হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2861)


2861 - أخبرني عبد الصمد بن علي البزَّاز ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد بن أبي عثمان الطَّيَالِسي، حدثنا علي بن بحر بن بَرِّي، حدثنا هشام بن يوسف، عن مَعمَر، عن عمرو بن مسلم، عن عِكرمة، عن ابن عباس: أنَّ امرأة ثابت بن قيس اختَلَعتْ منه، فجعلَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم عِدّتَها حَيضةً [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، غير أنَّ عبد الرزاق أرسلَه عن معمر:




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাবেত ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী তাঁর কাছ থেকে খোলা (তালাক) নিয়েছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ইদ্দতকাল এক মাসিক (ঋতুস্রাব) নির্ধারণ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، عمرو بن مسلم - وهو الجَنَدي - ضعيف يعتبر به، وقد اختُلف في هذا الحديث في الوصل والإرسال كما نبَّه عليه المصنف بإثره.وأخرجه أبو داود (2229)، والترمذي (1185) عن محمد بن عبد الرحيم البغدادي البزاز، عن علي بن بحر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وسيأتي بعده من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن عمرو بن مسلم، عن عكرمة مرسلًا.وأصل حديث ابن عباس عند البخاري (5273) من طريق خالد الحذاء، و (5276) من طريق أيوب، كلاهما عن عكرمة، عنه: أنَّ امرأة ثابت بن قيس أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول الله، ثابت بن قيس، ما أعتب عليه في خُلُق ولا دين، ولكني أكره الكُفر في الإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أترُدِّين عليه حديقتَه؟ " قالت: نعم، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اقبلِ الحديقة وطَلِّقها تطليقة". كذلك رواه خالد الحذاء وأيوب وغيرهما ليس فيه ذكر العدة.لكن يشهد لرواية عمرو بن مسلم حديث الرُّبَيّع بنت مُعوِّذ عند ابن ماجه (2058)، والترمذي (1185)، والنسائي (5662). وهو صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2862)


2862 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، عن معمر، عن عمرو بن مسلم، عن عِكْرمة: أنَّ امرأة ثابت بن قيس اختَلَعتْ منه، فجعلَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم عِدَّتَها حَيضةً [1].




সাবেত ইবনু ক্বাইসের স্ত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর স্বামী থেকে খোলা (তালাক) গ্রহণ করলেন। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ইদ্দতকাল এক ঋতুস্রাব (হায়িয) নির্ধারণ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره كسابقه، وهذا إسناد مرسل، وتقدم في الطريق التي قبله موصولًا. في "سننه الكبرى" 8/ 3 عن أبي عبد الله الحاكم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2863)


2863 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد بن حاتم، حدثنا عُبيد الله بن عبد المجيد الحَنَفي، حدثنا عُبيد الله بن عبد الرحمن بن مَوهَب، عن القاسم، عن عائشة: أنها أرادت أن تُعتِقَ مملُوكَين؛ زَوجٌ، فسألتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأمرَها أن تبدأَ بالرجلِ قبلَ المرأة [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দুজন গোলামকে, যারা স্বামী-স্ত্রী ছিলেন, আযাদ (মুক্ত) করতে চাইলেন। অতঃপর তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেনো মহিলার পূর্বে পুরুষকে আযাদ করে শুরু করে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين، رجاله ثقات غير عُبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، فهو مُختلَف في توثيقه كما قال الذهبي في "تلخيصه"، على أنه جزم في كتابه "مَن تُكلِّم فيه وهو مُوثَّق" بأنه صالح الحديث.وأخرجه أبو داود (2237)، وابن ماجه (2532) من طرق عن عُبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (1915) عن محمد بن بشار، وابن حبان (4311) من طريق محمد بن يحيى الذهلي، كلاهما عن حماد بن مَسعَدة، عن عبيد الله بن مَوهَب، به.وأخرجه النسائي (4915) و (5610) عن إسحاق بن راهويه، عن حماد بن مسعدة، به مرسلًا. في "سننه الكبرى" 8/ 3 عن أبي عبد الله الحاكم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2864)


2864 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا عيسى بن يونس، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثني أبي، حدثني رافع بن سِنان: أنه أسلمَ وأبَتِ امرأتُه أن تُسلِم، فأتتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقالت: ابنتي فَطِيمٌ، وقال رافع: ابنتي، فقال النبي صلى الله عليه وسلم لِرافع: "اقعُدْ ناحِيةً" وقال لامرأته: "اقعُدي ناحيةً"، قال: وأقعَدَ الصَّبِيّةَ [1] بينهما، ثم قال: "ادعُواها" فمالَتْ الصَّبِيّة إلى أمها، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "اللهم اهْدِها"، فمالَتْ إلى أبيها، فأخذها [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




রাফি' ইবনে সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন, কিন্তু তাঁর স্ত্রী ইসলাম গ্রহণে অস্বীকৃতি জানাল। অতঃপর স্ত্রী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার মেয়েটি স্তনদুগ্ধ ত্যাগকারী (দুধ ছাড়ানো শিশু)। আর রাফি’ বললেন: (না, বরং) আমার মেয়েটি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাফি’কে বললেন: "তুমি একপাশে বসো।" এবং তাঁর স্ত্রীকে বললেন: "তুমি অন্য একপাশে বসো।" বর্ণনাকারী বলেন: তিনি বাচ্চা মেয়েটিকে তাদের দুজনের মাঝে বসালেন। অতঃপর বললেন: "তোমরা উভয়েই তাকে ডাকো।" তখন মেয়েটি তার মায়ের দিকে ঝুঁকে গেল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "হে আল্লাহ! তাকে সৎপথ প্রদর্শন করুন।" অতঃপর সে তার পিতার দিকে ঝুঁকে গেল এবং তিনি তাকে নিয়ে নিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ع) إلى: الصبي، وجاء على الصواب في (ب)، وفي رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 8/ 3 عن أبي عبد الله الحاكم.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، لكن قيل: إنَّ جعفرًا - وهو ابن عبد الله بن الحكم بن رافع - لم يسمع من جد أبيه رافع بن سنان، مع أنه صرَّح بسماعه منه هنا عند المصنف، لكن يُعكّر على ذلك أنَّ أبا داود روى هذا الحديث عن إبراهيم بن موسى، فلم يذكر التصريح بالسماع بل عنعنه، وعلى أي حال فجعفر هذا ثقة، وما رواه قصةٌ حصلت في أهل بيته، فهو أدرى بها، والله أعلم.وأخرجه أبو داود (2244) عن إبراهيم بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 39/ (23757) عن علي بن بحر، عن عيسى بن يونس، به.وأخرجه النسائي (6352) من طريق المعافَى بن عمران، عن عبد الحميد بن جعفر، به.ورواه عثمان البَتّي عن عبد الحميد، لكنه اختُلف عليه:فأخرجه أحمد (23755)، وابن ماجه (2352)، والنسائي (6354) من طريق إسماعيل ابن عُلَيَّة، وأحمد (23759)، والنسائي (5659) و (6353) من طريق سفيان الثَّوري، كلاهما عن عثمان البَتّي، قال ابن عُلَيَّة: عن عبد الحميد بن سلمة، وقال الثَّوري: عن عبد الحميد الأنصاري، به. كذا سماه ابنُ عُلَيَّة في روايته.وأخرجه أحمد (23756) عن هُشَيم بن بَشير، عن عثمان البَتّي، عن عبد الحميد بن سلمة: أنَّ جده أسلمَ، فذكره مرسلًا.وأخرجه النسائي (6355) من طريق حماد بن سلمة، عن عثمان البَتّي، عن عبد الحميد بن سلمة، عن أبيه: أنَّ رجلًا أسلم، فذكره مرسلًا أيضًا.كذا سمى عثمانُ البتي شيخه عبد الحميد بن سلمة، وهو خطأ، والصحيح أنه عبد الحميد بن جعفر، فقد روى الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" بإثر الحديث (3093) وابن منده في "معجم الصحابة" 1/ 701 عن عبد الحميد بن جعفر، قال: أنا حدثتُ البَتِّي بحديث التخيير بالأهواز.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2865)


2865 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى، عن الأجلَح، عن الشعبي، عن عبد الله بن الخَليل، عن زيد بن أرقَمَ، قال: كنت جالسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ جاءه رجلٌ من أهل اليمن، فقال: إنَّ ثلاثةً من أهل اليمن أتَوْا عليًّا يَختصِمُون إليه في ولد، وَقعُوا على امرأةٍ في طُهْر واحد، فقال للاثنين منهما: طِيبا بالولد لهذا، فغُلِبا [1]، ثم قال للاثنين: طِيبا بالولد لهذا، فغُلِبا، ثم قال للاثنين: طِيبا بالولد لهذا، فغُلِبا. ثم قال: أنتم شركاءُ متشاكِسُون، إني مُقرِعٌ بينكم، فمن قَرَعَ فلهُ الولدُ وعليه لصاحبَيه ثُلُثا الدِّيَة، فأقرَعَ بينهم، فجعلَه لمن قَرَعَ. فضحك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى بَدَتْ أضراسُه، أو قال: نواجذُه [2]. قد اتفق الشيخان على ترك الاحتجاج بالأجلح بن عبد الله الكِنْدي، وإنما نَقَما عليه حديثًا واحدًا لعبد الله بن بُريدة، وقد تابعه على ذلك الحديث ثلاثةٌ من الثِّقات، فهذا الحديث إذًا صحيح، ولم يُخرجاه.




যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম, তখন ইয়ামানের একজন লোক তাঁর কাছে আসল। সে বলল: ইয়ামানের তিনজন লোক একটি সন্তানের ব্যাপারে ঝগড়া করতে করতে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিল। তারা একই তুহুরে (পবিত্রতার সময়ে) একজন নারীর সাথে সহবাস করেছিল।

তিনি (আলী) তাদের দুজনকে বললেন: তোমরা সন্তানের দাবি তার (তৃতীয় ব্যক্তির) জন্য ছেড়ে দাও, কিন্তু তারা অস্বীকার করল। তারপর তিনি অন্য দুজনকে বললেন: তোমরা সন্তানের দাবি তার (প্রথম ব্যক্তির) জন্য ছেড়ে দাও, কিন্তু তারা অস্বীকার করল। এরপর তিনি অন্য দুজনকে বললেন: তোমরা সন্তানের দাবি তার (দ্বিতীয় ব্যক্তির) জন্য ছেড়ে দাও, কিন্তু তারা অস্বীকার করল।

এরপর তিনি বললেন: তোমরা হচ্ছো ঝগড়াকারী অংশীদার। আমি তোমাদের মাঝে লটারি করব। যার লটারি উঠবে, সন্তান তার হবে এবং তাকে তার অন্য দুই সঙ্গীকে দিয়াতের (রক্তপণ) দুই-তৃতীয়াংশ দিতে হবে। অতঃপর তিনি তাদের মাঝে লটারি করলেন এবং যার লটারি উঠল, সন্তান তার করে দিলেন।

(এই কথা শুনে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে হাসলেন যে তাঁর মাড়ির দাঁত দেখা গেল, অথবা (বর্ণনাকারী) বলেছেন: তাঁর সামনের দাঁত দেখা গেল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] معنى قوله: فغُلِبا: ضعُفا عن أن يطيبا بالولد. وفي بعض الروايات: فغَلبا، أي: صاحا وتخاصما. فأخرجه أحمد (19329) عن عبد الرزاق، عن سفيان الثَّوري، عن أجلح، عن الشَّعبي، عن عبد خير، عن زيد بن أرقم. فذكر عبدَ خير بدل عبد الله بن الخليل.وأخرجه أبو داود (2270)، والنسائي (5652) و (5993) عن أبي عاصم خُشَيش بن أصرم، وابن ماجه (2348) عن إسحاق بن منصور، كلاهما عن عبد الرزاق عن سفيان الثَّوري، عن صالح بن صالح بن حَيٍّ الهَمْداني، عن الشعبي، عن عبد خير، عن زيد بن أرقم. فذكر صالحًا الهمداني بدل الأجلح، وذكر عبدَ خير بدل عبد الله بن الخليل.وأخرجه النسائي (5655) و (5994) من طريق أبي إسحاق الشَّيباني، عن الشعبي، عن رجل من حضرموت، عن زيد بن أرقم. فأبهم ذكر الحضرمي.وأخرجه أبو داود (2271)، والنسائي (5656) من طريق شعبة، عن سلمة بن كُهيل، عن الشعبي، عن أبي الخليل أو ابن الخليل، قال: أتي عليٌّ، فذكره مرسلًا موقوفًا ليس فيه ذكر النبي صلى الله عليه وسلم.



[2] إسناده ضعيف لاضطرابه كما هو مبيّن في "مسند أحمد" 32/ (19329)، وقد نبَّه على اضطرابه أبو حاتم في "العلل" لابنه (1204)، والنسائي (5652 - 5656)، وصَوَّبا أنه عن ابن الخليل مرسلًا موقوفًا، ومع ذلك صحَّح ابن حزم في "المحلى" 10/ 150 إسناد الثَّوري الذي قال فيه: عن صالح الهَمْداني - وهو ابن صالح بن حَيٍّ - عن الشعبي عن عبد خير الحضرميّ، عن زيد بن أرقم. فذكر عبد خير، بدل عبد الله بن الخليل، وذكر صالحًا الهمداني بدل الأجلح. وتابع ابنَ حزم على ذلك عبدُ الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" 3/ 220، وابنُ القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 433 و 436، وصحَّح الحديثَ قبل هؤلاء إسحاق بن راهويه كما في "مسائل إسحاق بن منصور الكوسج" (1047).أبو المثنَّى: هو معاذ بن المثنَّى، ومُسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد، ويحيى: هو ابن سعيد القطان، والأجلح عرَّفه المصنف.وأخرجه أبو داود (2269) عن مُسدَّد، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (5654) عن عمرو بن علي الفلّاس، عن يحيى القطان، به.وأخرجه أحمد 32/ (19342) عن سفيان بن عيينة، و (19344) من طريق هُشَيم، والنسائي (5653) و (5995) من طريق علي بن مُسهر، ثلاثتهم عن الأجلح، به. لكن قال ابن عيينة: عن عبد الله بن أبي الخليل، وقال هشيم: عن أبي الخليل.وسيأتي برقم (4710) من طريق عيسى بن يونس، وبرقم (4711) من طريق سفيان بن عيينة، وبرقم (7213) من طريق أبي غسان مالك بن إسماعيل النهدي، ثلاثتهم عن الأجلح.ورواه عبد الرزاق عن سفيان الثَّوري، واختُلف عليه: فأخرجه أحمد (19329) عن عبد الرزاق، عن سفيان الثَّوري، عن أجلح، عن الشَّعبي، عن عبد خير، عن زيد بن أرقم. فذكر عبدَ خير بدل عبد الله بن الخليل.وأخرجه أبو داود (2270)، والنسائي (5652) و (5993) عن أبي عاصم خُشَيش بن أصرم، وابن ماجه (2348) عن إسحاق بن منصور، كلاهما عن عبد الرزاق عن سفيان الثَّوري، عن صالح بن صالح بن حَيٍّ الهَمْداني، عن الشعبي، عن عبد خير، عن زيد بن أرقم. فذكر صالحًا الهمداني بدل الأجلح، وذكر عبدَ خير بدل عبد الله بن الخليل.وأخرجه النسائي (5655) و (5994) من طريق أبي إسحاق الشَّيباني، عن الشعبي، عن رجل من حضرموت، عن زيد بن أرقم. فأبهم ذكر الحضرمي.وأخرجه أبو داود (2271)، والنسائي (5656) من طريق شعبة، عن سلمة بن كُهيل، عن الشعبي، عن أبي الخليل أو ابن الخليل، قال: أتي عليٌّ، فذكره مرسلًا موقوفًا ليس فيه ذكر النبي صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2866)


2866 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا محمود بن خالد الدمشقي، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثني أبو عَمرو الأوزاعي، حدثني عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو: أنَّ امرأة قالت: يا رسول الله، ابني هذا كان بطني له وِعاءً، وثَدْيِي له سِقاءً، وحَجْري له حِواءً، وإِنَّ أباه طلَّقني وأراد أن يَنزِعَه مني، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنتِ أحقُّ به ما لم تَنْكِحي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমার এই সন্তানকে আমার পেট ধারণ করেছিল, আমার স্তন ছিল তার জন্য পানীয়ের উৎস এবং আমার কোল ছিল তার জন্য আশ্রয়স্থল। আর তার পিতা আমাকে তালাক দিয়েছে এবং সে আমার কাছ থেকে তাকে ছিনিয়ে নিতে চায়। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি তার অধিক হকদার, যতক্ষণ না তুমি বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হও।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن.وأخرجه أبو داود (2276) عن محمود بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6707) من طريق ابن جُرَيج، عن عمرو بن شعيب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2867)


2867 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى بن سعيد، عن ابن جُرَيج، أخبرني أبو الزُّبَير، عن جابر، قال: طُلِّقتْ خالتي ثلاثًا، فخرجَتْ تَجُدُّ نخلًا لها، فلقيَها رجلٌ فنهاها، فأتتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اخرُجي فجُدِّي، لعلّكِ أن تَصَدَّقي منه أو تفعلي خيرًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার খালাকে তিন তালাক দেওয়া হলো। তখন তিনি তাঁর খেজুর গাছ থেকে খেজুর সংগ্রহ করার জন্য বের হলেন। এরপর এক ব্যক্তি তার সাথে দেখা করে তাকে নিষেধ করল। তখন তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং তাঁকে বিষয়টি জানালেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বের হও এবং খেজুর সংগ্রহ করো, হতে পারে তুমি তা থেকে সাদকা করবে অথবা কোনো ভালো কাজ করবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (2297) عن أحمد بن حنبل، بهذا الإسناد.وأخرجه مسلم (1483) عن محمد بن حاتم بن ميمون، عن يحيى بن سعيد، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 22/ (14444)، ومسلم (1483)، وابن ماجه (2034) من طريق حجاج بن محمد، وابن ماجه (2034)، والنسائي (5713) من طرق عن ابن جُرَيج، به. حماد بن زيد، فسماه على الصواب.وأخرجه أحمد 45/ (27363) عن بشر بن المفضّل، وأبو داود (2300)، والترمذي (1204)، والنسائي (10977)، وابن حبان (4292) من طريق مالك بن أنس، وأحمد (27087)، والترمذي بإثر (1204)، والنسائي (5692) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن ماجه (2031) من طريق أبي خالد بن سليمان بن حيان، والنسائي (5696) من طريق سفيان الثَّوري، والنسائي (5692)، وابن حبان (4293) من طريق شعبة بن الحجاج، والنسائي (5692) من طريق ابن جُرَيج ومحمد بن إسحاق، و (5693) من طريق يزيد بن محمد المطلّبي، كلهم عن سعد بن إسحاق، به.وسيأتي بعده من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري عن سعد بن إسحاق.والأعلاج: الأعبُد، وهو جمع العِلج، وأصل العِلْج الرجل من كفار العجم وغيرهم.والقَدوم، بفتح القاف ودال مهملة مضمومة تشدّد وتخفف: موضع على ستة أميال من المدينة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2868)


2868 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا أبو النعمان محمد بن الفضل وسليمان بن حَرْب، قالا: حدثنا حماد بن زيد، حدثنا إسحاق بن سعد بن كعب بن عُجْرة، حدثَتْني زينبُ بنت كعب، عن فُرَيعة بنت مالك: أنَّ زوجها خَرَجَ في طلب أعلاج له، فقُتل بطَرَف القَدُّوم - قال حماد: وهو موضعُ ماء - قالت: فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم فذكرتُ ذلك له من حالي، وذكرت النُّقلةَ إلى إخوتي، قالت: فرخَّص لي، فلما تجاوزتُ ناداني، فقال: "امكُثي في بيتِك حتى يبلُغَ الكتابُ أجلَه" [1].




ফুরাই'আ বিনত মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তার স্বামী তার কিছু ক্রীতদাস বা শ্রমিক খুঁজতে বের হলেন, অতঃপর আল-কাদ্দুম নামক স্থানের প্রান্তে তিনি নিহত হলেন। (হাম্মাদ বলেন: এটি একটি জলাশয়ের নাম)। তিনি (ফুরাই’আ) বললেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে আমার অবস্থা তাঁকে জানালাম এবং আমার ভাইদের কাছে স্থানান্তরিত হওয়ার (ইদ্দতের সময় অন্যত্র চলে যাওয়ার) অনুমতি চাইলাম। তিনি বললেন, তখন তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন। যখন আমি অতিক্রম করে যাচ্ছিলাম, তিনি আমাকে ডেকে বললেন: "তুমি তোমার ঘরে অবস্থান করো যতক্ষণ না (ইদ্দতের) সময়কাল পূর্ণ হয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. زينب بنت كعب - وهو ابن عُجْرة - روى عنها ابنا أخويها سعد بن إسحاق - وليس إسحاق بن سعد كما سُمِّي في رواية حماد بن زيد عند المصنف هنا، على أنَّ الذُّهلي جعلهما اثنين، كما سينقله المصنف - وسليمان بن محمد، وهما ثقتان، وذكرها ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح حديثها، واحتجَّ بها مالك والشافعي، كما صحَّح حديثها الذُّهلي والترمذي وابن عبد البر والذهبي وابن القطان وغيرهم.وأخرجه النسائي (5694) عن قتيبة بن سعيد، عن حماد بن زيد، عن سعد بن إسحاق، به. فسماه على الصواب موافقًا للجماعة. وكذلك رواه سعيد بن منصور في "سننه" (1365) عن حماد بن زيد، فسماه على الصواب.وأخرجه أحمد 45/ (27363) عن بشر بن المفضّل، وأبو داود (2300)، والترمذي (1204)، والنسائي (10977)، وابن حبان (4292) من طريق مالك بن أنس، وأحمد (27087)، والترمذي بإثر (1204)، والنسائي (5692) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن ماجه (2031) من طريق أبي خالد بن سليمان بن حيان، والنسائي (5696) من طريق سفيان الثَّوري، والنسائي (5692)، وابن حبان (4293) من طريق شعبة بن الحجاج، والنسائي (5692) من طريق ابن جُرَيج ومحمد بن إسحاق، و (5693) من طريق يزيد بن محمد المطلّبي، كلهم عن سعد بن إسحاق، به.وسيأتي بعده من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري عن سعد بن إسحاق.والأعلاج: الأعبُد، وهو جمع العِلج، وأصل العِلْج الرجل من كفار العجم وغيرهم.والقَدوم، بفتح القاف ودال مهملة مضمومة تشدّد وتخفف: موضع على ستة أميال من المدينة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2869)


2869 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا يحيى بن سعيد، أنَّ سعد بن إسحاق بن كعب بن عُجْرة أخبره، أنَّ عمته زينب بنت كعب بن عُجْرة أخبرته، أنها سمعت فُريعة بنت مالك أختَ أبي سعيد الخُدْري قالت: خرج زَوجي في طلب أعبُدٍ له فأدركهم بطَرَف القَدوم فقتلوه، فأتاني نَعْيُه وأنا في دارٍ شاسعةٍ من دُور أهلي، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: إنه أتاني نَعْيُ زوجي، وأنا في دارٍ شاسعةٍ من دُور أهلي، ولم يَدَعْ لي نفقةً ولا مالًا، وليس المسكنُ لي، ولو تحوّلْتُ إلى إخوتي وأهلي كان أرفَقَ بي في بعض شأني، فقال: "تَحوّلي"، فلما خرجتُ إلى المسجد - أو [1] الحُجرة - دعاني - أو أُمِر بي فدُعِيتُ له - فقال: "امكُثي في البيت الذي أتاكِ فيه نَعْيُ زوجِك، حتى يَبلُغَ الكتابُ أجلَه"، فاعتددتُ فيه أربعةَ أشهرٍ وعشرًا. قالت: فأرسل عثمانُ بن عفّان، فأتيتُه فحدَّثتُه فأخذَ به [2]. هذا حديث صحيح الإسناد من الوجهين جميعًا، ولم يُخرجاه.رواه مالك بن أنس في "الموطَّأ" [3] عن سعد بن إسحاق بن كعب بن عُجْرة.قال محمد بن يحيى الذُّهْلي: هذا حديث صحيح محفُوظ، وهما اثنان سعد بن إسحاق، وهو أشهرُهما، وإسحاق بن سعد بن كعب [4]، وقد روى عنهما جميعًا يحيى بن سعيد الأنصاري، فقد ارتفعت عنهما جميعًا الجهالةُ.




ফুরি‘আ বিনত মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার স্বামী তাঁর কিছু ক্রীতদাসকে খুঁজতে বের হলেন। তিনি আল-কাদুম-এর প্রান্তে তাদের ধরে ফেললেন, তখন তারা তাকে হত্যা করল। যখন আমি আমার পরিবারের ঘর থেকে দূরে এক নির্জন ঘরে ছিলাম, তখন আমার কাছে তার মৃত্যুর খবর এলো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: আমার স্বামীর মৃত্যুর খবর এসেছে। আমি আমার পরিবারের ঘর থেকে দূরে এক নির্জন ঘরে আছি। তিনি আমার জন্য কোনো ভরণপোষণ বা সম্পদ রেখে যাননি, আর বাসস্থানটিও আমার নয়। যদি আমি আমার ভাই-বোনদের ও আমার পরিবারের নিকট চলে যাই, তবে আমার কিছু কাজের ক্ষেত্রে আমার জন্য সহজ হবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি চলে যাও।" যখন আমি মসজিদের দিকে—অথবা হুজরার দিকে—বের হলাম, তখন তিনি আমাকে ডাকলেন—অথবা আমাকে ডেকে আনার নির্দেশ দিলেন—এবং বললেন: "তুমি সেই ঘরেই অবস্থান করো, যেখানে তোমার স্বামীর মৃত্যুর খবর এসেছিল, যতক্ষণ না (ইদ্দতের) নির্দিষ্ট সময় পূর্ণ হয়।" অতঃপর আমি সেই ঘরে চার মাস দশ দিন ইদ্দত পালন করলাম। তিনি (ফুরি‘আ) বলেন: অতঃপর উসমান ইবনু আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোক পাঠালেন। আমি তাঁর নিকট এসে তাঁকে (এই হাদিসটি) শুনালাম এবং তিনি সেই অনুযায়ী আমল করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: والحجرة، بواو العطف، وإنما هو شك من الراوي كما في "السنن الصغرى" للبيهقي (2807) حيث رواه عن المصنف، وكذلك هو في مصادر التخريج. وأخرجه أحمد 45/ (27087)، والترمذي بإثر (1204)، والنسائي (5692) من طريق عبد الله بن إدريس، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد.



[2] إسناده صحيح كسابقه. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري. وأخرجه أحمد 45/ (27087)، والترمذي بإثر (1204)، والنسائي (5692) من طريق عبد الله بن إدريس، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد.



2869 [3] - "الموطأ" 2/ 591. "صحيحه" قرنه بعمرو بن دينار المكي الثقة، وقال عنه ابن حبان: لا يعجبني الاعتبار بحديثه من رواية إبراهيم بن مهاجر عنه، وقال الدارقطني: ليس بالقوي، وقال العقيلي في "الضعفاء" بإثر (1379): الأسانيد في هذا ثابتة في قصة سُبيعة الأسلمية عن أم سلمة وغيرها. قلنا: إن كان هذا الحديث الذي هنا هو نفسه حديث سُبيعة فقد وقعت المخالفة فيه في مواضع، منها أنه عن أم سلمة وليس عن عائشة، ومنها أنَّ زوج المرأة المذكورة مات أو قتل لا أنه طلَّقَها. والله تعالى أعلم.وأخرجه البخاري معلَّقًا في "تاريخه الكبير" 6/ 455 عن يعقوب بن إبراهيم، عن شريك، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري كذلك 6/ 455، والطبراني في "الأوسط" (1861) من طريق إسحاق بن يوسف، عن شريك، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن مصعب، به.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1379) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن أبي جعفر الرازي عيسى بن ماهان، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن سعد، عن عائشة.وحديث أم سلمة في قصة سُبيعة الأسلمية المذكورة أخرجه أحمد 42/ (26471) و (26658)، والبخاري (4909) و (5318)، ومسلم (1485)، والترمذي (1194)، والنسائي (5672 - 5680)، وابن حبان (4296) و (4297). وفي قصة سبيعة أنها وَلَدَت بعد وفاة زوجها بأربعين ليلة فخُطِبت فأنكحها رسول الله صلى الله عليه وسلم.



2869 [4] - كذا جزم بأنهما اثنان، مع أنَّ غيره قد جزم بأنه انقلب اسم سعد بن إسحاق على بعض من روى هذا الحديث وغيره، فسماه إسحاق بن سعد، فانقلب هنا على حماد بن زيد، مع أنه كان يروي عنه أحيانًا على الصواب كما قدَّمنا، وروى عبد الرحمن بن النعمان المدني عن سعد بن إسحاق حديثًا آخر فسماه إسحاق بن سعد خطأً كذلك، كما بينه الذهبي في "الميزان"، وابن حجر في "لسان الميزان"، والسخاوي في "التحفة اللطيفة في تاريخ المدينة الشريفة" (396)، والله تعالى أعلم. "صحيحه" قرنه بعمرو بن دينار المكي الثقة، وقال عنه ابن حبان: لا يعجبني الاعتبار بحديثه من رواية إبراهيم بن مهاجر عنه، وقال الدارقطني: ليس بالقوي، وقال العقيلي في "الضعفاء" بإثر (1379): الأسانيد في هذا ثابتة في قصة سُبيعة الأسلمية عن أم سلمة وغيرها. قلنا: إن كان هذا الحديث الذي هنا هو نفسه حديث سُبيعة فقد وقعت المخالفة فيه في مواضع، منها أنه عن أم سلمة وليس عن عائشة، ومنها أنَّ زوج المرأة المذكورة مات أو قتل لا أنه طلَّقَها. والله تعالى أعلم.وأخرجه البخاري معلَّقًا في "تاريخه الكبير" 6/ 455 عن يعقوب بن إبراهيم، عن شريك، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري كذلك 6/ 455، والطبراني في "الأوسط" (1861) من طريق إسحاق بن يوسف، عن شريك، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن مصعب، به.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1379) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن أبي جعفر الرازي عيسى بن ماهان، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن سعد، عن عائشة.وحديث أم سلمة في قصة سُبيعة الأسلمية المذكورة أخرجه أحمد 42/ (26471) و (26658)، والبخاري (4909) و (5318)، ومسلم (1485)، والترمذي (1194)، والنسائي (5672 - 5680)، وابن حبان (4296) و (4297). وفي قصة سبيعة أنها وَلَدَت بعد وفاة زوجها بأربعين ليلة فخُطِبت فأنكحها رسول الله صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2870)


2870 - أخبرني أبو حفص أحمد بن أَحْيَد الفقيه ببُخارَى من أصل كتابه، حدثنا أبو علي صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حدثنا علي بن حكيم الأَوْدي، حدثنا شَريك، عن إبراهيم بن مهاجر، عن مصعب بن عامر، عن عائشة، أنها قالت: طُلِّقَتِ امرأةٌ فَمَكَثَت ثلاثًا وعشرين ليلةً، فوَضَعتْ حَمْلَها، ثم أتتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَت ذلك له، فقال لها: "تَزوّجي" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في ذي القَعْدة سنة ثمانٍ وتسعين وثلاثِ مئة:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক মহিলাকে তালাক দেওয়া হলো। এরপর সে তেইশ রাত অতিবাহিত করল, অতঃপর সে তার সন্তান প্রসব করল। এরপর সে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বিষয়টি উল্লেখ করল। তখন তিনি তাকে বললেন, "তুমি বিবাহ করে নাও।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، تفرَّد به إبراهيم بن مهاجر، وهو ليس بالقوي وروى ما لا يُتابع عليه، ومصعب بن عامر كذا وقع اسمه في هذه الرواية، وبعض من يرويه عن شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - يسميه عامر بن مصعب، وهو الصحيح في اسمه كما كان يسميه ابنُ جُرَيج في عدة أحاديث رواها عنه، ومنها حديث أخرجه له البخاري (2060) قرنه فيه بعمرو بن دينار. وخالف أبو جعفر الرازي في هذا الحديث فسمى الرجل عامر بن سعد، وهو خطأ منه كما جزم بذلك أبو حاتم في سؤالات ابنه له في "العلل" (1301)، وأخطأ الدارقطني رحمه الله فصحَّح قوله في "العلل" (3869)، والقول في ذلك قول أبي حاتم. وعامر بن مصعب هذا وإن روى له البخاري في "صحيحه" قرنه بعمرو بن دينار المكي الثقة، وقال عنه ابن حبان: لا يعجبني الاعتبار بحديثه من رواية إبراهيم بن مهاجر عنه، وقال الدارقطني: ليس بالقوي، وقال العقيلي في "الضعفاء" بإثر (1379): الأسانيد في هذا ثابتة في قصة سُبيعة الأسلمية عن أم سلمة وغيرها. قلنا: إن كان هذا الحديث الذي هنا هو نفسه حديث سُبيعة فقد وقعت المخالفة فيه في مواضع، منها أنه عن أم سلمة وليس عن عائشة، ومنها أنَّ زوج المرأة المذكورة مات أو قتل لا أنه طلَّقَها. والله تعالى أعلم.وأخرجه البخاري معلَّقًا في "تاريخه الكبير" 6/ 455 عن يعقوب بن إبراهيم، عن شريك، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري كذلك 6/ 455، والطبراني في "الأوسط" (1861) من طريق إسحاق بن يوسف، عن شريك، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن مصعب، به.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1379) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن أبي جعفر الرازي عيسى بن ماهان، عن إبراهيم بن مهاجر، عن عامر بن سعد، عن عائشة.وحديث أم سلمة في قصة سُبيعة الأسلمية المذكورة أخرجه أحمد 42/ (26471) و (26658)، والبخاري (4909) و (5318)، ومسلم (1485)، والترمذي (1194)، والنسائي (5672 - 5680)، وابن حبان (4296) و (4297). وفي قصة سبيعة أنها وَلَدَت بعد وفاة زوجها بأربعين ليلة فخُطِبت فأنكحها رسول الله صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2871)


2871 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، قال: حدثنا هاشم بن يونس العَصّار بمصر، حدثنا علي بن مَعبَد، حدثنا أبو المَلِيح الرَّقِّي، حدثني عبد الملك بن أبي القاسم، عن أم كُلْثوم بنت عُقبة: أنها كانت تحت الزُّبَير بن العوام فكرهتْه، وكان شديدًا على النساء، فقالت للزُّبير: يا أبا عبد الله، رَوِّحْني بتطليقةٍ، قالت: وذلك حين وجدْتُ الطَّلْق، قال: وما يَنفعُكِ أن أُطلِّقَكِ تطليقةً واحدةً ثم أُراجعَك؟ قالت: إني أجدُني أستَرْوِحُ إلى ذلك، قال: فطلَّقها تطليقةً واحدةً، ثم خرج، فقالت لجاريتها: غَلِّقي الأبواب، قال: فوَضَعَتْ جاريةً، قال: فأُتي الزُّبَير فبُشِّر بها، فقال: مَكَرَت بي ابنةُ أبي مُعَيط، ثم خرج إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فأبانَها منه [1].هذا حديث غريب صحيح الإسناد.وأبو المَلِيح وإن لم يخرجاه، فغير متَّهم بالوَضْع [2]، فإنه إمام أهل الجزيرة في عصره، وأم كُلثوم هي ابنة عُقبة بن أبي مُعَيط، وهي التي يروي عنها ابنُها حميد بن عبد الرحمن عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس بالكذاب الذي يُصلِح بين الناس" [3].




উম্মে কুলসুম বিনত উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যুবাইর ইবনুল আওয়ামের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিবাহবন্ধনে ছিলেন, কিন্তু তিনি তাকে অপছন্দ করতেন। তিনি মহিলাদের প্রতি কঠোর ছিলেন। তিনি যুবাইরকে বললেন: হে আবূ আবদুল্লাহ! আমাকে এক তালাক দিয়ে স্বস্তি দাও। তিনি (উম্মে কুলসুম) বললেন: এটা সেই সময়ের কথা যখন আমি প্রসব বেদনা অনুভব করছিলাম। যুবাইর বললেন: আমি যদি তোমাকে এক তালাক দেই, আর এরপর তোমাকে ফিরিয়ে নেই, তাহলে তাতে তোমার কী লাভ হবে? তিনি বললেন: আমি এতে মানসিক প্রশান্তি অনুভব করব। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি তাকে এক তালাক দিলেন এবং বের হয়ে গেলেন। উম্মে কুলসুম তাঁর দাসীকে বললেন: দরজাগুলো বন্ধ করে দাও। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি একটি কন্যা সন্তান প্রসব করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, যুবাইরের কাছে খবর পৌঁছানো হলো এবং তাকে সুসংবাদ দেওয়া হলো। তখন তিনি বললেন: আবূ মুআইতের মেয়ে আমার সাথে ধোঁকা দিয়েছে। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং তাঁকে ঘটনাটি বললেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (যুবাইরকে) তার (উম্মে কুলসুম) থেকে সম্পূর্ণরূপে বিচ্ছিন্ন করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن بطريقيه، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل، لأن عبد الملك بن أبي القاسم - وهو الرَّقِّي، روى عنه ثقتان، وذكره ابن حبان في "الثقات" - كان يرسل الأخبار، وهو لم يدرك أم كلثوم بنت عقبة، لأنها ماتت في خلافة علي بن أبي طالب كما نص عليه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 2/ 277، وعبد الملك يروي عن نافع مولى ابن عمر وربيعة الرأي، فمثله لا يدرك الرواية عن الصحابة، لكن رُوي هذا الخبرُ من وجه آخر مرسلٍ رجاله ثقات، والله أعلم. أبو المَليح الرقي: هو الحسن بن عمر - ويقال: ابن عمرو - الفَزَاري.وأخرجه ابن ماجه (2026) من طريق عمرو بن ميمون بن مهران الجزري، عن أبيه، عن الزُّبَير بن العوام. فجعله من مسند الزُّبَير، واختُلِف فيه على عمرو بن ميمون، فالأكثرون يروونه عنه عن أبيه قال: كانت أم كلثوم تحت الزُّبَير، هكذا يروونه مرسلًا، وفي رواية عنه: عن أبيه عن أم كلثوم، فجعله من مسندها، وعلى أي حال فهو مرسل، لأنَّ ميمون بن مهران الجزري لم يُدرك الزُّبيرَ ولا أمَّ كلثوم، لكن رجاله ثقات فيعضدُ روايةَ المصنّف ويعتضد بها.وقولها: أستروِح، تعني أجد الراحة.



[2] ليس من شرط الصحيح الإخراج عمن لم يُتهم بالوضع، فمن كان هذا حاله فهو ساقط الرواية، ولا يحسن إيراد هذا الوصف أصلًا بإزاء من خرِّج له في الصحيح، ولو أنَّ المصنف قال: فغير موصوف بقصور الضبط أو سوء الحفظ لكان أليق.



2871 [3] - أخرجه البخاري (2692)، ومسلم (2605).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2872)


2872 - حدثني علي بن عيسى بن إبراهيم الحِيْري، حدثنا محمد بن عمرو بن النضر الحَرَشي، حدثنا عبد الله بن مَسلَمة، حدثني عبد الأعلى، حدثنا سعيد، عن مَطَر، عن رجاء بن حَيْوة، عن قَبِيصة بن ذُؤيب، عن عمرو بن العاص، قال: لا تَلبِسُوا علينا سنّةَ نبينا محمد صلى الله عليه وسلم في أمِّ الولد، إذا توفي عنها سيِّدُها عدّتُها {أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: উম্মুল ওয়ালাদের (যে দাসীর গর্ভে তার মনিবের সন্তান হয়েছে) ব্যাপারে আমাদের নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতকে আমাদের জন্য গোলমাল করে দিও না। যখন তার মনিব মৃত্যুবরণ করে, তখন তার ইদ্দত হলো {চার মাস ও দশ দিন}।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا حسن، مَطَرٌ - وهو ابن طهمان الورّاق - حديثه حسن في المتابعات والشواهد، وهذا منها، فقد تابعه قتادة كما سيأتي، وقول الدارقطني في "سننه" (3836): قبيصة لم يسمع من عمرو، فيه نظر كما قال ابن عبد الهادي في "المحرر" (1082)، وقال ابن التركماني في "الجوهر النقي" 7/ 448: قبيصة سمع عثمان بن عفان وزيد بن ثابت وأبا الدرداء، فلا شك في إمكان سماعه من عمرو. قلنا: ومما يؤكد أنَّ سماعه منه محتمل، أنَّ قبيصة ولد عام الفتح، وتوفي عمرو بن العاص سنة اثنتين وستين، وكان سنّ قبيصة سنة وفاة عمرو إحدى وخمسين، ثم إنَّ قبيصة سكن الشام، وكذلك عمرو بن العاص أقام بالشام بعد الفتوحات كثيرًا، وعليه فسماعه منه محتمل إقامة ومعاصرة. عبد الله بن مسلمة: هو القعنبي، وعبد الأعلى: هو ابن عبد الأعلى السامي، وسعيد: هو ابن أبي عروبة.وأخرجه أبو داود (2308) عن محمد بن المثنى، وابن حبان (4300) من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، كلاهما عن عبد الأعلى، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2308) من طريق محمد بن جعفر، وابن ماجه (2083) من طريق وكيع بن الجراح، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، به.وأخرجه أحمد 29/ (17803) عن يزيد بن هارون، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن رجاء بن حيوة، به. فذكر قتادة بدل مطر الوراق. وهذا إسناد صحيح، قال ابن حبان: سمع هذا الخبر ابن أبي عروبة عن قتادة ومطر الوراق، فمرة يُحدّث عن هذا، وأخرى عن ذلك. وقال الدارقطني في "سننه" بإثر (3839): رفعه قتادة ومطر الوراق، ثم ساقه (3837) من طريق يزيد بن زُريع، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة ومطر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2873)


2873 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا بشر بن بكر التِّنِّيسي، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن سُلَيم بن عامر الكَلَاعي، حدثني أبو أُمامة الباهِلي، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "بَيْنا أنا نائمٌ، إذ أتاني رجلان فأخَذا بضَبْعَيَّ، فأتَيا بي جبَلًا وَعْرًا، فقالا لي: اصعَدْ، فقلت: إني لا أُطيق، فقالا: إنا سنُسهِّله لك، فصَعَّدْتُ حتى كنتُ في سَواءِ الجَبَل إذا أنا بأصواتٍ شديدةٍ، فقلت: ما هذه الأصوات؟ قالوا: هذا عُواءُ أهل النار، ثم انطُلِق بي، فإذا بقوم مُعلَّقين بعَراقيبهم، مُشقَّقةٍ أَشْداقُهم تَسيلُ أشداقُهم دمًا، قلت: ما هؤلاء؟ قال: هؤلاء الذين يُفطِرون قبل تَحِلّةِ صومِهم، ثم انطُلِق بي، فإذا بقومٍ أشدَّ شيءٍ انتفاخًا وأنتَنَه ريحًا، وأسوأَه منظرًا، فقلت: من هؤلاء؟ قال: هؤلاء الزانُون والزَّواني، ثم انطُلِق بي، فإذا أنا بنساءٍ يَنهَشنَ ثُدِيَّهن الحيّاتُ، فقال: ما بالُ هؤلاء؟ فقال: هؤلاء اللواتي يَمنَعنَ أولادهن ألبانَهُنَّ، ثم انطُلِق بي، فإذا أنا بغلمانٍ يَلعبُون بين نهرَين، فقلت: من هؤلاء؟ قالوا: هؤلاء ذَرَاريُّ المؤمنين، ثم شَرَفَ لي شَرَفٌ، فإذا أنا بثلاثة نَفَرٍ يَشربُون من خمْرٍ لهم، قلت: من هؤلاء؟ قالوا: هؤلاء جعفرُ بن أبي طالب وزيدٌ وابنُ رَوَاحةَ، ثم شَرَفَ لي شَرَفٌ آخرُ، فإذا أنا بثلاثةِ نفرٍ، قلت: من هؤلاء؟ قال: هذا إبراهيمُ وموسى وعيسى، وهم ينتظرونَك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وقد احتجَّ البخاري بجميع رُواته غير سُلَيم بن عامر، وقد احتجَّ به مسلم.




আবু উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আমি ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলাম, হঠাৎ দু’জন লোক আমার কাছে আসলেন এবং তারা আমার বাহুদ্বয় ধরে আমাকে একটি দুর্গম পাহাড়ের কাছে নিয়ে গেলেন। তারা আমাকে বললেন: উপরে উঠুন। আমি বললাম: আমি শক্তি রাখি না। তারা বললেন: আমরা আপনার জন্য তা সহজ করে দেব। এরপর আমি উপরে উঠলাম, যখন আমি পাহাড়ের সমতল ভূমিতে পৌঁছলাম, তখন আমি কতগুলো বিকট আওয়াজ শুনতে পেলাম। আমি বললাম: এসব কিসের আওয়াজ? তারা বললেন: এটা জাহান্নামবাসীদের আর্তনাদ। তারপর আমাকে নিয়ে যাওয়া হলো, সেখানে দেখলাম কিছু লোক তাদের গোড়ালি দিয়ে ঝুলন্ত অবস্থায় রয়েছে। তাদের গালগুলো ছিন্নভিন্ন ছিল এবং তাদের গাল থেকে রক্ত ঝরছিল। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বললেন: এরা হলো তারা, যারা রোযা পূর্ণ করার আগেই তা ভঙ্গ করত। তারপর আমাকে নিয়ে যাওয়া হলো, সেখানে দেখলাম কিছু লোক, যারা ছিল সবচেয়ে বেশি ফোলা, সবচেয়ে দুর্গন্ধযুক্ত এবং সবচেয়ে খারাপ চেহারার। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বললেন: এরা হলো ব্যভিচারী পুরুষ ও ব্যভিচারিণী নারী। তারপর আমাকে নিয়ে যাওয়া হলো, সেখানে দেখলাম কিছু নারী, যাদের স্তনগুলো সাপেরা কামড়ে ধরছে। আমি বললাম: এদের কী হয়েছে? তারা বললেন: এরা হলো সেই সব নারী, যারা তাদের সন্তানদের দুধ পান করানো থেকে বিরত রাখত। এরপর আমাকে নিয়ে যাওয়া হলো, সেখানে আমি দুটি নদীর মাঝখানে কিছু বালককে খেলতে দেখলাম। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বললেন: এরা হলো মুমিনদের অপ্রাপ্তবয়স্ক সন্তানরা। তারপর আমার জন্য একটি উচ্চ স্থান প্রকাশ করা হলো, সেখানে দেখলাম তিনজন লোক তাদের পানীয় থেকে পান করছেন। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বললেন: এরা হলেন জা‘ফর ইবনু আবী তালিব, যায়দ এবং ইবনু রাওয়াহা। এরপর আমার জন্য আরেকটি উচ্চ স্থান প্রকাশ করা হলো, সেখানে দেখলাম আরও তিনজন লোক। আমি বললাম: এরা কারা? তিনি বললেন: এঁরা হলেন ইবরাহীম, মূসা ও ঈসা (আলাইহিমুস সালাম) এবং তাঁরা আপনার অপেক্ষায় আছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه ابن حبان (7491) عن محمد بن إسحاق بن خزيمة، عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.وتقدم برقم (1584) مختصرًا من طريق بحر بن نصر الخولاني عن مشرف بن بكر.الضَّبْعان: مثنّى ضَبْع، وهو العَضُد.والوعْر: الصعب، وزنًا ومعنًى.وسواء الجبل: وسطه.وعُواء أهل النار: صياحهم.والعراقيب: جمع عُرقوب، وهو عَصَب غليظ فوق عَقِب الإنسان.والأشداق: جمع شِدْق، هو جانب الفم.وتحلّة صومهم، أي: وقت كونهم في حِلٍّ من صومهم.وقوله: "شَرَف لي شَرَفٌ" أي: ارتفع وعلا لي مرتَفَعٌ، أي ظهر لي مكانٌ مُرتَفِع، والأشهر فيه: أشرف، من الرباعي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2874)


2874 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُباب، حدثني أبو ثابت زيد [1] بن إسحاق بن إسماعيل بن محمد بن ثابت بن قيس بن شَمّاس، حدثني جَدّي إسماعيل بن محمد بن ثابت بن قيس بن شَمّاس، عن أبيه محمد: أنَّ أباه ثابتَ بنَ قيس فارَقَ جَميلةَ بنتَ عبد الله بن أُبيّ، وهي حاملةٌ بمحمد [2]، فلما ولَدَتْه حَلَفتْ أن لا تَلْبِنَه مِن لَبَنِها، فدعا به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فبَزَق في فِيه، وحَنَّكه بتمرة عَجْوة، وسمّاه محمدًا، وقال: اختَلِفْ به، فإن الله رازِقُه، فأتيتُه اليومَ الأولَ والثاني والثالث، فإذا امرأةٌ من العرب تسأل عن ثابت بن قيس، فقلت: ما تُريدين منه؟ أنا ثابت، قالت: رَأيتُ في مَنامي هذه [3]، كأني أُرضع ابنًا له يقال له: محمد، فقال: فأنا ثابت، وهذا ابني محمد، قال: وإذا دِرْعُها يَنعصِر من لبنها [4]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সাবেত ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা সাবেত ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জামিলা বিনতে আবদুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের সঙ্গে বিচ্ছেদ ঘটিয়েছিলেন, যখন তিনি মুহাম্মদকে গর্ভে ধারণ করেছিলেন। যখন তিনি তাকে প্রসব করলেন, তখন তিনি কসম করলেন যে তাকে নিজের দুধ খাওয়াবেন না। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (শিশুটিকে) ডেকে আনলেন, তার মুখে থুথু দিলেন, এবং একটি আজওয়া খেজুর দিয়ে তাহনীক করলেন এবং তার নাম রাখলেন মুহাম্মদ। আর বললেন: তাকে নিয়ে আসা-যাওয়া করতে থাকো, আল্লাহই তার রিযিকদাতা। (সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন) আমি প্রথম দিন, দ্বিতীয় দিন এবং তৃতীয় দিনও তাকে নিয়ে (নবীজির কাছে) আসলাম। হঠাৎ দেখলাম একজন আরব মহিলা সাবেত ইবনে কায়সের খোঁজ করছেন। আমি বললাম: আপনি তার কাছে কী চান? আমিই সাবেত। তিনি বললেন: আমি এই রাতে স্বপ্নে দেখেছি, যেন আমি আপনার এক পুত্রকে দুধ পান করাচ্ছি, যার নাম মুহাম্মদ। সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিই সাবেত, আর এই হলো আমার পুত্র মুহাম্মদ। (বর্ণনাকারী) বলেন: তখন দেখা গেল যে তার (মহিলাটির) বক্ষদেশ থেকে দুধ নিঃসৃত হচ্ছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ع): يزيد، والمثبت من (ب)، وهو الموافق لما في رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 227 عن الحاكم، وكذلك لما في رواية ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 52/ 172 من طريق البيهقي عن الحاكم. قيس: أنَّ جميلة بنت أُبيّ اختَلَعَت من ثابت بن قيس، فانتقلت، فولَدت محمدًا، فجعلته في ليف وأرسلته إلى ثابت، فأتى به النبي صلى الله عليه وسلم فحنّكه وسماه محمدًا، فاستَرضع له في قوم آخرين.



[2] في (ز): وهي حاملةُ محمدٍ، على الإضافة. قيس: أنَّ جميلة بنت أُبيّ اختَلَعَت من ثابت بن قيس، فانتقلت، فولَدت محمدًا، فجعلته في ليف وأرسلته إلى ثابت، فأتى به النبي صلى الله عليه وسلم فحنّكه وسماه محمدًا، فاستَرضع له في قوم آخرين.



2874 [3] - قولها: هذه، تعني نفسها. قيس: أنَّ جميلة بنت أُبيّ اختَلَعَت من ثابت بن قيس، فانتقلت، فولَدت محمدًا، فجعلته في ليف وأرسلته إلى ثابت، فأتى به النبي صلى الله عليه وسلم فحنّكه وسماه محمدًا، فاستَرضع له في قوم آخرين.



2874 [4] - خبر محتمل للتحسين، وهذا إسناد فيه أبو ثابت زيد بن إسحاق وجده إسماعيل، فيهما جهالة، ولكن روي نحو هذا الخبر باختصار من وجه آخر عن يحيى بن إبراهيم بن محمد بن ثابت بن قيس مرسلًا، فباجتماع هذين الطريقين يتقوَّى الخبر إن شاء الله، على أنَّ هذه القصة حصلت في شأن ثابت بن قيس، وأهل بيته أدرى بها، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 227 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 51، وأبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (1962)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (671)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 52/ 171 و 172 و 172 - 173 من طرق عن زيد بن الحُباب، به.وأخرجه مختصرًا ابن سعد في "الطبقات" 4/ 343، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 52/ 173 عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، عن يحيى بن إبراهيم بن محمد بن ثابت بن قيس: أنَّ جميلة بنت أُبيّ اختَلَعَت من ثابت بن قيس، فانتقلت، فولَدت محمدًا، فجعلته في ليف وأرسلته إلى ثابت، فأتى به النبي صلى الله عليه وسلم فحنّكه وسماه محمدًا، فاستَرضع له في قوم آخرين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2875)


2875 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا الحسن بن المثنَّى العَنْبري، حدثنا موسى بن مسعود، حدثنا شِبْل بن عَبّاد، عن ابن أبي نَجِيح، قال: قال عطاء: قال ابن عباس: نَسَخَت هذه الآيةُ عِدّتَها عند أهلها، فتَعتدُّ حيث شاءت، وهو قول الله تعالى: {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} [البقرة: 240].قال عطاء: إن شاءت اعتدّت عند أهلها وسكَنتْ في وصيّتها، وإن شاءت خرجت لقول الله تعالى: {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ} [البقرة: 240]، قال عطاء: ثم جاء الميراثُ فنَسَخ السُّكْنى، تعتدُّ حيث شاءت [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه!




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এই আয়াতটি (সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৪০) তার (বিধবার) ইদ্দত শ্বশুরবাড়িতে কাটানোর বিধানকে রহিত (নাসখ) করে দিয়েছে। ফলে সে যেখানে ইচ্ছা ইদ্দত পালন করতে পারে। আর এটিই আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {গাইরা ইখরাজিন} (অর্থাৎ বহিষ্কার না করে) [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৪০]-এর মর্ম। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যদি সে চায়, তবে সে তার স্বামীর ওসিয়ত অনুযায়ী তার (শ্বশুর) বাড়িতে ইদ্দত পালন করতে পারে এবং বসবাস করতে পারে। আর যদি সে চায়, তবে সে বাইরেও চলে যেতে পারে। কারণ আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {ফা-লা জুনা-হা আলাইকুম ফীমা ফা‘আলনা} (অর্থাৎ তারা যা করবে তাতে তোমাদের কোনো পাপ নেই) [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৪০]। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এরপর (মৃত্যুজনিত) উত্তরাধিকারের আয়াত নাযিল হলো, যা বসবাসের বিধানকে রহিত করে দেয়। ফলে সে যেখানে ইচ্ছা ইদ্দত পালন করতে পারে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل موسى بن مسعود - وهو أبو حذيفة النَّهدي - وقد توبع. ابن أبي نَجيح: هو عبد الله، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (2301) عن أحمد بن محمد المروَزي، عن موسى بن مسعود، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (4531) و (5345) من طريق رَوح بن عُبادة، عن شبل بن عبّاد، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وسيأتي برقم (3146) من طريق ورقاء بن عمر عن ابن أبي نجيح. وانظر رواية ابن جريج عن عطاء الآتية برقم (3148).وقوله: "نَسَخَت هذه الآيةُ" يعني بها آية البقرة الأولى برقم (234) وهي قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا}، نسخت الآية الثانية منها برقم (240) وهي قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ مَتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ}، وهذا باتفاق جماعة المفسرين وكافّة الفقهاء.وروى عكرمة عن ابن عباس قال: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ مَتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ}، فنُسخ ذلك بآية الميراث بما فُرض لهن من الربع والثمن، ونُسخَ أجل الحول بأن جُعِل أجلُها أربعة أشهر وعشرًا. أخرجه أبو داود (2298) والنسائي (5706).وروى ابن سيرين عنه أيضًا: أنه قرأ حتى أتى على هذه الآية {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا} إلى قوله: {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} فقال: وهذه نُسِخَت. وسيأتي عند المصنف برقم (3147). وروى علي بن أبي طلحة عنه أيضًا قال: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ مَتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ}، كان الرجل إذا مات وترك امرأته اعتدّت سنة في بيته يُنفَق عليها من ماله، ثم أنزل الله عز وجل: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} قال: فهذه عدة المتوفى عنها زوجها إلّا أن تكون حاملًا فعدّتها أن تضع. أخرجه أبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (232)، والطبري في "تفسيره" 2/ 580، وكذا ابن أبي حاتم 2/ 452، وأبو جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 24، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 427، والخطيب في "الفقه والمتفقه" (241).وقوله: "عند أهلها" أي: عند أهل الرجل، باعتبارهم صاروا أهلًا لها، وقد جاء في رواية أبي بكر الجصاص في "أحكام القرآن" 2/ 124 لهذا الخبر عن ابن داسَهْ عن أبي داود السّجستاني: عند أهله، على الجادة، وكذا وقع لأبي ذر الهروي عن الكشميهني في رواية البخاري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2876)


2876 - أخبرنا أبو بكر إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّيّ، حدثنا محمد بن الفَرَج الأزرق، حدثنا حجّاج بن محمد، قال: وأخبرني [ابن جُرَيج] [1] حدثنا أبو الزُّبَير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: جاء مِسكينٌ لبعض الأنصار، فقال [2]: إِنَّ سيِّدي يُكرِهُني على البِغاء، فنَزَل في ذلك: {وَلَا تُكْرِهُوا فَتَيَاتِكُمْ عَلَى الْبِغَاءِ} [النور: 33] [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه [4]. بسم الله الرحمن الرحيم ‌‌أول كتاب العِتق




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের অন্তর্ভুক্ত এক মিসকীন (দাসী) এসে বললেন, 'নিশ্চয়ই আমার মনিব আমাকে ব্যভিচারে বাধ্য করে।' তখন এ প্রসঙ্গে এই আয়াতটি অবতীর্ণ হয়: {আর তোমরা তোমাদের দাসীদেরকে ব্যভিচারে বাধ্য করো না} (সূরাহ আন-নূর: ৩৩)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من أصولنا الخطية اسم ابن جُرَيج من الإسناد، والصحيح إثباته، وقد ثبت على الصواب في الرواية الآتية برقم (3544)، وثبت أيضًا في "إتحاف المهرة" (3517)، وهو ثابت لجميع من خرَّج هذا الحديث من طريق حجاج بن محمد، هو المعروف لأنَّ حجاجًا مشهور بإسناد روايات أبي الزُّبَير بواسطة ابن جُرَيج. وأخرجه أبو داود (2311) عن أحمد بن إبراهيم الدورقي، والنسائي (11301) عن الحسن بن محمد بن الصبّاح، كلاهما عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد. بلفظ: جاءت مُسَيكة لبعض الأنصار، فقالت ....وأخرجه مسلم (3029) من طريق أبي سفيان طلحة بن نافع، عن جابر، وسمَّى الأنصاري عبد الله بن أبيّ بن سَلُول.وسيأتي برقم (3544) من طريق محمد بن إسحاق الصغاني عن حجاج.والبِغاء: هو الزِّنى.



[2] كذا جاء في رواية الحاكم وحده هنا بأنَّ السائل عن ذلك رجل، وهو مخالف لسائر من روى الحديث أنَّ السائل عن ذلك امرأة، وهو المناسب لنص الآية، وسيأتي على الصواب في الرواية الآتية. وأخرجه أبو داود (2311) عن أحمد بن إبراهيم الدورقي، والنسائي (11301) عن الحسن بن محمد بن الصبّاح، كلاهما عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد. بلفظ: جاءت مُسَيكة لبعض الأنصار، فقالت ....وأخرجه مسلم (3029) من طريق أبي سفيان طلحة بن نافع، عن جابر، وسمَّى الأنصاري عبد الله بن أبيّ بن سَلُول.وسيأتي برقم (3544) من طريق محمد بن إسحاق الصغاني عن حجاج.والبِغاء: هو الزِّنى.



2876 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن الفرج، وقد توبع. ابن جُرَيج: هو عبد الملك بن عبد العزيز المكي، وأبو الزُّبَير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس المكي. وأخرجه أبو داود (2311) عن أحمد بن إبراهيم الدورقي، والنسائي (11301) عن الحسن بن محمد بن الصبّاح، كلاهما عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد. بلفظ: جاءت مُسَيكة لبعض الأنصار، فقالت ....وأخرجه مسلم (3029) من طريق أبي سفيان طلحة بن نافع، عن جابر، وسمَّى الأنصاري عبد الله بن أبيّ بن سَلُول.وسيأتي برقم (3544) من طريق محمد بن إسحاق الصغاني عن حجاج.والبِغاء: هو الزِّنى.



2876 [4] - بل قد أخرجه مسلم كما قدَّمنا، لكن من طريق أخرى عن جابر بسياقة أتمّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2877)


2877 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو بَكْرة بَكّار بن قُتيبة القاضي بمصر، حدثنا أبو داود الطيالسي، حدثنا هشام بن أبي عبد الله، عن قَتَادة، عن الحسن، عن قيس الجُذَامي، عن عُقْبة بن عامر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من أعتق رقبةً، فَكَّ اللهُ بكلّ عُضوٍ من أعضائه عُضوًا من أعضائه من النار" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهد عن أبي موسى الأشعري وواثلة بن الأسقَع.أما حديث أبي موسى:




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি একটি দাস বা দাসী আযাদ করবে, আল্লাহ তা'আলা তার (আযাদকৃত দাসের) প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে আযাদকারী ব্যক্তির প্রতিটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্ত করে দেবেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة الحسن: وهو ابن عبد الرحمن الشامي. أبو داود الطيالسي: هو سليمان بن داود، وهشام بن أبي عبد الله: هو الدَّستُوائي.وهو في "مسند الطيالسي" برواية يونس بن حبيب عنه (596) لكن دون ذكر الحسن بن عبد الرحمن الشامي في إسناده.لكن تابع بكار بن قتيبة على ذكر الحسن في إسناده محمدُ بن بشار عند الروياني في "مسنده" (241) حيث رواه الرُّوياني عن محمد بن بشار، عن أبي داود الطيالسي، به. بذكر الحسن.وأخرجه أحمد 28/ (17357) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن هشام الدستوائي، عن قتادة، عن قيس الجذامي، به. لم يذكر في إسناده الحسن أيضًا.وأخرجه أحمد كذلك (17326) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: ذُكر أنَّ قيسًا الجذامي، فذكرهوفي الباب عن أبي هريرة عند أحمد 16/ (10801)، والبخاري (2517)، ومسلم (1509).وعن أبي موسى الأشعري وواثلة بن الأسقع، وسيأتيان بعده.وعن عمرو بن عَنبَسة عند أحمد 28/ (17022)، وأبي داود (3965)، والنسائي (4859) و (4868)، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2878)


2878 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن دِيْزِيل، حدثنا آدم بن أبي إياس العَسْقلاني وعبد الله بن الزُّبَير الحُميدي وإبراهيم بن بشار الرَّمادي، قالوا: حدثنا سفيان بن عُيينة، حدثني شيخ من أهل الكوفة يقال له: شعبة، قال: كنا عند أبي بُردة بن أبي موسى ومعه بنُوه، فقال: ألا أُحدِّثُكم بحديثٍ حدثني به أبي؟ قالوا: بلى يا أبتِ، فحَدِّثنا، قال: حدثني أبي، أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أعتقَ رقبةً - أو عبدًا - كانت فَكَاكَهُ من النار عُضوًا بعُضو" [1].وأما حديث واثلةَ:




আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি একটি দাস মুক্ত করবে—অথবা একজন গোলামকে—তার প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে আল্লাহ তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্ত করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح: شعبة: هو ابن دينار.وأخرجه أحمد 32/ (19623)، وأخرجه النسائي (4858) عن محمد بن منصور، كلاهما (أحمد ومحمد بن منصور) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 25/ (16010) من طريق زياد بن عبد الله عُلاثة، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن واثلة بن الأسقع. وهذا منقطع، لأنَّ ابن أبي عبلة نصَّ على أنه لم يسمع من واثلة عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (734).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2879)


2879 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عُتبة أحمد بن الفَرَج، حدثنا ضَمْرة بن ربيعة، حدثنا إبراهيم بن أبي عَبْلة، عن الغَريف بن الدَّيلمي، قال: أتينا واثِلةَ بن الأسقع، فقلنا: حدِّثنا حديثًا سمعتَه مِن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ليس فيه زيادةٌ ولا نُقصان، فغضب، وقال: إنَّ مُصحفَ أحدِكم مُعلَّق في بيته وهو يزيدُ وينقصُ، قال: فقلنا: ليس هذا أردْنا، إنما أردْنا أن تحدّثَنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس بينك وبينه أحدٌ، قال: أتينا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في صاحب لنا، قد أوجَبَ - يعني النارَ - فقال: "أعتِقُوا عنه يُعتِقِ اللهُ بكلّ عُضوٍ منه عُضوًا منه من النارِ" [1]. غَريف هذا لقبٌ لعبد الله بن الدَّيلمي [2].




গারীফ ইবনুদ্ দাইলামী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ওয়াসিলা ইবনুল আসকা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা এমন একটি হাদীস আমাদের কাছে বর্ণনা করুন, যাতে কোনো প্রকার বৃদ্ধি বা কমতি নেই।

তিনি (ওয়াসিলা) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: তোমাদের কারো কারো মুসহাফ (কুরআন শরীফ) তোমাদের ঘরে ঝোলানো থাকে, অথচ তাতেও তো (ব্যাখ্যার ক্ষেত্রে) কিছু সংযোজন বা বিয়োজন হয়ে থাকে। গারীফ বলেন: তখন আমরা বললাম: আমরা এটা উদ্দেশ্য করিনি, বরং আমরা চাচ্ছিলাম যে আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা এমন একটি হাদীস বর্ণনা করুন, যা আপনি সরাসরি তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছ থেকে শুনেছেন, আপনার ও তাঁর মাঝে অন্য কেউ নেই।

তিনি (ওয়াসিলা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমাদের এক সাথীর ব্যাপারে এসেছিলাম, যার জন্য (জাহান্নাম) ওয়াজিব হয়ে গিয়েছিল। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার পক্ষ থেকে গোলাম আযাদ করো, আল্লাহ তার প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে জাহান্নাম থেকে তার এক একটি অঙ্গকে আযাদ করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، أحمد بن الفرج حديثه حسن في المتابعات والشواهد، وقد توبع، ومن فوقه لا بأس بهم إلَّا الغَريف - وهو ابن عياش بن فيروز - الدَّيلمي، لم يرو عنه غير إبراهيم بن أبي عَبْلَة، وانفرد ابن حبان بذكره في "الثقات"، لكن تابعه عمه عبد الله بن فيروز الدَّيلَمي في الطريق التالية.وأخرجه أحمد 25/ (16012) عن إبراهيم بن إسحاق الطالقاني، وأبو داود (3964) عن عيسى بن محمد الرمْلي، كلاهما عن ضَمْرة بن ربيعة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (16985)، والنسائي (4871) من طريق عبد الله بن المبارك، عن إبراهيم بن أبي عبلة، به. وأخرجه أحمد 25/ (16010) من طريق زياد بن عبد الله عُلاثة، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن واثلة بن الأسقع. وهذا منقطع، لأنَّ ابن أبي عبلة نصَّ على أنه لم يسمع من واثلة عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (734).



[2] كذا جزم المصنف رحمه الله بأنَّ الغَريف هو لقب لعبد الله بن الديلمي، ولم يسبقه أحد إلى هذا، والمعروف أنَّ الغريف هو ابن أخي عبد الله بن الديلمي، فقد نسبه عبد الله بن المبارك ويحيى بن حمزة الحضرمي عند الطحاوي في روايتهما لهذا الحديث، فقالا: الغريف بن عياش بن فيروز الديلمي، ومعلوم أنَّ لفيروز ثلاثة من الولد: وهم عبد الله وعياش والضحاك، وإبراهيم بن أبي عبلة قد روى هذا الحديث عن الغريف بن عياش بن فيروز، وعن عمه عبد الله بن فيروز كما في الطريق التالية، وكلاهما يرويه عن واثلة بن الأسقع. وتقدم قبله من طريق إبراهيم بن أبي عبلة، عن الغريف بن عياش بن فيروز الديلمي ابن أخي عبد الله، عن واثلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2880)


2880 - حدثنا بصحَّة ما ذكرتُه أبو إسحاق إبراهيم بن فِراس الفقيه، حدثنا بكر بن سَهْل الدِّمْياطي، حدثنا عبد الله بن يوسف التِّنِّيسي، حدثنا عبد الله بن سالم، حدثني إبراهيم بن أبي عَبْلة، قال: كنت جالسًا بأَرِيحا، فمَرَّ بي واثلةُ بن الأسقع متوكِّئًا على عبد الله بن الدَّيلَمي، فأجلَسه ثم جاء إليّ، فقال: عَجَبٌ ما حدثني هذا الشيخ - يعني واثلةَ - قلت: وما حدّثَك؟ قال: فحدَّثني قال: كنت جالسًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تَبُوك، فأتاه نفرٌ من بني سُلَيم، فقالوا: يا رسول الله، إنَّ صاحبنا قد أوجَبَ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أعتِقُوا عنه يُعتِق اللهُ بكلِّ عُضوٍ منها عضوًا منه من النار" [1]. فصار حديثُ واثلةَ بهذه الروايات صحيحًا، على شرط الشيخين، وقد أخرج مسلم من حديث أبي هريرة لفظَه في عِتْق امرئٍ مسلمٍ امرأً مسلمًا [2].




ওয়াসিলা ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাবুক যুদ্ধের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম। তখন বনু সুলাইম গোত্রের কিছু লোক তাঁর কাছে এসে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের এক সাথী এমন কাজ করেছে যা (তার জন্য জাহান্নাম) আবশ্যক করে দিয়েছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার পক্ষ থেকে একটি দাস মুক্ত করো। আল্লাহ সেই দাসটির প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে তার (পাপী ব্যক্তিটির) একটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্ত করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد فيه بكر بن سهل، وهو وإن كان ضعيفًا قد توبع.وأخرجه النسائي (4872) عن الربيع بن سليمان صاحب الشافعي، وابن حبان (4307) من طريق إبراهيم بن يعقوب الجُوزَجاني، كلاهما عن عبد الله بن يوسف، بهذا الإسناد.وقد تابع عبدَ الله بن سالم عليه مالكُ بن أنس عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (737).وسيأتي بعده من طريق أيوب بن سويد، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن عبد الأعلى بن الديلمي، عن واثلة. وأيوب ضعيف، ويغلب على الظن أنه أخطأ في تسمية ابن الديلمي، وإنما هو عبد الله. وتقدم قبله من طريق إبراهيم بن أبي عبلة، عن الغريف بن عياش بن فيروز الديلمي ابن أخي عبد الله، عن واثلة.



[2] أخرجه مسلم برقم (1509)، وهو أيضًا عند البخاري (2517).