، وإله كل شيء، ولك كل شيء، أعوذ بك من النار". وإسناده صحيح، واللفظ المذكور لأحمد وابن حبان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2025)


2025 - أخبرنا علي بن عبد الرحمن السَّبيعي بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا خالد بن مَخلَد، حدثنا يوسف بن عبد الرحمن، حدثني سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أتى أحدُكم فِراشَه فليقُل: اللهمَّ ربَّ السماوات وربَّ الأرض، ربَّنا وربَّ كلِّ شيء أنت آخِذٌ بِناصِيَتِه، أنتَ الأولُ فليس قبلَك شيءٌ، وأنت الآخِرُ فليس بعدَك شيءٌ [1]، وأنت الباطِنُ فليس دُونَك شيءٌ، أغنِنا مِن الفقرِ واقضِ عنا الدَّين" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه [3]، ويوسُف هذا هو الذي يقال له: مولى سُكّرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার বিছানায় যায়, তখন সে যেন বলে: হে আল্লাহ! হে আসমানসমূহের প্রতিপালক, হে যমীনের প্রতিপালক, হে আমাদের প্রতিপালক এবং সকল কিছুর প্রতিপালক! আপনিই সে সত্তা, যিনি সবকিছুর কপাল ধরে আছেন। আপনিই আদি, আপনার পূর্বে কোনো কিছু ছিল না; আর আপনিই শেষ, আপনার পরে কোনো কিছু থাকবে না। আর আপনিই বাত্বিন (গুপ্ত), আপনার বাইরে কিছু নেই। আমাদেরকে অভাব থেকে মুক্তি দিন এবং আমাদের ঋণ পরিশোধের ব্যবস্থা করে দিন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في سائر مصادر تخريج الحديث في هذا الدعاء زيادة: "وأنت الظاهر فليس فوقك شيءٌ".



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة يوسف بن عبد الرحمن مولى سُكّرة، وذكر ابنُ عديّ في "الكامل" 3/ 35 أنَّ لخالد بن مخلد - وهو القَطَواني - عنه نسخةً يرويها عن العلاء بن عبد الرحمن الحُرَقي مولاهم. وفي طبقته رجلٌ بهذا الاسم ذكره ابنُ أبي حاتم في "الجرح والتعديل"، وذكر عن أبيه أبي حاتم أنه حدَّث بحديثين كذبٍ لا أصل لهما، ولعله يكون هو نفسُه، والله أعلم. وعلى أي حالٍ فهو متابَع.وأخرجه بتمامه أحمد 14/ (8960) و 15/ (9247) و 16/ (1924)، ومسلم (2713)، وأبو داود (5051)، وابن ماجه (3873)، والترمذي (3400)، والنسائي (7621) و (7667) و (10558)، وابن حبان (5537) من طرق عن سهيل بن أبي صالح، به. وبعضهم يجعله من دعائه صلى الله عليه وسلم هو نفسُه بذلك.وسيأتي برقم (4796) من طريق سليمان الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة.وأخرجه بتمامه أيضًا مسلم (2713)، وابن ماجه (3831)، والترمذي (3481)، والنسائي (7622)، وابن حبان (966) من طريق سليمان الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: أتت فاطمةُ النبيَّ تسأله خادمًا، فقال لها: "قولي: اللهم رب السماوات … " فذكر الدعاء بمثل رواية سهيل عن أبيه.



2025 [3] - بل قد أخرجه مسلم كما تقدم، ونبَّه على ذلك الذهبي في "تلخيصه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2026)


2026 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدُّنيا، حدثنا عبد الأعلى بن حماد وأزهَر بن مروان البصريان، أنَّ بشر بن منصور السَّلِيمي [1] حدَّثهم عن زُهير بن محمد، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: دعا رجلٌ من الأنصار من أهل قُباءٍ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فانطلقْنا معه، فلما طَعِمَ وغَسَلَ يَدَيه - أو قال: يدَه - قال: "الحمدُ لله الذي يُطْعِمُ ولا يُطعَم، مَنَّ علينا فهَدَانا، وأطعَمَنا وسَقَانا، وكلَّ بلاءٍ حَسَنٍ أَبْلانا، الحمدُ لله غيرَ مُودَّعٍ ولا مُكافإٍ، ولا مَكفُورٍ، ولا مُستغنًى عنه، الحمدُ لله الذي أطعَمَ من الطعام، وسَقَى من الشراب، وكَسَا من العُرْيِ، وهَدَى من الضَّلالة، وبَصَّر من العَمَاية، وفَضَّلَ على كثيرٍ ممَّن خَلَقَ تفضيلًا، الحمدُ لله ربِّ العالمين" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুবাবাসী আনসারদের মধ্য থেকে একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাওয়াত দিলেন। আমরা তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) সাথে সেখানে গেলাম। যখন তিনি আহার করলেন এবং তাঁর উভয় হাত ধুলেন— অথবা বললেন: তাঁর হাত ধুলেন— তখন তিনি বললেন: "সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আহার করান কিন্তু নিজে আহার গ্রহণ করেন না। তিনি আমাদের প্রতি অনুগ্রহ করেছেন এবং আমাদের পথ দেখিয়েছেন, আমাদের খাইয়েছেন ও পান করিয়েছেন এবং প্রত্যেক উত্তম পরীক্ষায় আমাদের উত্তীর্ণ করেছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যাকে বিদায় জানানো হয় না, যার প্রতিদান দেওয়া যায় না, যার অকৃতজ্ঞতা করা হয় না, এবং যার মুখাপেক্ষী হওয়া থেকে অন্য কারো মাধ্যমে মুক্ত হওয়া যায় না। সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি খাদ্য থেকে আহার করান, পানীয় থেকে পান করান, বস্ত্রহীনতাকে পোশাক দেন, পথভ্রষ্টতা থেকে হেদায়েত করেন, অন্ধত্ব থেকে দৃষ্টি দান করেন, এবং তিনি তাঁর সৃষ্টির অনেকের উপর আমাদের বিশেষ মর্যাদা দান করেছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি সৃষ্টিকুলের রব।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] نسبة إلى سَلِيمة، بفتح السين وكسر اللام، من ولد مالك بن فَهْم من الأزد.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (10060) عن زكريا بن يحيى السِّجْزي، وابن حبان (5219) عن الحسن بن سفيان، كلاهما عن عبد الأعلى بن حماد وحده، بهذا الإسناد.ولبعضه شاهد من حديث أبي أمامة الذي تقدَّم برقم (1956).قوله: "أبلانا" أي: أنعم به علينا.وقوله: "ولا مُكافأ"، أي: إنَّ نعمة الله لا تُكافأ.والعَماية، بفتح العين المهملة، معناها: الغَوايةُ واللَّجَاجُ في الباطل والجَهالةُ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2027)


2027 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن علي بن مُسلم الأبّار، حدثنا الهيثم بن خارجة، حدثنا الوليد بن مسلم، عن عُفير بن مَعْدان، عن سُلَيم بن عامر، عن أبي أُمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إذا نادى المُنادِي فُتحت أبوابُ السماءِ، واستُجيب الدُّعاءُ، فمن نَزَلَ به كَرْبٌ أو شِدّةٌ فليَتحيَّن المُناديَ، فإذا كبَّرَ كبَّرَ، وإذا تَشهَّد تَشهَّدَ، وإذا قال: حيَّ على الصلاة، قال: حيَّ على الصلاة، وإذا قال: حيَّ على الفَلاح، قال: حيَّ على الفلاح، ثم يقول: اللهمَّ ربَّ هذه الدعوة الصادقةِ المستجابِ لها دعوةِ الحقِّ وكلمةِ التقوى أحْيِنا عليها، وأمِتْنا عليها، وابعَثْنا عليها، واجعَلْنا من خِيارِ أهلِها أحياءً وأمواتًا، ثم يسألُ اللهَ حاجتَه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুয়াজ্জিন আযান দেয়, তখন আসমানের দরজাগুলো খুলে যায় এবং দু’আ কবুল করা হয়। অতএব, যার ওপর কোনো কষ্ট বা তীব্র সঙ্কট নেমে আসে, সে যেন মুয়াজ্জিনের (আযানের) সময়টির অপেক্ষায় থাকে। যখন সে তাকবীর বলে, তখন সেও (শ্রোতা) তাকবীর বলে; যখন সে শাহাদাত পাঠ করে, সেও শাহাদাত পাঠ করে; যখন সে 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ' বলে, সেও 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ' বলে; যখন সে 'হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' বলে, সেও 'হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' বলে। এরপর সে এই দু’আ করে: ‘হে আল্লাহ! আপনি এই সত্য আহ্বান এবং সত্যের দু’আ, যার জবাব দেওয়া হয় এবং তাকওয়ার বাণী (কালিমা)-এর প্রতিপালক! আপনি আমাদেরকে এর ওপরই জীবন দিন, এর ওপরই মৃত্যু দিন এবং এর ওপরই পুনরুত্থিত করুন। আর আপনি আমাদেরকে জীবিত ও মৃত অবস্থায় এর উত্তম ধারকদের মধ্যে অন্তর্ভুক্ত করুন।’ এরপর সে আল্লাহর কাছে তার প্রয়োজন প্রার্থনা করবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عُفير بن مَعْدان، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه أحمد بن مَنيع في "مسنده"، وأبو يعلى الموصلي في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (242/ 1 و 4)، والطبراني في "الدعاء" (458)، وابن السني في "عمل اليوم والليلة" (98)، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 10/ 212 من طرق عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وهو عند ابن منيع والطبراني مختصر.وأخرج الطبراني في "الكبير" (7713)، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (669)، والبيهقي في "الكبرى" 3/ 360، وفي "معرفة السنن والآثار" (7240)، وابن الشجري في "أماليه" 1/ 224، والحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 383 من طريقين عن الوليد بن مسلم، به، مرفوعًا بلفظ: "تُفتح أبوابُ السماء ويُستجاب الدعاء في أربعة مواطن: عند التقاء الصفوف في سبيل الله، وعند نزول الغيث، وعند إقامة الصلاة، وعند رؤية الكعبة".ولإجابة الدعاء بعد الأذان شاهد من حديث أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12584)، وأبي داود (521)، والترمذي (212)، و (3594)، والنسائي (9812)، وابن حبان (1696)، بلفظ: "إنَّ الدعاء لا يُردُّ بين الأذان والإقامة فادعوا". وهو صحيح.وآخر من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6601)، وأبي داود (524)، والنسائي (9789)، وابن حبان (1695): أنَّ رجلًا قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنَّ المؤذنين يفضُلوننا بأذانهم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قل كما يقولون، فإذا انتهيت فَسَلْ تُعْطَ". وهو حسن في المتابعات والشواهد.وثالث من حديث سهل بن سعد عند المصنف برقم (730) و (2566)، وهو صحيح. شيخ المصنف - وإن كان فيه ضعف - متابع. وقد اختُصِرت روايةُ شعبة هنا بهذا اللفظ، وإنما هذا المذكور لفظ الأعمش كما أورده المصنف بعده.وأخرجه أحمد 11/ (6910) عن محمد بن جعفر، وأبو داود (5065) عن حفص بن عُمر الحوضي، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد، عن ابن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "خصلتان أو خلتان لا يحافظ عليهما رجلٌ مسلم إلَّا دخل الجنة، هما يسير ومن يعمل بهما قليل، تسبّح الله عشرًا، وتحمد الله عشرًا، وتكبر الله عشرًا في دُبُر كل صلاة، فذلك مئة وخمسون باللسان وألف خمس مئة في الميزان وتسبح ثلاثًا وثلاثين، وتحمد ثلاثًا وثلاثين، وتكبر أربعًا وثلاثين، إذا أخذ مضجعه، فذلك مئة باللسان وألف في الميزان، فأيكم يعمل في اليوم ألفين وخمس مئة سيئة؟ " قالوا: يا رسول الله، كيف هما يسير ومن يعمل بهما قليل؟ قال: "يأتي أحدَكم الشيطانُ إذا فرغ من صلاته، فيذكِّره حاجة كذا وكذا، فيقوم ولا يقولها، فإذا اضطجع يأتيه الشيطانُ فيُنوّمه قبل أن يقولها" فلقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يعقِدهُنَّ في يده. هذا لفظ محمد بن جعفر، ولفظ حفص بن عمر بنحوه.وأخرجه بنحو هذا اللفظ أحمد (6498)، وابن ماجه (926)، والترمذي (3410)، والنسائي (1272) و (10586)، وابن حبان (2012) و (2018) من طرق عن عطاء بن السائب، به.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2028)


2028 - حدثنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعبة.وأخبرنا أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا الحسن بن المُثنَّى، حدثنا عَفَّان، حدثنا شُعبة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، قال: رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يَعقِدُ التَّسبِيحَ [1]. رواه الأعمش عن عطاء بن السائب:




আবদুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাসবীহ গণনা করতে দেখেছি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، وسماع شعبة من عطاء بن السائب قبل اختلاطه، وعبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف - وإن كان فيه ضعف - متابع. وقد اختُصِرت روايةُ شعبة هنا بهذا اللفظ، وإنما هذا المذكور لفظ الأعمش كما أورده المصنف بعده.وأخرجه أحمد 11/ (6910) عن محمد بن جعفر، وأبو داود (5065) عن حفص بن عُمر الحوضي، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد، عن ابن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "خصلتان أو خلتان لا يحافظ عليهما رجلٌ مسلم إلَّا دخل الجنة، هما يسير ومن يعمل بهما قليل، تسبّح الله عشرًا، وتحمد الله عشرًا، وتكبر الله عشرًا في دُبُر كل صلاة، فذلك مئة وخمسون باللسان وألف خمس مئة في الميزان وتسبح ثلاثًا وثلاثين، وتحمد ثلاثًا وثلاثين، وتكبر أربعًا وثلاثين، إذا أخذ مضجعه، فذلك مئة باللسان وألف في الميزان، فأيكم يعمل في اليوم ألفين وخمس مئة سيئة؟ " قالوا: يا رسول الله، كيف هما يسير ومن يعمل بهما قليل؟ قال: "يأتي أحدَكم الشيطانُ إذا فرغ من صلاته، فيذكِّره حاجة كذا وكذا، فيقوم ولا يقولها، فإذا اضطجع يأتيه الشيطانُ فيُنوّمه قبل أن يقولها" فلقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يعقِدهُنَّ في يده. هذا لفظ محمد بن جعفر، ولفظ حفص بن عمر بنحوه.وأخرجه بنحو هذا اللفظ أحمد (6498)، وابن ماجه (926)، والترمذي (3410)، والنسائي (1272) و (10586)، وابن حبان (2012) و (2018) من طرق عن عطاء بن السائب، به.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2029)


2029 - أخبرَناهُ أبو الطَّيب محمد بن أحمد بن الحسن الحِيْري، حدثنا محمد بن عبد الوهاب الفَرّاء، حدثنا علي بن عَثّام بن علي العامِري، حدثنا أبي، حدثنا الأعمش، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، قال: رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يَعقِدُ التَّسبيحَ [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (আঙুলে) তাসবীহ গণনা করতে দেখেছি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وسماع الأعمش - وهو سليمان بن مِهران - من عطاء بن السائب قديم قبل اختلاطه.وأخرجه أبو داود (1502)، والترمذي (3411) و (3486)، والنسائي (1280)، وابن حبان (843) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2030)


2030 - أخبرَناهُ أزهَرُ بن أحمد المُنادِي ببغداد، حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقاشي، حدثنا عبد الله بن داود الخُرَيبي، حدثنا هانئ بن عثمان، عن حُمَيضةَ بنتِ ياسر، عن جَدّتِها يُسَيرة - وكانت إحدى المهاجراتِ - قالت: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "عَليكُنَّ بالتَّسبِيح والتَّهلِيل والتَّقدِيس، ولا تَغفُلْنَ فتَنسَيْنَ التوحيدَ، واعقِدْنَ بالأناملِ، فإنهنَّ مسؤولاتٌ ومُستَنطَقاتٌ" [1].




ইয়াসীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ), তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) ও তাকদীস (আল্লাহর পবিত্রতা বর্ণনা) করবে। তোমরা উদাসীন হয়ো না, তাহলে তোমরা তাওহীদ (একত্ববাদ) ভুলে যাবে। আর তোমরা (গণনার জন্য) আঙ্গুলের গাঁট ব্যবহার করবে, কারণ এগুলো (আঙ্গুলগুলো) জিজ্ঞাসিত হবে এবং কথা বলতে বাধ্য হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين، حُميضة بنت ياسر وإن انفرد بالرواية عنها ابنها هانئ بن عثمان، ذكرها ابنُ حبان في "الثقات"، وقال ابن حجر في "التقريب": مقبولة، وابنها هانئ روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه أبو داود (1501) عن مُسدَّد بن مُسرهد، عن عبد الله بن داود، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 45/ (27089)، والترمذي (3583)، وابن حبان (842) من طريق محمد بن بشر، عن هانئ بن عثمان، به.ويشهد له حديثُ عبد الله بن عمرو الذي قبله. صفيّةَ، عن صفية. ويزيد مولى صفيّة سمِّي أبوه معتّبًا في كتابي الطبراني المذكورين، وكذلك سمَّاه المزِّي في "تهذيب الكمال" في الرواة عن صفيّة، وسمَّاه البخاري في "تاريخه الكبير" 8/ 340، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 271: يزيد بن شعيب، وسمِّي في رواية له في "المطالب العالية" (1070): يزيد بن سعيد، فالظاهر أنَّ سعيدًا تحريف عن شعيب، وكذلك معتب تحريف عن شعيب، والله تعالى أعلم، وعلى أي حالٍ فهو - وإن كان فيه جَهالة - تابعيٌّ كان مولًى لصفيّة بنت حُيَيّ، ولا يُعرف بجرح، فيُحتمل تحسينُ حديثه في المتابعات والشواهد.ويشهد له حديث سعد بن أبي وقاص التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2031)


2031 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا شاذُّ بن فَيَّاض، حدثنا هاشم بن سعيد عن كِنانةَ، عن صَفِيَّةَ قالت: دخلَ علَيَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وبين يدَيّ أربعة آلافِ نَوَاةٍ أسبِّحُ بهنّ، فقال: "يا بنتَ حُيَيٍّ، ما هذا؟ " قلتُ: أُسبِّحُ بهنّ، قال: "قد سبَّحتُ منذ قُمتُ على رأسِكِ أكثرَ من هذا"، قلت: عَلِّمني يا رسولَ الله، قال: "قُولي: سبحانَ الله عَدَدَ مَا خَلَقَ من شيءٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ من حديث المصريين بإسناد أصحَّ من هذا:




সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন, আর আমার সামনে চার হাজার খেজুরের আঁটি ছিল যা দিয়ে আমি তাসবিহ পাঠ করছিলাম। তিনি বললেন, "হে হুয়াইয়ের কন্যা, এটা কী?" আমি বললাম, আমি এগুলো দিয়ে তাসবিহ পড়ি। তিনি বললেন, "আমি তোমার মাথার কাছে দাঁড়ানো থেকে শুরু করে এর চেয়েও বেশি তাসবিহ পাঠ করেছি।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে শিখিয়ে দিন। তিনি বললেন, "তুমি বলো: 'সুবহানাল্লাহি আদাদা মা খালাকা মিন শাইয়িন' (আল্লাহ তা'আলা যা কিছু সৃষ্টি করেছেন, সেই সংখ্যার সমপরিমাণ তাসবিহ)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن كما قال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 82، وهذا إسناد ضعيف لضعف هاشم بن سعيد - هو الكوفي - لكنه متابع، وللحديث طريق أخرى لا بأس بها عن صفية، وبذلك يمكن تحسين الحديث، على أنَّ له شاهدًا أيضًا، فتأكد تحسينُه، والله أعلم.وأخرجه الترمذي (3554) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، عن هاشم بن سعيد، به.وقال: حديث غريب لا نعرفه عن صفية إلّا من هذا الوجه من حديث هاشم بن سعيد الكوفي، وليس إسناده بمعروف.كذا قال مع أنَّ له طريقًا أخرى عند أبي الحسن الخِلَعي في "الخِلَعيّات" كما قال الحافظ ابن حجر في "النكت الظِّراف" 11/ (15904)، وأخرجه من طريقه في "نتائج الأفكار" 1/ 83 من طريق حُدَيج بن معاوية، عن كنانة مولى صفيّة، عن صفيّة. وحُديج بن معاوية ضعيف يُعتبر به في المتابعات والشواهد كما هو الحال هنا.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5472)، و"الدعاء" (1740) من طريق يزيد بن مُعتِّب مولى صفيّةَ، عن صفية. ويزيد مولى صفيّة سمِّي أبوه معتّبًا في كتابي الطبراني المذكورين، وكذلك سمَّاه المزِّي في "تهذيب الكمال" في الرواة عن صفيّة، وسمَّاه البخاري في "تاريخه الكبير" 8/ 340، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 271: يزيد بن شعيب، وسمِّي في رواية له في "المطالب العالية" (1070): يزيد بن سعيد، فالظاهر أنَّ سعيدًا تحريف عن شعيب، وكذلك معتب تحريف عن شعيب، والله تعالى أعلم، وعلى أي حالٍ فهو - وإن كان فيه جَهالة - تابعيٌّ كان مولًى لصفيّة بنت حُيَيّ، ولا يُعرف بجرح، فيُحتمل تحسينُ حديثه في المتابعات والشواهد.ويشهد له حديث سعد بن أبي وقاص التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2032)


2032 - حدَّثناه إسماعيل بن أحمد الجُرْجاني، حدثنا محمد بن الحسن بن قُتيبة العَسقَلاني، حدثنا حَرْملة بن يحيى، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، أنَّ سعيد بن أبي هلال حدَّثَه عن عائشة بنت سعد بن أبي وقّاص، عن أبيها: أنه دَخَلَ مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم على امرأةٍ وبين يديها نَوًى أو حَصًى تُسبِّحُ، فقال: "أُخبِرُك بما هو أيسَرُ عليكِ من هذا وأفضلُ؟ قُولي: سُبحانَ الله عَددَ مَا خَلَق في السماءِ، سُبحانَ الله عدَدَ ما خَلَق في الأرض، سُبحانَ الله عدَدَ ما بينَ ذلك، وسُبحانَ الله عدَدَ ما هو خالقٌ، الله أكبرُ مثلَ ذلك، والحمدُ لله مثل ذلك، ولا إله إلَّا اللهُ مثلَ ذلك، ولا قُوَّةَ إلَّا بالله مثلَ ذلك" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক মহিলার কাছে গেলেন। তার সামনে কিছু খেজুরের বীজ বা পাথর ছিল, যা দিয়ে সে তাসবীহ জপছিল। তখন তিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) বললেন: "আমি কি তোমাকে এর চেয়েও সহজ ও উত্তম কিছু বলব না? তুমি বলো: 'সুবহানাল্লাহ' আসমানে তিনি যা সৃষ্টি করেছেন তার সংখ্যা পরিমাণ, 'সুবহানাল্লাহ' যমীনে তিনি যা সৃষ্টি করেছেন তার সংখ্যা পরিমাণ, 'সুবহানাল্লাহ' এতদুভয়ের মাঝে তিনি যা সৃষ্টি করেছেন তার সংখ্যা পরিমাণ, এবং 'সুবহানাল্লাহ' তিনি ভবিষ্যতে যা সৃষ্টি করবেন তার সংখ্যা পরিমাণ। 'আল্লাহু আকবার'ও অনুরূপ সংখ্যা পরিমাণ, 'আলহামদুলিল্লাহ'ও অনুরূপ সংখ্যা পরিমাণ, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু'ও অনুরূপ সংখ্যা পরিমাণ, এবং 'লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'ও অনুরূপ সংখ্যা পরিমাণ।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه اختُلف فيه عن عبد الله بن وهب، فأكثر الروايات عنه وقع فيها زيادة راوٍ في الإسناد بين سعيد بن أبي هلال وعائشة بنت سعد بن أبي وقاص، وهو رجل اسمه خزيمة، كذلك وقع اسمه مهملًا غير مقيد، وهو رجل مجهول. وممَّن لم يذكره في الإسناد حرملة بن يحيى - وهو التَّجِيبي - عند المصنِّف وعند ابن حبان، ولا يُظَنُّ أنه سقط ذكر خزيمة من أصول "المستدرك" الخطية، بحجة أنَّ الحافظ ذكره في "إتحاف المهرة" 5/ (5094)، فقد نصَّ الضياء المقدسي في "المختارة" 3/ بإثر (1011) أنه لم يُذكر خزيمةُ في رواية حرملة عند ابن حبان والحاكم، هذا ولسعيد بن أبي هلال روايةٌ عن عائشة بنت سعد بغير واسطة كما في حديثٍ له عند النسائي (7465)، وآخر عند البزار (1202)، كلاهما من طريق خالد بن يزيد المصري عنه، وسماعه منها ممكن، فإنه أدركها، فلعله يكون سمع منها مرةً بواسطة، ومرة بغير واسطة، والله تعالى أعلم.وأخرجه ابن حبان (837) عن عبد الله بن محمد بن سَلم الفريابي، عن حرملة بن يحيى، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (1201) عن عمر بن الخطاب السجستاني، عن أصبغ بن الفرج، وأبو يعلى (710) عن هارون بن معروف، كلاهما عن عبد الله بن وهب، به. دون ذكر خزيمة في إسناده أيضًا.وخالفهم غيرهم:فأخرجه الترمذي (3568) عن أحمد بن الحسن الترمذي، والطبراني في "الدعاء" (1738) عن يحيى بن عثمان بن صالح، والبغوي في "شرح السنة" (1279) من طريق حميد بن زنجويه، ثلاثتهم عن أصبغ بن الفرج، عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن خزيمة، عن عائشة بنت سعد، عن أبيها. فزادوا فيه ذكر خزيمة بين ابن أبي هلال وعائشة بنت سعد. وقال الترمذي والبغوي: حديث حسنٌ غريب. وحسّنه أيضًا الحافظ في "نتائج الأفكار" 1/ 81، يعني حسّنوه مع وجود خزيمة في إسناده.وكذلك أخرجه أحمد بن إبراهيم الدورقي في "مسند سعد بن أبي وقاص" (88) عن عبد الله بن أبي موسى، وأبو داود (1500) - ومن طريقه البيهقي في "شعب الإيمان" (595) - عن أحمد بن صالح المصري، وأخرجه النسائي كما في "تحفة الأشراف" 3/ (3955) - ومن طريقه الضياء المقدسي في "المختارة" 3/ (1010) - عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن السَّرْح، وأخرجه أبو طاهر المخلِّص في "المخلَّصيات" (2052) - ومن طريقه الضياء المقدسي 3/ (1011)، والمزي في "تهذيب الكمال" 8/ 246 - من طريق يونس بن عبد الأعلى، وأخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (343)، وفي "الشعب" بإثر (595) من طريق أحمد بن عيسى المصري، خمستهم (عبد الله بن أبي موسى وأحمد بن صالح وأبو طاهر بن السرح ويونس بن عبد الأعلى وأحمد بن عيسى) عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن ابن أبي هلال، عن خزيمة، عن عائشة بنت سعد، عن أبيها.قال الحافظ في "نتائج الأفكار" 1/ 81: يمكن أن تكون هذه المرأة (يعني التي أُبهمت في حديث سعد بن أبي وقاص) صفية، فقد جاء من حديثها بهذا اللفظ. يعني الحديث السابق.ويشهد له حديث أبي أُمامة الباهلي المتقدم عند المصنف برقم (1912). وهو حديث صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2033)


2033 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنْبل، حدثنا عُبيد الله بن عمر، حدثنا جَرير بن عبد الحميد، عن محمد بن إسحاق، عن عَمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جدِّه، عن عبد الله - وهو ابن عَمرو - قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمُرُ بكلماتٍ من الفَزَع: "أعوذُ بكلماتِ الله التامّات من غَضَبِه ومن عِقابِه، ومن شَرِّ عباده، ومن هَمَزاتِ الشياطينِ وأن يَحضُرونِ".قال: فكان عبد الله بن عَمرٍو مَن بَلَغَ من ولده عَلَّمَهن إياه، فقالهنَّ عند نومِه، ومن لم يَبلُغْ منهم كَتَبها فعَلَّقَها في عُنُقِه [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد مُتّصلٌ في موضع الخِلاف.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ভয়ের সময় কিছু বাক্য বলার আদেশ করতে শুনেছি: "আমি আল্লাহর পূর্ণাঙ্গ কালেমাগুলোর মাধ্যমে তাঁর ক্রোধ, তাঁর শাস্তি, তাঁর বান্দাদের অনিষ্ট, শয়তানদের কুমন্ত্রণা (হেমাজাত) এবং তাদের আমার নিকট উপস্থিত হওয়া থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করছি।" বর্ণনাকারী বলেন, (এ কারণে) আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সন্তানদের মধ্যে যারা বালেগ হতো, তাদের তা শিখিয়ে দিতেন এবং তারা ঘুমের সময় তা বলত। আর যারা বালেগ হতো না, তাদের জন্য তা লিখে তাদের গলায় ঝুলিয়ে দিতেন। এই হাদীসটির সনদ সহীহ এবং মতপার্থক্যের ক্ষেত্রে মুত্তাসিল (পরম্পরাযুক্ত)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لولا عنعنةُ محمد بن إسحاق، وما وقع في إسناد المصنِّف من قوله: عن جده عن عبد الله بن عَمرو، فهو غريب، وقد وقع مثلُه في رواية ابن بطة العُكْبَري في "الإبانة" 5/ 258 - 259 من طريق يوسف بن موسى عن جرير بن عبد الحميد، وقال ضياء الدين المقدسي فيما نقله عنه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 5/ 112: أظن "عن" (يعني في قوله: عن عبد الله) فيه زائدة، وإلّا فيكون من رواية محمد (يعني ابن عبد الله بن عمرو بن العاص) عن أبيه. قال الذهبي: عمرو بن شعيب لا يعني بجده إلَّا جده الأعلى عبد الله رضي الله عنه، وقد جاء مصرَّحًا به في غير حديثٍ، يقول: عن جدِّه عبد الله، فهذا ليس بمرسل، وقد ثبت سماع والده شعيب من جده عبد الله بن عمرو، وما علمنا بشعيب بأسًا، رُبِّي يتيمًا في حجر جدّه عبد الله، وسمع منه، وسافر معه … وما أدري هل حفظ شعيب شيئًا من أبيه أم لا؟ وأنا عارف بأنه لازم جدَّه وسمع منه.قلنا: لم يقع ذلك إلّا عند المصنف وابن بطة، وعند غيرهما ممن خرَّج الحديثَ: عن جده، لم يزيدوا على ذلك، وهذا يدلُّ على وهم ما وقع في رواية المصنّف وابن بطة.وقد أخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (429) من طريق المصنّف هذه، ثم قال بعد قوله: عن عبد الله: كذا وجدتُه في كتابي!وأخرجه أحمد 11/ (6696)، وأبو داود (3893)، والترمذي (3528)، والنسائي (10533) من طرق عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب عن أبيه، عن جده. وقال الترمذي: حديث حسنٌ غريب.وأخرجه النسائي (10534) عن عمران بن بكار، عن أحمد بن خالد الوهبي، عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: كان خالد بن الوليد بن المغيرة رجلًا يَفْزع في منامه، فذكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "إذا اضطجعت فقل: باسم الله، أعوذ … فذكره، فقالها، فذهب ذلك عنه. كذا وقع في هذه الرواية قصة الحديث المذكور وأنَّ صاحب القصة هو خالد بن الوليد.لكن خالف عمرانَ بنَ بكار جماعةٌ آخرون عند البخاري في "خلق أفعال العباد" (440)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (6509)، وابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 109، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 119، فرووه عن أحمد بن خالد الوهبي، عن ابن إسحاق، به فذكروا القصة، لكنهم ذكروا أنَّ صاحب القصة هو الوليد بن الوليد بن المغيرة، وليس أخاه خالد بن الوليد، وكأنَّ هذا هو الأشبه، فقد روى قصة الوليد بن الوليد هذه مع الدعاء المذكور جماعةٌ من الحفاظ عن يحيى بن سعيد الأنصاري عن محمد بن يحيى بن حَبّان مرسلًا، منهم شعبةُ عند أحمد 27/ (1657)، وابن السني في "عمل اليوم والليلة" (638)، وعبدُ الرحيم بنُ سليمان عند ابن أبي شيبة 8/ 160 و 10/ 362، ويحيى بنُ سعيد القطانُ عند مسدّد بن مُسرهد في "مسنده" كما في "إتحاف الخِيَرة المهرة" للبوصيري (6094/ 1) وسليمانُ بنُ بلال عند البيهقي في "الأسماء والصفات" (406)، ويزيدُ بنُ هارون عند الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 112. كلهم ذكر أنَّ صاحب القصة هو الوليد بن الوليد. وقال الحافظ هذا مرسل صحيح الإسناد.وخالفهم مالك بن أنس وحده في "الموطأ" 2/ 950 فرواه عن يحيى بن سعيد الأنصاري قال: بلغني أنَّ خالد بن الوليد … فذكر القصة، فجعل صاحب القصة خالد بن الوليد، والقول قول الجماعة الذين جعلوها لأخيه الوليد بن الوليد.ورواه أيوب بن موسى عند مسدَّد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (6203)، وابن السني (750)، وابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 109، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 111، حيث رواه سفيان بن عيينة، عن أيوب بن موسى، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، فذكر القصة لخالد بن الوليد، ولعلّه وهمٌ من أحد الرواة، والله أعلم.وقد رُوي عن خالد بن الوليد من عدة روايات انه كان يفزع أيضًا، لكن وقع فيها جميعًا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم علّمه لدفع ذلك دعاءً آخر غير هذا الدعاء الذي علمه لأخيه الوليد بن الوليد، وهو: "أعوذ بكلمات الله التامات التي لا يجاوزهن بَرٌّ ولا فاجر، من شرِّ ما ينزل من السماء ومن شَرِّ ما يعرُج فيها، ومن شرِّ ما ذرأ في الأرض، ومن شرِّ ما يخرج منها، ومن شرِّ طوارق الليل والنهار، ومن شرِّ كل طارق يطرُق، إلّا طارقًا يطرق بخير، يا رحمن". فلعلَّ هذا هو منشأ الوهم لدى الذين جعلوا صاحب قصة الدعاء في حديث عمرو بن شعيب وغيره خالدَ بنَ الوليد، فكأنه دخل لهم حديثٌ في حديثٍ، والله تعالى أعلم. إذًا فمرسل محمد بن يحيى بن حَبّان شاهدٌ لحديث عمرو بن شعيب الذي بأيدينا، وهو مرسل صحيح الإسناد كما قال الحافظ، فيصحُّ به حديثُ عمرو بن شعيب، وقد قال ابنُ عبد البر في "التمهيد" 24/ 109: هذا حديثٌ مشهورٌ مسندًا وغير مسندٍ.ويشهد له أيضًا مرسلُ محمد بن المنكدر عند ابن السني (747)، وإسناده يصلح في المتابعات والشواهد.قوله: "همزات الشياطين"، أي: خَطَراتُها التي تُخطِرها بقلب الإنسان.وقوله: "وأن يَحضُرون": معناه: أن يُصيبُوني بشرٍّ.وكلمات الله التامة: يحتمل أن يريد به أنَّه لا يدخلها نقص وإن كان كلمات غيره يدخلها النقص. ويحتمل أن يريد به الفاضلة، يقال: فلان تامٌّ وكاملٌ، أي: فاضل. ويُحتمل أن يريد به الثابت حكمُها كما في قوله تعالى: {وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ الْحُسْنَى عَلَى بَنِي إِسْرَائِيلَ بِمَا صَبَرُوا}.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2034)


2034 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القَزّاز، حدثنا مُعاذ بن فَضَالة، حدثنا هشامٌ صاحب الدَّسْتُوائي، حدثنا أبو الزُّبير، عن جابر، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أَوَى أحدُكم إلى فِراشِه ابتدَرَه مَلَكٌ وشيطانٌ، يقول الشيطانُ: افتح بشَرٍّ، ويقول المَلَك: افتَحْ بخَيرٍ، فَإِن ذَكَرَ اللهَ ذهبَ الشيطانُ وباتَ الملكُ يَكلؤُه، وإذا استيقظ ابتدَرَه مَلَكٌ وشيطانٌ، يقول الشيطان: افتح بشَرٍّ، ويقول المَلَك: افتح بخَيرٍ، فإن قال: الحمدُ لله الذي رَدَّ إِليَّ نَفْسي بعد مَوتها ولم يُمِتْها في نومها، الحمدُ لله الذي يُمسِكُ السماءَ أن تَقعَ على الأرضِ إِلَّا بِإِذنِهِ، إِنَّ الله بالناس لرؤوفٌ رحيمٌ، الحمدُ لله الذي يُحيي الموتى وهو على كلّ شيءٍ قديرٌ، فإن خَرَّ مِن دابَّةٍ مات شهيدًا، وإن قام فصلَّى صلَّى في الفَضائلِ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার বিছানায় যায়, তখন একজন ফেরেশতা ও একজন শয়তান তার দিকে ধাবিত হয়। শয়তান বলে: মন্দ দিয়ে শুরু করো; আর ফেরেশতা বলে: কল্যাণ দিয়ে শুরু করো। অতঃপর যদি সে আল্লাহকে স্মরণ করে, তবে শয়তান দূরে সরে যায় এবং ফেরেশতা রাতভর তাকে পাহারা দিতে থাকে। আর যখন সে ঘুম থেকে ওঠে, তখনও একজন ফেরেশতা ও একজন শয়তান তার দিকে ধাবিত হয়। শয়তান বলে: মন্দ দিয়ে শুরু করো; আর ফেরেশতা বলে: কল্যাণ দিয়ে শুরু করো। অতঃপর যদি সে বলে: 'সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তার মৃত্যুর (ঘুমের) পর আমার আত্মা আমার কাছে ফিরিয়ে দিয়েছেন এবং ঘুমের মধ্যে আমাকে মৃত্যু দেননি, সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আকাশকে ধরে রাখেন যেন তাঁর অনুমতি ছাড়া তা পৃথিবীর উপর পড়ে না যায়। নিশ্চয় আল্লাহ মানুষের প্রতি অতি স্নেহশীল, পরম দয়ালু। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি মৃতকে জীবিত করেন এবং তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান।' তখন যদি সে তার সওয়ারি থেকে পড়ে গিয়ে মারা যায়, তবে সে শহীদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করবে। আর যদি সে উঠে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করে, তবে সে মর্যাদাপূর্ণ সালাত আদায় করে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن غريب كما قال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 3/ 79، ورجال إسناد المصنف هنا ثقات غير محمد بن سنان القَزَّاز، ففيه مقال، لكنه يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد تابعه أبو حاتم الرازي عند ابن مَنْدَه في "التوحيد" (137). وإنما اقتصر الحافظُ في "نتائج الأفكار" على تحسينِه، مع اعترافه بثقة رجاله، لأنه رحمه الله يرى أنَّ مثلَ ذلك مما يعنعنه الثقة المدلّس - وهو هنا أبو الزبير المكي في رأي ابن حجر - يحط الحديث عن درجة الصحيح كما صرَّح به عند تخريجه هذا الحديث 3/ 80، وأما المنذري في "الترغيب والترهيب" فنسبه إلى أبي يعلى وصحح إسناده.وأخرجه النسائي (10625) من طريق أزهر بن القاسم، عن هشام الدَّستُوائي، عن الحجاج بن أبي عثمان الصَّوّاف، عن أبي الزبير، عن جابر موقوفًا. كذا خالف فيه أزهرُ معاذَ بنَ فضالة فذكر واسطةً بين هشام الدستُوائي وأبي الزبير، ووقفَ الحديثَ على جابر، غير أنَّ أزهر بن القاسم قال عنه أبو حاتم الرازي: يُكتب حديثُه ولا يُحتج به، وقال ابن حبان: كان يخطئ. وأطلق أحمد والنسائي توثيقه، ولهذا قال الذهبي في "الميزان": ليس بالحجة، فهو كما قال الذهبي، فمعاذُ بنُ فَضَالة أوثقُ منه حيث وثَّقه أبو حاتم واحتجَّ به البُخاري، ثم إنَّ لهشامٍ الدَّستوائي في الصحيح روايةً عن أبي الزبير مباشرة، على أنه صرَّح هنا في رواية المصنف بسماعه من أبي الزبير، وأما ما يتعلق بوقف الحديث فإنَّ غير أزهر رفع الحديث، فالمحفوظ رفعه، ولهذا قال الحافظ في "الأمالي السَّفَرية الحلبية" ص 53: سند المرفوع أقوى.وأخرجه النسائي (10624)، وابن حبان (5533) من طريق حماد بن سلمة، عن الحجاج بن أبي عثمان الصَّوّاف عن أبي الزبير، عن جابر مرفوعًا. وكذلك رواه جماعةُ أصحاب الحجاج الصّوّاف مرفوعًا.وأخرجه كذلك النسائي (10623) من طريق المغيرة بن مسلم القَسْملي، عن أبي الزبير، عن جابر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2035)


2035 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا صَدَقة بن الفضل، حدثنا أبو هَمّام الأهوازي، حدثنا ثَور بن يَزيدَ، عن خالد بن مَعْدان عن زُهير الأَنْماري، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إِذا أَخَذَ مَضْجَعَه قال: "اللهم اغفِرْ لي ذَنْبي، واخسَ شيطاني، وفُكَّ رِهاني، وثَقِّل مِيزاني، واجعلْني في المَلأ الأعلى" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




যুহাইর আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন শয্যা গ্রহণ করতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! আমার গুনাহ ক্ষমা করে দিন, আমার শয়তানকে বিতাড়িত করুন, আমার দায়ভার/বন্ধন মুক্ত করুন, আমার দাঁড়িপাল্লা ভারী করুন এবং আমাকে সর্বোচ্চ সমাবেশে স্থান দিন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قويٌّ من أجل أبي همام الأهوازي - وهو محمد بن الزِّبْرقان - وقد توبع كما تقدَّم تخريجه عند الطريق السالفة برقم (2005) حيث تقدَّم الحديث هناك من طريق أبي زكريا يحيى بن يزيد الأهوازي عن أبي همام الأهوازي









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2036)


2036 - أخبرني أبو النضر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أصبَغُ بن الفَرَج المصري وهارون بن مَعروف البغدادي، قالا: حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني حُيَيّ بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عَمرو، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا جاءَ الرجل يعودُ مَريضًا فليقل: اللهمَّ اشْفِ عبدَك يَنكَأُ لك عدوًّا، أو يَمشي لك إلى صلاةٍ" [1].هذا حديث مِصري صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رُوي في هذا الباب حديثٌ آخرُ من حديث الكوفيين:




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো ব্যক্তি কোনো রুগীকে দেখতে আসে, তখন সে যেন বলে: 'হে আল্লাহ! আপনার এই বান্দাকে আরোগ্য দান করুন, যেন সে আপনার জন্য কোনো শত্রুকে পরাস্ত করতে পারে, অথবা আপনার জন্য নামাজের দিকে হেঁটে যেতে পারে'।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من أجل حُيّي بن عبد الله - وهو المَعافِري - فهو ضعيف عند التفرد، وقد تفرَّد بهذا الحديث كما قال الحافظ في "نتائج الأفكار" 4/ 189، ومع ذلك حسَّنه!وقد تقدَّم هذا الحديثُ برقم (1289) من طريق أبي الطاهر بن السَّرْح عن ابن وهب. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المرض والكفارات" (31)، ومن طريقه أخرجه الخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 288 - 289، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1073)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 417، كلاهما (ابن أبي الدنيا والبغوي) عن أبي محمد عبد الرحمن بن صالح الأزدي، عن شعيب بن راشد، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6106) من طريق وهب بن حفص الحراني، عن محمد بن سليمان بن أبي داود الحراني، عن عمرو بن خالد الواسطي، به. ووهب بن حفص هذا كذّاب يضع الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2037)


2037 - حدَّثَناهُ أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أحمد بن علي الخَزّاز، حدثنا جَنْدَلُ بن والِقٍ التَّغْلِبي، حدثنا شُعيب بن راشد بَيَّاع الأنْماطِ، حدثنا أبو هاشم الرُّمّاني، عن زَاذانَ، عن سَلْمَانَ، قال: عادَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأنا عَلِيلٌ، فقال: "يا سلمانُ، شَفَى الله سَقَمَك، وغَفَر ذَنْبَك، وعافاك في دِينِك وجِسمِك إلى مُدةِ أجَلِكَ" [1].




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অসুস্থ থাকাকালীন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এসেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে সালমান! আল্লাহ তোমার অসুস্থতা দূর করুন, তোমার গুনাহ ক্ষমা করে দিন এবং তোমার জীবনের নির্ধারিত সময়কাল পর্যন্ত তোমার দ্বীন ও দেহে সুস্থতা দান করুন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده تالفٌ بمرةٍ، وقد سقط هذا الإسناد بين شعيب وأبي هاشم رجلٌ هو أبو خالد عمرو بن خالد الواسطي كما نبَّه عليه الحافظُ في "نتائج الأفكار" 4/ 208، وهو رجلٌ كذّاب يضعُ الحديث، وقد خفي أمرُه على الحاكم فصحَّح إسناده، وخفي على الذهبي في "تلخيصه" فجوَّد الإسناد. وشعيب بن راشد - ويقال: بن أبي راشد - قال عنه أبو حاتم: حدَّث بثلاثة أحاديث بإسناد واحدٍ عن عمرو بن خالد منكرة، وهو شيخ مجهولٌ.وأخرجه الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 207 من طريق أحمد بن علي بن خلف، عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد. وأخرجه ابن السني في "عمل اليوم والليلة" (548) من طريق محمد بن الحسين الكوفي، والبيهقي في "الدعوات" (602) من طريق محمد بن صالح الأنماطي، كلاهما عن جَنْدل بن والِقٍ، عن شُعيب بن راشد عن أبي خالد عمرو بن خالد الواسطي، عن أبي هاشم الرُّماني، به. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المرض والكفارات" (31)، ومن طريقه أخرجه الخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 288 - 289، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1073)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 417، كلاهما (ابن أبي الدنيا والبغوي) عن أبي محمد عبد الرحمن بن صالح الأزدي، عن شعيب بن راشد، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6106) من طريق وهب بن حفص الحراني، عن محمد بن سليمان بن أبي داود الحراني، عن عمرو بن خالد الواسطي، به. ووهب بن حفص هذا كذّاب يضع الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2038)


2038 - أخبرنا جعفر بن هارون النَّحْوي ببغداد، حدثنا إسحاق بن صَدَقة بن صَبِيح، حدثنا خالد بن مَخلَد القَطَواني، حدثنا سليمان بن بلال، حدثنا عُمارة بن غَزِيّة، قال: سمعتُ عبدَ الله بن علي بن الحُسين يُحدِّث عن أبيه، عن جدِّه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ البَخِيلَ من ذُكرتُ عنده فلم يُصَلِّ عَلَيَّ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ عن أبي هريرة:




হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রকৃত কৃপণ সেই ব্যক্তি, যার সামনে আমার নাম উল্লেখ করা হলো, কিন্তু সে আমার প্রতি সালাত (দরুদ) পাঠ করলো না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف إسحاق بن صدقة، لكنه متابع.وأخرجه النسائي (8046) و (9800) عن أحمد بن الخليل البغدادي، عن خالد بن مخلد القَطَواني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 3/ (1736)، والترمذي (3546)، والنسائي (8046) و (9801)، وابن حبان (909) من طريق أبي عامر عبد الملك بن عَمرو العَقَدي، وأحمد (1736) عن أبي سعيد مولى هاشم، كلاهما عن سليمان بن بلال، به.ووافق سليمانَ بنَ بلال عليه إسماعيلُ بن جعفر بن أبي كثير عند القاضي إسماعيل بن إسحاق في "فضل الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم" (35)، وأبي بكر الدِّينوري في "المجالسة" (1048)، وابن المقرئ في "معجمه" (930)، وقاضي المارستان في "مشيخته" (419).وخالفهما عبد العزيز بنُ محمد الدَّراوردي عند النسائي (9802)، فرواه عن عُمارة بن غزية، عن عبد الله بن علي بن الحسين، قال: قال علي بن أبي طالب. كذا رواه منقطعًا وجعله من مسند علي بن أبي طالب.وخالفهم عمرو بن الحارث المصري، فقد أخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 148 معلَّقًا، والقاضي إسماعيل في "فضل الصلاة على النبي" (33) عن أحمد بن عيسى بن حسان المصري عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن عمارة بن غزية، عن عبد الله بن علي بن الحسين، أنه سمع أباه يقول … فذكره مرسلًا. وخالف أحمدَ بنَ عيسى المصريَّ فيه أحمدُ بنُ عمرو بن السَّرْح عند البيهقي في "شعب الإيمان" (1464) فرواه عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن عمارة بن غزية، عن عبد الله بن علي بن الحسين، أنه سمع أبا هريرة يقول … فذكره وذكر أبي هريرة في هذا الإسناد وهمٌ لا محالة، على أنه وإن صحَّ فيه ذكر أبي هريرة تنزُّلًا فيبعد سماع عبد الله بن علي بن الحسين منه بل يبعد إدراكه له كذلك، لأنَّ أباه علي بن الحسين كان عمره لما مات أبو هريرة تسعةَ عشرَ عامًا أو واحدًا وعشرين عامًا، فيبعد وجود ولد له يدرك السماع من أبي هريرة، والله أعلم.وقال الدارقطني في "العلل" (304): قول سليمان بن بلال أشبه بالصواب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2039)


2039 - حدَّثَناهُ أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنّى، حدثنا مُسدّد، حدثنا بشر بن المُفضَّل، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، عن سعيدٍ المَقبُري، عن أبي هريرة، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "رَغِمَ أنْفُ رجلٍ ذُكرتُ عنده فلم يُصَلِّ عَليَّ" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঐ ব্যক্তির নাক ধূলায় ধূসরিত হোক, যার সামনে আমার নাম উল্লেখ করা হলো, কিন্তু সে আমার উপর দরূদ পড়ল না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذ إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن إسحاق - وهو المدني - فهو صدوق، وقد توبع. أبو المُثنَّى: هو معاذ بن المُثنَّى.وأخرجه أحمد 12/ (7451)، والترمذي (3545) من طريق ربعي بن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن إسحاق، به. وقال الترمذي: حسن غريب من هذا الوجه.وأخرجه ابن حبان (907) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صعِدَ المِنبرَ، فقال: "آمين آمين آمين"، قيل: يا رسول الله، إنك حين صعِدتَ المنبر قلت: آمين آمين آمين، قال: "إنَّ جبريل أتاني، فقال: … ومن ذُكِرتَ عنده فلم يُصَلِّ عليك فمات فدخل النار فأبعدَه اللهُ، قل: آمين، فقلت: آمين". وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو.وبنحو لفظ محمد بن عمرو عن أبي سلمة رواه أيضًا كثيرُ بنُ زيد عن الوليد بن رباح عن أبي هريرة عند البخاري في "الأدب المفرد" (646) وغيره، وإسناده حسن كذلك من أجل كثير والوليد.قوله: "رَغِمَ أنفُ رجل"، أي: لَصِق بالتراب، وهو كناية عن غاية الذُّلِّ والهَوان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2040)


2040 - حدثنا أحمد بن عُبيد الحافظ، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذِئْب، عن سعيد بن أبي سعيد، عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ما جَلَسَ قومٌ يَذكُرون اللهَ لم يُصلُّوا على نَبيِّهم، إلَّا كان ذلك المجلسُ عليهم تِرَةً، ولا قَعَدَ قومٌ لم يَذكُروا الله، إلَّا كان ذلك عليهم تِرَةً" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: কোনো সম্প্রদায় যখন আল্লাহকে স্মরণ করার জন্য বসে, কিন্তু তাদের নবীর উপর দরূদ পাঠ না করে, তখন সেই মজলিস তাদের জন্য আফসোস (বা ক্ষতির কারণ) হয়। আর কোনো সম্প্রদায় যখন বসে, কিন্তু আল্লাহকে স্মরণ না করে, সেটাও তাদের জন্য আফসোস (বা ক্ষতির কারণ) হয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف فيه في تسمية التابعي فسُمِّي هنا في رواية آدم بن أبي إياس عن ابن أبي ذئب: إسحاقَ بنَ عبد الله بن الحارث، وسماه يحيى بن سعيد القطان في روايته عن ابن أبي ذئب: إسحاق مولى الحارث، وكذلك سمّاه القاسم بن يزيد الجَرْمي في روايته عن ابن أبي ذئب لكنه أسقط سعيدًا المقبري من الإسناد، وكل ذلك وهم، قال المزي في "تهذيب الكمال" 2/ 502: قال عبد الله بن المبارك وعثمان بن عمر بن فارس ويحيى بن سعيد القطان: عن ابن أبي ذئب (وهو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة) عن سعيد المقبري، عن أبي إسحاق مولى عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة، وهو الصواب. قلنا: كذلك عدَّ المزيُّ يحيى بنَ سعيد القطان ممّن ذكر أبا إسحاق بدل إسحاق، اعتمادًا على ما وقع له في النسخ التي اعتمدها من "سنن النسائي الكبرى"، لكن ذكر الحافظ في "النكت الظراف" 10/ (14856) أنه وقع في رواية حمزة الكناني لسنن النسائي: إسحاق، بدل أبي إسحاق. قلنا: وهو الذي جاء في مصادر التخريج التي خرَّجت هذا الحديثَ من طريق يحيى القطان، فكأنَّ هذا الوهم كله من جهة ابن أبي ذئبٍ، والله أعلم.وممَّن سمَّاه أبا إسحاق مولى عبد الله بن الحارث أيضًا رَوح بن عُبادة، فهو الصواب، كما قال المزي، وإذا عرفنا ذلك فأبو إسحاق مولى عبد الله بن الحارث هذا تابعي روى عنه تابعي معروف بالرواية عن أبي هريرة، فيحتمل تحسينُ حديثه، على أنَّ هذا الحديث مرويٌّ بنحو هذا اللفظ من طريق أبي صالح السمان عن أبي هريرة كما تقدَّم عند المصنف بالأرقام (1829 - 1831) بإسناد صحيح، ومن طريق صالح مولى التوأمة أيضًا عن أبي هريرة كما تقدَّم برقم (1847) بإسناد حسن، فالحديث صحيح بهذا اللفظ.ولا تُعِلُّ رواية سعيد المقبري هذه عن أبي إسحاق مولى عبد الله بن الحارث عن أبي هريرة، روايةَ سعيد المقبري التي قبل هذه عن أبي هريرة مباشرة بدون واسطةٍ بينهما، لأنهما سياقان مختلفان، فهما حديثان، والله تعالى أعلم. وأخرجه أحمد 15/ (9583) عن روح بن عُبادة، والنسائي (10165) من طريق عبد الله بن المبارك، والنسائي أيضًا كما في "تحفة الأشراف" للمزي 10/ (14856) من طريق عثمان بن عمر، ثلاثتهم عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (9583)، والنسائي (10166) من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن إسحاق - وقيّد في رواية النسائي بمولى الحارث - عن أبي هريرة. كذا سمّاه القطانُ إسحاقَ وأنه مولى الحارث!وأخرجه النسائي (10168) من طريق القاسم بن يزيد الجرمي، عن ابن أبي ذئب، عن إسحاق، عن أبي هريرة. كذا سماه القاسمُ إسحاقَ، وأسقط سعيدًا المقبري من الإسناد!وأخرج شطره الثاني ابنُ حبان (853) من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة. فأسقط من إسناده أبا إسحاق مولى عبد الله بن الحارث، لكن الوليد بن مسلم يدلّس تدليس التسوية، فلا يبعد أن يكون دلّس أبا إسحاق من الإسناد.وأصل التِّرةِ: النقصُ، ومعناها ها هنا التَّبِعة والمؤاخذة.