আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
3221 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي ببغداد، حدثنا إسحاق بن الحسن الحَرْبي، حدثنا أبو حُذَيفة، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن الحَكَم، عن مقسَم، عن ابن عبَّاس: {وَمَنْ كَانَ غَنِيًّا فَلْيَسْتَعْفِفْ} فلا يحتاجُ إلى مالِ اليتيم {وَمَنْ كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ} [النساء: 6] يأكلُ من ماله مثل أن يَقُوتَ حتى لا يحتاجَ إلى مال اليتيم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আল্লাহ্র বাণী): “আর যে স্বচ্ছল সে যেন বিরত থাকে,” (এর অর্থ হলো) তার ইয়াতীমের সম্পদের প্রয়োজন নেই। “আর যে দরিদ্র সে যেন সংগতভাবে খায়,” [সূরা নিসা: ৬] (এর অর্থ হলো) সে তার সম্পদ থেকে তার ভরণপোষণের প্রয়োজন অনুযায়ী খাবে, যেন তার ইয়াতীমের সম্পদের দরকার না হয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي حذيفة: وهو موسى بن مسعود النَّهدي، وقد توبع. سفيان: هو الثوري، والحكم هو ابن عتيبة، ومقسم: هو ابن بُجْرة مولى ابن عبَّاس.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 869، والنحاس في "الناسخ والمنسوخ"، ص 299 - 300 من طريقين عن سفيان، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو داود في الناسخ والمنسوخ كما في "تهذيب الكمال" 15/ 209 عن عبد الله بن عبد الرحمن بن عبد الله الدشتكي، عن أبيه، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبري في "تفسيره" 4/ 268 من طريق عنبسة بن سعيد، عن سليمان الشيباني، به.
3222 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن محمود، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله الدَّشتَكي، حدثنا عمرو بن أبي قيس، عن أبي إسحاق الشَّيباني، عن عِكْرمة عن ابن عبّاس في قوله: {وَإِذَا حَضَرَ الْقِسْمَةَ أُولُو الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينُ فَارْزُقُوهُمْ مِنْهُ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَعْرُوفًا} [النساء: 8]، قال: يُرضَخُ لهم، فإن كان في المال تقصيرٌ اعتُذِرَ إليهم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী: {আর যখন বন্টনের সময় নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম ও মিসকীনরা উপস্থিত হয়, তখন তা থেকে তাদেরকে কিছু দাও এবং তাদের সাথে সদালাপ করো} [সূরা আন-নিসা: ৮] প্রসঙ্গে তিনি বলেন: তাদেরকে সামান্য কিছু (উপহার) দেওয়া উচিত। আর যদি সম্পদে ঘাটতি থাকে, তবে তাদের কাছে ওজর পেশ করা উচিত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عمرو بن أبي قيس. أبو إسحاق الشيباني: هو سليمان بن أبي سليمان الكوفي. وأخرجه أبو داود في الناسخ والمنسوخ كما في "تهذيب الكمال" 15/ 209 عن عبد الله بن عبد الرحمن بن عبد الله الدشتكي، عن أبيه، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبري في "تفسيره" 4/ 268 من طريق عنبسة بن سعيد، عن سليمان الشيباني، به.
3223 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا جَرير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبَّاس قال: لما أنزل الله: {وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ} [الأنعام: 152]، و {إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًا} [النساء: 10]، قال: انطَلَق من كان عنده يتيمٌ فعَزَلَ طعامَه من طعامه وشرابَه من شرابه، فجعل يَفضُلُ الشيءُ من طعامه وشرابه فيُحبَس حتى يأكلَه أو يَفْسُدَ، فاشتدَّ ذلك عليهم، فذكروا ذلك للنبيِّ صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلَاحٌ لَهُمْ خَيْرٌ وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ} [البقرة:220]، فخَلَطوا طعامَهم بطعامِهم، وشرابَهم بشرابِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর ইয়াতীমের সম্পদের ধারেকাছেও যেও না, তবে উত্তম পন্থায়" (সূরা আল-আন'আম: ১৫২), এবং "নিশ্চয় যারা ইয়াতীমদের সম্পদ অন্যায়ভাবে ভক্ষণ করে, তারা তো তাদের পেটে আগুন ভর্তি করে এবং অতি সত্বর তারা জলন্ত আগুনে প্রবেশ করবে।" (সূরা আন-নিসা: ১০), তখন যার কাছেই ইয়াতীম ছিল, তারা ইয়াতীমের খাবার তাদের খাবার থেকে এবং ইয়াতীমের পানীয় তাদের পানীয় থেকে আলাদা করে দিল। ফলে ইয়াতীমের খাবার ও পানীয় থেকে কিছু অংশ অবশিষ্ট থাকলে তা জমা রাখা হতো যতক্ষণ না সে তা খেত অথবা তা নষ্ট হয়ে যেত। এতে তাদের জন্য বিষয়টি খুব কঠিন হয়ে গেল। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "তারা তোমাকে ইয়াতীমদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছে, বলো: তাদের জন্য সুব্যবস্থা (সংশোধন করা) করাই শ্রেষ্ঠ। আর যদি তোমরা তাদের সাথে মিশ্রিত হও, তবে তারা তো তোমাদের ভাই।" (সূরা আল-বাকারা: ২২০), এরপর তারা তাদের খাবার ও পানীয়ের সাথে ইয়াতীমদের খাবার ও পানীয় মিশ্রিত করে দিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر حسن، وقد سلف الكلام عليه برقم (2530)، وسيأتي مكررًا برقم (3278). وأخرجه بنحوه البخاري (4577)، ومسلم (1616) (6)، والنسائي (6289) و (11025) من طريق ابن جريج، عن محمد بن المنكدر، به فاستدراك الحاكم له ذهول منه.أما رواية شعبة عن محمد بن المنكدر التي أشار إليها المصنف، فهي عند البخاري برقم (194) و (5676) و (6743)، ومسلم برقم (1616) (8). وهو عند أحمد في "مسنده" 22/ (14186)، وانظر تتمة تخريجه فيه.
3224 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن محمود ابن حَرْب المقرئ، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد، حدثنا عمرو بن أبي قيس، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَعودُني وأنا مريض في بني سَلِمة، فقلت: يا رسول الله، كيف أَقسِمُ مالي بين ولدي؟ فلم يردَّ عليَّ شيئًا، فنزلت {يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ} [النساء: 11] [1]. قد اتفق الشيخان على إخراج حديث شُعبة عن محمد بن المنكَدِر في هذا الباب بألفاظٍ غيرِ هذه، وهذا إسناد صحيح، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু সালিমাহ গোত্রে আমার অসুস্থতার সময় আমাকে দেখতে এসেছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমি আমার সন্তানদের মধ্যে আমার সম্পদ কীভাবে ভাগ করব? তিনি আমাকে কোনো জবাব দিলেন না। অতঃপর (এই আয়াত) নাযিল হলো: "আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের সন্তানদের সম্পর্কে নির্দেশ দিচ্ছেন..." (সূরা নিসা: ১১)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عمرو بن أبي قيس، وقد توبع.وأخرجه الترمذي (2096) عن عبد بن حميد، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح. وأخرجه بنحوه البخاري (4577)، ومسلم (1616) (6)، والنسائي (6289) و (11025) من طريق ابن جريج، عن محمد بن المنكدر، به فاستدراك الحاكم له ذهول منه.أما رواية شعبة عن محمد بن المنكدر التي أشار إليها المصنف، فهي عند البخاري برقم (194) و (5676) و (6743)، ومسلم برقم (1616) (8). وهو عند أحمد في "مسنده" 22/ (14186)، وانظر تتمة تخريجه فيه.
3225 - هكذا أخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا الهيثم ابن خالد، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا ابن عُيينة، عن عمرو بن دينار قال: سمعت محمدَ ابن طلحة بن يزيد بن رُكَانة يحدِّث عن عمر بن الخطاب قال: لَأن أكونَ سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ثلاث، أحبُّ إلي من حُمْر النَّعَم: مَن الخليفةُ بعده؟ وعن قومٍ قالوا: نُقِرُّ بالزكاة في أموالنا ولا نؤدِّيها إليك، أيَحِلُّ قتالُهم؟ وعن الكَلَالة [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যদি আমি তিনটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম, তবে তা আমার কাছে লাল রঙের উট (মূল্যবান সম্পদ) প্রাপ্তির চেয়েও বেশি প্রিয় ছিল: তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরে খলিফা কে হবেন? আর ঐ সম্প্রদায় সম্পর্কে, যারা বলত, 'আমরা আমাদের সম্পদে যাকাতের স্বীকৃতি দিচ্ছি, কিন্তু তা আপনাকে দেব না,' তাদের বিরুদ্ধে কি যুদ্ধ করা বৈধ হবে? এবং কালালাহ (উত্তরাধিকারের একটি বিশেষ মাসআলা) সম্পর্কে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات إلّا أنه منقطع، محمد بن طلحة لم يدرك عمرَ بنَ الخطاب، وبهذا أعلَّه الذهبي في "تلخيصه". أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين.وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (19185)، وسعيد بن منصور في "سننه" (2932) عن سفيان بن عيينة بهذا الإسناد. وقرن عبد الرزاق بسفيان ابنَ جُريج. وأخرجه كذلك الطبري في "تفسيره" 4/ 286 عن سفيان بن وكيع، وابن المنذر في "تفسيره" (1442) من طريق محمد بن الصباح، والطحاوي في "مشكل الآثار" 13/ 227 عن عيسى بن إبراهيم الغافقي، عن سفيان بن عيينة، به.وأخرجه عبد الرزاق (19188) عن ابن عيينة، به -وزاد في آخره: حسبت أنه قال: ولا والد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 887 عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن ابن عيينة، به -وزاد: ولا والد؛ ولم يشك.وهاتان الروايتان شاذّتان، والمحفوظ عن سفيان بدون قوله: ولا والد، وتابعه عليه هكذا ابنَ جريج عن ابن طاووس عن أبيه فيما سيأتي برقم (8046).وأما ما رواه الشَّعبي عند عبد الرزاق (19191)، والدارمي (3015)، والطحاوي 13/ 230، وسميط بن عمير عند البيهقي 6/ 224، كلاهما عن عمر: أنَّ الكلالة مَن لا ولد له ولا والد. فإنه منقطع، فكلاهما لم يدرك عمر.ثم إنَّ الإجماع قد انعقد عند أئمة الدِّين على أن الكلالة هو من لا ولد له ولا والد.
3226 - وأخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة حدثنا الهيثم بن خالد، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا ابن عُيينة قال: سمعت سليمان الأحوَل يُحدِّث عن طاووس قال: سمعتُ ابن عبَّاس قال: كنت آخر الناس عهداً بعمر، فسمعته يقول: القولُ ما قلتُ، قلت: وما قلتَ؟ قال: قلتُ: الكَلَالةُ مَن لا ولدَ له [1]. هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে যারা শেষবার সাক্ষাত করেছিলেন, আমি ছিলাম তাদের মধ্যে। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: (আসল) কথা সেটাই, যা আমি বলেছি। আমি (ইবনু আব্বাস) বললাম: আপনি কী বলেছেন? তিনি বললেন: আমি বলেছি, ‘কালালাহ’ (উত্তরাধিকার সূত্রে মৃত ব্যক্তি) হলো সেই ব্যক্তি, যার কোনো সন্তান নেই।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه سعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (589)، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 11/ 415، وسعدان بن نصر في "جزئه" (23) -ومن طريقه البيهقي 6/ 225 - ثلاثتهم عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. كرواية المصنف. وأخرجه كذلك الطبري في "تفسيره" 4/ 286 عن سفيان بن وكيع، وابن المنذر في "تفسيره" (1442) من طريق محمد بن الصباح، والطحاوي في "مشكل الآثار" 13/ 227 عن عيسى بن إبراهيم الغافقي، عن سفيان بن عيينة، به.وأخرجه عبد الرزاق (19188) عن ابن عيينة، به -وزاد في آخره: حسبت أنه قال: ولا والد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 887 عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن ابن عيينة، به -وزاد: ولا والد؛ ولم يشك.وهاتان الروايتان شاذّتان، والمحفوظ عن سفيان بدون قوله: ولا والد، وتابعه عليه هكذا ابنَ جريج عن ابن طاووس عن أبيه فيما سيأتي برقم (8046).وأما ما رواه الشَّعبي عند عبد الرزاق (19191)، والدارمي (3015)، والطحاوي 13/ 230، وسميط بن عمير عند البيهقي 6/ 224، كلاهما عن عمر: أنَّ الكلالة مَن لا ولد له ولا والد. فإنه منقطع، فكلاهما لم يدرك عمر.ثم إنَّ الإجماع قد انعقد عند أئمة الدِّين على أن الكلالة هو من لا ولد له ولا والد.
3227 - وأخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة، حدثنا الهيثم بن خالد، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا سفيان، عن عمرو بن مُرَّة، عن مُرَّة، عن عمر قال: ثلاثٌ لأن يكونَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بينَّهم لنا، أحبُّ إليَّ من الدنيا وما فيها: الخِلافةُ، والكَلالةُ، والرِّبا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তিনটি বিষয় এমন, যদি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের জন্য সেগুলোর ব্যাখ্যা করে যেতেন, তবে তা আমার কাছে দুনিয়া ও তার মধ্যে যা কিছু আছে তার চেয়েও বেশি প্রিয় হতো: খিলাফত, কালালাহ এবং রিবা।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات، إلّا أنه منقطع، مرَّة -وهو ابن شراحيل- روايته عن عمر مرسلة. سفيان هنا: هو الثوري.وأخرجه ابن ماجه (2727) من طريق وكيع عن سفيان -وهو الثوري- بهذا الإسناد.وتابع سفيانَ عليه شعبةُ عند أبي داود الطيالسي (60)، والطحاوي في "مشكل الآثار" 13/ 224.وأخرجه بنحوه البخاري (5588)، ومسلم (3032)، وأبو دارد (3669) من طريق الشعبي، عن ابن عمر، عن أبيه عمر - وذكر فيه الجَدَّ بدل الخلافة.
3228 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا أحمد بن سيَّار، حدثنا محمد بن كَثير، حدثنا سفيان عن الأعمش، عن إسماعيل بن رَجَاء، عن عُمَير، عن ابن عبَّاس قال: حَرُمَ من النَّسب سبعٌ ومن الصِّهر سبعٌ، ثم قرأ هذه الآية: {حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ وَعَمَّاتُكُمْ وَخَالَاتُكُمْ وَبَنَاتُ الْأَخِ وَبَنَاتُ الْأُخْتِ} هذا من النَّسَب، {وَأُمَّهَاتُكُمُ اللَّاتِي أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ مِنَ الرَّضَاعَةِ وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ وَرَبَائِبُكُمُ اللَّاتِي فِي حُجُورِكُمْ مِنْ نِسَائِكُمُ اللَّاتِي دَخَلْتُمْ بِهِنَّ فَإِنْ لَمْ تَكُونُوا دَخَلْتُمْ بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَائِلُ أَبْنَائِكُمُ الَّذِينَ مِنْ أَصْلَابِكُمْ وَأَنْ تَجْمَعُوا بَيْنَ الْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ} [النساء: 23]، {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ} [النساء: 22] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهد صحيح من رواية عكرمة:
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বংশের কারণে সাত প্রকার মহিলাকে হারাম করা হয়েছে এবং বৈবাহিক সম্পর্কের কারণে সাত প্রকার মহিলাকে হারাম করা হয়েছে। অতঃপর তিনি এই আয়াতটি পাঠ করলেন: "তোমাদের জন্য হারাম করা হয়েছে তোমাদের মাতাগণকে, কন্যাগণকে, বোনগণকে, ফুফুগনণকে, খালাগণকে, ভাইয়ের মেয়েদেরকে এবং বোনের মেয়েদেরকে।" এটা হলো বংশীয় সম্পর্কের (কারণে হারাম)। "[হারাম করা হয়েছে] এবং তোমাদের ঐ সমস্ত মাতাগণকে যারা তোমাদেরকে দুধ পান করিয়েছেন এবং তোমাদের দুধ বোনদেরকে, এবং তোমাদের স্ত্রীদের মাতাগণকে, এবং তোমাদের স্ত্রীদের ঐ কন্যাগণকে যাদের সাথে তোমরা সহবাস করেছো, যারা তোমাদের তত্ত্বাবধানে আছে। তবে যদি তোমরা তাদের সাথে সহবাস না করে থাকো, তবে তোমাদের উপর কোনো পাপ নেই। আর তোমাদের ঔরসজাত পুত্রদের স্ত্রীদেরকে (হারাম করা হয়েছে)। আর দুই বোনকে একত্রে (বিবাহ বন্ধনে) রাখা (হারাম), তবে যা গত হয়েছে (তা ব্যতিক্রম)।" [নিসা: ২৩]। "আর তোমাদের পিতৃপুরুষরা যে নারীদের বিবাহ করেছে, তোমরা তাদেরকে বিবাহ করো না।" [নিসা: ২২]
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وعمير: هو مولى ابن عبَّاس.وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (10808)، والطبري في "تفسيره" 4/ 320، والطحاوي في "مشكل الآثار" 12/ 200، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 911 و 914، والطبراني في "الكبير" (12222) من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (5105) من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن سفيان -وهو الثوري- عن حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عبَّاس. فكان الأَولى بالحاكم عدم استدراكه.
3229 - أخبرنيه أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامري، حدثنا الحسن بن عَطيَّة [1]، حدثنا علي بن صالح، عن سِمَاك، عن عِكْرمة عن ابن عبَّاس قال: حَرُمَ سبعٌ من النَّسب، وسبعٌ من الصِّهْر [2].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বংশগত কারণে সাতজন নারীকে এবং বৈবাহিক সম্পর্কের কারণে সাতজন নারীকে (বিবাহ করা) হারাম করা হয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] زاد هنا في نسخنا الخطية حدثنا علي بن عطية، وهي زيادة مقحمة.
[2] خبر صحيح وهذا إسناد حسن، سماك -وهو ابن حرب- وإن كان في روايته عن عكرمة اضطراب، قد توبع.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 4/ 320، والجصاص في "أحكام القرآن" 3/ 64، والطبراني في "الكبير" (11772) من طريقين عن علي بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني (11956) من طريق نعيم بن حماد، عن عبد الوهاب الثقفي، عن خالد الحذّاء، عن عكرمة به وانظر ما قبله.
3230 - أخبرنا الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدثنا شُعبة، عن أبي حَصِين، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: أنه قال في هذه الآية {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} [النساء: 24]، قال: كلُّ ذاتِ زوج إتيانُها زناً إِلَّا ما سُبِيَت [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াত {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} [সূরা নিসা: ২৪] সম্পর্কে বলেছেন, প্রতিটি বিবাহিতা নারীর সাথে সহবাস করা যিনা (ব্যভিচার), তবে যাদেরকে যুদ্ধবন্দী হিসেবে ধরে আনা হয়েছে তারা ব্যতীত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. أبو حَصين: هو عثمان بن عاصم الأسدي.وأخرجه البيهقي 7/ 167 عن أبي عبد الله محمد بن عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 5/ 1 من طريق إسرائيل، عن أبي حصين، به.
3231 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا النَّضْر بن شُميل، أخبرنا شعبة، حدثنا أبو مَسلَمة، قال: سمعت أبا نَضْرة يقول: قرأتُ على ابن عبَّاس {فَمَا اسْتَمْتَعْتُمْ بِهِ مِنْهُنَّ فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ} [النساء: 24]، قال ابنُ عبَّاس: (فما استَمتَعْتُم به مِنهُنَّ إلى أَجَلٍ مُسمًّى)، قال أبو نَضْرة: فقلت: ما نقرؤُها كذلك، قال ابن عبَّاس: واللهِ لَأَنزَلَها اللهُ كذلك [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ নাদরা বলেন, আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে আল্লাহর বাণী: {আর তাদের মধ্যে তোমরা যাদের সাথে উপকৃত হবে (ভোগ করবে), তাদেরকে তাদের নির্ধারিত ফি (দেনমোহর) প্রদান করো} [সূরা নিসা: ২৪] পাঠ করলাম। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (আয়াতের মূল অর্থ হলো) {আর তাদের মধ্যে তোমরা যাদের সাথে একটি নির্ধারিত সময় পর্যন্ত উপকৃত হবে (ভোগ করবে),}। আবূ নাদরা বলেন, আমি বললাম: আমরা তো এটিকে এভাবে পাঠ করি না। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর শপথ! আল্লাহ অবশ্যই এটি এভাবেই অবতীর্ণ করেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، وأبو مسلمة: هو سعيد بن يزيد بن مسلمة الأزدي، وأبو نضرة: هو منذر بن مالك بن قِطعة العبدي.وأخرجه الطبري في "تفسير" 5/ 12 - 13، وابن أبي داود في "المصاحف" (218) من طريقين عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري أيضًا 5/ 12 من طريق داود بن أبي هند، عن أبي نضرة به.ثم قال الطبري تعليقًا على هذه القراءة: هي بخلاف ما جاءت به مصاحفُ المسلمين، وغيرُ جائز لأحد أن يُلحق في كتاب الله تعالى شيئًا لم يأت به الخبرُ القاطعُ العُذرَ عمَّن لا يجوز خلافُه.
3232 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا علي بن الحسن بن شقيق، حدثنا نافع بن عمر، قال: سمعت، عبد الله ابن أبي مَلَيكة يقول: سُئِلت عائشةُ عن مُتْعة النساء، فقالت: بيني وبينكم كتابُ الله، قال: وقرأَتْ هذه الآية: {وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ (5) إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ} [المؤمنون: 5 - 6]، فمَنِ ابْتَغَى وراءَ ما زَوَّجه الله أو مَلَّكَه فقد عَدَا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে মহিলাদের মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: আমার ও তোমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাবই (ফায়সালা স্বরূপ)। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "আর যারা নিজেদের যৌনাঙ্গকে হেফাযত করে। তবে তাদের স্ত্রীগণ অথবা তাদের ডান হাত যাদের মালিক হয়েছে তারা ছাড়া। এতে তারা নিন্দিত হবে না।" (সূরা মু’মিনুন: ৫-৬)। সুতরাং যে ব্যক্তি আল্লাহ যাকে বিবাহ করিয়ে দিয়েছেন অথবা যার মালিক বানিয়েছেন তা ছাড়া অন্য কিছু তালাশ করে, সে সীমালঙ্ঘনকারী।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وسيأتي مكررًا برقم (3526).وأخرجه البيهقي 7/ 206 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (479 - بغية الباحث)، ومن طريقه ابن عبد البر في "التمهيد" 10/ 116 عن بشر بن عمر عن نافع بن عمر الجمحي، به.وأخرج معناه أبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (131) من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة. الخبر: وأظن الخامسة {وَمَنْ يَعْمَلْ سُوءًا … }.
3233 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو البَخْتَري عبد الله بن محمد بن شاكر، حدثنا أبو عبد الله محمد بن بِشْر العَبْدي، حدثنا مِسعَر بن كِدام، عن مَعْن بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود قال: إنَّ في سورة النساء لخمسَ آيات ما يَسُرُّني أنَّ لي بها الدنيا وما فيها: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِنْ لَدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا} [النساء: 40]، و {إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَنُدْخِلْكُمْ مُدْخَلًا كَرِيمًا} [النساء: 31]، و {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [النساء:48]، و {وَلَوْ أَنَّهُمْ إِذْ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ جَاءُوكَ فَاسْتَغْفَرُوا اللَّهَ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمُ الرَّسُولُ لَوَجَدُوا اللَّهَ تَوَّابًا رَحِيمًا} [النساء: 64] [1]، قال عبد الله: ما يَسُرُّني أَنَّ لي بها الدنيا وما فيها [2].هذا إسناد صحيح إن كان عبدُ الرحمن سمع من أبيه، فقد اختُلِفَ في ذلك.
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই সূরা নিসায় পাঁচটি আয়াত রয়েছে, যার বিনিময়ে আমার কাছে দুনিয়া ও এর মধ্যে যা কিছু আছে তা পাওয়ার চেয়েও বেশি প্রিয়:
১. "নিশ্চয় আল্লাহ অণু পরিমাণও যুলুম করেন না। আর যদি কোনো নেক কাজ হয়, তবে তিনি তা দ্বিগুণ করে দেন এবং তাঁর নিকট থেকে মহাপুরস্কার দান করেন।" [সূরা নিসা: ৪০]
২. "তোমাদেরকে যা করতে নিষেধ করা হয়েছে, তার মধ্যে যা গুরুতর (কবীরাহ) তা থেকে যদি তোমরা বিরত থাকো, তবে আমি তোমাদের ত্রুটিগুলো (ছগীরাহ গুনাহ) মুছে দেবো এবং তোমাদেরকে সম্মানজনক স্থানে প্রবেশ করাবো।" [সূরা নিসা: ৩১]
৩. "নিশ্চয় আল্লাহ তাঁর সাথে শিরক করা ক্ষমা করেন না। তিনি এর চেয়ে ছোট অপরাধ যাকে ইচ্ছা ক্ষমা করেন।" [সূরা নিসা: ৪৮]
৪. "আর যদি তারা নিজেদের প্রতি যুলুম করার পর তোমার কাছে আসত অতঃপর আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাইত এবং রাসূলও তাদের জন্য ক্ষমা চাইতেন, তবে অবশ্যই তারা আল্লাহকে তওবা কবুলকারী, পরম দয়ালু হিসেবে পেত।" [সূরা নিসা: ৬৪]
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার কাছে এই (পাঁচটি আয়াতের বিনিময়ে) দুনিয়া ও তার মধ্যে যা কিছু আছে তা পাওয়ার চেয়েও বেশি প্রিয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] زاد بعد هذا في المطبوع: و {وَمَنْ يَعْمَلْ سُوءًا أَوْ يَظْلِمْ نَفْسَهُ ثُمَّ يَسْتَغْفِرِ اللَّهَ يَجِدِ اللَّهَ غَفُورًا رَحِيمًا} [النساء:110]، وهذا ثابت في غير رواية الحاكم، أما روايته فالصواب -كما في نسخنا الخطية- أنه لم ترد فيها هذه الآية الخامسة، والدليل على ذلك أنَّ البيهقي في "شعب الإيمان" (2202) روى هذا الخبر عن شيخه أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد دون ذكرها، ثم قال في آخر الخبر: وأظن الخامسة {وَمَنْ يَعْمَلْ سُوءًا … }.
[2] إسناده صحيح، والراجح في عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود أنه سمع من أبيه قليلًا.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (2202) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عبيد في "فضائل القرآن" ص 277، وسعيد بن منصور في التفسير من "سننه" (659)، وابن المنذر في "تفسيره" (1673) و (1956)، والطبراني في "الكبير" (9069)، والبيهقي (2203) من طريق سفيان بن عيينة به.
3234 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الوهاب، أخبرنا قَبِيصة، حدثنا سفيان، عن ابن أبي نَجِيح، عن مجاهد، عن أم سَلَمة، أنها قالت: يا رسول الله، أيغزُو الرجالُ ولا نَعْزُو ولا نقاتلُ فتُستشهَدَ، وإنما لنا نصفُ الميراثِ؟ فأنزل الله {وَلَا تَتَمَنَّوْا مَا فَضَّلَ اللَّهُ بِهِ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ} [النساء: 32] [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين إن كان سمع مجاهدٌ من أم سلمة [2].
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! পুরুষরা জিহাদে যায়, আর আমরা যাই না। তারা লড়াই করে শাহাদাত লাভ করে, কিন্তু আমরা তা পাই না। উপরন্তু, আমরা মীরাসের (উত্তরাধিকারের) মাত্র অর্ধেক অংশ পাই! তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর যে বিষয়ে আল্লাহ তোমাদের একজনকে অপরের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দান করেছেন, তোমরা তার আকাঙ্ক্ষা করো না।" (সূরা নিসা: ৩২)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات إلّا أنَّ المحفوظ فيه عن مجاهد: أنَّ أم سلمة قالت؛ هكذا على وجه الإرسال.قبيصة: هو ابن عقبة، وسفيان هو الثوري وابن أبي نجيح: هو عبد الله.وأخرجه أحمد 44 / (26736)، والترمذي (3022) من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن أبي نجيح، به. وقال الترمذي: هذا حديث مرسل، ورواه بعضهم عن ابن أبي نجيح عن مجاهد مرسلًا: أنَّ أم سلمة قالت كذا وكذا.وانظر ما سيأتي برقم (3602).
[2] لم يصرِّح أحدٌ من أهل العلم بنفي سماعه منها، ولقاؤه لها وسماعه منها محتمل جدًا، إلَّا أنه لم يَرِد في شيء من الأسانيد تصريحُه بالسماع، وانظر كلام الشيخ أحمد شاكر رحمه الله في هذه المسألة في تعليقه على "تفسير الطبري" برقم (9241).
3235 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو جعفر أحمد بن عبد الحميد الحارثي، حدثنا أبو أسامة، حدثني إدريس بن يزيد، حدثنا طلحة بن مُصرِّف، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ [1] أَيْمَانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ} [النساء: 33]، قال: كان المهاجرون حين قَدِمُوا المدينةَ تُورَّثُ الأنصارَ دون ذوي القُربَى، رحمةً للأخوَّة التي آخى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ} [النساء: 33]، قال: فنَسَخَتها (وَالَّذِينَ عاقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ) من النَّصر والنَّصيحة [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ..... [3].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী: {আর যাদের সাথে তোমরা অঙ্গীকারাবদ্ধ হয়েছ, তাদের অংশ তাদের প্রদান কর} (সূরা নিসা: ৩৩) প্রসঙ্গে তিনি বলেন: যখন মুহাজিরগণ মদীনায় আগমন করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে যে ভ্রাতৃত্বের বন্ধন স্থাপন করেছিলেন তার দয়াবশত তারা নিকটাত্মীয়দের বাদ দিয়ে আনসারদের সম্পত্তির উত্তরাধিকারী হতো। অতঃপর যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়রা যা রেখে গেছে তার ওয়ারিশ আমরা প্রত্যেকের জন্যই বানিয়েছি} (সূরা নিসা: ৩৩), তিনি বললেন: এই আয়াতটি (উত্তরাধিকারের পূর্বের বিধান) রহিত করে দিয়েছে। আর (وَالَّذِينَ عاقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ)— এর অর্থ হলো সাহায্য ও সৎ পরামর্শের অংশ প্রদান করা।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في نسخ "المستدرك" الحاضرة بين أيدينا، وهي قراءة ابن كثير ونافع وأبي عمرو وابن عامر من السبعة، وقرأ عاصم وحمزة والكسائي "عَقَدَتْ" بغير ألف. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 233. وأخرجه أحمد 28/ (18064) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه بنحوه أحمد 38/ (23353) و (23384) و (23463)، والبخاري (2077) و (2391) و (3451)، ومسلم (1560)، وابن ماجه (2420) من طرق عن ربعي بن حراش، به.
[2] إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه البخاري (458) و (6747)، وأبو داود (2922)، والنسائي (6384) و (11037) من طرق عن أبي أسامة بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه رحمه الله. وأخرجه أحمد 28/ (18064) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه بنحوه أحمد 38/ (23353) و (23384) و (23463)، والبخاري (2077) و (2391) و (3451)، ومسلم (1560)، وابن ماجه (2420) من طرق عن ربعي بن حراش، به.
3235 [3] - هنا بياض في النسخ الخطية، ومكانه في المطبوع: ولم يخرجاه. وأخرجه أحمد 28/ (18064) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه بنحوه أحمد 38/ (23353) و (23384) و (23463)، والبخاري (2077) و (2391) و (3451)، ومسلم (1560)، وابن ماجه (2420) من طرق عن ربعي بن حراش، به.
3236 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا أبو خالد الأحمر، حدثنا سعد بن طارق أبو مالك الأشجَعي، حدثنا رِبْعيُّ بن حِرَاش، عن حُذيفة قال: "أُتِيَ الله بعبد من عبادِه آتاه الله مالًا، فقال له: ماذا عملتَ في الدنيا؟ - قال: {وَلَا يَكْتُمُونَ اللَّهَ حَدِيثًا} [النساء: 42]- فقال: ما عملتُ من شيء يا ربِّ إلَّا أنك آتيتني مالًا فكنتُ أبايع الناسَ، وكان من خُلُقي أن أيسِّرَ على المُوسِر وأُنظِرَ المُعسِرَ، قال الله: أنا أحقُّ بذلك منك، تَجاوَرُوا عن عبدي". فقال عُقْبة بن عامر الجُهَني وأبو مسعود الأنصاري: هكذا سمعنا من فِي رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলা তাঁর বান্দাদের মধ্য থেকে এমন এক বান্দাকে উপস্থিত করবেন যাকে তিনি সম্পদ দান করেছিলেন। অতঃপর তিনি তাকে বলবেন: দুনিয়াতে তুমি কী আমল করেছো? (বর্ণনাকারী বলেন: তারা আল্লাহর কাছে কোনো কিছুই গোপন করবে না – সূরা নিসা: ৪২)। সে বলবে: হে রব! আমি তো বিশেষ কোনো আমল করিনি, তবে আপনি আমাকে সম্পদ দান করেছিলেন, আর আমি মানুষের সাথে লেনদেন করতাম। আমার স্বভাব ছিল যে, আমি ধনীকে সহজ করে দিতাম এবং অভাবীকে সময় দিতাম। আল্লাহ বলবেন: আমি তোমার চেয়েও (ক্ষমা ও সহজ করার) অধিক উপযুক্ত। তোমরা আমার বান্দাকে ক্ষমা করে দাও। (এরপর) উক্ববা ইবনে আমির আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মুখ থেকে এভাবেই শুনেছি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي خالد الأحمر -وهو سليمان بن حيان- وقد توبع. وأخرجه مسلم (1560) (29) عن أبي سعيد الأشج، عن أبي خالد الأحمر، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهول منه. وأخرجه أحمد 28/ (18064) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه بنحوه أحمد 38/ (23353) و (23384) و (23463)، والبخاري (2077) و (2391) و (3451)، ومسلم (1560)، وابن ماجه (2420) من طرق عن ربعي بن حراش، به.
3237 - أخبرني أبو بكر بن أبي نصر المروَزي، حدثنا عبد العزيز بن حاتم، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد، حدثنا عمرو بن أبي قيس، عن مُطرِّف، عن المنهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: أنَّ رجلًا سأله عن هذه الآية: {وَاللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ} [الأنعام: 23]، وقال في آية أخرى: {وَلَا يَكْتُمُونَ اللَّهَ حَدِيثًا} [النساء: 42]، فقال ابن عبَّاس: أما قوله: {وَاللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ} فإنهم لما رأَوْا يومَ القيامة أنه لا يدخل الجنةَ إِلَّا أَهل الإسلام، قالوا: تعالَوا فلنَجحَدْ، فَخَتَمَ الله على أفواهِهم، فتكلَّمت أيديهم وأرجلُهم، فلا يَكتُمون اللهَ حديثًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক তাঁকে এই আয়াতটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল: “আল্লাহর কসম, আমাদের প্রতিপালকের কসম! আমরা কখনো মুশরিক ছিলাম না।” (সূরা আন'আম: ২৩) এবং অপর একটি আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল: “আর তারা আল্লাহ্র কাছে কোনো কথাই গোপন করবে না।” (সূরা নিসা: ৪২)। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “আল্লাহর কসম, আমাদের প্রতিপালকের কসম! আমরা কখনো মুশরিক ছিলাম না” - এই আয়াতের ব্যাখ্যা হলো, তারা যখন কিয়ামতের দিন দেখবে যে ইসলামপন্থীরা ছাড়া অন্য কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না, তখন তারা (মুশরিকরা) বলবে: 'এসো, আমরা অস্বীকার করি (মিথ্যা বলি)।' অতঃপর আল্লাহ তাদের মুখে মোহর মেরে দেবেন। তখন তাদের হাত ও পা কথা বলবে। ফলে তারা আল্লাহ্র কাছে কোনো কথাই গোপন করতে পারবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عبد العزيز بن حاتم وعمرو بن أبي قيس. مطرف: هو ابن طريف.وأخرجه الطبراني في "تفسيره" 5/ 94، وكذا ابن أبي حاتم 4/ 1274 و 8/ 2558 من طريقين عن عمرو بن أبي قيس، بهذا الإسناد.
3238 - أخبرنا محمد بن علي بن دُحَيم الشَّيباني، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا أبو نُعيم وقَبِيصة قالا: حدثنا سفيان، عن عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن، عن عليٍّ قال: دعانا رجلٌ من الأنصار قبل تحريم الخمر، فحَضَرَت صلاةُ المغرب، فتقدَّم رجلٌ فقرأ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} فالتبس عليه، فنزلت: {لَا تَقْرَبُوا الصَّلَاةَ وَأَنْتُمْ سُكَارَى حَتَّى تَعْلَمُوا مَا تَقُولُونَ} الآية [النساء:43] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وفي هذا الحديث فائدة كبيرة، وهي أنَّ الخوارج تَنُسب هذا السُّكرَ وهذه القراءةَ إلى أمير المؤمنين عليِّ بن أبي طالب دون غيره، وقد برَّأَه الله منها، فإنه راوي هذا الحديث!
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদ হারাম হওয়ার আগে আনসারদের এক ব্যক্তি আমাদেরকে দাওয়াত দিলেন। অতঃপর যখন মাগরিবের সালাতের সময় হলো, তখন একজন লোক ইমামতি করার জন্য এগিয়ে গেলেন এবং তিনি {ক্বুল ইয়া আইয়্যুহাল কাফিরূন} পাঠ করলেন, কিন্তু তিনি (তেলাওয়াত করতে গিয়ে) গুলিয়ে ফেললেন। ফলে এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তোমরা নেশাগ্রস্ত অবস্থায় সালাতের কাছে যেও না, যতক্ষণ না তোমরা যা বলছো তা বুঝতে পারো} [সূরা নিসা: ৪৩]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، ورواية سفيان -وهو الثوري- عن عطاء قبل الاختلاط، لكن اختُلف عليه فيمن أمهم في هذه الصلاة كما سيأتي بيانه عند الروايات (7406 - 7408).
3239 - حدثنا أبو العبَّاس قاسم بن القاسم السَّيَّاري، حدثنا إبراهيم بن هلال، حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، أخبرنا الحسين بن واقد، عن عمرو بن دينار، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس: أنَّ عبد الرحمن بن عَوْف وأصحابًا له أتَوُا النبيَّ صلى الله عليه وسلم بمكة فقالوا: يا نبيَّ الله، كنا في عزٍّ ونحن مشركون، فلمَّا آمَنَّا صِرْنا أَذلَّةً! قال: "إني أُمِرْتُ بالعفو فلا تُقاتِلوا، فكُفُّوا"، فأنزل الله: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ} [النساء: 77] [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবনু আওফ এবং তাঁর কয়েকজন সাথী মক্কায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তারা বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমরা যখন মুশরিক ছিলাম, তখন আমরা সম্মানের সাথে ছিলাম, কিন্তু যখন আমরা ঈমান আনলাম, তখন আমরা লাঞ্ছিত হয়ে গেলাম! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাকে ক্ষমার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে। সুতরাং তোমরা যুদ্ধ করো না। তোমরা (যুদ্ধ থেকে) হাত গুটিয়ে রাখো।" অতঃপর আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: "তুমি কি তাদেরকে দেখনি যাদেরকে বলা হয়েছিল, 'তোমরা তোমাদের হাত গুটিয়ে রাখো, সালাত কায়েম করো ও যাকাত প্রদান করো?' অতঃপর যখন তাদের উপর কিতাল (যুদ্ধ) ফরয করা হলো, তখন তাদের একদল লোককে দেখা গেল, তারা মানুষকে ভয় করছে..." (সূরা নিসা: ৭৭)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل إبراهيم بن هلال وقد سلفت ترجمته برقم (420)، وهذا الحديث سلف برقم (2408). وأخرجه ابن أبي شيبة 9/ 444، ومن طريقه ابن أبي عاصم في "الديات" ص 88، والطبراني في "الأوسط" (8174) عن معاوية بن هشام، عن عمار بن رزيق، به.
3240 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو الجوَّاب، حدثنا عمّار بن رُزَيق، حدثنا عطاء بن السائب، عن أبي يحيى، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {فَإِنْ كَانَ مِنْ قَوْمٍ عَدُوٍّ لَكُمْ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مُؤْمِنَةٍ} قال: كان الرجل يأتي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فيُسلِمُ، ثم يَرِجعُ إلى قومه فيكون فيهم [وهم] مشركون، فيصيبه المسلمون خطأً في سَرِيَّة أو غَزَاة، فيُعتِق الرجلُ رَقَبةً، {وَإِنْ كَانَ مِنْ قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِيثَاقٌ فَدِيَةٌ مُسَلَّمَةٌ إِلَى أَهْلِهِ وَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مُؤْمِنَةٍ} [النساء: 92] قال: يكون الرجلُ معاهدًا وقومه أهلُ عهدٍ فيُسلَّمُ إليهم دِيَتُه، ويُعتق الذي أصابه رقبةً [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আল্লাহ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে বর্ণিত: {যদি নিহত ব্যক্তি এমন কোনো গোত্রের হয় যারা তোমাদের শত্রু এবং সে ছিল মুমিন, তাহলে একজন মুমিন গোলামকে মুক্ত করা অপরিহার্য।} তিনি বলেন: কোনো ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসত এবং ইসলাম গ্রহণ করত। এরপর সে তার মুশরিক গোত্রের কাছে ফিরে যেত এবং তাদের সাথেই থাকত। এমন অবস্থায় মুসলিমরা কোনো সামরিক অভিযানে বা যুদ্ধে ভুলক্রমে তাকে আঘাত করত (এবং সে মারা যেত)। এমতাবস্থায় হত্যাকারী ব্যক্তি একটি গোলামকে মুক্ত করবে। {আর যদি নিহত ব্যক্তি এমন কোনো গোত্রের হয় যাদের সাথে তোমাদের চুক্তি রয়েছে, তবে (নিহত ব্যক্তির) পরিবার-পরিজনদের নিকট দিয়াত (রক্তপণ) পৌঁছাতে হবে এবং একজন মুমিন গোলামকে মুক্ত করতে হবে।} (সূরা আন-নিসা: ৯২)। তিনি বলেন: লোকটি সন্ধিচুক্তিবদ্ধ গোত্রের একজন চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তি হবে, তখন তার দিয়াত তার পরিবারের নিকট পৌঁছে দেওয়া হবে এবং যে তাকে আঘাত করেছে সে একটি গোলাম মুক্ত করবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. أبو الجوَّاب: هو الأحوص بن جوّاب، وأبو يحيى: هو زياد المكي الأعرج.وأخرجه البيهقي 8/ 131 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 1033 عن أحمد بن منصور الرمادي، عن أبي الجوّاب، به. وأخرجه ابن أبي شيبة 9/ 444، ومن طريقه ابن أبي عاصم في "الديات" ص 88، والطبراني في "الأوسط" (8174) عن معاوية بن هشام، عن عمار بن رزيق، به.