হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2881)


2881 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نَصْر بن سابِق الخَوْلاني، حدثنا أيوب بن سُويد، حدثنا إبراهيم بن أبي عَبْلة، عن عبد الأعلى بن الدَّيلمي، عن واثلةَ بن الأسقع، سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أعتق مسلمًا كانَ فَكَاكَهُ مِن النار، بكلِّ عُضوٍ من هذا عضوًا من هذا" [1].عبد الأعلى هذا أيضًا هو عبد الله بن الدَّيلمي بلا شكِّ فيه، كما قُلناه في غَريف.




ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি কোনো মুসলমানকে দাসত্বমুক্ত করবে, তার সেই মুক্তিদান জাহান্নাম থেকে তার মুক্তির কারণ হবে—(মুক্তিদাতার) প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে (জাহান্নাম থেকে) এই (মুক্ত দাসটির) প্রতিটি অঙ্গের মুক্তি মিলবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف أيوب بن سويد، ويغلب على ظننا أنه أخطأ في تسمية ابن الدَّيلمي بعبد الأعلى، وإنما هو عبد الله، ولهذا ضبّب فوقها في (ز)، وممّا يؤيده أنه سماه على الصواب في رواية عنه عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 241، وعلى أي حال فقد توبع في الطريق السابقة.وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (41) من طريق هشام بن عمار، وأبو حفص بن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (575) من طريق إبراهيم بن منقذ، كلاهما عن أيوب بن سويد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 46/ 241 من طريق عمرو بن عبد الله بن صفوان النصْري والد الحافظ أبي زرعة الدمشقي، عن أيوب بن سويد، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن عبد الله بن الدَّيلمي، عن واثلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2882)


2882 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، قال: سمعت أبا إسحاق، أنه سمع أبا حَبيبة.وأخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو نُعيم وأبو حُذيفة، قالا: حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي حَبيبة الطائي، قال: أَوصى إليَّ أخي بطائفة من ماله، فلقيتُ أبا الدرداء، فقلت: إنَّ أخي قد أوصى إليَّ بطائفة من ماله، فأين أضعُه، في الفقراء أو المجاهدين أو المساكين؟ فقال: أمّا أنا فلو كنتُ، لم أَعدلْ بالمجاهدين، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَثَلُ الذي يُعتِقُ عند الموت، كمَثَل الذي يُهدي إذا شَبِعَ" [1]. هذا لفظ حديث الثَّوْري. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হাবীবা তাঈ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন যে, তাঁর ভাই সম্পদের যে অংশ অসিয়ত করে গেছেন, তা তিনি কোথায় রাখবেন—ফকিরদের মধ্যে, নাকি মুজাহিদদের মধ্যে, নাকি মিসকিনদের মধ্যে? তিনি (আবূ দারদা) বললেন: আমি যদি হতাম, তবে মুজাহিদদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতাম না। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "যে ব্যক্তি মৃত্যুর সময় (দাস) মুক্ত করে বা দান করে, তার উপমা হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে পেট ভরে খাওয়ার পর উপহার দেয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن كما قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 8/ 532، وذلك من أجل أبي حبيبة الطائي، فهو - وإن لم يرو عنه غير أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي - من كبار التابعين كما يظهر من قصة دخوله على أبي الدرداء وروايته عنه، وأبو الدرداء متقدم الوفاة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد صحَّح حديثَه هذا جماعةٌ غير المصنف، منهم الترمذي وابن حبان.أبو نُعيم: هو الفضل بن دُكين، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وسفيان: هو الثَّوري.وأخرجه أحمد 36/ (21719) و 45/ (27533) والترمذي (2123) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، و 45/ (27533) عن وكيع، وأبو داود (3968) عن محمد بن كثير العَبْدي، ثلاثتهم عن سفيان الثَّوري، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (4873) من طريق أبي الأحوص سلّام بن سليم، وابن حبان (3336) من طريق إدريس بن يزيد الأودي، كلاهما عن أبي إسحاق، به. لكن قال إدريس في روايته: "مثل الذي يتصدق" بدل "يُعتق".وأخرجه النسائي (6408) عن محمد بن بشار، عن محمد بن جعفر، عن شعبة، قال: سمعت أبا إسحاق، به.لكن خالف محمدَ بنَ بشار أحمدُ بن حنبل في "مسنده" 36/ (21718) فرواه عن محمد بن جعفر، عن شعبة، عن عطاء بن السائب، قال: سمعت أبا إسحاق، به. فزاد فيه بين شعبة وبين أبي إسحاق عطاء بن السائب، وقد انفرد الإمام أحمد بذلك، فقد رواه جماعة عن شعبة، لم يذكر أحد منهم في إسناده عطاء بن السائب، وهذا يوافق رواية محمد بن بشار عن محمد بن جعفر، وشعبة معروف بروايته عن أبي إسحاق السَّبيعي بدون واسطة، فإن ثبت ما في رواية الإمام أحمد فلعل شعبة يكون سمعه على الوجهين، ويكون ذكر عطاء بن السائب من المزيد في متصل الأسانيد، والله تعالى أعلم.ويشهد لمعناه حديث أبي هريرة عند البخاري (1419)، ومسلم (1032)، وغيرهما، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال - وسئل: أي الصدقة أعظم؟ -: "أن تَصدَّقَ وأنت صحيح شحيح، تخشى الفقر وتأمل الغنى، ولا تُمهل حتى إذا بلغتِ الحُلقومَ قلتَ: لفلانٍ كذا ولفُلانٍ كذا، ألا وقد كان لفلانٍ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2883)


2883 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق القاضي وأحمد بن حازم الغِفاري، قالا: حدثنا يعلى بن عُبيد الطَّنافسي، حدثنا محمد بن إسحاق، عن بُكير بن عبد الله بن الأشَجّ، عن سُليمان بن يَسَار، عن مَيمُونة، قالت: أعتقتُ جاريةً لي، فدخلَ عليَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، وأخبرتُه بعِتقها، قال: "أمَا إنكِ لو كنتِ أعطَيتِيها أَخوالَك، كان أعظمَ لأجرِكِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه [2].




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বললেন, আমি আমার একটি দাসীকে মুক্ত করে দিলাম। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন। আমি তাঁকে দাসীটি মুক্ত করার কথা জানালে তিনি বললেন: "শোনো, তুমি যদি তাকে তোমার মাতৃপক্ষের আত্মীয়স্বজনকে দিতে, তবে তোমার সওয়াব আরও বেশি হতো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لأنَّ محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - مدلِّس، ولم يصرح فيه بسماعه، بل عنعنه، وخولف فيه أيضًا، فرواه جماعة منهم عمرو بن الحارث المصري ويزيد بن أبي حبيب، فرووه عن بكير عن كُريب مولى ابن عباس عن ميمونة، فذكروا كريبًا بدل سليمان بن يسار، وكلاهما ثقة.وأخرجه أحمد 44/ (26817) عن يعلى بن عبيد بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (1527) من طريق أبي معاوية الضرير ومن طريق عبدة بن سليمان، كلاهما عن محمد بن إسحاق. البصري - من سعد مولى أبي بكر، ولا سيما وقد انفرد الحسن بالرواية عنه، لكن جاء الخبر من وجه آخر مرسل، فيعتضدان.وأخرجه أحمد 3/ (1717) عن أبي داود الطيالسي سليمان بن داود، عن أبي عامر صالح بن رستم، به.وأخرجه أبو إسحاق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني في "أمارات النبوة" كما في "جامع الآثار في السير ومولد المختار" لابن ناصر الدين الدمشقي 7/ 332 عن أبي توبة الربيع بن نافع، عن معاوية بن سلّام، عن أبي قلابة عبد الله بن زيد الجرمي، مرسلًا. ورجاله ثقات.الماهن: الخادم.



[2] بل قد أخرجاه كما قدمنا بيانه برقم (1527). البصري - من سعد مولى أبي بكر، ولا سيما وقد انفرد الحسن بالرواية عنه، لكن جاء الخبر من وجه آخر مرسل، فيعتضدان.وأخرجه أحمد 3/ (1717) عن أبي داود الطيالسي سليمان بن داود، عن أبي عامر صالح بن رستم، به.وأخرجه أبو إسحاق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني في "أمارات النبوة" كما في "جامع الآثار في السير ومولد المختار" لابن ناصر الدين الدمشقي 7/ 332 عن أبي توبة الربيع بن نافع، عن معاوية بن سلّام، عن أبي قلابة عبد الله بن زيد الجرمي، مرسلًا. ورجاله ثقات.الماهن: الخادم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2884)


2884 - أخبرنا أبو بكر بن سلْمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكْرَم البَزَّاز، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا أبو عامر صالح بن رُستُم، عن الحسن، عن سعد مولى أبي بكر الصِّدِّيق: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر الصِّدِّيق - وكان سعد مملوكًا له وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعجِبُه خدمتُه - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا بكر، أعتِقْ سعدًا" فقال: يا رسول الله، ما لَنا ماهِنٌ غيرُه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أتتكَ الرجالُ، أتتكَ الرجالُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সা'দ মাওলা আবূ বকর আস-সিদ্দীক থেকে বর্ণিত, সা'দ ছিলেন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গোলাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর খেদমত পছন্দ করতেন। একবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “হে আবূ বকর, সা'দকে মুক্ত করে দাও।” আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল, সে ছাড়া আমাদের আর কোনো সেবক নেই।” তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমার কাছে লোকজন আসবে, তোমার কাছে লোকজন আসবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن لم نتبين هل سمع الحسن - وهو البصري - من سعد مولى أبي بكر، ولا سيما وقد انفرد الحسن بالرواية عنه، لكن جاء الخبر من وجه آخر مرسل، فيعتضدان.وأخرجه أحمد 3/ (1717) عن أبي داود الطيالسي سليمان بن داود، عن أبي عامر صالح بن رستم، به.وأخرجه أبو إسحاق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني في "أمارات النبوة" كما في "جامع الآثار في السير ومولد المختار" لابن ناصر الدين الدمشقي 7/ 332 عن أبي توبة الربيع بن نافع، عن معاوية بن سلّام، عن أبي قلابة عبد الله بن زيد الجرمي، مرسلًا. ورجاله ثقات.الماهن: الخادم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2885)


2885 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد الصيرفي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى، حدثنا أبو مَعمَر، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، حدثنا سعيد بن جُمْهان، حدثني سَفينة قال: قالت لي أم سَلَمة: أُعتقُكَ وأَشترِطُ عليك أن تخدُم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ما عشتَ؟ قال: قلت: لو أنك لم تشترطي عليَّ، ما فارقتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ما عشتُ؟ قال: فأعتقتْني واشترطَتْ عليَّ أن أخدُم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ما عشتُ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: “আমি তোমাকে মুক্ত করে দিলাম, তবে আমি তোমার উপর এই শর্ত আরোপ করছি যে তুমি যতদিন জীবিত থাকবে, ততদিন আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করবে।” তিনি (সফীনা) বললেন: আমি বললাম, “যদি আপনি আমার উপর এই শর্ত আরোপ নাও করতেন, তবুও আমি যতদিন বেঁচে থাকতাম, ততদিন আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ছেড়ে যেতাম না।” তিনি (উম্মে সালামাহ) আমাকে মুক্ত করে দিলেন এবং আমার উপর শর্ত আরোপ করলেন যে আমি যেন যতদিন জীবিত থাকি, ততদিন আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل سعيد بن جمهان. أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو المُقعَد.وأخرجه أبو داود (3932)، والنسائي (4976) من طريقين عن عبد الوارث بن سعيد، به.وسيأتي مختصرًا برقم (6694) من طريق حماد بن سلمة عن سعيد بن جُهمان. وصله وإرساله، فروي عنه كما وقع في رواية المصنف هنا موصولًا، مع أنه جاء في "جامع الثَّوري" كما قال البيهقي 6/ 279 - وهو أيضًا من رواية علي بن الحسن الهلالي عن عبد الله بن الوليد العَدَني - عن عطاء بن أبي رباح مرسلًا، وكذلك رواه وكيع وعبد الرزاق عن سفيان الثَّوري عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.ورواه عُبيد بن سعيد الأُموي وفردوس الأشعري كما في "أطراف الغرائب والأفراد" لابن طاهر المقدسي (2329) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن ابن عباس، فذكر ابن عباس بدل عائشة، ولم يذكرا عطاء بن أبي رباح، وحبيب قد سمع ابن عباس فيما نص عليه ابن معين والعجلي.وأخرجه البيهقي 6/ 279 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال: كذا أخبرنا به، وهو خطأ، إنما رواه علي بن الحسن الهلالي في "جامع الثَّوري" عن عبد الله بن الوليد، عن الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء بن أبي رباح: أنَّ رجلًا قال، فذكره.وأخرجه البيهقي أيضًا من طريق سفيان بن محمد الجوهري، عن علي بن الحسن، عن عبد الله بن الوليد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.وأخرجه عبد الرزاق (16340)، وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 387 عن وكيع بن الجراح، كلاهما (عبد الرزاق ووكيع) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء، مرسلًا أيضًا.وأخرجه أبو إسحاق الهاشمي في الجزء الأول من "أماليه" (105)، والطبراني في "الكبير" (12683) من طريق عُبيد بن سعيد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عباس. وقد وافقه فردوس الأشعري كما قدَّمنا.ويشهد له حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ العاص بن وائل أوصى أن يُعتَقَ عنه مئة رقبة، فأعتق ابنه هشام خمسين رقبة، فأراد ابنه عمرو أن يُعتق عنه الخمسين الباقية، فقال: حتى أسأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنَّ أبي أوصى بعتق مئة رقبة، وإنَّ هشامًا أعتق عنه خمسين، وبقيت عليه خمسون رقبة، أفأعتق عنه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنه لو كان مسلمًا فأعتقتم عنه، أو تصدقتم عنه، أو حججتم عنه، بلغه ذلك". أخرجه أحمد 11/ (6704)، وأبو داود (2883)، واللفظ له، وإسناده حسن.ويشهد له أيضًا ما أخرجه عبد الرزاق (16345)، وأبو عبيد في "الغريب" 4/ 309، والبيهقي 6/ 279 عن عائشة: أنَّ أخاها عبد الرحمن بن أبي بكر مات في منامه، فأعتقت عنه عائشة، تِلادًا من تلاده. والتِّلاد: كل مالٍ قَدُم. وإسناده صحيح موقوفًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2886)


2886 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا علي بن الحسن الهِلالي، حدثنا عبد الله بن الوليد العَدَني، حدثنا سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء، عن عائشة، قالت: قال رجل: أُعتقُ عن أبي [1] يا رسول الله؟ قال: "نعم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি জিজ্ঞাসা করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি আমার পিতার পক্ষ থেকে (গোলাম) মুক্ত করব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হ্যাঁ।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في أُصولنا إلى: ابني، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 79، عن أبي عبد الله الحاكم في كتاب "المستدرك"، وهو الموافق لعامة مصادر تخريج الحديث. وصله وإرساله، فروي عنه كما وقع في رواية المصنف هنا موصولًا، مع أنه جاء في "جامع الثَّوري" كما قال البيهقي 6/ 279 - وهو أيضًا من رواية علي بن الحسن الهلالي عن عبد الله بن الوليد العَدَني - عن عطاء بن أبي رباح مرسلًا، وكذلك رواه وكيع وعبد الرزاق عن سفيان الثَّوري عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.ورواه عُبيد بن سعيد الأُموي وفردوس الأشعري كما في "أطراف الغرائب والأفراد" لابن طاهر المقدسي (2329) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن ابن عباس، فذكر ابن عباس بدل عائشة، ولم يذكرا عطاء بن أبي رباح، وحبيب قد سمع ابن عباس فيما نص عليه ابن معين والعجلي.وأخرجه البيهقي 6/ 279 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال: كذا أخبرنا به، وهو خطأ، إنما رواه علي بن الحسن الهلالي في "جامع الثَّوري" عن عبد الله بن الوليد، عن الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء بن أبي رباح: أنَّ رجلًا قال، فذكره.وأخرجه البيهقي أيضًا من طريق سفيان بن محمد الجوهري، عن علي بن الحسن، عن عبد الله بن الوليد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.وأخرجه عبد الرزاق (16340)، وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 387 عن وكيع بن الجراح، كلاهما (عبد الرزاق ووكيع) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء، مرسلًا أيضًا.وأخرجه أبو إسحاق الهاشمي في الجزء الأول من "أماليه" (105)، والطبراني في "الكبير" (12683) من طريق عُبيد بن سعيد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عباس. وقد وافقه فردوس الأشعري كما قدَّمنا.ويشهد له حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ العاص بن وائل أوصى أن يُعتَقَ عنه مئة رقبة، فأعتق ابنه هشام خمسين رقبة، فأراد ابنه عمرو أن يُعتق عنه الخمسين الباقية، فقال: حتى أسأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنَّ أبي أوصى بعتق مئة رقبة، وإنَّ هشامًا أعتق عنه خمسين، وبقيت عليه خمسون رقبة، أفأعتق عنه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنه لو كان مسلمًا فأعتقتم عنه، أو تصدقتم عنه، أو حججتم عنه، بلغه ذلك". أخرجه أحمد 11/ (6704)، وأبو داود (2883)، واللفظ له، وإسناده حسن.ويشهد له أيضًا ما أخرجه عبد الرزاق (16345)، وأبو عبيد في "الغريب" 4/ 309، والبيهقي 6/ 279 عن عائشة: أنَّ أخاها عبد الرحمن بن أبي بكر مات في منامه، فأعتقت عنه عائشة، تِلادًا من تلاده. والتِّلاد: كل مالٍ قَدُم. وإسناده صحيح موقوفًا.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه اختُلف فيه على سفيان - وهو الثَّوري - في وصله وإرساله، فروي عنه كما وقع في رواية المصنف هنا موصولًا، مع أنه جاء في "جامع الثَّوري" كما قال البيهقي 6/ 279 - وهو أيضًا من رواية علي بن الحسن الهلالي عن عبد الله بن الوليد العَدَني - عن عطاء بن أبي رباح مرسلًا، وكذلك رواه وكيع وعبد الرزاق عن سفيان الثَّوري عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.ورواه عُبيد بن سعيد الأُموي وفردوس الأشعري كما في "أطراف الغرائب والأفراد" لابن طاهر المقدسي (2329) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن ابن عباس، فذكر ابن عباس بدل عائشة، ولم يذكرا عطاء بن أبي رباح، وحبيب قد سمع ابن عباس فيما نص عليه ابن معين والعجلي.وأخرجه البيهقي 6/ 279 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال: كذا أخبرنا به، وهو خطأ، إنما رواه علي بن الحسن الهلالي في "جامع الثَّوري" عن عبد الله بن الوليد، عن الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء بن أبي رباح: أنَّ رجلًا قال، فذكره.وأخرجه البيهقي أيضًا من طريق سفيان بن محمد الجوهري، عن علي بن الحسن، عن عبد الله بن الوليد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء مرسلًا.وأخرجه عبد الرزاق (16340)، وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 387 عن وكيع بن الجراح، كلاهما (عبد الرزاق ووكيع) عن سفيان الثَّوري، عن حبيب، عن عطاء، مرسلًا أيضًا.وأخرجه أبو إسحاق الهاشمي في الجزء الأول من "أماليه" (105)، والطبراني في "الكبير" (12683) من طريق عُبيد بن سعيد، عن سفيان الثَّوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عباس. وقد وافقه فردوس الأشعري كما قدَّمنا.ويشهد له حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ العاص بن وائل أوصى أن يُعتَقَ عنه مئة رقبة، فأعتق ابنه هشام خمسين رقبة، فأراد ابنه عمرو أن يُعتق عنه الخمسين الباقية، فقال: حتى أسأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنَّ أبي أوصى بعتق مئة رقبة، وإنَّ هشامًا أعتق عنه خمسين، وبقيت عليه خمسون رقبة، أفأعتق عنه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنه لو كان مسلمًا فأعتقتم عنه، أو تصدقتم عنه، أو حججتم عنه، بلغه ذلك". أخرجه أحمد 11/ (6704)، وأبو داود (2883)، واللفظ له، وإسناده حسن.ويشهد له أيضًا ما أخرجه عبد الرزاق (16345)، وأبو عبيد في "الغريب" 4/ 309، والبيهقي 6/ 279 عن عائشة: أنَّ أخاها عبد الرحمن بن أبي بكر مات في منامه، فأعتقت عنه عائشة، تِلادًا من تلاده. والتِّلاد: كل مالٍ قَدُم. وإسناده صحيح موقوفًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2887)


2887 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا محمد بن الحسن بن قُتيبة وعبد الله بن محمد بن سَلْم، قالا: حدثنا إبراهيم بن محمد بن يوسف الفِرْيابي، حدثنا ضَمْرة بن ربيعة، عن سفيان، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن مَلَك ذا رَحِمٍ مَحْرَمٍ، فهو حُرٌّ" [1].2887 م - وحدثنا أبو علي، بإسناده سواءً: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الوَلاءِ وعن هِبَتِه [2].سمعتُ أبا علي الحافظ، يقول: إنما ذكرتُ المتن الثاني ليزولَ به الوَهْم [3] عن ضَمْرة.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وشاهدُه الحديث الصحيح المحفوظ عن سَمُرة بن جُندُب:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, “যে ব্যক্তি এমন কোনো আত্মীয়কে মালিকানাভুক্ত করবে যার সাথে তার মাহরামের সম্পর্ক রয়েছে, তবে সে (আত্মীয়) মুক্ত হয়ে যাবে।”

এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম 'ওয়ালা' (মুক্তির কারণে সৃষ্ট আনুগত্যের অধিকার) বিক্রি করতে এবং তা হেবা (দান) করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن بعض أهل العلم أنكره على ضمرة، وأنه انفرد به بهذا الإسناد، منهم أحمد بن حنبل والترمذي والنسائي والبيهقي، ولم يعبأ بهذا الإعلال آخرون من أهل العلم فصحَّحوه، منهم ابن الجارود وأبو علي الحافظ وابن حزم وعبد الحق الإشبيلي وابن القطان الفاسي وابن التركماني، وقد روي من حديث سمرة بن جندب كما نبّه عليه المصنف وسيخرجه بعده.وأخرجه ابن ماجه (2525) عن راشد بن سعيد الرملي وعُبيد الله بن الجهم الأنماطي، والنسائي (4877) عن عيسى بن محمد الرملي وعيسى بن يونس الفاخوري، كلهم عن ضمرة بن ربيعة، بهذا الإسناد.وذو الرحم المحرَم: هم الأقارب، ويقع على كل من يجمع بينك وبينه نَسبٌ.



[2] سيأتي تخريج حديث الولاء هذا عند الحديث رقم (8189).



2887 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الزُّهْري، ثم عُدّلت في (ز).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2888)


2888 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن بكر.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحَنْظَلي وإسحاق بن منصور المروَزي، قالا: حدثنا محمد بن بكر البُرساني، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن عاصم الأحول وقَتَادة، عن الحسن، عن سمُرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن مَلَك ذا رَحِم، فهو حُرٌّ" [1].




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি রক্তসম্পর্কীয় কোনো আত্মীয়ের মালিক হয়, সে মুক্ত।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد ثبت سماع الحسن - وهو البصري - من سمرة كما بيناه برقم (151).وأخرجه ابن ماجه (2524) عن إسحاق بن منصور، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2524)، والترمذي (1365) عن عقبة بن مُكرم، والنسائي (4882) عن عبيد الله بن سعيد، كلاهما عن محمد بن بكر، به.وأخرجه أبو داود (3949) عن مسلم بن إبراهيم وموسى بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن قتادة وحده، به. وقد ردّت أم المؤمنين عائشةُ على أبي هريرة كما سيأتي برقم (2891).وأخرج النسائي (4904) و (4905) من طريقين عن مجاهد، عن ابن أبي ذُباب، عن أبي هريرة، رفعه: "لا يدخل الجنة ولد زنية"، وقد اختُلف فيه عن مجاهد في تعيين شيخه، وبعضهم يسقط الواسطة بين مجاهد وأبي هريرة، لكن قال الدارقطني في "العلل" (1664): الأشبه من ذلك قول من ذكر ابن أبي ذُباب. قلنا: وابن أبي ذباب هذا ثقة، لكن اختُلف على مجاهد في رفعه ووقفه أيضًا، فقد وقفه عنه الحكم بن عُتيبة عند النسائي (4906)، والأعمش كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 132، فالأظهر وقفه، والله أعلم، وعلى تقدير صحته فهو محمول كما قال الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 2/ 271 على من تحقق بالزنى حتى غلب عليه، فاستحق بذلك أن يُنسب إليه، كما يقال: بنو الدنيا لمن تحقق وعلم بها وترك ما سواها، وكما يقال لمن تحقق بالحذر: ابن أحذار، وكما قيل للمسافر: ابن السبيل. وليس المقصود ولده من الزنى.وقوله: "أمتِّع" على صيغة المتكلم المعلوم، بمعنى: أتصدّق بشيءٍ ولو حقيرًا كسوط يُستمتَع به ويُنتَفعُ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2889)


2889 - حدثنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حدثنا صالح بن محمد الحافظ، حدثنا أبو الربيع الزَّهْراني وعثمان بن أبي شَيْبة وزهير بن حَرْب، قالوا: حدثنا جَرير، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ولدُ الزنى شَرُّ الثلاثة".قال أبو هريرة: لأن أُمتِّعَ بسوطٍ في سبيل الله، أحبُّ إليَّ من أن أُعتق ولدَ زِنْيةٍ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد من حديث أبي سلمة عن أبي هريرة:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ব্যভিচারের সন্তান হলো তিনজনের মধ্যে নিকৃষ্ট।" আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর পথে একটি চাবুক দিয়ে উপকৃত হওয়া আমার কাছে ব্যভিচারের সন্তানকে আযাদ করে দেওয়ার চেয়ে অধিক প্রিয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو الربيع الزهراني: هو سليمان بن داود، وجرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه أبو داود (3963) عن إبراهيم بن موسى، والنسائي (4909) عن إسحاق بن راهويه، كلاهما عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد. ولم يذكر النسائي قول أبي هريرة.وأخرجه كذلك أحمد 13/ (8098) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، عن سهيل، به.وسيأتي برقم (7231) من طريق سفيان الثَّوري عن سهيل بن أبي صالح. وسيأتي بعده وبرقم (7232) من طريق عمر بن أبي سلمة عن أبيه، عن أبي هريرة دون قوله: لأن أُمتِّع بسوط … وستذكر عائشة هذا الحرف مرفوعًا برقم (2891).وقال سفيان الثَّوري - وقد روى هذا الحديثَ عن جرير عند البيهقي 10/ 58 - : يعني إذا عمل بعمل والديه. وقد رُوي قول سفيان هذا مرفوعًا من حديث عائشة عند أحمد 41/ (24784)، لكن في إسناده إبراهيم بن إسحاق، وهو إبراهيم بن الفضل أبو إسحاق، وهو متروك. وقد ردّت أم المؤمنين عائشةُ على أبي هريرة كما سيأتي برقم (2891).وأخرج النسائي (4904) و (4905) من طريقين عن مجاهد، عن ابن أبي ذُباب، عن أبي هريرة، رفعه: "لا يدخل الجنة ولد زنية"، وقد اختُلف فيه عن مجاهد في تعيين شيخه، وبعضهم يسقط الواسطة بين مجاهد وأبي هريرة، لكن قال الدارقطني في "العلل" (1664): الأشبه من ذلك قول من ذكر ابن أبي ذُباب. قلنا: وابن أبي ذباب هذا ثقة، لكن اختُلف على مجاهد في رفعه ووقفه أيضًا، فقد وقفه عنه الحكم بن عُتيبة عند النسائي (4906)، والأعمش كما في "التاريخ الكبير" للبخاري 5/ 132، فالأظهر وقفه، والله أعلم، وعلى تقدير صحته فهو محمول كما قال الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 2/ 271 على من تحقق بالزنى حتى غلب عليه، فاستحق بذلك أن يُنسب إليه، كما يقال: بنو الدنيا لمن تحقق وعلم بها وترك ما سواها، وكما يقال لمن تحقق بالحذر: ابن أحذار، وكما قيل للمسافر: ابن السبيل. وليس المقصود ولده من الزنى.وقوله: "أمتِّع" على صيغة المتكلم المعلوم، بمعنى: أتصدّق بشيءٍ ولو حقيرًا كسوط يُستمتَع به ويُنتَفعُ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2890)


2890 - أخبرَناه أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا أبو عَوَانة عن عُمر بن أبي سلَمة، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ولدُ الزنى شرُّ الثلاثةِ" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ব্যভিচারের সন্তান তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، لكن سيأتي توجيه عائشة أم المؤمنين له على وفق القصة التي ورد الحديثُ لأجلها بعده، وهذا إسناد حسن في المتابعات من أجل عمر بن أبي سلمة - وهو ابن عبد الرحمن بن عوف - وقد روى المصنف الحديث قبلَه من وجه آخر صحيح عن أبي هريرة. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليَشكُري.وأخرجه البيهقي 10/ 58 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7232) من طريق عمرو بن عون عن أبي عوانة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2891)


2891 - فحدَّثَنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا الحسن بن عُمر بن شَقيق، حدثنا سلمة بن الفَضْل، عن محمد بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن عُرْوة بن الزُّبَير، قال: بلغ عائشةَ أنَّ أبا هُريرة يقول: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لَأن أُمتِّعَ بسَوطي في سبيل الله، أحبُّ إليَّ مِن أن أُعتق ولدَ الزنى"، وإنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "ولدُ الزنى شرُّ الثلاثة، وإنَّ الميتَ يُعذَّب ببُكاء الحيّ".فقالت عائشة: رَحِمَ الله أبا هريرة أساءَ سمعًا وأساء إجابةً: أما قوله: "لأن أُمتِّعَ بسَوطٍ في سبيل الله أحبُّ إليَّ من أن أُعتقَ ولدَ الزنى"، إنها لما نزلت {فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَ (11) وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْعَقَبَةُ} [البلد: 11، 12]، قيل: يا رسول الله، ما عندنا ما نُعتِق إلّا أنَّ أحدَنا له الجاريةُ السوداء تخدُمه وتسعى عليه، فلو أمرناهُنّ فزنَين فجئن بأولادٍ فأعتقناهُم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لَأن أُمتِّعَ بسَوطٍ في سبيل الله، أحبُّ إليَّ من أن آمُرَ بالزنى، ثم أُعتِقَ الولدَ".وأما قوله: "ولدُ الزّنى شرُّ الثلاثة" فلم يكنِ الحديثُ على هذا، إنما كان رجلٌ من المنافقين يؤذي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "من يَعذِرُني من فلان؟ " قيل: يا رسول الله، إنه مع ما به ولدُ الزنى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هو شرُّ الثلاثةِ"، والله عز وجل يقول: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الإسراء: 15].وأما قوله: "إن الميتَ ليُعذَّبُ ببُكاء الحيّ" فلم يكنِ الحديثُ على هذا، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ بدارِ رجلٍ من اليهود قد مات وأهلُه يبكون عليه، فقال: "إنهم يَبكُون عليه، وإنه ليُعذَّبُ"، والله عز وجل يقول: {لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا} [البقرة: 286] [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর (রাহ.) বলেন, তাঁর কাছে (আয়েশা রাঃ-এর কাছে) খবর পৌঁছালো যে, আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর পথে আমার চাবুক ব্যবহার করা আমার কাছে যেনার সন্তানকে মুক্ত করে দেওয়ার চেয়েও বেশি প্রিয়।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: "যেনার সন্তান তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।" এবং "জীবিত ব্যক্তির কান্নার কারণে মৃতের শাস্তি হয়।"

তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আবু হুরায়রাকে রহম করুন। তিনি ভালোভাবে শোনেননি এবং ভালোভাবে জবাবও দেননি।

আর তাঁর উক্তি: "আল্লাহর পথে আমার চাবুক ব্যবহার করা আমার কাছে যেনার সন্তানকে মুক্ত করে দেওয়ার চেয়েও বেশি প্রিয়" সম্পর্কে (বলছি): যখন আয়াতটি নাযিল হলো: "কিন্তু সে দুর্গম পথে প্রবেশ করেনি। আর আপনি কি জানেন সেই দুর্গম পথ কী?" [সূরা বালাদ: ১১-১২], তখন বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কাছে (দাস) মুক্ত করার মতো কিছু নেই। তবে আমাদের কারো কারো এমন কালো দাসী আছে, যারা আমাদের খেদমত করে এবং আমাদের জীবনধারণের ব্যবস্থা করে। যদি আমরা তাদেরকে যেনা করার নির্দেশ দেই এবং তারা সন্তান প্রসব করে, তবে আমরা তাদের মুক্ত করতে পারি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহর পথে আমার চাবুক ব্যবহার করা আমার কাছে প্রিয়, এর চেয়ে যে আমি যেনার নির্দেশ দেই এবং তারপর সন্তানকে মুক্ত করি।"

আর তাঁর উক্তি, "যেনার সন্তান তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট" সম্পর্কে (বলছি): হাদীসটি এই বিষয়ে ছিল না। বরং মুনাফিকদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট দিত। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অমুকের হাত থেকে কে আমাকে রেহাই দেবে?" বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! তার যা কিছু আছে, তা সত্ত্বেও সে যেনার সন্তান। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (আসলে) তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।" অথচ আল্লাহ তাআলা বলেন: "কেউ অন্যের বোঝা বহন করবে না।" [সূরা ইসরা: ১৫]

আর তাঁর উক্তি, "জীবিত ব্যক্তির কান্নার কারণে মৃতের শাস্তি হয়" সম্পর্কে (বলছি): হাদীসটি এই বিষয়ে ছিল না। বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইয়াহুদী গোত্রের এক ব্যক্তির ঘরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে মারা গিয়েছিল এবং তার পরিজন তার জন্য কাঁদছিল। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তারা তার জন্য কাঁদছে, আর সে শাস্তি ভোগ করছে।" অথচ আল্লাহ তাআলা বলেন: "আল্লাহ কারো ওপর তার সাধ্যের অতিরিক্ত ভার চাপান না।" [সূরা বাকারা: ২৮৬]




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن لولا أنَّ فيه عنعنة محمد بن إسحاق، فهو مدلِّس، وسلمة بن الفضل - وهو الأبرش - من أوثق الناس في ابن إسحاق، وروايته للمغازي عنه أتم الروايات كما قال ابن معين. قلنا: فلا عجب إذًا أن لا يذكر هذا الخبرَ غيرُه عن ابن إسحاق، وقال البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (20238): قد رُوي عن بُرد بن سنان أبي سليمان الشامي عن الزُّهْري عن عائشة مرسلًا في إعتاق ولد الزنى، فدلَّ على أنَّ الحديث له أصل من حديث الزُّهْري، والله أعلم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 58، وفي "معرفة السنن" (20235 - 20237) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (910) عن صالح بن شعيب بن أبان البصري، عن الحسن بن عمر بن شقيق، به. لكن لم يسقه بتمامه.ويشهد للقسم الثاني من الحديث في ردّ عائشة على أبي هريرة في روايته بأنَّ ولد الزنى شر الثلاثة، ما رواه هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، كانت إذا قيل لها: هو شرُّ الثلاثة، عابت ذلك، وقالت: ما عليه من وزر أبويه؟ قال الله: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى}. أخرجه عبد الرزاق (13860) و (13861)، وابن أبي شيبة 2/ 216، وابن أبي داود في "مسند عائشة" (53)، وابن المنذر في "الأوسط" (1938)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1435، وغيرهم من طرق عن هشام، وإسناده صحيح.وروي عنها مرفوعًا كما سيأتي برقم (7230)، لكن الصحيح وقفه كما رواه جماعة أصحاب هشامٍ عنه.ويشهد للقسم الثالث ما روي عن عائشة أم المؤمنين أنها ردّت في ذلك على عبد الله بن عُمر، كما أخرجه أحمد 9/ (4959) و 40/ (24302)، والبخاري (3978)، ومسلم (929) و (931) و (932)، وغيرهم.وفي رواية عنها أنها ردّت في ذلك على عمر بن الخطاب أيضًا، كما أخرجه أحمد 1/ (288) و 40/ (26409)، والبخاري (1288)، ومسلم (929)، (23)، وغيرهم، وفي بعض هذه الروايات أنَّ عمر هو الذي حدّث ابنَه عبدَ الله بذلك.قوله: "من يَعذِرني" معناه: من ينصرني عليه، أو من يقوم بعذري إن كافأته على سوء فعله ولا يلومني.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2892)


2892 - حدثنا أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي والفضل بن محمد بن المسيَّب الشَّعْراني، قالا: حدثنا أبو صالح المصري عبد الله بن صالح كاتب الليث، حدثني الليث بن سعد، عن عمر بن عيسى القُرشي ثم الأسَدي، عن ابن جُرَيج، عن عطاء بن أبي رَبَاح، عن ابن عباس قال: جاءت جاريةٌ إلى عمر بن الخطاب، فقالت: إنَّ سيّدي اتهَمَني، فأقعدَني على النار حتى احترق فَرْجي، فقال لها عمر: هل رأى ذلك عليك؟ قالت: لا، قال: فهل اعترفتِ له بشيءٍ؟ قالت: لا، قال عمر: عليَّ به، فلما رأى عمرُ الرجلَ، قال: أتعذِّب بعذاب الله؟! قال: يا أمير المؤمنين، اتهمتُها في نفسي، قال: رأيتَ ذلك عليها؟ قال الرجلُ: لا، قال: فاعترفَتْ لك به؟ قال: لا، قال: والذي نفسي بيده، لو لم أسمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يُقادُ مملوكٌ مِن مالكِه، ولا والدٌ من وَلَدِه"، لأقدْتُها منكَ، فبَرَّزَه وضربَه مئة سوطٍ، وقال للجارية: اذهبي، فأنتِ حُرّةٌ لوجهِ الله، وأنتِ مولاةُ الله ورسولِه [1]. قال أبو صالح: قال الليث: وهذا القول معمولٌ به.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একটি দাসী উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলল: আমার মালিক আমাকে সন্দেহ করেছে এবং আমাকে আগুনের ওপর বসিয়ে দিয়েছে, ফলে আমার লজ্জাস্থান পুড়ে গেছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: সে কি তোমার উপর তা ঘটতে দেখেছিল? সে বলল: না। তিনি (উমর) বললেন: তুমি কি তার কাছে কিছু স্বীকার করেছিলে? সে বলল: না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকটিকে দেখলেন, তিনি বললেন: তুমি কি আল্লাহ্‌র শাস্তি দিয়ে শাস্তি দিচ্ছ?! লোকটি বলল: হে আমীরুল মুমিনীন, আমি মনে মনে তাকে সন্দেহ করেছিলাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কি তাকে এ অবস্থায় দেখেছিলে? লোকটি বলল: না। তিনি বললেন: সে কি তোমার কাছে তা স্বীকার করেছিল? লোকটি বলল: না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! যদি আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই কথা বলতে না শুনতাম যে, "কোনো মালিকের কাছ থেকে তার গোলামের কিসাস (প্রতিশোধমূলক শাস্তি) নেওয়া যাবে না, আর কোনো পিতার কাছ থেকে তার সন্তানের কিসাস নেওয়া যাবে না," তবে আমি অবশ্যই তোমার কাছ থেকে তার কিসাস নিতাম। এরপর তিনি লোকটিকে বের করে আনলেন এবং তাকে একশ’ চাবুক মারলেন। আর দাসীটিকে বললেন: যাও, তুমি আল্লাহ্‌র সন্তুষ্টির জন্য মুক্ত এবং তুমি আল্লাহ্‌ ও তাঁর রাসূলের মুক্তদাসী। আবূ সালিহ বলেন, লায়স বলেছেন: এই বক্তব্যটি (ফতোয়া হিসেবে) আমলযোগ্য।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن بطرقه وشواهده، وهذا إسناد ضعيف بمرّة من أجل عمر بن عيسى القرشي، فهو منكر الحديث كما قال البخاري والنسائي والذهبي في "تلخيصه"، واتهمه ابن حبان في "المجروحين" بالوضع، ولا يُعرف هذا الخبر إلّا به، ومع ذلك حسّن إسنادَه ابنُ كثير في "مسند الفاروق" (447) مع اطّلاعه على قول البخاري فيه!وأخرجه البيهقي 8/ 36 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. بلفظ: "ولا ولدٌ من والده"، وهو اللفظ الآتي في مكرره عند المصنف برقم (8300).وأخرجه ابن أبي عاصم في كتاب "الديات" ص 66، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5329)، والعقيلي في "الضعفاء" (1143)، والطبراني في "الأوسط" (8657)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 58، والإسماعيلي في "مسند عمر" كما في "مسند الفاروق" لابن كثير 1/ 372، وابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (563)، والبيهقي 8/ 36، وأبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (416) من طرق عن عبد الله بن صالح كاتب الليث، به. وعندهم جميعًا بلفظ: "ولا ولد من والده"، إلَّا ابن أبي عاصم فبلفظ: "ولا والد من ولده".وأخرج عبد الرزاق (17930) عن معمر، عن أيوب، عن أبي قلابة قال: وقع سفيان بن الأسود بن عبد الأسود على أَمَة له فأقعدها على مقلى، فاحترق عَجُزها، فأعتقها عمر بن الخطاب وأوجعه ضربًا.وأخرج أيضًا (17931) عن الثَّوري، عن عبد الملك بن أبي سليمان، عن رجل منهم، عن عمر: أنَّ رجلًا أقعد جارية له على النار، فأعتقها عمر.وفي "موطأ مالك" 2/ 776: أنه بلغه أنَّ عمر بن الخطاب أتته وليدة قد ضربها سيدها بنار أو أصابها بها فأعتقها.وروى عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر بن الخطاب، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يُقتل الوالد بالولد". أخرجه أحمد 1/ (147) و (346)، وابن ماجه (2662)، والترمذي (1400)، لكن اختلف فيه على عمرو بن شعيب كما ذكر الدارقطني في "العلل" (146)، ورجَّح أنه من رواية عمرو بن شعيب عن عمر مرسلًا.وأخرج أحمد 1/ (98) عن أسود بن عامر، عن جعفر بن زياد الأحمر، عن مطرف بن طريف، عن الحكم بن عتيبة، عن مجاهد، قال: حذف رجلٌ ابنًا له بسيف فقتله، فرُفع إلى عمر، فقال: لولا أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يُقاد الوالد من ولده"، لقتلتُك قبل أن تبرح. ورجاله ثقات لكن مجاهدًا لم يدرك عمر، إلَّا أنَّ مثله يصلح في المتابعات والشواهد.ويشهد لقضية إسقاط القود عن الوالد بولده حديث ابن عباس الآتي برقم (8303)، وهو وإن كان في إسناده ضعف، يصلح في الشواهد.وفي الباب أيضًا عن علي بن أبي طالب عند ابن ماجه (2664)، ولا يصحّ.وقصة تحرير المملوك يشهد لها ما صحَّ عن عبد الله بن عمر: أنه دعا بغُلام له، فرأى بظهره أثرًا، فقال له: أوجعتُك؟ قال: لا، قال: فأنت عَتيق، قال: ثم أخذ شيئًا من الأرض، فقال: ما لي فيه من الأجر ما يَزِنُ هذا، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من ضرب غلامًا له حدًّا لم يأتِهِ، أو لطمه، فإنَّ كفارته أن يعتقه". أخرجه أحمد 9/ (5051)، ومسلم (1657)، وغيرهما.وعن سويد بن مُقرِّن: أنَّ بعض بني مقرّن لطم جاريةً لهم، قال: فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نُعتقها. أخرجه أحمد 24/ (15703)، ومسلم (1658)، وغيرهما. وسيأتي عند المصنف برقم (8302).قوله: "فبَرَّزه" بمعنى جرّده، كما جاء بيانه في رواية الطحاوي في "شرح المشكل".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2893)


2893 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا مسعر، عن عُبيد بن الحسن، عن ابن مَعقِل: أنَّ سَبْيًا من خَوْلانَ قَدِم، وكان على عائشة رقبةٌ من ولد إسماعيلَ، فقَدِمَ سبْيٌ من اليمن، فأرادت أن تُعتِق منهن، فنهاها النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقَدِمَ سَبْيٌ من مُضَر - أحسبه قال -: من بني العَنْبر، فأمرها أن تُعتِق [1]. تابعه شعبة عن عُبيد بن الحسن:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, খাওলান গোত্রের কিছু বন্দী এসেছিল। আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশধরদের মধ্য থেকে একজন দাস মুক্ত করার দায়িত্ব ছিল। অতঃপর ইয়েমেন থেকে কিছু বন্দী আসল, আর তিনি তাদের মধ্য থেকে একজনকে মুক্ত করতে চাইলেন, কিন্তু নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নিষেধ করলেন। এরপর মুদার গোত্রের কিছু বন্দী আসল—আমার মনে হয় তিনি বলেছেন—বনু আনবার গোত্রের। তখন তিনি (নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) তাকে মুক্ত করার নির্দেশ দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير أنه اختُلف في وصله وإرساله، وهو في كلا الطريقين اللتين عند المصنف هنا مرسلٌ، والأشبه أنه مرسلٌ، وابن مَعقِل المذكور في إسناده هو عبد الله بن معقل، كما سيأتي مقيدًا في الطريق التالية، وهو المزني، فقد روى عُبيد بن الحسن عدة روايات عنه، ونسبَه في بعضها مُزَنيًّا، فليس هو بالمحاربي كما جزم به الحافظُ ابن حجر في "أطراف المسند" 9/ 85، وفي "إتحاف المهرة" (21898) إذ أورد هذا الحديث في ترجمة عبد الله بن معقل المحاربي، وذلك أنَّ عبيد بن الحسن نص في بعض رواياته أنَّ ابن معقل هذا هو المزني كما قدَّمنا، ولم نقف على رواية لعبيد بن الحسن عن ابن معقل المحاربي، فليس هو به في هذا الحديث، والله أعلم.وأخرجه أحمد 43/ (26268) عن أبي أحمد الزُّبَيري، عن مسعر، عن عبيد بن حسن، عن ابن معقل، عن عائشة. فوصله. وتابعه علي وصله أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (4968/ 1)، فرواه عن مسعر كذلك.ورواه شعبةُ كما في الطريق التالية، وأبو نعيم الفضل عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (1768)، ومحمد بن بِشْر العَبْدي عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" (12604 - عوامة) كلهم عن عبيد بن الحسن، عن ابن معقل مرسلًا.ويشهد له حديث أبي هريرة عند البخاري (2543)، ومسلم (2525) بلفظ: كانت سبيّة منهم - يعني من بني تَميم - عند عائشة، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم: "أعتقيها فإنها من ولد إسماعيل".وفي رواية عنه عند مسلم، ولم يسق لفظها، وساقها غيره، كالطحاوي في "شرح المشكل" (3914)، قال: كان على عائشة محرَّر من ولد إسماعيل، فقدم سبيُ بلعنبر، فقال: "إن سرَّكِ أن تعتقي من ولدِ إسماعيل، فأعتقي من هؤلاء".وفي رواية ثالثة عند أبي يعلى (6108)، كلفظ رواية المصنف هنا، وإسنادها صحيح.ويشهد له أيضًا حديث ابن عمر عند البزار كما في "كشف الأستار" للهيثمي (2826)، و"مختصر زوائد البزار" للحافظ (2055)، وصحَّحه الحافظ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2894)


2894 - أخبرَناه أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا أبو قِلابة.وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق؛ قالا: حدثنا وهب بن جرير، أخبرنا شعبة، عن عُبيد أبي الحسن، قال: سمعتُ عبد الله بن مَعقِل، قال: كان على عائشة مُحرَّر من ولد إسماعيل، فأُتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بسَبْي من بني العَنْبر، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أعتِقِي من بني العنبر - أو من بني لِحْيان - ولا تُعتِقي من بني خَوْلان" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌كتاب المكاتَب




আব্দুল্লাহ ইবনু মা'কিল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওপর ইসমাইল-বংশের একজনকে মুক্ত করার দায়িত্ব ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বানু আনবার গোত্রের কিছু যুদ্ধবন্দী আনা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি বানু আনবার অথবা বানু লিহ্য়ানের মধ্য থেকে কাউকে মুক্ত করো, কিন্তু বানু খাওলানের মধ্য থেকে কাউকে মুক্ত করো না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره كسابقه. أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (3913) عن إبراهيم بن مرزوق، بهذا الإسناد. لكنه قرن بوهب أبا داود الطيالسي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2895)


2895 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى العَنْبري، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا ابن عَجْلان، عن سعيد المقبُري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ثلاثٌ حقٌّ على الله أن يُعينَهم: المكاتَبُ الذي يريدُ الأداء، والمجاهدُ في سبيل الله، والناكِحُ يريدُ أن يَستعِفَّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন প্রকার লোককে সাহায্য করা আল্লাহর জন্য কর্তব্য: চুক্তিবদ্ধ গোলাম যে তার চুক্তির মূল্য পরিশোধ করতে চায়, আল্লাহর পথে জিহাদকারী এবং সে ব্যক্তি যে সচ্চরিত্র বা পবিত্রতা অর্জনের উদ্দেশ্যে বিবাহ করে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل ابن عجلان: وهو محمد. وقد تقدم برقم (2711) من طريق يحيى بن محمد بن يحيى، عن مُسدَّد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2896)


2896 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا أبو الوليد هشام بن عبد الملك، حدثنا عَمرو بن ثابت، حدثنا عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن عبد الله بن سهل بن حُنَيف، أنَّ سهلًا حدَّثه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أعانَ مُجاهدًا في سبيل الله - أو غازِيًا - أو غارِمًا في عُسرتِه، أو مكاتبًا في رقبتِه، أظلَّه الله في ظِلّه يومَ لا ظِلَّ إلّا ظِلُّه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো মুজাহিদকে—অথবা কোনো যোদ্ধাকে—অথবা সংকটে পতিত কোনো ঋণগ্রস্তকে, অথবা মুক্তির জন্য চুক্তিবদ্ধ কোনো দাসকে সাহায্য করে, আল্লাহ তাকে তাঁর (আরশের) ছায়ায় স্থান দেবেন, যেদিন তাঁর ছায়া ছাড়া আর কোনো ছায়া থাকবে না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عمرو بن ثابت: وهو عمرو بن أبي المقدام البكري، ولأنَّ عبد الله بن سهل لا يُعرف روى عنه غير عبد الله بن محمد بن عَقِيل، ولم يرو هذا الحديث غيره، وقد توبع عمرو بن ثابت عليه فيما تقدم برقم (2479)، فيبقى الشأن في تفرد ابن عَقيل به. وله شواهد أوردناها هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2897)


2897 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ ومحمد بن عبد الله بن دِينار العَدْل، قالا: حدثنا أحمد بن محمد بن نصر، حدثنا أبو نُعيم الفضل بن دُكين، حدثنا عيسى بن عبد الرحمن السُّلَمي، حدثنا طلحة اليامِيّ، عن عبد الرحمن بن عَوسَجة، عن البراء بن عازب، قال: جاء أعرابيٌّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، علِّمني شيئًا يُدخِلُني الجنة، فقال: "لَئِن أقصرْتَ الخُطبةَ لقد أعرضْتَ المسألةَ: أعتقِ النَّسَمةَ وفُكَّ الرقَبَة" قال: أوَليسا واحدًا؟ قال: "فإنَّ عِتْقَ النسَمةِ أن تَفَرَّدَ بعِتْقها، وفَكَّ الرقَبةِ أن تُعينَ في ثمنِها، والمِنْحةُ المَوكُوفة، والفَيءُ على ذي الرَّحِمِ الظالِم، فإن لم تُطِقْ ذلك، فأطعِمِ الجائعَ، واسقِ الظَّمآن، وأْمُر بالمعروف وانْهَ عن المُنكر، فإن لم تُطِقْ ذلك، فكُفَّ لِسانَك إلّا مِن خَيرٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে এমন কিছু শিক্ষা দিন যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার কথা সংক্ষিপ্ত হলেও তোমার জিজ্ঞাসা অনেক বিস্তৃত: তুমি একটি ব্যক্তিকে মুক্ত করো এবং একটি দাসকে মুক্ত করো।" সে বলল: "এ দুটি কি একই নয়?" তিনি বললেন, "ব্যক্তিকে মুক্ত করা হলো, তুমি এককভাবে তাকে মুক্ত করে দেবে। আর দাসকে মুক্ত করা হলো, তুমি তার (মুক্তির) মূল্যের ক্ষেত্রে সহায়তা করবে। (আর উত্তম আমল হলো) ওয়াক্ফকৃত পশু দান করা এবং জালিম আত্মীয়ের উপর অনুগ্রহ করা। যদি তুমি এর সামর্থ্য না রাখো, তাহলে ক্ষুধার্থকে খাবার দাও, পিপাসার্তকে পান করাও, ভালো কাজের আদেশ দাও এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করো। যদি তুমি এরও সামর্থ্য না রাখো, তাহলে তোমার জিহ্বাকে সৎকথা ব্যতীত বিরত রাখো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. طلحة الياميّ: هو ابن مُصرِّف.وأخرجه أحمد 30/ (18647)، وابن حبان (374) من طرق عن عيسى بن عبد الرحمن البجلي، بهذا الإسناد.قوله: "أقصرْتَ الخُطبة"، أي: جئت بالخطبة قصيرة.وقوله: "أعرضْتَ المسألة"، أي: جئت بالمسألة واسعة كثيرة.والنَّسَمة: النفس والرُّوح، وكل دابّة فيها روح فهي نَسَمة، وإنما يريد الناس.والمِنْحة: الناقة أو الشاة تعطى ليُنتفَعَ بلبنها ثم تعاد إلى مالكها.وقوله: الموكوفة، كذا جاء في أصولنا بصيغة مفعولة، وفي سائر مصادر تخريج: الوَكُوف، بصيغة فَعُول، وهو المعروف في كتب اللغة، ومعناه: الناقة أو الشاة الغزيرة اللبن. ولعلَّ الصواب في رواية الحاكم: الوكوفة، بحذف الميم، بإلحاق تاء التأنيث، لأنَّ المنحة مؤنثة، وذلك جائز في نظائره على قِلّة، كعَجُوزة للمرأة المُسِنة، والله أعلم.والفَيء على ذلك الرحم الظالم: العَطفُ عليه والرجوع إلى بِرّه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2898)


2898 - أخبرني أبو القاسم عبد الرحمن بن الحَسَن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن عاصم بن سليمان وعلي بن زيد [1]، عن أبي عثمان النَّهْدي، عن سلمان، قال: كاتبتُ أهلي على أن أغرِسَ لهم خمسَ مئة فَسِيلةٍ، فإذا عَلِقَتْ فأنا حُرٌّ، فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم فذكرتُ ذلك له، فقال: "اغرِسْ، واشترِط لهم، فإذا أردتَ أن تَغرِسَ فآذِنِّي"، فجاء فجعل يَغرِس، إلّا واحدةً غَرَستُها بيدي، فعَلِقَت جميعًا إلّا الواحدةَ [2].هذا حديث صحيح من حديث عاصم بن سليمان الأحول على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার মনিবদের সাথে চুক্তি করেছিলাম যে, আমি তাদের জন্য পাঁচশত চারা রোপণ করব। যখন সেগুলো শিকড় ধরবে, তখন আমি মুক্ত হয়ে যাব। অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি জানালাম। তিনি বললেন, “রোপণ কর এবং তাদের সাথে (শর্ত অনুযায়ী) চুক্তি কর। যখন তুমি রোপণ করতে চাইবে, তখন আমাকে জানাবে।” অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং রোপণ করতে শুরু করলেন। কিন্তু একটি চারা ছাড়া, যা আমি নিজ হাতে রোপণ করেছিলাম। আর সেই একটি চারা ছাড়া সবগুলোই শিকড় ধরলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد.



[2] إسناده ضعيف لضعف عبد الرحمن بن الحسن القاضي، وقد انفرد في هذا الإسناد بذكر عاصم بن سليمان - وهو الأحول - وإنما هذا الخبر بهذه السياقة لعلي بن زيد - وهو ابن جُدعان - كذلك رواه جماعة من الحُفاظ عن عفان بن مسلم، وعلي بن زيد هذا ضعيف باتفاق، وعليه فما وقع في "مسند أحمد" من تصحيح الحديث اغترارًا بذكر عاصم بن سليمان هنا غير صحيح البتة، والله ولي التوفيق في "مسنده" (469).وأخرجه أحمد 39/ (23730) عن عفان بن مسلم، عن حماد سلمة، عن علي بن زيد وحده به. وكذلك رواه أبو بكر بن أبي شيبة في "مسنده" (469) وابن سعد في "الطبقات" 4/ 75 عن عفان دون ذكر عاصم بن سليمان.وقد قدّمنا برقم (2213) بيان اختلاف الرواة لخبر إسلام سلمان فيما أدّاه مقابل مكاتبته. وأخرجه النسائي في العِتق كما في "تحفة الأشراف" (8725) عن عبد القدوس بن محمد، عن عمرو بن عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6726)، وأخرجه أبو داود (3927) عن محمد بن المثنى، كلاهما (أحمد وابن المثنى) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن همام، به. غير أنَّ عبد الله بن أحمد قال بعد أن روى هذا الحديث عن أبيه، وقال في إسناده: عباس الجزري، قال: كذا قال عبد الصمد: عباس الجزري، كان في النسخة: عباس الجريري، فأصلحه أبي كما قال عبد الصمد: الجزري. قلنا: وأما ابن المثنى فسماه في روايته عباسًا الجريري، وتابعه أحمد بن سعيد بن صخر الدارمي عند الدارقطني (4213)، فالصحيح ما كان في أصل نسخة الإمام أحمد. وقال عبد الصمد في روايته: "على مئة أوقية"، بدل: "على ألف أوقية".وأخرجه النسائي (5008) من طريق أبي الوليد الطيالسي، عن همام، عن العلاء الجُريري، عن عمرو بن شعيب؛ فسماه العلاء الجريري، فوافق غيره في النسبة، وانفرد بالاسم، والقول قول من سماه عباسًا، كما صحَّحه الذهبي. وقال أبو الوليد في روايته: "على مئة وُقيّة"، كعبد الصمد.وأخرج أبو داود (3926) من طريق إسماعيل بن عياش، عن سليمان بن سُليم الحمصي، عن عمرو بن شعيب، به. بلفظ: "المكاتَب عبدٌ ما بقي عليه من مكاتبته درهمٌ". وإسناده حسن أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2899)


2899 - أخبرنا ميمون بن إسحاق الهاشمي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا عمرو بن عاصم الكِلابي، حدثنا همَّام، عن عباس الجُريري، حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيُّما مُكاتَبٍ كُوتِبَ على ألف أُوقيّة فأدّاها إلّا عشرَ أَواقٍ، فهو عبدٌ، وأيُّما مُكاتَبٍ كُوتِب على مئة دينارٍ فأدّاها إلّا عشرةَ دنانير، فهو عبدٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি কোনো মুকাতাবকে (মুক্তির চুক্তিবদ্ধ দাস) এক হাজার উকিয়ার (রৌপ্যমুদ্রা) বিনিময়ে চুক্তি করা হয় এবং সে দশ উকিয়া ছাড়া বাকি সব পরিশোধ করে দেয়, তবে সে দাসই থাকবে। আর যদি কোনো মুকাতাবকে একশো দিনারের বিনিময়ে চুক্তি করা হয় এবং সে দশ দিনার ছাড়া বাকি সব পরিশোধ করে দেয়, তবে সে দাসই থাকবে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وعباس الجُريري: هو ابن فرُّوخ، وليس هو عباسًا الجزري، كما أصلحه الإمام أحمد في "المسند" بعد أن كان في أصل نسخته: عباس الجريري، اعتمادًا على ما قاله شيخه عبد الصمد - وهو ابن عبد الوارث - الذي يرويه عن همام - وهو ابن يحيى العَوْذي - فقد رواه عن عبد الصمد غير الإمام أحمد، فقالوا فيه: عباس الجريري، وهو الذي قاله غير واحد ممَّن رواه عن همام غير عبد الصمد، كعمرو بن عاصم الكلابي هنا، وعبد الله بن يزيد المقرئ فيما نقله الدارقطني في "السنن" بإثر الحديث (4213)، وكذلك نسبه أبو الوليد الطيالسي في روايته عن همام، غير أنه انفرد بتسميته العلاء بدل عباس، فالأصح أنه عباس الجُريري كما قال الذهبي في "الكاشف". وقد تابعه على معنى حديثه سليمانُ بن سُليم الحمصي، يرويه عن عمرو بن شعيب. وأخرجه النسائي في العِتق كما في "تحفة الأشراف" (8725) عن عبد القدوس بن محمد، عن عمرو بن عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6726)، وأخرجه أبو داود (3927) عن محمد بن المثنى، كلاهما (أحمد وابن المثنى) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن همام، به. غير أنَّ عبد الله بن أحمد قال بعد أن روى هذا الحديث عن أبيه، وقال في إسناده: عباس الجزري، قال: كذا قال عبد الصمد: عباس الجزري، كان في النسخة: عباس الجريري، فأصلحه أبي كما قال عبد الصمد: الجزري. قلنا: وأما ابن المثنى فسماه في روايته عباسًا الجريري، وتابعه أحمد بن سعيد بن صخر الدارمي عند الدارقطني (4213)، فالصحيح ما كان في أصل نسخة الإمام أحمد. وقال عبد الصمد في روايته: "على مئة أوقية"، بدل: "على ألف أوقية".وأخرجه النسائي (5008) من طريق أبي الوليد الطيالسي، عن همام، عن العلاء الجُريري، عن عمرو بن شعيب؛ فسماه العلاء الجريري، فوافق غيره في النسبة، وانفرد بالاسم، والقول قول من سماه عباسًا، كما صحَّحه الذهبي. وقال أبو الوليد في روايته: "على مئة وُقيّة"، كعبد الصمد.وأخرج أبو داود (3926) من طريق إسماعيل بن عياش، عن سليمان بن سُليم الحمصي، عن عمرو بن شعيب، به. بلفظ: "المكاتَب عبدٌ ما بقي عليه من مكاتبته درهمٌ". وإسناده حسن أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2900)


2900 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلْمان بن الحسن الفقيه إملاءً ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكرَم البَزّاز، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا علي بن المُبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: قضَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في المكاتَب أن يُقتَلَ بدِيَةِ الحُرّ على قَدْر ما أَدَّى منه [1]. قال يحيى: قال عِكْرمة عن ابن عباس: يُقام عليه حدُّ المَملُوك [2].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুকাতাব (মুক্তি চুক্তিবদ্ধ দাস) সম্পর্কে এই ফায়সালা দিয়েছেন যে, তাকে (হত্যার বদলে) মুক্ত ব্যক্তির দিয়তের (রক্তমূল্য) অনুপাতে হত্যা করা হবে (বা দিয়ত দিতে হবে), যতটুকু সে (মুক্তির মূল্য) পরিশোধ করেছে তার হিসাব অনুযায়ী। ইয়াহইয়া বলেন, ইকরামা ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেন: তার উপর দাসের শাস্তি (হাদ) কার্যকর করা হবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلِف في وصله وإرساله، وفي رفعه ووقفه، كما بسطناه في "سنن أبي داود" بتحقيقنا (4581)، وقد نبَّه على ذلك أبو داود باختصار بإثر الحديث (4582).وأخرجه النسائي (6983) من طريق وكيع، عن علي بن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 3/ (1944) و (1984) و 4/ (2356)، وأبو داود (4581)، والنسائي (5000) من طريق هشام بن أبي عبد الله الدَّستُوائي، وأحمد 5/ (3423)، وأبو داود (4581)، والنسائي (6985) من طريق حجاج بن أبي عثمان الصوّاف، والنسائي (5001) و (6984) من طريق معاوية بن سلّام، ثلاثتهم عن يحيى بن أبي كثير، به. ولفظ هشام وحجاج بنحو لفظ أبان بن عبد العزيز بن يزيد الآتي عند المصنف بعده.وسيأتي برقم (2902) بلفظ وسياق فيه مغايرة من طريق أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس، ويخالف فتوى ابن عباس التي أسندها المصنف بإثر الرواية هنا، كما نبَّه عليه البيهقي 10/ 326.وإذا ضُبط قوله في الحديث هنا: "أن يَقتُل" على البناء للفاعل، يعني أن يكون المكاتب هو الذي باشر القتل، لا أنه قتله غيره، فيوافق حينئذٍ روايةَ أيوب عن عكرمة، وتكون رواية أيوب فيها زيادة معنًى ليس في هذه الرواية، وهو ذكر الميراث، لكن رواية هشام وأبان وحجاج عن يحيي تدل على أنَّ الضبط هنا بالبناء للمفعول، وعلى أية حالٍ فليس في كلتا الروايتين تعارض، بل إذا انضمتا لبعضهما أفادت كلُّ واحدة معنًى زائدًا على الأخرى، وقد جمعهما الترمذي (1259) في روايته عن أيوب عن عكرمة، لكن تبقى مخالفة المرفوع لفتوى ابن عباس التي هنا، ويبقى الخلاف في الوصل والإرسال والرفع والوقف، والله أعلم.



[2] هذا موصول بالإسناد الذي قبله، ولكنه موقوف على ابن عباس، ويخالف ظاهره رواية أيوب عن عكرمة عن ابن عباس المرفوعة الآتية برقم (2902).وأخرجه البيهقي 10/ 326 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن الجارود (982) عن محمد بن يحيى الذهلي، عن عثمان بن عمر، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 6/ 148 و 9/ 518، وابن أبي عاصم في "الديات" ص 99، والطحاوي في "أحكام القرآن" (2043)، وفي "شرح معاني الآثار" 2/ 461 من طريق وكيع بن الجراح، عن علي بن المبارك، به.وقال البيهقي 10/ 326: هذا عن ابن عباس من قوله يخالف الحديث المرفوع في القياس، ويخالف ما رواه حماد بن سلمة في النص. قلنا: يعني ما رواه حماد عن أيوب عن عكرمة في الرواية الآتية برقم (2902).