আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2921 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله قال: أقرأَني رسول الله صلى الله عليه وسلم سورةَ (حم)، ورُحْتُ إلى المسجد عَشِيَّةً، فجلس إليَّ رَهْطٍ، فقلت لرجل من الرَّهْط: اقرأْ عليَّ، فإذا هو يقرأُ حروفًا لا أقرؤُها، فقلت له: مَن أقرأَكَها؟ قال: أقرأَنيها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فانطَلَقْنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وإذا عنده رجل، فقلت: اختَلَفْنا في قراءتنا، وإذا وجهُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد تغيَّر ووَجَدَ في نفسه حين ذكرتُ له الاختلاف، فقال: "إنما أهلَكَ من كان قبلَكم الاختلافُ"، ثم أسرَّ إلى عليٍّ، فقال عليٌّ: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرُكم أن يقرأَ كلُّ رجل منكم كما عُلِّم، فانطَلَقْنا وكلُّ رجل منا يقرأُ حروفًا لا يقرؤُها صاحبُه [1].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে সূরা হা-মীম পাঠ করিয়েছিলেন। আমি সন্ধ্যায় (দিনের শেষ ভাগে) মসজিদের দিকে যাচ্ছিলাম, তখন একদল লোক আমার কাছে এসে বসলো। আমি সেই দলটির একজনকে বললাম, 'তুমি আমার কাছে পাঠ করো।' তখন সে এমন সব হরফ (আক্ষরিক রূপ) পাঠ করছিল যা আমি পাঠ করি না। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, 'কে তোমাকে এটি পাঠ করিয়েছে?' সে বলল, 'আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি পাঠ করিয়েছেন।' আমরা উভয়ে তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম। দেখলাম তাঁর কাছে একজন লোক উপস্থিত আছেন। আমি বললাম, 'আমাদের কিরাআতে (কুরআন পাঠে) মতপার্থক্য হয়েছে।' আমি যখন মতপার্থক্যের কথা বললাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেল এবং তিনি মনে কষ্ট অনুভব করলেন। তিনি বললেন, "তোমাদের পূর্ববর্তীদের কেবল মতভেদই ধ্বংস করেছে।" এরপর তিনি আলীকে চুপিসারে কিছু বললেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে নির্দেশ দিচ্ছেন যে, তোমাদের প্রত্যেকে যেন সেভাবেই পাঠ করে যেভাবে তাকে শেখানো হয়েছে।" অতঃপর আমরা ফিরে এলাম এবং আমাদের প্রত্যেকেই এমন কিছু হরফ পাঠ করছিল যা তার অন্য সাথী পাঠ করে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناده حسن من أجل عاصم: هو ابن أبي النَّجود. زر: هو ابن حُبيش، وعبد الله: هو ابن مسعود. وأخرجه ابن حبان (747) من طريق عامر بن مُدرِك، عن عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (3981) و (3992) و (3993) و (4322)، وابن حبان (746) من طرق عن عاصم، به.وأخرجه بنحوه مختصرًا أحمد 6/ (3803) من طريق همام، عن عاصم، عن أبي وائل، عن ابن مسعود.وأخرجه أحمد 6/ (3724) و 7/ (3907) و (3908) و (4364)، والبخاري (2410) و (3476) و (5062)، والنسائي (8040) من طريق النَّزّال بن سَبْرة، عن عبد الله بن مسعود ولم يذكر فيه عليًّا.
2922 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا علي بن محمد بن أبي الشَّوَارب، حدثنا أبو الوليد الطَّيَالِسي، حدثنا أبو عَوَانة، عن عاصم، فذكر الحديث بإسناده نحوَه، قال فيه: فانطلقنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وإذا عنده رجلٌ؛ قال زِرٌّ: إنهم يَلعَنُونه [1]! يعني عليًّا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.
আসিম থেকে বর্ণিত, তিনি (হাদীসটির প্রসঙ্গে) বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম, আর দেখলাম তাঁর নিকট একজন লোক আছেন। যির (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: তারা তাঁকে অভিশাপ দেয়! অর্থাৎ আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في المطبوع إلى: يعينونه. والمراد بقولهم: "إنهم يلعنونه" بنو أُمية وشيعتهم، كانوا يلعنون أمير المؤمنين علي بن أبي طالب رضي الله عنه على المنابر، حتى أزاح عنهم هذه السَّوءةَ أمير المؤمنين عمرُ بن عبد العزيز رحمه الله حين استُخلف وجعل مكان ذلك في الخطبة: {إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ} الآية [النحل: 90] فلم يزل مستعملًا إلى عصرنا هذا، ونِعمَ السُّنةُ سنَّ رحمه الله. انظر "تاريخ الإسلام" للذهبي 3/ 144 - 145، و"السلوك في طبقات العلماء والملوك" لبهاء الدين الجندي اليمني 1/ 112، و"مورد اللطافة فيمن ولي السلطنة والخلافة" لابن تغري بردي 1/ 91.
[2] إسناده حسن كسابقه. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك، وأبو عوانة: هو وضّاح بن عبد الله اليَشكُري.
2923 - أخبرنا أبو حفص عمر بن محمد بن صفوان الجُمَحي بمكة، حدثنا علي بن عبد العزيز بن يحيى، حدثنا سليمان بن داود الهاشمي، حدثنا عبد الرحمن [1] ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن خارِجةَ بن زيد، عن أبيه زيد بن ثابت قال: القراءةُ سُنَّة؛ قال سليمان: يعني: أن لا تخالفَ الناسَ برأيك في الاتِّباع [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিরাত (কুরআন পাঠ) হল সুন্নাত। সুলাইমান বলেন: এর অর্থ হলো, তুমি যেন অনুসরণের ক্ষেত্রে নিজের মত দিয়ে মানুষের বিরোধিতা না করো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، والتصويب من "شعب الإيمان" للبيهقي (2425) حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه، وعبد الرحمن بن أبي الزناد معروف برواية سليمان بن داود الهاشمي عنه، وأبو الزناد: اسمه عبد الله بن ذكوان، وليس له ولد اسمه عبد الله.
[2] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (2425) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (67)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (4855)، والبيهقي في "السنن" 2/ 385، والخطيب في "الجامع لأخلاق الراوي والسامع" (1596) عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، به. وقرن الطبراني بسعيدِ بن منصور سعيدَ بنَ أبي مريم وعيسى بنَ ميناء.قال البيهقي في "السنن": أراد - والله أعلم - أنَّ اتباع مَن قبلنا في الحروف وفي القراءات سُنَّة مُتَّبعة لا يجوز مخالفة المصحف الذي هو إمام، ولا مخالفة القراءات التي هي مشهورة، وإن كان غيرُ ذلك سائغًا في اللغة أو أظهرَ منها، وبالله التوفيق.وقال البغوي في "شرح السنة" 4/ 512: أجمعت الصحابة والتابعون فمَن بعدهم على هذا: أنَّ القراءة سُنَّة، فليس لأحدٍ أن يقرأ حرفًا إلّا بأثرٍ صحيح عن رسول الله صلى الله عليه وسلم موافقٍ لخطِّ المصحف أخَذَه لفظًا وتلقينًا.
2924 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو البَختَري عبد الله بن محمد بن شاكر، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن عبد الله قال: قرأْنا المفصَّلَ بمكة حِجَجًا ليس فيه: يا أيُّها الذين آمَنوا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মক্কায় বহু বছর ধরে মুফাস্সাল সূরাগুলো পাঠ করেছি, অথচ সেগুলোতে ‘ইয়া আইয়্যুহাল্লাযীনা আমানূ’ (হে ঈমানদারগণ!) সম্বোধনটি ছিল না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وعبد الرحمن بن يزيد: هو ابن قيس النَّخَعي.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 423 من طريق خلف - وتحرَّف في المطبوع إلى: خالد - بن سالم، عن يحيى بن آدم، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق وكيع عن إسرائيل عند المصنف برقم (4342). وانظر (4341).
2925 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن بن أحمد الأسَدي، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن دِيزِيل، حدثنا آدم بن أبي إيَاس، حدثنا شُعْبة، عن عاصم، عن زِرِّ، عن أُبيِّ بن كعب قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله أمَرني أن أقرأَ عليك القرآنَ"، فقرأ: {لَمْ يَكُنِ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ وَالْمُشْرِكِينَ} [البينة: 1]، ومِن نَعتِها: "لو أنَّ ابنَ آدمَ سأَل واديًا من مالٍ فأُعطِيَه سأل ثانيًا، وإن سأَل ثانيًا فأُعطِيَه سأل ثالثًا، ولا يَملأُ جوفَ ابنِ آدمَ إِلَّا الترابُ، ويتوبُ الله على من تاب، وإن ذاتَ الدِّينِ عند الله الحَنِيفيَّةُ غيرُ اليهوديةِ ولا النصرانيةِ، ومن يَعمَلْ خيرًا فلن يُكفَرَه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমি তোমার সামনে কুরআন তেলাওয়াত করি।" অতঃপর তিনি তেলাওয়াত করলেন: "{কিতাবধারী ও মুশরিকদের মধ্যে যারা কুফরি করেছে...} [সূরা আল-বায়্যিনাহ: ১]"। আর এর বর্ণনার মধ্যে ছিল: "যদি আদম-সন্তান সম্পদের একটি উপত্যকা চায় এবং তাকে তা দেওয়া হয়, তবে সে দ্বিতীয়টি চাইবে। আর যদি সে দ্বিতীয়টি চায় এবং তাকে তা দেওয়া হয়, তবে সে তৃতীয়টি চাইবে। আর মাটি ছাড়া আদম-সন্তানের উদর অন্য কিছু দ্বারা পূর্ণ হবে না। আর যে তওবা করে, আল্লাহ তার তওবা কবুল করেন। নিশ্চয় আল্লাহর নিকট দ্বীন হলো একনিষ্ঠ ধর্ম (হানিফিয়্যাহ), যা ইহুদি ধর্মও নয়, নাসারা (খ্রিস্টান) ধর্মও নয়। আর যে ব্যক্তি কোনো ভালো কাজ করে, তাকে কখনোই অস্বীকার করা হবে না (বা তার প্রতিদান নষ্ট করা হবে না)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عاصم: وهو ابن أبي النَّجود، وعبد الرحمن بن الحسن الأسدي القاضي - وإن كان فيه مقال - لم ينفرد به.وأخرجه أحمد 35/ (21202)، وابنه عبد الله في زياداته (21203) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه فيه.وروى البخاري بإثر حديث أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم (6439) قال: "لو أنَّ لابن آدم واديًا من ذهب … " إلخ، حديثَ أنس عن أُبي بن كعب (6440) قال: كنا نرى هذا من القرآن حتى نزلت {أَلْهَاكُمُ التَّكَاثُرُ}. وانظر شرح الحافظ ابن حجر عليه في "فتح الباري" 20/ 61 - 62.وسيأتي الحديث مختصرًا برقم (4006) من طريق أبي داود الطيالسي عن شعبة، وانظر (3048).
2926 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عفَّان بن مسلم وأبو الوليد الطَّيَالسي قالا: حدثنا أبو عَوَانة، عن الأسود بن قيس، عن نُبَيح العَنَزي، عن ابن عبَّاس قال: بينما أنا أقرأُ آيةً من كتاب الله عز وجل، وأنا أمشي في طريقٍ من طرق المدينة، فإذا أنا برجل يناديني من بعدي: أتبِعِ ابنَ عبَّاس، فإذا هو أميرُ المؤمنين عمر، فقلت: أُتبِعُك على أُبيِّ بن كعب، فقال: أهو أقرأَكَها كما سمعتُك تقرأُ؟ قلت: نعم، قال: فأرسَلَ معي رسولًا، قال: اذهَبْ معه إلى أُبيِّ بن كعب فانظُرْ أيَقرأُ أُبيٌّ كذلك، قال: فانطلقتُ أنا ورسولُه إلى أُبي بن كعب، فقلت: يا أُبيُّ، قرأتُ آيةً من كتاب الله فناداني مِن بعدي عمرُ بن الخطَّاب: أتبِعِ ابنَ عبَّاس، فقلت: أُتبِعُك على أُبيِّ بن كعب، فأرسَلَ معي رسولَه، أفأنت أقرأْتَنِيها كما قرأتُ؟ قال أُبيّ: نعم، قال: فرَجَعَ الرسولُ إليه، فانطلقتُ أنا إلى حاجَتي، قال: فراح عمرُ إلى أُبيّ فوَجَدَه قد فَرَغَ من غَسْل رأسه ووَلِيدتُه تَدَّرِي لحيتَه بمِدْراها، فقال أُبي: مرحبًا يا أمير المؤمنين، أزائرٌ جئتَ أم طالبُ حاجةٍ؟ فقال عمر: بل طالبُ حاجة، قال: فجلس ومعه مَولَيَانِ له، حتى فرغ من لحيته وادَّرَتْ جانبَه الأيمنَ من لِمَّتِه، ثم ولَّاها جانبَه الأيسرَ، حتى إذا فرغ أقبلَ إلى عمر بوجهه، فقال: ما حاجةُ أمير المؤمنين، قال عمر: يا أُبيُّ، عَلَامَ تُقنِّطُ الناسَ؟ قال أُبي: يا أمير المؤمنين، إني تلقَّيتُ القرآنَ ممَّن تلقَّاه [1] [من] جبريلَ وهو رَطْبٌ، فقال عمر: تَاللهِ ما أنت بمُنتَهٍ وما أنا بصابرٍ؛ ثلاثَ مرات، ثم قام فانطَلَق [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর কিতাবের একটি আয়াত পড়ছিলাম, আর আমি মদীনার রাস্তাগুলোর মধ্যে একটি রাস্তায় হাঁটছিলাম। হঠাৎ আমি পিছন থেকে একজন লোককে আমাকে ডাকতে শুনলাম: ইবনে আব্বাসের পিছু নাও (তাঁর কাছে যাও)। দেখলাম তিনি হলেন আমীরুল মুমিনীন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
আমি বললাম: আমি উবাই ইবনে কা'বের সূত্রে আপনার অনুসরণ করব। তিনি বললেন: তিনি কি তোমাকে এমনভাবে পড়িয়েছেন যেমন আমি তোমাকে পড়তে শুনলাম? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তখন তিনি আমার সাথে একজন দূত পাঠালেন এবং বললেন: তুমি তার সাথে উবাই ইবনে কা'বের কাছে যাও এবং দেখো উবাই কি অনুরূপ পড়ান?
তিনি বলেন: অতঃপর আমি এবং তাঁর দূত উবাই ইবনে কা'বের কাছে গেলাম। আমি বললাম: হে উবাই! আমি আল্লাহর কিতাবের একটি আয়াত পড়ছিলাম, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পিছন থেকে আমাকে ডাকলেন: ইবনে আব্বাসের পিছু নাও। আমি বললাম: আমি উবাই ইবনে কা'বের সূত্রে আপনার অনুসরণ করব। তিনি আমার সাথে তাঁর দূতকে পাঠিয়েছেন। আপনি কি আমাকে এমনভাবে পড়িয়েছেন যেমন আমি পড়লাম? উবাই বললেন: হ্যাঁ। তিনি বলেন: তখন দূতটি তাঁর (উমরের) কাছে ফিরে গেলেন এবং আমি আমার কাজে চলে গেলাম।
তিনি বলেন: এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উবাইয়ের কাছে গেলেন এবং দেখলেন তিনি মাথা ধোয়া শেষ করেছেন আর তাঁর দাসী চিরুনি দিয়ে তাঁর দাড়ি আঁচড়ে দিচ্ছে। তখন উবাই বললেন: স্বাগতম হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি কি সাক্ষাৎ করতে এসেছেন নাকি কোনো প্রয়োজন নিয়ে এসেছেন? উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরং প্রয়োজন নিয়ে এসেছি।
তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (উমর) বসলেন এবং তাঁর সাথে তাঁর দুইজন দাস ছিল। (উবাই) দাড়ি আঁচড়ানো শেষ করলেন এবং দাসীটি তাঁর কপালের চুল ডান দিক দিয়ে আঁচড়ে দিল, এরপর বাম দিক দিয়ে আঁচড়ে দিল। যখন তিনি শেষ করলেন, তখন তিনি উমরের দিকে মুখ ফিরালেন এবং বললেন: আমীরুল মুমিনীনের কী প্রয়োজন? উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে উবাই! কেন আপনি লোকেদেরকে নিরাশ (হতাশ) করছেন?
উবাই বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আমি তাঁর নিকট থেকে কুরআন গ্রহণ করেছি, যিনি তা জিবরীল (আঃ)-এর নিকট থেকে সতেজ অবস্থায় (সদ্য নাযিলকৃত হিসেবে) গ্রহণ করেছেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! তুমি থামবে না, আর আমিও ধৈর্য ধারণকারী নই (অর্থাৎ, আমি তোমার এই কাজ সহ্য করব না); একথা তিনি তিনবার বললেন। এরপর তিনি উঠে চলে গেলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "ممَّن تلقاه" تحرَّف في (ب) إلى: من تلقاء. ولفظ "من" الذي بين معقوفين زيادة يقتضيها النص ولم يرد في النسخ الخطية.
[2] إسناده صحيح. أبو عوانة: هو وضّاح اليَشكُري.وأخرجه مختصرًا جدًّا أحمد 35/ (21112) عن عفان وهشام بن عبد الملك - وهو أبو الوليد الطيالسي - بهذا الإسناد. واقتصر فيه على قول أُبي لعمر: إني تلقيت القرآن ممَّن تلقَّاه من جبريل وهو رطب.قوله: "أَتبِع ابنَ عبَّاس" أي: أَتبِع يا ابن عبَّاس، أي: أَسنِدْ قراءتك ممَّن أخذتها، وأَحِلْ على من سمعتها منه. قاله ابن الأثير في "النهاية".وقوله: "تدَّرِي لحيته بمِدراها" أي: تمشطه وتسرّحه، والمِدرَى: كالمُشْط لكنه أطول أسنانًا منه. وقوله: "تدَّري" أصله: تَدْتَري، تَفتعِل، فأُدغِمت التاء في الدال. قاله ابن الأثير.واللِّمَّة: الشَّعر الذي يجاوز شحمة الأذن، فإذا بلغ المنكبين فهو جُمَّة.
2927 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا العبَّاس بن الوليد [1] بن مَزيَد، حدثنا محمد بن شعيب بن شابُور، حدثنا عبد الله بن العلاء بن زَبْر، عن بُسْر ابن عُبيد الله، عن أبي إدريس، عن أُبيِّ بن كعب: أنه كان يقرأُ: (إذْ جَعَلَ الذين كفروا في قلوبِهمُ الحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الجاهليةِ، ولو حَمِيتُم كما حَمَوْا لَفَسَدَ المسجدُ الحرامُ، فأنزَلَ اللهُ سَكِينتَه على رسولِه) [2]، فبَلَغَ ذلك عمرَ فاشتَدَّ عليه، فبَعَثَ إليه وهو يَهنَأُ ناقةً له، فدخل عليه، فدَعَا ناسًا من أصحابه فيهم زيدُ بن ثابت، فقال: مَن يَقرَأُ منكم سورةَ الفتح؟ فقرأَ زيدٌ على قراءتنا اليومَ، فغَلَّظَ لهُ [3] عمرُ، فقال له أُبي: أأتكلَّمُ؟ فقال: تكلَّمْ، فقال: لقد عَلِمتَ أني كنتُ أَدخُلُ على النبي صلى الله عليه وسلم ويُقرِئُني وأنتم بالباب، فإن أحببتَ أن أُقرِئَ الناسَ على ما أقرأَني، أقرأتُ، وإلَّا لم أُقرِئْ حرفًا ما حَيِيتُ، قال: بل أقرِئِ الناس [4].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সূরা আল-ফাতহ, ৪৮:২৬) এই আয়াতটি এভাবে তিলাওয়াত করতেন: "(স্মরণ করো) যখন কাফিরেরা তাদের অন্তরে জিদ, অর্থাৎ জাহিলিয়্যাতের জিদ পোষণ করেছিল, আর তোমরাও যদি তাদের মতো জিদ করতে, তাহলে মাসজিদুল হারাম বরবাদ হয়ে যেত, অতঃপর আল্লাহ তাঁর রাসূলের উপর তাঁর প্রশান্তি নাযিল করলেন।" এটি যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছাল, তখন তিনি কঠোরভাবে প্রতিক্রিয়া জানালেন। তিনি উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন। তখন উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর একটি উটের পরিচর্যা করছিলেন। উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সঙ্গীদের মধ্য থেকে কিছু লোককে ডাকলেন, তাদের মধ্যে যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমাদের মধ্যে কে সূরা আল-ফাতহ তিলাওয়াত করবে? তখন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আজ আমরা যেভাবে পড়ি সেইভাবে তিলাওয়াত করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি কঠোর হলেন। তখন উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আমি কি কিছু বলব? তিনি বললেন: বলুন। উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি তো জানেন যে, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে প্রবেশ করতাম এবং তিনি আমাকে পাঠ করাতেন, অথচ তখন আপনারা দরজায় (বাইরে) থাকতেন। আপনি যদি চান যে তিনি আমাকে যেভাবে পাঠ করিয়েছেন, আমিও সেভাবে লোকদেরকে পাঠ করাই, তবে আমি তা করাব। অন্যথায়, আমি বেঁচে থাকা পর্যন্ত একটি অক্ষরও পাঠ করাব না। তিনি (উমার) বললেন: বরং আপনি লোকদেরকে (এভাবেই) পাঠ করান।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "بن الوليد" لم يرد في (ز) و (ص)، وأثبتناه من (ع) و (ب).
[2] انظر الآية (26) من سورة الفتح.
2927 [3] - أي: فغلَّظ لأُبي بن كعب في القول.
2927 [4] - رجاله لا بأس بهم على خلاف في إسناده، وأبو إدريس - وهو عائذ الله بن عبد الله الخولاني - قيل: إنَّ روايته عن أبي بن كعب مرسلة.وأخرجه النسائي (11441) من طريق شبابة بن سوّار، عن عبد الله بن العلاء بن زَبْر، بهذا الإسناد مختصرًا. وشبابة ومن فوقه ثقات.وأخرجه عمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 2/ 709 - 710، وابن أبي داود في "المصاحف" (516)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 337 - 338 من طريق الوليد بن مسلم، عن عبد الله بن العلاء بن زبر، عن عطية بن قيس، عن أبي إدريس الخولاني: أنَّ أبا الدرداء ركب إلى المدينة في نفر من أهل دمشق - وذكر القصة. ورجاله ثقات، ولا يضر هذا الخلاف على ابن زبر في شيخه، فعطية بن قيس وبُسْر بن عبيد الله كلاهما ثقة، وأبو إدريس من أثبات أصحاب أبي الدرداء وكان عالمَ الشام بعده، فإن لم يكن حضر هذه القصة فلا بدَّ أنه سمع خبرها من أبي الدرداء، والله تعالى أعلم.قوله: "يَهنَأ ناقة له" أي: يطليها بالقَطِران علاجًا لها من الجرب وغيره.
2928 - أخبرني إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العَدْل، حدثنا السَّرِي بن خُزَيمة، حدثنا محمد بن عبد الله الرَّقَاشي، حدثنا جعفر بن سليمان، حدثنا أبو عِمران الجَوْني، عن جُندُب قال: أتيتُ المدينة لأتعلَّمَ العلمَ، فلما دخلتُ مسجدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا الناسُ فيه حَلَقٌ يتحدَّثون، قال: فجعلتُ أَمضي حتى انتهيتُ إلى حَلْقَةٍ فيها رجل شاحبٌ عليه ثوبانِ كأنما قَدِمَ من سفر، فسمعتُه يقول: هَلَكَ أصحابُ العَقْدِ وربِّ الكعبة، ولا آسَى عليهم - يقولها ثلاثًا - هَلَكَ أصحابُ العَقْد وربِّ الكعبة، هَلَكَ أصحابُ العَقْد وربِّ الكعبة [1]، قال: فجلستُ إليه فتحدَّث ما قُضِيَ له، ثم قام، فسألتُ عنه، فقالوا: هذا سيِّدُ الناس أُبيُّ بن كعب.قال: فتبعتُه إلى منزله، فإذا هو رَثُّ المنزل، رَثُّ الكِسْوة، رثُّ الهيئة، يُشبِهُ أمرُه بعضُه بعضًا، فسلَّمتُ عليه، فردَّ عليَّ السلامَ، قال: ثم سألني: ممَّن أنت؟ قال: قلت: من أهل العراق قال: أكثرُ شيءٍ سؤالًا، وغَضِبَ، قال: فاستقبلتُ القِبلةَ، ثم جَثَوتُ على ركبتيَّ ورفعتُ يديَّ هكذا - ومدَّ ذراعيه - فقلت: اللهمَّ إنا نَشكُوهم إليك، إنا نُنفِقُ نَفَقاتِنا ونُنصِبُ أبدانَنا، ونَرحَلُ مَطَايانا ابتغاءَ العلم، فإذا لَقِيناهم تَجهَّموا لنا، وقالوا لنا، قال: فبَكَى أُبيٌّ وجعل يترضَّاني، ويقول: وَيحَك، إني لم أَذهب هناك، ثم قال أُبيّ: أعاهدُك لَئِن أَبقَيتَني إلى يوم الجمعة لأتكلَّمَنَّ بما سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم، لا أخافُ فيه لومةَ لائم، قال: ثم انصرفتُ عنه وجعلت أنتظرُ يومَ الجمعة، فلما كان يومُ الخميس خرجتُ لبعض حاجتي، فإذا الطريقُ مملوءةٌ من الناس لا آخُذُ فِي سِكَّة إلّا استقبَلَني الناسُ، قال: فقلت: ما شأنُ الناس؟ قالوا: إنا نَحسَبُك غريبًا، قال: قلت: أجل، قالوا: مات سيدُ الناس أبيُّ بن كعب، قال: فلَقِيتُ أبا موسى بالعراق فحدَّثتُه، فقال: هلَّا كان يبقى حتى تَبلُغَنا مَقَالتُه [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জ্ঞান অর্জনের জন্য মদিনায় এসেছিলাম। যখন আমি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মসজিদে প্রবেশ করলাম, তখন দেখলাম লোকেরা সেখানে গোল হয়ে বসে গল্প করছে।
তিনি বলেন, আমি চলতে লাগলাম যতক্ষণ না একটি বৈঠকের কাছে পৌঁছালাম। সেখানে একজন বিবর্ণ চেহারার লোক ছিলেন, যিনি দুটি কাপড় পরিধান করেছিলেন এবং দেখে মনে হচ্ছিল যেন সবেমাত্র সফর থেকে এসেছেন। আমি তাকে বলতে শুনলাম: কা'বার রবের কসম, চুক্তির অনুসারীরা ধ্বংস হয়ে গেছে, এবং আমি তাদের জন্য দুঃখিত নই। তিনি কথাটি তিনবার বললেন: কা'বার রবের কসম, চুক্তির অনুসারীরা ধ্বংস হয়ে গেছে! কা'বার রবের কসম, চুক্তির অনুসারীরা ধ্বংস হয়ে গেছে!
জুনদুব বলেন, আমি তার পাশে বসলাম। তিনি যতক্ষণ ইচ্ছা কথা বললেন, এরপর উঠে গেলেন। আমি তার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে লোকেরা বলল: ইনি হলেন মানুষের নেতা উবাই ইবনু কা'ব।
তিনি বলেন, আমি তার বাড়ি পর্যন্ত তাকে অনুসরণ করলাম। দেখলাম তার ঘর, পোশাক এবং সামগ্রিক বেশভূষা খুবই সাধারণ ও জীর্ণ। তার সবকিছুই ছিল সাদামাটা ও একইরকম। আমি তাকে সালাম দিলাম, তিনিও সালামের উত্তর দিলেন। এরপর তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কোত্থেকে এসেছ? আমি বললাম: আমি ইরাকের বাসিন্দা। তিনি বললেন: (ইরাকবাসীরা) সবচেয়ে বেশি প্রশ্নকারী, এবং তিনি রাগান্বিত হলেন।
জুনদুব বলেন, তখন আমি ক্বিবলামুখী হলাম, এরপর হাঁটু গেড়ে বসলাম এবং হাত দুটি এভাবে প্রসারিত করলাম—(বর্ণনাকারী তার দুই হাত প্রসারিত করে দেখালেন)—তারপর বললাম: হে আল্লাহ! আমরা তাদের (শিক্ষকদের) ব্যাপারে আপনার কাছে অভিযোগ করছি। আমরা জ্ঞান অর্জনের জন্য আমাদের খরচপত্র ব্যয় করি, আমাদের শরীরকে ক্লান্ত করি, এবং আমাদের সওয়ারীকে ভ্রমণ করাই, কিন্তু যখন আমরা তাদের সাথে দেখা করি, তখন তারা আমাদের প্রতি ভ্রুকুটি করে এবং কটুকথা বলে।
জুনদুব বলেন, তখন উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন এবং আমাকে শান্ত করতে লাগলেন। তিনি বললেন: তোমার দুর্ভাগ্য হোক! আমি তো ওভাবে (তাদের দলে) যাইনি। এরপর উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমার সাথে অঙ্গীকার করছি, যদি আমি জুমু'আর দিন পর্যন্ত বেঁচে থাকি, তবে আমি অবশ্যই আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে যা শুনেছি, তা নিয়ে কথা বলব। এক্ষেত্রে আমি কোনো নিন্দুকের নিন্দার ভয় করব না।
জুনদুব বলেন, এরপর আমি তার কাছ থেকে ফিরে এলাম এবং জুমু'আর দিনের অপেক্ষা করতে লাগলাম। যখন বৃহস্পতিবার এল, আমি কোনো এক প্রয়োজনে বের হলাম। দেখলাম রাস্তাঘাট লোকে লোকারণ্য। আমি যে গলি দিয়েই যাই না কেন, লোকেরা আমার সামনে এসে ভিড় করছে। আমি জিজ্ঞেস করলাম: মানুষের কী হয়েছে? তারা বলল: আমরা আপনাকে সম্ভবত আগন্তুক মনে করছি। আমি বললাম: হ্যাঁ। তারা বলল: মানুষের নেতা উবাই ইবনু কা'ব ইন্তিকাল করেছেন।
জুনদুব বলেন, এরপর আমি ইরাকে আবূ মূসার সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং তাকে ঘটনাটি শুনালাম। তখন তিনি বললেন: আহা! যদি তিনি বেঁচে থাকতেন, যাতে তার বক্তব্য আমাদের কাছে পৌঁছাতে পারত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] يريد بأصحاب العقد: الأُمراء، وذلك لأنَّ الناس يعقدون لهم البيعةَ بالإمارة والولاية. لأبيه (1162)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (3080)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 341 و 342 من طرق عن جعفر بن سليمان الضُّبَعي، به.وأخرج هذه القصة باختصارٍ ابنُ سعد 3/ 464، ومن طريقه ابن عساكر 7/ 340 عن روح بن عبادة وهُوذة بن خليفة، عن عوف بن أبي جميلة، عن الحسن البصري قال: أخبرنا عُتَيُّ بن ضَمْرة قال: قلت لأُبي بن كعب: ما لكم أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم نأتيكم من البُعْد … فذكر نحوها. فجعل القصة لعُتي بن ضمرة مع أُبي، وعُتيٌّ تابعي كبير، والسند إليه صحيح، أما جعفر بن سليمان فجعل القصة لجندب مع أُبي، وجندب الذي يروي عنه أبو عمران الجوني: هو جندب بن عبد الله البجلي، وهو من صغار الصحابة، والقلب إلى حديث الحسن البصري أميَل، فلعلَّ جعفرًا وهم في تسمية صاحب القصة مع أُبي، أو أن يكون كلاهما كان حاضرًا، والله تعالى أعلم.وانظر ما سلف برقم (873).
[2] إسناده جيد. أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب.وسيأتي الحديث مختصرًا برقم (5411) من طريق أبي قلابة عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرقاشي عن أبيه.وأخرجه بطوله ابن سعد في "الطبقات" 3/ 465، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "الزهد" لأبيه (1162)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (3080)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 341 و 342 من طرق عن جعفر بن سليمان الضُّبَعي، به.وأخرج هذه القصة باختصارٍ ابنُ سعد 3/ 464، ومن طريقه ابن عساكر 7/ 340 عن روح بن عبادة وهُوذة بن خليفة، عن عوف بن أبي جميلة، عن الحسن البصري قال: أخبرنا عُتَيُّ بن ضَمْرة قال: قلت لأُبي بن كعب: ما لكم أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم نأتيكم من البُعْد … فذكر نحوها. فجعل القصة لعُتي بن ضمرة مع أُبي، وعُتيٌّ تابعي كبير، والسند إليه صحيح، أما جعفر بن سليمان فجعل القصة لجندب مع أُبي، وجندب الذي يروي عنه أبو عمران الجوني: هو جندب بن عبد الله البجلي، وهو من صغار الصحابة، والقلب إلى حديث الحسن البصري أميَل، فلعلَّ جعفرًا وهم في تسمية صاحب القصة مع أُبي، أو أن يكون كلاهما كان حاضرًا، والله تعالى أعلم.وانظر ما سلف برقم (873).
2929 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن عَلقَمة قال: جاء رجلٌ إلى عمر وهو بعَرَفةَ، فقال: يا أمير المؤمنين، جئتُ من الكوفة وتركتُ بها مَن يُمْلي المصاحفَ عن ظَهْر قلبه، قال: فغضب عمرُ وانتفَخَ حتى كاد يملأُ ما بين شُعبَتَي الرَّحْل، ثم قال: وَيحَك، من هو؟ قال: عبدُ الله بن مسعود، فما زال يُطفأُ ويُسرَّى الغضبُ، حتى عاد إلى حالِه التي كان عليها، ثم قال: وَيحَك، والله ما أَعلمُه بقيَ أحد من المسلمين هو أحقُّ بذلك منه، سأحدِّثُك عن ذلك:كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يزالُ يَسمُرُ في الأمر من أمر المسلمين عند أبي بكر، وإنه سَمَرَ عنده ذاتَ ليلةٍ وأنا معه، ثم خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وخرجنا نمشي معه، فإذا رجلٌ قائمٌ يصلِّي في المسجد، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم يستمعُ قراءتَه، فلمَّا أعْيانا أن نعرفَ مَن الرجل، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن سَرَّه أن يقرأَ القرآن غضًّا كما أُنزِلَ، فليَقرَأْه على قراءَةِ ابنِ أمِّ عَبْدٍ"، ثم جلس الرجلُ يدعو، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول له: "سَلْ تُعطَهْ". قال: فقال عمر: فقلت: والله لأَغدُوَنَّ إليه فَلأُبشِّرَنَّه، قال: فغَدَوتُ إليه لأبشِّرَه، فوجدتُ أبا بكر قد سَبَقَني فبَشَّره، والله ما سابقتُه إلى خيرٍ قطُّ إلَّا سَبَقَني إليه [1].
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। এক ব্যক্তি আরাফাতে অবস্থানকালে তাঁর কাছে এসে বলল: হে আমীরুল মুমিনীন, আমি কুফা থেকে এসেছি এবং সেখানে এমন একজনকে রেখে এসেছি যিনি মুখস্থ কুরআন ইমলা (শ্রুতিলিপি) করান। (বর্ণনাকারী) বলেন: তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হলেন এবং এমনভাবে ফুলে উঠলেন যে, মনে হচ্ছিল তিনি উটের হাওদার দুই পাশের খালি জায়গা ভরে ফেলবেন। এরপর তিনি বললেন: তোমার জন্য আফসোস! সে কে? লোকটি বলল: তিনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ। এরপর ধীরে ধীরে তাঁর রাগ প্রশমিত হলো এবং তিনি স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে আসলেন। এরপর তিনি বললেন: তোমার জন্য আফসোস! আল্লাহর কসম! আমি জানি না মুসলমানদের মধ্যে এমন আর কেউ অবশিষ্ট আছে, যে এর (এই কাজের) জন্য তাঁর চেয়ে অধিক যোগ্য। আমি এ ব্যাপারে তোমাকে একটি ঘটনা বলছি: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের বিষয়াদি নিয়ে প্রায়শই আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে রাতে আলোচনা করতেন। একদিন রাতে আমিও তাঁর সাথে সেখানে উপস্থিত ছিলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে হেঁটে চললাম। হঠাৎ দেখলাম, একজন লোক মসজিদে দাঁড়িয়ে সালাত (নামাজ) আদায় করছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তাঁর কিরাত (কুরআন তিলাওয়াত) শুনতে লাগলেন। লোকটি কে তা যখন আমরা চিনতে পারলাম না, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি কুরআনকে তা যেভাবে নাযিল হয়েছে সেভাবে সতেজ ও তাজা অবস্থায় পড়তে পছন্দ করে, সে যেন ইবনু উম্মি আবদ-এর (আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদের) কিরাত অনুসারে পড়ে।” এরপর লোকটি বসে দু’আ করতে লাগল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাকে বলতে লাগলেন: “তুমি চাও, তোমাকে দেওয়া হবে।” উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মনে মনে বললাম, আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই সকালে তাঁর কাছে গিয়ে তাঁকে সুসংবাদ দেব। বর্ণনাকারী বলেন, আমি সকালে তাঁকে সুসংবাদ দেওয়ার জন্য গেলাম এবং দেখলাম আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার আগেই তাঁকে সুসংবাদ দিয়ে দিয়েছেন। আল্লাহর কসম! আমি কখনোই কোনো কল্যাণের কাজে তাঁর (আবূ বকর-এর) সাথে প্রতিযোগিতা করিনি, কিন্তু তিনি আমার চেয়ে এগিয়ে গেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات عن آخرهم غير أحمد بن عبد الجبار العُطاردي فإنه يَقصُر عن رتبة الثقة وهو حسن الحديث. وهذا الحديث لم يسمعه علقمة - وهو ابن قيس النخعي - من عمر، إنما رواه عن القَرثَع الضبِّي عن قيس بن مروان الجعفي - وهو قيس بن أبي قيس - عن عمر، كما قال البيهقي في "السنن الكبرى" 1/ 453، والقريع وقيس ثقتان لا بأس بهما، وقيس هو الرجل الذي جاء إلى عمر، كما وقع مبيَّنًا في رواية البيهقي.ورواية علقمة عن القرثع هذه أخرجها أحمد 1/ (265) عن عفان، عن عبد الواحد بن زياد، عن الحسن بن عبيد الله النخعي، عن إبراهيم - وهو ابن يزيد النخعي - عن علقمة، به. والإسناد إليه صحيح.وأما حديث أبي معاوية فقد أخرجه أحمد (175) عنه بمثل إسناد المصنف ولفظه. ثم قال: قال أبو معاوية: وحدثنا الأعمش، عن خيثمة - وهو ابن عبد الرحمن الجُعْفي - عن قيس بن مروان: أنه أتى عمر …وأخرج منه قصة السَّمر عند أبي بكر مختصرًا أحمد (178) و (228)، والترمذي (169) من طريق أبي معاوية، به. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرج منه قوله: "من أحب أن يقرأ القرآن غضًّا … " أحمد (36)، والنسائي (8199) من طرق عن الأعمش، به. وهو عند النسائي من طريق أبي معاوية عنه، ومن طريق سفيان الثوري عنه، ومن طريق سفيان سيأتي في الحديث التالي عند المصنف.وأخرجه أيضًا النسائي (8198) من طريق محمد بن فضيل، عن الأعمش، عن خيثمة، عن قيس بن مروان، عن عمر.وللحديث طريق آخر عن عمر سيأتي تخريجه عند حديث علي الآتي عند المصنف برقم (5471). مصعب بن المقدام عند المصنف برقم (5476)، وهو قطعة من الحديث السابق، وانظر تخريجه فيه.
2930 - أخبَرَناه أبو بكر بن أبي دارمٍ الحافظ بالكوفة، حدثنا محمد بن عبد الله الحضرمي، حدثنا القاسم بن بِشْر بن معروف، حدثنا مُصعَب بن المِقْدام الخَثعَمي، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن عَلقَمة، عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من أحبَّ أن يَقرأَ القرآنَ غَضًّا كما أُنزِلَ، فليَقرَأْ على قراءة ابن أمِّ عبدٍ" [1]. حديث عَلقَمة عن عمر صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وأتوهَّمُهما لم يَصِحَّ عندهما سماعُ علقمة بن قيس من عمر [2]، والله أعلم.وله شاهد مفسَّر من حديث عمَّار بن ياسر:
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোরআনকে অবিকল তেমনই সতেজ (নতুন) অবস্থায় পাঠ করতে পছন্দ করে, যেমনভাবে তা নাযিল হয়েছে, সে যেন ইবনু উম্মে আব্দের (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদের) কিরাত অনুযায়ী পাঠ করে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، ابن أبي دارم - وإن كان متكلَّمًا فيه - قد توبع، فسيأتي من غير طريقه عن مصعب بن المقدام عند المصنف برقم (5476)، وهو قطعة من الحديث السابق، وانظر تخريجه فيه.
[2] قد ثبت - كما تقدم - أنَّ علقمة بن قيس النخعي لم يسمع هذا الحديث من عمر، وقد نقل العلائي في "جامع التحصيل": أنَّ أحمد بن حنبل سُئل: هل سمع علقمة من عمر؟ فقال: ينكرون ذلك، قيل: من ينكره؟ قال: الكوفيون أصحابه.
2931 - أخبَرَناه أبو محمد عبد الله بن جعفر الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان الفارسي، حدثنا عبد العزيز بن عبد الله الأُوَيْسي، حدثنا محمد بن جعفر بن أبي كَثير، عن إسماعيل بن صَخْر الأَيْلي، عن أبي عُبيدة بن محمد بن عمَّار بن ياسر، عن أبيه، عن عمَّار بن ياسر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَرَّ بعبد الله بن مسعود وهو يقرأُ حرفًا حرفًا، فقال: "مَن سَرَّه أن يقرأَ القرآنَ كما أُنزِلَ، فليَقرَأْه على قراءة ابنِ مسعود" [1].
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তিনি এক অক্ষর এক অক্ষর ধরে ধরে তেলাওয়াত করছিলেন। তখন তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি পছন্দ করে যে সে কুরআনকে ঠিক যেভাবে অবতীর্ণ করা হয়েছে সেভাবে তেলাওয়াত করবে, সে যেন ইবনে মাসঊদের কিরাআত অনুসারে তা তেলাওয়াত করে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد حسن، وحسَّنه الإمام محمد بن إسماعيل البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (652).وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 360 عن عبد العزيز الأويسي، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" (652)، والبزار (1404)، والطبراني في "الأوسط" (3326)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (1486)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 102 - 103 و 103 من طرق عن عبد العزيز الأُويسي، به.
2932 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا الحسن بن المثنَّى بن معاذ بن معاذ، حدثنا أَبي، حدثنا أَبي [1]، حدثنا عبد الله بن عَوْن، حدثني عمر بن قيس، عن أبي مَيْسَرة عَمرو بن شُرَحْبيل قال: أَتى عليَّ رجل وأنا أصلِّي فقال: ثَكِلَتْك أمُّك، ألا أَراكَ تصلِّي وقد أُمِرَ بكتاب الله أن يُمزَّقَ كلَّ مُمَزَّق، قال: فتجوَّزتُ في صلاتي، وكنت [لا] أُحبَسُ [2]، فدخلتُ الدارَ ولم أُحبَسْ، ورَقِيتُ ولم أُحبَسْ، فإذا أنا بالأشعريِّ، وحذيفةُ وابنُ مسعود يَتقاوَلانِ، وحذيفةُ يقول لابن مسعود: ادفَعْ إليهم هذا المصحفَ، قال: واللهِ لا أدفَعُه، أقرأَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بِضعًا وسبعين سورةً، ثم أَدفَعُه إليهم، والله لا أدفَعُه إليهم [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আমর ইবনু শুরাহবিল (আবু মাইসারা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি যখন সালাত আদায় করছিলাম, তখন এক ব্যক্তি আমার কাছে এল এবং বলল: তোমার মা তোমাকে হারাক! আমি কি তোমাকে সালাত আদায় করতে দেখছি না, অথচ আল্লাহর কিতাবকে (কুরআনের নুসখাসমূহকে) টুকরো টুকরো করে ছিঁড়ে ফেলার আদেশ দেওয়া হয়েছে? তিনি বললেন: তখন আমি আমার সালাত সংক্ষেপে শেষ করলাম। আমি ঘরে প্রবেশ করলাম এবং আমাকে আটকানো হলো না। আমি উপরে আরোহণ করলাম এবং আমাকে আটকানো হলো না। তখন আমি দেখলাম আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজেদের মধ্যে তর্ক করছেন। আর হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলছেন: এই মুসহাফটি তাদের কাছে দিয়ে দিন। তিনি (ইবনু মাসউদ) বললেন: আল্লাহর কসম, আমি এটি তাদের কাছে দেব না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে সত্তর-এর কিছু বেশি সূরা শিক্ষা দিয়েছেন, এরপর আমি তা তাদের কাছে দিয়ে দেব! আল্লাহর কসম, আমি এটি তাদের কাছে দেব না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "حدثنا أبي" في المرة الثانية سقط من (ص) و (ع) و (ب)، والمراد به معاذ بن معاذ العنبري فهو الذي يروي عن عبد الله بن عون، وقد تحرَّف "عون" في (ب) إلى عوف. وعبد الله بن عون: هو ابن أَرطَبان المزني.
[2] تحرَّف لفظ "أحسن" في المواضع الثلاثة في المطبوع إلى: أجلس. ولفظ "لا" في هذا الموضع سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج. ومعنى "وكنت لا أُحبَس" أي: عن الدخول إلى دار الإمارة التي في الكوفة. وأخرجه أحمد 6/ (3697) و (3846) و (4218) عن وكيع، عن سفيان، بهذا الإسناد. وفيه: وزيد له ذؤابة في الكُتّاب.وأخرجه أحمد 7/ (3929) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، به - إلّا أنه لم يذكر زيدًا.وأخرجه بنحو رواية المصنف النسائيُّ (9278)، وابن حبان (7064) من طريق الأعمش، عن أبي إسحاق، عن هُبيرة بن يَرِيم، عن ابن مسعود.وللأعمش فيه إسناد آخر، فقد أخرجه أحمد 7/ (3906)، والبخاري (5000)، ومسلم (2462)، والنسائي (7943) و (9279) من طريقه عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن ابن مسعود. ولم يذكر فيه البخاري ومسلم والنسائي في الموضع الأول زيدًا.وأخرجه أحمد 6/ (3599) و 7/ (4330) من طريق زر بن حبيش، و 6/ (3845) من طريق رجل من هَمْدان من أصحاب ابن مسعود، كلاهما عن ابن مسعود ولم يذكرا فيه زيدًا. وانظر ما بعده.
2932 [3] - إسناده صحيح. عمر بن قيس: هو الماصر أبو الصبّاح الكوفي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (8438) عن المثنى بن معاذ بن معاذ، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام في "فضائل القرآن" ص 285 عن معاذ بن معاذ العنبري، به.وأخرجه الشاشي في "مسنده" (777) من طريق الأنصاري - وهو محمد بن عبد الله بن المثنى - عن عبد الله بن عون، به. وأخرجه أحمد 6/ (3697) و (3846) و (4218) عن وكيع، عن سفيان، بهذا الإسناد. وفيه: وزيد له ذؤابة في الكُتّاب.وأخرجه أحمد 7/ (3929) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، به - إلّا أنه لم يذكر زيدًا.وأخرجه بنحو رواية المصنف النسائيُّ (9278)، وابن حبان (7064) من طريق الأعمش، عن أبي إسحاق، عن هُبيرة بن يَرِيم، عن ابن مسعود.وللأعمش فيه إسناد آخر، فقد أخرجه أحمد 7/ (3906)، والبخاري (5000)، ومسلم (2462)، والنسائي (7943) و (9279) من طريقه عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن ابن مسعود. ولم يذكر فيه البخاري ومسلم والنسائي في الموضع الأول زيدًا.وأخرجه أحمد 6/ (3599) و 7/ (4330) من طريق زر بن حبيش، و 6/ (3845) من طريق رجل من هَمْدان من أصحاب ابن مسعود، كلاهما عن ابن مسعود ولم يذكرا فيه زيدًا. وانظر ما بعده.
2933 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا قَبِيصة بن عُقْبة، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن خُمَير [1] بن مالك، قال: قال عبد الله بن مسعود: لقد قرأتُ مِن فِي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم سبعين سورةً، وزيدُ بن ثابتٍ ذو ذُؤابتَينِ يلعبُ مع الصِّبيان [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.ولهذه الزيادة شاهدٌ عن عبد الله:
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখ থেকে সত্তরটি সূরা সরাসরি পড়েছি, আর যায়দ ইবনে সাবিত, যার দুটি বেণী ছিল, সে তখন শিশুদের সাথে খেলা করত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: حفص، وفي (ص) و (ع) إلى: حمزة، وكذلك هو في "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (12526)، وكل هذا تحريف، والصواب أنه خُمير بن مالك، كما في (ب)، وقيل: خَمْر، وهو مترجم في "التاريخ الكبير" للبخاري 3/ 227، و"الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 3/ 391، و"المؤتلف والمختلف" للدارقطني 2/ 671 - 672، و"المتفق والمفترق" للخطيب البغدادي 2/ 862 وغيرها، وبعضهم ذكر له هذا الحديث عن ابن مسعود. وأخرجه أحمد 6/ (3697) و (3846) و (4218) عن وكيع، عن سفيان، بهذا الإسناد. وفيه: وزيد له ذؤابة في الكُتّاب.وأخرجه أحمد 7/ (3929) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، به - إلّا أنه لم يذكر زيدًا.وأخرجه بنحو رواية المصنف النسائيُّ (9278)، وابن حبان (7064) من طريق الأعمش، عن أبي إسحاق، عن هُبيرة بن يَرِيم، عن ابن مسعود.وللأعمش فيه إسناد آخر، فقد أخرجه أحمد 7/ (3906)، والبخاري (5000)، ومسلم (2462)، والنسائي (7943) و (9279) من طريقه عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن ابن مسعود. ولم يذكر فيه البخاري ومسلم والنسائي في الموضع الأول زيدًا.وأخرجه أحمد 6/ (3599) و 7/ (4330) من طريق زر بن حبيش، و 6/ (3845) من طريق رجل من هَمْدان من أصحاب ابن مسعود، كلاهما عن ابن مسعود ولم يذكرا فيه زيدًا. وانظر ما بعده.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل خمير بن مالك فهو تابعي كبير وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد توبع. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبِيعي. وأخرجه أحمد 6/ (3697) و (3846) و (4218) عن وكيع، عن سفيان، بهذا الإسناد. وفيه: وزيد له ذؤابة في الكُتّاب.وأخرجه أحمد 7/ (3929) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، به - إلّا أنه لم يذكر زيدًا.وأخرجه بنحو رواية المصنف النسائيُّ (9278)، وابن حبان (7064) من طريق الأعمش، عن أبي إسحاق، عن هُبيرة بن يَرِيم، عن ابن مسعود.وللأعمش فيه إسناد آخر، فقد أخرجه أحمد 7/ (3906)، والبخاري (5000)، ومسلم (2462)، والنسائي (7943) و (9279) من طريقه عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن ابن مسعود. ولم يذكر فيه البخاري ومسلم والنسائي في الموضع الأول زيدًا.وأخرجه أحمد 6/ (3599) و 7/ (4330) من طريق زر بن حبيش، و 6/ (3845) من طريق رجل من هَمْدان من أصحاب ابن مسعود، كلاهما عن ابن مسعود ولم يذكرا فيه زيدًا. وانظر ما بعده.
2934 - أخبَرَناه أبو الحسين محمد بن أحمد الحَنظَلي ببغداد، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا يحيى بن حمَّاد، حدثنا أبو عَوَانة، حدثني إسماعيل بن سالم، عن أبي سَعْد [1] الأَسْدي قال: سمعت عبدَ الله بنَ مسعود يقول: أقرأَني رسول الله صلى الله عليه وسلم سبعين سورةً أحكَمْتُها قبل أن يُسلِمَ زيدُ بن ثابت [2].
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে সত্তরটি সূরা শিক্ষা দিয়েছিলেন, যা যায়দ ইবনে সাবেত ইসলাম গ্রহণের আগেই আমি সুনিশ্চিতভাবে আয়ত্ত করে নিয়েছিলাম।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ص) و (ع) و (ب): سعيد، بياء، وهو صحيح أيضًا، فقد قيل فيه كما في "تهذيب الكمال" للحافظ المِزِّي: أبو سعد وأبو سعيد، وهو الأزْدي، من أزد شَنُوءة، وتقال الزاي بالسين الساكنة أيضًا. "المصاحف" (61) - ومن طريقه ابن عساكر 33/ 137 - من طريقين عن يحيى بن حماد، به.
[2] صحيح بما قبله، وهذا إسناد حسن من أجل أبي سعد الأزدي، فقد روى عنه غير واحد وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، وأبو عوانة: هو وضّاح اليشكُري.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 137 من طريق البيهقي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (8439) - وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 125 - وابن أبي داود في "المصاحف" (61) - ومن طريقه ابن عساكر 33/ 137 - من طريقين عن يحيى بن حماد، به.
2935 - حدثنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك إملاءً في مسجده ببغداد، حدثنا إبراهيم بن هيثم البَلَدي، حدثنا محمد بن كَثير الصَّنعاني، حدثنا الأوزاعي.وحدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن إسماعيل بن مَهْران، حدثنا هشام بن عمَّار، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثني الأوزاعي، حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سَلَمة، حدثني عبد الله بن سَلَام قال: قَعَدْنا نَفَرٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فقلنا: لو نَعلَمُ أيُّ الأعمال أحبُّ إلى الله، عَمِلْنا، فأنزل الله تبارك وتعالى: {سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (1) يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ (2) كَبُرَ مَقْتًا عِنْدَ اللَّهِ أَنْ تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ (3) إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِهِ صَفًّا كَأَنَّهُمْ بُنْيَانٌ مَرْصُوصٌ} إلى آخر السورة، وقرأَها علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1].زاد محمد بن كثير في حديثه: وقال لنا الأوزاعيُّ: قرأَها علينا يحيى بن أبي كثير هكذا، قال محمد بن كثير: وقرأَها علينا الأوزاعيُّ إلى آخر السورة هكذا، قال إبراهيم: وقرأها علينا محمد بن كثير إلى آخر السورة هكذا، قال لنا أبو عمرو بن السَّمّاك: وقرأها علينا إبراهيم بن الهيثم إلى آخر السورة هكذا.قال الحاكم: وقرأَ علينا أبو عمرو بن السَّمّاك من أول السورة إلى آخرها هكذا، وقرأَها علينا الحاكم من أول السورة إلى آخرها هكذا.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবী বসেছিলাম। আমরা বললাম, যদি আমরা জানতে পারতাম আল্লাহর কাছে কোন আমল সবচেয়ে বেশি প্রিয়, তবে আমরা সেটাই করতাম। তখন আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: {নভোমণ্ডল ও ভূমণ্ডলে যা কিছু আছে, সবই আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করে। তিনি পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়। (১) হে মুমিনগণ, তোমরা যা করো না, তা কেন বলো? (২) তোমরা যা বলো, অথচ করো না, তা আল্লাহর কাছে খুবই অপছন্দনীয়। (৩) নিশ্চয় আল্লাহ তাদেরকে ভালোবাসেন, যারা তাঁর পথে সারিবদ্ধভাবে যুদ্ধ করে, যেন তারা সীসাঢালা প্রাচীর।} - সূরার শেষ পর্যন্ত। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এই সূরাটি তিলাওয়াত করলেন।
মুহাম্মাদ ইবনে কাছীর তাঁর হাদীসে যোগ করেছেন: আওযাঈ আমাদের বলেছিলেন, ইয়াহইয়া ইবনে আবী কাছীর এভাবে আমাদের নিকট তা তিলাওয়াত করেছেন। মুহাম্মাদ ইবনে কাছীর বলেছেন: আওযাঈ আমাদের নিকট সূরার শেষ পর্যন্ত এভাবে তিলাওয়াত করেছেন। ইবরাহীম বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনে কাছীর আমাদের নিকট সূরার শেষ পর্যন্ত এভাবে তিলাওয়াত করেছেন। আবূ আমর ইবনুস সাম্মাক আমাদের বলেছেন: ইবরাহীম ইবনুল হাইছাম আমাদের নিকট সূরার শেষ পর্যন্ত এভাবে তিলাওয়াত করেছেন। হাকেম (ইমাম হাকেম) বলেছেন: আবূ আমর ইবনুস সাম্মাক আমাদের নিকট সূরার প্রথম থেকে শেষ পর্যন্ত এভাবে তিলাওয়াত করেছেন, আর হাকেমও আমাদের নিকট সূরার প্রথম থেকে শেষ পর্যন্ত এভাবে তিলাওয়াত করেছেন। (ইমাম হাকেম বলেন) এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، والإسناد الأول له حسن في المتابعات من أجل محمد بن كثير الصنعاني، والثاني جيد من أجل هشام بن عمار، وقد سلفا عند المصنف برقم (2415) و (2416).
2936 - حدثنا أبو النَّضْر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي وِبْشر بن موسى الأَسَدي والحارث بن أبي أُسامة التميمي قالوا: حدثنا يحيى بن إسحاق السّالَحِيني، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثني يزيد بن أبي حَبِيب، أنَّ عبد الرحمن بن شُمَاسَة حدَّثه عن زيد بن ثابت قال: كنَّا حولَ رسول الله صلى الله عليه وسلم نُؤلِّفُ القرآنَ، إذ قال: "طُوبَى للشَّام"، فقيل له: ولِمَ؟ قال: "إنَّ ملائكةَ الرحمنِ باسطةٌ أجنِحتَها عليهم" [1].رواه جرير بن حازم عن يحيى بن أيوب:
যায়েদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আশেপাশে ছিলাম এবং কুরআন সংকলন করছিলাম, যখন তিনি বললেন: "শামের (সিরিয়া/লেভান্ট) জন্য রয়েছে তুবা (সৌভাগ্য/জান্নাতের বৃক্ষ)।" তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: "কেন?" তিনি বললেন: "নিশ্চয় দয়াময় আল্লাহর ফেরেশতারা তাদের উপর নিজেদের ডানা বিছিয়ে রেখেছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - وقد توبع، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه أحمد 35/ (21607) عن يحيى بن إسحاق، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد أيضًا (21606) من طريق عبد الله بن لَهِيعة، وابن حبان (7304) من طريق عمرو بن الحارث وآخر معه - وهو ابن لهيعة - كلاهما عن يزيد بن أبي حبيب، به. ولم يذكرا فيه تأليف القرآن. وانظر ما بعده.قوله: "نؤلِّف القرآن" أي: من الرِّقاع، كما في روايات أخرى، ومعنى "نؤلِّف": نَجمَع، والمراد: تأليف ما نزل من الآيات المتفرِّقة في سُوَرها وجمعها فيها بإشارة النبي صلى الله عليه وسلم، ثم كانت مثبتةً في الصدور، مكتوبة في الرِّقاع واللِّخاف والعُسُب، فجمعها (أي: زيدٌ) منها في صُحُف بإشارة أبي بكر وعمر، ثم نَسَخَ ما جمعه في الصُّحف في مصاحف بإشارة عثمان بن عفان على ما رَسَمَ المصطفى صلى الله عليه وسلم. قاله البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 146 - 147.
2937 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أَبي، سمعتُ يحيى بن أيوب يحدِّث عن يزيد بن أبي حَبيب، عن عبد الرحمن بن شُمَاسةَ، عن زيد بن ثابت قال: كنَّا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم نُؤلِّفُ القرآن من الرِّقَاع، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "طُوبَى للشَّام"، فقلنا: لأيِّ شيءٍ ذاك؟ فقال: "لأنَّ ملائكةَ الرحمن باسطةٌ أجنِحتَها عليهم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وفيه البيانُ الواضحُ: أنَّ جَمْعَ القرآن لم يكن مرةً واحدةً، فقد جُمِعَ بعضُه بحَضْرة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم جُمِعَ بحَضْرة أبي بكر الصِّدّيق، والجمعُ الثالث - وهو ترتيب السُّوَر - كان في خلافة أمير المؤمنين عثمان، رضي الله عنهم أجمعين.
যায়িদ ইবনু সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট থাকাকালীন চামড়ার টুকরোগুলো থেকে কুরআন বিন্যস্ত করছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "শামের জন্য সুসংবাদ (বা সৌভাগ্য)!" আমরা বললাম: এটা কিসের জন্য? তিনি বললেন: "কারণ দয়াময় আল্লাহর ফেরেশতাগণ তাদের উপর তাদের ডানা প্রসারিত করে রাখেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح كسابقه.وأخرجه الترمذي (3954)، وابن حبان (114) من طريقين عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن. ولم يذكر ابن حبان فيه فضل الشام.وسيأتي دون ذكر فضل الشام برقم (4263) من طريق إبراهيم بن أبي طالب عن وهب بن جرير.
2938 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا يحيى بن أيوب العَلَّاف، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر بن أبي كَثير، حدثنا شَرِيك بن عبد الله بن أبي نَمِرٍ، عن عطاء بن يَسَار، عن أبي ذرٍّ أنه قال: دخلتُ المسجدَ يومَ الجُمُعة، والنبيُّ صلى الله عليه وسلم يَخطُب، فجلستُ قريبًا من أُبيِّ بن كعب، فقرأَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم سورةَ براءةَ، فقلت لأُبي: متى نَزَلَت هذه السورةُ؟ قال: فتجهَّمَني ولم يُكلِّمْني؛ قال: وذكر الحديث [1].هكذا وجدتُه في كتابي، وطلبتُه في المسانيد فلم أجده بطوله، والحديث بإسنادٍ صحيح.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জুমুআর দিনে মসজিদে প্রবেশ করলাম, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবা দিচ্ছিলেন। তখন আমি উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছাকাছি বসলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন সূরাহ বারাআত (আত-তাওবাহ) তেলাওয়াত করলেন। আমি উবাইকে জিজ্ঞেস করলাম: এই সূরাটি কখন নাযিল হয়েছে? তিনি বললেন: তখন তিনি (উবাই) আমার দিকে ভর্ৎসনার দৃষ্টিতে তাকালেন এবং আমার সাথে কোনো কথা বললেন না। তিনি বললেন: এবং বাকি হাদীসটি উল্লেখ করলেন। [১] আমার কিতাবে আমি এভাবেই পেয়েছি। আমি অন্যান্য মুসনাদ গ্রন্থে সম্পূর্ণ হাদীসটি খুঁজলাম কিন্তু পেলাম না। তবে হাদীসটির সনদ সহীহ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح. وقد سلف عند المصنف برقم (1072)، وذكرنا في تخريجه هناك تتمة الحديث. وأخرجه أحمد أيضًا 5/ (3422)، والنسائي (7940) و (8201) من طريق الأعمش، عن أبي ظَبْيان، عن ابن عبَّاس. وهذا إسناد صحيح.وقصة عرض القرآن على جبريل دون ذكر زيد أو ابن مسعود أخرجها أحمد 3/ (2042) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عبَّاس. وانظر تتمة تخريجها فيه.ويشهد لها حديث أبي هريرة عند البخاري (4998).
2939 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن إبراهيم بن مُهاجِر، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس قال: أيَّ القراءتين تَرَونَ كان آخرَ القراءة؟ قالوا: قراءةُ زيد، قال: لا، إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يَعرِضُ القرآنَ كلَّ سَنةٍ على جبريل عليه السلام، فلما كانت السنةُ التي قُبِضَ فيها عَرَضَه عليه عَرْضَتين، فكانت قراءةُ ابنِ مسعود آخرَهنَّ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّيَاقة، وفائدة الحديث ذِكرُ عبد الله بن مسعود.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমরা কোন দুটি কিরাতকে (কুরআন পাঠের ধরনকে) শেষ কিরাত বলে মনে করো? তারা বললো: যায়িদ ইবনু সাবিতের কিরাত। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: না। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি বছর একবার জিবরাঈল (আঃ)-এর কাছে কুরআন পেশ করতেন (রিভিশন দিতেন)। কিন্তু যেই বছর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, সেই বছর তিনি দু'বার পেশ করেছিলেন (দু'বার রিভিশন দিয়েছিলেন)। সুতরাং আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদের কিরাত ছিল সেগুলোর মধ্যে সর্বশেষ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إبراهيم بن مهاجر، وقد توبع.وأخرجه أحمد 4/ (2494) عن محمد بن سابق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد أيضًا 5/ (3422)، والنسائي (7940) و (8201) من طريق الأعمش، عن أبي ظَبْيان، عن ابن عبَّاس. وهذا إسناد صحيح.وقصة عرض القرآن على جبريل دون ذكر زيد أو ابن مسعود أخرجها أحمد 3/ (2042) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عبَّاس. وانظر تتمة تخريجها فيه.ويشهد لها حديث أبي هريرة عند البخاري (4998).
2940 - أخبرنا جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي، حدثنا علي بن عبد العزيز البَغَوي بمكة، حدثنا حَجَّاج بن المِنهال، قال: حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة قال: عُرِضَ القرآنُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم عَرَضاتٍ.فيقولون: إنَّ قراءتنا هذه هي العَرْضةُ الأخيرة [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري بعضُه، وبعضُه على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. من كتاب قراءات النبي صلى الله عليه وسلم ممّا لم يُخرجاه وقد صَحَّ سندُه
সমুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কুরআনকে কয়েকবার পেশ করা হয়েছিল। তাই তারা বলেন, আমাদের এই কিরাত (পঠন) হলো শেষবারের পেশকৃত কিরাত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، وقد سلف الكلام على سماع الحسن - وهو البصري - من سمرة عند الحديث (150)، وحسَّن إسناده الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (1552) و"فتح الباري" 15/ 91. والقائل: "فيقولون: إنَّ قراءتنا … إلخ" هو حماد بن سلمة كما وقع مصرَّحًا به في رواية عبيد الله بن الحجاج بن المنهال عن أبيه عند الروياني في "مسنده" (826).وأخرجه البزار (4564)، والروياني (817) و (826) من طرق عن الحجاج بن منهال، بهذا الإسناد. وقالوا فيه: ثلاث عرضات.