আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
3241 - أخبرني إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّيّ، حدثنا محمد بن الفَرَج، حدثنا حَجَّاج بن محمد قال: قال ابن جُرَيج: أخبرني يَعلَى بن مُسلِم، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: {إِنْ كَانَ بِكُمْ أَذًى مِنْ مَطَرٍ أَوْ كُنْتُمْ مَرْضَى} [النساء: 102]، قال: نزلت في عبد الرحمن بن عَوْف كان جريحًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আল্লাহ্র বাণী:) {যদি তোমাদের বৃষ্টিজনিত কোনো কষ্ট হয় অথবা তোমরা অসুস্থ হও...} [সূরা আন-নিসা: ১০২], তিনি বলেন: এই আয়াতটি আবদুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে নাযিল হয়েছিল, যিনি আহত ছিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن الفرج -وهو أبو بكر الأزرق- وقد توبع. وأخرجه البخاري (4599)، والنسائي (11056) من طرق عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهول منه.
3242 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الأصبهاني الزاهد، حدثنا إسماعيل ابن إسحاق، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حمَّاد بن زيد [1]، عن الحَجّاج الصَّوّاف، عن أَيوب، عن أبي قِلَابة، عن أبي المُهلَّب قال: رحلتُ إلى عائشة في هذه الآية: {لَيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَا أَمَانِيِّ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ} [النساء: 123]، قالت: هو ما يُصيبُكم في الدنيا [2].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু আল-মুহাল্লাব বলেন, আমি এই আয়াত, "এটা তোমাদের আশা-আকাঙ্ক্ষা অনুসারেও হবে না, আর আহলে কিতাবদের আশা-আকাঙ্ক্ষা অনুসারেও হবে না। যে মন্দ কাজ করবে, সে তার প্রতিদান পাবে।" [সূরা নিসা: ১২৩] প্রসঙ্গে তাঁর নিকট গেলাম। তিনি (আয়িশা রাঃ) বললেন: এটা হলো তাই যা তোমাদেরকে দুনিয়াতে (বিপদ-আপদ হিসেবে) স্পর্শ করে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف "زيد" في (ز) و (ص) و (ب) إلى: أيوب، ومكانه في (ع) بياض، والتصويب من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (22997)، وهو كذلك على الصواب عند إسحاق بن راهويه في "مسنده".
[2] إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تميمة السَّختياني، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرْمي، وأبو المهلَّب: هو الجرمي، مشهور بكنيته واختُلف في اسمه.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3565) عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد.
3243 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو الجوَّاب، حدثنا عمّار بن رُزَيق، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وَمَا يُتْلَى عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ فِي يَتَامَى النِّسَاءِ} [النساء: 127]، في أول هذه السورة من المَواريث، كانوا لا يُورِّثون صبيًّا حتى يَحتلِمَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: {আর কিতাবে তোমাদের কাছে যা তেলাওয়াত করা হয়, নারীদের ইয়াতীমদের ব্যাপারে...} [সূরা নিসা: ১২৭]—যা এই সূরার শুরুতে মিরাছের (উত্তরাধিকারের) বিধান সংক্রান্ত—(তৎকালীন লোকেরা) কোনো ছোট ছেলেকে (সম্পত্তির) উত্তরাধিকারী করতো না, যতক্ষণ না সে বালেগ হতো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي أبو الجوّاب: هو الأحوص بن جوّاب.وأخرجه البيهقي 6/ 263 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب وحده: أنَّ ابنة محمد ابن مَسلمة كانت عند رافع بن خديج … فذكر نحوه.وأخرجه كذلك مالك في "الموطأ" 2/ 548 - 549 عن ابن شهاب الزهري، عن رافع بن خديج: أنه تزوج بنت محمد بن مسلمة الأنصاري … إلخ. لكن لم يذكر فيه نزول الآية.قوله: "قد خلا من سِنِّها" أي: مضى من عمرها سنين، يريد أنها كبرت.
3244 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر عن الزُّهري، عن سعيد بن المسيّب وسليمان بن يَسار، عن رافع بن خَدِيج: أنه كانت تحته امرأةٌ قد خَلَا من سِنِّها، فتزوَّج عليها شابةً، فآثر البِكَر عليها، فأبَتِ امرأتُه الأولى أن تَقِرَّ على ذلك، فطلَّقها تطليقةً حتى إذا بقي من أجَلِها يسيرٌ قال: إن شئتِ راجعتُكِ وصبرتِ على الأَثَرة، وإن شئتِ تركتُكِ حتى يَخلُوَ أجَلُكِ، قالت: بل راجِعْني أَصبِرْ على الأَثَرة، فراجعها، ثم آثَرَ عليها، فلم تَصبِرْ على الأَثَرة فطلَّقها الأخرى، وآثَرَ عليها الشابةَ. قال: فذلك الصلحُ الذي بَلَغَنا أنَّ الله أنزل فيه: {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا} [النساء: 128] [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
রাফে' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর অধীনে এমন একজন স্ত্রী ছিলেন যিনি বয়সে বৃদ্ধা হয়ে গিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি তাঁর উপর একজন যুবতীকে বিবাহ করলেন। ফলে তিনি কুমারী (যুবতী) স্ত্রীর প্রতি বেশি মনোযোগ দিতে লাগলেন। তাঁর প্রথম স্ত্রী তা মেনে নিতে অস্বীকৃতি জানালেন। ফলে তিনি তাকে এক তালাক দিলেন। যখন তাঁর ইদ্দতের সামান্য সময় বাকি ছিল, তিনি বললেন: "তুমি চাইলে আমি তোমাকে ফিরিয়ে নিতে পারি, কিন্তু (আমার) এই পক্ষপাতিত্ব সহ্য করে থাকতে হবে। আর যদি তুমি চাও, আমি তোমাকে ছেড়ে দেবো যাতে তোমার ইদ্দত শেষ হয়ে যায়।" স্ত্রী বললেন: "বরং আপনি আমাকে ফিরিয়ে নিন, আমি পক্ষপাতিত্ব সহ্য করবো।" অতঃপর তিনি তাকে ফিরিয়ে নিলেন (রাজ‘আত করলেন)। এরপরও তিনি তাঁর প্রতি পক্ষপাতিত্ব বজায় রাখলেন, কিন্তু সে (স্ত্রী) তা সহ্য করতে পারলেন না। ফলে তিনি তাকে অন্য (দ্বিতীয়) তালাক দিলেন এবং যুবতী স্ত্রীর প্রতি মনোযোগ দিতে থাকলেন। বর্ণনাকারী (যুহরী) বলেন: এটাই সেই সন্ধি (সুলেহ), যা আমাদের কাছে পৌঁছেছে যে আল্লাহ্ এই বিষয়েই নাযিল করেছেন: "যদি কোনো নারী তার স্বামীর পক্ষ থেকে দুর্ব্যবহার বা উপেক্ষা (বিমুখতা) আশঙ্কা করে, তবে তারা উভয়ে আপসে কোনো মীমাংসা বা সন্ধি করলে তাদের কোনো পাপ হবে না।" (সূরা নিসা: ১২৮)
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وهو في تفسير "تفسير عبد الرزاق" 1/ 175، وفي "مصنفه" (10653)، وهو في "المصنف" على صورة الإرسال: عن سعيد بن المسيب وسليمان بن يسار أنَّ رافع بن خديج كان تحته امرأة … لكن سعيد وسليمان معروفان بالرواية عن رافع وقد سمعا منه، ومهما يكن من أمر فإنَّ مراسيل سعيد بن المسيب من أصحِّ المراسيل والجمهور على الاحتجاج بها. ومن طريق عبد الرزاق كرواية "المصنَّف" أخرجه الطبري في "تفسيره" 5/ 309.وأخرجه بنحوه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1081 من طريق شعيب بن أبي حمزة، عن الزهري، عن سعيد وسليمان: أنَّ رافع بن خديج … إلخ.وأخرجه بنحوه أيضًا الشافعي في "الأم" 6/ 481، وسعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (701)، وابن أبي شيبة 4/ 202، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 75 و 296، و"معرفة السنن والآثار" (14501)، والواحدي في "أسباب النزول" (370)، و"التفسير الوسيط" 2/ 124 من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب وحده: أنَّ ابنة محمد ابن مَسلمة كانت عند رافع بن خديج … فذكر نحوه.وأخرجه كذلك مالك في "الموطأ" 2/ 548 - 549 عن ابن شهاب الزهري، عن رافع بن خديج: أنه تزوج بنت محمد بن مسلمة الأنصاري … إلخ. لكن لم يذكر فيه نزول الآية.قوله: "قد خلا من سِنِّها" أي: مضى من عمرها سنين، يريد أنها كبرت.
3245 - أخبرني أبو بكر الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن ذرٍّ، عن يُسَيع [1] الكِنْدي قال: كنت عند علي بن أبي طالب فقال رجل: يا أمير المؤمنين، أرأيتَ قول الله تعالى: {فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَنْ يَجْعَلَ اللَّهُ لِلْكَافِرِينَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ سَبِيلًا} [النساء: 141]، وهم يقاتلونهم فيَظهَرون ويَقتُلون، فقال علي: ادنُهْ، ادنُهْ، ثم قال: {فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَنْ يَجْعَلَ اللَّهُ} يومَ القيامة [2] {لِلْكَافِرِينَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ سَبِيلًا} [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইউসাই' আল-কিন্দী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! আল্লাহ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার কী অভিমত: "আল্লাহ ক্বিয়ামতের দিন তোমাদের মাঝে ফায়সালা করবেন। আর আল্লাহ মু'মিনদের উপর কাফিরদের জন্য কোনো পথ রাখবেন না।" (সূরা নিসা: ১৪১)। অথচ তারা (কাফিররা) মু'মিনদের সাথে যুদ্ধ করে, বিজয়ী হয় এবং তাদের হত্যা করে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কাছে আসো, কাছে আসো। এরপর তিনি বললেন: "আল্লাহ ক্বিয়ামতের দিন তোমাদের মাঝে ফায়সালা করবেন। আর আল্লাহ ক্বিয়ামতের দিন মু'মিনদের উপর কাফিরদের জন্য কোনো পথ রাখবেন না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ص) و (ع): أسيع، وكلاهما صواب قد قيل في اسمه.
[2] هذا القول تفسير من علي رضي الله عنه أوضح فيه للسائل أنَّ هذا النفي إنما هو حاصل في يوم القيامة وليس في الدنيا.
3245 [3] - إسناده حسن أبو حذيفة هو موسى بن مسعود النهدي، وهذا الخبر في "تفسير سفيان الثوري" بروايته برقم (228). ذر: هو ابن عبد الله الهمداني.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (81) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 2/ (793) من طريق إسحاق بن الحسن، عن أبي حذيفة، به.وأخرجه من طريق سفيان الثوري أيضًا عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 175، وكذا الطبري 5/ 333.وأخرجه بنحوه الطبري في "تفسيره" 5/ 333، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1095، والواحدي في "الوسيط" 2/ 130 - 131 من طرق عن الأعمش، به. ولم يسمِّ الطبري في أحد طرقه يسيعًا بل أبهمه.
3246 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا علي بن الحسن بن أبي عيسى، حدثنا عبد الله بن الوليد، حدثنا سفيان، عن أبي حَصِين، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: {وَإِنْ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ إِلَّا لَيُؤْمِنَنَّ بِهِ قَبْلَ مَوْتِهِ} [النساء:159]، قال: خروجُ عيسى ابنِ مريمَ صلوات الله عليه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী: "{আর আহলে কিতাবদের মধ্যে এমন কেউই থাকবে না যে, তার (ঈসা আলাইহিস সালামের) মৃত্যুর পূর্বে তার প্রতি ঈমান আনবে না}" [সূরা আন-নিসা: ১৫৯] সম্পর্কে তিনি বলেন: (এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো) ঈসা ইবনু মারইয়াম (আলাইহিস সালাম)-এর আবির্ভাব (পুনরায় পৃথিবীতে আগমন)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. سفيان: هو الثوري، وأبو حصين: هو عثمان بن عاصم الأسدي.وهو عند أبي حذيفة النهدي في "تفسير سفيان الثوري" عنه (229).وقال فيه مكان قوله: "خروج عيسى": قبل موت عيسى، ومن طريق أبي حذيفة أخرجه الضياء المقدسي في "المختارة" 10/ (250).وأخرجه كذلك الطبري في "تفسيره" 6/ 18، وكذا ابن أبي حاتم 4/ 1114 من طريق عبد الرحمن ابن مهدي ووكيع، عن سفيان، به.
3247 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أحمد ابن مِهران بن خالد الأصبهاني، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي بُرْدة، عن أبي موسى قال: أمَرَنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن ننطلقَ إلى أرض النَّجَاشي، فبلغ ذلك قريشًا، فبَعَثوا إلى عمرو بن العاص وعُمارة بن الوليد وجمعوا للنَّجاشي هدايا، فقَدِمْنا، وقَدِما على النَّجاشي، فأَتَوه بهديَّته فقَبِلَها وسجدوا له، ثم قال له عمرو بن العاص: إنَّ قومًا منا رَغِبُوا عن ديننا وهم في أرضك، فقال لهم النجاشي: في أرضي؟! قالا: نعم، قال: فبعث إلينا، فقال لنا جعفر: لا يتكلَّم منكم أحد، أنا خطيبُكم اليومَ.فانتهينا إلى النجاشي وهو جالسٌ في مَجلسِه، وعمرُو بن العاص عن يمينه نه وعمارةُ عن يساره والقِسِّيسون من الرُّهبان جلوسٌ سِماطَين، فقال له عمرو وعمارة: إنهم لا يَسجُدون لك، فلما انتهَينا إليه زَبَرَنا من عندَه من القِسِّيسين والرُّهبان: اسجُدوا للملك، فقال جعفر: لا نسجدُ إلَّا لله، فقال له النجاشي: وما ذاك؟ قال: إنَّ الله بَعَثَ فينا رسولَه، وهو الرسول الذي بَشَّرَ به عيسي {بِرَسُولٍ يَأْتِي مِنْ بَعْدِي اسْمُهُ أَحْمَدُ}، فأمَرَنا أن نَعْبُدَ الله ولا نُشرِكَ به شيئًا، ونُقِيمَ الصلاة ونُؤتيَ الزكاة، وأمرنا بالمعروف ونهانا عن المنكَر، قال: فأَعجَبَ الناسَ قولُه، فلما رأى ذلك عمرٌو، قال له: أصلَحَ اللهُ الملكَ، إنهم يخالفونك في عيسى ابن مريم، فقال النجاشي لجعفر: ما يقول صاحبُك في ابن مريم؟ قال: يقول فيه قولَ الله: هو رُوحُ الله، وكلمتُه، أخرجه من البَتُول العذراء لم يَقرَبْها بشرٌ، قال: فتناول النجاشيُّ عودًا من الأرض فرفعه فقال: يا معشرَ القِسِّيسينَ والرُّهبان، ما يزيدُ هؤلاء على ما تقولون في ابن مريم ما يَزِنُ هذه، مرحبًا بكم، وبمن جئتم من عندِه، فأنا أشهدُ أنه رسول الله، وأنه الذي بَشَّر به عيسى ابنُ مريم، ولولا ما أنا فيه من المُلْك لأتيتُه حتى أَحمِلَ نَعلَيهِ، امكُثوا في أرضى ما شئتم، وأَمر لهم بطعام وكِسْوة، وقال: رُدُّوا على هذَينِ هديَّتَهم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وإنما أخرجته في هذا الموضع اقتداءً بشيخنا أبي يحيى الخفَّاف [2]، فإنه خرَّجه في قوله عز وجل: {لَنْ يَسْتَنْكِفَ الْمَسِيحُ أَنْ يَكُونَ عَبْدًا لِلَّهِ} [النساء: 172].
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নাজ্জাশীর ভূমির (হাবশার) দিকে রওয়ানা হওয়ার নির্দেশ দিলেন। এই খবর কুরাইশদের কাছে পৌঁছাল। তারা আমর ইবনুল আস ও উমারা ইবনুল ওয়ালিদকে (নাজ্জাশীর কাছে) পাঠাল এবং নাজ্জাশীর জন্য উপহার সামগ্রী সংগ্রহ করল। আমরা সেখানে পৌঁছলাম, আর তারাও নাজ্জাশীর কাছে পৌঁছাল। তারা তাদের উপহার নিয়ে এল, নাজ্জাশী তা গ্রহণ করলেন এবং তারা তাঁকে সিজদা করল। এরপর আমর ইবনুল আস তাকে বলল: "আমাদের মধ্য থেকে একদল লোক আমাদের ধর্ম ত্যাগ করেছে এবং তারা আপনার রাজ্যে আছে।" নাজ্জাশী তাদের জিজ্ঞাসা করলেন: "আমার রাজ্যে?" তারা বলল: "হ্যাঁ।"
তিনি (নাজ্জাশী) আমাদের কাছে লোক পাঠালেন। তখন জাফর (ইবনু আবী তালিব) আমাদেরকে বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কথা বলবে না। আজ আমিই তোমাদের মুখপাত্র।"
আমরা নাজ্জাশীর কাছে পৌঁছলাম, যখন তিনি তার আসনে উপবিষ্ট ছিলেন। আমর ইবনুল আস তার ডান দিকে এবং উমারা তার বাম দিকে ছিল। পুরোহিত ও পাদ্রীরা দু'পাশে সারিবদ্ধভাবে বসেছিল। আমর ও উমারা নাজ্জাশীকে বলল: "তারা আপনাকে সিজদা করে না।" যখন আমরা তার কাছে পৌঁছলাম, তখন তার পার্শ্ববর্তী পুরোহিত ও পাদ্রীরা আমাদেরকে ধমক দিয়ে বলল: "বাদশাহকে সিজদা করো!"
জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমরা আল্লাহ ছাড়া অন্য কাউকে সিজদা করি না।" নাজ্জাশী তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: "এর কারণ কী?" তিনি বললেন: "আল্লাহ আমাদের মাঝে তাঁর রাসূল প্রেরণ করেছেন। তিনি সেই রাসূল, যার সুসংবাদ ঈসা (আঃ) দিয়েছিলেন – 'আমার পরে একজন রাসূল আসবেন, যার নাম হবে আহমাদ।' তিনি আমাদেরকে আদেশ করেছেন যেন আমরা আল্লাহর ইবাদত করি এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরিক না করি, সালাত কায়েম করি, যাকাত প্রদান করি। তিনি আমাদেরকে ভালো কাজের আদেশ দিয়েছেন এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেছেন।"
বর্ণনাকারী বলেন: তাঁর এই কথাগুলো লোকেদেরকে মুগ্ধ করল। আমর যখন এটা দেখলেন, তখন নাজ্জাশীকে বললেন: "বাদশাহকে আল্লাহ রক্ষা করুন! তারা মারইয়াম পুত্র ঈসা (আঃ) সম্পর্কে আপনার সাথে ভিন্নমত পোষণ করে।"
তখন নাজ্জাশী জাফরকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমার সাথী মারইয়ামের পুত্র সম্পর্কে কী বলেন?" তিনি বললেন: "তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সম্পর্কে আল্লাহর বক্তব্যই বলেন: তিনি আল্লাহর রূহ এবং তাঁর বাণী। তিনি তাঁকে কুমারী সতী মারইয়াম থেকে বের করেছেন, যাকে কোনো পুরুষ স্পর্শ করেনি।"
বর্ণনাকারী বলেন: তখন নাজ্জাশী মাটি থেকে একটি কাঠি হাতে নিলেন এবং তা তুলে ধরে বললেন: "হে পুরোহিত ও পাদ্রীদের দল! মারইয়াম পুত্র সম্পর্কে তোমরা যা বলো, তার উপর এরা (মুসলমানেরা) এর (কাঠির) ওজনের চেয়েও বেশি কিছু বলেনি। তোমাদেরকে স্বাগত জানাই, এবং যাঁর কাছ থেকে তোমরা এসেছ, তাঁকেও স্বাগত জানাই। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি আল্লাহর রাসূল, এবং তিনি সেই ব্যক্তি যাঁর সুসংবাদ মারইয়াম পুত্র ঈসা দিয়েছিলেন। আমি যে রাজত্বে আছি, তা যদি না থাকত, তাহলে আমি তাঁর কাছে যেতাম, এমনকি তাঁর জুতা বহন করতাম। তোমরা আমার দেশে যত দিন ইচ্ছা বসবাস করো।" তিনি তাদের জন্য খাবার ও পোশাকের ব্যবস্থা করার নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: "এই দুজনের (আমর ও উমারা) উপহার তাদের কাছে ফিরিয়ে দাও।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح على وهمٍ في أوله، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن مهران الأصبهاني، وقد توبع، وباقي رجاله ثقات، وظاهر هذا الخبر يدلُّ على أنَّ أبا موسى كان بمكة وأنه خرج مع جعفر إلى أرض الحبشة، قال البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 299: والصحيح عن بريد بن عبد الله بن أبي بردة عن جده أبي بردة عن أبي موسى (وهو مخرَّج عند البخاري: 3136، ومسلم: 2502): أنه بلغهم مَخرَجُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهم باليمن فخرجوا مهاجرين في بضع وخمسين رجلًا في سفينة فألقتهم سفينتهم إلى النجاشي بالحبشة، فوافقوا جعفرَ بنَ أبي طالب وأصحابَه عنده، فأمرهم جعفر بالإقامة، فأقاموا حتى قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم زمن خيبر؛ فأبو موسى شهد ما جرى بين جعفر وبين النجاشي فأخبر عنه، ولعلَّ الراوي وَهِمَ في قوله: أمَرَنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن ننطلق، والله أعلم.وأخرجه أبو داود (3205) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. واختصره ولم يسق لفظه بتمامه.
[2] هو زكريا بن داود بن بكر النيسابوري أبو يحيى الخفاف، صاحب "التفسير الكبير"، توفي سنة 287 هـ. انظر "تاريخ الإسلام" للذهبي 6/ 751.
3248 - أخبرني الشيخ الفقيه أبو الوليد، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا إسحاق بن إبراهيم وفيَّاض بن زهير قالا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهري، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن قال: جاء ابنَ عبَّاس رجلٌ فقال: رجل تُوفِّي وترك ابنتَه وأختَه لأبيه وأمه، فقال: للابنة النصفُ وليس للأخت شيءٌ، ما بقي فهو لعَصَبَته، فقال له رجل: فإنَّ عمر بن الخطَّاب قد قَضَى بغير ذلك: جعل للابنة النصفَ وللأخت النصفَ، فقال ابن عبَّاس: أنتم أعلمُ أم الله؟قال مَعمَر: فلم أدْرِ ما وجهُ ذلك حتى لَقِيتُ ابنَ طاووس، فذكرتُ له حديث الزهري، فقال: أخبرني أَبي: أنه سمع ابنَ عبَّاس يقول: قال الله: {إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ} [النساء: 176]، قال ابن عبَّاس: فقلتم أنتم: لها النصفُ وإن كان له ولدٌ! [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. 5 - سورة المائدةبسم الله الرحمن الرحيم
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল: এক ব্যক্তি মারা গেছে এবং সে তার কন্যা ও আপন বোন (পিতা-মাতা উভয়ের দিকের বোন) রেখে গেছে। তিনি বললেন: কন্যার জন্য অর্ধেক এবং বোনের জন্য কিছুই নেই। যা অবশিষ্ট থাকবে, তা আসাবার (পুরুষ ওয়ারিশ)-এর জন্য। তখন তাকে অন্য এক ব্যক্তি বলল: কিন্তু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো এর ব্যতিক্রম ফায়সালা দিয়েছিলেন; তিনি কন্যার জন্য অর্ধেক এবং বোনের জন্য অর্ধেক নির্ধারণ করেছিলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কি বেশি জানো, নাকি আল্লাহ? মা‘মার (রাহঃ) বলেন: আমি এর মর্মার্থ বুঝতে পারিনি, যতক্ষণ না আমি ইবনু তাউসের সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম এবং তাকে যুহরীর (রাহঃ) এই হাদীসটি বললাম। তিনি বললেন: আমার পিতা আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন: আল্লাহ্ বলেছেন: “যদি কোনো ব্যক্তি মারা যায় এবং তার কোনো সন্তান না থাকে আর তার একজন বোন থাকে, তবে তার জন্য হলো সে যা রেখে গেছে তার অর্ধেক।” (সূরা আন-নিসা: ১৭৬) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা (তোমাদের ফায়সালায়) বলছো যে, তার সন্তান থাকলেও বোনের জন্য অর্ধেক!
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه.وأخرجه البيهقي 6/ 233 عن أبي عبد الله محمد بن عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال البيهقي: والمراد بالولد هاهنا الابن.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (19023)، ومن طريقه ابن المنذر في "الأوسط" (6849).وسيأتي برقم (8178) من طريق محمد بن نصر عن إسحاق بن إبراهيم.
3249 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نصر الخَوْلاني، قال: قُرئَ على عبد الله بن وهب: أخبرك معاويةُ بن صالح، عن أبي الزاهريَّة، عن جُبير بن نُفير قال: حَجَجتُ فدخلتُ على عائشة، فقالت لي: يا جبيرُ، تقرأُ المائدة؟ فقلت: نعم، فقالت: أمَا إنها آخرُ سورة نزلت، فما وجدتُم فيها من حلالٍ، فاستَحِلُّوه، وما وجدتُم فيها من حرامٍ، فحرِّموه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুবাইর ইবনু নুফাইর বলেন, আমি হজ্জ করলাম এবং তাঁর (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি আমাকে বললেন: হে জুবাইর! তুমি কি সূরাহ আল-মা'ইদাহ পাঠ করো? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: শোনো! এটিই শেষ সূরা যা নাযিল হয়েছে। অতএব, তোমরা তাতে যা কিছু হালাল পাবে, সেগুলোকে হালাল গণ্য করো এবং তাতে যা কিছু হারাম পাবে, সেগুলোকে হারাম গণ্য করো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو الزاهرية: هو حُدَير بن كُريب.وأخرجه أحمد 42/ (25547)، والنسائي (11073) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية بن صالح، بهذا الإسناد.
3250 - حدثنا أبو العبَّاس، حدثنا بَحْر بن نصر قال: قُرئَ على ابن وهب: أخبرك حُيَيُّ بن عبد الله المَعافِري قال: سمعت أبا عبد الرحمن الحُبُلي يحدِّث عن عبد الله بن عَمْرو: أنَّ آخر سورةٍ نزلت سورةُ المائدة [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই সর্বশেষ যে সূরাটি নাযিল হয়েছিল, তা হলো সূরা আল-মায়িদাহ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل حيي بن عبد الله. أبو عبد الرحمن الحبلي: هو عبد الله بن يزيد المعافري.وأخرجه الترمذي (3063) عن قتيبة بن سعيد، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد -وزاد فيه سورة الفتح. وقال: حديث حسن غريب.
3251 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن شاذانَ الجَوهَري، حدثنا مُعلَّى بن منصور، حدثنا ابن أبي زائدة، عن محمد بن إسحاق، عن أبان بن صالح، عن القعقاع بن حَكيم، عن سَلْمى أخت أبي رافع [1]، عن أبي رافع قال: أمَرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بقتل الكلاب، فقال الناس: يا رسول الله، ما أُحِلَّ لنا من هذه الأُمَّة التي أمرتَ بقتلها؟ فأنزل الله: {يَسْأَلُونَكَ مَاذَا أُحِلَّ لَهُمْ قُلْ أُحِلَّ لَكُمُ الطَّيِّبَاتُ وَمَا عَلَّمْتُمْ مِنَ الْجَوَارِحِ مُكَلِّبِينَ} [المائدة: 4] [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে কুকুর হত্যা করার আদেশ দিলেন। তখন লোকেরা জিজ্ঞেস করল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যে প্রাণীগোষ্ঠীকে হত্যার নির্দেশ দিয়েছেন, তার মধ্যে আমাদের জন্য কোনটি হালাল করা হয়েছে? তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা আপনার কাছে জিজ্ঞেস করে যে, তাদের জন্য কী হালাল করা হয়েছে? আপনি বলুন, তোমাদের জন্য হালাল করা হয়েছে সব উত্তম বস্তু এবং শিকারী জন্তু— যাদেরকে তোমরা প্রশিক্ষণ দিয়েছ শিকারের জন্য..." [সূরা মায়েদাহ: ৪]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) لفظ "أخت" إلى: أخي، ومكانه في (ص) و (ع) بياض، ووقع في "السنن" للبيهقي 9/ 235 - وقد رواه عن المصنف-: أم أبي رافع، وهو خطأ، وفي أكثر المصادر التي خرَّجت الحديث: أم رافع، وقد جمع بينهما الحافظ ابن حجر في أثناء تخريجه للحديث في "إتحاف المهرة" (17710) فقال: عن سلمى أم رافع وهي أخت أبي رافع؛ وكأنه بهذا ذهب إلى أنَّ سلمى هذه غير سلمى زوج أبي رافع التي ترجم لها في "الإصابة في تمييز الصحابة" 7/ 709، وقد وقع في حديث رواه عبد الرحمن بن أبي رافع في "السنن" و"مسند أحمد" 39/ (23862) قال: عن عمَّته سلمى عن أبي رافع، وذكر حديثًا آخر. وعلى كلا الأمرين فإنَّ سلمى هذه لها صحبة، والله تعالى أعلم.
[2] إسناده حسن، ومحمد بن إسحاق قد توبع.وأخرجه البيهقي 9/ 235 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الروياني في "مسنده" (690) و (698)، والطبري في "تفسيره" 6/ 88 - 89، والطحاوي في "معاني الآثار" 4/ 57، والطبراني في "الكبير" (971) و (972)، والواحدي في "أسباب النزول" (383) من طرق عن موسى بن عبيدة الربذي، عن أبان بن صالح، به. وموسى بن عبيدة -وإن كان ضعيفًا- يُعتبر به.وأصل هذا الحديث في قتل الكلاب قد روي من غير وجه عن أبي رافع كما هو مبيَّن في "مسند أحمد" 39/ (23865) و 45/ (27188).
3252 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامري، حدثنا يحيى بن فَصِيل [1]، حدثنا الحسن بن صالح، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس قال: إنما أُحِلَّت ذبائحُ اليهود والنصارى من أجل أنهم آمنوا بالتَّوراة والإنجيل [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইহুদি ও খ্রিস্টানদের জবাইকৃত পশু (হালাল) কেবল এ কারণেই করা হয়েছে যে তারা তাওরাত ও ইঞ্জিলের প্রতি ঈমান এনেছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تصحف في النسخ الخطية إلى: فضيل، وقد سلف الكلام عليه عند الحديث (347).
[2] إسناده حسن إن شاء الله.وأخرجه البيهقي 9/ 282 عن أبي عبد الله الحاكم وآخر معه، بهذا الإسناد.وأخرجه إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (13) عن سماك بن حرب، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (11779) من طريق إسماعيل بن عمرو البجلي، عن سماك، به.وإسماعيل فيه ضعف لكنه متابع.
3253 - حدثنا أبو الحسن علي بن محمد القُرشي بالكوفة، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامري، حدثنا مُصعَب بن المقدام، حدثنا سفيان بن سعيد، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {جَعَلَ فِيكُمْ أَنْبِيَاءَ} قال: جعل منكم [1] أنبياء {وَجَعَلَكُمْ مُلُوكًا} قال: المرأةُ والخادمُ {وَآتَاكُمْ مَا لَمْ يُؤْتِ أَحَدًا مِنَ الْعَالَمِينَ} [المائدة: 20] قال: الذين هم بين ظَهرانَيهِم يومئذٍ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ তা'আলার বাণী: {তোমাদের মধ্যে নবী-রাসূল সৃষ্টি করেছেন...} সম্পর্কে তিনি বলেন: তিনি তোমাদের মধ্য থেকে নবী-রাসূল সৃষ্টি করেছেন। {এবং তোমাদেরকে রাজা-বাদশাহ বানিয়েছেন...} সম্পর্কে তিনি বলেন: (এর অর্থ হলো) স্ত্রী ও খাদেম (সেবক)। {আর তোমাদেরকে এমন কিছু দিয়েছেন যা বিশ্বজগতের কাউকেও তিনি দেননি} (সূরা আল-মাইদাহ্: ২০) সম্পর্কে তিনি বলেন: (এর অর্থ হলো) যারা সেই দিনগুলোতে তাদের আশেপাশে ছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في المطبوع، وهو الوجه، وفي "تلخيص الذهبي": جعل ومنكم! وفي النسخ الخطية: جعلكم ومنكم! وسيأتي برقم (3688) من طريق محمد بن كثير عن سفيان.
[2] إسناده قوي. سفيان بن سعيد: هو الثوري.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4298) من طريق عبد الله بن محمد بن شاكر، عن مصعب ابن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرج آخره الطبري في "تفسيره" 6/ 170 من طريق عبد العزيز بن أبان، عن سفيان، به.ويعني بقوله: "المرأة والخادم -وزاد في بعض الروايات: البيت-" أنه مَن مَلَك هذه الأشياء عُدَّ ملكًا. وسيأتي برقم (3688) من طريق محمد بن كثير عن سفيان.
3254 - حدثنا علي بن محمد القرشي، حدثنا الحسن بن علي، حدثنا مُصعَب ابن المِقدام، حدثنا سفيان، عن سَلَمة بن كُهيل، عن مالك بن حُصَين، عن أبيه، عن عليٍّ في قوله تعالى: {رَبَّنَا أَرِنَا اللَّذَيْنِ أَضَلَّانَا مِنَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ نَجْعَلْهُمَا تَحْتَ أَقْدَامِنَا} [فصلت:29]، قال: إبليسُ، وابنُ آدمَ الذي قَتَل أخاه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {হে আমাদের রব! জিন ও মানবের মধ্যে যারা আমাদের পথভ্রষ্ট করেছে, তাদের দুজনকে আমাদের দেখিয়ে দিন, আমরা তাদের দুজনকে আমাদের পায়ের নিচে রাখব} [সূরা ফুসসিলাত: ২৯] প্রসঙ্গে তিনি বললেন: তারা হল ইবলীস এবং আদম-পুত্র যে তার ভাইকে হত্যা করেছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر حسنٌ إن شاء الله بمجموع طرقه، وهذا إسناد ليِّن، فمالك بن حصين -وهو ابن عقبة الفَزَاري- تفرَّد بالرواية عنه سلمة بن كهيل، فهو في عداد المجاهيل.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 186، وابن أبي شيبة 9/ 364، والطبري في "تفسيره" 24/ 113 وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 47 من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد.ولسفيان الثوري فيه إسنادٌ ثانٍ، فقد أخرجه ابن أبي شيبة 9/ 363، والطبري 24/ 113 من طريق سفيان، عن أبي المقدام ثابت الحدّاد، عن حَبّة بن جُوين العُرَني، عن علي. وهذا إسناد فيه ضعف من جهة حبّة.وله فيه إسناد ثالث، فقد أخرجه أبو حذيفة النهدي في "تفسير سفيان" (858) عنه، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن حَبّة العربي، عن علي.وأخرجه الطبري 24/ 113 - 114 من طريق شعبة، عن سلمة بن كهيل، عن أبي مالك أو ابن مالك، عن أبيه، عن علي. وسيأتي برقم (3688) من طريق محمد بن كثير عن سفيان.
3255 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا محمد بن عبد الوهاب، حدثنا مُحاضِر بن المورِّع، حدثنا الأعمش، عن أبي وائل، عن حُذَيفة: أنه سمع قارئًا يقرأ {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ} [المائدة: 35]، قال: القُرْبةَ، ثم قال: لقد عَلِمَ المحفوظون من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم أنَّ ابنَ أمِّ عبدٍ من أقربِهم إلى الله وسيلةً [1].
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি একজন কারীকে এই আয়াতটি তিলাওয়াত করতে শুনলেন: "হে মুমিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং তাঁর দিকে ওয়াসীলা (নিকটবর্তী হওয়ার মাধ্যম) অন্বেষণ করো।" [সূরা মায়েদা: ৩৫] তিনি (হুযাইফা) বললেন: আল-কুরবাহ (আল্লাহর নৈকট্য)। অতঃপর তিনি বললেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে যারা সংরক্ষক (জ্ঞানী) ছিলেন, তারা নিশ্চিতভাবে জানতেন যে ইবনু উম্মে আব্দ (অর্থাৎ আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ) তাঁদের মধ্যে আল্লাহর নিকট পৌঁছার জন্য সবচেয়ে নিকটতম ওয়াসীলা (মাধ্যম/নৈকট্য লাভকারী)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل محاضر بن المورِّع أبو وائل: هو شقيق بن سلمة.وسيأتي برقم (5461) من طريق أبي معاوية عن الأعمش دون ذكر الآية، وزاد في أوله: أشبه الناس هديًا وسمتًا ودلًّا بمحمد صلى الله عليه وسلم عبدُ الله بن مسعود … وانظر تخريجه هناك.وابن أمِّ عبدٍ: هو عبد الله بن مسعود رضي الله عنه. وأخرجه النسائي (6336) و (7181)، والضياء (129) من طريقين آخرين عن عباد بن العوام، بذكر ابن عبَّاس فيه.وأخرجه أبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (247)، والطبري في "تفسيره" 6/ 245 من طريق يزيد بن هارون، عن سفيان بن حسين، لم يذكر فيه ابنَ عبَّاس وجعله من قول مجاهد.وكذلك رواه منصور بن زاذان عن الحكم عند أبي عبيد (244) والطبري 6/ 245 والنحاس ص 398، من قول مجاهد.وأخرجه أبو عبيد (243) من طريق عطاء بن أبي مسلم الخراساني، وأبو داود (3590) من طريق يزيد النحوي عن عكرمة، كلاهما عن ابن عبَّاس. ورواه السُّدي عند عبد الرزاق في "مصنفه" (10010) وأبي عبيد (245) والطبري 6/ 245 والبيهقي 8/ 249 عن عكرمة من قوله.وانظر التعليق على مسألة النسخ هذه في "سنن أبي داود" (طبعة دار الرسالة).
3256 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا سعيد ابن سليمان الواسطي، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، حدثنا سفيان بن حسين، عن الحَكَم، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس قال: آيتانِ منسوختانِ من سورة المائدة: {فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ} [المائدة:42]، فأنزل الله عز وجل: {وَأَنِ احْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ} [المائدة: 49] … [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সূরা আল-মায়িদার দুটি আয়াত রহিত (মানসূখ) হয়েছে: {ফাহ্কুম বাইনাহুম আও আ'রিদ 'আনহুম} [আল-মায়িদা: ৪২]। অতঃপর আল্লাহ তা'আলা নাযিল করেন: {ওয়া আন ইহ্কুম বাইনাহুম বিমা আনঝালাল্লাহু ওয়া লা তাত্তাৰি' আহ্ওয়াআহুম} [আল-মায়িদা: ৪৯]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هنا بياض في النسخ الخطية قدر نصف سطر، وقد جاء في هذا الحديث عند غير المصنف: أنَّ الآية الثانية المنسوخة من سورة المائدة هي آية القلائد.والخبر إسناده صحيح. الحكم: هو ابن عُتيبة.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1135، وأبو جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 397، والطبراني في "الأوسط" (8482)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 248 - 249، و"معرفة السنن والآثار" (16983) و (18762)، والضياء المقدسي في "المختارة" 13 / (128) من طرق عن سعيد بن سليمان الواسطي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 6/ 246 عن محمد بن عمار، عن سعيد بن سليمان، به -إلّا أنه لم يذكر فيه ابن عبَّاس، ووقفه على مجاهد. وهذا طريق شاذّ في رواية سعيد بن سليمان الواسطي. وأخرجه النسائي (6336) و (7181)، والضياء (129) من طريقين آخرين عن عباد بن العوام، بذكر ابن عبَّاس فيه.وأخرجه أبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (247)، والطبري في "تفسيره" 6/ 245 من طريق يزيد بن هارون، عن سفيان بن حسين، لم يذكر فيه ابنَ عبَّاس وجعله من قول مجاهد.وكذلك رواه منصور بن زاذان عن الحكم عند أبي عبيد (244) والطبري 6/ 245 والنحاس ص 398، من قول مجاهد.وأخرجه أبو عبيد (243) من طريق عطاء بن أبي مسلم الخراساني، وأبو داود (3590) من طريق يزيد النحوي عن عكرمة، كلاهما عن ابن عبَّاس. ورواه السُّدي عند عبد الرزاق في "مصنفه" (10010) وأبي عبيد (245) والطبري 6/ 245 والبيهقي 8/ 249 عن عكرمة من قوله.وانظر التعليق على مسألة النسخ هذه في "سنن أبي داود" (طبعة دار الرسالة).
3257 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جَرير، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن همَّام قال: كنا عند حُذَيفة فذكروا {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ} [المائدة: 44]، فقال رجل من القوم: إنَّ هذا في بني إسرائيل، فقال حذيفة: نِعمَ الإخوةُ بنو إسرائيل أن كان لكم الحُلوُ ولهم المُرُّ، كلَّا والذي نفسي بيده حتى تَحذُوا السُّنةَ بالسُّنةِ حَذْوَ القُذَّةِ بالقُذَّة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাম্মাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তারা (উপস্থিত লোকেরা) সূরা মায়েদার ৪৪ নং আয়াতটি নিয়ে আলোচনা করছিল: "আর যারা আল্লাহ যা অবতীর্ণ করেছেন, সে অনুযায়ী বিধান দেয় না, তারা কাফির।" তখন উপস্থিত লোকদের মধ্যে এক ব্যক্তি বলল: এটি তো বনী ইসরাঈলের ক্ষেত্রে প্রযোজ্য। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বনী ইসরাঈল কতই না উত্তম ভাই! (কারণ) যদি মিষ্টি (সুবিধা) তোমাদের জন্য হয় এবং তিক্ততা (কষ্ট/শাস্তি) তাদের জন্য হয়। কখনোই না! সেই সত্তার শপথ, যার হাতে আমার প্রাণ, তোমরা অবশ্যই সুন্নাহকে সুন্নাহর সাথে অনুসরণ করবে, যেমন তীর-পালকের সাথে তীর-পালক হুবহু মিলে যায়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح إسحاق بن إبراهيم هو ابن راهويه، وجرير: هو ابن عبد الحميد، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وهمام: هو ابن الحارث النخعي.وأخرجه محمد بن نصر المروزي في "السنة" (65) عن إسحاق بن راهويه بهذا الإسناد.وأخرجه محمد بن خلف وكيع في "أخبار القضاة" 1/ 39 - 40 من طريق عثمان بن محمد بن أبي شيبة، عن جرير، به.وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 4/ 179 من طريق أبي بكر بن عياش، عن الأعمش، به.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 191، وكذا الطبري 6/ 253، وابن أبي حاتم 4/ 1143، وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 2/ 737 من طريق سفيان الثوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أبي البختري، عن حذيفة. وروي عن سفيان فيه إسناد آخر، فهو عند أبي حذيفة النهدي في "تفسير سفيان" (244)، ومن طريقه وكيع في "أخبار القضاة" 1/ 40 عن حبيب بن أبي ثابت، عن أبو الطفيل، عن حذيفة. وأبو حذيفة النهدي وقع له في روايته عن سفيان أخطاء، ويغلب على ظننا أنَّ هذا منها.والقُذَّة: واحدة القُذَذ، وهي ريش السَّهم، ومعنى "حذوَ القذة بالقذة" أي: كما تقدَّر كل واحدة منهما على قدر صاحبتها وتُقطَع، يُضرَب مثلًا للشيئين يستويان ولا يتفاوتان. قاله ابن الأثير في "النهاية".
3258 - أخبرنا أحمد بن سليمان المَوصِلي، حدثنا علي بن حَرْب، حدثنا سفيان ابن عُيينة، عن هشام بن حُجَير، عن طاووس قال: قال ابن عبَّاس: إنه ليس بالكفر الذي يذهبون إليه، إنه ليس كفرًا يَنقُل عن المِلَّة؛ {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ} [المائدة: 44]؛ كفرٌ دونَ كفرٍ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: এটি সেই কুফর নয়, যেদিকে তারা যায় (যা তারা মনে করে)। এটি এমন কুফর নয় যা ইসলাম ধর্মের গণ্ডি থেকে বের করে দেয়। [আল্লাহর বাণী:] “যারা আল্লাহর নাযিল করা বিধান অনুযায়ী ফায়সালা করে না, তারা কাফির।” (সূরা আল-মায়েদা, ৪৪) এটি হলো কুফর, তবে তা হলো (বড়) কুফরের চেয়ে ছোট কুফর।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل هشام بن حُجير.وأخرجه البيهقي 8/ 20 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (749)، ومحمد بن نصر المروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (569)، وأبو بكر الخلال في "السنة" (1419)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1143، وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 2/ 736 من طرق عن سفيان بن عيينة، به -دون قوله: "إنه ليس كفرًا ينقل عن المِلّة، كفر دون كفر"، وجعل الإمام أحمد في روايته عن سفيان عند الخلال وابن بطة هذا القول دون قوله: "كفر دون كفر" من كلام سفيان نفسه.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 6/ 256، والمروزي (571) و (572)، وابن بطة 2/ 734 من طريق سفيان الثوري، عن معمر، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عبَّاس قال: هو به كفر، وليس كمن كفر بالله وملائكته وكتبه ورسله. وإسناده صحيح.ورواه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 191 - ومن طريقه الطبري 6/ 256، والمروزي (570)، وابن أبي حاتم 4/ 1143، وابن بطة 2/ 736 - عن معمر، عن ابن طاووس، عن أبيه، قال: سئل ابن عبَّاس عن هذه الآية، قال: هي كفر. قال ابن طاووس: وليس كمن كفر بالله وملائكته وكتبه ورسله.
3259 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا عبد الملك ابن محمد الرَّقَاشي، حدثنا وَهْب بن جَرير وسعيد بن عامر قالا: حدثنا شعبة، عن سِماك بن حَرْب، قال: سمعت عِيَاضً [1] الأشعريَّ يقول: لمَّا نزلت {فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ} [المائدة: 54]، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هم قَومُك يا أبا موسى"، وأومأَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده إلى أبي موسى الأشعريِّ [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {অচিরেই আল্লাহ এমন এক সম্প্রদায়কে আনবেন যাদেরকে তিনি ভালোবাসেন এবং যারা তাঁকে ভালোবাসে} [সূরা আল-মায়িদাহ: ৫৪], তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবূ মূসা! তারা হলো তোমার কওম (সম্প্রদায়)।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দ্বারা আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ইশারা করলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا جاء في أصولنا الخطية بغير ألف مع أنه منصوب، على لغة من يكتب المنصوب بلا ألف، وانظر التعليق عند الحديث (1429).
[2] إسناده إلى عياض حسن، وعياض قد اختُلف في صحبته، فإن لم يكن صحابيًا فهو تابعي مخضرم، وحديثه هذا مرسل، وقد رواه بعضهم عن سماك فجعله من رواية عياض الأشعري عن أبي موسى.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 32/ 33 من طريق الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 4/ 100، وابن أبي شيبة في "مسنده" (664)، و"مصنفه" 12/ 123، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2515)، والطبري في "تفسيره" 6/ 284، والطبراني في "الكبير" 17/ (1016)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5438)، و"أخبار أصبهان" 1/ 59، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 363، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 32/ 33 - 34 و 47/ 252 من طرق عن شعبة، به.وأخرجه الطبري 6/ 284، وابن أبي حاتم 4/ 1160، وابن عساكر 32/ 34 و 47/ 253 من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث وأبي الوليد الطيالسي، عن شعبة، عن سماك، عن عياض، عن أبي موسى الأشعري. فوصله بذكر أبي موسى.وكذلك أخرجه موصولًا تمام الرازي في "فوائده" (1108)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 351، وابن عساكر 32/ 34 من طريق عبد الله بن إدريس الأودي، عن أبيه، عن سماك به.ويشهد له حديث جابر مرفوعًا عند ابن أبي حاتم 4/ 160، والطبراني في "الأوسط" (1392)، وإسناده حسن.
3260 - حدثنا عبد الصمد بن علي البزَّاز ببغداد، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا الحارث بن عُبيد، حدثنا سعيد الجُرَيري، عن عبد الله بن شَقيق، عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُحرَسُ حتى نزلت هذه الآية: {وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ} [المائدة: 67]، فأخرج النبي صلى الله عليه وسلم رأسَه من القُبَّة، فقال لهم: "أيها الناسُ، انصَرِفوا، فقد عَصَمَني اللهُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পাহারা দেওয়া হতো যতক্ষণ না এই আয়াত নাযিল হলো: {আর আল্লাহ আপনাকে মানুষের (ক্ষতি) থেকে রক্ষা করবেন} [সূরা আল-মায়েদা: ৬৭]। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁবুর ভেতর থেকে তাঁর মাথা বের করলেন এবং তাদের বললেন: "হে লোক সকল, তোমরা চলে যাও, আল্লাহ অবশ্যই আমাকে রক্ষা করেছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات غير الحارث بن عبيد الإيادي فإنه ضعيف يُعتبر به، وقد خالفه إسماعيل ابن عُليَّة عند الطبري 6/ 307 - 308، ووُهيب بن خالد عند ابن مردويه -كما في "تفسير ابن كثير"- فروياه عن سعيد بن إياس الجريري عن عبد الله بن شقيق مرسلًا لم يذكر فيه عائشة، وهو الصواب، فإنَّ ابن عُليَّة ووهيب ثقتان ثبتان.وأخرجه الترمذي (3046) من طريقين عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد. وقال: حديث غريب، ثم أشار إلى الرواية المرسلة. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 9/ 156: إسناده حسن، واختُلف في وصله وإرساله.